Rajasthan Board RBSE Class 12 Political Science Chapter 23 राज्य स्तरीय एवं स्थानीय शासन, 73वें एवं 74वें संविधान संशोधन के सन्दर्भ में वर्तमान स्वरूप

RBSE Class 12 Political Science Chapter 23 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

RBSE Class 12 Political Science Chapter 23 बहुंचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के अन्तर्गत भारत के राष्ट्रपति, राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति करते हैं?
(अ) अनुच्छेद 154
(ब) अनुच्छेद 155
(स) अनुच्छेद 160
(द) अनुच्छेद 356

प्रश्न 2.
राज्य की वास्तविक कार्यपालिका शक्ति निहित है
(अ) मुख्यमंत्री में
(ब) राज्यपाल में
(स) विधानसभा अध्यक्ष में
(द) नेता प्रतिपक्ष में

प्रश्न 3.
राज्य का संवैधानिक प्रधान है
(अ) वित्तमंत्री
(ब) राज्यपाल
(स) मुख्यमंत्री
(द) विधानसभा अध्यक्ष

प्रश्न 4.
राज्य का मुख्यमंत्री किस अनुच्छेद के अन्तर्गत राज्यपाल को राज्य सम्बन्धी सूचनाएँ देता है
(अ) 167 (1)
(ब) 163 (1)
(स) 162 (1)
(द) 155 (1)

प्रश्न 5.
त्रिस्तरीय पंचायती राज प्रणाली का आरम्भ 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के कौन से जिले में किया गया?
(अ) जोधपुर
(ब) नागौर
(स) झालावाड़
(द) बीकानेर

प्रश्न 6.
कौन – सा इतिहासकार भारतीय गाँवों को गणराज्यों की संज्ञा देता है?
(अ) अल्टेकर
(ब) पणिन्धिकर
(स) जेम्स टॉड
(द) अशोक मेहता

प्रश्न 7.
इनमें से कौन – सी संस्था ग्रामीण स्वशासन से सम्बन्धित नहीं है?
(अ) ग्राम पंचायत
(ब) पंचायत समिति
(स) नगर परिषद्
(द) जिला परिषद्

प्रश्न 8.
पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए एक – तिहाई पद किस संविधान संशोधन के पश्चात् आरक्षित
किए गए?
(अ) 72 वाँ संशोधन अधिनियम
(ब) 73 वाँ एवं 74 वाँ संशोधन अधिनियम
(स) 75 वाँ संशोधन अधिनियम
(द) 43 वां संशोधन अधिनियम

प्रश्न 9.
नगर निगम का निर्वाचित प्रमुख कहलाता है
(अ) सभापति
(ब) अध्यक्ष
(स) आयुक्त
(द) मेयर,

उत्तर:
1. (ब) 2. (अ) 3. (ब) 4. (अ) 5. (ब) 6. (अ) 7. (स) 8. (ब) 9. (द)

RBSE Class 12 Political Science Chapter 23 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्य का नाममात्र का कार्यपालक कौन है?
उत्तर:
राज्य का नाममात्र का कार्यपालक राज्यपाल होता है।

प्रश्न 2.
राज्यपाल को परामर्श कौन देता है?
उत्तर:
राज्य मंत्रिपरिषद।

प्रश्न 3.
राज्यपाल किसको मुख्यमंत्री नियुक्त करता है?
उत्तर:
राज्यपाल विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है।

प्रश्न 4.
भारत के संविधान में “राज्यों का संघ” शब्दों का प्रयोग किस बात की ओर संकेत करता है?
उत्तर:
भारत के संविधान में “राज्यों का संघ” शब्दों का प्रयोग इस बात की ओर इंगित करता है कि भारत में राज्य प्रशासन, स्वायत्तता के बावजूद राष्ट्रीय धारा के विपरीत नहीं जा सकता है।

प्रश्न 5.
संविधान के किस संशोधन द्वारा राज्य मंत्रिपरिषद की संख्या, विधानसभा के कुल सदस्यों की अधिकतम 15 प्रतिशत निश्चित कर दी गई है?
उत्तर:
91वें संविधान संशोधन द्वारा राज्य मंत्रिपरिषद की संख्या विधानसभा के कुल सदस्यों की अधिकतम 15 प्रतिशत निश्चित कर दी गई है।

प्रश्न 6.
पंचायती राज व्यवस्था में स्थानीय शासन के कौन-से स्तर विद्यमान हैं?
उत्तर:
पंचायती राज व्यवस्था में स्थानीय शासन के दो स्तर विद्यमान हैं-1..ग्रामीण स्थानीय शासन (पंचायती राज), 2. शहरी स्थानीय शासन ।

प्रश्न 7.
‘पंचायती राज दिवस’ कब मनाया जाता है?
उत्तर:
प्रतिवर्ष 24 अप्रैल को पंचायती राज दिवस मनाया जाता है।

प्रश्न 8.
ग्रामीण स्थानीय शासन में सबसे छोटी निर्वाचित संस्था कौन – सी है?
उत्तर:
ग्रामीण स्थानीय शासन में सबसे छोटी निर्वाचित संस्था ‘ग्राम पंचायत’ है।

प्रश्न 9.
नगरीय स्वशासन की सबसे बड़ी संस्था का नाम बताइए।
उत्तर:
नगरीय स्वशासन की सबसे बड़ी संस्था का नाम ‘नगर निगम’ है।

प्रश्न 10.
स्थानीय निकायों के चुनाव कौन-सी संस्था करवाती है?
उत्तर:
राज्य निर्वाचन आयोग।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 23 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्य प्रशासन की पाँच विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
राज्य प्रशासन की पाँच विशेषताएं निम्नलिखित हैं

  1. विकास का द्योतक – राज्य प्रशासन, एक ऐसे विकास प्रक्रिया अथवा प्रशासन का द्योतक है जिसमें समस्त नागरिकों की भूमिका निश्चित की जाती है।
  2. केन्द्र पर आश्रित – राज्य प्रशासन चूँकि केन्द्र के निर्देशन में अपने कार्यों का संपादन करते हैं, इसलिए वे केन्द्र पर निर्भर हैं।
  3. जनसहभागिता पर आधारित – राज्य प्रशासन स्वयं संचालित नहीं होता है, बल्कि वह जन सहभागिता पर आधारित होते हुए अपने कार्यों का संचालन करता है।
  4. राज्यपाल राज्य में राष्ट्रपति का प्रतिनिधि -राज्य में संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल होता है जो केन्द्र में राष्ट्रपति की भाँति राज्य का नाममात्र का कार्यपालक होता है।
  5. स्वतंत्र अस्तित्व – राज्य प्रशासन का अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व होता है।

प्रश्न 2.
राज्यपाल की नियुक्ति के संबंध में सरकारिया आयोग की प्रमुख सिफारिशें बताइए।
उत्तर:
सरकारिया आयोग की प्रमुख सिफारिशें

  1. राज्यपाल के रूप में मनोनीत व्यक्ति को उसके कार्यकाल के बाद पुनः लाभ का पद नहीं देना चाहिए।
  2. केन्द्र में सत्तारूढ़ दल का नेता राज्यपाल न बने।
  3. राज्यपाल राष्ट्रपति और उप – राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ सकता है, लेकिन दलगत राजनीति में सक्रिय भाग नहीं ले सकता है।
  4. अनुच्छेद 155 में आवश्यक संशोधन व परिवर्तन कर राज्यपाल की नियुक्ति में मुख्यमंत्री से सलाह लेने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  5. राज्यपाल के पद पर ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति हो जो किसी क्षेत्र में जानी – मानी हस्ती हो।

प्रश्न 3.
मुख्यमंत्री और राज्यपाल के पारस्परिक संबंधों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
मुख्यमंत्री व राज्यपाल के पारस्परिक सम्बन्ध-मुख्यमंत्री तथा राज्यपाल एक-दूसरे के पूरक हैं। इनके पारस्परिक संबंधों को निम्नलिखित आधारों पर स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. राज्य विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल / दलों के नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री नियुक्त करता है और पद की गोपनीयता की शपथ दिलाता है।
  2. मुख्यमंत्री, राज्यपाल को अपने मंत्रियों की नियुक्ति तथा उनके विभागों के आवंटन, परिवर्तन या उनके त्यागपत्र स्वीकार या अस्वीकार करने में सलाह देता है।
  3. किसी भी मंत्री द्वारा लिए गए निर्णय को मुख्यमंत्री, राज्यपाल के कहने पर पूर्ण मंत्रिपरिषद में विचार के लिए रखवा सकता है।
  4. मुख्यमंत्री, राज्यपाल तथा मंत्रिपरिषद के मध्य संपर्क सूत्र के रूप में कार्य करता है। जिससे राज्यपाल को कोई समस्या न हो।
  5. यदि कोई मंत्री राज्यपाल से मिलना चाहता है, तो इसकी पूर्व सूचना मुख्यमंत्री को देनी पड़ती है।

