Chapter 2 संघे शक्तिः

वस्तुनिष्ठ – प्रश्नाः

1. वायसः कीदृशं व्याधम् आयान्तम् अपश्यत्
(अ) कृतान्तमिव द्वितीयम्
(आ) मितभाषिणम्
(इ) अनिष्टदर्शनम्
(ई) अनभिमतम्

2. ‘कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः’ इति कः उक्तवान्
(अ) लघुपतनकः
(आ) चित्रग्रीवः
(इ) व्याधः
(ई) हिरण्यकः

3. विपत्काले कापुरुषस्य लक्षणमस्ति
(अ) विस्मयः
(आ) धैर्यम्
(इ) उत्साहः
(ई) प्रतीकारः

4. अल्पानामपि वस्तूनां कार्यसाधिका अस्ति
(अ) संहतिः
(आ) उपयोगः
(इ) अभावः
(ई) समभावः

उत्तराणि:

1. (अ)
2. (आ)
3. (अ)
4. (अ)

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 2 संघे शक्तिः अतिलघूत्तरात्मक – प्रश्नाः

प्रश्न 1.
वायसस्य नाम किम्? (कौवे का क्या नाम था ?)
उत्तरम्:
लघुपतनकः। (लघुपतनक)

प्रश्न 2.
वायसः कम् आयान्तम् अपश्यत्? (कौवे ने किसको आते हुए देखा ?)
उत्तरम्:
व्याधम् (वधिक को)।

प्रश्न 3.
कः कपोतराजः? (कपोतराज कौन है?)
उत्तरम्:
चित्रग्रीवः। (चित्रग्रीव)

प्रश्न 4.
कीदृशैः तृणैः मत्तदन्तिनः बध्यन्ते? (कैसे तिनकों से मतवाले हाथी बाँधे जाते हैं।)
उत्तरम्:
गुणत्वमापन्नैः (बल दिए हुए)।

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 2 संघे शक्तिः निबन्धात्मक – प्रश्नाः

प्रश्न 1.
कथायां वर्णित व्याधकृत्यं स्वशब्देषु लिखत।
(कथा में वर्णित व्याध द्वारा किए को अपने शब्दों में लिखिए।)
उत्तरम्:
सः व्याधः तत्र तण्डुलकणान् विकीर्णवान् जालं च प्रसारितवान्। स प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः।
(उस वधिक ने वहाँ चावल के कण बिखेर दिए और जाल को फैला दिया। वह छिपकर बैठ गया।)

प्रश्न 2.
चित्रग्रीवः कपोतान् किम् अवबोधयत्?
(चित्रग्रीव ने कबूतरों को क्या समझाया?)
उत्तरम्:
कपोता:! कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भव:? तन्निरूप्यतां तावत् भद्रमिदं न पश्यामि।
(कबूतरो! यहाँ निर्जन वन में चावलों की सम्भावना कहाँ से। अतः विचार कीजिए। मुझे इसमें कल्याण दिखाई नहीं पड़ता।)

प्रश्न 3.
कपोताः कथं सिद्धिं प्राप्तवन्तः?
(कबूतरों ने कैसे सिद्धि प्राप्त की)?
उत्तरम्:
चित्रग्रीवस्य वचनं श्रुत्वा सर्वे एकचित्तीभूय खगाः जालमादाय उत्पतिताः एवं ते सिद्धि प्राप्तवन्तः।
(चित्रग्रीव के वचन सुनकर सभी कबूतर एकमत होकर जाल को लेकर उड़ गये। इस प्रकार उन्होंने सफलता प्राप्त की।)

प्रश्न 4.
चित्रग्रीवम् अवहेलयन् कपोतः सदर्यं किम् उक्तवान्?
(चित्रग्रीव की उपेक्षा करके कबूतर ने दर्प के साथ क्या कहा ?)
उत्तरम्:
कपोत: सदर्पमाह-ई, घृणी, असन्तुष्टः क्रोधिनः, नित्यशङ्कितेः, परभाग्योपजीवी च एते षड् दु:ख-भागिनः भवन्ति।
(कबूतर गर्व के साथ बोला-ईर्ष्यालु, घृणा करने वाला, असन्तुष्ट, क्रोधी, सशंकित, पराश्रित ये छः व्यक्ति सदैव दु:ख के भागीदार होते हैं।)

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 2 संघे शक्तिः व्याकरण – प्रश्नाः

प्रश्न 1.
अधोलिखितेषु धातु-लकार-पुरुष-वचनानां निर्देशं कुरुत-
(निम्नलिखित में धातु, लकार, पुरुष और वचनों का निर्देश कीजिए-)
उत्तरम्:
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 2 1

प्रश्न 2.
अधोलिखितेषु पदेषु शब्द-विभक्ति-वचनानां निर्देशं कुरुत-
(निम्नलिखित पदों में शब्द, विभक्ति, वचनों का निर्देश कीजिए-)
उत्तरम्:
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 2 2

प्रश्न 3.
निम्नलिखितेषु शब्देषु सन्धि-नाम निर्देशसहितं सन्धि-विच्छेदं प्रदर्शयत-
(निम्नलिखित पदों में सन्धि के नाम का निर्देश करते हुए सन्धि-विच्छेद कीजिये-)
उत्तरम्:
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 2 3

प्रश्न 4.
अधस्तनेषु पदेषु नामनिर्देशसहितं समासविग्रहो विधेयः-
(निम्न पदों में नाम बताते हुए समास विग्रह कीजिये-)
उत्तरम्:
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 2 4
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 2 5

प्रश्न 5.
निम्नलिखितेषु शब्देषु प्रकृतिः प्रत्ययश्च विवेच्यताम्-
(निम्नलिखित शब्दों में प्रकृति, प्रत्यय का निर्देश कीजिए-) उदाहरण-
उत्तरम्:
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 2 6

प्रश्न 6.
निम्नलिखितपदानां प्रयोगं स्ववाक्येषु कुरुत-
(निम्नलिखित पदों का प्रयोग अपने वाक्यों में कीजिए-) उदाहरण-
उत्तरम्:
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 2 7

