सामाजिक निबन्ध

दूरदर्शन का सामाजिक जीवन पर प्रभाव

सम्बद्ध शीर्षक

  • दूरदर्शन का महत्त्व
  • दूरदर्शन का जीवन पर प्रभाव
  • दूरदर्शन से लाभ एवं हानि [2012]
  • दूरदर्शन : गुण और दोष [2010]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. दूरदर्शन का आविष्कार,
  3. विभिन्न क्षेत्रों में दूरदर्शन का योगदान,
  4. दूरदर्शन से हानियाँ,
  5. उपसंहार।

प्रस्तावना-विज्ञान द्वारा मनुष्य को दिया गया एक सर्वाधिक आश्चर्यजनक उपहार है—दूरदर्शन। आज व्यक्ति जीवन की आपाधापी से त्रस्त है। वह दिन-भर अपने काम में लगा रहता है, चाहे उसका कार्य शारीरिक हो या मानसिक। शाम को थक कर चूर हो जाने पर अपनी थकावट और चिन्ताओं से मुक्ति के लिए व्यक्ति कुछ मनोरंजन चाहता है। दूरदर्शन मनोरंजन का सर्वोत्तम साधन है। आज यह जनसामान्य के जीवन का केन्द्रीय अंग हो चला है। इससे जीवन के विविध क्षेत्रों में व्यक्ति का ज्ञानवर्द्धन हुआ है। दूरदर्शन ने व्यक्ति में जनशिक्षा का संचार करके उसे समय के साथ चलने की चेतना दी है। यह रेडियो, सिनेमा और समाचार-पत्रों से अधिक अच्छा और प्रभावी माध्यम सिद्ध हुआ है।

दूरदर्शन का आविष्कार-दूरदर्शन का आविष्कार अधिक पुराना नहीं है। 25 जनवरी, 1926 ई० को इंग्लैण्ड के एक इंजीनियर जॉन बेयर्ड ने इसको रॉयल इंस्टीट्यूट के सदस्यों के सामने पहली बार प्रदर्शित किया। भारत में दूरदर्शन का पहला केन्द्र 1959 ई० में नयी दिल्ली में चालू हुआ था। आज तो लगभग सारे देश में दूरदर्शन का प्रसार हो गया है और इसका प्रसारण-क्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है। कृत्रिम उपग्रहों ने तो दूरदर्शन के कार्यक्रमों को समस्त विश्व के लोगों के लिए और भी सुलभ बना दिया है। ।

विभिन्न क्षेत्रों में दूरदर्शन का योगदान–दूरदर्शन अनेक दृष्टियों से हमारे लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है। कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में दूरदर्शन के योगदान, महत्त्व एवं उपयोगिताओं का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया जा रहा है
(क) शिक्षा के क्षेत्र में-दूरदर्शन से अनेक शैक्षिक सम्भावनाएँ जीवन्त हुई हैं। वह कक्षा में प्रभावशाली ढंग से पाठ की पूर्ति कर सकता है तथा विविध विषयों में यह विद्यार्थी की रुचि विकसित कर सकता है। दृश्य होने के कारण इसका प्रभाव दृढ़ होता है। देश-विदेश के अनेक स्थानों को देखकर भौगोलिक ज्ञान बढ़ता है।
(ख) वैज्ञानिक अनुसन्धान तथा अन्तरिक्ष के क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसन्धान की दृष्टि से भी दूरदर्शन का विशेष महत्त्व रहा है। चन्द्रमा, मंगल व शुक्र ग्रहों पर भेजे गये अन्तरिक्ष यानों में दूरदर्शन यन्त्रों का प्रयोग किया गया था, जिन्होंने वहाँ के बहुत सुन्दर और विश्वसनीय चित्र पृथ्वी पर भेजे। विभिन्न वैज्ञानिक अनुसन्धानों को प्रदर्शित करके दूरदर्शन ने विज्ञान का उच्चतर ज्ञान कराया है।
(ग) तकनीक और चिकित्सा के क्षेत्र में तकनीक और चिकित्सा के क्षेत्र में भी दूरदर्शन बहुत शिक्षाप्रद रहा है। दूरदर्शन ने एक सफल और प्रभावशाली प्रशिक्षक की भूमिका निभायी है। यह अधिक। प्रभावशाली और रोचक विधि से मशीनी प्रशिक्षण के विभिन्न पक्ष शिक्षार्थियों को समझा सकता है।
(घ) कृषि के क्षेत्र में–भारत एक कृषिप्रधान देश है। यहाँ अधिकांश कृषक अशिक्षित हैं। दूरदर्शन ने अपने कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को फसल बोने की आधुनिक तकनीक, उत्तम बीज तथा रासायनिक खाद के प्रयोग और उसके परिणामों को प्रत्यक्ष दिखाकर इस क्षेत्र में सराहनीय कार्य किया है।
(ङ) सामाजिक चेतना की दृष्टि से विविध कार्यक्रमों के माध्यम से दूरदर्शन ने लोगों को ‘छोटा परिवार-सुखी परिवार की ओर आकर्षित किया है। इसने बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, छुआछूत व साम्प्रदायिकता के विरुद्ध जनमत तैयार किया है। यह बाल-कल्याण और नारी-जागरण में भी उपयोगी सिद्ध हुआ है। यह दर्शकों को कानून और व्यवस्था के विषय में भी शिक्षित करता है।
(च) राजनीतिक दृष्टि से दूरदर्शन राजनीतिक दृष्टि से भी जनसामान्य को शिक्षित करता है। वह प्रत्येक व्यक्ति को, उसके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक करता है तथा मताधिकार के प्रति रुचि जात करके उसमें राजनतिक चेतना लाता है।

दूरदर्शन के सीधे प्रसारण ने कुश्ती, तैराकी, बैडमिण्टन, फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट आदि खेलों को लोकप्रियता की बुलन्दियों पर पहुँचा दिया है। दूरदर्शन के इस सुदृढ़ प्रभाव को देखते हुए उद्योगपति और व्यवसायी अपने उत्पादनों के प्रचार के लिए इसे प्रमुख माध्यम के रूप में अपना रहे हैं।

दूरदर्शन से हानियाँ-दूरदर्शन से होने वाले लाभों के साथ-साथ इससे होने वाली कुछ हानियाँ भी हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। कोमल आँखें घण्टों तक टी० वी० स्क्रीन पर केन्द्रित रहने से अपनी स्वाभाविक शोभा क्षीण कर लेती हैं। इससे निकलने वाली विशेष प्रकार की किरणों का प्रतिकूल प्रभाव नेत्रों के साथ-साथ त्वचा पर भी पड़ता है। इसके कारण हमें अपने आवश्यक कार्यों के लिए भी समय का प्रायः अभाव ही बना रहता है।

