वस्तुनिष्ठ – प्रश्नाः

1. अस्माकं करणीयं किमस्ति
(अ) निर्धनाना साहाय्यम्
(आ) रोगिणां सेवा
(इ) ज्ञानस्य धनस्य च दानम्
(ई) लोकहितम्

2. अस्माभिः कुत्र ने शयनीयम्
(अ) सुखशय्यायाम्
(आ) शरशय्यायाम्
(इ) परशय्यायाम्
(ई) तृणशय्यायाम्

3. लोकहिताय कदा जागरणीयम्
(अ) दिने
(आ) रात्रौ
(इ) अहर्निशम्
(ई) अन्येषु सुप्तेषु जागरणीयम्

4. कुत्र तरणीयम्
(अ) दु:खसागरे
(आ) दुस्तरसागरे
(इ) सुखसागरे
(ई) गंगासागरे

5. अस्मिन् गीते आहत्य कति अनीयर्-प्रत्ययान्तानि – (स्मरणीयम् इत्यादीनि) पदानि प्रयुक्तानि
(अ) दश
(आ) पञ्चदश
(इ) षोडश
(ई) सप्तदश

उत्तराणि:

1. (ई)
2. (अ)
3. (ई)
4. (अ)
5. (ई)

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 7 लोकहितं मम करणीयम्ल घूत्तरात्मक – प्रश्नाः

प्रश्न 1.
त्वरणीयम्, तरणीयम् च इत्यनयोः द्वयो कः अर्थभेदः? – (त्वरणीयम् और तरणीयम् शब्दों में क्या अर्थ-भेद है?)
उत्तरम्:
त्वरणीयम् = त्वरया करणीयम्, तरणीयम् = तीर्वा पारं करणीयम्। (त्वरणीयम् = जल्दी करना चाहिए, तरणीयम् = तैरकर पार करना चाहिए।)

प्रश्न 2.
अस्माभिः कुत्र सञ्चरणीयम्? – (हमें कहाँ संचार करना चाहिए?)
उत्तरम्:
यत्र बन्धु जनाः गहनारण्ये च घनान्धकारे गवरे स्थिताः सन्ति तत्र सञ्चरणीयम्। (जहाँ भाई लोग गहन वन में और सघन अन्धकार की कन्दरा में स्थित हों, वहाँ संचरण करना चाहिए।)

प्रश्न 3.
अधोलिखित-पदानां पर्यायपदं पाठात् अन्विष्य लिखन्तु – (निम्नलिखित पदों के पर्यायवाची पद पाठ से ढूँढ़कर लिखिए-)
उत्तरम्:
RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 7 1

प्रश्न 4.
स्थूलपदमाधृत्य प्रश्न-निर्माणं कुर्वन्तु – (मोटे पदों के आधार पर प्रश्न-निर्माण कीजिए-)

(i) अहर्निशं जागरणीयम्।
उत्तरम्:
कदा जागरणीयम्?

(ii) न जातु दुःखं गणनीयम्।
उत्तरम्:
न जातु किं गणनीयम् ?

(iii) न भोगभवने रमणीयम्।
उत्तरम्:
कुत्र न रमणीयम्?

(iv) मनसा सततं स्मरणीयम्।
उत्तरम्:
केन सततं स्मरणीयम्?

प्रश्न 5.
संस्कृतेन वाक्यं निर्माण (अधोदत्त-पदानि प्रयुज्य) कुर्वन्तु – (संस्कृत में वाक्य बनाइये (नीचे के पदों का प्रयोग करना चाहिए-)
(i) अहर्निशं
(ii) तत्र
(iii) न जातु
उत्तरम्:
(i) सः अहर्निशं अध्ययने रतः तिष्ठति।
(ii) बालकः यत्र निवसति तत्र एव पठति।
(iii) न जातु असत्यं वदेत्।

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 7 लोकहितं मम करणीयम्नि बन्धात्मक – प्रश्नाः

प्रश्न 1.
‘गहनारण्ये ….. करणीयम्’ इत्यस्य श्लोकस्य हिन्द्या अनुवादः करणीयः।
(‘गहनारण्ये ….. करणीयम्’ इस श्लोक का हिन्दी अनुवाद कीजिए।)
उत्तरम्:
अन्तिम पद्य का सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद देखें।