प्रश्न 7.
सम्यक् विभक्तिं संयोज्य कोष्ठकगतेन पदेन रिक्तस्थानं पूरयत-
(उचित विभक्ति जोड़कर कोष्ठक में दिए पद से रिक्तस्थान की पूर्ति कीजिए-)
उदाहरण:
शाल्मलीतरौ पक्षिणः निवसन्ति स्म। (पक्षी)
उत्तरम्:
(अ) अवसन्नायां रात्रौ वायसः प्रबुद्धः। (रात्रि:)
(आ) तेन व्याधेन जालं विस्तीर्णम्। (व्याधः)
(इ) कपोतराजः तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान् अकथयत्। (कपोत:)
(ई) सर्वे कपोताः तत्रोपविष्टाः। (सर्व)
(उ) अल्पानामपि वस्तूनाम् संहतिः कार्यसाधिका। (वस्तु)
(ऊ) सः व्याधः जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चाद्-धावान् अकरोत्। (तद्)

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 2 संघे शक्तिः अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोनराणि

अधोलिखितान् प्रश्नान् संस्कृत भाषया पूर्णवाक्येन उत्तरत – (नीचे लिखे हुए प्रश्नों के संस्कृत भाषा में पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए-)

प्रश्न 1.
‘संघे शक्तिः’ इति पाठः कस्मात् ग्रन्थात् गृहीतः?
(‘संघे शक्ति:’ पाठ किस ग्रन्थ से लिया गया है?)
उत्तरम्:
‘संघे शक्तिः’ इति पाठः हितोपदेशः इति कथाग्रन्थात् गृहीतः।
(‘संघे-शक्तिः’ पाठ हितोपदेश कथा ग्रन्थ से लिया गया है।)

प्रश्न 2.
हितोपदेशः कथा ग्रन्थः केन रचितः?
(हितोपदेश कथाग्रन्थ किसने रचा?)
उत्तरम्:
हितोपदेशः इति कथा ग्रन्थः नारायण पण्डितेन रचितः।
(हितोपदेश कथाग्रन्थ नारायण पंडित ने लिखा है।)

प्रश्न 3.
हितोपदेशे कति परिच्छेदाः सन्ति?
(हितोपदेश में कितने परिच्छेद हैं?)
उत्तरम्:
हितोपदेशे चत्वारः परिच्छेदाः सन्ति।
(हितोपदेश में चार परिच्छेद हैं।)

प्रश्न 4.
हितोपदेशस्य चतुर्णा परिच्छेदानां नामानि लिखत।
(हितोपदेश के चार परिच्छेदों के नाम लिखिए-)
उत्तरम्:
हितोपदेशस्य चत्वारः परिच्छेदाः सन्ति-

  1. मित्रलाभ:
  2. सुहृद्भेदः
  3. विग्रहः
  4. सन्धिः

(हितोपदेश के चार परिच्छेद हैं-मित्रलाभ, सुहृद्भेद, विग्रह और सन्धि।)

प्रश्न 5.
विशालः शाल्मली वृक्षः कुत्र आसीत्?
(विशाल सेमल का पेड़ कहाँ था?)
उत्तरम्:
विशाल: शाल्मली वृक्षः गोदावरी नद्याः तीरे आसीत्।
(विशाल सेमल का पेड़ गोदावरी नदी के किनारे पर था।)

प्रश्न 6.
शाल्मली वृक्षे पक्षिणः कुतः आयान्ति स्म?
(सेमल के पेड़ पर पक्षी कहाँ से आया करते थे?)
उत्तरम्:
शाल्मली वृक्षे पक्षिण: नानादिग्देशात् आयान्ति स्म।
(सेमल के पेड़ पर पक्षी अनेक दिशा और देशों से आया करते थे।)

प्रश्न 7.
लघुपतनकः कः आसीत्?
(लघुपतनक कौन था?)
उत्तरम्:
लघुपतनकः एकः काकः आसीत्।
(लघुपतनक एक कौआ था।)

प्रश्न 8.
लघुपतनकः कदा प्रबुद्धः?
(लघुपतनक कब जागा?)
उत्तरम्:
अवसन्नायां रात्रौ अस्ताचलचूड़ावलम्बिनि भगवति कुमुदिनीनायके चन्द्रमसि लघुपतनकः वायसः प्रबुद्धः।
(रात्रि के समाप्त होने पर जब कुमुदिनी नायक भगवान चन्द्रमा अस्त हो रहे थे तब लघुपतनक कौआ जागा।)

प्रश्न 9.
प्रबुद्धः वायसः कीदृशं व्याधम् अपश्यत्?
(जागे हुए कौवे ने कैसे बधिक को देखा?)
उत्तरम्:
प्रबुद्धः वायसः कृतान्तमिव द्वितीयं व्याधम् अपश्यत्।
(जागे हुए कौवे ने यमराज के समान दूसरे बधिक को देखा।)

प्रश्न 10.
सर्वप्रथमम् आयान्तं व्याधं कोऽपश्यत्?
(सबसे पहले आते हुए बंधिक को किसने देखा?)
उत्तरम्:
सर्वप्रथमं आयान्तं व्याधं वायसोऽपश्यत्।
(सबसे पहले आते हुए व्याध को कौवे ने देखा।)

प्रश्न 11.
व्याधमवलोक्य वायसः किमचिन्तयत्?
(व्याध को देखकर कौवे ने क्या सोचा?)
उत्तरम्:
व्याधमवलोक्य वायसोऽचिन्तयत् अद्यप्रातरेव अनिष्टदर्शनं जातम्, न किम् अनभिमतं दर्शयिष्यति ?
(बधिक को देखकर कौवे ने सोचा कि आज प्रातः से ही अनिष्ट दर्शन हुए हैं ने क्या अनहोनी दिखायेगी।)

