सांस्कृतिक निबन्ध: सूक्तिपरक

परहित सरिस धरम नहिं भाई

सम्बद्ध शीर्षक

  • वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे
  • परोपकार का महत्त्व [2011, 14]
  • परोपकार ही जीवन है। [2012, 13]

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. परोपकार का अर्थ,
  3. परोपकार : एक स्वाभाविक गुण,
  4. परोपकार : मानव का धर्म,
  5. परोपकार : आत्मोत्थान का मूल,
  6. परोपकारी महापुरुषों के उदाहरण,
  7. प्रेम : परोपकार का प्रतिरूप,
  8. उपसंहार

प्रस्तावना–संसार में परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं हैं। सन्त-असन्त और अच्छे-बुरे व्यक्ति का अन्तर परोपकार से प्रकट होता है। जो व्यक्ति परोपकार के लिए अपने शरीर की बलि दे देता है, वह सन्त या अच्छा व्यक्ति है। अपने संकुचित स्वार्थ से ऊपर उठकर मानव-जाति का नि:स्वार्थ उपकार करना ही मनुष्य का प्रधान कर्तव्य है। जो मनुष्य जितना पर-कल्याण के कार्य में लगा रहता है, वह उतना ही महान् बनता है। जिस समाज में दूसरे की सहायता करने की भावना जितनी अधिक होती है, वह समाज उतना ही सुखी और समृद्ध होता है। इसलिए तुलसीदास जी ने कहा है

परहित सरिस धरम नहिं भाई ।पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।।

परोपकार का अर्थ-परोपकार से तात्पर्य है-दूसरों का हित करना। जब हम स्वार्थ से प्रेरित होकर दूसरे का हित साधन करते हैं, तब वह परोपकार नहीं होता। परोपकार स्वार्थपूर्ण मन से नहीं हो सकता है। उसके लिए हृदय की पवित्रता और शुद्धता आवश्यक है। परोपकार क्षमा, दया, त्याग, बलिदान, प्रेम, ममता आदि गुणों का व्यक्त रूप है। महर्षि व्यास ने परोपकार को पुण्य की संज्ञा दी है; यथा—

अष्टादश पुराणेषु, व्यासस्य वचनद्वयम्।।
परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम् ॥

परोपकारः एक स्वाभाविक गुण–परोपकार की भावना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। यह भावना मनुष्य में ही नहीं, पशु-पक्षियों, वृक्ष और नदियों तक में पायी जाती है। प्रकृति भी सदा परोपकारयुक्त दिखाई देती है। मेघ वर्षा का जल स्वयं नहीं पीते, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, नदियाँ दूसरों के उपकार के लिए ही बहती हैं। सूर्य सबके लिए प्रकाश वितरित करता है, चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से सबको शान्ति देता है, सुमन सर्वत्र अपनी सुगन्ध फैलाते हैं, गाय हमारे पीने के लिए ही दूध देती है। कवि रहीम का कथन है–

तरुवर फल नहिं खाते हैं, सरवर पियहिं न पान ।
कहि रहीम परकाज हित, सम्पति सँचहिं सुजान ॥

परोपकार : मानव का धर्म-परोपकार मनुष्य का धर्म है। भूखों को अन्न, प्यासे को पानी, वस्त्रहीन को वस्त्र, पीड़ितों और रोगियों की सेवा-सुश्रुषा मानव का परम धर्म है। संसार में ऐसे ही व्यक्तियों के नाम अमर होते हैं, जो दूसरों के लिए मरते और जीवित रहते हैं। तुलसीदास की ये पंक्तियाँ कितनी महत्त्वपूर्ण

परहित बस जिनके मन माहीं । तिन्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥

परोपकार को इतनी महत्ता इसलिए दी गयी है, क्योंकि इससे मनुष्य की पहचान होती है। इस प्रकार सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने को तत्पर रहता है।

परोपकार : आत्मोत्थान की मूल-मनुष्य क्षुद्र से महान् और विरल से विराट तभी बनता है जब उसकी परोपकार-वृत्ति विस्तृत होती जाती है। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि उसने प्राणिमात्र के हित को मानव-जीवन का लक्ष्य बताया है। एक धर्मप्रिय व्यक्ति की जीवनचर्या पक्षियों को दाना और पशुओं को चारा देने से प्रारम्भ होती है। यही व्यक्ति का समष्टिमय स्वरूप है। ज्यों-ज्यों आत्मा में उदारता बढ़ती जाती है, उतनी ही अधिक आनन्द की उपलब्धि होती जाती है और अपने समस्त कर्म जीव-मात्र के लिए समर्पित करने की भावना तीव्रतर होती जाती है

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत् ॥

अर्थात् सभी लोग सुखी हों, निरोगी हों, कल्याणयुक्त हों। दुःख-कष्ट कोई न भोगे। यही सर्व कल्याणमय भावना सन्तों का मुख्य लक्षण है।

परोपकारी महापुरुषों के उदाहरण-महर्षि दधीचि ने राक्षसों के विनाश के लिए अपनी हड्डियाँ देवताओं को दे दी। राजा शिवि ने कबूतर की रक्षा के लिए बाज को अपने शरीर का मांस काट-काटकर दे दिया। गुरु गोविन्द सिंह हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपने बच्चों सहित बलिदान हो गये। राजकुमार सिद्धार्थ ने संसार को दु:ख से छुड़ाने के लिए राजसी सुख-वैभव का त्याग कर दिया। लोक-हित के लिए महात्मा ईसा सूली पर चढ़ गये और सुकरात ने विष का प्याला पी लिया। महात्मा गाँधी ने देश की अखण्डता के लिए अपने सीने पर गोलियाँ खायीं। इस प्रकार इतिहास का एक-एक पृष्ठ परोपकारी महापुरुषों की पुण्यगाथाओं से भरा पड़ा है।