प्रश्न 4.
राज्य मंत्रिपरिषद के गठन के बारे में टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
राज्य मंत्रिपरिषद का गठन – संविधान द्वारा राज्यों में भी संसदात्मक शासन व्यवस्था स्थापित की गई है। संसदात्मक शासन में राज्य की वास्तविक कार्यपालिका शक्ति मंत्रिपरिषद में निहित होती है जो कि राज्य की विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। अनुच्छेद 163 के अंतर्गत राज्यपाल को उसके कार्यों में सलाह के लिए मंत्रिपरिषद होगी।

अन्य मंत्रियों का चयन मुख्यमंत्री ही करता है और वह मंत्रियों के नामों तथा उनके विभागों की सूची राज्यपाल को दे देता है। 91 वें संवैधानिक संशोधन (2003) ई. के आधार पर व्यवस्था की गई है कि राज्य में मुख्यमंत्री सहित राज्य मंत्रि परिषद् के सदस्यों की संख्या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। मंत्री परिषद में तीन प्रकार के मंत्री होते हैं-

  1. कैबिनेट मंत्री
  2. राज्यमंत्री
  3. उपमंत्री। कभी – कभी संसदीय सचिव भी नियुक्त किए जाते । हैं। इन सभी के लिए राज्य विधानमंडल का सदस्य होना आवश्यक है। इनके मध्य कार्य विभाजन मुख्यमंत्री करता है।

प्रश्न 5.
मुख्यमंत्री और राज्य विधायिका के संबंधों पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
मुख्यमंत्री और राज्य विधायिका के सम्बन्ध – मुख्यमंत्री तथा राज्य विधायिका के संबंधों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. मुख्यमंत्री विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होता है, इस प्रकार वह सदन का नेता होता है।
  2. मुख्यमंत्री राज्यपाल को राज्य विधायिका (विधानमंडल) का सत्र बुलाने और सत्रावसान करने की सलाह देता है।
  3. मुख्यमंत्री विधानसभा में अपना बहुमत रहते हुए राज्यपाल को कभी भी विधानसभा भंग करने की सलाह दे सकता है।
  4. मुख्यमंत्री सरकार की नीतियों की घोषणा विधायिका में करता है।
  5. विधानसभा के बहुमत दल के सदस्य दलीय अनुशासन के कारण मुख्यमंत्री का समर्थन करने के लिए बाध्य होते हैं।

प्रश्न 6.
अशोक मेहता समिति की दो प्रमुख सिफारिशें क्या थीं? लिखिए।
उत्तर:
अशोक मेहता समिति की सिफारिशें – पंचायती राज संस्थाओं की कार्यप्रणाली का अध्ययन करने तथा उनके वर्तमान ढाँचे में आव श्यक परिवर्तन हेतु सुझाव देने के लिए जनता पार्टी सरकार ने दिसम्बर 1977 में अशोक मेहता समिति गठित की। इस समिति ने अगस्त 1978 में अपनी रिपोर्ट सौंपी और देश में पतनोन्मुख पंचायती राज पद्धति को पुनजीविंत एवं शक्तिसम्पन्न बनाने हेतु 132 सिफारिशें की। इसकी दो प्रमुख सिफारिशें निम्नलिखित हैं–

  1. त्रिस्तरीय प्रणाली को समाप्त कर द्विस्तरीय प्रणाली अपनाई जाए। 15000 – 20000 की जनसंख्या पर मण्डल पंचायत का गठन किया जाए एवं ग्राम पंचायत को समाप्त किया जाए और जिले को विकेन्द्रकरण का प्रथम स्तर माना जाए।
  2. जिला कलक्टर सहित सभी अधिकारी जिला परिषद के अधीन रखे जायें।

प्रश्न 7.
त्रिस्तरीय पंचायती राज ढाँचे के तीन स्तर कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
त्रिस्तरीय पंचायती राज ढाँचा-भारत में पंचायती राज को त्रिस्तरीय स्वरूप प्रदान किया गया है। जिसके अन्तर्गत स्थानीय स्तर पर ग्राम पंचायत, मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत समिति एवं जिला स्तर पर जिला परिषद है। जिनका वर्णन निम्नानुसार है

(i) ग्राम पंचायत – ग्रामीण क्षेत्र में स्थानीय स्वशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम पंचायत होती है। ग्राम पंचायत कम से कम 9 वार्डों में विभक्त की जाती है। ग्राम पंचायत का प्रमुख सरपंच कहलाता है जिसका निर्वाचन पंचायत क्षेत्र के मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है ।

llप्रत्येक वार्ड के मतदाला एक पंच का निर्वाचन करते हैं। ग्राम पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष होता है। ग्राम पंचायत में सरकारी प्रतिनिधि के रूप में पंचायत सचिव का पद होता है। ग्राम पंचायत का मुख्य कार्य पंचायत क्षेत्र में ग्रामीण विकास से सम्बन्धित कार्यक्रम को क्रियान्वित करना है।

(ii) पंचायत समिति – पंचायत राज व्यवस्था की मध्य स्तरीय संस्था.पंचायत समिति है। जिसमें जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं जो अपने में से प्रधान व उपप्रधान का चयन करते हैं। प्रशासक के रूप में विकास अधिकारी व अन्य कर्मचारी होते हैं इसका कार्यकाल भी 5 वर्ष होता है। इसका प्रमुख कार्य वार्षिक योजनाएँ तैयार करना तथा ग्रामीण विकास के कार्यक्रमों का क्रियान्वयन एवं मूल्यांकन करना भी है।

(iii) जिला परिषद – यह पंचायती राज व्यवस्था की सर्वोच्च संस्था है। इसके सदस्य प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होते हैं। इसका अध्यक्ष जिला प्रमुख कहलाता है। जिला परिषद का कार्यकाल 5 वर्ष होता है। प्रशासक के रूप में मुख्य कार्यकारी अधिकारी व राज्य कर्मचारी होते हैं। इसका मुख्य कार्य जिले की सभी ग्राम पंचायत व पंचायत समितियों के मध्य समन्वय बनाये रखना है।

प्रश्न 8.
राज्य वित्त आयोग के कोई दो कार्य बताइए।
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद 243 के तहत प्रत्येक राज्य का राज्यपाल 5 वर्ष के अन्तराल पर एक राज्य वित्त आयोग का गठन करता है। जिसके द्वारा पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा की जाती है तथा इसमें सुधार के लिए किए जाने वाले उपायों के संबंध में राज्यपाल को संस्तुति दी जाती है। राज्य वित्त आयोग के दो प्रमुख कार्य-

  1. पंचायतों को कुछ मदों पर कर वसूलने, शुल्कों, पथ करों तथा फीसों से आय अर्जित करने का अधिकार प्रदान करता है।
  2. पंचायतों की आर्थिक स्थिति के लिए उचित उपायों के सुझाव राज्य सरकार को देना।

प्रश्न 9.
संविधान का अनुच्छेद 40 क्या प्रावधान करता है?
उत्तर:
संविधान का अनुच्छेद 40 ग्राम पंचायतों को संगठित कर, उन्हें ऐसी शक्तियाँ, राज्य द्वारा दिये जाने का प्रावधान करता है, जो उन्हें शक्तिशाली बनाती हैं।
ग्राम पंचायत की शक्तियाँ:

  1. पेयजल हेतु कुओं, जलाशयों तथा तालाबों का निर्माण एवं रख-रखाव करना।
  2. बेरोजगारी की सांख्यिकी तैयार करना, पंचायतों के अभिलेखों की तैयारी, मृत्यु-जन्म एवं विवाह के पंजीकरण करना आदि।

प्रश्न 10.
नगरीय स्थानीय शासन की तीन इकाइयाँ कौन – कौन सी हैं?
उत्तर:
नगरीय स्थानीय शासन की तीन इकाइयाँ निम्नलिखित हैं

  1. नगर पालिका – नगर में पंचायत को नगर पालिका का नाम दिया गया है। 10 हजार से 1 लाख तक जनसंख्या वाले कस्बों में इसकी स्थापना की जाती है। इसका अध्यक्ष चैयरमैन कहलाता है।
  2. नगर परिषद -1 लाख से 3 लाख तक की जनसंख्या वाले शहरों में नगर परिषद की स्थापना की जाती है। इसे कई वार्डों में बाँट दिया जाता है। प्रत्येक वार्ड से एक पार्षद का जनता द्वारा सीधे निर्वाचन किया जाता है। नगर परिषद के अध्यक्ष को सभापति कहते हैं।
  3. नगर निगम – 3 लाख से अधिक जनसंख्या वाले बड़े शहरों में नगर निगम की स्थापना की जाती है। इसका अध्यक्ष मेयर या महापौर कहलाता है। इनका चुनाव प्रत्यक्ष या परोक्ष (पार्षदों द्वारा) विधि जो भी, राज्य सरकार के विधान द्वारा निर्धारित की गई है-द्वारा किया जाता है। इनका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, किंतु अविश्वास प्रस्ताव से समय पूर्व भी इन निर्वाचित मंडलों को भंग किया जा सकता है।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 23 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्य प्रशासन पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
राज्य प्रशासन को निम्नलिखित आधारों पर स्पष्ट किया जा सकता है