प्रश्न 12.
व्याधमवलोक्य चिन्तितो वायसः किमकरोत्?
(बधिक को देखकर चिन्तित कौवे ने क्या किया?)
उत्तरम्:
व्याधमवलोक्य चिन्तितो वायसः तदनुसरक्रमेण व्याकुलश्चलितः।
(बधिक को देखकर चिन्तित कौआ उसके पीछे चिन्तित होकर चल दिया।)

प्रश्न 13.
व्याधः तत्रागत्य किं किम् अकरोत्?
(बधिक ने वहाँ आकर क्या-क्या किया?)
उत्तरम्:
व्याधस्तत्रागत्य तण्डुलकणान् विकीर्य जालं प्रसारयत्।
(बधिक ने वहाँ आकर चावल के दानों को बिखेरकर जाल को फैला दियो।)

प्रश्न 14.
व्याधः जाल विस्तीर्य किमकरोत्?
(व्याध ने जाल बिछाकर क्या किया?)
उत्तरम्:
व्याधो जालं विस्तीर्य प्रच्छन्नो सन् स्थित:।
(बधिक जाल बिछाकर छिपकर खड़ा हो गया।)

प्रश्न 15.
व्याधे तण्डुलकणान् विकीर्णे सति आकाशे कः आगच्छत्?
(व्याध जब चावल कणों को बिखेर रहा था तब आकाश में कौन आया?)
उत्तरम्:
व्याधे तण्डुलकणान् विकीर्णे सति आकाशे सपरिवारः कपोतराजश्चित्रग्रीवः आगच्छत्।
(बधिक जब चावल के दाने बिखेर रहा था तब आकाश में सपरिवार कपोतराज चित्रग्रीव आया।)

प्रश्न 16.
कपोतराजः तण्डुललुब्धान् कपोतान् किम् अकथयत् ?
(कपोतराज ने चावलों के लोभी कबूतरों से क्या कहा?)
उत्तरम्:
सोऽकथयत्-“कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः? तन्निरूप्यताम् तावत्। भद्रमिदं न पश्यामि।
(वह बोला यहाँ निर्जन वन में चावल के कणों की सम्भावना कहाँ? इस पर विचार करो। मुझे इसमें कल्याण नजर नहीं आता।)

प्रश्न 17.
कपोतस्य तिरस्कारं श्रुत्वा चित्रग्रीवः किम् अकथयत्?
(कबूतर के तिरस्कार को सुनकर चित्रग्रीव ने क्या कहा?)
उत्तरम्:
चित्रग्रीवोऽवदत्-“नायमस्यदोषः। विपत्काले विस्मय एव कापुरुषलक्षणम् तदत्र धैर्यमवलम्ब्य प्रतीकारश्चिन्त्यताम्।”
(चित्रग्रीव बोला-यह इसका दोष नहीं है। विपत्ति के समय आश्चर्य ही कायर का लक्षण होता है। इसलिए यहाँ धैर्य का सहारा लेकर समाधान सोचिए।)

प्रश्न 18.
जालबद्धान् कपोतान् अवलोक्य तान् चित्रग्रीवः किं शिक्षितवान्?
(जाल में बँधे कबूतरों को देखकर चित्रग्रीव ने उनको क्या शिक्षा दी?)
उत्तरम्:
जालबद्धान् कपोतान् अवलोक्य चित्रग्रीवोऽवदत्-“सर्वैरेकचित्तीभूय जालमादायोड्डीयताम्।”
(जाल में बँधे कबूतरों को देखकर चित्रग्रीव बोला-सभी एकमत होकर जाल को लेकर उड़ जाओ।)

प्रश्न 19.
चित्रग्रीवस्य परामर्श श्रुत्वा कपोताः किमकुर्वन्?
(चित्रग्रीव के परामर्श को सुनकर कबूतरों ने क्या किया?)
उत्तरम्:
चित्रग्रीवस्य परामर्श श्रुत्वा सर्वे पक्षिणः जालमादायोत्पतिताः।
(चित्रग्रीव के परामर्श को सुनकर सभी पक्षी जाल को लेकर उड़ गये।)

प्रश्न 20.
जालमपहारकान् कपोतान् अवलोक्य कः तान् अन्वधावत्?
(जाल का अपहरण करने वाले कबूतरों को देखकर कौन उनके पीछे दौड़ा?)
उत्तरम्:
जालमपहारकान् कपोतान् अवलोक्य व्याधः तान् अन्वधावत्।
(जाल का अपहरण करने वाले कबूतरों को देखकर बधिक उनके पीछे दौड़ा।)

प्रश्नं 21.
व्याधः कपोतान् अनुधावनात् कदा निवृतः?
(बधिक कबूतरों के पीछे दौड़ने से कब लौटा?)
उत्तरम्:
कपोतेषु अदृश्येषु व्याधो निवृतः।
(कबूतरों के अदृश्य हो जाने पर बधिक लौट आया।)

प्रश्न 22.
का कार्यसाधिका?
(कार्यसाधिका क्या है?)
उत्तरम्:
संहतिः कार्यसाधिका।
(एकता कार्यसाधिका होती है।)

प्रश्न 23.
शक्तिः कुत्र विद्यते?
(शक्ति कहाँ होती है?)
उत्तरम्:
संघे शक्तिः विद्यते।
(संघ में शक्ति होती है।)

प्रश्न 24.
कीदृशैः तृणैः मत्तदन्तिनः बध्यन्ते?
(कैसे तिनकों से मतवाले हाथी बाँधे जाते हैं?)
उत्तरम्:
गुणत्वमापन्नैः तृणैः मत्तदन्तिनः बध्यन्ते।
(गुणयुक्त तिनकों से मतवाले हाथी बाँधे जाते हैं।)

प्रश्न 25.
मनुष्याणां संहतिः अत्र कैः सह उपमिता?
(मनुष्य की संहति को किसकी उपमा दी गई है?)
उत्तरम्:
मनुष्याणां संहतिः अत्र अल्पवस्तुभिः तृणैः सह उपमिता।
(मनुष्यों की एकता को अल्प वस्तुओं और घास से उपमा दी गई है।)

स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्न-निर्माणं कुरुत – (मोटे पदों के आधार पर प्रश्नों का निर्माण कीजिये।)

प्रश्न 1.
गुणत्वमापन्नैः तृणैः मत्तदन्तिनः बध्यन्ते।
(गुणत्व को प्राप्त तिनकों से मतवाले हाथी बाँधे जाते हैं।)
उत्तरम्:
कीदृशैः तृणैः मत्तदन्तिन: बध्यन्ते?
(कैसे तिनकों से मतवाले हाथी बाँधे जाते हैं?)