प्रेम: परोपकार का प्रतिरूप—प्रेम और परोपकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्राणिमात्र के प्रति स्नेह-वात्सल्य की भावना परोपकार से ही जुड़ी हुई है। प्रेम में बलिदान और उत्सर्ग की भावना प्रधान होती है। जो पुरुष परोपकारी होता है, वह दूसरों के हित के लिए अपने सर्वस्व निछावर हेतु तत्पर रहता है। परोपकारी व्यक्ति कष्ट उठाकर, तकलीफ का अनुभव करके भी परोपकार वृत्ति का त्याग नहीं करता। जिस प्रकार मेहदी लगाने वाले के हाथ में भी अपना रंग रचा देती है, उसी प्रकार परोपकारी व्यक्ति की संगति सदा सबको सुख देने वाली होती है।

उपसंहार–परोपकार मानव-समाज का आधार है। समाज में व्यक्ति एक-दूसरे की सहायता व सहयोग की सदा आकांक्षी रहता है। परोपकार सामाजिक जीवन की धुरी है, उसके बिना सामाजिक जीवन गति नहीं कर सकता। परोपकार मानव-जाति का आभूषण है। ‘परोपकाराय सतां विभूतयः’ अर्थात् सत्पुरुषों का अलंकार तो परोपकार ही है। हमारा कर्तव्य है कि हम परोपकारी महात्माओं से प्रेरित होकर अपने जीवन-पथ को प्रशस्त करें और कवि मैथिलीशरण गुप्त के इस लोक-कल्याणकारी पावन सन्देश को चारों दिशाओं में प्रसारित करें

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

13. पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं

सम्बद्ध शीर्षक

  • स्वतन्त्रता का महत्त्व

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. स्वतन्त्रता का सुख
  3. परतन्त्रता का दुःख,
  4. पराधीनता के विविध रूप-राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक,
  5. स्वाधीनता की महत्ता,
  6. स्वाधीनता के लिए संघर्ष,
  7. उपसंहार

प्रस्तावना–स्वाधीनता में महान् सुख है और पराधीनता में किंचित्-मात्र भी सुख नहीं। पराधीनता दु:खों की खान है। स्वाभिमानी व्यक्ति एक दिन भी परतन्त्र रहना पसन्द नहीं करता। उसका स्वाभिमान परतन्त्रता के बन्धन को तोड़ देना चाहता है। पराधीन व्यक्ति को चाहे कितना ही सुख, भोग और ऐश्वर्य प्राप्त हो, वह उसके लिए विष तुल्य ही है। पराधीन व्यक्ति की बुद्धि कुण्ठित हो जाती है, उसकी योग्यता का विकास अवरुद्ध हो जाता है, स्वतन्त्र चिन्तन का प्रवाह रुक जाता है और उसको पग-पग पर अपमानित व प्रताड़ित होना पड़ता है।

स्वतन्त्रता का सुख-मुक्त गगन में उन्मुक्त उड़ान भरने में जो आनन्द है, वह पिंजरे में कहाँ ? कल-कल नाद करने वाली नदियाँ भी पर्वतों की छाती को चीरकर आगे बढ़ जाती हैं। सिंह और चीते जैसे हिंसक पशु भी कठघरा तोड़कर बाहर निकलने को बेचैन रहते हैं। हिरन, खरगोश आदि वन्य जीव तो मुक्त विचरण कर प्रसन्न रहते हैं। जब पशु-पक्षी-फूल-पत्ती आदि को भी स्वतन्त्रता से इतना उन्मुक्त प्यार है तो विवेकशील व्यक्ति परतन्त्र रहना कैसे पसन्द करेगा ? एक अंग्रेज लेखक का यह कथन कितना सत्य है– ‘It is better to be in hell than to be a slave in heaven.’ अर्थात् स्वर्ग में दास बनकर रहने से नरक में रहना कहीं अधिक अच्छा है। महर्षि व्यास ने भी प्रकारान्तर से यही बात कही है-‘पारतन्त्र्यं महोदुःखं स्वातन्त्र्यं परमं सुखम्।

परतन्त्रता का दुःख-परतन्त्रता वास्तव में मानव के लिए कलंक है। उसे जीवन के हर क्षेत्र में पराश्रित रहना पड़ता है। उसकी प्रतिभा, कला-कौशल और योग्यता दूसरों के लिए होती है। उसका लाभ वह स्वयं नहीं ले पाता। वह पराधीनता के बन्धन में जकड़ा हुआ होने से आत्महीनता और तुच्छता का अनुभव करता है। वह अपने जीवन को उपेक्षित और पीड़ित समझता है और ऐसे जीवन को स्वप्न में भी नहीं चाहता।

पराधीनता अभिशाप है। पराधीनता मानव, समाज अथवा राष्ट्र के लिए कभी हितकर नहीं हो सकती। पराधीनता से उन्नति और विकास के सभी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। पराधीन राष्ट्र सभी सुख-साधनों से हीन होकर दूसरे शासकों की कठपुतली बन जाते हैं।

