सांस्कृतिक निबन्ध : धार्मिक

मेरी प्रिय पुस्तक (श्रीरामचरितमानस) [2011, 12, 15, 17, 18]

सम्बद्ध शीर्षक

  • तुलसी और उनकी अमर कृति
  • हिन्दी का लोकप्रिय ग्रन्थ

रूपरेखा

  1. प्रस्तावना,
  2. श्रीरामचरितमानस का परिचय,
  3. श्रीरामचरितमानस का महत्त्व,
  4. श्रीरामचरितमानस का वण्र्य-विषय,
  5. श्रीरामचरितमानस की विशेषताएँ,
  6. उपसंहार

प्रस्तावना-पुस्तकें मनुष्य के एकाकी जीवन की उत्तम मित्र हैं, जो घनिष्ठ मित्र की तरह सदैव सान्त्वना प्रदान करती हैं। अच्छी पुस्तकें मानव के लिए सच्ची पथ-प्रदर्शिका होती हैं । मनुष्य को पुस्तकें पढ़ने में आनन्द की उपलब्धि होती है। वैसे तो सभी पुस्तकें ज्ञान का अक्षय भण्डार होती हैं और उनसे

मस्तिष्क विकसित होता है, परन्तु अभी तक पढ़ी गयी अनेक पुस्तकों में मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है। ‘श्रीरामचरितमानस’ ने। इसके अध्ययन से मुझे सर्वाधिक सन्तोष, शान्ति और आनन्द की प्राप्ति हुई है।

श्रीरामचरितमानस का परिचय-‘श्रीरामचरितमानस’ के प्रणेता, भारतीय जनता के सच्चे प्रतिनिधि गोस्वामी तुलसीदास जी हैं। उन्होंने इसकी रचना संवत् 1631 वि० से प्रारम्भ करके संवत् 1633 वि० में पूर्ण की थी। यह अवधी भाषा में लिखा गया उनका सर्वोत्तम ग्रन्थ है। इसमें महाकवि तुलसी ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र के जीवन-चरित को सात काण्डों में प्रस्तुत किया है। तुलसीदास जी ने इस महान् ग्रन्थ की रचना ‘स्वान्तः सुखाय’ की है।

श्रीरामचरितमानस का महत्त्व-‘श्रीरामचरितमानस’ हिन्दी-साहित्य को सर्वोत्कृष्ट और अनुपम ग्रन्थ है। यह हिन्दू जनता को परम पवित्र धार्मिक ग्रन्थ है। अनेक विद्वान् अपने वार्तालाप को इसकी सूक्तियों का उपयोग करके प्रभावशाली बनाते हैं। श्रीरामचरितमानस की लोकप्रियता का सबसे सबल प्रमाण यही है कि इसका अनेक विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। यह मानव-जीवन को सफल बनाने के लिए मैत्री, प्रेम, करुणा, शान्ति, तप, त्याग और कर्तव्य-परायणता का महान् सन्देश देता है। |

‘श्रीरामचरितमानस’ का वर्य-विषय-‘श्रीरामचरितमानस की कथा मर्यादा-पुरुषोत्तम राम के सम्पूर्ण जीवन पर आधारित है। इसकी कथावस्तु का मूल स्रोत वाल्मीकिकृत ‘रामायण’ है। तुलसीदास ने अपनी कला एवं प्रतिभा के द्वारा इसे नवीन एवं मौलिक रूप प्रदान किया है। इसमें राम की रावण पर विजय दिखाते हुए प्रतीकात्मक रूप से सत्य, न्याय और धर्म की असत्य, अन्याय और अधर्म पर विजय प्रदर्शित की है। इस महान् काव्य में राम के शील, शक्ति और सौन्दर्य का मर्यादापूर्ण चित्रण है।