RBSE Class 10 Sanskrit स्पन्दन Chapter 7 लोकहितं मम करणीयम् अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तराणि

अधोलिखितप्रश्नानां संस्कृतभाषया पूर्णवाक्येन उत्तरम् – (निम्नलिखित प्रश्नों का संस्कृत भाषा में पूर्णवाक्य में उत्तर दीजिए-)

प्रश्न 1.
अस्माभिः मनसो कि स्मरणीयम्? (हमें मन से क्या याद करना चाहिए?)
उत्तरम्:
अस्माभिः मनसा, सततं स्मरणीयं यत् लोकहितं मम करणीयम्। (हमें मन से निरन्तर यह सोचना चाहिए कि लोक-कल्याण मेरा कर्तव्य है।)

प्रश्न 2.
‘लोकहितं मम करणीयम्’ इति केन वदनीयम्? (‘लोकहित मेरा कर्तव्य है’ ऐसा किससे बोलना चाहिए?)
उत्तरम्:
‘लोकहितं मम करणीयम्’ इति वचसा वदनीयम्। (‘लोकहित मेरा कर्तव्य है’ ऐसा वाणी से बोलना चाहिए)।

प्रश्न 3.
कुत्र न रमणीयम्? (कहाँ रमण नहीं करना चाहिए?)
उत्तरम्:
भोगभवने न रमणीयम्। (भोगों के भवनों में रमण नहीं करना चाहिए।)

प्रश्न 4.
शयनं कुत्र ने करणीयम्? (शयन कहाँ नहीं करना चाहिए?)
उत्तरम्:
सुखशयने शयनं ने करणीयम्। (सुखद शयन पर नहीं सोना चाहिए।)

प्रश्न 5.
अहर्निशं किं करणीयम्? (दिन-रात क्या करना चाहिए?)
उत्तरम्:
अहर्निशं जागरणीयम्। (दिन-रात जागना चाहिए।)

प्रश्न 6.
मम करणीयम् किम्? (मेरा करने योग्य क्या है?)
उत्तरम्:
मम करणीयं लोकहितम्। (मेरा करने योग्य जन-कल्याण है।)

प्रश्न 7.
किं ने गगनीयम्: (क्या नहीं गिनना चाहिए?)
उत्तरम्:
दु:खं न गणनीयम्। (दु:ख को नहीं गिनना चाहिए।)

प्रश्न 8.
किं न मननीयम्? (किसका मनन नहीं करना चाहिये?)
उत्तरम्:
निज सौख्यं न मननीयम्। (अपने सुख का मनन नहीं करना चाहिए।)

प्रश्न 9.
कस्य क्षेत्रे त्वरणीयम्? (किसके क्षेत्र में जल्दी करनी चाहिए?)
उत्तरम्:
कर्मणः क्षेत्रे त्वरणीयम्। (कर्मक्षेत्र में जल्दी करनी चाहिए।)

प्रश्न 10.
कस्मिन् तरणीयम्? (किसमें तैरना चाहिए?)
उत्तरम्:
दु:खसागरे तरणीयम्। (दु:ख के सागर में तैरना चाहिए।)

प्रश्न 11.
कुत्र चरणीयम्? (कहाँ चलना चाहिए?)
उत्तरम्:
कष्ट पर्वते चरणीयम्। (कष्टों के पर्वत पर चलना चाहिए।)

प्रश्न 12.
कुत्र भ्रमणीयम्? (कहाँ भ्रमण करना चाहिए?)
उत्तरम्:
विपत्ति-विपिने भ्रमणीयम्। (विपत्तियों के वन में भ्रमण करना चाहिए।)

प्रश्न 13.
बन्धुजनाः कुत्र स्थिताः सन्ति? (बन्धुजन् किस कन्दरा में स्थित हैं?)
उत्तरम्:
बन्धुजनाः गहनारण्ये घनान्धकारे गह्वरे स्थिताः सन्ति। (बन्धुजन गहरे जंगल में घने अँधेरे में कन्दरा में स्थित हैं।)