पराधीनता के विविध रूप-पराधीनता चाहे व्यक्ति की हो या राष्ट्र की दोनों ही गर्हित हैं। जिस प्रकार व्यक्तिगत पराधीनता से व्यक्ति का विकास रुक जाता है, उसी प्रकार राष्ट्र की पराधीनता से राष्ट्र पंगु बन जाता है। पराधीनता के अनेकानेक रूप होते हैं, जिनमें मुख्य निम्नलिखित हैं–
(क) राजनीतिक-राजनीतिक पराधीनता सबसे भयावह हैं। इसके अन्तर्गत एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र का गुलाम बनकर रहना पड़ता है। राजनीतिक पराधीनता शासित देश के गौरव व सम्मान को खत्म कर उसे उपहास व घृणा का पात्र बना देती है।
(ख) आर्थिक–आज किसी देश को पराधीन रख पाना बहुत कठिन है। इसलिए शक्तिशाली राष्ट्रों; विशेषकर अमेरिका ने एक नया तरीका अपनाया है। वह राष्ट्रों को आर्थिक सहायता यो ऋण देकर उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है। यह पराधीनता भविष्य में बहुत कष्टकर होती है।
(ग) सांस्कृतिक—इसका तात्पर्य यह है कि किसी देश पर अपनी भाषा और साहित्य थोपकर मानसिक दृष्टि से उसे अपना गुलाम बना लिया जाए। अंग्रेजों ने भारत में अंग्रेजी का प्रचलन कर तथा पाश्चात्य संस्कृति के प्रचार के माध्यम से देश को मानसिक गुलामी प्रदान की है।
(घ) सामाजिक-सामाजिक पराधीनता से आशय है–विभिन्न वर्गों में असमानता का होना। अंग्रेजों ने इसके लिए विभिन्न वर्गों में भेदभाव को प्रोत्साहन दिया। उन्होंने जातीयता, प्रान्तीयता व छुआछूत को भड़काकर देश में सर्वत्र अशान्ति और द्वेष-भावना को जाग्रत किया।

स्वाधीनता की महत्ता–स्वाधीनता का कोई सानी नहीं। स्वाधीनता की शीतल छाया में संस्कृति, सभ्यता और समृद्धि बढ़ती है। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसकी अनुभूति करते हुए ईश्वर से कामना की है-“जहाँ मन में कोई डर न हो और मस्तक गर्व से ऊँचा हो, जहाँ ज्ञान के प्रवाह पर कोई प्रतिबन्ध न हो और स्पष्ट विचारों की निर्मल सरिता निरर्थक रूढ़िग्रस्तता के मरुस्थल में लुप्त न हो जाए, हे परमपिता! ऐसी स्वाधीनता के स्वर्ग में मेरा देश जाग्रत हो।”

स्वाधीनता के लिए संघर्ष-स्वतन्त्रता मनुष्य को जन्मसिद्ध अधिकार है। इस अधिकार को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक समाज और प्रत्येक राष्ट्र को सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए। आज हम भारतवासी राजनीतिक दृष्टिकोण से स्वाधीन हैं, परन्तु हम आज भी मानसिक रूप से विदेशियों (अंग्रेजों) के गुलाम हैं। हमें शीघ्र ही इस मानसिक गुलामी से भी मुक्त होना चाहिए।

उपसंहार-आज हमारा सौभाग्य है कि हम मुक्त भूमि पर मुक्त गगन के नीचे मुक्ति-गीत गा रहे हैं। हमारा देश चिर स्वतन्त्र बना रहे, इसके लिए हमें आपसी द्वेषभाव व वर्ग-विद्वेष को भूलकर राष्ट्रीय चेतना जाग्रत कर देश के गौरव और अक्षुण्णता को कायम रखने के लिए संकल्प लेना चाहिए। कश्मीर से कन्याकुमारी तक सम्पूर्ण देश एक है; अत: एकत्व की भावना को दृढ़ और मूर्त रूप देकर हमें गौरवशाली राष्ट्र का निर्माण करना चाहिए।

14. आचारः परमो धर्मः

सम्बद्ध शीर्षक

  • सदाचार का महत्त्व
  • जीवन में सदाचार का महत्त्व [2014]

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. सदाचार का अर्थ,
  3. सच्चरित्रता,
  4. धर्म की प्रधानता,
  5. शील : सदाचार की शक्ति,
  6. सदाचार : सम्पूर्ण गुणों का सार,
  7. उपसंहार

प्रस्तावना-सदाचार मनुष्य का लक्षण है। सदाचार को धारण करना मानवता को प्राप्त करना है। सदाचारी व्यक्ति समाज में पूजित होता है। आचारहीन का कोई भी सम्मान नहीं करता, कोई भी उसका साथ नहीं देता, वेद भी उसका कल्याण नहीं करते।’ आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः’-अर्थात् वेद भी आचारहीन व्यक्ति का उद्धार नहीं कर सकते।

सदाचार का अर्थ-सदाचार’ शब्द संस्कृत के ‘सत्’ और ‘आचार’ शब्दों से मिलकर बना है। इसका अर्थ है-सज्जन का आचरण अथवा शुभ आचरण। सत्य, अहिंसा, ईश्वर-विश्वास, मैत्री-भाव, महापुरुषों का अनुसरण करना आदि बातें सदाचार में गिनी जाती हैं। इस सदाचार को धारण करने वाला व्यक्ति सदाचारी कहलाता है। इसके विपरीत आचरण करने वाले व्यक्ति को दुराचारी कहते हैं।

सच्चरित्रता-सदाचार का महत्त्वपूर्ण अंग सच्चरित्रता है। सच्चरित्रता सदाचार का सर्वोत्तम साधन है। प्रसिद्ध कहावत है कि “यदि धन नष्ट हो जाए तो मनुष्य का कुछ भी नहीं बिगड़ता, स्वास्थ्य बिगड़ जाने पर कुछ हानि होती है और चरित्रहीन होने पर मनुष्य का सर्वस्व नष्ट हो जाता है। मनुष्य में जो कुछ भी मनुष्यत्व है, उसका प्रतिबिम्ब उसका चरित्र है। आचारहीन मनुष्य तो निरा पशु या राक्षस है।