श्रीरामचरितमानस की विशेषताएँ—
(क) आदर्श चरित्रों को भण्डार—‘श्रीरामचरितमानस आदर्श चरित्रों को पावन भण्डार है। कौशल्या मातृप्रेम की प्रतिमा हैं। भरत में भ्रातृभक्ति, निलभिता और तप-त्याग का उच्च आदर्श है। सीता पतिपरायणा आदर्श पत्नी हैं। लक्ष्मण सच्चे भ्रातृप्रेमी और अतुल बलशाली हैं। निषाद, सुग्रीव, विभीषण आदि आदर्श मित्र एवं हनुमान सच्चे उपासक हैं।।
(ख) लोकमंगल का आदर्श—तुलसी का ‘श्रीरामचरितमानस’ लोकमंगल की भावना का आदर्श है। तुलसी ने अपनी लोकमंगल-साधना के लिए जो भी आवश्यक समझा, उसे अपने इष्टदेव राम के चरित्र में निरूपित कर दिया।
(ग) भारतीय समाज का दर्पण—तुलसी के ‘श्रीरामचरितमानस में तत्कालीन भारतीय समाज मुखरित हो उठा है। यह ग्रन्थ उस काल की रचना है, जब हिन्दू जनता पतन के गर्त में जा रही थी। वह भयभीत और चारों ओर से निराश हो चुकी थी। उस समय तुलसीदास जी ने जनता को सन्मार्ग दिखाने के लिए नाना पुराण और आगमों (नानापुराणनिगमागम सम्मतं यद्) में बिखरी हुई भारतीय संस्कृति को जनता की भाषा में जनता के कल्याण के लिए प्रस्तुत किया।
(घ) नीति, सदाचार और समन्वय की भावना-‘श्रीरामचरितमानस’ में श्रेष्ठ नीति, सदाचार के विभिन्न सूत्र और समन्वय की भावना मिलती है। शत्रु से किस प्रकार व्यवहार किया जाये, सच्चा मित्र कौन है, अच्छे-बुरे की पहचान आदि पर भी इसमें विचार हुआ है। तुलसीदास उसी वस्तु या व्यक्ति को श्रेष्ठ बतलाते हैं, जो सर्वजनहिताय हो। इसके अतिरिक्त धार्मिक, सामाजिक और साहित्यिक सभी क्षेत्रों में व्याप्त विरोधों को दूर कर कवि ने समन्वय स्थापित किया है।
(ङ) रामराज्य के रूप में आदर्श राज्य की कल्पना-कवि ने ‘श्रीरामचरितमानस’ में आदर्श राज्य की कल्पना रामराज्य के रूप में लोगों के सामने रखी। इन्होंने व्यक्ति के स्तर से लेकर समाज और राज्य तक के समस्त अंगों का आदर्श रूप प्रस्तुत किया और निराश जन-समाज को नवीन प्रेरणा देकर । रामराज्य के चरम आदर्श तक पहुँचने का मार्ग दिखाया।
(च) कला का उत्कर्ष-‘श्रीरामचरितमानस’ में कला की चरम उत्कर्ष है। यह अवधी भाषा में दोहा-चौपाई शैली में लिखा महान् ग्रन्थ है। इसमें सभी रसों और काव्यगुणों का सुन्दर समावेश हुआ है। इस प्रकार काव्यकला की दृष्टि से यह एक अनुपम कृति है।

उपसंहार-मेरे विचार में कालिदास और शेक्सपियर के ग्रन्थों का जो साहित्यिक महत्त्व है; चाणक्य-नीति का राजनीतिक क्षेत्र में जो मान है, बाइबिल, कुरान, वेदादि का जो धार्मिक सत्य है, वह सब कुछ अकेले ‘श्रीरामचरितमानस में समाविष्ट है। यह हिन्दू धर्म की ही नहीं, भारतीय समाज की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक है। यही कारण है कि इसने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया है। मेरा विश्वास है कि मैं इस पुस्तक से जीवन-निर्माण के लिए सर्वाधिक प्रेरणा प्राप्त करता रहूंगा।

9. होली [2011, 12]