  1. राज्यों के ऊपर संघीय नियंत्रण – संकटकाल में केन्द्रीय सरकार का राज्य सरकार के ऊपर पूर्ण नियंत्रण रहता है। साधारण काल में यद्यपि राज्य सरकारों को सामान्यतया अपने क्षेत्र में पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त रहती है फिर भी केन्द्रीय सरकार कुछ सीमा तक उन्हें नियंत्रित करती है। इस प्रकार से राज्य प्रशासन पर केन्द्र का पूर्ण नियंत्रण पाया जाता है।
  2. राज्य सरकारों को संघीय कृत्य सौंपना – अनुच्छेद 258 में निर्धारित शर्तों के अनुसार संघ राज्यों को अपने कुछ प्रशासनिक कृत्य हस्तांतरित कर सकता है तथा राज्य संघ को अपने कुछ प्रशासनिक कृत्य सौंप सकते हैं। संघीय सरकार द्वारा राज्य सरकारों को अपने प्रशासनिक कृत्य सौंपे जाने पर इन कृत्यों को संपन्न करने में जो भी खर्च होगा उसका वहन संघीय सरकार करेगी।
  3. सहायता अनुदान – अनुच्छेद 275 के अनुसार संसद राज्यों को आवश्यकतानुसार सहायता व अनुदान भी दे सकती है। अनुदान देते समय संसद राज्यों पर कुछ शर्ते लगाकर उनके व्यय को भी नियंत्रित कर सकती है।
  4.  विकास का द्योतक – राज्य प्रशासन, विकास प्रशासन का द्योतक है। जिसमें नागरिकों के सर्वांगीण विकास पर बल दिया जाता है। नागरिकों के लिए कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाता है।
  5. आपातकाल – जब राष्ट्रपति अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल की घोषणा करते हैं तब राज्यों पर संघीय सरकार का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो जाता है। राज्य प्रशासन के अन्य आधार –
    • राज्य प्रशासन का स्वयं का एक स्वतंत्र अस्तित्व है।
    • राज्य प्रशासन जन सहभागिता पर आधारित है।
    • सचिवालये राज्य प्रशासन की एक महत्वपूर्ण धुरी है।
    • राज्य प्रशासन के प्रमुख प्रशासक अखिल भारतीय सेवाओं से चयनित होकर आते हैं।
    •  राज्य प्रशासन में राज्यों में राज्यपाल, राष्ट्रपति का प्रतिनिधि होता है।

प्रश्न 2.
राज्यपाल व मुख्यमंत्री के आपसी संबंधों का विवरण देते हुए, राज्य प्रशासन की कार्यप्रणाली बताइए।
उत्तर:
राज्यपाल व मुख्यमंत्री के आपसी संबंधों को निम्नलिखित आधारों पर स्पष्ट किया जा सकता है

  1. संवैधानिक दृष्टि से संविधान के अनुच्छेद 163 के अनुसार जहाँ कार्यपालिका का प्रधान राज्यपाल है, वहाँ व्यावहारिक दृष्टि से शासन का वास्तविक मुखिया मुख्यमंत्री होता है।
  2. राज्यपाल का पहला कार्य मुख्यमंत्री की नियुक्ति करना है। यदि विधानसभा में किसी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त है और बहुमत वाले राजनीतिक दल ने अपना नेता चुन लिया है तो राज्यपाल उसे मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त करता है।
  3. मुख्यमंत्री, मंत्रियों का चयन कर सूची राज्यपाल को दे देता है, जिसे राज्यपाल स्वीकार कर लेता है तथा मुख्यमंत्री की सूची के आधार राज्यपाल उन्हें नियुक्त करता है।
  4.  विधानसभा को भंग करने का कार्य राज्यपाल उसी समय करेगा, जब मुख्यमंत्री उसे ऐसा करने के लिए परामर्श देगा।
  5.  संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद तथा राज्यपाल के बीच संपर्क स्थापित करता है।
  6. मुख्यमंत्री ही मंत्रिमंडल के निर्णयों की सूचना राज्यपाल को देता है तथा राज्यपाल के विचार मंत्रिमंडल तक पहुँचाता है।
  7. राज्यपाल मुख्यमंत्री सहित मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करता है।

राज्य प्रशासन की कार्यप्रणाली:
राज्य प्रशासन में मंत्रिपरिषद की सबसे अधिक महत्वपूर्ण इकाई मंत्रिमंडल है और मंत्रिमंडल ही सभी महत्वपूर्ण विषयों में निर्णय लेता है। मंत्रिमंडल की बैठक को मुख्यमंत्री जब चाहे बुला सकता है। इन बैठकों की अध्यक्षता मुख्यमंत्री करता है। बैठक को कोई कोरम (गणपूर्ति) नहीं होता है। मंत्रिमंडल की कार्यवाही के दो प्रमुख नियम हैं – सामूहिक उत्तरदायित्व तथा गोपनीयता।

  1. सामूहिक उत्तरदायित्व – मंत्रिमंडल की बैठकों में प्रायः समस्त निर्णय एकमत में लिए जाते हैं। मतभेद की स्थिति में पारस्परिक विचार-विमर्श के आधार पर निर्णय लिया जाता है और यह निर्णय सभी मंत्रियों का संयुक्त निर्णय माना जाता है। यदि कोई मंत्री इसे स्वीकार करने में अपने को असमर्थ पाता है तो उसे त्यागपत्र देना होता है।
  2. गोपनीयता – मंत्रिपरिषद के प्रत्येक सदस्य द्वारा गोपनीयता की शपथ ली जाती है और मंत्रिमंडल की कार्यवाही तथा निर्णय गुप्त रखे जाते हैं। यदि कोई मंत्री गोपनीयता को भंग करता है तो उसे त्यागपत्र देना होता है।

प्रश्न 3.
स्थानीय शासन क्या है? इसके सुदृढ़ीकरण हेतु गठित समितियों की प्रमुख सिफारिशों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर;
स्थानीय शासन से आशय:
स्थानीय शासन से आशय उस शासन से होता है जिसका संबंध किसी स्थान विशेष से हो और जिसका प्रबन्ध उस स्थान विशेष के निवासियों द्वारा किया जाए। दूसरे शब्दों में स्थानीय शासन का तात्पर्य स्थानीय स्तर की उन संस्थाओं से है जो जनता द्वारा चुनी जाती हैं एवं जिन्हें राष्ट्रीय अथवा प्रान्तीय शासन के नियन्त्रण में रहते हुए नागरिकों की स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अधिकार एवं दायित्व प्राप्त होते हैं।

इसका अभिप्राय यह भी है कि स्थानीय शासन की इकाइयां सीमित क्षेत्र में प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करती हैं, वे संप्रभु नहीं होतीं। भारत में ये संस्थाएँ राज्य विधान मण्डल द्वारा बनाई गयी विधि की सीमा में काम करती है एवं विधि द्वारा प्रदत्त समस्त अधिकारों का उपयोग करते हुए दिए गए दायित्वों का निष्पादन करती हैं, एनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटेनिकों के अनुसार स्थानीय शासन का अर्थ है, पूर्ण राज्य की अपेक्षा एक अंदरूनी प्रतिबन्धित एवं छोटे क्षेत्र में निर्णय लेने एवं उनको क्रियान्वित करने वाली सत्ता।

कार्ल जे. फ्रेडरिक के अनुसार:
स्वशासन स्थानीय समाज की एक प्रशासनिक व्यवस्था है जो व्यवस्थापन के नियमों द्वारा इस प्रकार विनियमित होती है कि सरकार की सत्ता का वह उस समय प्रतिनिधित्व करे जबकि वह स्थानीय रूप से सक्रिय है। एफ. गोल्डिंग के अनुसार: ‘यह एक बस्ती के लोगों द्वारा अपने मामलों का स्वयं ही प्रबन्ध है।’ स्थानीय शासन को सुदृढ़ करने के लिए अनेक समितियों का गठन किया गया है, जिनकी सिफारिशें निम्नलिखित हैं

1. बलवंत राय मेहता समिति (1957) की सिफारिशें:

  1. त्रिस्तरीय पंचायती राज की स्थापना की जाए जो इस प्रकार होगी कि ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति एवं जिला स्तर पर जिला परिषद तथा ये आपस में अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा जुड़े होने चाहिए।
  2. ग्राम पंचायत की स्थापना प्रत्यक्ष रूप से चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से होनी चाहिए जबकि पंचायत समिति व जिला परिषद का गठन अप्रत्यक्ष रूप से चुने हुए सदस्यों द्वारा होना चाहिए।
  3. जिला परिषद का अध्यक्ष जिलाधिकारी को बनाया जाए।

2. अशोक मेहता समिति (1977) की सिफारिशें:

  1. द्विस्तरीय पंचायती राज प्रणाली को अपनाया जाएँ। ग्राम पंचायत के स्थान पर मंडल पंचायतें गठित की जाएँ।
  2. संस्थाओं के चुनाव दलगत आधार पर करवाए जाएँ।
  3. जिला कलक्टर सहित सभी अधिकारी जिला परिषद के अधीन रखे जाएँ।
  4. पंचायती राज व्यवस्था में स्वयं सेवी संस्थाओं की भूमिका बढ़ाई जाएँ।
  5. पंचायती राज सेवाओं में समाज के अनुसूचित जाति, जनजाति एवं महिला वर्ग को आरक्षण प्रदान किया जाए।