प्रश्न 14.
‘लोकहितं मम करणीयम्’ इति गीतं केन रचितम्? (लोकहितं मम करणीयम्’ यह गीत किसके द्वारा रचा गया है?)
उत्तरम्:
‘लोकहितं मम करणीयम्’ इति गीत डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर महोदयेन रचितम्। (‘लोकहितं मम करणीयम्’ गीत डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर महोदय द्वारा रचित है।)

प्रश्न 15.
गीतमिदं कस्मिन् रागे निबद्धम् अस्ति? (यह गीत किस राग में निबद्ध है?)
उत्तरम्:
गीतमिदं हिन्दोल रागे निबद्धमस्ति। (यह गीत हिन्दोल राग में निबद्ध है।)

स्थूलपदमाधृत्यं प्रश्ननिर्माणं कुरुत – (मोटे पदों के आधार पर प्रश्न निर्माण कीजिए-)

प्रश्न 1.
मनसा सततम् स्मरणीयम्। (मन से निरन्तर याद करना चाहिए)।
उत्तरम्:
मनसा कथम् स्मरणीयम्? (मन से कैसे याद करना चाहिए?)

प्रश्न 2.
वचसा सततं वदनीयम्। (वाणी से निरन्तर बोलना चाहिए।)
उत्तरम्:
केन सततं वदनीयम्? (किससे निरन्तर बोलना चाहिए?)

प्रश्न 3.
भोगभवने न रमणीयम्। (भोगभवन में रमण नहीं करना चाहिए।)
उत्तरम्:
कुत्र न रमणीयम्? (कहाँ रमण नहीं करना चाहिए?)

प्रश्न 4.
सुखशयने न शयनीयम्। (सुख शयन पर सोना नहीं चाहिए।)।
उत्तरम्;
सुख शयने कि न करणीयम्? (सुखद शयन पर क्या नहीं करनी चाहिए?)

प्रश्न 5.
अहर्निशं जागरणीयम्। (दिन-रात जागना चाहिए)।
उत्तरम्:
कदा जागरणीय? (कब जागना चाहिए?)

प्रश्न 6.
न जातु दुःख गणनीयम्। (दु:ख कदापि नहीं गिनना चाहिए)।
उत्तरम्:
किं न जातु गणनीयम्? (कदाचित क्या नहीं गिनना चाहिए?)

प्रश्न 7.
निजसौख्यं न मननीयम्। (अपना सुख नहीं सोचना चाहिए)।
उत्तरम्:
किम् न मननीयम्? (क्या नहीं सोचना चाहिए?)

प्रश्न 8.
कार्य-क्षेत्रे त्वरणीयम्। (कार्यक्षेत्र में शीघ्रता करनी चाहिए)।
उत्तरम्:
कस्य क्षेत्रे त्वरणीयम्? (किसके क्षेत्र में जल्दी नहीं करनी चाहिए?)

प्रश्न 9.
दुःखसागरे तरणीयम्। (दु:ख के सागर में तैरना चाहिए।)
उत्तरम्:
कस्मिन् तरणीयम्? (किसमें तैरना चाहिए?)

प्रश्न 10.
कष्टपर्वते चरणीयम्। (कष्टों के पर्वत पर चलना चाहिए।)
उत्तरम्:
कस्य पर्वते चरणीयम्? या केषां पर्वते चरणीयम्? (किनके किसके पर्वत पर विचरण करना चाहिए?)

प्रश्न 11.
विपत्ति-विपिने भ्रमणीयम्। (विपत्ति के वन में भ्रमण करना चाहिए।)
उत्तरम्:
विपत्ति विपिने किं करणीयम्। (विपत्ति के वन में क्या करना चाहिए?)

प्रश्न 12.
बन्धुजनाः स्थिता: गह्वरे। (बंधुजन कन्दरा में स्थित हैं।)
उत्तरम्:
बन्धु जना: कुत्र स्थिता। (भाई-बन्धु कहाँ स्थित है?)