सम्बद्ध शीर्षक

  • किसी प्रिय त्योहार का वर्णन
  • मेरा प्रिय पर्व [2018]

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. प्राकृतिक वातावरण,
  3. धार्मिक एवं ऐतिहासिक दृष्टिकोण,
  4. होली का राग-रंग,
  5. त्योहार के कुछ दोष,
  6. उपसंहार

प्रस्तावना-हमारे देश में अनेक धर्मों व सम्प्रदायों के मानने वाले व्यक्ति निवास करते हैं। सभी की अपनी-अपनी परम्पराएँ, मान्यताएँ, रहन-सहन व वेशभूषा हैं। सभी के द्वारा मनाये जाने वाले त्योहार भी। भिन्न-भिन्न हैं। यही कारण है कि हर मास किसी-न-किसी धर्म से सम्बन्धित त्योहार आते ही रहते हैं। कभी हिन्दू दीपावली की खुशियाँ मनाते हैं तो ईसाई प्रभु यीशु के जन्म-दिवस पर चर्च में प्रार्थना करते हैं तो मुसलमान ईद के अवसर पर गले मिलते व नमाज अदा करते दिखाई देते हैं। रंगों में सिमटा, खुशियों का त्योहार होली भी इसी प्रकार देश-भर में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह शुभ पर्व प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा के सुन्दर अवसर की शोभा बढ़ाने आता है।

प्राकृतिक वातावरण-रंगों का त्योहार होली वसन्त ऋतु का सन्देशवाहक है। इस ऋतु में मानव-मात्र के साथ-साथ प्रकृति भी इठला उठती है। चारों ओर प्रकृति के रूप और सौन्दर्य के दृश्य दृष्टिगत होते हैं। पुष्प-वाटिका में पपीहे की तान सुनने से मन-मयूर नृत्य कर उठता है। आम के झुरमुट से कोयल की कूक सुनकर तो हृदय भी झंकृत हो उठता है। ऋतुराज वसन्त का स्वागत अत्यधिक शान से सम्पन्न होता है। चारों ओर हर्ष और उल्लास छा जाता है।

धार्मिक एवं ऐतिहासिक दृष्टिकोण-होलिकोत्सव धार्मिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। एकता, मिलन और हर्षोल्लास के प्रतीक इस त्योहार को मनाने के पीछे अनेक पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। प्रमुखतः इस उत्सव का आधार हिरण्यकशिपु नामक अभिमानी राजा और उसके ईश्वर-भक्त पुत्र प्रह्लाद की कथा है। कहते हैं कि हिरण्यकशिपु बड़ा अत्याचारी था, किन्तु उसी का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर का अनन्य भक्त था। जब हिरण्यकशिपु ने यह बात सुनी तो वह बड़ा ही क्रोधित हुआ। उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश करे। होलिका को यह वरदान था कि अग्नि उसको जला नहीं सकती थी, किन्तु ‘जाको राखे साइयाँ, मारन सकिहैं कोय’ के अनुसार होलिका तो आग में जल गयी और प्रह्लाद को बाल भी बॉका नहीं हुआ। उसी समय से परम्परागत रूप से होली के त्योहार के एक दिन पूर्व होलिका-दहन का आयोजन होता है। होली के शुभ अवसर पर जैन धर्मावलम्बी आठ दिन तक सिद्धचक्र की पूजा करते हैं। यह ‘अष्टाह्निका’ पर्व कहलाता है।

होली का राग-रंग-प्रथम दिन होलिका का दहन होता है। बच्चे घर-घर से लकड़ियाँ एकत्रित करके चौराहों पर होली तैयार करते हैं। सन्ध्या समय महिलाएँ इसकी पूजा करती हैं और रात्रि में यथा मुहूर्त होलिका दहन करते हैं। होलिका दहन के समय लोग जौ की बालों को भूनकर खाते भी हैं। होलिका का दहन इस बात का द्योतक है कि मानव अपने क्रोध, मान, माया और लोभ को भस्म कर अपने दिल को उज्ज्वल व निर्मल बनाये। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय है।