केबल टी० वी० पर प्रसारित होने वाले कुछ कार्यक्रमों ने तो अल्पवयस्क बुद्धि के किशोरों को वासना के पंक में धकेलने का कार्य किया है। इनसे न केवल हमारी युवा पीढ़ी पर विदेशी अपसंस्कृति का प्रभाव पड़ रहा है अपितु हमारे अबोध और नाबालिग बच्चे भी इसके दुष्प्रभाव से बच नहीं पा रहे हैं।

उपसंहार-इस प्रकार हम देखते हैं कि दूरदर्शन मनोरंजन के साथ-साथ जन-शिक्षा का भी एक . सशक्त माध्यम है। आवश्यकता है कि इसे केवल मनोरंजन का साधन ही न समझा जाए, वरन् यह जन-शिक्षा एवं प्रचार का माध्यम भी बने। इस उद्देश्य के लिए इसके विविध कार्यक्रमों में अपेक्षित सुधार होने चाहिए। इसके माध्यम से तकनीकी और व्यावहारिक शिक्षा का प्रसार किया जाना चाहिए। दूरदर्शन से होने वाली हानियों के लिए एक विशेष तन्त्र एवं दर्शक जिम्मेदार हैं। इसके लिए दूरदर्शन के निदेशकों, सरकार एवं सामान्यजन को संयुक्त रूप से प्रयास करने होंगे, जिससे दूरदर्शन के कार्यक्रमों को दोषमुक्त बनाकर उन्हें वरदान के रूप में ग्रहण किया जा सके।

31. वनों (वृक्षों) का महत्त्व [2009, 13, 17]

सम्बद्ध शीर्षक

  • हमारी वन सम्पदा
  • वन और पर्यावरण
  • वन-महोत्सव की उपयोगिता
  • वृक्ष हमारे जीवन-साथी
  • वृक्षारोपण का महत्त्व [2009, 11]
  • वृक्षों की रक्षा : पर्यावरण सुरक्षा [2012, 13]
  • वृक्षारोपण [2013, 18]
  • वृक्ष : मानव के सच्चे हितैषी [2016]

रूपरेखा—

  1. प्रस्तावना,
  2. वनों को प्रत्यक्ष योगदान,
  3. वनों का अप्रत्यक्ष योगदान,
  4. भारतीय बन-सम्पदा के लिए उत्पन्न समस्याएँ,
  5. वनों के विकास के लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना-वन मानव-जीवन के लिए बहुत उपयोगी हैं, किन्तु सामान्य व्यक्ति इसके महत्त्व को नहीं समझ पा रहे हैं। जो व्यक्ति वनों में रहते हैं या जिनकी आजीविका वनों पर आश्रित है, वे तो वनों के महत्त्व को समझते हैं, लेकिन जो लोग वनों में नहीं रह रहे हैं, वे इन्हें प्राकृतिक शोभा का साधन मानते हैं। वनों का मनुष्यों के जीवन से कितना गहरा सम्बन्ध है, इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों में उनका योगदान क्रमिक रूप से द्रष्टव्य है।

वनों का प्रत्यक्ष योगदान :
(क) मनोरंजन का साधन-वन, मानव को सैर-सपाटे के लिए रमणीक क्षेत्र प्रस्तुत करते हैं। वृक्षों के अभाव में पर्यावरण शुष्क हो जाता है और सौन्दर्य नष्ट। ग्रीष्मकाल में लोग पर्वतीय क्षेत्रों की यात्रा करके इस प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द लेते हैं।
(ख) लकड़ी की प्राप्ति-वनों से हम अनेक प्रकार की बहुमूल्य लकड़ियाँ प्राप्त करते हैं। इन्हें ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। कुछ लकड़ियाँ व्यापारिक दृष्टिकोण से भी बहुत उपयोगी होती हैं,
जिनमें साल, सागौन, देवदार, चीड़, शीशम, चन्दन, आबनूस आदि की लकड़ियाँ मुख्य हैं। इनका प्रयोग फर्नीचर, इमारती सामान, माचिस, रेल के डिब्बे, जहाज आदि बनाने में किया जाता है।
(ग) विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चे माल की पूर्ति–वनों से लकड़ी के अतिरिक्त अनेक उपयोगी सहायक वस्तुओं की प्राप्ति होती है, जिनका अनेक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है। इनमें गोंद, शहद, जड़ी-बूटियाँ, कत्था, लाख, बाँस, बेंत आदि मुख्य हैं। इनका कागज, फर्नीचर, दियासलाई, टिम्बर, ओषधि आदि उद्योगों में कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है।
(घ) प्रचुर फलों की प्राप्ति-वन प्रचुर मात्रा में फल उत्पन्न करके मानव का पोषण करते हैं। ये फल अनेक बहुमूल्य खनिज लवणों व विटामिनों के स्रोत हैं।
(ङ) जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियाँ-वन अनेक जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियों के भण्डार हैं। वनों में ऐसी अनेक वनस्पतियाँ पायी जाती हैं, जिनसे अनेक असाध्य रोगों का निदान सम्भव हो सका है। विजयसार की लकड़ी मधुमेह की अचूक औषध है।
(च) वन्य पशु-पक्षियों को संरक्षण–वन्य पशु-पक्षियों की सौन्दर्य की दृष्टि से अपनी एक विशिष्ट उपयोगिता है। वन अनेक वन्य पशु-पक्षियों को संरक्षण प्रदान करते हैं। ये हिरन, नीलगाय, गीदड़, रीछ, शेर, चीता, हाथी आदि वन्य पशुओं की क्रीड़ास्थली हैं। ये पशु वनों में स्वतन्त्र विचरण करते हैं, भोजन प्राप्त करते हैं और संरक्षण पाते हैं। पालतू पशुओं के लिए भी वन विशाल चरागाह उपलब्ध कराते हैं।
(छ) आध्यात्मिक लाभ–मानव-जीवन के भौतिक पक्ष के अतिरिक्त उसके मानसिक एवं आध्यात्मिक पक्षों के लिए भी वनों का महत्त्व कुछ कम नहीं है। सांसारिक जीवन से क्लान्त मनुष्य यदि वनों में कुछ समय निवास करते हैं तो उन्हें सन्तोष तथा मानसिक शान्ति प्राप्त होती है।

उपर्युक्त के अतिरिक्त सरकार को राजस्व और वनों के ठेकों के रूप में करोड़ों रुपये की आय होती है। साथ ही सरकार चन्दन के तेल, उसकी लकड़ी से बनी कलात्मक वस्तुओं, फर्नीचर, लाख, तारपीन के तेल आदि के निर्यात से प्रति वर्ष करोड़ों रुपये की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करती है।

वनों का अप्रत्यक्ष योगदान :