सच्चरित्रता की सबसे आवश्यक बात है-भय की प्रवृत्ति पर नियन्त्रण करना। भय की प्रवृत्ति को वश में करके ही हमारे हृदय में ऊँचे आदर्श और स्वस्थ प्रेरणाएँ पनप सकती हैं। जो भय के वश में हो गया। हो, उसके चरित्र का विकास नहीं होता। उसकी शक्ति, आत्मबल और महत्त्वाकांक्षाएँ दुर्बल हो जाती हैं। इसी भय के कारण वह सत्य बात नहीं कर पाता और कदम-कदम पर कायरों की भाँति दूसरों के सामने घुटने टेकता है।

जीवन में अच्छे चारित्रिक संस्कारों का विकास हो सके, इसके लिए आवश्यक है कि बुरे वातावरण से स्वयं को दूर रखा जाए। यदि आपका वातावरण दूषित है तो आपका चरित्र भी गिर जाएगा। इसीलिए अपने चरित्र-निर्माण के लिए सदैव भले या बुद्धिमान् लोगों को संग करना चाहिए, बुरे लोगों का साथ छोड़ देना चाहिए तथा शुभ विचारों को मन में लाना चाहिए।

धर्म की प्रधानता–भारत एक आध्यात्मिक देश है। यहाँ की संस्कृति एवं सभ्यता धर्मप्रधान है। धर्म से मनुष्य की लौकिक एवं आध्यात्मिक उन्नति होती है। लोक और परलोक की भलाई धर्म से ही सम्भव है। धर्म आत्मा को उन्नत करता है और उसे पतन की ओर जाने से रोकता है। धर्म के यदि इस रूप को ग्रहण किया जाए तो धर्म को सदाचार का पर्यायवाची भी कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में सदाचार में वे गुण हैं,
जो धर्म में हैं। सदाचार के आधार पर ही धर्म की स्थिति सम्भव है। जो आचरण मनुष्य को ऊँचा उठाये, उसे चरित्रवान् बनाये, वह धर्म है, वही सदाचार है। सदाचारी होना ही धर्मात्मा होना है। महाभारत में कहा गया है-‘आचारः धर्मः’ अर्थात् धर्म की उत्पत्ति आचार से ही होती है।

शील : सदाचार की शक्ति-शील मानसिक उच्छंखलता के लिए अंकुश है। सदाचार मनुष्य की काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि वृत्तियों से रक्षा करता है। अहिंसा की भावना से मन की क्रूरता समाप्त होती है। और उसमें करुणा, सहानुभूति एवं दया की भावना जाग्रत होती है। क्षमा, सहनशीलता आदि गुणों से मनुष्य का नैतिक उत्थान होता है और मानव से लेकर पशु-पक्षी तक के प्रति उदारता की भावना पैदा होती है। इस प्रकार सदाचार का गुण धारण करने से मनुष्य का चरित्र उज्ज्वल होता है, उसमें कर्तव्यनिष्ठा एवं धर्मनिष्ठा पैदा होती है जो उसे अलौकिक शक्ति की प्राप्ति कराने में सहायक होती है।

सदाचार : सम्पूर्ण गुणों का सार-सदाचार मनुष्य के सम्पूर्ण गुणों का सार है, जो उसके जीवन को सार्थकता प्रदान करता है। इसकी तुलना में विश्व की कोई भी मूल्यवान् वस्तु नहीं टिक सकती। व्यक्ति चाहे संसार के वैभव का स्वामी हो या सम्पूर्ण विद्याओं का पण्डित अथवा शस्त्र-संचालन में कुशल योद्धा, यदि वह सदाचार से रहित है तो कदापि पूजनीय नहीं हो सकता। सदाचार का बल संसार की सबसे बड़ी शक्ति है, जो कभी भी पराजित नहीं हो सकती। सदाचार के बल से मनुष्य मानसिक दुर्बलताओं का नाश करता है। जिस प्रकार दिग्दर्शक यन्त्र के बिना जहाज निर्दिष्ट स्थान पर नहीं पहुँच सकता, उसी प्रकार सदाचार के बिना मनुष्य कभी भी अपने जीवन-लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता।

उपसंहार-वर्तमान युग में पाश्चात्य पद्धति की शिक्षा के प्रभाव से भारत के युवक-युवतियाँ सदाचार को निरर्थक समझने लगे हैं तथा सदाचार-विरोधी जीवन को आदर्श मानने लगे हैं। इसी कारण युवा वर्ग पतन की ओर बढ़ रहा है तथा उसके जीवन में विश्रृंखलता, अनुशासनहीनता, उच्छृखलता बढ़ती जा रही है। लुटते हुए आचरण की रक्षा के लिए युवा वर्ग को सचेत होना चाहिए। उन्हें राम, कृष्ण, हरिश्चन्द्र, युधिष्ठिर, गाँधी एवं नेहरू के चरित्र को आदर्श मानकर सदाचरणप्रिय होना चाहिए। राष्ट्र का वास्तविक अभ्युत्थान तभी हो सकेगा, जब हमारे देशवासी सदाचारी बनेंगे।

15. का बरखा जब कृषी सुखाने

सम्बद्ध शीर्षक

  • समय का सदुपयोग
  • अब पछताये होत क्या, जब चिड़ियाँ चुग गयीं खेत
  • मन पछितैहैं अवसर बीते

