RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 15 आचार्योपदेशः अतिलघूत्तरात्मक – प्रश्नाः

प्रश्न 1.
रिक्तस्थानानि पूरयतु
उत्तरम्:
(i) श्रद्धया ……………..।
उत्तरम्:
श्रद्धया देयम्।

(ii) अश्रद्धया ……………..।
उत्तरम्:
अश्रद्धया अदेयम्।

(iii) आचार्यदेवो ……………..।
उत्तरम्:
आचार्यदेवो भव।

(iv) स्वाध्याय-प्रवचनाभ्यां ……………..।
उत्तरम्:
स्वाध्याय-प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्।

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 15 आचार्योपदेशः लघूत्तरात्मक – प्रश्नाः

प्रश्न 1.
श्रद्धया किं करणीयम्? (श्रद्धा से क्या करना चाहिए?)
उत्तरम्:
श्रद्धया देयम्। (श्रद्धा से दान करना चाहिए।)

प्रश्न 2.
धर्मात् किं न करणीयम्? (धर्म से क्या नहीं करना चाहिए?)
उत्तरम्:
धर्मात् न प्रमदितव्यम्। (धर्म से लापरवाही नहीं करनी चाहिए।)

प्रश्न 3.
कीदृशानि कर्माणि सेवितव्यानि? (कैसे कर्मों का ही सेवन करना चाहिए?)
उत्तरम्:
यानि अनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि। (जो अनिन्दनीय कर्म हैं उन्हीं का सेवन करना चाहिए।)

प्रश्न 4.
कानि त्वया उपास्यानि? (तुम्हें, कौन से (कर्म / आचरण) सेवन करने चाहिए?)
उत्तरम्:
यानि अस्माकं सुचरितानि तानि त्वया उपास्यानि।
(जो हमारे अच्छे आचरण हैं, उन्हीं की तुम्हें उपसना करनी चाहिए अर्थात् वे ही व्यवहार में लाये जाने चाहिए।)

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 15 आचार्योपदेशः निबन्धात्मक – प्रश्नाः

प्रश्न 1.
केषु केषु कार्येषु कदापि प्रमादः न करणीयः?
(किन-किन कार्यों में कभी लापरवाही नहीं करनी चाहिए?)
उत्तरम्:
सत्य-धर्म-स्वाध्याय-कुशल-भूति-प्रवचन-देवपितृकार्येभ्यः न प्रमदितव्यम्।
(सत्य, धर्म, स्वाध्याय, आत्मरक्षण, वैभव, प्रवचन (शिक्षण) देव-पितृ कार्यों में कभी लापरवाही नहीं करनी चाहिए।)

प्रश्न 2.
दानस्य विषये शिक्षाबल्यां यल्लिखितं तत् वर्यताम्।
(दान के विषय में शिक्षाबल्ली में जो लिखा है वह वर्णन कीजिए।)
उत्तरम्:
श्रद्धया देयम्, अश्रद्धया अदेयम्, श्रिया देयम्, ह्रियादेयम्, भियादेयम् संविदा च देयम्।
(श्रद्धा से देना चाहिए अश्रद्धा से नहीं देना चाहिए। इच्छा से देना चाहिए, लज्जा के साथ देना चाहिए, भय से भी देना चाहिए तथा मित्रादि के कार्य से भी देना चाहिए।)

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 15 आचार्योपदेशः व्याकरणात्मक – प्रश्नाः

प्रश्न 1.
अधोलिखित पदेषु धातु-लकार-पुरुष-वचनानां निर्देशं कुरुत-
(निम्न पदों में धातु, लकार, पुरुष तथा वचन बताइए-)
उत्तरम्:
RBSE Solutions for Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 15 1

प्रश्न 2.
निम्नलिखितेषु शब्द-लिङ्ग-विभक्ति-वचनानां निर्देशं कुरुत-
(निम्न में शब्द, लिंग, विभक्ति, वचन का निर्देश कीजिए-)
उत्तरम्:

प्रश्न 3.
अधोलिखितेषु प्रत्ययस्य निर्देशं कुरुत-
(निम्न में प्रत्यय का निर्देश कीजिए-)
उत्तरम्:

प्रश्न 4.
निम्नाङ्कितेषु उपसर्गस्य निर्देशं कुरुत-
(निम्न में उपसर्ग बताइए-)
उत्तरम्:

प्रश्न 5.
अधोलिखितपदानां एकवचनम् लिखत-
(निम्न पदों के एकवचन लिखिए-)
उत्तरम्:

प्रश्न 6.
क-खण्डं ख-खण्डेन सह योजयत-
(क भाग तथा ख भाग के साथ जोड़िये (मिलाइए)-)
उत्तरम्:

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 15 आचार्योपदेशः अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तराणि

अधोलिखित प्रश्नान् संस्कृत-भाषया पूर्णवाक्येन उत्तरत – (निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में पूर्ण वाक्य में दीजिए-)

प्रश्न 1.
वैदिक वाङ्मये किम् किं साहित्यं गण्यते?
(वैदिक वाङ्मय में क्या-क्या साहित्य गिना जाता है?)
उत्तरम्:
वैदिक साहित्ये चत्वारः वेदाः तेषां व्याख्या रूपा ब्राह्मणग्रन्थाः आरण्यकग्रन्था उपनिषदश्च गण्यन्ते।
(वैदिक वाङमय में चार वेद और उनके व्याख्यारूप ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक ग्रन्थ और उपनिषदें गिनी जाती हैं।)

प्रश्न 2.
वेदाः कति सन्ति?
(वेद कितने हैं?)
उत्तरम्:
वेदाः चत्वारः भवन्ति।
(वेद चार होते हैं।)

प्रश्न 3.
उपनिषद् कति परिगण्यन्ते?
(उपनिषदों की कितनी गिनती की गई है?)
उत्तरम्:
उपनिषदः 108 परिगण्यन्ते।
(उपनिषदें 108 गिनी गई हैं।)

प्रश्न 4.
प्रमुखाः उपनिषद्ः कति पाठ्यन्ते पठ्यन्ते च?
(प्रमुख उपनिषदें कितनी पढ़ाई और पढ़ी जाती हैं?)
उत्तरम्:
प्रमुखा: उपनिषदः दश एव सन्ति ये पाठ्यन्ते पठ्यन्ते च।
(प्रमुख उपनिषदें दस हैं जो पढ़ाई और पढ़ी जाती हैं।)

प्रश्न 5.
‘आचार्योपदेशः’ पाठः कस्मात् ग्रन्थात् संकलितः?
(‘आचार्योपदेशः’ पाठ किस ग्रन्थ से संकलित है?)
उत्तरम्:
आचार्योपदेशः पाठः तैत्तिरीय उपनिषद् शिक्षाबल्लीत: संकलितः।
(‘आचार्योपदेशः’ पाठ तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षाबल्ली से संकलित है।)

प्रश्न 6.
किं वदेत्?
(क्या बोलना चाहिए?)
उत्तरम्:
सत्यमेव वदेत्।
(सत्य ही बोलना चाहिए।)

प्रश्न 7.
केभ्यः न प्रमदितव्यम्?
(किनसे प्रमाद नहीं करना चाहिए?)
उत्तरम्:
स्वाध्याय-सत्य-धर्म-कुशल-भूति, प्रवचन देव-पितृ कार्येभ्यः न प्रमदितव्यम्।
(स्वाध्याय, सत्य, धर्म, कुशल, वैभव, प्रवचन देव-पितृकार्यों में लापरवाही नहीं करनी चाहिए।)

प्रश्न 8.
के देवतुल्याः भवन्तु?
(कौन देवतुल्य हैं?)
उत्तरम्:
मातृ-पितृ आचार्य-अतिथयश्च देवतुल्या भवन्तु।
(माता-पिता आचार्य और अतिथि देवतुल्य हों।)

प्रश्न 9.
कानि कर्माणि न करणीयानि?
(क्या कार्य नहीं करने चाहिये?)
उत्तरम्:
निन्दनीयानि कार्याणि न करणीयानि।
(निन्दनीय कार्य नहीं करने चाहिए।)

प्रश्न 10.
कीदृशानि चरितानि न उपास्यानि?
(कैसे आचरण हमें नहीं करने चाहिये?)
उत्तरम्:
यानि सुचरितानि न तानि अस्माभिः नोपास्यानि।
(जो अच्छे आचरण नहीं हैं। वे हमें नहीं करने चाहिए।)

प्रश्न 11.
कथं देयं न देयं च?
(कैसे देना और कैसे नहीं देना चाहिए?)
उत्तरम्:
श्रद्धया, श्रिया, हिया, भिया, संविदा च देयं परञ्च अश्रद्धया न देयम्।
(श्रद्धा, इच्छा, लज्जा, भय, संवत् से देना चाहिए अश्रद्धा से नहीं देना चहिए।)

स्थूलाक्षरपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत – (मोटे अक्षर वाले पदों के आधार पर प्रश्न बनाइए-)

प्रश्न 1.
एवम् उपासितव्यम्। (ऐसे उपासना करनी चाहिए।)
उत्तरम्:
कथं उपासितव्यम्? (कैसे उपासना करनी चाहिए?)