होलिंका के अगले दिन दुल्हैंडी मनायी जाती है। इस दिन मनुष्य अपने आपसी बैर-विरोध को भुलाकर आपस में एक-दूसरे पर रंग डालते हैं, गुलाल लगाते हैं और गले मिलते हैं। चारों तरफ हँसीमजाक का वातावरण फैल जाता है। क्या अमीर और क्या गरीब, सभी होली के रंगों से सराबोर हो उठते हैं। सारा वातावरण ही रंगमय प्रतीत होता है। बच्चे, औरतें व युवक सभी आनन्द व उमंग से भर उठते हैं। ब्रज की होली बड़ी मशहूर है। देश-विदेश के असंख्य लोग इसे देखने आते हैं। नगरों में सायंकाल अनेक स्थानों पर होली मिलन समारोह का आयोजन होता है जिसमें हास्य-कविताएँ, लतीफे व अन्य रंगारंग कार्यक्रम भी होते हैं।

त्योहार के कुछ दोष-होली के इस पवित्र व प्रेमपूर्ण त्योहार को कुछ लोग अश्लील आचरण और गलत हरकतों द्वारा गन्दा बनाते हैं। कुछ लोग एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं और गन्दगी फेंकते हैं। चेहरों पर कीचड़, पक्के रंग या तारकोल पोतने तथा राहगीरों पर गुब्बारे फेंकते हैं। कुछ लोग भाँग, शराब आदि पीकर हुड़दंग करते हैं। ऐसी अनुचित व अनैतिक हरकतें इस पर्व की पवित्रता को दूषित करती हैं।

उपसंहार-होली प्रेम का त्योहार है, गले मिलने का त्योहार है, बैर और विरोध को मिटाने का त्योहार है। इस दिन शत्रु भी अपनी शत्रुता भुलाकर मित्र बन जाते हैं। यह त्योहार अमीर और गरीब के भेद को कम करके वातावरण में प्रेम की ज्योति को प्रज्वलित करता है। इसे एकता के त्योहार के रूप में मनाया जाना चाहिए। निस्सन्देह होली का पर्व हमारी सांस्कृतिक धरोहर है और इस परम्परा का पूर्ण निर्वाह करना। हमारा दायित्व है।

10. दीपावली

सम्बद्ध शीर्षक

  • किसी प्रिय त्योहार का वर्णन
  • मेरा प्रिय पर्व

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. अन्य देशों में दीपावली,
  3. ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टिकोण
  4. दीपावली का आयोजन,
  5. उपसंहार

प्रस्तावना-भारत देश विभिन्न त्योहारों एवं पर्वो का देश है। यहाँ ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ त्योहारों की निराली छटा भी देखने को मिल जाती है। ये त्योहार हमारे देश की संस्कृति एवं सभ्यता के प्रतीक हैं। इन त्योहारों को मनाने से मन स्वस्थ एवं मानव-समाज प्रेम की भावना से युक्त हो जाता है। इन त्योहारों में दीपावली अत्यन्त हर्षोल्लास का त्योहार माना जाता है। यह दीपों का अथवा प्रकाश का त्योहार है। दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनायी जाती है। इसके स्वागत में लोग कहते हैं

पावन पर्व दीपमाला का, आओ साथी दीप जलाएँ।
सब आलोक मन्त्र उच्चारै, घर-घर ज्योति ध्वजा फहराएँ॥

अन्य देशों में दीपावली–दीपावली केवल भारत में ही नहीं अपितु संसार के विभिन्न देशों बर्मा (म्यांमार), मलाया, जावा, सुमात्रा, थाईलैण्ड, हिन्द-चीन, मॉरीशस आदि में भी मनायी जाती है। अमेरिका के एक राष्ट्र गुयाना में दीपावली को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है। इन देशों में कुछ स्थानों पर इस दिन भारत की ही तरह लक्ष्मी-पूजन भी किया जाता है।

ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टिकोण—दीपावली मनाने के पीछे अनेक पौराणिक कथाएँ भी प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार इस दिन भगवान् राम रावण का वध करने के पश्चात् अयोध्या लौटे थे और अयोध्यावासियों ने उनके आगमन की प्रसन्नता में दीप जला कर अपनी भावनाओं को व्यक्त किया था। एक अन्य कथा के अनुसार इस दिन भगवान् कृष्ण ने नरकासुर का वध करके उसके चंगुल से सोलह हजार युवतियों को मुक्त कराया था। इस कारण प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए लोगों ने दीप जलाये थे। एक अन्य मान्यता के अनुसार इस दिन समुद्र मन्थन से लक्ष्मी जी प्रकट हुई थीं तथा देवताओं ने उनकी अर्चना की थी। इसीलिए आज भी इस दिन लोग सुख, समृद्धि एवं ऐश्वर्य की कामना से लक्ष्मी-पूजन करते हैं। यह भी माना जाता है कि इस दिन भगवान् विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण कर भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी।

जैन तीर्थंकर भगवान् महावीर ने इस दिन जैनत्व की प्राण प्रतिष्ठा करते हुए महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था तथा इसी दिन महर्षि दयानन्द ने भी निर्वाण प्राप्त किया था। सिक्ख सम्प्रदाय के छठे गुरु हरगोविन्द जी को भी इस दिन बन्दीगृह से मुक्ति मिली थी। ये सभी किंवदन्तियाँ यही सिद्ध करती हैं कि दीपावली के त्योहार का भारतवासियों के सामाजिक जीवन में बहुत महत्त्व है।

दीपावली का आयोजन–दीपावली स्वच्छता एवं साज-सज्जा का सुन्दर सन्देश लेकर आती है। दशहरे के बाद से ही लोग दीपावली मनाने की तैयारियाँ प्रारम्भ कर देते हैं। समाज के सभी वर्गों के लोग अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने घरों की सफाई करते हैं तथा रंग-रोगन से अपने घरों को चमका देते हैं। इस सफाई से घरों में वर्षा ऋतु में आयी सीलन आदि भी दूर हो जाती है।

दीपावली से पूर्व धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन लोग बर्तन आदि खरीदते हैं। दीपावली के दिन बाजार बहुत सजे हुए होते हैं। लोग मिठाई, खील-बताशे आदि खरीदते तथा एक-दूसरे को उपहार देते हैं। इस दिन सभी बच्चे नवीन वस्त्र धारण करते हैं। रात को लक्ष्मी-गणेश की पूजा के पश्चात् बच्चे और बूढ़े मिलकर पटाखे, आतिशबाजी आदि छोड़ते हैं। घरों को दीपकों, बिजली के बल्बों, मोमबत्तियों आदि से सजाया जाता है। समस्त दृश्य अत्यन्त मनोरम एवं हृदयग्राही प्रतीत होता है। सभी लोग पारस्परिक बैर-भाव को त्याग कर प्रेम से एक-दूसरे को दीपावली की शुभ-कामनाएँ देते हैं।

उपसंहार-दीपावली के शुभ अवसर पर कुछ लोग जुआ खेलते हैं तथा जुए में पराजित होने पर एक-दूसरे को भला-बुरा भी कहते हैं। इससे उल्लास एवं उमंग का यह त्योहार विषाद में बदल जाता है। मार-पीट होने से अनेक व्यक्ति घायल हो जाते हैं। पटाखे और आतिशबाजी छोड़ने के कारण हुई दुर्घटना में अनेक व्यक्ति अपने प्राणों से भी हाथ धो बैठते हैं। हमें दीपावली के इस त्योहार को उसके सम्पूर्ण वैभव के साथ उस ढंग से मनाना चाहिए जिससे समाज में पारस्परिक सद्भाव उत्पन्न हो सके।

