वस्तुनिष्ठप्रश्नाः

1. ‘मेवाड़’ राज्यम् उद्भवभूमिः अस्ति
(अ) उत्सर्गपरम्परायाः
(आ) शूराणां शौर्य्यस्य
(इ) प्रतापस्य
(ई) वीराणाम्

2. महाराणा प्रतापस्य वंशः आसीत्|
(अ) पुण्यवंशः
(आ) सिसोदिया
(इ) गुप्तवंशः
(ई) मौर्यवंशः

3. मुगलैः सह प्रवृत्तं प्रतापस्य मुख्य ‘युद्धम्’ आसीत्
(अ) चित्तौड़युद्धम्
(आ) उदयपुरयुद्धम्
(इ) हल्दीघाटीयुद्धम्
(ई) चावण्डयुद्धम्

4. प्रतापाय कः स्वीयं सम्पूर्णं धनं दत्तवान्
(अ) चेटकः
(आ) उदयसिंह
(इ) हकीमखाँ सूरि
(ई) भामाशाहः

उत्तराणि:

1. (अ)
2. (आ)
3. (इ)
4. (ई)

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 6 महाराणा प्रतापः लघूत्तरात्मकप्रश्नाः

प्रश्न 1.
मेवाड़राज्यस्य वीराणां नामानि लिखत।
(मेवाड़ राज्य के वीरों के नाम लिखिए।)
उत्तरम्:
बप्पारावलः, राणाहमीरः, राणासांगा प्रभृति-वीराणां सुदीर्घा परम्परा।
(बप्पारावल, राणाहमीर, राणासागा आदि वीरों की लम्बी परम्परा है।)

प्रश्न 2.
प्रतापस्य जन्म कदा अभवत्?
(प्रताप का जन्म कब हुआ?)
उत्तरम्:
प्रतापस्य जन्म विक्रमस्य 1597 तमे वर्षे (1540 ई.) ज्येष्ठ शुक्लतृतीयायाम् अभवत्।
(प्रताप का जन्म विक्रम संवत् 1597 अर्थात् 1540 ई. में हुआ।)

प्रश्न 3.
प्रतापस्य शासनकाले कः मुगलशासकः आसीत्?
(प्रताप के शासन में कौन मुगल शासक था?)
उत्तरम्:
प्रतापस्य शासनकाले अकबरः मुगलशासकः आसीत्।
(प्रताप के शासनकाल में अकबर मुगल राजा था।)

प्रश्न 4.
प्रतापः कुत्र स्वराजधानीम् अकरोत्?
(प्रताप ने कहाँ अपनी राजधानी की?)
उत्तरम्:
प्रतापः चावण्ड इति स्थाने राजधान अकरोत्।

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 6 महाराणा प्रतापः निबन्धात्मक-प्रश्नाः

प्रश्न 1.
मेवाड़ राज्य केन प्रकारेण विश्वस्मिन् जगति प्रसिद्धिम् अलभत्?
(मेवाड़ राज्य किस प्रकार से सारे संसार में प्रसिद्धि पा गया?)
उत्तरम्:
मेवाड़ राज्यं शूराणां शौर्येण, यूनाम् आत्माहुत्या, सतीनां च जौहर परम्पराया विश्वस्मिन् जगति महती प्रसिद्धिम् अलभत्।
(मेवाड़ राज्य वीरों के शौर्य, जवानों के बलिदान और सतियों के जौहर की परम्परा के कारण सारे संसार में प्रसिद्धि पा गया।)

प्रश्न 2.
मेवाड़राज्यस्य वीरपरम्परायां के के वीराः अभवन्?
(मेवाड़ राज्य के वीरों की परम्परा में कौन कौन से वीर हुए?)
उत्तरम्:
मेवाड़राजस्य वीरपरम्परायां बप्पारावल:, राणाहमीरः, राणासांगा, उदयसिंहः, महाराणा प्रतापः प्रभृति-वीराणां सुदीर्घा परम्परा आसीत्।
(मेवाड़ राज्य की वीर परम्परा में बप्पारावल, राणाहमीर, रांणासांगा, उदयसिंह, महाराणा प्रताप सिंह आदि वीरों की लम्बी परम्परा है।)

प्रश्न 3.
प्रतापस्य प्रतिज्ञा का?
(प्रताप की प्रतिज्ञा क्या थी?)
उत्तरम्:
प्रतापस्य प्रतिज्ञा आसीत्-“यावत् अहं हस्तच्युतान् स्वराज्यभागान् पुनः न प्राप्स्यामि तावत् सुवर्णपात्रेषु भोजन न करिष्यामि, राजप्रासादे वासं न करिष्यामि, मृदुतल्पे च शयनं न करिष्यामि”।
(प्रताप की प्रतिज्ञा थी- “जब तक़ मैं हाथ से निकले अपने राज्य के भागों को वापिस नहीं ले लँगा तब तक सोने के थलों में भोजन नहीं करूंगा, राजमहल में वास नहीं करूंगा तथा कोमल गद्दे पर नहीं सोऊँगा।”)

प्रश्न 4.
प्रताप-भामाशाहयोः वार्ता स्वशब्देषु लिखत।
(प्रताप और भामाशाह की वार्ता को अपने शब्दों में लिखिए।)
उत्तरम्:
भामाशाहः – ‘प्रभो! अहं भववंशस्य सेवकः अस्मि। मम हस्ते प्रभूतं धनं विद्यते। तेन भवान् 25000 सैनिकान् द्वादशवर्षपर्यन्तं पालियुतं प्रभविष्यति।
प्रतापः – नाहमेतद्धनं स्वीकर्तुं श्क्नोमि, एतद् धनं भवेता अर्जितम् अस्ति।
भामाशाहः – नैतद्धनं परकीयम्। देशरक्षार्थं मया अर्जितमिदं धनं यदि सहायकं भवेत् तर्हि मम जीवनं सार्थक भविष्यति।
प्रतापः – अहम् असीमास्वस्तोऽस्मि भवद् वचनेन।
भामाशाह – स्वामी, मैं आपके वंश का सेवक हूँ। मेरे पास बहुत धन है। उससे आप 25000 सैनिकों को 12 वर्ष तक पाल सकते हैं।
प्रताप – मैं यह धन स्वीकार नहीं करता हूँ, यह धन तो आपके द्वारा अर्जित किया गया है।
भामाशाह – यह पराया नहीं है, देशरक्षा के लिए मैंने अर्जित किया यह धन यदि सहायक हो तो मेरा जीवन सार्थक हो जायेगा।
प्रताप – मैं अपार सन्तुष्ट हूँ आपके वचनों से।