प्रश्न 2.
एतद् अनुशासनम्। (यह अनुशासन है।)
उत्तरम्:
किम् अनुशासनम्? (अनुशासन क्या है?)

प्रश्न 3.
एषा उपनिषद्। (यह उपनिषद् है।)
उत्तरम्:
काः उपनिषद्? (उपनिषद् क्या है?)

प्रश्न 4.
अश्रद्धया देयम्। (अश्रद्धा से नहीं देना चाहिए।)
उत्तरम्:
केन न, अदेयम्? (किससे नहीं देना चाहिए?)

प्रश्न 5.
सुचरितानि उपास्यानि। (अच्छे आचरण की उपासना करनी चाहिए।)
उत्तरम्:
कानि उपास्यानि? (किनकी उपासना करनी चाहिए?)

प्रश्न 6.
अनवद्यानि कर्माणि सेवितव्यानि। (अनिन्दनीय कर्म करने चाहिए।)
उत्तरम्:
कीदृशानि कर्माणि सेवितव्यानि? (कैसे कर्म करने चाहिए?)

प्रश्न 7.
देवपितृ कार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्। (देव और पितृकार्यों में प्रमाद नहीं करना चहिए।)
उत्तरम्:
काभ्याम् न प्रमदितव्यम्? (किनसे लापरवाही नहीं करनी चाहिए?)

प्रश्न 8.
कुशलात् न प्रमदितव्यम्। (आत्मरक्षण में लापरवाही नहीं करनी चाहिए।)
उत्तरम्:
कुशलात् किं न कर्तव्यम्? (आत्मरक्षा में क्या नहीं करना चाहिए?)

प्रश्न 9.
‘आचार्योऽन्तेवासिन’ मनुशास्ति। (आचार्य शिष्य को उपदेश देता है।)
उत्तरम्:
आचार्यः कम् अनुशास्ति? (आचार्य किसको उपदेश देता है?)

प्रश्न 10.
विश्वसाहित्ये वैदिकसाहित्यस्य महत्वपूर्ण स्थानमस्ति। (विश्व साहित्य में वैदिक साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान है।)
उत्तरम्:
विश्वसाहित्ये कस्य महत्वपूर्ण स्थानमस्ति? (विश्व साहित्य में किसका महत्वपूर्ण स्थान है?)

पठ-परिचयः

विश्व-वाङ्मय में वैदिक साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान है। वैदिक साहित्य में चार वेद, उनके व्याख्या रूप ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक ग्रन्थ और उपनिषद हैं। वहाँ 108 उपनिषदों की गणना है। परन्तु प्रमुख दस उपनिषदों का पठन-पाठन सब-जगह ही होता है। ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और वृहदारण्यक ये दस उपनिषद हैं।

प्रस्तुत पाठ तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षाबल्ली से उद्धृत है। विद्या समाप्ति के पश्चात् छात्र के समावर्तन (दीक्षान्त) संस्कार के अवसर पर आचार्य शिष्य को उपदेश देता है। उसी का वर्णन शिक्षाबल्ली है। इस पाठ में उसी के सारांश का उल्लेख है।

मूलपाठ, शब्दार्थ, हिन्दी-अनुवाद

1. वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति। सत्यं वद! धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। ६ र्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्याय-प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्। देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्। मातृदेवो भव! पितृदेवो भव! आचार्यदेवो भव! अतिथिदेवो भव! यानि अनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि। यानि अस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि। श्रद्धया देयम्। अश्रद्ध्यादेयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्। एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्। एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्।