11. भारत के प्रमुख पर्व

रूपरेखा-

  1. भूमिका,
  2. राष्ट्रीय जातीय पर्व,
  3. प्रमुख राष्ट्रीय पर्व,
  4. प्रमुख जातीय पर्व,
  5. हिन्दुओं के प्रमुख पर्व,
  6. सिक्खों के प्रमुख पर्व,
  7. ईसाइयों के प्रमुख पर्व,
  8. मुसलमानों के प्रमुख ‘पर्व,
  9. उपसंहार।

भूमिका-मानव एक सामाजिक प्राणी है। वह अपने सुख-दुःख का विभाजन अपने समाज के साथ करता है। वह हमेशा अपने कार्य में लीन रहता है तथा अपने बँधे-बँधाये जीवन में परिवर्तन की अपेक्षा रखता है। यह इसीलिए कि वह चाहता है कि दैनिक कार्यों में स्फूर्ति, आनन्द तथा उत्साह का संचार होता रहे। इस परिवर्तन को वह विविध पर्वो के रूप में मनाता है। इन पर्वो पर वह समाज के सभी लोगों के साथ मिलकर समाज के उत्थान के लिए प्रयासरत रहता है।

राष्ट्रीय-जातीय पर्व-भारत देश अनेकता में एकता लिये हुए है। विभिन्न जातियों, धर्मों और वर्गों के व्यक्तियों ने इस महान देश का निर्माण किया है। इसलिए यहाँ अनेक पर्व वर्ष भर मनाये जाते हैं। इन पर्वो में देश के सभी सहृदय निवासी सहर्ष भाग लेते हैं और आपस में मित्रता, सद्भाव, एकता आदि का परिचय देते हैं। हमारे पर्व–राष्ट्रीय तथा जातीय-दो तरह के हैं। राष्ट्रीय पर्वो के अन्तर्गत स्वतन्त्रता दिवस, गणतन्त्र दिवस और विभिन्न राष्ट्रीय नेताओं के जन्मदिन आते हैं और जातीय पर्यों में भारत में रहने वाले विभिन्न सम्प्रदायों द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर मनाये जाने वाले पर्वो की गणना होती है।

प्रमुख राष्ट्रीय पर्व-राष्ट्रीय पर्वो में सबसे पहला पर्व है-स्वतन्त्रता दिवस। हमारा भारत अनेक वर्षों की परतन्त्रता से 15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्र हुआ था। उसी की याद में प्रति वर्ष 15 अगस्त को सारे देश में स्वतन्त्रता दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। मुख्य समारोह का प्रारम्भ दिल्ली के लाल किले पर प्रधानमन्त्री द्वारा झण्डा फहराने से होता है। देश के प्रमुख नगरों और गाँवों में भी यह पर्व उत्साह के साथ मनाया जाता है।

गणतन्त्र दिवस हमारा दूसरा प्रमुख राष्ट्रीय पर्व है। 26 जनवरी, 1950 को हमारे देश में संविधान लागू किया गया था और इसी दिन भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न गणराज्य घोषित किया गया था। इसी कारण सम्पूर्ण देश में प्रति वर्ष 26 जनवरी को यह राष्ट्रीय पर्व अत्यन्त उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। इस पर्व का मुख्य समारोह दिल्ली में होता है, जहाँ विशाल झाँकियों से जुलूस निकाला जाता है और राष्ट्रपति सलामी लेते हैं।

हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने हमें स्वाधीनता दिलाने में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। उनकी याद में उनके जन्म दिवस 2 अक्टूबर को प्रति वर्ष यह राष्ट्रीय पर्व मनाया जाता है। इसके मुख्य समारोह दिल्ली स्थित राजघाट पर और उनके जन्म-स्थान पोरबन्दर पर होते हैं।