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 6 महाराणा प्रतापः व्याकरण-प्रश्नाः

प्रश्न 1.
अधोलिखितेषु पदेषु धातु-लकार-पुरुष-वचनानां निर्देशं कुरुत – (निम्नलिखित पदों में धातु, लकार, पुरुष और वचन बताइए-)
उत्तरम्:
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 6 1

प्रश्न 2.
अधोलिखितेषु शब्द-विभक्ति-वचनानां निर्देशं कुरुत – (निम्नलिखित पदों में शब्द, विभक्ति, वचन बताइये-)
उत्तरम्:
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 6 2

प्रश्न 3.
निम्नलिखितेषु प्रकृति प्रत्ययोः निर्देशं कुरुत – (निम्नलिखित पदों में प्रकृति-प्रत्यय बताइए-)
उत्तरम्:
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 6 3
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 6 10
प्रश्न 4.
अधोलिखितपदानां समास-विग्रहं प्रदर्श्य समासनामोल्लेखं कुरुत – (निम्नलिखित पदों का समास विग्रह दिखाकर नाम का उल्लेख कीजिये-)
उत्तरम्:
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 6 5

प्रश्न 5.
अधोलिखितान् पदान् आधारीकृत्य वाक्यनिर्माणं कुरुत – (निम्नलिखित पदों के आधार पर वाक्य-निर्माण कीजिये-)
उत्तरम्:
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 6 6

प्रश्न 6.
अधोलिखितेषु यथानिर्देशं विभक्ति परिवर्तनं कुरुत – (निम्नलिखित पदों में निर्देशानुसार विभक्ति परिवर्तन कीजिए-)
उत्तरम्:
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 6 7
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 6 9

प्रश्न 7.
उचितपदप्रयोगेण रिक्तस्थानानि पूरयत – (उचित पद का प्रयोग करके रिक्तस्थानों की पूर्ति कीजिए-)
उत्तरम्:
उदाहरण:
प्रतापः कदापि पराजयं न स्वीकृतवान्। (पराजयः)

  1. प्रभो! अहम् भववंशस्य सेवकः। (भवद्वंश:)
  2. प्रतापस्य सेना पर्वतीययुद्धे कुशला आसीत्। (पर्वतीययुद्धम्)
  3. राजानः देशरक्षा कर्तव्यात् सर्वथा विमुखा: आसन्। (देशरक्षा कर्तव्यः)
  4. प्रतापः हस्तच्युतान् दुर्गा प्राप्तुं चिन्तनमकरोत्। (दुर्ग:)
  5. तावत् सुवर्णपात्रेषु भोजनं न करिष्यामि। (सुवर्णपात्रम्)

प्रश्न 8.
अधोलिखितानाम् उत्तराणाम् आधारेण प्रश्ननिर्माणं कुरुत – (निम्नलिखित उत्तरों के आधार पर प्रश्ननिर्माण कीजिए-)
उदाहरण: वीराणां सुदीर्घा परम्परा कस्य विद्यते?
उत्तरम्:
मेवाड़ राज्यस्य सिसोदियावंशस्य वीराणां सुदीर्धा परम्परा विद्यते।

(i) प्रतापस्य जन्म कदा अभवत्?
उत्तरम्:
प्रतापस्य जन्म विक्रमस्य 1597 तमे वर्षे ज्येष्ठ शुक्ल तृतीयायाम् अभवत्।

(ii) प्रतापस्य राजकाले कः मुगलशासकः आसीत्?
उत्तरम्:
प्रतापस्य राज्यकाले अकबरः इति नामक: मुगलशासकः आसीत्।

(iii) प्रतापः कस्मिन् युद्धे बहुशौर्यं प्रदर्शितवान्।
उत्तरम्:
प्रतापः हल्दीघाटीयुद्धे बहुशौर्यं प्रदर्शितवान्।

(iv) प्रतापाय कः प्रभूतं धनं दत्तवान्?
उत्तरम्:
प्रतापाय भामाशाहः प्रभूतं धनं दत्तवान्।

(v) प्रतापः किं स्थानं स्वराजधानीं अकरोत्।
उत्तरम्:
प्रतापः ‘चावण्ड’ नामकं स्थानं स्वराजधानीम् अकरोत्।

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 6 महाराणा प्रतापः अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तराणि

अधोलिखितान् प्रश्नान् संस्कृतभाषया पूर्णवाक्येन उत्तरत – (निम्नलिखित प्रश्नों के संस्कृत भाषा में पूर्णवाक्य में उत्तर दीजिए-)

प्रश्न 1.
मेवाड़ः कस्य परम्परायाः उद्भवभूमिः?
(मेवाड़ किस परम्परा की उद्गम भूमि है?)
उत्तरम्:
मेवाड़ः उत्सर्गपरम्परायाः उद्भवभूमिः।
(मेवाड़ बलिदान परम्परा की उद्गम भूमि है।)

प्रश्न 2.
प्रतापः कस्मिन् वंशे जन्म लेभे?
(प्रताप ने किस वंश में जन्म लिया?)
उत्तरम्:
प्रतापः सिसोदिया वंशे जन्म लेभे।
(प्रताप ने सिसोदिया वंश में जन्म लिया।)

प्रश्न 3.
प्रतापः बाल्यकालात् कीदृशः आसीत्?
(प्रताप बाल्यकाल में कैसा था?)
उत्तरम्:
प्रतापः बाल्यकालात् वीर योद्धा, कुशलसेनानी, धीरनायकश्चासीत्।
(प्रताप बचपन से ही वीर योद्धा कुशल सेनानी और धीर नायक था।)