प्रश्न 2.
अल्पानां वस्तूनाम् अपि संहतिः कार्यसाधिका।
(छोटी वस्तुओं की संहति भी कार्यसाधक होती है।)
उत्तरम्:
केषां संहतिः कार्यसाधिका?
(किनकी संहति कार्य को साधने वाली होती है?)

प्रश्न 3.
संहतिः कार्यसाधिका भवति।
(संहति कार्यसाधिका होती है।)
उत्तरम्:
का कार्यसाधिका?
(कार्य को साधने वाली क्या होती है?)

प्रश्न 4.
चक्षुर्विषयाक्रान्तेषु पक्षिषु व्याध: निवृतः।
(पक्षियों के आँखों से ओझल होने पर बधिक लौट आया।)
उत्तरम्:
व्याधः कदा निवृत:?
(व्याध कब्र लौट आया?)

प्रश्न 5.
व्याधः कपोतान् अवलोक्य पश्चाद् धावनम् अकरोत्।
(बधिक कबूतरों को देखकर पीछे दौड़ा।)
उत्तरम्:
व्याधः कान् अवलोक्य पश्चाद् धावनम् अकरोत्?
(बधिक किन्हें देखकर पीछे दौड़ा?)

प्रश्न 6.
पक्षिणः जाल मादायोत्पतिताः।
(पक्षी जाल को लेकर उड़ गये।)
उत्तरम्:
पक्षिणः किम् आदायोत्पतिताः।
(पक्षी क्या लेकर उड़ गये?)

प्रश्न 7.
सर्वे एकचित्तीभूयः जालमादाय उड्डयन्।
(सभी एक चित्त होकर जाल को लेकर उड़ गये।)
उत्तरम्:
सर्वे कथं जालम् आदाय उड्डयन्?
(सभी कैसे जाल को लेकर उड़ गये?)

प्रश्न 8.
सर्वे एकचित्तीभूयः जालमादाय उड्डयन्।
(सभी एकमत होकर जाल को लेकर उड़ गये।)
उत्तरम्:
सर्वे एकचित्तीभूयः किम् अकुर्वन्?
(सभी ने एकमत होकर क्या किया?)

प्रश्न 9.
विपत्काले धैर्यम् अवलम्ब्य प्रतीकारश्चिन्त्यताम्।
(विपत्ति में धैर्य का सहारा लेकर उपाय सोचना चाहिए।)
उत्तरम्:
विपत्काले किम् अवलम्ब्य प्रतीकारः चिन्त्यताम्?
(विपत्ति में किसका सहारा लेकर उपाय सोचना चाहिए?)

प्रश्न 10.
विपत्काले विस्मय एव कापुरुषस्य लक्षणम्।
(विपत्तिकाल में आश्चर्य ही कायर पुरुष का लक्षण है।)
उत्तरम्:
विपत्काले विस्मय एव कस्य लक्षणम्?
(विपत्तिकाल में आश्चर्य ही किसका लक्षण है?)

प्रश्न 11.
सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम्।
(सब प्रकार से बिना विचार किए काम नहीं करना चाहिए।)
उत्तरम्:
सर्वथा कीदृशं कर्म न कर्त्तव्यम्?
(सब प्रकार से कैसा कर्म नहीं करना चाहिए?)

प्रश्न 12.
चित्रग्रीवस्य अवज्ञाम् कृत्वा कपोता: जालबद्धाः सजाताः।
(चित्रग्रीव की अवज्ञा करके कबूतर जाल में बँध गये।)
उत्तरम्:
कस्य अवज्ञाम् कृत्वा कपोता: जालबद्धाः सञ्जाताः?
(किसकी अवज्ञा करके कबूतर जाल में बँध गये?)

प्रश्न 13.
अद्य प्रातरेव अनिष्टदर्शनं जातम्।
(आज प्रातः ही अनिष्ट दर्शन हो गया।)
उत्तरम्:
अद्य प्रातरेव कीदृशं दर्शनं जातम्?
(आज प्रातः ही कैसा दर्शन हुआ?)

प्रश्न 14.
स प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः।
(वह छिपकर खड़ा हो गया।)
उत्तरम्:
सेः कथं स्थितः?
(वह कैसे खड़ा हो गया?)

प्रश्न 15.
चित्रग्रीवः तण्डुलकणान् अपश्यत्।
(चित्रग्रीव ने चावल के दानों को देखा।)
उत्तरम्:
चित्रग्रीवः कान् अपश्यत्?
(चित्रग्रीव ने किनको देखा?)

प्रश्न 16.
कपोतराजः तण्डुललुब्धान् कपोतान् प्रति आह।
(कपोतराज ने चावलों के लोभी कबूतरों से कहा।)
उत्तरम्:
कपोतराजः कीदृशान् कपोतान् प्रति आह?
(कपोतराज ने कैसे कबूतरों से कहा?)

प्रश्न 17.
कश्चित् कपोतः सगर्वम् आह।
(कोई कबूतर गर्व से बोला।)
उत्तरम्:
क: सगर्वम् आह?
(किसने गर्व से कहा?)

प्रश्न 18.
षडेते दु:ख-भागिनः।
(ये छः दु:ख के भागीदार हैं।)
उत्तरम्:
कति एते दु:ख-भागिनः?
(ये कितने दु:ख के भागीदार हैं?)