पाठ-परिचयः

प्राचीनकाल में सम्पूर्ण भारत में बच्चों से लेकर वृद्धों तक संस्कृत वाणी का प्रसार था। इसके बाद बहुत समय तक उत्तरोत्तर घटती हुई यह क्षीण हो गई। आजकल फिर यह कुछ बढ़ती हुई नजर आती है। पहले कभी यहाँ भारत में निरन्तर प्रवाहित होती हुई यह संस्कृतरूपी गङ्गा फिर से लोकहित के लिए देवलोक से अवतरित करनी चाहिए। ऐसी बुद्धि से अर्थात् ऐसा सोचकर अनेक भगीरथ प्रयत्नशील हैं और उससे चारों दिशाओं में संस्कृत-जगत् में कुछ हलचल और स्फुरण देखा जाता है। संस्कृत के अनुकूल वातावरण का निर्माण आरम्भ हो चुका है। बहुत समय के उपरान्त विद्यालयों में पढ़ते हुए छोटे-छोटे बालक भी वहाँ-तहाँ संस्कृत में संभाषण करते नजर आते हैं। बच्चों के आकर्षण के लिए संस्कृत गीत भी एक सरल उपाय है। उससे संस्कृत भाषा का संस्कार भी अनायास हो जाता है। कुछ विगत वर्षों में अनेक प्रकार के नये संस्कृत गीत रचे गये। इस पाठ में अत्यन्त सरल भाषा के माध्यम से और सरल शैली से एक संस्कृत गीत प्रस्तुत किया जा रहा है। आओ पढ़ो, सुनो, अभ्यास करो और गाओ, अत्यन्त सरल-तरल और सरस इस गीत को। यह गीत राग हिन्दोल में निबद्ध है।

मूलपाठ, अन्वय, शब्दार्थ, हिन्दी अनुवाद तथा सप्रसंग संस्कृत व्याख्या (हिन्दोल रागः) (आदिताल:)

1. मनसा सततं स्मरणीयम्
वचसा सततं वदनीयम्।
लोकहितं मम करणीयम्॥ (लोकहितं) ॥1॥

अन्वयः- (मानवः सदैव) मनसा सततं स्मरणीयं, वचसा सततं वदनीयं (यत्) लोकहितम् (एव) मम करणीयम्।।

शब्दार्था:-मनसा = हृदयेन (हृदय से, मन से)। सततम् = निरन्तरं (लगातार)। स्मरणीयम् = स्मरणं करणीयम् (याद करना चाहिए)। यत् = कि। लोकहितं = जन-कल्याणम् एव (जन कल्याण हीं)। मम = मे (मेरा/मेरे लिए)। करणीयम् = कर्तव्यम् (करने योग्य है या करना चाहिए)। वचसी = वाण्या (वाणी से)। वदनीयम् = वदेत् (बोलना चाहिए)।

हिन्दी-अनुवादः-मनुष्य को सदैव मन से निरन्तर याद करना चाहिए, वाणी से निरन्तर (यही), बोलना चाहिए (कि) जन-कल्याण ही हमारा कर्तव्य है, अर्थात् करने योग्य है।

♦ सप्रसंग संस्कृत व्यारव्या
प्रसङ्गः-गीतमिदम् अस्माकं ‘स्पन्दना’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘लोकहितं मम करणीयम्’ इति पाठात् उद्धृत्। गीतमिदं डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर महोदयेन विरचितम्। गीतेऽस्मिन् कविता मानवीय करणीयम् निर्दिष्टम्।

(यह गीत हमारी ‘स्पन्दना’ पाठ्य-पुस्तक के ‘लोकहितं मम करणीयम्’ पाठ से लिया गया है। यह गीत डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर द्वारा रचित है। इस गीत में कवि द्वारा मानव को कर्तव्यों को निर्दिष्ट किया है–)

व्याख्याः – मानवः सदैव निरन्तरमेव हृदयेन स्मरणं कुर्यात्, वाण्या निरन्तरम् इदमेव वक्तव्यं यत्-यत् लोक कल्याणं (जन कल्याणम्) एव मे कर्तव्यम्।