प्रश्न 4.
प्रतापस्य पितुः किं नाम आसीत्?
(प्रताप के पिता का क्या नाम था ?)
उत्तरम्:
प्रतापस्य पितुः नाम उदयसिंहः आसीत्।
(प्रताप के पिता का नाम उदयसिंह था।)

प्रश्न 5.
प्रतापः मेवाड़राज्यसिंहासनं कस्मिन् वयसि आरूढ़वान्?
(प्रताप मेवाड़ राज्य के सिंहासन पर किस उम्र में आरूढ़ हुए?)
उत्तरम्:
प्रतापः स्ववयसः 32 तमे वर्षे मेवाड़राज्यसिंहासनम् आरूढ़वान्।
(प्रताप अपनी उम्र के 32 वें वर्ष में राज्य सिंहासन पर बैठे।)

प्रश्न 6.
प्रतापस्य राज्याभिषेकः कुत्र अभवत्?
(प्रताप का राज्याभिषेक कहाँ हुआ?)
उत्तरम्:
प्रतापस्य राज्याभिषेक ‘गोगुन्दा’ ग्रामे अभवत्।
(प्रताप का राज्याभिषेक गोगुन्दा गाँव में हुआ।)

प्रश्न 7.
प्रताप सिंहासनारूढ़े राजानः किं विधाये आत्मगौरवं मन्यन्ते स्म?
(प्रताप के सिंहासन आरूढ़ होने पर राजा लोग क्या करके गौरव अनुभव करते थे?)
उत्तरम्:
प्रताप सिंहासनारूढ़े राजानः मुगलशासकस्य सहाय्यं विधाय आत्मगौरवं मन्यन्ते स्म।
(प्रताप के सिंहासनारूढ़ होने पर राजा मुगल शासक की सहायता करके अपना गौरव मानते थे।)

प्रश्न 8.
केन कारणेन मेवाड़स्य स्थितिः असमीचीना जाता?
(किस कारण से मेवाड़ की स्थिति अच्छी नहीं थी?)
उत्तरम्:
शत्रुभिः सह दीर्घकालीनानां युद्धानां कारणेन मेवाड़राजस्य स्थिति: समीचीना न आसीत्।
(शत्रुओं के साथ लम्बे समय तक युद्ध होने के कारण मेवाड़ राज्य की स्थिति अच्छी नहीं थी।)

प्रश्न 9.
प्रतापः प्रथमं केषां सभाम् आकारितवान्?
(प्रताप ने पहले किनकी सभा बुलाई?)
उत्तरम्:
प्रतापः प्रथमं स्वस्वामिभक्तसामन्तानां स्थानीयभिल्लजनानां च सभाम् आकारितवान्।
(प्रताप ने पहले अपने विश्वासपात्र सामन्तों और स्थानीय भील लोगों की सभा बुलाई ।)

प्रश्न 10.
प्रथमसभायां प्रतापः किम् अकरोत्?
(प्रथम सभा में प्रताप ने क्या किया?)
उत्तरम्:
प्रथमसभायां प्रतापः प्रतिज्ञाम् अकरोत्।
(प्रथम सभा में प्रताप ने प्रतिज्ञा की।)

प्रश्न 11.
हल्दीघाटी युद्धे कस्य सेनायाः अतिक्षतिः जाता?
(हल्दीघाटी के युद्ध में किसकी सेना की अधिक हानि हुई?)
उत्तरम्:
हल्दीघाटी युद्धे मुगलसेनायाः अतिक्षतिः जाता।
(हल्दीघाटी के युद्ध में मुगल सेना की अत्यधिक क्षति हुई।)

प्रश्न 12.
हल्दीघाटी युद्धे मुगलसेनायाः अतिक्षतिः कस्मात् अभवत्?
(हल्दीघाटी के युद्ध में मुगल सेना की अधिक हानि क्यों हुई?)
उत्तरम्:
यतः प्रतापस्य सेना पर्वतीययुद्धेषु कुशला आसीत्।
(क्योंकि प्रताप की सेना पहाड़ी युद्धों में कुशल थी।)

प्रश्न 13.
मुगल सेना केन कारणेन परावर्तिता?
(मुगल सेना किस कारण से लौट गई?)
उत्तरम्:
मुगलसेना स्थानीयजनानां विरोधकारणेन परावर्तिता।
(मुगल सेना स्थानीय लोगों के विरोध के कारण लौट गई।)

प्रश्न 14.
प्रतापस्य सेना केन कारणेन विघटिता जाता?
(प्रताप की सेना किस कारण से बिखर गई?)
उत्तरम्:
प्रतापस्य सेना धनाभाव विघटिता।
(प्रताप की सेना धन के अभाव में विघटित हो गई।)

प्रश्न 15.
प्रतापः किं न स्वीकृतवान्?
(प्रताप ने क्या स्वीकार नहीं किया?)
उत्तरम्:
प्रतापः पराजयं कदापि न स्वीकृतवान्।
(प्रताप ने पराजय कभी स्वीकार नहीं की।)

प्रश्न 16.
सैन्यसंग्रहणं कीदृशं कार्यम् आसीत्?
(सेना संग्रह करने का काम कैसा था?)
उत्तरम्:
सैन्यसंग्रहणं कार्यं बहुवित्तसाध्यम् आसीत्।
(सेना का एकत्रित करने का काम बहुत धनसाध्य था।)

प्रश्न 17.
प्रतापस्य बहुचिन्ती कारणं किम् आसीत्?
(प्रताप की बहुत चिन्ता का कारण क्या था?)
उत्तरम्:
प्रतापस्य बहुचिन्तायाः कारणं सैन्य संग्रहणं तत्प्रशिक्षणं आसीत्।
(प्रताप का बहुत चिन्ता का कारण सेना का संग्रह करना तथा प्रशिक्षित करना था।)