प्रश्न 19.
कपोतराजस्य शङ्काम् अनादृत्य सर्वे कपोतास्तत्रोपविष्टाः।
(कपोतराज की शंका का अनादर करके सभी कबूतर वहाँ बैठ गये।)
उत्तरम्:
कस्य शङ्काम् अनादृत्य सर्वे कपोता: तत्रोपविष्टा:?
(किसकी शङ्का का अनादर करके सभी कबूतर वहाँ बैठ गये?)

प्रश्न 20.
कपोतस्य तिरस्कारं श्रुत्वा चित्रग्रीवः उवाच।
(कबूतर के तिरस्कार को सुनकर चित्रग्रीव बोला।)
उत्तरम्:
कस्य तिरस्कारं श्रुत्वा चित्रग्रीवः उवाच?
(किसके तिरस्कार को सुनकर चित्रग्रीव बोला?)

पाठ – परिचयः

नीतिकथा साहित्य में हितोपदेश अनुपम ग्रन्थ है। इस प्रकार सुना जाता है-नारायण शर्मा नाम के पंडित ने पटना के राजकुमारों को नीतिशास्त्र का ज्ञान कराने के लिए इस ग्रन्थ की रचना की। अपनी मनोहर प्रवाहमयी शैली के इस ग्रन्थ ने लोक में बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की। सरस और सरल भाषा के माध्यम से इस ग्रन्थ में पञ्चतन्त्र आदि ग्रन्थों को आधार बनाकर पशु-कथाओं का संग्रह किया गया है। हितोपदेश के चार परिच्छेद उपलब्ध हैं-

  1. मित्रलाभ
  2. सुहृदभेद
  3. विग्रह और
  4. सन्धि

प्रस्तुत पाठ मित्रलाभ परिच्छेद की पहली कथा का सम्पादित अंश है। इस पाठ में बड़ों की उपेक्षा का और एकजुट प्रयास का फल वर्णित है। चित्रग्रीव की अवज्ञा (उपेक्षा) करके कबूतर जाल में बँध गये। फिर भी चित्रग्रीव के उपदेश से एकमत होकर एकता का सहारा लेकर जाल को लेकर ही उड़ जाते हैं। यही पाठ का उपदेश है-‘संघ में शक्ति’ अथवा ‘संहति कार्य को साधने वाली होती है।

मूलपाठ, शब्दार्थ एवं हिन्दी-अनुवाद

1. अस्ति गोदावरी तीरे विशालः शाल्मलीतरुः। नानादिग्देशादागत्य रात्रौ पक्षिणो तत्र निवसन्ति। अथ कदाचित्। अवसन्नायां रात्रौ अस्ताचलचूडावलम्बिनि भगवति कुमुदिनीनायके चन्द्रमसि लघुपतनक नामा वायसः प्रबुद्धः, कृतान्तमिव द्वितीयम् आयान्तं व्याधम् अपश्यत्। तम् अवलोक्य अचिन्तयत् -“अद्य प्रातरेव अनिष्टदर्शनं जातम्, न जाने किम् अनभिमतं दर्शयिष्यति।” अतः तदनुसरणक्रमेण व्याकुलश्चलितः।।

शब्दार्था:
शाल्मलीतरुः = सेंमल का पेड़। नानादिग्देशाद्-विविध-क्षेत्रेभ्यः (विविध दिशाओं और देशों से)। पक्षिणः = खगाः (पक्षियों का समूह)। अवसनायाम् = समाप्तौ (समाप्त होने पर)। अस्ताचलचूडावलम्बिनि = अस्ताचल शिखरं गच्छति (अस्ताचल के शिखर पर अवलम्बित)। प्रबुद्धः = जागरित: (जागा हुआ)। कृतान्तमिव : यमम् इव (यमराज के समान)। द्वितीयम् = अपरम् (दूसरे को)। व्याधम् = लुब्धकम् (शिकारी को)। अवलोक्य = दृष्ट्वा (देखकर)। अनिष्टदर्शनम् = पापदर्शनम् (अपशकुन)। अनभिमतम् = अनिष्टं। प्रातरेव = सुबह ही।

हिन्दी अनुवाद:
गोदावरी के किनारे एक विशाल सेमल का पेड़ है। अनेक दिशा और देशों से आकर रात में पक्षी वहाँ निवास करते हैं। इसके बाद कभी रात बीतने पर जब भगवान् कुमुदिनियों के स्वामी चन्द्रमा अस्ताचल के शिखर पर लटके हुए थे अर्थात् अस्त होने को थे तब लघुपतनक नाम के कौआ ने जागने पर दूसरे यमराज की तरह आते हुए शिकारी को देखा। उसको देखकर वह सोचने लगा-“आज सुबह से ही अशुभ दर्शन हुआ है। न जाने क्या अनिष्ट दिखायेगा।” अतः उसके पीछे चलने से वह व्याकुल हुआ चल पड़ा।

व्याकरणिक-बिन्दव:
शाल्मलीतरुः = शाल्मले: तरुः (षष्ठी तत्पुरुष)। अवसन्नायाम् = अव + सद् + क्त + टाप्। (सप्तमी एकवचन)। प्रबुद्धः = प्र + बुध् + क्त। आयान्तम् = आङ् + या + शतृ (द्वितीया विभक्ति एकवचन)। अनिष्टदर्शनम् = अनिष्टं च तत् दर्शनम् (कर्मधारय समास)।

2. अथ तेन व्याधेन तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्णम्। स च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः। तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीव नामा कपोतराजः सपरिवारो वियति विसर्प तान् तण्डुलकणान् अवलोकयामास (अपश्यत्)। ततः कपोतराजः तण्डुलकण-लुब्धान् कपोतान् प्रति आह (अकथयत्) “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः? तन्निरूप्यतां तावत्। भद्रमिदं न पश्यामि। सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्त्तव्यम्”। एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित् कपोतः सदर्पम् आह (अकथयत्)।

ईर्थी घृणी त्वसन्तुष्टः क्रोधनो नित्यशङ्कितः।
परभाग्योपजीवी च षडेते दुःख-भागिनः॥

अन्वय:
ई, घृणी, असन्तुष्टः, क्रोधनः, नित्यशङ्कितः, परभाग्योपजीवी च एते ते षड् दु:ख भागिनः (सन्ति)।