इसी प्रकार हमारे प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन 14 नवम्बर को बाल दिवस के रूप में; डॉ० राधाकृष्णन का जन्मदिवस 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इन पर्वो को छोटे-बड़े सभी भारतवासी मिल-जुलकर धूमधाम से मनाते हैं।

प्रमुख जातीय पर्व-भारत के प्रमुख जातीय पर्यों में सभी जातियों के विभिन्न पर्व देश में समयसमय पर मनाये जाते हैं। इन जातियों में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख और ईसाई मुख्य हैं।

हिन्दुओं के प्रमुख पर्व-हिन्दुओं में प्रचलित प्रमुख पर्व हैं-होली, दीपावली, दशहरा, रक्षाबन्धन आदि। रक्षाबन्धन को श्रावणी भी पुकारते हैं। प्राचीन परम्परा के अनुसार इस दिन ब्राह्मण दूसरे वर्ग के लोगों को रक्षा-सूत्र बाँधते थे, जिससे रक्षा-सूत्र बँधवाने वाला, देश तथा जाति की रक्षा करना अपना कर्तव्य समझता था। कालान्तर में बहनें अपने भाइयों को रक्षा-सूत्र बाँधने लगीं। मध्यकाल में हिन्दू बहनों ने मुसलमान भाइयों को रक्षा-सूत्र बाँधकर सांस्कृतिक एकता का परिचय दिया था। यह पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है।

दशहरा या विजयदशमी हिन्दुओं का राष्ट्रव्यापी पर्व है। इस पर्व से पूर्व रामलीलाओं तथा दुर्गापूजा का आयोजन किया जाता है। इस दिन रावण-वध के द्वारा बुरी प्रवृत्तियों पर सदगुणों की विजय प्रदर्शित की जाती है। यह पर्व वीरता, दया, सहानुभूति, आदर्श मैत्री, भक्ति-भावना आदि उच्च गुणों की प्रेरणा देता है।

दीपावली कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाने वाला दीपों का पर्व है। इस दिन लक्ष्मीगणेश जी की पूजा की जाती है और घर-आँगन में दीपों से प्रकाश किया जाता है।

होली हर्षोल्लास का पर्व है। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को होलिका-दहन होता है और चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को होली खेली जाती है। इस दिन लोग परस्पर रंग लगाकर मिलते हैं। होली के दिन अपने-पराये का भेद समाप्त हो जाता है।

सिक्खों के प्रमुख पर्व-सिक्खों का प्रमुख पर्व है-गुरु-पर्व। इसमें गुरु नानक, गुरु गोविन्द सिंह
आदि विभिन्न गुरुओं के जन्मदिन धूमधाम से मनाये जाते हैं, गुरु ग्रन्थ-साहब की वाणी का पाठ किया जाता है, जुलूस निकाले जाते हैं और लंगर (सामूहिक भोज) होते हैं।

ईसाइयों के प्रमुख पर्व–प्रति वर्ष 25 दिसम्बर को क्रिसमस का पर्व अत्यन्त उत्साह से मनाया जाता है। यह महात्मा ईसा मसीह की पुण्य जयन्ती का पर्व है। ईसाइयों का दूसरा प्रमुख पर्व है-ईस्टर, जो 21 मार्च के बाद जब पहली बार पूरा चाँद दिखाई पड़ता है तो उसके पश्चात् आने वाले रविवार को मनाया जाता है। इनके अतिरिक्त दो प्रमुख पर्व हैं-गुड फ्राइडे तथा प्रथम जनवरी (नववर्ष)। ।

मुसलमानों के प्रमुख पर्व-मुसलमानों के पर्वो में रमजान, मुहर्रम, ईद, बकरीद आदि प्रमुख हैं।

उपसंहार–पर्व हमारी सभ्यता तथा संस्कृति के प्रतीक हैं। सैकड़ों वर्षों से ये हमारे सामाजिक जीवन में नित नवीन प्रेरणा का संचार करते रहे हैं। अत: इन पर्वो का मनाना हमारे लिए उपादेय तथा आवश्यक है।