3. जी.वी.के. राव समिति (1985) की सिफारिशें-

  1. ग्राम पंचायतों को अधिक वित्तीय शक्तियाँ उपलब्ध करायी जाएँ।
  2. राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाए।
  3. संस्थाओं का कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 8 वर्ष किया जाए।
  4.  जिला विकास आयुक्त के पद का सृजन किया जाए तथा उसे जिले के विकास कार्यों का प्रभारी बनाया जाए।

4. एल.एम. सिंघवी समिति (1986) की सिफारिशें:

  1. पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया जाए और उन्हें संरक्षण प्रदान किया जाए।
  2. ग्राम पंचायतों को अधिक व्यावहारिक बनाने के लिए गाँवों का पुनर्गठन किया जाना।
  3. ग्राम पंचायतों को अधिक वित्तीय सम्पन्न बनाया जाए और इन संस्थाओं के चुनाव, विघटन एवं उनके कार्यों से सम्बन्धित जो भी विवाद उत्पन्न हों, उनके समाधान के लिए न्यायिक अभिकरणों की स्थापना की जाए।

5. पी.के. श्रृंगन समिति (1988) की सिफारिशें:
इस समिति ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने की सिफारिश की।

प्रश्न 4.
पंचायती राज ढाँचे के त्रिस्तरीय स्वरूप को विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
ग्राम पंचायत का त्रिस्तरीय स्वरूप
1. ग्राम पंचायत: ग्रामीण क्षेत्र में स्थानीय स्वशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम – पंचायत होती है। ग्राम पंचायत कम से कम 9 वार्डों में विभक्त की जाती है। ग्राम पंचायत का प्रमुख सरपंच कहलाता है। सरपंच का निर्वाचन समस्त पंचायत, क्षेत्र के मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से गुप्त मतदान पद्धति के द्वारा किया जाता है। पंच का चुनाव सम्बन्धित वार्ड के मतदाता प्रत्यक्ष रूप से करते हैं।

उप सरपंच पंचों द्वारा अपने में से चुना जाता है। पंचायत चुनाव निर्वाचन आयुक्त द्वारा सम्पन्न कराए जाते हैं। प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र में जनसंख्या के अनुपात में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए स्थान चक्रानुक्रम के आधार पर आरक्षित होते हैं। प्रत्येक चुनाव से पूर्व लाटरी पद्धति द्वारा आरक्षित सीटों का निर्ध रण होता है।

ग्राम पंचायत में सरकारी प्रतिनिधि के रूप में पंचायत सचिव होता है। ग्राम पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। 15 दिन में कम से कम एक बार निर्धारित स्थान पर बैठक बुलायी जानी आवश्यक है। पंचायत की बैठकों की अध यक्षता सरपंच एवं उसकी अनुपस्थिति में उप सरपंच ग्राम पंचायत द्वारा सम्पादित कार्य करता है। ग्राम पंचायत के मुख्य कार्य हैं –

  1. वार्षिक बजट एवं योजनाएँ बनाना
  2. प्रशासनिक कार्य
  3. विकास संबंधी कार्य
  4. पशुपालन एवं डेयरी विकास संबंधी कार्य
  5. खादी व कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना
  6. पानी, प्रकाश, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की व्यवस्था करना।

2. पंचायत समिति: पंचायती राज ढाँचे का मध्यवर्ती सोपान पंचायत समिति कहलाता है। पंचायत समिति में जनता द्वारा निर्वाचित लगभग 15 प्रतिनिधि होते हैं। निर्वाचित प्रतिनिधि के अतिरिक्त पंचायत क्षेत्र के विधायक तथा सरपंच पंचायत समिति के सदस्य होते हैं। यह प्रधान व उपप्रधान के चुनाव व अविश्वास प्रस्ताव को छोड़कर अन्य सभी बैठकों में मत दे सकते हैं। पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्य अपने में से प्रधान तथा उप प्रधान का चयन करते हैं। आकस्मिक पद रिक्ति की स्थिति में पुनः प्रधान यो उप प्रधान का चयन किया जाता है।

पंचायत समितियों में भी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान है। ये सभी आरक्षित किए गये स्थान चक्रानुक्रम से बारी – बारी से आवंटित किए जाते हैं। पंचायत समिति का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है पंचायत समिति में प्रशासक के रूप में विकास अधिकारी का पद होता है। विकास अधिकारी कर्मचारियों के कार्यों में समन्वय स्थापित करता है।

पंचायत समिति के प्रमुख कार्य है-

  1. वार्षिक योजनाएँ तैयार करना, ग्राम पंचायतों की योजनाओं पर विचार करना, वार्षिक बजट तैयार करना आदि।
  2. लघुसिंचाई व जल प्रबन्ध संबंधी कार्य
  3. कृषि उत्पादन एवं विस्तार संबंधी कार्य
  4. गरीबी उन्मूलन सम्बन्धी कार्य
  5. पशुपालन, डेयरी, कुक्कुट तथा मत्स्य पालन संबंधी कार्य
  6. प्राथमिक शिक्षा संबंधी कार्य
  7. अन्य कार्य, जैसे-खादी, कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन, पेयजल व्यवस्था, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी कार्य।

3. जिला परिषद:
पंचायती राज व्यवस्था में जिला स्तरीय संस्था जिला परिषद है। इसका गठन चार प्रकार के सदस्यों से मिलकर होता है।

  1. प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचित प्रतिनिधि
  2. जिला परिषद क्षेत्र के लोकसभा व विधानसभा सदस्य
  3. जिला परिषद क्षेत्र में निर्वाचकों के रूप में पंजीकृत सभी राज्यसभा सदस्य और
  4. जिला परिषद क्षेत्र की समस्त पंचायत समितियों के प्रधान।

जिला प्रमुख व उप जिला प्रमुख को पहले प्रकार के सदस्य अपनों में से निर्वाचित करते हैं। अविश्वास द्वारा हटाने का अधिकार भी इन्हीं को है। अन्य कार्यों में अन्य प्रकार के सदस्य भी मतदान कर सकते हैं। जिला परिषद में जिला प्रमुख और उप – जिला प्रमुख जनता के प्रतिनिधि हैं। इनके अतिरिक्त एक मुख्य अधिकारी निर्माण कार्य देखने हेतु, एक सहायक अभियन्ता एवं अन्य कर्मचारी होते है। जिला प्रमुख की अध्यक्षता में जिला परिषद की बैठक व अन्य गतिविधिया सम्पन्न होती है।

समस्त अधिकारियों व कर्मचारियों पर उसका नियंत्रण रहता है। जिला परिषद में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्गों एवं महिलाओं के लिए नियमानुसार एवं चक्रानुक्रमानुसार आरक्षण दिया गया है। जिला परिषद का कार्यकाल 5 वर्ष होता है एवं इसे समय से पहले भंग करने पर चुनाव 6 माह के अंदर कराना आवश्यक है, जो कि शेष कार्यकाल के लिए होता है। यदि कार्यकाल छः माह से कम शेष हो तो निर्वाचन नही कराए जा सकते।

जिला परिषद के प्रमुख कार्य हैं:

  1. जिले की सभी ग्राम पंचायत एवं पंचायत समितियों के बीच समन्वय बनाए रखना।
  2. राज्य सरकार द्वारा दिए गए अनुदान को पंचायत समितियों में वितरित करना एवं पंचायत समितियों के बजट का पर्यवेक्षण करना।
  3. कृषि विकास तथा आर्थिक सामाजिक विकास के लिए कार्य करना
  4. ग्राम नियोजन, जन स्वास्थ्य एवं शिक्षा व्यवस्था के लिए कार्य करंना
  5. प्राकृतिक आपदाओं वाले क्षेत्रों के लिए विशेष कार्यक्रमों का निर्माण करना।

प्रश्न 5.
संविधान की 11 वीं अनुसूची में उल्लिखित पंचायती राज संस्थाओं के प्रमुख कार्य कौन – कौन से हैं?
उत्तर:
संविधान की 11 वीं अनुसूची में वर्णित पंचायती राज संस्थाओं के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. कृषि, जिसमें कृषि विस्तार सम्मिलित है।
  2. भूमि विकास, भूमि सुधार लागू करना, भूमि संगठन व भू – संरक्षण।
  3. लघु सिंचाई, जल प्रबन्धन एवं नदियों के मध्य का भूमि विकास।
  4. पशुधन, दुग्ध का व्यवसाय एवं मुर्गीपालन।
  5.  मछली उद्योग।
  6. वनजीवन एवं वनों में कृषि।
  7. लघु वन उत्पादन।
  8. लघु उद्योग, जिसमें खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी शामिल है।
  9. खादी, ग्राम तथा कुटीर उद्योग।
  10. ग्रामीण विकास।
  11. ईंधन व चारा।
  12. पेयजल।
  13. सड़क, पुल, नदी तट, जलमार्ग एवं संचार के अन्य साधन।
  14. ग्रामीण, विद्युत तथा विद्युत विभाजन।
  15. गैर परम्परागत ऊर्जा स्त्रोत।
  16. गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम।
  17. शिक्षा-प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा के विद्यालय।
  18. तकनीकी प्रशिक्षण व व्यावसायिक शिक्षा।
  19. प्रौढ़ व अनौपचारिक शिक्षा,
  20. पुस्तकालय एवं वाचनालय।
  21. पुस्तकालय एवं वाचनालय।
  22. मेले तथा बाजार।
  23. सांस्कृतिक गतिविधियाँ।
  24. स्वास्थ्य एवं इससे संबंधित संस्थाएँ–अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र आदि।
  25. महिला तथा बाल विकास।
  26. समाज कल्याण, विशेषकर मानसिक विमंदित व दिव्यांगों का कल्याण शामिल है।
  27. समाज के कमजोर वर्ग, विशेषकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के कल्याण व समृद्धि के कार्य।
  28. सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
  29. सार्वजनिक संपत्तियों की देख – रेख।