(मानव को सदैव लगातार मन से याद करना चाहिए, वचनों से बोलना चाहिए कि जन कल्याण ही मेरे करने योग्य (कर्तव्य) हैं।)

व्याकरणिक-बिन्दवः-मरणीयम् = स्मृ। अनीयर्, वदनीयम् – वद्+अनीयर्। करणीयम् = कृ+अनीयर्। लोकहितम् = लोकस्य हितम् (षष्ठी तत्पुरुष समास)।

2. न भोगभवने रमणीयम्
न च सुखशयने शयनीयम्।।
अहर्निशं जागरणीयम्.
लोकहितं मम करणीयम् ॥ (मनसा) ॥2॥

अन्वयः-(मानवेन, भोग-भवने न रमणीयम्, न च सुख शयने शयनीयम् अहर्निशं जागरणीयं (यत:) लोकहितम् एव मम करणीयम्।।

शब्दार्था:-भोगभवने = भौतिकभोगैः युते भवने (भौतिक भोगों/सुविधाओं से युक्त भवन में)। शयनीयम् = सुप्यात् (सोना चाहिए)। अहर्निशम् = दिवा रात्रि (दिन-रात)। जागरणीयम् = जागृयात् (जागना चाहिए)।

हिन्दी-अनुवादः-मनुष्य को सुख-सुविधाओं (भोगों) से परिपूर्ण भवनों में रमण नहीं करना चाहिए। सुखद शयन (पलंग) पर नहीं सोना चाहिए। दिन-रात जागना (सचेत रहना) चाहिए, क्योंकि जनकल्याण ही मेरा कर्तव्य है।

♦ सप्रसंग संस्कृत व्यारव्या
प्रसङ्गः-गीतमिदम् अस्माकं ‘स्पन्दना’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘लोकहितं मम करणीयम्’ इति पाठात् उद्धृत्। गीतमिदं डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर महोदयेन रचितम् अस्ति। अत्र कविः मानवाय करणीयानि निर्दिशति

(यह गीत हमारी ‘स्पन्दना’ पाठ्य-पुस्तक के ‘लोकहितं मम करणीयम्’ पाठ से लिया गया है। यह गीत डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर द्वारा रचित है। यहाँ कवि मानव को करने योग्य कार्यों का निर्देश करता है-)

व्याख्याः -मया भोगोयुते सुखसुविधा युतेन प्रासादे न रमणीय। न च सुखदे शयने शयितव्यम्। दिवसे रात्रौ च सचेत एव यतोहि जन कल्याणम् एव मे कर्तव्यम्।

(मुझे भोगों से युक्त, सुख-सुविधा से युक्त महलों में रमण नहीं करना चाहिए। और न सुखद शय्या पर सोना चाहिए। दिन-रात जागरूक रहना चाहिए या सचेत रहना चाहिए क्योंकि जन कल्याण करना ही मेरा कर्तव्य है।)

व्याकरणिक-बिन्दवः-भोगभवने = भोगानां भवने (ष. तत्पुरुष) रमणीयम् = रम्+अनीयर्। शयनीयम् = शीड्. + अनीयर्। जागरणीयम् = जागृ+अनीयर्।

3. न जातु दुःखं गणनीयम्
न च निजसौख्यं मननीयम्।
कार्य-क्षेत्रे त्वरणीयम् लोकहितं मम करणीयम्॥ (मनसा) ॥3॥

अन्वयः-जातु दु:खं न गणनीयम्, न च निज सौख्यं मननीयम्, (स्व) कार्य-क्षेत्रे त्वरणीयम् यतोहि लोकहितं मम करणीयम्।।

शब्दार्थाः-जातु = कदाचित् (कभी)। गणनीयम् = गणयेत् (गिनना चाहिए)। सौख्यम् = सुखम् (सुख को)। मननीयम् = स्मरणीयम् (मन में लाना चाहिए।) करणीयम् = त्वरा करणीयम् (जल्दी करनी चाहिए)। त्वरणीयम् = शीघ्रमेव करणीयम् (जल्दी करनी चाहिए)।