प्रश्न 18.
प्रतापस्य चिन्तां विभाव्य कः आगच्छत्?
(प्रताप की चिन्ता को समझकर कौन आया?)
उत्तरम्:
प्रतापस्य चिन्तां विभाव्य भामाशाहः श्रेष्ठी आगच्छत्।
(प्रताप की चिन्ता को समझकर भामाशाह सेठ आया।)

प्रश्न 19.
प्रतापः कुत्र उषित्वा सैन्य संग्रहणम् उपाक्रमत?
(प्रताप ने कहाँ रहकर सेना का संग्रह किया?)
उत्तरम्;
प्रतापः अरण्यॊगुहाप्रदेशेषु उषित्वा सैन्यसंग्रहणम् उपाक्रमत।
(प्रताप ने जंगलों और गुफाओं में रहकर सैन्य संग्रह किया।)

प्रश्न 20.
भामाशाहः प्रतापस्य चिन्तां विभाव्य किम् अचिन्तयत्?
(भामाशाह ने प्रताप की चिन्ता को समझकर क्या सोचा?)
उत्तरम्:
सोऽचिन्तयत् यद् किमपि महत्कार्यं कर्तुं कालः समायातः।
(उसने सोचा कि कुछ महान् कार्य करने का समय आ गया है।)

प्रश्न 21.
भामाशाहः धनं कस्मात् अर्जितवान्?
(भामाशाह ने धन किसलिए अर्जित किया?)
उत्तरम्:
भामाशाह: धनं देशरक्षार्थम् एवं अर्जितवान्।
(भामाशाह ने धन देश-रक्षा के लिये अर्जित किया।)

प्रश्न 22.
भामाशाहस्य वचनं श्रुत्वा प्रतापः कथम् अनुभूतवान्?
(भामाशाह की बात सुनकर प्रताप ने कैसा अनुभव किया?)
उत्तरम्:
भामाशाहस्य वचनं श्रुत्वा प्रताप: असीमसान्त्वनां प्राप्तवान्।
(भामाशाह की बात सुनकर प्रताप को अपार सन्तुष्टि हुई।)।

प्रश्न 23.
नूतनसेनया प्रतापः कानि क्षेत्राणि पुनः हस्तगतं कृतवान्?
(नई सेना से प्रताप ने किन क्षेत्रों को फिर से हस्तगत किया?)
उत्तरम्:
नूतनसेनया प्रतापः मोही, गोगुन्दा, उदयपुरम् इत्यादीनि स्थानानि हस्तगतं कृतवान्।
(नई सेना से प्रताप ने गोगुन्दा, मोही और उदयपुर को हस्तगत किया।)

प्रश्न 24.
प्रतापः स्वराज्ये शान्ति संस्थाप्य स्वराजधानीम् कुत्र अकरोत्?
(प्रताप ने अपने राज्य में शान्ति स्थापित कर अपनी राजधानी कहाँ बनाई?)
उत्तरम्:
प्रतापः स्वराज्ये शान्तिं संस्थाप्य चावण्ड नामक स्थानं स्वराजधानीम् अकरोत्।
(प्रताप ने अपने राज्य में शान्ति की स्थापना करके चावण्ड नामक स्थान पर अपनी राजधानी बनाई।)

प्रश्न 25.
कीदृशाः भारतवासिनः अद्यापि प्रतापस्य शौर्यगाथां गायन्ति?
(कैसे भारतवासी आज भी प्रताप की शूरवीरता की गाथा करते हैं?)
उत्तरम्:
स्वातन्त्र्य प्रेमिणः भारतवासिनः अद्यापि प्रतापस्य शौर्यगाथां गायन्ति।
(स्वतन्त्रता प्रेमी भारतवासी आज भी प्रताप की शौर्य गाथा गाते हैं।)

स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत – (मोटे शब्दों के आधार पर प्रश्न निर्माण कीजिए-)

प्रश्न 1.
धनुष् प्रत्यञ्चाघातेन प्रतापः अस्वस्थोऽभवत्। (धनुष की डोरी के आघात से प्रताप अस्वस्थ हो गया।)
उत्तरम्:
प्रतापः केन अस्वस्थोऽभवत्? (प्रताप किससे अस्वस्थ हो गये?)

प्रश्न 2.
1597 तमे ईस्वीयाब्दे प्रतापः दिवङ्गतः। (1597 ई. में प्रताप दिवंगत हो गये ।)
उत्तरम्:
प्रतापः कदा दिवङ्गत:? (प्रताप कब दिवंगत हुए?)

प्रश्न 3.
अकबरस्य सेनया सह प्रतापस्य अनेकवारं युद्धम् अभवत्।(अकबरे की सेना के साथ प्रताप का अनेक बार युद्ध हुआ।)
उत्तरम्:
कस्य सेनया सह प्रतापस्य अनेकबार युद्धम् अभवत्? (किसकी सेना के साथ प्रताप का अनेक बार युद्ध हुआ?)

प्रश्न 4.
अकबर-प्रतापयो: मुख्य युद्धं हल्दीघाटी स्थानेऽभवत्। (अकबर और प्रताप का मुख्य युद्ध हल्दीघाटी स्थान पर हुआ।)
उत्तरम्:
अकबर्-प्रतापयो: मुख्ययुद्धं कुत्र अभवत्? (अकबर और प्रताप का मुख्य युद्ध कहाँ हुआ?)

प्रश्न 5.
प्रतापस्य राज्ये जनक्षति धनक्षति: च संजाता। (प्रताप के राज्य में जन और धन की हानि हुई।)
उत्तरम्:
कस्य राज्ये जनक्षति: धनक्षति: च अभवत्? (किसके राज्य में जन-धन की हानि हुई?)

प्रश्न 6.
संकल्पसिद्धये सैन्य संग्रहणम् उपाक़मत। (संकल्प सिद्धि के लिए सेना का संग्रह किया।)
उत्तरम्:
कस्मै सैन्य संग्रहणम् उपाक्रमत? (किसके लिए सैन्य संग्रहण किया?)