रूपरेखा

  1. प्रस्तावना,
  2. समय का महत्त्व,
  3. समय का सदुपयोग,
  4. समय के सदुपयोग से लाभ,
  5. समय के दुरुपयोग से हानि,
  6. समय के सदुपयोग के कुछ उदाहरण,
  7. समय के दुरुपयोग की समस्या,
  8. उपसंहार

प्रस्तावना—समय सबसे बड़ा धन है। जिसने समय के प्रवाह को जाना, समय की चाल को पहचाना; वह लघु से महान् और रंक से राजा बन गया। जो समय के मूल्य को नहीं पहचानता, वह समय के बीत जाने पर पछताता है। जो समय पर जागा नहीं, निद्रा-तन्द्रा-आलस्यवश पड़ा रहा, निश्चय ही उसका भाग्य भी सोया रहा। समय पर न किया जाने वाला कार्य उसी प्रकार व्यर्थ है, जिस प्रकार दीपक बुझ जाने पर तेल डालना अथवा चोर के भाग जाने पर सावधान होना।

प्रकृति के समस्त कार्य समय पर संचालित होते हैं। सूर्य और चन्द्रमा निश्चित समय पर उदय और अस्त होते हैं तथा ऋतुओं को आगमन निश्चित समय पर होता है, परन्तु मानव ही ऐसा प्राणी है, जो समय के मूल्य को नहीं पहचानता और समय के बीत जाने पर पछताता है। कहा गया है–

समय चूकि पुनि का पछताने। का बरखा जब कृषी सुखाने ।

समय का महत्त्व-मानव-जीवन में समय का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कई क्षण मिलकर जीवन का रूप लेते हैं। एक क्षण को नष्ट करने का अर्थ है, जीवन के एक अंश को नष्ट करना। जीवन में समय बहुत थोड़ा है। यदि इसका उपयोग न किया गया तो जीवन व्यर्थ ही चला जाएगा। समय के सदुपयोग से ही जीवन सार्थक बनता है। समय के एक क्षण को संसार के समस्त ऐश्वर्य से भी क्रय नहीं किया जा सकता

आयुषः क्षण एकोऽपि, न लभ्यः स्वर्णकोटिकैः।
सचेन्निरर्थकं नीतः, का नु हानिस्ततोऽधिकाः॥

समय का सदुपयोग-समय के सदुपयोग का अर्थ है–निर्धारित समय पर नियमपूर्वक काम करना। जो लोग समय का सदुपयोग करते हैं, वे जीवन में सफल होते हैं। नियत समय काम करने से कठिन-से-कठिन काम भी सरल हो जाते हैं तथा ठीक समय पर कार्य न करने से सुगम कार्य भी कठिन हो जाते हैं। जो लोग आज का काम कल पर छोड़ते हैं, वे आलसी हैं। ऐसे ही लोगों के लिए एक विद्वान् ने कहा है-‘Yesterday never comes’, अर्थात् बीता हुआ कल कभी वापस नहीं आता।।

प्रत्येक कार्य की महत्ता के अनुसार उसका समय निर्धारित करना चाहिए। एक क्षण भी व्यर्थ की बातों के लिए नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि “An empty mind, is devil’s workshop.” यदि हम अच्छे कार्यों में समय लगाते हैं तो हम उसका सदुपयोग करते हैं। यद्यपि समय के सदुपयोग की कोई निर्णायक रेखा नहीं होती, तथापि सामान्य रूप से उचित समय पर काम करने को समय का सदुपयोग कहा जाता है।

समय के सदुपयोग से लाभ-समय का सदुपयोग करने के अनेकानेक लाभ हैं। जो विद्यार्थी समय को सदुपयोग कर लेते हैं, वे परीक्षा में प्रथम आते हैं। समय के सदुपयोग से दरिद्र धनवान् बन जाते हैं। यदि हम किसी महापुरुष के जीवन को देखें तो हमें ज्ञात होगा कि वे समय के सदुपयोग से ही महान् बने हैं। मनुष्य समय के सदुपयोग से अपनी शारीरिक, मानसिक और आत्मिक; अर्थात् सर्वांगीण उन्नति कर सकता है। समय के सदुपयोग से आत्मविश्वास की भावना जाग्रत होती है।

समय के दुरुपयोग से हानि–समय को व्यर्थ खोकर कोई भी सुखी नहीं हो सका। जिन्होंने समय को नष्ट किया, समय ने उन्हें नष्ट कर दिया। अपनी सेना के कुछ मिनट देर से पहुँचने के कारण नेपोलियन बोनापार्ट को नेल्सन से पराजित होना पड़ा था। समय का दुरुपयोग करने वाला जीवन में आस्था और आत्मविश्वास खो बैठता है। वह अकर्मण्य व असफलता से पीड़ित होकर जीवन से निराश हो जाता है।

समय के सदुपयोग के उदाहरण—इतिहास इस बात का साक्षी है कि जो व्यक्ति समय का ध्यान रखता है, समय उसका ध्यान रखता है। समय की उपेक्षा करने वाला समय से भी उपेक्षित रहता है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए, सभी ने समय के महत्त्व को समझा और उसका पूर्ण उपयोग किया। महावीर स्वामी ने अपने शिष्य से कहा था-“हे गौतम! क्षण का भी प्रमोद मत कर। जो रात्रियाँ जा रही हैं, वे वापस लौटने वाली नहीं हैं; अत: शुभ संकल्पपूर्वक उनका उपयोग आत्म-साधना के लिए कर।’