शब्दार्था:-वेदम् = ज्ञानराशिम् (वेद)। अनूच्य = अध्याप्य, अध्यापनं कृत्वा (अनु+व+ल्यप्) (उपदेश देकर))। आचार्यः = गुरु। अन्तेवासिनम् = शिष्यम् (गुरु के पास रहकर अध्ययन करने वाले)। अनुशास्ति = उपदिशति (उपदेश देता है)। वद = बोल। चर = आचरणं कुरु (आचरण करो)। मा = न (नहीं)। प्रमदः = प्रमादं कुरु (लापरवाही)। प्रमदितव्यम् = प्रमादं क़रणीयम् (लापरवाही नहीं करनी चाहिए)। धर्मात् = धर्म में। आत्मरक्षणकर्मणः = आत्मरक्षा के विषय में। भूत्यैः = ऐश्वर्यकर्मणः, (वैभव के लिए) स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् = नियमेन स्वाध्याय: प्रवचनं च अवश्यमेव करणीयम्, (स्वयं अध्ययन करने तथा उपदेश देने में लापरवाही न करें)। मातृदेवः, पितृदेवः आचार्यदेवः भव = मात्रादयः देवाः यस्य स त्वं भव अर्थात् एते देवतावत्त्वया उपास्याः (मातृ देव, पितृ देव, आचार्य देव की तरह उपास्य हैं)। अनवद्यानि = अनिन्दनीयानि अथवा प्रशंसनीयानि कर्माणि, वदितुं योग्यं वद्यं, न वद्यम् अवद्यम्, न अवद्यम् इति अनवद्यम्, तानि (अनिन्दनीय अथवा प्रशंसनीय कार्य ही करने चाहिए।)। सेवितव्यानि = सेवनं करणीयम् सेवन करना)। सुचारितानि = सुकर्माणि (अच्छे कर्म)। इतराणि = अन्यानि (अन्य)। श्रद्धया = श्रद्धापूर्वक। देयम् = दातव्यम् (देना चाहिए)। अदेयम् = दापि न दातव्यम् (नहीं देना चाहिए)। ह्रिया = मत्तुल्य मदवराश्च अपि दास्यन्ति इति लज्जया वा देयम् (लज्जा के साथ) भिया = पारलौकिक-भयेन वा देयम् (पारलौकिक भय से देना चाहिए)। संविदा = संवित् मित्रादिकार्यम् तया वा देयम् (मित्रादि के सहयोग के लिए देना चाहिए)। आदेशः = विधिः (हक)। एष उपदेशः = पित्रादीनां पुत्रादिभ्यः एष एव उपदेशः (यह उपदेश)। एषा वेदोपनिषद् = एतस्य वेदरहस्यार्थत्वात् (वेदों और उपनिषदों का सार है)। अनुशासनम् = ईश्वरवचनम् एतत् सर्वप्रमाणानां अनुशासनम् (ईश्वर का वचन यह सब प्रमाणों का अनुशासन है)।

हिन्दी-अनुवाद-ज्ञानराशि वेद का अध्यापन सम्पन्न होने के पश्चात् आचार्य के पास में रहकर अध्ययन करने वाले शिष्य को उपदेश देता है-सत्य बोल! धर्म (कर्तव्य) का आचरण कर। नियमित अध्ययन में कभी लापरवाही मत कर। सत्य बोलने में लापरवाही नहीं करनी चाहिए। धर्म के कार्य में लापरवाही नहीं करनी चाहिए। आत्मरक्षा के काम में लापरवाह नहीं होना। चाहिए। ऐश्वर्य के कार्यों में लापरवाही नहीं करनी चाहिए। स्वाध्याय और प्रवचन (शिक्षा देने में) लापरवाही नहीं करनी चाहिए। देवपितृ (यज्ञ या ऋण) के विषय में लापरवाही नहीं करनी चाहिए। माता का देवता के तुल्य सम्मान करो। पिता का देवतुल्य सम्मान करो।

आचार्य को देवता मानो तथा अतिथि तुम्हारे लिए देवता के समान हो। जो अनिन्दनीय कर्म हैं वे ही करने चाहिए, इनसे भिन्न अर्थात् निन्दनीय कर्म नहीं करने चाहिए। जो हमारे लिए अच्छे कर्म हैं उन्हीं को करना चाहिए। उन्हीं की उपासना करनी चाहिए, इनसे भिन्न अर्थात् दुष्कर्म नहीं करने चाहिए। श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिए, अश्रद्धा से नहीं देना चाहिए। इच्छा से देना चाहिए। (दूसरे दाताओं को देखकर) लज्जा से देना चाहिए। पारलौकिक भय से डरकर भी देना चाहिए। मित्रादि कार्य से देना चाहिए। यही वेद का आदेश है। यही पिता आदि बड़ों का उपदेश है। यही वेदों का सार है, यही अनुशासन है। इसी की उपासना करनी चाहिए।

व्याकरणिक-बिन्दवः-वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति = वेदम्+अन्नुच्य+आचार्य:+अन्तेवासिनम्+अनुशास्ति (क्रमशः निर्विकार, दीर्घ, विसर्ग पूर्वरूप तथा निर्विकल्पसन्धि) सत्यान्नः = देवानाम् च पितृणाम् च कार्य।