प्रश्न 7.
तस्य राज्याभिषेक: गोगुन्दा ग्रामे अभवत्। (उसका राज्याभिषेक गोगुन्दा गाँव में हुआ।)
उत्तरम्:
तस्य राज्याभिषेकः कस्मिन् ग्रामे अभवत्? (उसका राज्याभिषेक कहाँ हुआ?)

प्रश्न 8.
तस्मिन् काले उत्तरभारते मुगलवंशीयानां शासनम् आसीत्। (उस समय उत्तर भारत में मुरालवंशियों का शासन था।)
उत्तरम्:
तस्मिन् काले केषां शासनम् आसीत्? (उस समय किनका शासन था?)

प्रश्न 9.
शत्रुभिः सह युद्धम् अभवत्। (शत्रुओं के साथ युद्ध हुआ।)
उत्तरम्:
केः सह युद्धम् अभवत्? (किनके साथ युद्ध हुआ?)

प्रश्न 10.
मुगलशासकस्य साहाय्यं विधाय आत्मगौरवं मन्यते स्म। (मुगल शासक की सहायता करके आत्मगौरव मानते थे।)
उत्तरम्:
मुगल शासकस्य साहाय्यं विधाये किं मन्यते स्म? (मुगल शासक की सहायता करके क्या मानते थे?)

प्रश्न 11.
प्रतापस्य पिता महाराणा उदयसिंहः आसीत् (प्रताप के पिता महाराणा उदयसिंह थे।)
उत्तरम्:
प्रतापस्य पिता कः आसीत्? (प्रताप के पिता कौन थे?)

प्रश्न 12.
राजानः देशरक्षाकर्तव्यात् विमुखाः आसन्। (राजा देशरक्षा के कर्तव्य से विमुख थे।)
उत्तरम्;
राजानः कस्मात् विमुखाः आसन्? (राजा किससे विमुख थे?)

प्रश्न 13.
प्रतापः बहुशौर्यं प्रदर्शितवान्। (प्रताप ने बहुत शूरवीरता दिखाई।)
उत्तरम्:
कः बहुशौर्यं प्रदर्शितवान्? (किसने बहुत शूरवीरता दिखाई?)

प्रश्न 14.
प्रतापः पराजयं न स्वीकृतवान्। (प्रताप ने पराजय स्वीकार नहीं की।)
उत्तरम्:
प्रताप: किं ने स्वीकृतवान्? (प्रताप ने क्या स्वीकार नहीं किया?)

प्रश्न 15.
इदं बहुचिन्ता कारणमासीत्। (यह बहुत चिन्ता का कारण था।)
उत्तरम्:
इदं कस्याः कारणमासीत्। (यह किसका कारण था?)

प्रश्न 16.
सः प्रतापं निकषा गत्वा उवाच। (वह प्रताप के पास जाकर बोला।)
उत्तरमू:
सः के निकषी गत्वा उवाच? (वह किसके पास जाकर बोला?)

प्रश्न 17.
देशरक्षार्थं मया अर्जितं धनम्। (देशरक्षा के लिए मेरे द्वारा धन अर्जित किया गया है।)
उत्तरम्:
कस्मात्त्वया अर्जितं धनम्? (तुम्हारे द्वारा यह धन किस कारण से इकट्ठा किया गया है?)

प्रश्न 18.
स्वातन्त्र्यप्रेमिणः तस्य शौर्यगाथा गायन्ति। (स्वातन्त्र्यप्रेमी उसकी वीरगाथा का गान करते हैं।)।
उत्तरम्:
के तस्य शौर्यगाथां गायन्ति? (कौन उसकी वीरगाथा का गान करते हैं?)

प्रश्न 19.
प्रतापस्य प्रतिमामिव प्रतापः मेवाड़ राज्ये भ्राज़ते स्म्। (प्रताप की प्रतिमा की तरह प्रताप मेवाड़ राज्य में चमकते थे।)
उत्तरम्:
कस्य प्रतिमामिव प्रतापः मेवाड़ राज्ये भ्राजते स्म:? (किसकी प्रतिमा की तरह प्रताप मेवाड़ राज्य में चमकते थे।)

प्रश्न 20.
जगति महर्ती प्रसिद्धिम् अलभत्। (जगत में महान प्रसिद्धि प्राप्त की।)
उत्तरम्:
कस्यां महतीं प्रसिद्धिं अलभत्? (किसने महान प्रसिद्धि प्राप्त की?)

पाठ-परिचयः
भारतवर्ष हजारों से भी अधिक वर्षों से गुलाम था। विदेशियों के पैरों तले कुचले हुए, गुलामी से दूषित हुए उस समय मुगलवंशियों के शासन में प्रायः राजा लोग बिना युद्ध किए हुए ही मुगलसत्ता के आकाओं की अधीनता स्वीकार करके उन्हीं में संसार के स्वामी का भाव रखते थे। उनकी सेवा में कटिबद्ध रहते हुए स्वदेश की रक्षाव्रत के विरुद्ध ही रहते थे। भारतीय पूरी तरह से निराशा और परमात्मा का आश्रय लेकर जीवनयापन करते थे। उसी अन्धकारमय काल-खण्ड में स्वतन्त्रता की दीपशिखा की तरह, आत्मगौरव की मूर्ति की तरह, प्रताप की प्रतिमा की तरह महाराणा प्रताप मेवाड़ राज्य में चमक रहे थे।

प्रताप भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में स्वतन्त्रता के अनुपम योद्धा के रूप में स्मरण किए जाते हैं। अपने 25 वर्ष के शासन काल में मुगलों के साथ अनेक बार युद्ध किया। जीवन में अनेकों विपरीत परिस्थितियों द्वारा संन्तप्त किए जाते हुए भी कभी भी पराजय अथवा दीनता प्रदर्शित नहीं की। प्रस्तुत पाठ प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप का परिचय प्रदान करता है। जिससे छात्र उसके जीवन से प्रेरणा प्राप्त करें।