(क) वर्षा–भारत एक कृषिप्रधान देश है। कृषि की मानसून पर निर्भरता की दृष्टि से वनों का बहुत महत्त्व है। वन वर्षा में सहायता करते हैं। इन्हें वर्षा का संचालक कहा
जाता है।
(ख) पर्यावरण सन्तुलन (शुद्धीकरण)-वन-वृक्ष वातावरण से दूषित वायु (कार्बन डाइऑक्साइड) ग्रहण करके अपना भोजन बनाते हैं और ऑक्सीजन छोड़कर पर्यावरण को शुद्ध बनाते हैं। इस प्रकार वन पर्यावरण में सन्तुलन बनाये रखने में सहायक होते हैं।
(ग) जलवायु पर नियन्त्रण-वनों से वातावरण का तापक्रम, नमी और वायु प्रवाह नियन्त्रित होता है, जिससे जलवायु में सन्तुलन बना रहता है। वन जलवायु की भीषण उष्णता को सामान्य बनाये रखते हैं। ये आँधी-तूफानों से हमारी रक्षा करते हैं तथा जलवायु को भी प्रभावित करते हैं।
(घ) जल के स्तर में वृद्धि–वन वृक्षों की जड़ों के द्वारा वर्षा के जल को सोखकर भूमि के नीचे के जल-स्तर को बढ़ाते रहते हैं। इससे दूर-दूर तक के क्षेत्र हरे-भरे रहते हैं, साथ ही भूमिगत जल का स्तर घटने नहीं पाता। पहाड़ों पर बहते चश्मे, वनों की पर्याप्तता के ही परिणाम हैं।
(ङ) भूमि-कटाव पर रोक–वनों के कारण वर्षा का जल मन्द गति से प्रवाहित होता है; अतः भूमि का कटाव कम होता है। वर्षा के अतिरिक्त जल को वन सोख लेते हैं और नदियों के प्रवाह को नियन्त्रित करके भूमि के कटाव को रोकते हैं, जिसके फलस्वरूप भूमि की उर्वरा-शक्ति भी बनी रहती है।
(च) रेगिस्तान के प्रसार पर रोक-वन तेज आँधियों को रोकते हैं तथा वर्षा को आकर्षित करते हैं, जिससे मिट्टी के कण उनकी जड़ों में बँध जाते हैं। इससे रेगिस्तान का प्रसार नहीं होने पाती।।

भारतीय वन-सम्पदा के लिए उत्पन्न समस्याएँ-वनों के योगदान से स्पष्ट है कि वन हमारे जीवन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूप से बहुत उपयोगी हैं। वनों में अपार सम्पदा पायी जाती थी, किन्तु जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गयी, वनों को मनुष्य के प्रयोग के लिए काटा जाने लगा। अनेक अद्भुत और घने वन आज समाप्त हो गये हैं। वन-सम्पदा के इस संकट ने व्यक्ति और सरकार को वन-संरक्षण की ओर सोचने पर विवश कर दिया है। आज हमारे देश में वनों का क्षेत्रफल केवल 20 प्रतिशत से भी कम रह गया है, जो कम-से-कम एक-तिहाई होना चाहिए था। वनों के पर्याप्त दोहन, नगरीकरण, वनों की अन्धाधुन्ध कटाई ने भारतीय वन-सम्पदा के लिए अनेक समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं।

वनों के विकास के लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास सरकार ने वनों के महत्त्व को दृष्टिगत रखते हुए समय-समय पर वनों के संरक्षण और विकास के लिए अनेक कदम उठाये हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है

  1. सन् 1956 ई० में वन महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य नारा था-‘अधिक वृक्ष लगाओ’, तभी से यह उत्सव प्रति वर्ष 1 से 7 जुलाई तक मनाया जाता है।
  2. सन् 1965 ई० में सरकार ने केन्द्रीय वन आयोग की स्थापना की जो वनों से सम्बन्धित आँकड़े और सूचनाएँ एकत्रित करके वनों के विकास में लगी हुई संस्थाओं के कार्य में ताल-मेल बैठाता है।
  3. विभिन्न राज्यों में वन निगमों की रचना की गयी है, जिससे वनों की अनियन्त्रित कटाई को रोका जा सके।

व्यक्तिगत स्तर पर भी अनेक आन्दोलनों का संचालन करके समाज-सेवियों द्वारा समय-समय पर सरकार को वनों के संरक्षण और विकास के लिए सचेत किया जाता रहा है।

उपसंहार-निस्सन्देह वन हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं। इसलिए वनों का संरक्षण और संवर्द्धन बहुत आवश्यक है। इसलिए आवश्यकता है कि सरकार वन-संरक्षण नियमों को कड़ाई से पालन कराकर आने वाली पीढ़ी की भावी प्राकृतिक विपदाओं से रक्षा करे। इसके लिए सरकार के साथ-साथ सामान्य जनता का सहयोग भी अपेक्षित है। यदि प्रत्येक व्यक्ति वर्ष में एक बार एक वृक्ष लगाने और उसको भली प्रकार संरक्षण करने का संकल्प लेकर उसे क्रियान्वित भी करे तो यह राष्ट्र के लिए आगे आने वाले कुछ एक वर्षों में अमूल्य योगदान हो सकता है।

32. ग्राम्य-जीवन [2010]

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारत गाँवों में बसता है।
  • भारतीय किसान का जीवन
  • भारतीय किसान की समस्याएँ

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. ग्रामीणों का सरल और सात्त्विक जीवन,
  3. ग्राम्य-जीवन का आनन्द,
  4. भारतीय ग्रामों की दुर्दशा,
  5. सरकार के सुधार और प्रयत्न,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना–भारत ग्रामप्रधान देश है। यहाँ की 70% जनसंख्या ग्रामों में निवास करती है। गाँधीजी का कथन था कि, “भारत ग्रामों में बसता है।’ कवीन्द्र रवीन्द्र का कथन है कि ‘‘यदि तुम्हें ईश्वर के दर्शन करने हैं तो वहाँ जाओ, जहाँ किसान जेठ की दुपहरी में हल जोतकर एड़ी-चोटी का पसीना एक करता है। इन कथनों से स्पष्ट होता है कि भारत का सच्चा सौन्दर्य ग्रामों में है। भारत में ग्रामों की संख्या अधिक है। ग्रामों में लोग झोपड़ियों में निवास करते हैं, जबकि नगरों के लोग उच्च अट्टालिकाओं और दिव्य प्रासादों में। फिर भी वास्तविक आनन्द ग्रामों में ही प्राप्त होता है, नगरों में नहीं।

ग्रामीणों का सरल और सात्त्विक जीवन–ग्रामों के लोग बाहर से अधनंगे, अनाकर्षक और अशिक्षित होते हुए भी हृदय से सीधे, सच्चे और पवित्र होते हैं। भारत की सच्ची सभ्यता के दर्शन ग्रामों में ही होते हैं। ग्रामवासी ईमानदार और अतिथि-सत्कार करने वाले होते हैं। ग्रामीणों का जीवन कृत्रिमता, बाह्यआडम्बर, छल, धोखा आदि से दूर रहता है। ‘सादा जीवन और उच्च विचार’ की झलक सरल ग्राम्य-जीवन में ही मिलती है। ग्रामीणों में अधिक व्यय की भावना नहीं होती। वे कृत्रिम साधनों से दूर तथा सिनेमा, नाटक , और नाच-रंग से अछूते रहते हैं।