प्रश्न 6.
हमारे शहरों का स्थानीय प्रशासन कौन – कौन से कार्य करता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शहरों का स्थानीय प्रशासन तीन तरह की संस्थाओं नगर पालिका, नगर परिषद तथा नगर निगम के माध्यम से कार्य करता है, जिसका विवरण इस प्रकार है-

  1. पेयजल की व्यवस्था करना।
  2. मल का निस्तारण करना।
  3. नगर को साफ – सुथरा रखना।
  4. नगर में फैली बीमारियों को दूर करते हुए उपचार का प्रबंध करना।
  5. सड़कों की मरम्मत व निर्माण करना।
  6. प्रकाश अर्थात् बिजली की व्यवस्था करना।
  7. जन्म तथा मृत्यु का पंजीकरण एवं प्रमाण-पत्र देना।
  8. अतिक्रमणों को रोकना।
  9. वर्षा के दिनों में जलभराव होने पर जल की निकासी।
  10. सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण करना।
  11. प्रौढ़-शिक्षा केन्द्रों की स्थापना करना।
  12. धर्मशालाओं, पार्क, संग्रहालय व मूर्तियों का निर्माण व उनकी व्यवस्था करना।
  13. पार्किंग स्थलों की समुचित व्यवस्था करना।
  14. शहरी गरीबी को दूर करने के लिए नीतियों का सृजन करना।
  15. काजी गृहों का प्रबंध करना।
  16. वधशालाओं एवं चमड़ा उद्योग का विनियमन करना।
  17. कब्रिस्तानों व मरघटों की व्यवस्था करना।
  18. वाचनालय तथा पुस्तकालय का निर्माण।
  19. नगरीय व वानिकी पर्यावरण संरक्षण एवं पारिस्थिकी तंत्र का प्रबंध करना।
  20. गंदी व मलिन बस्तियों में समुचित व्यवस्था करना।
  21. भूमि उपयोग नियमन व भवनों का निर्माण करना।
  22. नागरिकों को अग्निशमन सेवाएँ उपलब्ध करवाना।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 23 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Political Science Chapter 23 बहुंचयनात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्यपाल की नियुक्ति की जाती है
(अ) राष्ट्रपति द्वारा
(ब) प्रधानमंत्री द्वारा
(स) विधानमंडल द्वारा
(द) जनता द्वारा

प्रश्न 2.
राज्यपाल पूर्ण रूप से उत्तरदायी होता है
(अ) संसद के प्रति
(ब) राष्ट्रपति के प्रति
(स) जनता के प्रति
(द) प्रधानमंत्री के प्रति

प्रश्न 3.
राज्यपाल पद पर नियुक्ति हेतु न्यूनतम आयु है
(अ) 25 वर्ष
(ब) 30 वर्ष
(स) 35 वर्ष
(द) 45 वर्ष

प्रश्न 4.
राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है
(अ) राष्ट्रपति
(ब) प्रधानमंत्री
(स) न्यायाधीश
(द) राज्यपाल

प्रश्न 5.
राज्य का मुख्यमंत्री होता है
(अ) विधानसभा में बहुमत दल / दलों का नेता
(ब) विधानसभा का सदस्य
(स) विधानपरिषद का सदस्य
(द) विधानमंडल का मुखिया।

प्रश्न 6.
राज्य की मंत्रिपरिषद के मुखिया को कहा जाता है
(अ) गृहमंत्री
(ब) मुख्यमंत्री
(स) विधि मंत्री
(द) वित्त मंत्री

प्रश्न 7.
राज्य का मुख्यमंत्री निम्न में से किसके प्रति उत्तरदायी है?
(अ) राष्ट्रपति
(ब) राज्यपाल
(स) जनता
(द) विधानसभा

प्रश्न 8.
लोक विकेन्द्रीकृत संरचना का मुख्य अधिकर्ता व समन्वयकर्ता है
(अ) जिलाध्यक्ष
(ब) संसद
(स) जनता
(द) राष्ट्रपति

प्रश्न 9.
राज्यपाल विधानसभा में कितने आंग्ल भारतीय सदस्य मनोनीत कर सकता है?
(अ) 5
(ब) 3
(स) 1
(द) 2

प्रश्न 10.
राज्यपाल जिला जजों की नियुक्ति किसके परामर्श से करता है?
(अ) जिला न्यायालय
(ब) क्षेत्रीय न्यायालय
(स) सर्वोच्च न्यायालय
(द) उच्च न्यायालय

प्रश्न 11.
किस अनुच्छेद के अनुसार राज्यपाल विधानमंडल का अभिन्न अंग है?
(अ) अनुच्छेद 168
(ब) अनुच्छेद 169
(स) अनुच्छेद 170.
(द) अनुच्छेद 171

प्रश्न 12.
किस विधेयक को राज्यपाल की स्वीकृति के बिना विधानसभा में पेश नहीं किया जा सकता है?
(अ) साधारण विधेयक
(ब) धन विधेयक
(स) ये दोनों
(द) कोई भी नहीं

प्रश्न 13.
कौन से संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा ग्रामीण स्थानीय शासन को सांविधानिक दर्जा दिया गया है?
(अ) 72 वाँ संशोधन अधिनियम
(ब) 73 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम
(स) 101 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम
(द) 42 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम

प्रश्न 14.
74 वें संविधान संशोधन अधिनियम का संबंध है
(अ) नगरीय स्थानीय स्वशासन से
(ब) ग्रामीण स्थानीय स्वशासन से
(स) जिला स्तरीय स्वशासन से
(द) पंचायत समिति से

प्रश्न 15.
11 वीं अनुसूची का संबंध है
(अ) शहरी स्वशासन से
(ब) पंचायती राज से
(स) नगर परिषद से
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 16.
संविधान की 11 वीं अनुसूची में विषय हैं
(अ) 18
(ब) 29
(स) 13
(द) 11

प्रश्न 17.
ग्रामीण स्थानीय शासन में संबंधित समिति है
(अ) बलवंत राय मेहता समिति
(ब) अशोक मेहता समिति
(स) एल.एम. सिंघवी समिति
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 18.
12 वीं अनुसूची का संबंध है
(अ) शहरी विषयों से
(ब) ग्रामीण स्थानीय स्वशासन से
(स) जिला परिषद से
(द) राज्य सरकार से।

प्रश्न 19.
पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था करने वाली समिति थी
(अ) बलवंत राय मेहता समिति
|(ब) अशोक मेहता समिति
(स) पी.के. शुंगल समिति
(द) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 20.
भारत के किस राज्य ने सर्वप्रथम बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें लागू कीं
(अ) राजस्थान
(ब) पंजाब
(स) हरियाणा
(द) उत्तर प्रदेश

प्रश्न 21.
नगर निकायों के अंतर्गत शामिल है
(अ) नगर परिषद्
(ब) नगरपालिका
(स) नगर निगम
(द) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 22.
नगर परिषद के प्रमुख को क्या कहा जाता है?
(अ)उपसभापति
(ब) चेयरमैन
(स) सभापति
(द) कोई भी नहीं

प्रश्न 23.
भारत में सर्वप्रथम पंचायती राज व्यवस्था लागू करने वाला राज्य थान
(अ) राजस्थान
(ब) उत्तर प्रदेश
(स) आन्ध्र प्रदेश
(द) हरियाणा

प्रश्न 24.
संविधान की 12 वीं अनुसूची में विषय हैं
(अ) 29
(ब) 13
(स) 18
(द) 36

उत्तर:
1. (अ), 2. (ब), 3. (स), 4. (द), 5. (अ), 6. (ब), 7. (स), 8. (अ), 9. (स), 10. (द),
11. (अ), 12. (ब), 13. (ब), 14. (अ), 15. (ब), 16. (ब), 17. (द), 18. (अ), 19. (अ),
20. (अ),21. (द), 22. (स), 23. (अ), 24. (स) ।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 23 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जिला प्रशासन का प्रमुख दायित्व क्या है?
उत्तर:
जिला प्रशासन का प्रमुख दायित्व कानून व्यवस्था को बनाए रखना, राजस्व एकत्र करना व विकास कार्यों को क्रियान्वित करना होता है।