शब्दार्था:
तण्डुलकणान् = चावल के कणों को। विकीर्य = बिखेरकर। विस्तीर्णम् = फैला दिया। प्रच्छन्नो भूत्वा = छिपकर। वियति = आसमान में। विसर्प = उड़ता हुआ। लुब्धान् = लोभियों को। निरूप्यताम् = निश्चय कीजिए। भद्रम् = कल्याण। सदर्पम् = अहंकारयुक्त। ईष्र्थी = ईष्यवान् (ईष्र्या रखने वाला)। घृणी = घृणा करने वाला। नित्यशङ्कितः = सदा। शंकालु। परभाग्योपजीवी = (पराश्रित) दूसरों के भाग्य पर जीवित रहने वाला।

हिन्दी-अनुवाद:
इसके पश्चात् उस बधिक ने चावल के कण (दाने) बिखेरकर जाल फैला दिया। उसी समय चित्रग्रीव नाम के कबूतरों के राजा ने परिवार सहित आकाश में उड़ते हुए उन चावलों को देखा। तब कपोतराज ने चावलों के लोभी कबूतरों से कहा-“यहाँ निर्जन वन में चावल के कणों की सम्भावना कहाँ? तो तब तक विचार कीजिए। इसमें मैं कल्याण नहीं देख रहा हूँ। हमेशा बिना विचारे काम नहीं करना चाहिए।” इस बात को सुनकर कोई कबूतर बड़े घमण्ड के साथ बोला। ईष्र्या करने वाला, घृणा करने वाला, सन्तोषहीन, क्रोधी, सदैव शंका करने वाला और दूसरे के भाग्य पर जीवित रहने वाला ये छः दु:ख के भागीदार होते हैं। अर्थात् ये छः दु:खी रहते हैं।

व्याकरणिक-बिन्दव:
विकीर्य = वि + कृ + ल्यप्। प्रच्छन्नो = प्र + छद् + क्त। विस्तीर्णम् = वि + स्तृ + क्त। तस्मिन्नेव = तस्मिन् + एव। कपोतराजः = कपोतानां राजा (षष्ठी तत्पुरुष समास)। लुब्धान् = लुभ् + क्त। कर्त्तव्यम् = कृ + तव्यत्।।

3. तत् श्रुत्वा कपोतराजस्य शङ्कां च अनादृत्य सर्वे कपोतास्तत्रोपविष्टाः। अनन्तरं सर्वे जालेन बद्धाः बभूवुः। ततो यस्य वचनात् तत्र अवलम्बितास्तं सर्वे तिरस्कुर्वन्ति। तस्य तिरस्कारं श्रुत्वा चित्रग्रीव उवाच-“नायमस्य दोषः। विपत्काले विस्मय एव कापुरुषलक्षणम्। तदत्र धैर्यमवलम्ब्य प्रतीकारश्चिन्त्यताम्। इदानीमप्येवं क्रियताम्। सर्वैरेकचित्तीभूय जालमादायोड्डीयताम्।” इति विचिन्त्य सर्वे पक्षिणः जालमादायोत्पतिताः। अनन्तरं स व्याधः सुदूराज्जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चाद् धावनम् अकरोत्। ततस्तेषु चक्षुर्विषयातिक्रान्तेषु पक्षिषु स व्याधो निवृतः। अत एव उच्यते

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।
तृणैः गुणत्वमापन्नैः बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥

अन्वय:
अल्पानां वस्तूनाम् अपि संहतिः कार्य साधिका (भवति) गुणत्वमापन्नैः तृणैः मत्तदन्तिनः (अपि) बध्यन्ते।

शब्दार्था:
अवलम्बिताः = जाल में बँध गये। अनादृत्य = अनादर या उपेक्षा करके। शङ्काम् = सन्देह को। विपत्काले = आपत्ति के समय। कापुरुषः = कायर। प्रतीकारः = समाधान। एकचित्तीभूय = मिलकर। आदाय = लेकर। संहतिः = एकता। आपन्नै = प्राप्त हुए। मत्तदन्तिनः = मतवाले हाथी। बध्यन्ते = बाँध दिये जाते हैं। गुणत्वमापन्नैः = गुण (बल) प्राप्त करने पर।

हिन्दी-अनुवाद:
उसे सुनकर और कबूतरों के राजा की शंका का अनादर करके सभी कबूतर वहाँ आ बैठे। इसके बाद सभी जाल में बँध गये। तब जिसके वचनों से वहाँ उतरे थे सभी उसका तिरस्कार करते हैं। उसका तिरस्कार सुनकर चित्रग्रीव बोला-“यह इसका दोष नहीं है। आपत्ति के समय आश्चर्य ही कायर का लक्षण है। तो यहाँ धैर्य का सहारा लेकर निवारण का उपाय (उपचार) सोचना चाहिए। अब भी ऐसा करना चाहिए। सभी को एकमत होकर जाल को लेकर उड़ जाना चाहिए।” ऐसा विचारकर सभी पक्षी जाल को लेकर उड़ गये। इसके बाद वह व्याध बहुत दूर से जाल को अपहरण करने वालों को देखकर पीछे दौड़ा। तब उन पक्षियों के आँखों से ओझल हो जाने पर वह व्याध लौट आया। इसलिए कहा जाता है- “छोटी-छोटी वस्तुओं की एकता कार्य को साधने वाली होती है। तिनका (मुँज) जब गुणत्व को प्राप्त हो जाती है अर्थात् बट दी जाती है (बल देने पर) उसमें मतवाले हाथी भी बाँधे जाते हैं।”