ग्रामीण लोग रूखा-सूखा, जो कुछ मिल जाता है, खा लेते हैं। मोटा और सस्ता कपड़ा पहनते हैं। अतिथि का दिल खोलकर स्वागत करते हैं। खुली हवा और खुली धूप में प्रकृति के ये नौजवान साधु खेतों में काम करते हैं। प्रात:काल की ऊषा की लालिमा से लेकर सन्ध्या तक ये खेतों में कठिन परिश्रम करते हैं। सन्ध्या-पूजा से अनभिज्ञ इन लोगों के हृदय में ईश्वर निवास करता है। इनमें परमात्मा के प्रति अटूट विश्वास, मानवता से प्रेम तथा भाईचारा, दया, करुणा, सहयोग आदि की उच्च भावनाएँ पायी जाती हैं। गाय-भैंस के ताजे दूध और मक्खन, अपने खेत में उत्पन्न अन्न और सब्जियों, ग्राम-वधुओं के हाथ से पीसे गये आटे और उनके द्वारा बिलोये गये मट्टे में जो आनन्द और सन्तोष मिलता है, वह नगरों के चटनी, अचार, मुरब्बों और पकवानों में कहाँ ?

ग्राम्य-जीवन का आनन्द–ग्रामवासियों का जीवन सरल, शान्त और आनन्दमय होता है। नगरों की विशाल अट्टालिकाओं, चौड़ी-चिकनी सड़कों, बिजली की चकाचौंध, सिनेमा, नाट्यधरों और अन्य विलासिता की सामग्री में वह आनन्द नहीं, जो शान्त, एकान्त, कोलाहल से दूर प्रकृति की सुरम्य गोद अर्थात् ग्रामों के वातावरण में है। कल-कल नाद करके बहती हुई नदी की धारा, घनी अमराइयों, पुष्पित लताओं, दूर तक फैली हरीतिमा और लहलहाते खेतों से जो मानसिक शान्ति और आत्म-सन्तोष मिलता है, वह धुआँ उगलती चिमनियों, क्लोरीन मिले पानी, सड़कों पर घर-घर्र और पों-पों के कोलाहल, हवा की पहुँच से दूर घने बसे घरों के वातावरण से पूर्ण नगरों में कहाँ ? गाँवों में प्रकृति का शुद्ध रूप देखने को मिलता है।

भारतीय ग्रामों की दुर्दशा-सरलता, सादगी और प्रकृति की सुरम्य गोद अर्थात् भारतीय ग्रामों की एक अपनी करुण कहानी है। शताब्दियों से इन दीन-हीन किसानों का शोषण होता आ रहा है। आज ग्रामों में जो विकट समस्याएँ मुँह बाये खड़ी हुई हैं, वे भारत जैसे देश के लिए कलंक की बात हैं। अधिकांश ग्रामीण अशिक्षा के भयंकर रोग, दरिद्रता के दुर्दान्त दानव एवं अन्धविश्वास के भूत से ग्रसित हैं। भारत की स्वतन्त्रता से पूर्व कृषक का जन्म दरिद्रता और अज्ञान के मध्य होता था, वे अन्धविश्वास और ऋण की गोद में पलते थे, दु:ख और दरिद्रता में बड़े होते थे। भारत की लोकप्रिय सरकार ने ग्रामों की दशा में उल्लेखनीय सुधार किये हैं।

वर्तमान समय में गाँव दुर्गुणों, बुराइयों, रूढ़ियों एवं हानिकारक रीति-रिवाजों के अड्डे बन गये हैं। भोले किसानों को सूदखोर महाजनों एवं मुनाफाखोर व्यापारियों के शोषण का शिकार होना पड़ता है। ग्रामों में स्नेह, स्वावलम्बन, सहयोग, सरलता, पवित्रता आदि गुणों को लोप होता जा रहा है। बढ़ती हुई बेकारी ने ग्रामीणों के जीवन को कुण्ठित और निराशामय बना दिया है। जातिवाद, लड़ाई-झगड़े एवं मुकदमेबाजी के कारण उनका जीवन नरकतुल्य बन गया है; अतः ग्रामों के देश भारत की सर्वांगीण उन्नति करने के लिए ग्रामों के सुधार की नितान्त आवश्यकता है।

सरकार के सुधार और प्रयत्न-हमारी लोकप्रिय सरकार ग्रामों के सुधार की ओर विशेष ध्यान दे रही है। ग्रामों में रोगों से मुक्ति दिलाने के लिए अस्पताल तथा अशिक्षा को दूर करने के लिए स्कूल खोले जा रहे हैं। ग्रामों के आर्थिक विकास के लिए उन्हें सड़कों और रेलमार्गों से जोड़ा जा रहा है। नलकूपों, बिजली, उत्तम बीज, रासायनिक खाद तथा कृषि-यन्त्रों को सुलभ कराके ग्रामों की दशा सुधारी जा रही है। ग्राम पंचायतों के माध्यम से रेडियो, टेलीविजन आदि के द्वारा मनोरंजन के साधन सुलभ कराये जा रहे हैं।

उपसंहार–स्वतन्त्रता से पूर्व ग्रामों की दशा अत्यन्त शोचनीय थी। सरकार के प्रयत्नों से ग्रामों की दशा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। ग्राम-सुधार और विकास कार्यक्रमों में तेजी लाने के लिए ग्राम के उत्साही युवकों का सहयोग अपेक्षित है। वह दिन दूर नहीं है, जब भारत के ग्राम पुन: ‘पृथ्वी का स्वर्ग’ कहलाएँगे।

33. चलचित्र : लाभ और हानियाँ

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. चलचित्रों की व्यापकता,
  3. मनोरंजन का साधन,
  4. समाज पर कुप्रभाव,
  5. उपसंहार।

प्रस्तावना मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो समाज में रह कर ही अपने मनोरंजन के माध्यम हूँढ़ने का यत्न करता है। समय और परिस्थिति के अनुसार उसके मनोरंजन के साधन बदलते रहते हैं। जब तक विज्ञान का पूर्ण विकास नहीं हुआ था, तब तक वह मेले-तमाशे आदि के माध्यम से अपना मनोरंजन करता था, परन्तु वैज्ञानिक विकास के साथ उसने अपनी सुख-सुविधाओं के नवीन साधनों का भी आविष्कार किया है। उसने दृश्य और श्रव्य की सहायता से अनेक आविष्कार किये हैं और इन्हीं के संयोग से चलचित्र का निर्माण किया है। सन् 1929 तक बने चलचित्रों में फोटोग्राफी तो सचल थी पर उनमें ध्वनि की कमी थी। सवाक् चलचित्रों का निर्माण सन् 1930 से आरम्भ हो गया था। पिछले वर्षों में इसने जो भी उन्नति की है, उसी के कारण मानव-मनोरंजन के क्षेत्र में इनको प्रमुख स्थान हो गया है।