हिन्दी-अनुवादः-दु:ख को हमें कदाचित् नहीं गिनना चाहिए और न ही अपने सुख का मनन (ध्यान) करना चाहिए। अपने कार्य के क्षेत्र में शीघ्रता करनी चाहिए क्योंकि जन (मानव) कल्याण ही मेरा कर्तव्य है। यही मुझे करना चाहिए।

♦ सप्रसंग संस्कृत व्यारव्या
प्रसङ्गः-गीतमिदम् अस्माकं ‘स्पन्दना’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘लोकहितं मम करणीयम्’ इति पाठात् उद्धृत्। गीतमिदं डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर महोदयेन विरचिता। अत्र कविः मानवं मानवीय कर्तव्यान् प्रति प्रेरयति-

(यह गीत हमारी ‘स्पन्दना’ पाठ्य-पुस्तक के लोकहितं मम करणीयम्’ पाठ से लिया गया है। यह गीत डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर द्वारा रचित है। यहाँ कवि मानव को मानवीय कृत्यों के प्रति प्रेरित करता है-)

व्याख्याः-अस्माभिः स्वकीयं शारीरिक दुःखं कदापि न गणतव्यम्। न च स्वकीयं सुखं एवं स्मरणीयम्। निर्धारित कार्यस्य क्षेत्रे सत्वरं कार्यं करणीयम् यतोहि जनानां कल्याणकरणमेव में साधनीयम्।

(हमें अपने शारीरिक दु:खों को नहीं गिनना चाहिए। नहीं अपने सुख का ही मनन करना चाहिए। निर्धारित कार्य के क्षेत्र में सदैव शीघ्रता करनी चाहिए क्योंकि जनकल्याण करना ही हमारा कर्तव्य है।)

व्याकरणिक-बिन्दवः-गणनीयम् = गण+अनीयर्। सौख्यम् = सुख+ण्यञ्। त्वरणीयम् = त्वर् + अनीयर्।

4. दुःखसागरे तरणीयम्
कष्टपर्वते चरणीयम्। विपत्तिविपिने भ्रमणीयम्।
लोकहितं मम करणीयम्॥ (मनसा) ॥4॥

अन्वयः–दु:ख सागरे तरणीयम्, कष्ट-पर्वते चरणीयम्, विपत्ति-विपिने भ्रमणीयम् लोक-हितं मम करणीयम्।

शब्दार्थाः-दुःख-सागरे = दु:खानाम् सागरे (दु:खों के सागर में)। कष्ट-पर्वते = कष्टानां पर्वते (कष्टों के ढ़ेर)। चरणीयम् = विचरेत् (विचरण करना चाहिए) विपत्ति-विपिने = विपदां-वने (विपत्तियों के जंगल में)। तरणीयम् = तरितव्यम् (तैरना चाहिए)। भ्रमणीयम् = अटनीयम् (भ्रमण करना चाहिए)।

हिन्दी-अनुवादः-मनुष्य को दु:खों के सागर में तैरना चाहिए, कष्टों के पर्वत अर्थात् ढेर पर भी विचरण करना चाहिए, विपत्तियों के जंगल में घूमना चाहिए, मुझे जन-कल्याण करना चाहिए।

♦ सप्रसंग संस्कृत व्यारव्या
प्रसङ्गः-गीतमिदम् अस्माकं ‘स्पन्दना’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘लोकहितं मम करणीयम्’ इति पाठात् उद्धृत्। गीतमिदं डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर महोदयेन विरचिता अस्ति। अत्र गीतिकारः मानवाय साहस-पूर्ण जीवन यापनाय प्रेरयति

(यह गीत हमारी ‘स्पन्दना’ पाठ्य-पुस्तक के लोकहितं मम करणीयम्’ पाठ से लिया गया है। यह गीत डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर द्वारा रचित है। यहाँ गीतकार मानव के लिए साहसपूर्ण जीवनयापन करने की प्रेरणा देता है-)