मूलपाठ, शब्दार्थ एवं हिन्दी अनुवाद

1. उत्सर्गपरम्परायाः उद्भवभूमि, प्रतापस्य पुण्यभूमि, ‘मेवाड़’ राज्यं को न जानाति? इदं राज्यं शूराणां शौर्येण, यूनाम् आत्माहुत्या सतीनाञ्च’जौहर’ परम्पराया विश्वस्मिन् जगति महतीं प्रसिद्धिम् अलभत्। मेवाड़राज्यस्य सिसोदियावंशे बप्पारावल-राणाहमीर-राणासांगा प्रभृति-वीराणां सुदीर्घा परम्परा विद्यते। अस्यामेव परम्परायां महाराणाप्रतापसिंहस्य जन्म विक्रमस्य 1597 तमे वर्षे (1540 ईसवीयाब्दे) ज्येष्ठ शुक्लतृतीयायाम् अभवत्। प्रतापः बाल्यकालादेव वीरयोद्धा, कुशलसेनानी, धीरनायकश्च आसीत्। पितुः उदयसिंहस्य अनन्तरं ‘प्रतापः’ महाराणापदवीं प्राप्य स्ववयसः 32 तमे वर्षे मेवाड़राज्यसिंहासनम् आरूढवान्। तस्य राज्याभिषेकः ‘गोगुन्दा’ ग्रामे अभवत्।

शब्दार्थाः-उत्सर्गपरम्परायाः = त्याग की परम्परा की। उद्भवभूमि = उत्पत्तिस्थान। शूराणाम् = शूरवीरों के। यूनाम् =युवकानाम् (जवानों के)। आत्माहुत्या = बलिदानेन (बलिदान से)। जगति = संसारे। कुशलसेनानी =निपुण सेनापति। सुदीर्घा =लम्बी। अनन्तरं =पश्चात्। स्ववयसः = अपनी उम्र के।

हिन्दी अनुवादः-त्याग की परम्परा की उद्गम भूमि, प्रताप की पावन भूमि मेवाड़ राज्य को कौन नहीं जानता। यह राज्य शूरवीरों के शौर्य से, जवानों के बलिदानों से, सतियों की जौहर परम्परा से इस सारे संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ। मेवाड़ राज्य के सिसोदिया वंश में बप्पारावल, राणाहमीर, राणासांगा आदि वीरों की एक लम्बी परम्परा है। इसी परम्परा में महाराणा प्रताप सिंह का जन्म विक्रम के 1597वें वर्ष में (1540 ईसवी वर्ष में) ज्येष्ठ शुक्ला तृतीया को हुआ। प्रताप बचपन से ही वीर योद्धा, कुशल सेनापति और धीर नायक थे। पिता उदयसिंह के पश्चात् प्रताप महाराणा पदवी को प्राप्त कर अपनी आयु के 32वें वर्ष में मेवाड़ राज्य के सिंहासन पर आरूढ़ हुए (बैठे)। उसका राज्याभिषेक गोगुन्दा गाँव में हुआ।

व्याकरणिक बिन्दवः-आत्माहुत्या = आत्मनः आहुत्या (षष्ठी तत्पुरुष) प्राप्य = प्र + आप् + ल्यप्। आरूढ़वान् = आ + रूह् + क्तवतु। प्रसिद्धिम् = प्र + सिध् + क्तिन्।

2. तस्मिन् काले उत्तरभारते मुगलवंशीयानां शासकानां शासनम् आसीत्। राजानः तत्सेवामेव स्वकर्त्तव्यं मन्यमानाः देशरक्षाकर्तव्याद् सर्वथा विमुखाः आसन्। मुगलशासकस्य साहाय्यं विधाय आत्मगौरवं मन्यन्ते स्म। शत्रुभिः सह दीर्घकालीनानां युद्धानां कारणेन मेवाड़राज्य-स्थितिः समीचीना न आसीत्। यद्यपि प्रतापस्य पिता महाराणा उदयसिंहः प्रतापी राजा आसीत्, किन्तु परिस्थितिवशात् चित्तौड़ादिस्थानानि आक्रान्तृभिरधिगृहीतानि। अतएव सिंहासनमधिरूढः प्रतापः हस्तच्युतान् प्रमुखदुर्गान् प्राप्तुं चिन्तनमारेभे। प्रथमं सः स्वस्वामिभक्तसामन्तानां स्थानीयभिल्लजनानां च सभाम् आकारितवान्। तत्रैव सः प्रतिज्ञां कृतवान्-‘यावत् अहं हस्तच्युतान् स्वराज्यभागान् पुनः न प्राप्स्यामि, तावत् सुवर्णपात्रेषु भोजनं न करिष्यामि, राजप्रासादे वासं न करिष्यामि, मृदुतल्पे च शयनं न करिष्यामि।”

शब्दार्था:-विमुखाः = पराङ्मुखाः (विपरीत/विमुख हुए)। साहाय्यम् = सहायताम् (सहायता को)। विधाय = करके। आक्रान्तृभिः = आक्रमण करने वालों के द्वारा। अधिगृहीतानि = आत्मवशीकृतानि (कब्जे में करा लिए)। आरेभे = आरब्धवान् (आरम्भ किया)। भिल्लजनानां = भीलों की। आकारितवान् = आहूतवान् (बुला लिया)। हस्तच्युतान् = स्वनियन्त्रणात् वियुक्तान् (अपने हाथ से निकले हुए)। मन्यमानाः = मत्वा (मानते हुए)। विधाय = कृत्वा (करके)। आत्मगौरवम् = स्वकीया महनीयता (अपना गौरव)। समीचीना = समुचिता, शुद्धा (उचित, अच्छी)। आक्रान्तृभिः = आक्रमणकारैः (आतंककारियों द्वारा)। शमनं = स्वपनम् (सोना)। अधिगृहीतानि = अधिकारे गृहीतानि (अधिकार में ले लिए)। मृदुतल्पे = सुकोमले आस्तरणे (कोमलगद्दे)।

हिन्दी अनुवादः-उस समय उत्तर भारत में मुगलवंशियों शासकों का राज्य था। राजा उसकी सेवा को ही अपना कर्तव्य