चलचित्रों की व्यापकता–चलचित्रों ने समाज को अत्यधिक प्रभावित किया है। प्रारम्भ में जनता ने कौतूहल के साथ इस मनोरंजन का आस्वादन किया। धीरे-धीरे उसको इसमें कथा, नाटक, प्रहसन आदि का आनन्द भी मिलने लगा। इससे सिनेमा के दर्शकों की संख्या में वृद्धि होने लगी। जनता के प्रत्येक वर्ग में इसके प्रति मोह बढ़ने लगा। आज भारत में अमेरिका के बाद दूसरे नम्बर पर चलचित्रों का निर्माण होता है। प्रतिवर्ष भारत में बनने वाले चलचित्रों की संख्या लगभग एक हजार है। इनके निर्माण पर अरबों रुपये खर्च होते हैं। यह एक सफल व्यवसाय बन चुका है, जिसमें न जाने कितने लागों को रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं।

मनोरंजन का साधन–सिनेमा आज मनोरंजन का प्रमुख, सर्वसुलभ एवं सस्ता माध्यम माना जाता है। दिन भर विभिन्न कार्यों में लगे रहने के कारण लोगों का मन श्रान्त-क्लान्त रहता है। अपनी शारीरिक एवं मानसिक थकान को दूर करने के लिए वे थोड़ी-सी राशि व्यय करके सिनेमा देखते हैं तथा इसे देखते हुए आनन्द की धारा में बहकर अपनी समस्त पीड़ाओं को भूल जाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें जो मानसिक सन्तुष्टि प्राप्त होती है, उससे वे अपने अगले दिन के कार्यों के लिए उत्साह प्राप्त करते हैं।

सिनेमा शिक्षा के प्रचार का साधन भी स्वीकार किया जाता है। इसके द्वारा हमें अनेक प्रकार की शिक्षाएँ प्राप्त होती हैं। जिनके आधार पर दर्शक अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए अपने जीवन से विभिन्न बुराइयों को दूर कर अपना जीवन ‘आदर्श जीवन’ बना सकते हैं। अनेक समस्याओं के सहज, स्वाभाविक समाधान भी चलचित्रों के माध्यम से सुझाये जा सकते हैं, जो समाज में नवचेतना उत्पन्न कर सकते हैं। वीरों एवं देशभक्तों के चरित्रों पर बनी फिल्में राष्ट्रीय भावना को जाग्रत करती हैं।

सिनेमा से विभिन्न प्रकार के दृश्यों का आनन्द प्राप्त होता है। सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक चलचित्रों के माध्यम से हमें अपनी प्राचीन समृद्धि और परम्परा का ज्ञान होता है, जिससे प्रेरणा प्राप्त कर हम अपने वर्तमान को भी महान् बना सकते हैं।

समाज पर कुप्रभाव-सिनेमा ने आधुनिक समाज को जहाँ अत्यधिक प्रभावित करते हुए उसमें नव-चेतना जाग्रत की है, वहीं उसे पर्याप्त हानि भी पहुँचाई है। धन के लोभी फिल्म-निर्देशकों ने भद्दी-अश्लील और फूहड़ फिल्में बनानी आरम्भ कर दी हैं। इस प्रकार के चलचित्रों से दर्शकों के आचरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है। श्रृंगार एवं फैशन के प्रति आकर्षण भी चलचित्रों के प्रभाव से बढ़ रहा है। जिन लोगों को इसका व्यसन लग जाता है, वे अपनी आर्थिक स्थिति की चिन्ता किये बिना अपना सर्वस्व इसी में स्वाहा कर देते हैं। फिल्मों से मानवीय मूल्य नष्ट हो रहे हैं। लोगों को दृष्टिकोण हीन और कामुक होने लगा है तथा जीवन की वास्तविकता के प्रति उनकी आस्था समाप्त होने लगी है। कम आयु के बालक जब चलचित्र में अश्लील, अमानवीय और अतिमानवीय व्यवहार देखते हैं तो वे भविष्य में वैसा ही करने की प्रेरणा लेकर घर आते हैं।

आज स्थिति ऐसी हो गयी है कि सिनेमाघर बच्चों के बिगड़ने के अड्डे बन गये हैं। बच्चों के आयु से पहले परिपक्व हो जाने के पीछे भी सिनेमा का प्रमुख हाथ है। फिल्मों ने भारतीय समाज को ‘प्रेम-संस्कृति प्रदान की है जिसमें ‘गर्ल फ्रेण्ड’ और ‘ब्वॉय फ्रेण्ड’ का प्रचलन बढ़ा है, पति-पत्नी में मानसिक प्रतिरोध बढ़ा है तथा सामाजिक और पारिवारिक सम्बन्धों में विकार उत्पन्न हुए हैं।

उपसंहार–सिनेमा सैद्धान्तिक रूप से ज्ञानवर्द्धक है। इसका व्यावसायिक रूप अत्यन्त हानिकारक है। आज हमें इस प्रकार के चलचित्रों की आवश्यकता है जो सामाजिक, राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना जगाने वाली हों। फिल्म निर्माण में संलग्न निर्माता, निर्देशकों, अभिनेताओं आदि को भी अपना उत्तरदायित्व समझते हुए समाज-सुधार एवं राष्ट्र-निर्माण में योगदान देना चाहिए। दर्शकों को सिनेमा मनोरंजन के लिए देखना चाहिए, व्यसन के रूप में नहीं तभी सिनेमा की सार्थकता सिद्ध होगी।

34. नारी-शिक्षा (2010, 13]

सम्बद्ध शीर्षक

  • नारी-शिक्षा का महत्त्व [2011, 12, 14]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. स्त्री-शिक्षा का अतीत और वर्तमान,
  3. नारी शिक्षा की ओवश्यकता,
  4. नारी-शिक्षा को रूप,
  5. आधुनिक शिक्षा,
  6. उपसंहार : भारत में नारी-शिक्षा की वर्तमान स्थिति।

प्रस्तावना-एक समय था, जब कि भारतवर्ष जगद्गुरु कहलाता था। विश्व के कोने-कोने से शिक्षार्थी यहाँ के विश्वविद्यालयों में विद्या ग्रहण करने आते थे। परन्तु परिस्थितियों के चक्रवात में भारत ऐसा फैसा कि आज यहाँ अशिक्षा और अज्ञान का साम्राज्य व्याप्त हो गया है। आज विश्व के निरक्षरों का एक बड़ा प्रतिशत भारत में विद्यमान है। यहाँ की नारियों की स्थिति और भी दयनीय है। अक्षर-ज्ञान, स्कूली शिक्षा, तकनीकी शिक्षा आदि के क्षेत्र में वे बहुत पिछड़ी हुई हैं।