प्रश्न 2.
राज्यपाल विधान परिषद में कितने सदस्य मनोनीत कर सकता है?
उत्तर:
राज्यपाल विधान परिषद में 1 / 6 सदस्य मनोनीत कर सकता है।

प्रश्न 3.
मन्त्रिपरिषद की बैठक की तिथि वे स्थान कौन तय करता है।
उत्तर:
मन्त्रिपरिषद की बैठक की तिथि व स्थान मुख्यमन्त्री तय करता है।

प्रश्न 4.
मन्त्रिपरिषद का मुखिया कौन होता है?
उत्तर:
मन्त्रिपरिषद् का मुखिया मुख्यमन्त्री होता है।

प्रश्न 5.
आपातकाल में राज्यों में राष्ट्रपति के अभिकर्ता के रूप में कौन कार्य करता है?
उत्तर:
राज्यपाल।

प्रश्न 6.
किसकी स्वीकृति के बिना धन विधेयक को विधानसभा में प्रस्तुत नही किया जा सकता है?
उत्तर:
राज्यपाल की स्वीकृति।

प्रश्न 7.
किसकी स्वीकृति के बिना राज्य के राजस्व की कोई राशि व्यय नही की जा सकती है?
उत्तर:
राज्यपाल की स्वीकृति

प्रश्न 8.
राज्य निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति कौन करता है?
उत्तर:
राज्यपाल

प्रश्न 9.
राज्यपाल की किन्हीं दो शक्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है।
  2. प्रत्येक वित्तीय वर्ष का विवरण तैयार करवाकर विधानसभा में प्रस्तुत करवाना।

प्रश्न 10.
जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति कौन करता है?
उत्तर:
राज्यपाल

प्रश्न 11.
राज्य मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता कौन करता है?
उत्तर:
मुख्यमंत्री।

प्रश्न 12.
राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के मध्य संपर्क सूत्र के रूप में कौन कार्य करता है?
उत्तर:
मुख्यमंत्री।

प्रश्न 13.
राज्य का शासनाध्यक्ष एवं वास्तविक कार्यपालक कौन होता है?
उत्तर:
मुख्यमंत्री।

प्रश्न 14.
ग्रामीण स्थानीय स्वशासन को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
पंचायती राज के नाम से।

प्रश्न 15.
ग्रामीण एवं शहरी स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का कार्यकाल बताइए।
उत्तर:
5 वर्ष

प्रश्न 16.
किसने भारतीय गाँवों को गणराज्यों की संज्ञा दी है?
उत्तर:
इतिहासकार ‘अल्टेकर’ ने भारतीय गाँवों को छोटे-छोटे गणराज्यों की संज्ञा दी है।

प्रश्न 17.
वित्त आयोग का क्या कार्य है?
उत्तर:
राजकोष से आवश्यकतानुसार स्थानीय निकायों को आर्थिक सहायता प्रदान करना व उनके लेखों की जाँच करना।

प्रश्न 18.
राज्य में वित्त आयोग कौन गठित करता है?
उत्तर:
राज्यपाल राज्य में वित्त आयोग गठित करता है।

प्रश्न 19.
पंचायती राज संविधान की किस सूची में वर्णित है?
उत्तर:
पंचायती राज संविधान की राज्य सूची में वर्णित है।

प्रश्न 20.
स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को अनुदान कहाँ से प्राप्त होता है?
उत्तर:
राज्य सरकारों से इन संस्थाओं को अनुदान प्राप्त होता है।

प्रश्न 21.
जिला परिषद का अध्यक्ष को किस नाम से जानते हैं?
उत्तर:
जिला प्रमुख के नाम से।

प्रश्न 22.
पंचायती राज की ग्राम स्तरीय संस्था का नाम बताइए।
उत्तर:
ग्राम पंचायत।

प्रश्न 23.
पंचायती राज की खण्ड स्तरीय संस्था का नाम बताइए।
उत्तर:
पंचायत समिति।

प्रश्न 24.
पंचायती राज की जिला स्तरीय संस्था का नाम बताइए।
उत्तर:
जिला परिषदें।

प्रश्न 25.
ग्राम पंचायत के अध्यक्ष को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
सरपंच के नाम से।

प्रश्न 26.
पंचायत समिति के निर्वाचित पदाधिकारी को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
प्रधान।

प्रश्न 27.
जिला परिषद के अध्यक्ष को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
जिला प्रमुख के नाम से।

प्रश्न 28.
नगरीय स्वशासन की सबसे छोटी संस्था का नाम बताइए।
उत्तर:
नगर पंचायत

प्रश्न 29.
त्रिस्तरीय पंचायत राज प्रणाली लागू करने की सिफारिश किस समिति ने की?
उत्तर:
बलवंत राय मेहता समिति ने।

प्रश्न 30.
पंचायती राज व्यवस्था में सुधार हेतु गठित किन्हीं दो समितियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. अशोक मेहता समिति (1977)
  2. जी.वी.के. राव समिति (1985)

प्रश्न 31.
जी.वी. के. राव समिति की कोई दो प्रमुख सिफारिशें लिखिए।
उत्तर:

  1. ग्राम पंचायतों को अधिक वित्तीय शक्तियाँ दी जाए।
  2. राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाए।

प्रश्न 32.
नगरपालिका की स्थापना कब की जाती है?
उत्तर:
दस हजार से एक लाख की जनसंख्या वाले शहरों में नगरपालिका की स्थापना की जाती है।

प्रश्न 33.
नगर परिषद की स्थापना कहां की जाती है?
उत्तर:
एक लाख से तीन लाख जनसंख्या वाले शहरों में नगर परिषद की स्थापना की जाती है।

प्रश्न 34.
नगर निगम का प्रमुख क्या कहलाता है?
उत्तर:
नगर निगम के प्रमुख को मेयर अथवा महापौर कहा जाता है।

प्रश्न 35.
नगर निकायों को कानून बनाने का अधिकार किस अनुसूची के अंतर्गत दिया गया है?
उत्तर:
नगर निकायों को कानून बनाने का अधिकार 12वीं अनुसूची के अंर्तगत दिया गया है।

प्रश्न 36.
नगर निगम की स्थापना कहाँ की जाती है?
उत्तर:
3 लाख से अधिक जनसंख्या वाले बड़े शहरों में नगर निगम की स्थापना की जाती है।

प्रश्न 37.
संविधान की 11वीं अनुसूची में पंचायतों को कितने प्रकार के कार्य करने का अधिकार दिया गया है?
उत्तर:
संविधान की 11वीं अनुसूची में 29 प्रकार के कार्य करने का अधिकार पंचायतों को दिया गया है।

प्रश्न 38.
पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने के लिए प्रत्येक 5 वर्ष पश्चात किस आयोग का गठन किया जाता है?
उत्तर:
वित्त आयोग का।

प्रश्न 39.
भारत में पंचायती राज शासन प्रणाली को आदर्श रूप किस शासनकाल में देखा जा सकता है।
उत्तर:
चोल शासनकाल में।

प्रश्न 40.
खण्ड स्तर पर पंचायत समिति के अध्यक्ष को किस नाम से जाना जाता है।
उत्तर:
प्रधान।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 23 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्य प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ (लक्षण) बताइए।
उत्तर:
राज्य प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ (लक्षण): राज्य प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ (लक्षण) निम्नलिखित है

  1. राज्य प्रशासन का स्वतंत्र अस्तित्व
  2. पृथक संविधान का अभाव
  3. आपातकाल में केन्द्र प्रशासन के अधीन
  4.  केन्द्र पर निर्भरता
  5. जनसहभागिता पर आधारित
  6. राज्य प्रशासन विकास प्रशासन का द्योतक
  7. सचिवालय-राज्य प्रशासन की धुरी
  8. प्रमुख प्रशासकों का अखिल भारतीय सेवाओं से चुनकर आना
  9. स्थानीय प्रशासन राज्य प्रशासन के अधीन
  10. राज्यपाल का राज्य में राष्ट्रपति का प्रतिनिधि के रूप में होना।

प्रश्न 2.
राज्यपाल की नियुक्ति तथा इस पद के लिए निर्धारित योग्यताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
राज्यपाल की नियुक्ति: राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। योग्यताएँ संविधान के अनुच्छेद 157 के अनुसार राज्यपाल के पद के लिए किसी व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए-

  1. वह भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. वह 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो।
  3. वह संसद या किसी राज्य के विधान मण्डल के किसी सदन का सदस्य न हो।
  4. वह कोई लाभ का पद धारण न करता हो।

प्रश्न 3.
राज्यपाल की बदलती हुई भूमिका के प्रमुख कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
राज्यपाल की बदलती हुई भूमिका के प्रमुख कारण: राज्यपाल की नियुक्ति 5 वर्ष की अवधि के लिये की जाती है। लेकिन वह अपने उत्तराधिकारी के पद ग्रहण करने तक अपने पद पर बना रह सकता है। राज्यपाल को उसकी अवधि 5 वर्ष के पूर्व भी राष्ट्रपति के द्वारा हटाया जा सकता है। एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानान्तरण किया जा सकता है।