व्याकरणिक-बिन्दव:
अनादृत्य = अन् + आङ् + दृ + ल्यप्। कपोतास्तत्रोपविष्टाः = कपोताः + तत्र + उपविष्टाः। उपविष्टाः = उप + विश् + क्त। श्रुत्वा = श्रु + क्त्वा। विपत्काले = विपदः काले (षष्ठी तत्पुरुष)। विचिन्त्य = वि + चिन्त् + ल्यप्। अल्पानां वस्तूनाम् = अल्पवस्तूनाम् (षष्ठी तत्पुरुष)। आपन्नैः = आङ् + पत् + क्त (तृतीया बहुवचन)।

पठ-परिचयः

नीतिकथा साहित्य में हितोपदेश अनुपम ग्रन्थ है। इस प्रकार सुना जाता है-नारायण शर्मा नाम के पंडित ने पटना के राजकुमारों को नीतिशास्त्र का ज्ञान कराने के लिए इस ग्रन्थ की रचना की। अपनी मनोहर प्रवाहमयी शैली के इस ग्रन्थ ने लोक में बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की। सरस और सरल भाषा के माध्यम से इस ग्रन्थ में पञ्चतन्त्र आदि ग्रन्थों को आधार बनाकर पशु-कथाओं का संग्रह किया गया है।

हितोपदेश के चार परिच्छेद उपलब्ध हैं-

  1. मित्रलाभ,
  2. सुहृदभेद,
  3. विग्रह और
  4. सन्धि

प्रस्तुत पाठ मित्रलाभ परिच्छेद की पहली कथा का सम्पादित अंश है। इस पाठ में बड़ों की उपेक्षा का और एकजुट प्रयास का फल वर्णित है। चित्रग्रीव की अवज्ञा (उपेक्षा) करके कबूतर जाल में बँध गये। फिर भी चित्रग्रीव के उपदेश से एकमत होकर एकता का सहारा लेकर जाल को लेकर ही उड़ जाते हैं। यही पाठ का उपदेश है–‘संघ में शक्ति’ अथवा ‘संहति कार्य को साधने वाली होती है।’

मूलपाठ, शब्दार्थ एवं हिन्दी-अनुवाद

1. अस्ति गोदावरी तीरे विशालः शाल्मलीतरुः। नानादिग्देशादागत्य रात्रौ पक्षिणो तत्रे निवसन्ति। अथ कदाचित् अवसन्नाया रात्रौ अस्ताचलचूडावलम्बिनि भगवति कुमुदिनीनायके चन्द्रमसि लघुपतनक नामा वायसः प्रबुद्धः, कृतान्तमिवं द्वितीयम् आयान्तं व्याधम् अपश्यत्। तम् अवलोक्य अचिन्तयत्-“अद्य प्रातरेव अनिष्टदर्शनं जातम्, न जाने किम् अनभिमतं दर्शयिष्यति।” अतः तदनुसरणक्रमेण व्याकुलश्चलितः।

शब्दार्थाः-शाल्मलीतरुः = सेंमल का पेड़। नानादिग्देशाद्-विविध-क्षेत्रेभ्यः (विविध दिशाओं और देशों से)। पक्षिणः = खगाः (पक्षियों का समूह)। अवसन्नायाम् = समाप्तौ (समाप्त होने पर)। अस्ताचलचूडावलम्बिनि = अस्ताचल शिखरं गच्छति (अस्ताचल के शिखर पर अवलम्बित)। प्रबुद्धः = जागरित: (जागा हुआ)। कृतान्तमिव – यमम् इव (यमराज के समान)। द्वितीयम् = अपरम् (दूसरे को)। व्याधम् = लुब्धकम् (शिकारी को)। अवलोक्य = दृष्ट्वा (देखकर)। अनिष्टदर्शनम् = पापदर्शनम् (अपशकुन)। अनभिमतम् = अनिष्टं। प्रातरेव = सुबह ही।

हिन्दी अनुवादः-गोदावरी के किनारे एक विशाल सेमल का पेड़ है। अनेक दिशा और देशों से आकर रात में पक्षी वहाँ निवास करते हैं। इसके बाद कभी रात बीतने पर जब भगवान् कुमुदिनियों के स्वामी चन्द्रमा अस्ताचल के शिखर पर लटके हुए थे अर्थात् अस्त होने को थे तब लघुपतनक नाम के कौआ ने जागने पर दूसरे यमराज की तरह आते हुए शिकारी को देखा। उसको देखकर वह सोचने लगा-“आज सुबह से ही अशुभ दर्शन हुआ है। न जाने क्या अनिष्ट दिखायेगा।” अतः उसके पीछे चलने से वह व्याकुल हुआ चल पड़ा।

व्याकरणिक-बिन्दवः-शाल्मलीतरुः = शाल्मले: तरु: (षष्ठी तत्पुरुष)। अवसन्नायाम् = अव + सद् + क्त + टोप् (सप्तमी एकवचन)। प्रबुद्धः = प्र + बुध् + क्त। आयान्तम् = आङ् + या + शतृ (द्वितीया विभक्ति एकवचन)। अनिष्टदर्शनम् = अनिष्टं च तत् दर्शनम् (कर्मधारय समास)।

2. अथ तेन व्याधेन तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्णम्। स च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः। तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीव नामा कपोतराजः सपरिवारो वियति विसर्पन् तान् तण्डुलकणान् अवलोकयामास (अपश्यत्)। ततः कपोतराजः तण्डुलकण-लुब्धान् कपोतान् प्रति आहे (अकथयत्) “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः? तन्निरूप्यता तावत्। भद्रमिदं न पश्यामि। सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्त्तव्यम्”। एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित् कपोतः सदर्पम् आह (अकथयत्)।

ईर्थी घृणी त्वसन्तुष्टः क्रोधनो नित्यशङ्कितः।
परभाग्योपजीवी च षडेते दुःख-भागिनः॥

अन्वयः-ई, घृणी, असन्तुष्टः, क्रोधनः, नित्यशङ्कितः, परभाग्योपजीवी च एते ते षड् दु:ख भागिनः (सन्ति)।