स्त्री-शिक्षा का अतीत और वर्तमान-ऐसा नहीं है कि भारतीय नारियाँ सदा-से ही अशिक्षित रही हों। प्राचीन काल में स्त्रियों को भी पुरुषों के समान शिक्षा दी जाती थी। अनुसूया, गार्गी, लीलावती आदि विदुषियों ने अपने ज्ञान से समाज को प्रभावित किया था। आचार्य मण्डन मिश्र की पत्नी ने जगद्गुरु शंकराचार्य से शास्त्रार्थ करके स्त्रियों के गौरव को बढ़ाया था। परन्तु दुर्भाग्य से भारतवर्ष को शताब्दियों तक आक्रमणकारियों के युद्ध झेलने पड़े। अस्तित्व के लिए जूझने हमारे देश का शैक्षिक विकास रुक गया। भारतीय नारी को अपनी लाज बचाने के लिए घर की दहलीज में सीमित रहना पड़ा। परिणामस्वरूप अशिक्षा उसकी विवशता बन गयी।

उल्लेखनीय बात यह है कि युगों तक विद्यालयी शिक्षा से वंचित रहने पर भी भारतीय नारी ने पुरुषसमाज को सुसंस्कारित करने का बीड़ा उठाया। शिवाजी को महान बनाने वाली जीजाबाई थीं। ‘तुलसीदास को ‘रामबोला’ बनाने वाली उनकी अर्धांगिनी रत्नावली’ थीं। सैकड़ों वर्षों के युद्धों में अपने धर्म और संस्कृति को बचाये रखने वाली भारत की नारियाँ ही थीं। इस कारण हम यहाँ की नारियों को अशिक्षित होते हुए भी असंस्कारित नहीं कह सकते।

नारी-शिक्षा की आवश्यकता–नारी और पुरुष दोनों समाज रूपी रथ के दो पहिये हैं। दोनों का समान रूप से शिक्षित होना आवश्यक है। समाज के कुछ पुरातनपन्थी लोग स्त्री-शिक्षा के विरोधी हैं। वे स्त्री को ‘पराया-धन’ या ‘पाँव की जूती’ या ‘अनुत्पादक’ मानकर पुरुषों के समकक्ष नहीं आने देना चाहते। वे भूल जाते हैं कि मनुष्य-जीवन की सबसे मूल्यवान शक्ति नारी के हाथों में ही है। नारियाँ ही माँ बनकर बच्चों को पालती हैं, उन्हें गुणवान बनाती हैं। वे ही उस कच्ची मिट्टी को अपने कल्पित साँचे में ढालती हैं। वह उसे देवता भी बना सकती हैं और राक्षस भी। यदि नारी में ही विवेक न होगा तो उसकी सन्तानें कैसे विवेकवान होंगी। अतः सर्वप्रथम नारी को शिक्षित, संस्कारित एवं ज्ञान-समृद्ध बनाना आवश्यक है।

अरस्तू के कथनानुसार, “नारी की उन्नति तथा अवनति पर ही राष्ट्र की उन्नति या अवनति निर्भर करती है।’ प्रसिद्ध दार्शनिक बर्नार्ड शॉ का कहना है कि “किसी व्यक्ति का चरित्र कैसा है, यह उसकी माता को देखकर बताया जा सकता है।”

नारी-शिक्षा का रूप–प्रश्न यह है कि नारी-शिक्षा का स्वरूप क्या होना चाहिए ? क्या नारी और पुरुष की शिक्षा में कोई अन्तर होना चाहिए ? उत्तर है–हाँ, होना चाहिए। जब प्रकृति ने उन्हें स्वभावतया पुरुष से भिन्न बनाया है तो उनकी शिक्षा भी भिन्न होनी चाहिए। नारी स्वभाव से कोमल होती है। उसमें समस्त रचनात्मक क्षमताएँ होती हैं। जयशंकर प्रसाद ने नारी-हृदय के गुणों की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा है

दया माया ममता लो आज, मधुरिमा लो अगाध विश्वास।
हमारा हृदय-रत्न निधि स्वच्छ, तुम्हारे लिए खुला है पास ॥

नारी में दया, ममता, मधुरिमा, विश्वास, स्वच्छता, समर्पण, त्याग आदि उदात्त वृत्तियाँ होती हैं। अतः उसकी शिक्षा भी ऐसी होनी चाहिए जिससे उसकी इन शक्तियों का उत्तरोत्तर विकास हो। एक नारी चिकित्सा, शिक्षा, सेवा, पालन-पोषण, सौन्दर्य-बोध, कला आदि क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। वह चिकित्सक, शिक्षिका, प्रशिक्षक, परिधान-विशेषज्ञ आदि के रूप में कुशल सिद्ध हो सकती है। ये कार्य उसकी शक्तियों और रुचियों के अनुरूप हैं।

आधुनिक शिक्षा-आज की नारी पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने की होड़ में इंजीनियरिंग, वाणिज्य, सेना, पायलट, पुलिस आदि सेवाओं में जा रही है। आज के इस समानता-समर्थक युग में इस दौड़ को उचित कहा जा रहा है, परन्तु ये क्षेत्र स्त्रियोचित नहीं हैं। सेना-पुलिस जैसे क्षेत्र पुरुषोचित हैं। इनके लिए चित्त की कठोरता और अनथक भागदौड़ की आवश्यकता होती है। स्त्री के लिए वैसी शिक्षा और नौकरी चाहिए जिससे उसका स्त्रैण स्वभाव अक्षुण्ण बना रहे। फिर भी यदि नारी-समाज का अल्पांश कानून, पुलिस, सेना, वाणिज्य जैसे क्षेत्रों में जाना चाहे तो उसे पुरुषवत् अधिकार दिये जाने चाहिए; क्योंकि रानी लक्ष्मीबाई, इन्दिरा गाँधी, सरोजिनी नायडू, किरण बेदी आदि प्रतिभाओं ने कठोर क्षेत्रों में आकर जनसमाज को क्रान्तिकारी दिशा प्रदान करने में सफलता प्राप्त की है।

उपसंहार : भारत में नारी-शिक्षा की वर्तमान स्थिति-यद्यपि भारत में नारी-शिक्षा की स्थिति सन्तोषजनक नहीं है, किन्तु आशाजनक अवश्य है। सरकार और समाज के प्रयत्नों से नारी-शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। हरियाणा में स्नातक स्तर तक ग्रामीण नारियों की शिक्षा मुफ्त कर दी गयी है। लड़कियों ने कला, चिकित्सा, विज्ञान, वाणिज्य, प्रशासनिक सेवा सभी क्षेत्रों में लड़कों को जबरदस्त चुनौती दी है। लड़कियों की उत्तीर्णता प्रतिशत और गुणवत्ता प्रतिशत लड़कों से अधिक है। इससे स्पष्ट है कि भारत नारी-शिक्षा और प्रतियोगिता के क्षेत्र में उत्तरोत्तर प्रगति कर रहा है। यह एक शुभ संकेत है।