मानते हुए देश रक्षा के कर्तव्य से पूरी तरह विमुख थे। मुगल शासक की सहायता करके आत्मगौरव मानते थे। शत्रुओं के साथ लम्बे समय तक युद्धों के कारण मेवाड़ राज्य की स्थिति अच्छी नहीं थी। यद्यपि प्रताप के पिता महाराणा उदयसिंह प्रतापी राजा थे। किन्तु परिस्थितिवश चित्तौड़ आदि स्थान आक्रमणकारियों ने अधिकार में कर लिए थे। इसलिए सिंहासन पर आरूढ़ प्रताप ने हाथ से निकले प्रमुख किलों को प्राप्त करने का चिन्तन आरम्भ किया। सबसे पहले उसने अपने स्वामिभक्त सामन्तों और स्थानीय भील लोगों की सभा बुलाई। वहीं उसने प्रतिज्ञा की-जब तक मैं हाथ से (अधिकार से) निकले अपने राज्य के भागों को फिर से प्राप्त नहीं कर लूंगा, तब तक सोने के थालों में भोजन नहीं करूंगा, राजमहल में निवास नहीं करूंगा, कोमल गद्दों पर शयन नहीं करूंगा।’

व्याकरणिक बिन्दवः-देशरक्षा = देशस्य रक्षा (षष्ठी तत्पुरुष)। विधाय = वि + धा + ल्यप्। आत्मगौरवम् = आत्मनः गौरवम्।

3. प्रतापस्य राज्यकाले ‘अकबर’ इति नामकः मुगलशासकः आसीत्। अकबरस्य सेनया सह प्रतापस्य अनकेवारं युद्धम् अभवत्। मुख्ययुद्धम् हल्दीघाटीस्थाने अभवत्, अतएव एतत् ‘हल्दीघाटीयुद्धम्’ इति नाम्ना प्रसिद्धमस्ति। अस्मिन् युद्धे प्रतापः ‘चेतक’ इति नामके अश्वे आरुह्य बहुशौर्यं प्रदर्शितवान्। प्रतापस्य सेना पर्वतीययुद्धेषु कुशला आसीत्। अतएव मुगलसेनायाः अतिक्षतिः जाता। मुगलसेना स्थानीयजनानां विरोधकारणेन परावर्तिता। अस्मिन् युद्धे प्रतापस्य राज्येऽपि जनक्षतिः धनक्षतिश्च संजाता। तस्य सेनाऽपि धनाभावे विघटिता। परं प्रतापः कदापि पराजयं न स्वीकृतवान्। अरण्यगुहाप्रदेशेषु उषित्वा स्वसंकल्पसिद्धये सैन्यसंग्रहणम् उपाक्रमत। सैन्यसंग्रहणं तत्प्रशिक्षणं च बहुवित्तसाध्यं कार्यम्।।

शब्दार्थाः-अतिक्षतिः = अत्यधिक हानि। विघटिता = विश्रृंखलिता (बिखर गई)। अरण्यगुहाप्रदेशेषु = गुफा एवं वन क्षेत्रों में। उषित्वा = निवासं कृत्वा (रहकर)। उपाक्रमत = अकरोत् (किया)। बहुवित्तसाध्यम् = बहुधनेन साधनीयम् (बहुत धन से सिद्ध होने वाला कार्य)। राज्यकाले = शासनसमये (शासनकाल में)। प्रसिद्धम् = ख्यातम् (विख्यात)। आरुह्य = आरूढं भूत्वा (चढ़कर)। क्षतिः जाता = हानिः अभवत् (हानि हो गई)। परावर्तिता = प्रत्यागता (लौट गई, वापिस चली गई)। कुशला = प्रवीणा, समर्था (कुशल)। स्वयंसंकल्पसिद्धये = आत्मनः दृढताया: सफलताया कृतेः (अपनी दृढ़ता की सफलता के लिए।)

हिन्दी अनुवादः–प्रताप के राज्यकाल में अकबर नाम का मुगल बादशाह था। अकबर की सेना के साथ प्रताप का अनेक बार युद्ध हुआ। मुख्य युद्ध हल्दी घाटी नाम के स्थान पर हुआ। इसलिए यह हल्दीघाटी युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। इस युद्ध में प्रताप ने चेतक-नाम के घोड़े पर चढ़कर बहुत शौर्य प्रदर्शित किया। प्रताप की सेना पर्वतीय युद्धों में कुशल (निपुण) थी। अतः मुगल सेन्म की अधिक हानि हुई। मुगल सेना स्थानीय लोगों के विरोध के कारण लौट गई। इस युद्ध में प्रताप के राज्य में भी जन-धन की हानि हुई। उसकी सेना भी धन के अभाव में बिखर गई। लेकिन प्रताप ने कभी भी पराजय स्वीकार नहीं की। जंगल और गुफाओं में निवास करके अपनी संकल्पसिद्धि के लिए सेना का संग्रह किया। सैन्य संग्रह करना और उसको प्रशिक्षित करना अधिक धन से सिद्ध होने वाला कार्य था।

व्याकरणिक बिन्दवः-अनकेवारं = नैकवारम् (नञ् तत्पुरुष) मुख्ययुद्धम् = मुख्यं च तत् युद्धम् (कर्मधारय) उषित्वा = वस् + त्वा। स्वीकृतवान् = स्वी + कृ + तवतु (पु.) जाता = जन् + क्त + टाप्।।

4. महता दारिद्र्येण परितप्यमानस्य प्रतापस्य इदमेव बहुचिन्ताकारणमासीत्। प्रतापस्य चिन्तां विभाव्य ‘भामाशाह नामा कश्चित् श्रेष्ठी किमपि महत्कार्यं कर्तुं कालः समायातः इति भावितवान्। सः प्रतापं निकषा गत्वा उवाच-“प्रभो! अहं भवद्वंशस्य सेवकः, मम हस्ते प्रभूतं धनं विद्यते। तेन भवान् पञ्चविंशतिसहस्रसैनिकान् द्वादशवर्षपर्यन्तं पालयितुं प्रभविष्यति” इति। तदा प्रतापः उवाच-“अहं नैतद्धनं स्वीकर्तुं शक्नोमि, एतद् धनं भवता अर्जितमस्ति।” तदा भामाशाहः प्रावोचत्-‘नैतद्धनं परकीयम्। देशरक्षार्थं मया अर्जितमिदं धनं यदि सहायकं भवेत् तर्हि मम जीवन सार्थक भविष्यति” इति। भामाशाहस्य वचनं श्रुत्वा प्रतापस्य मनः असीमसान्त्वानाम् आप्तवान्।