समय के दुरुपयोग की समस्या-समय को व्यर्थ खोने वालों में भारतीयों की तुलना नहीं। कार्यालयों में सभी कर्मचारी पास-पास कुर्सियाँ डालकर गप्पों में समय बिता देते हैं। यहाँ पर हिन्दुस्तानी समय के अनुसार काम होता है; अर्थात् निर्धारित समय से दो, तीन, चार घण्टे बाद तक। देश के उच्चकोटि के नेता किसी सभा में समय पर नहीं पहुँचते। भारत में समय के इस अपव्यय से समय का सदुपयोग करने वालों को बड़ी परेशानी होती है। समय को गंवाना हमारे चरित्र का अंग बन गया है। इस दोष को दूर किये बिना राष्ट्र की उन्नति सम्भव ही नहीं है।

उपसंहार-समय बड़ा अमूल्य है। जो समय का सदुपयोग करता है, वह अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर सकता है तथा जो समय का दुरुपयोग करता है, वह अपने जीवन को नष्ट करता है। माता-पिता, अभिभावक, अध्यापक तथा नेताओं का परम कर्तव्य है कि वे छात्रों को समय के सदुपयोग की प्रेरणा प्रदान करें; क्योंकि राष्ट्र के सम्यक् उत्थान के लिए समय का सदुपयोग नितान्त आवश्यक है। समय का सदुपयोग करके ही अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को सुरक्षित और प्रगतिशील बनाये रखा जा सकता है। कबीर ने समय की गति को समझा था, इसलिए उन्होंने जीवन की सफलता का राज बताते हुए कहा था

काल्हि करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में परलै होयगी, बहुरि करैगो कब ।।

16. उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः

सम्बद्ध शीर्षक

  • परिश्रम से लाभ [2013]
  • श्रम का महत्त्व [2011, 15]
  • श्रम ही सफलता की कुंजी है [2014]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. स्वावलम्बी की विशेषताएँ,
  3. स्वावलम्बन के लाभ,
  4. स्वावलम्बियों के उदाहरण,
  5. स्वावलम्बन की शिक्षा,
  6. उपसंहार

प्रस्तावना–स्वावलम्बन जीवन के लिए परमावश्यक हैं। यह प्रतिभावान मनुष्य का लक्षण है, उन्नति को मूल है, बड़प्पन का साधन है और सुखमय जीवन का स्रोत है। स्वावलम्बन का अर्थ अपना सहारा या अपने ऊपर निर्भर होना है। स्वावलम्बी व्यक्ति या राष्ट्र ही स्वतन्त्र रह सकता है। जो देश या व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों का मुंह ताकते हैं, वे स्वतन्त्र नहीं रह सकते। यह शारीरिक तथा आध्यात्मिक उन्नति का साधन है। अंग्रेजी की एक प्रसिद्ध कहावत है-“God helps those who help themselves.” अर्थात् ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। प्रसिद्ध कहावत ‘बिना मरे स्वर्ग किसने देखा’ भी सही अर्थों में स्वावलम्बन की ही शिक्षा देती है।

स्वावलम्बी की विशेषताएँ-स्वावलम्बी व्यक्ति स्वतन्त्र होता है। उसका अपने पर अधिकार होता है। वह बड़े-बड़े धनिकों तथा शक्तिवानों की भी परवाह नहीं करता। तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास ने ‘सन्तन को कहा सीकरी सो काम’ कहकर अकबर का निमन्त्रण ठुकरा दिया था। स्वावलम्बी व्यक्ति सबके साथ विनम्रता का व्यवहार करके अपने काम में संलग्न रहता है। उस पर चाहे कितनी भी विपत्ति क्यों न आ जाए, किसी भी बाधा के सामने वह हार नहीं मानता तथा हमेशा अपने कार्य में सफल होता है। स्वावलम्बी सरलता का व्यवहार करता है, किसी के साथ छल-कपट नहीं करता। उसमें त्याग, तपस्या और सेवाभाव होता है, लालच नहीं होता। वह स्वाभिमान की रक्षा के लिए बड़े-से-बड़े वैभव को तिनके के समान त्याग देता है। उसमें असीम उत्साह और आत्मविश्वास होता है।

स्वावलम्बन के लाभ-स्वावलम्बन का गुण प्रत्येक परिस्थिति में लाभकारी होता है। स्वावलम्बी व्यक्ति आत्मविश्वास के कारण उन्नति कर सकता है। उसमें स्वयं काम करने एवं सोचने-विचारने की सामर्थ्य होती है। वह किसी भी काम को करने के लिए किसी के सहारे की प्रतीक्षा नहीं करता। वह अकेला ही कार्य करने के लिए आगे बढ़ता है। उसे अपना काम करने में सच्चा आनन्द मिलता है। जिस प्रकार बैसाखी के सहारे चलने वाले व्यक्ति की बैसाखी छीन ली जाए तो उसका चलना बन्द हो जाता है; उसी प्रकार जो व्यक्ति दूसरों के सहारे की आशा करता है, उसका मार्ग निश्चित ही अवरुद्ध होता है।

नेपोलियन बोनापार्ट के कथनानुसार, ‘असम्भव शब्द मूर्खा के शब्दकोश में होता है।’ विघ्न-बाधाएँ स्वावलम्बियों के मार्ग को अवरुद्ध नहीं कर पातीं। महापुरुषों ने स्वावलम्बन के कारण ही उन्नति की है। स्वावलम्बी की सभी प्रशंसा करते हैं। उसे यश और गौरव की प्राप्ति होती है।