35. परिवार नियोजन

सम्बद्ध शीर्षक

  • बढ़ती जनसंख्या : संसाधनों पर बोझ
  • बढ़ती हुई जनसंख्या और हमारी प्रगति

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. भारत की स्थिति,
  3. जनसंख्या : समस्या क्यों?,
  4. जनसंख्यावृद्धि के कारण,
  5. जनसंख्या-वृद्धि रोकने के उपाय,
  6. उपसंहार : शिक्षा तथा प्रोत्साहन।

प्रस्तावना–परिवार-नियोजन का तात्पर्य है-परिवार को सीमित रखना, दूसरे शब्दों में कम सन्तान को जन्म देना या जनसंख्या पर रोक लगाना। भारतवर्ष बीसवीं-इक्कीसवीं सदी में जिस सबसे बड़े और • भयानक संकट के दौर से गुजर रहा है, वह है-जनसंख्या-विस्फोट।

भारत की स्थिति-भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या के आँकड़े चौंका देने वाले हैं। यहाँ की आबादी एक अरंब बीस करोड़ का आँकड़ा पार कर चुकी है। हर मिनट में कई बच्चे जन्म ले लेते हैं। इस प्रकार प्रतिवर्ष सवा करोड़ की वृद्धि होती चली जाती है। दूसरे शब्दों में, भारत में हर वर्ष एक नया ऑस्ट्रेलिया समा जाता है।

जनसंख्या : समस्या क्यों ?–बढ़ती हुई जनसंख्या भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा इसलिए है, क्योंकि भारत के पास बढ़ती हुई आबादी को खिलाने-पिलाने, काम देने और बसाने की सुविधाएँ नहीं हैं। बढ़ती आबादी और साधनों का सन्तुलन बुरी तरह टूट चुका है। भारत की आबादी विश्व की कुल आबादी का लगभग 17% है, जब कि भूमि केवल 2% ही है। इस भूमि को बढ़ाने का कोई तरीका हमारे पास नहीं है।

दूसरी समस्या यह है कि देश में खाद्यान्न 4 +4 = 8 की दर से बढ़ते हैं तो जनसंख्या 4 x 4 = 16 की दर से। इस भाँति भूमि पर नित्य अभाव, गरीबी और भूख का दबाव बढ़ता चला जाता है। आजीविका के साधनों का भी यही हाल है। आजादी के बाद देश में कुछ लाख ही बेरोजगार थे, जिनकी संख्या बढ़कर आज कई करोड़ तक पहुँच चुकी है।

जनसंख्या-विस्फोट से सारा देश भयाक्रान्त है। जहाँ भी जाइए लोगों की अनन्त भीड़ दिखायी देती है। महानगरों में तो लोग मधुमक्खी के छत्तों की भाँति मँडराते नजर आते हैं। इससे प्रत्येक प्राणी पर मानसिक तनाव बढ़ता है। लोगों के लिए पैदल चलना तक कठिन हो गया है। इसके अतिरिक्त बेकार लोगों की भीड़ चोरी, उपद्रव, अपराध आदि में रुचि लेती है। अधिक जनसंख्या से देश का जीवन-स्तर कदापि नहीं उठ सकता; क्योंकि जीवन-स्तर का सीधा सम्बन्ध समृद्धि से है। जनसंख्या-वृद्धि से परिवार की सम्पन्नता में वृद्धि की जगह बिखराव आता है। इसलिए खाते-पीते परिवार भी गरीब होते चले जाते हैं। भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास की समस्या दिनोंदिन बढ़ती चली जा रही है जिससे देश का आर्थिक ढाँचा बुरी तरह चरमरा रहा है।

जनसंख्या-वृद्धि के कारण-जनसंख्या-विस्फोट का सबसे बड़ा कारण है जन्म-दर और मृत्यु-दर का सन्तुलन बिगड़ना। भारत की मृत्यु-दर निरन्तर कम होती जा रही है, जब कि जन्म-दर वहीं-की–वहीं है। मृत्यु-दर इसलिए कम हुई है, क्योंकि स्वास्थ्य-सेवाओं में पर्याप्त सुधार हुआ है। हैजा, टी० बी०, मलेरिया, चेचक आदि जानलेवा बीमारियों का शत-प्रतिशत उपचार हुँढ़ लिया गया है। वैज्ञानिक उन्नति के कारण बाढ़, सूखा, अकाल, प्राकृतिक प्रकोपों पर भी पर्याप्त नियन्त्रण कर लिया गया है, परन्तु । जन्म-दर को रोकने में उतनी अधिक सफलता नहीं मिली है।

जनसंख्या-वृद्धि रोकने के उपाय-जनसंख्या-वृद्धि को रोकने का सबसे कारगर उपाय यह है कि नर-नारी को सीमित परिवार की शिक्षा दी जाए। शहरों में यह कार्य लगभग पूरा हो चुका है। शहरी आबादी सीमित परिवार के प्रति सचेत है, परन्तु ग्रामीण आबादी अभी भी इस विषय में लापरवाह है। जब तक सामाजिक संस्थाएँ सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर सीमित परिवार की चेतना नहीं जगाएँगी, तब तक जनसंख्या की बाढ़ आती रहेगी। शहरों में भी अभी लोग पुत्र-मोह के कारण दो लड़कियों के पश्चात् तीसरी-चौथी सन्तान पैदा कर देते हैं। अभी कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अन्धविश्वास के कारण सन्तान को रोकने में बुराई मानते हैं। इसका उपचार लगातार शिक्षा देने से ही हो सकता है।

जहाँ तक सन्तान को रोकने के वैज्ञानिक साधनों का प्रश्न है, भारत में साधनों की कमी नहीं है। इन साधनों का निस्संकोच प्रयोग करने से जनसंख्या पर निश्चित रूप से नियन्त्रण किया जा सकता है।

उपसंहार : शिक्षा तथा प्रोत्साहन-जनसंख्या को सीमित करने के लिए औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ परिवार-नियोजन की शिक्षा भी दी जानी चाहिए। उन माता-पिताओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिन्होंने परिवार को सीमित किया है। सरकार ने अपनी ओर से ऐसे अनेक उपाय किये हैं, परन्तु आवश्यकता इस बात की है कि परिवार को सीमित बनाने सम्बन्धी कठोर कानून बनाये जाएँ तभी हर मिनट बढ़ता हुआ खतरा रुक सकता है। इस विषय में यदि कोई जाति, धर्म या सम्प्रदाय आड़े भी आता है तो उसकी परवाह नहीं करनी चाहिए। अब तो जनसंख्या-वृद्धि जीवन और मरण का प्रश्न बन चुका है। डॉ० चन्द्रशेखर ने सच ही कहा है-“हम एक रात की भी प्रतीक्षा नहीं कर सकते। परिवार-नियोजन के बिना हर रात एक भयावह स्वप्ने की तरह है।’