शब्दार्थः-परितप्यमानस्य = संतापितस्य (संतापित का)। श्रेष्ठी = सेठ। भावितवान् = विचारितवान् (विचार किया)। प्रभविष्यति = समर्थो भविष्यति (समर्थ होंगे)। विभाव्य = समझकर। निकषा = समीपम्। असीमसान्त्वानाम् = अपार सान्त्वनां (संतुष्टि पाकर)। दारिद्रयेण = दरिद्रता से। उवाच = अवदत् (बोला)। प्रभूतं धनं = पर्याप्तं धनम् (पर्याप्त धन)। परकीयम् = अन्याय, अपरस्य (दूसरे का)। अर्जितम् = उपार्जितम् (पैदा किया)। आप्तवान् = प्राप्त किया।

हिन्दी अनुवादः-महान दरिद्रता से सन्तप्त होते हुए प्रताप का यह चिन्ता का बहुत बड़ा कारण हो गया। प्रताप की चिन्ता को समझकर भामाशाह नाम के किसी सेठ ने ‘कुछ महान कार्य करने का समय आ गया है’, ऐसा विचार किया। वह प्रताप के पास जाकर बोला-”स्वामी, मैं तुम्हारे वंश का सेवक हूँ, मेरे पास बहुत-सा धन है। उससे आप पच्चीस हजार सैनिकों को बारह वर्ष तक पालने में समर्थ हो।” प्रताप बोली-“मैं यह धन स्वीकार नहीं कर सकता, यह धन आपको अर्जित किया हुआ है।” तब भामाशाह बोला-“यह धन पराया नहीं है। देश रक्षा के लिए मेरे द्वारा अर्जित किया हुआ यह धन यदि सहायक हो तो जीवन सार्थक हो जायेगा। भामाशाह का वचन सुनकर प्रताप का मन असीम सान्त्वना को प्राप्त हुआ।

व्याकरणिक-बिन्दवः-दारिद्रय = दरिद्र + ष्यञ्। महत्कार्यम् = महत् च तत् कार्यम्। कर्तुम् = कृ + तुमुन्। समायांतः = सम् + आ + या + क्त। नैतद्धनम् = न + एतत् + धनम्।

5. तेन पुनः सैन्यशक्तिसंग्रहकार्यम् आरब्धम्, महासैन्यं स रचयामास। तया सेनया च मुगलशासनं प्रति स्वातन्त्र्ययुद्धं प्रारभत। स्वराज्यहस्तच्युतान् अनेकभागान् पुनः हस्तगतान् कृतवान्। तेषु मोही, गोगुन्दा, उदयपुरम् इत्यादयः मुख्याः आसन्। स्वराज्ये शान्ति संस्थाप्य ‘चावण्ड’ नामक स्थानं स्वराजधानीम् अकरोत्। तस्मिन् काले ‘चावण्ड’ स्थानं स्थापत्यकलायाः, ललितकलायाः, वाणिज्यस्य, विद्यायाश्च प्रमुखकेन्द्रम् आसीत्। अन्ते असावधानतया पादे धनुष्-प्रत्यञ्चाघातेन प्रतापोऽस्वस्थोऽभवत्। 1597 तमे ईस्वीयाब्दे प्रतापः दिवङ्गतः। प्रतापः महान् सेनानायकः, जननायकः, व्यवस्थापकः संघटनकर्ता च आसीत्। भारतवासिनः अधुनापि तस्य स्वातन्त्र्यप्रेमिणः शौर्यगाथा गायन्ति।

शब्दार्थाः-आरब्धम् = आरम्भ किया। प्रारभत = प्रारंभ किया। हस्तच्युतान् = हाथ से छूटे, हाथ से निकले हुए। संस्थाप्य = स्थापित करके। तस्मिन्काले = उस समय। असावधानतया = असावधानीवश। धनुष्-प्रत्यक्षाघातेन = धनुष की डोरी की चोट से।

हिन्दी अनुवादः-उसने (प्रताप ने) फिर से सैन्य शक्ति के संग्रह का कार्य आरम्भ किया और महान सेना की रचना की। और उस सेना से मुगल शासन के विरुद्ध स्वतन्त्रता का युद्ध आरम्भ किया। अपने राज्य के अनेक हाथ से निकले हुए भागों को फिर हस्तगत किया। उनमें मोही, गोगुन्दा, उदयपुर इत्यादि मुख्य थे। अपने राज्य में शान्ति की स्थापना करके चावण्ड नामक स्थान को अपनी राजधानी बनाया। उस समय चावण्ड स्थान स्थापत्य कला, ललितकला, व्यापार और विद्या का प्रमुख केन्द्र था।

अन्त में असावधानी से पैर में धनुष की डोरी के आघात से प्रताप अस्वस्थ हो गया। 1597 वें इस्वी वर्ष में प्रताप स्वर्ग सिधार गया। प्रताप महान सेनापति, जननायक, व्यवस्थापक और संघटनकर्ता था। भारतवासी आज भी उस स्वतन्त्रता प्रेमी की शौर्य गाथा गाते हैं।

व्याकरणिक बिन्दवः-आरब्धम् = आ + रेभ् + क्त। महासैन्यम् = महत् च तत् सैन्यम् कर्मधारय। मुगलशासनम् = मुगलानां शासनम् (ष. तत्पुरुष) हस्तच्युतान् = हस्तात् च्युतानाम् (पंचमी तत्पुरुष) शान्तिम् = शम् + क्तिन्। संस्थाप्य = सम् + स्था + णिच् + ल्यप्। दिवम् गतः = इति दिवङ्गत (द्वितीया तत्पुरुष)।