स्वावलम्बियों के उदाहरण—संसार के सभी महापुरुष स्वावलम्बन के कारण ही महान् बने हैं। छत्रपति शिवाजी ने थोड़े-से मराठों को एकत्र कर हिन्दुओं की निराशा से रक्षा की थी। एक लकड़हारे का लड़का’ अब्राहम लिंकन स्वावलम्बन से ही अमेरिका का राष्ट्रपति बना था। बेंजामिन फ्रेंकलिन ने स्वावलम्बन का पाठ पढ़ा और विज्ञान के क्षेत्र में नाम कमाया। माइकल फैराडे प्रारम्भ में जिल्दसाजी का कार्य किया करते थे, पर स्वावलम्बन के बल पर ही वे संसार के महान् वैज्ञानिक बने। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर दीन ब्राह्मण की सन्तान थे, किन्तु भारत में उन्होंने जो यश अर्जित किया, उसका रहस्य स्वावलम्बन ही है। कवीन्द्र रवीन्द्र ने नदी के तट पर मात्र दस विद्यार्थियों को बैठाकर ही शान्ति-निकेतन की स्थापना की थी। गाँधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में स्वावलम्बन के बल पर गोरे शासकों के अत्याचारों का दमन कियाथा। उन्होंने
आत्मबल के द्वारा ही भारत को परतन्त्रता के पाश से मुक्त कराया था। नेताजी सुभाषचन्द्र बोले ‘आजाद हिन्द फौज का संगठन करके अंग्रेजों के छक्के छुड़ाये थे।

स्वावलम्बन की शिक्षा–स्वावलम्बन का गुण वैसे तो किसी भी आयु में हो सकता है, परन्तु बालकों में यह शीघ्र उत्पन्न किया जा सकता है। उन्हें ऐसी परिस्थिति में डालकर जहाँ कोई सहारा देने वाला न हो, स्वावलम्बन का पाठ सिखाया जा सकता है। आजकल स्वावलम्बन की विशेष आवश्यकता है। प्रकृति से भी हमें स्वावलम्बन की शिक्षा मिलती है। पशु-पक्षियों के बच्चे जैसे ही चलने-फिरने लगते हैं, वे अपना । रास्ता स्वयं खोज लेते हैं और अपना घर स्वयं बनाते हैं। हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है कि हम बात-बात में सरकार का मुंह ताकते हैं और आवश्यकता की पूर्ति न होने पर हम उसे दोषी तो ठहराते हैं, पर अपनी उन्नति के लिए स्वयं कुछ नहीं करते। किसी विचारक ने ठीक ही कहा है कि “पतन से भी महत्त्वपूर्ण पतन यह है कि किसी को स्वयं पर ही भरोसा न हो।”

उपसंहार-इस प्रकार स्वावलम्बन उन्नति की प्रथम सीढ़ी है। स्वावलम्बन से जीवन-भर शान्ति और सन्तोष प्राप्त होता है। इससे निडरता, परिश्रम और धैर्य आदि गुणों का विकास होता है। इसी से समाज और राष्ट्र की उन्नति होती है। स्वावलम्बन पर सब प्रकार का वैभव निछावर किया जा सकता है। गुप्त जी ने कहा भी है

‘स्वावलम्बन की एक झलक पर, निछावर है कुबेर का कोष।’

17. पर उपदेश कुशल बहुतेरे [2014, 18]

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. पर उपदेश द्वारा अहं की सन्तुष्टि,
  3. विचार से आचार श्रेष्ठ,
  4. आचरण का ही प्रभाव पड़ता है,
  5. अनाचरित उपदेश प्रभावक नहीं होता,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना-दूसरों को उपदेश देना बहुत ही आसान कार्य है; क्योंकि दूसरों को उपदेश देने में स्वयं का कुछ नहीं लगता; बस जरा-सी जीभ ही हिलानी पड़ती है। परन्तु इसे आचरण में उतारना कोई हँसी-खेल नहीं है। यह हवा में गाँठ लगाने के सदृश कठिन ही नहीं, अपितु अति कठिन है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने ‘श्रीरामचरितमानस में मानव-जीवन को प्रेरणा देने वाली व योग्य दिशा-निर्देश करने वाली कितनी ही सूक्तियाँ सँजो रखी हैं, जिनमें से एक यह भी है। मेघनाद जब युद्ध में मारा जाता है तो मन्दोदरी आदि रावण की रानियाँ विलाप कर रोने लगती हैं। उस समय रावण जगत् की नश्वरता आदि का बखानकर उन्हें समझाने लगता है। इसी अवसर पर गोस्वामी जी लिखते हैं

तिन्हहिं ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन ॥
पर उपदेश कुशल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे ॥

अर्थात् रावण उन्हें तो उपदेश देने लगा, पर स्वयं उसका आचरण क्या था? एक असहाय परायी नारी को बलपूर्वक उठा लाना, उसके लिए समस्त लंका-राज्य, बन्धु-बान्धव, स्वजन-परिजन को विनष्ट करा डालना। इस प्रकार वह स्वयं तो था पापाचारी, पर बातें बड़ी ऊँची और शुभ करता था। ऐसे ही व्यक्तियों को लक्ष्य करते हुए कबीर ने लिखा है

अपना मन निश्चल नहीं, और बँधावत धीर।
पानी मिले न आप को, औरहु बकसत हीर॥

सचमुच दूसरों को उपदेश देने में बहुत-से लोग बड़े कुशल होते हैं; पर उसे स्वयं अपने आचरण में उतारकर दिखाने वाले बिरले ही होते हैं।

पर उपदेश द्वारा अहं की सन्तुष्टि—किसी विद्वान् व्यक्ति का कथन है कि “परोपदेश पाण्डित्यं’, अर्थात् दूसरों को उपदेश देने में लोग अपनी पण्डिताई अथवा विद्वत्ता का प्रदर्शन करते हैं।