36. सत्संगति का महत्त्व [2016, 18]

सम्बद्ध शीर्षक

  • कबिरा संगत साधु की, हरे और व्याधि
  • कुसंग का ज्वर भयानक होता है।

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. संगति का प्रभाव,
  3. सत्संगति का अर्थ,
  4. सत्संगति से लाभ,
  5. कुसंगति से हानि,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना–“संसर्ग से ही मनुष्य में गुण-दोष आते हैं।” मनुष्य का जीवन अपने आस-पास के वातावरण से प्रभावित होता है। मूलरूप से मानव के विचारों और कार्यों को उसके संस्कार व वंश-परम्पराएँ ही दिशा दे सकती हैं। यदि उसे स्वच्छ वातावरण मिलता है तो वह कल्याण के मार्ग पर चलता है और यदि वह दूषित वातावरण में रहता है तो उसके कार्य भी उससे प्रभावित हो जाते हैं।

संगति का प्रभाव-मनुष्य जिस वातावरण एवं संगति में अपना अधिक समय व्यतीत करता है, उसका प्रभाव उस पर अनिवार्य रूप से पड़ता है। मनुष्य ही नहीं, वरन् पशुओं एवं वनस्पतियों पर भी इसका असर होता है। मांसाहारी पशु को यदि शाकाहारी प्राणी के साथ रखा जाए तो उसकी आदतों में स्वयं ही परिवर्तन हो जाएगा। यही नहीं, मनुष्य को भी यदि अधिक समय तक मानव से दूर पशु-संगति में रखा जाए। तो वह भी शनैः-शनै: मनुष्य-स्वभाव छोड़कर पशु-प्रवृत्ति को ही अपना लेगा।।

सत्संगति का अर्थ-सत्संगति का अर्थ है-‘अच्छी संगति’। वास्तव में ‘सत्संगति’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-‘सत्’ और ‘संगति’ अर्थात् ‘अच्छी संगति’। अच्छी संगति का अर्थ है-ऐसे सत्पुरुषों के साथ निवास, जिनके विचार अच्छी दिशा की ओर ले जाएँ।

सत्संगति से लाभ–सत्संगति के अनेक लाभ हैं। सत्संगति मनुष्य को सन्मार्ग की ओर अग्रसर करती है। सत्संगति व्यक्ति को उच्च सामाजिक स्तर प्रदान करती है, विकास के लिए सुमार्ग की ओर प्रेरित करती है, बड़ी-से-बड़ी कठिनाइयों का सफलतापूर्वक सामना करने की शक्ति प्रदान करती है और सबसे बढ़कर व्यक्ति को स्वाभिमान प्रदान करती है। सत्संगति के प्रभाव से पापी पुण्यात्मा और दुराचारी सदाचारी हो जाते हैं। ऋषियों की संगति के प्रभाव से ही, वाल्मीकि जैसे भयानक डाकू महान कवि बन गए तथा अंगुलिमाल ने महात्मा बुद्ध की संगति में आने से हत्या, लूटपाट के कार्य छोड़कर सदाचार के मार्ग को अपनाया। सन्तों के प्रभाव से आत्मा के मलिन भाव दूर हो जाते हैं तथा वह निर्मल बन जाती है।

सत्संगति एक प्राण वायु है, जिसके संसर्ग मात्र से मनुष्य सदाचरण का पालक बन जाता है; दयावान, विनम्र, परोपकारी एवं ज्ञानवान बन जाता है। इसलिए तुलसीदास ने लिखा है कि

सठ सुधरहिं सत्संगति पाई,
पारस परस कुधातु सुहाई।”

एक साधारण मनुष्य भी महापुरुषों, ज्ञानियों, विचारवानों एवं महात्माओं की संगत से बहुत ऊँचे स्तर को प्राप्त करता है। वानरों-भालुओं को कौन याद रखता है, लेकिन हनुमान, सुग्रीव, अंगदं, जाम्बवन्त आदि श्रीराम की संगति पाने के कारण अविस्मरणीय बन गए।

सत्संगति ज्ञान प्राप्त की भी सबसे बड़ी साधिका है। इसके बिना तो ज्ञान की कल्पना तक नहीं की जा सकती

‘बिनु सत्संग विवेक न होई।।

जो विद्यार्थी अच्छे संस्कार वाले छात्रों की संगति में रहते हैं, उनका चरित्र श्रेष्ठ होता है एवं उनके सभी कार्य उत्तम होते हैं। उनसे समाज एवं राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ती है।

कुसंगति से हानि–कुसंगति से लाभ की आशा करना व्यर्थ है। कुसंगति से पुरुष का विनाश निश्चित है। कुसंगति के प्रभाव के मनस्वी पुरुष भी अच्छे कार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं। कुसंगति में बँधे रहने के कारण वे चाहकर भी अच्छा कार्य नहीं कर पाते। कुसंगति के कारण ही दानवीर कर्ण अपना उचित सम्मान खो बैठा। जो छात्र कुसंगति में पड़ जाते हैं वे अनेक व्यसन सीख जाते हैं, जिनका प्रभाव उनके जीवन पर बहुत बुरा पड़ता है। उनके लिए प्रगति के मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। उनका मस्तिष्क अच्छे-बुरे का भेद करने में असमर्थ हो जाता है। उनमें अनुशासनहीनता आ जाती है। गलत दृष्टिकोण रखने के कारण ऐसे छात्र पतन के गर्त में गिर जाते हैं। वे देश के प्रति अपने उत्तरदायित्व भी भूल जाते हैं।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ठीक ही लिखा है-“कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है। किसी युवा पुरुष की संगति बुरी होगी तो वह उसके पैरों में बँधी चक्की के समान होगी, जो उसे दिन-पर-दिन अवनति के गड्डे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाहु के समान होगी, जो उसे निरन्तर उन्नति की ओर उठाती जाएगी।”

उपसंहार–सत्संगति का अद्वितीय महत्त्व हैं जो सचमुच हमारे जीवन को दिशी प्रदान करती है। सत्संगति का पारस है, जो जीवनरूपी लोहे को कंचन बना देती है। मानव-जीवन की सर्वांगीण उन्नति के लिए सत्संगति आवश्यक है। इसके माध्यम से हम अपने लाभ के साथ-साथ अपने देश के लिए भी एक उत्तरदायी तथा निष्ठावान नागरिक बन सकेंगे।