प्रारम्भ में राज्यपाल की भूमिका औपचारिकता तक ही सीमित थी किन्तु बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में यह पद अत्यन्त शक्तिशाली और गरिमामय हो गया है। अब पहले जैसी स्थिति नही है। राज्यपाल की बदलती हुई भूमिका के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. मुख्यमंत्रियों का कमजोर व्यक्तित्व।
  2. राज्य सरकार के पास स्पष्ट बहुमत न होकर साधारण बहुमत होना।
  3. गठबंधन की विखंडनकारी प्रवृत्ति
  4. क्षेत्रीय दलों का अधिक शक्तिशाली होना
  5. दल – बदल की प्रवृत्ति और राजनीतिक अस्थिरता।

प्रश्न 4.
राज्यपाल को मनोनीत करने के प्रमुख कारण कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
राज्यपाल को मनोनीत करने के प्रमुख कारण: राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रधान होता है। इसे भारत का राष्ट्रपति मनोनीत करता है राज्यपाल को मनोनीत करने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. देश एवं राज्य दोनों में संसदीय शासन प्रणाली का होना।
  2. संसदीय शासन प्रणाली के कारण।
  3. राज्यपाल को नाममात्र कार्यपालिका शक्ति प्रदान की गई ताकि वास्तविक शक्ति का प्रयोग मुख्यमंत्री कर सके।
  4. एक स्वतंत्र और निष्पक्ष मध्यस्थ एवं निर्णायक के लिए।
  5. भारत की विविधिता को ध्यान में रखते हुए संघ व राज्यों में एकता एवं अखण्डता स्थापित करने के लिए।

प्रश्न 5.
राज्यपाल की नियुक्ति के संबंध में विकसित परम्पराओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
राज्यपाल की नियुक्ति के संबंध में विकसित परम्पराएँ: राज्यपाल की नियुक्ति के संबंध में भारतीय संविधान लागू होने के बाद से वर्तमान तक कुछ परम्परायें विकसित हुई है। इनमें से प्रमुख परम्पराएँ निम्नलिखित हैं-

  1. सामान्यतया एक राज्य में उसी राज्य के निवासी को राज्यपाल नहीं बनाया जाता है।
  2. राज्य मंत्रिमंडले राज्यपाल के नाम पर सहमत हो, यद्यपि इस परम्परा को व्यवहार में कम ही माना जाता है।
  3. वरिष्ठ राजनीतिज्ञों को, नौकरशाहों को व सैन्य अधिकारियों को नियुक्त किया जाता है।
  4. प्रशासनिक सुधार आयोग के अनुसार एक व्यक्ति को एक ही बार राज्यपाल नियुक्त किया जाना चाहिए।

प्रश्न 6.
राज्यपाल की कार्यपालिका शक्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
राज्यपाल की कार्यपालिका शक्तियाँ-राज्यपाल की कार्यपालिका शक्तियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और उसके परामर्श से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
  2. मंत्रियों के मध्य विभागों का वितरण मुख्यमंत्री से परामर्श कर राज्यपाल द्वारा ही किया जाता है।
  3. राज्य की सरकार को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए एवं मंत्रियों के कार्य वितरण के लिए राज्यपाल को नियमों का निर्माण करने का अधिकार प्राप्त है।
  4. प्रशासन के संबंध में राज्यपाल / मुख्यमंत्री से सूचनाएँ प्राप्त कर सकता है एवं वह किसी मंत्री द्वारा लिये गये किसी व्यक्तिगत निर्णय को समूचे मंत्रिमंडल में विचारार्थ रखने की माँग कर सकता है।
  5. राज्यपाल मंत्रिपरिषद के सदस्यों को पद के कर्तव्यपालन तथा गोपनीयता की शपथ दिलाता है।
  6. राज्यपाल राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है।
  7. राज्यपाल राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में राष्ट्रपति को परामर्श देता है तथा उच्च न्यायालय के परामर्श से जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है।
  8. राज्य के राज्यपाल को राज्य की कार्यपालिका क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत कानूनों के विरुद्ध अपराध करने वाले व्यक्तियों के दण्ड को कम करने, स्थगित करने, बदलने एवं क्षमा करने का अधिकार है।
  9. राज्यपाल राज्य, विधानसभा में एक सदस्य आंग्ल भारतीय मनोनीत कर सकता है, यदि वह समझे कि विधानसभा में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
  10. राज्यपाल (जिन राज्यों में दो सदन है) विधान परिषद में 1 / 6 सदस्य ऐसे मनोनीत कर सकता है जिन्होंने शिक्षा, साहित्य, समाज सेवा विज्ञान कला आदि के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया हो।

प्रश्न 7.
राज्यपाल के विधायी अधिकार लिखिए।
उत्तर:
राज्यपाल के प्रमुख विधायी अधिकार निम्नलिखित हैं

  1. राज्यपाल राज्य के विधानमण्डल का एक अभिन्न अंग है। उसे विधानमण्डल के दोनों सदनों के अधिवेशन बुलाने, विसर्जित करने तथा विधानसभा को भंग करने का अधिकार है।
  2. आम चुनाव के बाद वह विधानमण्डल की पहली बैठक को सम्बोधित करता है।
  3. राज्यपाल विधानमण्डल के विचार हेतु कोई संदेश भेज सकता है।
  4. विधानमण्डल के सत्रावसान के समय राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकता है। अध्यादेश विधानमण्डल का अधिवेशन पुनः प्रारंभ होने के बाद 6 सप्ताह तक लागू रह सकता है। यदि विधानमण्डल अध्यादेश को स्वीकार कर लेता है तो वह अधिनियम का स्वरूप धारण कर ले ता है अन्यथा वह निरस्त हो जाता है।
  5.  साधारण विधेयक को यदि विधानमण्डल संशोधन सहित या बिना संशोधन के दोबारा पारित कर दे तो राज्यपाल को स्वीकृति देनी होगी।
  6. जब कोई विधेयक स्वीकृति के लिए राज्यपाल के पास जाता है, तो राज्यपाल को यह अधिकार है कि वह उसे स्वीकार कर ले या अस्वीकार कर दे या राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रख ले।

प्रश्न 8.
राज्यपाल की वित्तीय शक्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
राज्यपाल की वित्तीय शक्तियाँ – राज्यपाल की प्रमुख वित्तीय शक्तियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. राज्यपाल व्यवस्थापिका के समक्ष प्रतिवर्ष बजट प्रस्तुत करवाता है।
  2. राज्य विधानसभा में राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति के बिना कोई भी धन विधेयक प्रस्तुत नही किया जा सकता।
  3. राज्यपाल की अनुमति के बिना किसी भी अनुदान की माँग नही की। जा सकती है। राज्यपाल विधानमण्डल से पूरक, अतिरिक्त और अनुदानों की माँग भी कर सकता है।
  4. राज्यपाल को राज्य की संचित निधि में से खर्च करने का अधिकार है, परन्तु उसके द्वारा किए गए खर्च के लिए विधानसभा की स्वीकृति आवश्यक है।

प्रश्न 9.
राज्यपाल की न्याय संबंधी शक्तियाँ बताइए।
उत्तर:
राज्यपाल की न्याय संबंधी शक्तियाँ: राज्यपाल की न्याय संबंधी शक्तियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार जिन विषयों पर राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार होता है, उन विषयों से संबंधित किसी भी कानून के विरुद्ध अपराध करने वाले व्यक्तियों के दण्ड को राज्यपाल कम कर सकता है, स्थगित कर सकता है। बदल सकता है या उन्हें क्षमा कर सकता है।
  2. राज्यपाल अपने राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में राष्ट्रपति को सलाह देता है।
  3. राज्यपाल जिला न्यायाधीश की नियुक्ति करता है।
  4. राज्यपाल पर किसी दोष के कारण उसकी पदावधि में अभियोग नही चलाया जा सकता है।

प्रश्न 10.
राज्यपाल की स्वविवेकीय एवं अन्य शक्तियों के बारे में बताइए।
उत्तर:
राज्यपाल की स्वविवेकीय एवं अन्य शक्तियाँ-राज्यपाल की स्वविवेकीय एवं अन्य शक्तियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. राज्यपाल राष्ट्रपति को राज्य में संवैधानिक तंत्र की असफलता के संबंध में सूचना देता है और उसकी सूचना पर राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है।
  2. आपातकाल में राज्यपाल राष्ट्रपति के अभिकर्ता के रूप में कार्य करता है।
  3. असम का राज्यपाल असम की सरकार के रूप में एवं इस आदिम क्षेत्र की जिला परिषदों के मध्य खानों से उत्पन्न आय विभाजन के संबंध में होने वाले विवादों के संबंध में स्वविवेक के अधिकार का प्रयोग करता है।
  4. बिहार, मध्यप्रदेश एवं उड़ीसा में राज्यपाल का एक विशेष कर्तव्य है कि वह आदिम जातियों के कल्याण संबंधी कार्यो के लिए एक मंत्री की नियुक्ति करे।