व्याख्याः -दु:खानां सागरं, समुद्रम् अपि मानवः सुखेन सह पारं कुर्यात्, कष्टानां पीडानां गिरौ अपि विचरेत्, आपदां वने अपि अभीत: सन् भ्रमेत् अर्थात् मानवः दु:खानि, कष्टानि आपदः च उपेक्ष्य अनवरुद्ध एव जीवन यापयेत्। एतेषाम् अवरोधे आगते स्वकार्यात् न विरतो विचलितो भवेत्।।

(दु:खों के समुद्र को भी मनुष्य को सुख से पार करना चाहिए, पीड़ाओं के पहाड़ (ढेर) पर भी विचरण करना चाहिए. विपत्तियों के वन में भी निर्भय होकर भ्रमण करना चाहिए। अर्थात् मानव को दु:ख, कष्ट और आपदाओं की उपेक्षा करके बिना रुके ही जीवनयापन करना चाहिए। इनके अवरोध आने पर अपने कार्य से रुकना या विचलित नहीं होना चाहिए।)

व्याकरणिक-बिन्दवः-दु:ख = सागरे = दु:खानां सागरे (षष्ठी तत्पुरुष)। तरणीयम् = तृ + अनीयर्।

5. गहनारण्ये घनान्धकारे
बन्धुजना ये स्थिता गह्वरे।
तत्र मया सञ्चरणीयम्
लोकहितं मम करणीयम्॥ (मनसा) ॥5॥

अन्वयः-गहन अरण्ये घनान्धकारे ये बन्धुजनाः गवरे स्थिताः तत्र मया सञ्चरणीयम्, लोकहितं मम करणीयम्।।

शब्दार्थाः-गहनारण्ये = गंभीरे, सघने वने (सघन वन में)। घनान्धकारे = प्रगाढ़े तमापि (गहन अँधेरे में)। गह्वरे = गर्ते, कन्दरायाम् (गड्ढे में, गुफा में)। सञ्चरणीयम् = सञ्चारं करणीयम् (संचरण करना चाहिए)। स्थिताः = नियतिता, उथिताः (पड़े हुए हैं)।

हिन्दी-अनुवादः-गहरे अँधेरे में, सघन वन में जो मेरे भाई-बन्धु गड्ढे में पड़े हुए हैं अर्थात् पतित हो गये हैं, वहाँ मुझे सञ्चार करना चाहिए। (विचरण करना चाहिए)। मुझे लोक या जन-कल्याण करना चाहिए।

♦ सप्रसंग संस्कृत व्यारव्या
प्रसङ्गः-गीतमिदम् अस्माकं ‘स्पन्दना’ इति पाठ्यपुस्तकस्य ‘लोकहितं मम करणीयम्’ इति पाठात् उद्धृत्। गीतमिदं डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर महोदयेन विरचितम्। अस्मिन् गीते कविः मानवाय साहसं करुणां च प्रति प्रेरयति

(यह गीत हमारी ‘स्पन्दना’ पाठ्य-पुस्तक के लोकहितं मम करणीयम्’ पाठ से लिया गया है। यह गीत डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर द्वारा रचित है। इस गीत में कवि मनुष्यों को साहस और करुणा की ओर प्रेरित करता है-)

व्याख्याः -मया तत्रापि गमनीयं यत्र मे बहवः बन्धवः दु:खानां सघने कानने वने वा निवसन्ति, प्रगाढ़े अज्ञान अन्धतमसि जीवन यापयन्ति अत: तेषां कष्टानि अपि अपसारणीयानि। यत: मे कर्तव्यं तु जनकल्याणमेव। अत: मया दलितानां कष्टामलानां, अज्ञानाम् च सहाय्यां करणीयम्।

(मुझे वहाँ जाना चाहिए, जहाँ मेरे बहुत से भाई-बन्धु अज्ञान के गहने अन्धकार में जीवनयापन कर रहे हैं। अत: उनके कष्ट भी दूर करने चाहिए क्योंकि जन-कल्याण करना ही मेरा कर्तव्य है।)

व्याकरणिक-बिन्दवः-गहनारण्ये = गहनं च तत् अरण्यं तस्मिन् च (कर्मधारय)। सञ्चरणीयम् = सम् + चर्+अंनीयर्। स्थिताः = स्था+क्त (बहुवचन)