वस्तुत: मनुष्य में दूसरों को उपदेश देने की प्रवृत्ति बहुत सामान्य है। इसका कारण यह है कि इस प्रकार वह दूसरों पर अपनी श्रेष्ठता, अपनी विद्वत्ता की धाक जमाकर अपने अहं को सन्तुष्ट करना चाहता है। यह भी देखने में आता है कि जो जितना खोखला होता है, आचरण से गिरा होता है, दूसरों को उपदेश देने में वह उतना ही उत्साह प्रकट करता है। इसका मनोवैज्ञानिक कारण कदाचित् यही है कि आचरण-हीनता से उसके अन्दर हीनता की जो एक ग्रन्थि बन जाती है, उसे वह इस प्रकार के आडम्बर से दबाना चाहता है।

विचार से आचार श्रेष्ठ-किसी विचारक का कथन है, “आचरण का एक कण सम्पूर्ण भाषण से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।” एक लघुकथा से यह बात अधिक स्पष्ट हो जाती है—कौरव-पाण्डव बाल्यावस्था में गुरुजी के पास विद्याध्ययन के लिए गये। गुरुजी ने पहला पाठ दिया, ‘सत्यं वद’ (सत्य बोलो)। अन्य बच्चों ने तो पाठ तत्काल याद करके सुना दिया, पर युधिष्ठिर न सुना सके। एक-एक करके कई दिन बीत गये। युधिष्ठिर यही कहते रहे-“पाठ अभी ठीक से याद नहीं हुआ। एक दिन बोले-“याद हो गया।” गुरुजी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा-“युधिष्ठिर, जरा-सा पाठ याद करने में तुम्हें इतना समय कैसे लग गया?’ युधिष्ठिर ने नम्रतापूर्वक कहा-“गुरुदेव! आपके दिये पाठ के शब्द रटने थोड़े ही थे, उन्हें तो व्यवहार में उतारना था। मुझसे कभी-कभी असत्य भाषण हो जाता था। अब इतने दिनों के अभ्यास से ही उस दुर्बलता को दूर कर सका हूँ। इसी से कहता हूँ कि पाठ याद हो गया।” गुरुदेव युधिष्ठिर की ऐसी निष्ठा देखकर गद्गद हो गये। उन्होंने उन्हें गले से लगा लिया। इसी आचरण के बल पर युधिष्ठिर आगे चल कर धर्मराज कहलाये।

आचरण का ही प्रभाव पड़ता है-आज के नेताओं में उपदेश देने की कला प्रचुरता से विद्यमान है। वे मंच पर खड़े होकर भोली-भाली जनता के समक्ष मितव्ययिता का उपदेश देते हैं, परन्तु स्वयं पाँच सितारा । होटलों में आधुनिक सुख-सुविधाओं से युक्त वैभव का उपभोग करते हैं। सत्य ही कहा है-

कथनी मीठी खाँड़ सी, करनी विष की लोय।
कथनी तज करनी करै, तो विष से अमृत होय॥

महापुरुषों के लक्षण बताते हुए एक विचारक ने कहा है, “ने जैसा सोचते हैं, वे कहते हैं और जैसा कहते हैं, वैसा ही करते हैं।’ मन से, वचन से और कर्म से वे क रूप होते हैं। जो केवल कहते ही हैं, तदनुरूप आचरण नहीं करते, उनकी बातो का लोगों पर कोई प्रभाव नहीं होता। आदरणीय बापू जी उपदेश देने से पूर्व स्वयं आचरण करते थे। स्वयं आचरण करके ही उसे दूसरों से करने के लिए कहते थे। यह है उन असाधारण पुरुषों की बात, जो वाक्शुरता में नहीं, आचरण की शूरता में विश्वास रखते थे। ऐसे लोगों की वाणी से ऐसा ओज प्रकट होता है कि सुनने वाला प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। यह है कथनी और करनी की एकता का प्रभाव। वास्तव में कथनी को करनी में परिणत करके दिखाने वाले लोग असाधारण होते हैं। ऐसे ही आचारनिष्ठ लोगों से जन-जीवन प्रभावित होता है।

अनाचरित उपदेश प्रभावक नहीं होता–जो व्यक्ति अपनी लच्छेदार भाा में प्रभावोत्पादक उपदेश देता है, लेकिन स्वयं उस उपदेश के अनुसार आचरण नहीं करता: ऐसे लोगों की प्रभावकता अधिक समय तक नहीं टिकती। ‘ढोल की पोल’ भन्ना कितने दिनों तक छिपी रह सकती हैं। ऐसे लोगों का उपदेश ‘थोथा चना बाजे घना’ के अनुसार कोरी बकवास ही समझा जाता है। सफेद पोशाक पहनकर, मुग्धकारी और मनमोहक वाणी में बोलने वालों की जब कलई खुल जाती है तो जनता में ऐसे लोग घृणा के पात्र बन जाते हैं।

उपसंहार-समाज में ऐसे लोगों की भरमार है, जिनकी कथनी और करन में कोई तालमेल ही नहीं। ऐसे ही लोगों से समाज में पाखण्ड और मिथ्याचार पनपते हैं तथा सच्चाई छिप जाती है। फलतः इनसे समाज का हित होना तो दूर, अहित ही होता है। तोला भर आचरण सेर खोखले उपदेश से बढ़कर है, इसीलिए एक विद्वान् ने लिखा है-‘Example is better than precept.’ (उपदेश से आचरण भला)।