शब्दार्थाः-तण्डुलकणान् = चावल के कणों को। विकीर्य = बिखेरकर। विस्तीर्णम् = फैला दिया। प्रच्छन्नो भूत्वा = छिपकर। वियति = आसमान में। विसर्प = उड़ता हुआ। लुब्धान् = लोभियों को। निरूप्यताम् = निश्चय कीजिए। भद्रम् = कल्याण। सदर्पम् = अहंकारयुक्त। ईष्र्थी = ईष्यवान् (ईष्र्या रखने वाला)। घृणी = घृणा करने वाला। नित्यशङ्कितः = सदा शंकालु। परभाग्योपजीवी = (पराश्रित) दूसरों के भाग्य पर जीवित रहने वाला।

हिन्दी-अनुवादः-इसके पश्चात् उस बधिक ने चावल के कण (दाने) बिखेरकर जाल फैला दिया। उसी समय चित्रग्रीव नाम के कबूतरों के राजा ने परिवार सहित आकाश में उड़ते हुए उन चावलों को देखा। तब कपोतराज ने चावलों के लोभी कबूतरों से कहा-“यहाँ निर्जन वन में चावल के कणों की सम्भावना कहाँ? तो तब तक विचार कीजिए। इसमें मैं कल्याण नहीं देख रहा हूँ। हमेशा बिना विचारे काम नहीं करना चाहिए।” इस बात को सुनकर कोई कबूतर बड़े घमण्ड के साथ बोला ईष्र्या करने वाला, घृणा करने वाला, सन्तोषहीन, क्रोधी, सदैव शंका करने वाला और दूसरे के भाग्य पर जीवित रहने वाला ये छः दु:ख के भागीदार होते हैं। अर्थात् ये छः दु:खी रहते हैं।

व्याकरणिक-बिन्दवः-विकीर्य = वि + कृ + ल्यप्। प्रच्छन्नो = प्र + छद् + क्त। विस्तीर्णम् = वि + स्तृ + क्त। तस्मिन्नेव = तस्मिन् + एव। कपोतराजः = कपोतानां राजा (षष्ठी तत्पुरुष समास)। लुब्धान् = लुभ् + क्त। कर्त्तव्यम् = कृ + तव्यत्।

3. तत् श्रुत्वा कपोतराजस्य शङ्कां च अनादृत्य सर्वे कपोतास्तत्रोपविष्टाः। अनन्तरं सर्वे जालेन बद्धाः बभूवुः। ततो यस्य वचनात् तत्र अवलम्बितास्तं सर्वे तिरस्कुर्वन्ति। तस्य तिरस्कारं श्रुत्वा चित्रग्रीव उवाच-“नायमस्य दोषः। विपत्काले विस्मय एवं कापुरुषलक्षणम्। तदत्र धैर्यमवलम्ब्य प्रतीकारश्चिन्त्यताम्। इदानीमप्येवं क्रियताम्। सर्वेरेकचित्तीभूय जालमादायोडीयताम्।” इति विचिन्त्य सर्वे पक्षिणः जालमादायोत्पतिताः। अनन्तरं स व्याधः सुदूराज्जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चाद् धावनम् अकरोत्। ततस्तेषु चक्षुर्विषयातिक्रान्तेषु पक्षिषु स व्याधो निवृतः। अत एव उच्यते

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।
तृणैः गुणत्वमापन्नैः बध्यन्ते मत्तदन्तिनः।

अन्वयः-अल्पानां वस्तूनाम् अपि संहतिः कार्य साधिका (भवति) गुणत्वमापन्नैः तृणै: मत्तदन्तिनः (अपि) बध्यन्ते।

शब्दार्थाः-अवलम्बिताः = जाल में बँध गये। अनादृत्य = अनादर या उपेक्षा करके। शङ्काम् = सन्देह को। विपत्काले = आपत्ति के समय। कापुरुषः = कायर। प्रतीकारः = समाधान। एकचित्तीभूय = मिलकर। आदाय = लेकर। संहतिः = एकता। आपन्नै = प्राप्त हुए। मत्तदन्तिनः = मतवाले हाथी। बध्यन्ते = बाँध दिये जाते हैं। गुणत्वमापन्नैः = गुण (बल) प्राप्त करने पर।

हिन्दी-अनुवादः-उसे सुनकर और कबूतरों के राजा की शंका का अनादर करके सभी कबूतर वहाँ आ बैठे। इसके बाद सभी जाल में बँध गये। तब जिसके वचनों से वहाँ उतरे थे सभी उसका तिरस्कार करते हैं। उसका तिरस्कार सुनकर चित्रग्रीव बोला-“यह इसका दोष नहीं है। आपत्ति के समय आश्चर्य ही कायर का लक्षण है। तो यहाँ धैर्य का सहारा लेकर निवारण का उपाय (उपचार) सोचना चाहिए। अब भी ऐसा करना चाहिए। सभी को एकमत होकर जाल को लेकर उड़ जाना चाहिए।” ऐसा विचारकर सभी पक्षी जाल को लेकर उड़ गये। इसके बाद वह व्याध बहुत दूर से जाल को अपहरण करने वालों को देखकर पीछे दौड़ा। तब उन पक्षियों के आँखों से ओझल हो जाने पर वह व्याध लौट आया। इसलिए कहा जाता है- “छोटी-छोटी वस्तुओं की एकता कार्य को साधने वाली होती है। तिनका (मॅज) जब गुणत्व को प्राप्त हो जाती है अर्थात् बट दी जाती है (बल देने पर) उसमें मतवाले हाथी भी बाँधे जाते हैं।

व्याकरणिक-बिन्दवः-अनादृत्य = अन् + आङ् + दृ + ल्यप्। कपोतास्तत्रोपविष्टाः = कपोताः + तत्र + उपविष्टाः। उपविष्टाः = उप + विश् + क्त। श्रुत्वा = श्रु + क्त्वा। विपत्काले = विपदः काले (षष्ठी तत्पुरुष)। विचिन्त्य = वि + चिन्त् + ल्यप्। अल्पानां वस्तूनाम् = अल्पवस्तूनाम् (षष्ठी तत्पुरुष)। आपन्नैः = आङ् + पत् + क्त (तृतीया बहुवचन)।