प्रश्न 11.
मुख्यमन्त्री की नियुक्ति कैसे होती है? बताइए।
उत्तर:
मुख्यमन्त्री की नियुक्ति – मुख्यमंत्री की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार, राज्यपाल द्वारा की जाती है। राज्यपाल द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त किया जाता है, जिसके बारे में वह आश्वस्त हो कि उसे विधानसभा के सदस्यों के बहुमत का समर्थन प्राप्त हो सकेगा।

इसके अतिरिक्त चूँकि मुख्यमंत्री का कार्यकाल विधान के बहुमत के समर्थन पर निर्भर करता है, इसलिए मुख्यमंत्री के पद की अवधि निश्चित नही होती है विधानसभा में किसी एक दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त हो एवं वह अपना नेता निर्वाचित कर ले, तो राज्यपाल को उस नेता को ही मुख्यमंत्री नियुक्त करना पड़ता है किन्तु यदि विधानसभा में किसी एक दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त न हो एवं दो या दो से अधिक दल द्वारा समान कार्यक्रम के आधार पर एक संयुक्त दल (गठबन्धन) बनाकर एक नेता का निर्वाचन कर लिया जाए, तो राज्यपाल द्वारा इस नेता को मुख्यमंत्री हेतु आमन्त्रित किया जाता है।

प्रश्न 12.
मुख्यमंत्री और राज्य मंत्रिपरिषद के संबंधों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
मुख्यमंत्री और राज्य मंत्रिपरिषद के संबंध-मुख्यमंत्री राज्य का वास्तविक कार्यपालक होता है। राज्य मंत्री परिषद का निर्माण, विघटन एवं विभाग आवंटन आदि मुख्यमंत्री में निहित है। प्रत्येक मंत्री मुख्यमंत्री की इच्छापर्यन्त पद पर बना रहता है। मुख्यमंत्री उससे कभी भी उसका त्यागपत्र माँग सकता है या उसे राज्यपाल द्वारा बर्खास्त करवा सकता है।

मंत्रिपरिषद की बैठकों की आयोजन की तिथि व स्थान मुख्यमंत्री के द्वारा ही निर्धारित किया जाता है। मुख्यमंत्री ही मंत्रिपरिषद की बैठक की अध्यक्षता करता है। मंत्रिपरिषद के निर्णयों पर अंतिम स्वीकृति या अस्वीकृति मुख्यमंत्री की इच्छा पर निर्भर करती है। मुख्यमंत्री का त्याग-पत्र सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद का त्यागपत्र माना जाता है।

प्रश्न 13.
मन्त्रिपरिषद् की शक्तियों तथा कार्यों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
राज्य की कार्यपालिका शक्ति मन्त्रिपरिषद में ही निहित है। मन्त्रिपरिषद के कार्यों तथा शक्तियों का उल्लेख निम्नांकित रूप से किया जा सकता है ।

(1) शासन की नीति निर्धारित करना – मन्त्रिपरिषद का सबसे अहम कार्य शासन की नीति निर्धारित करना है। चाहे गृह विभाग हो या शिक्षा आदि सभी शासन की नीति का निर्धारण मन्त्रिपरिषद के द्वारा ही किया जाता है।

(2) बजट तैयार करवाना राज्य का वार्षिक वित्तीय बजट साव्रजनिक रूप से प्रस्तुत करने से पूर्व वित्तमन्त्री द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत किया जाता है। यह बजट मन्त्रिपरिषद् द्वारा निश्चित की गई नीति के आधार पर ही तैयार किया जाता है। बजट के पारित कराने का उत्तरदायित्व भी मन्त्रिपरिषद का ही होता है।

(3) विधानमण्डल के शासन का प्रतिनिधित्व – विधानमण्डल की बैठकों में मन्त्रिपरिषद शासन का प्रतिनिधित्व करता है। मन्त्रिगण विधानमण्डल तथा विधान परिषद में उपस्थित होकर सदस्यों के प्रश्नों तथा आलोचनाओं का उत्तर देते हैं तथा शासन की नीति का समर्थन करते हैं।

(4) उच्च पदों पर नियुक्ति के सम्बन्ध में राज्यपाल को परामर्श संविधान के अनुसार राज्यपाल महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है। व्यवहार में राज्यपाल के द्वारा ये सभी नियुक्तियाँ मन्त्रिपरिषद के परामर्श के आधार पर ही की जाती है। मन्त्रिपरिषद ही राष्ट्रपति को उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध में परामर्श देती है।

(5) कानून निर्माण का कार्यक्रम निश्चित करना – मन्त्रिपरिषद कानून निर्माण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। मन्त्रिपरिषद विधानमण्डल की सहमति से कानूनों का निर्माण करती है।

प्रश्न 14.
मुख्यमंत्री के कोई चार कार्य लिखिए।
उत्तर:
मुख्यमंत्री के कार्य:
मुख्यमंत्री के चार प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. मुख्यमंत्री राज्यपाल को अपने मंत्रियों की नियुक्ति एवं उनके विभागों के आवंटन, परिवर्तन या उनके त्यागपत्र स्वीकार या अस्वीकार करने में सलाह देता है।
  2. मुख्यमंत्री मंत्री परिषद की सभी बैठकों में अध्यक्षता करता है और यह सुनिश्चित करता है कि मंत्री परिषद सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धान्त पर कार्य करे।
  3. मुख्यमंत्री राज्य के प्रशासन एवं विधान संबंधी प्रस्तावों के संबंध में कैबिनेट द्वारा लिए गए निर्णयों से राज्यपाल को समय-समय पर सूचित करता है।
  4. महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य व अन्य महत्वपूर्ण नियुक्तियों के संबंध में मुख्यमंत्री राज्यपाल को परामर्श देता है।

प्रश्न 15.
मुख्यमंत्री की स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुख्यमंत्री की स्थिति: केन्द्रीय मंत्रिपरिषद जिस प्रकार केन्द्र में वास्तविक कार्यपालिका है और जिसका प्रधान या मुखिया प्रधानमंत्री है, उसी प्रकार राज्य की वास्तविक कार्यपालिका मंत्रिपरिषद है जिसका प्रधान मुख्यमंत्री है इस प्रकार राज्य प्रशासन में मुख्यमंत्री की वही भूमिका है जो केन्द्रीय प्रशासन में प्रधानमंत्री की है। मुख्यमंत्री के निम्नलिखित कार्यों व शक्तियों से राज्य प्रशासन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका स्वतः स्पष्ट हो जाती है

  1. मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष होने के नाते वह मंत्रिपरिषद का गठन करता है।
  2. मंत्रिपरिषद की बैठकों में अध्यक्षता करता है।
  3. मंत्रियों से त्यागपत्र माँग सकता है उन्हे बर्खास्त कर सकता है।
  4. मंत्रिपरिषद के निर्णयों से राज्यपाल को अवगत कराता है।
  5. मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद एवं राज्यपाल के बीच वार्ता की एक कड़ी है।
  6. विभिन्न पदों पर मुख्यमंत्री के परामर्श से ही राज्यपाल नियुक्तियाँ करता है।
  7. वह विधानसभा का नेतृत्व करता है, विधानसभा में शासकीय नीतियों और कार्यों की घोषणा और स्पष्टीकरण मुख्यमंत्री ही करता है।

विधयेकों को पारित करता है, वास्तव में देखा जाए तो मुख्यमंत्री की स्थिति यथार्थ राजनीतिक परिस्थितियों द्वारा निर्धारित होती है। उसके दल के बहुमत का स्वरूप, दल के केन्द्रीय नेतृत्व के साथ उसके संबंध, जनता में उसकी लोकप्रियता आदि तत्व उसकी स्थिति में निर्णायक भूमिका का निर्वाह करते हैं।

प्रश्न 16.
स्थानीय स्वशासन की क्या आवश्यकता है?
उत्तर:
स्थानीय स्वशासन, केन्द्रीय सरकार एवं राज्य सरकार के पारित अधिनियम द्वारा निर्मित एक शासकीय इकाई हैं जिसमें ग्राम अथवा नगर में जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं जो अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं में लोक-कल्याण के लिए अपने उत्तरदायित्वों का पालन करते हैं। स्थानीय स्तर पर ग्राम अथवा नगर में जो समस्याएँ होती हैं उनकी जानकारी वहीं की जनता को होती है।

वे ही वहाँ की समस्याओं को समझ सकते हैं तथा सुलझा भी सकते हैं। गाँव अथवा नगर में अनेक कार्य वहाँ की जनता के लिए आवश्यक होते हैं, जो वहीं के निवासी ही सम्पन्न कर सकते हैं जैसे नालियों का निर्माण, गलियों का निर्माण, सार्वजनिक शौचालय तथा स्वच्छता बनाए रखने के लिए स्वायत्त संस्थाएँ अत्यन्त आवश्यक हैं।

प्रश्न 17.
भारत में प्रचलित स्थानीय स्वशासन के दो रूपों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत में प्रचलित स्थानीय स्वशासन के दो रूप – भारत में प्रचलित स्थानीय स्वशासन के दो रूप निम्नलिखित हैं
(i) ग्रामीण स्थानीय स्वशासन-इसके अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्र के निवासियों की स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व होता है। ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करने वाली स्थानीय स्वशासन की प्रमुख संस्थाएँ हैं।

(ii) नगरीय स्थानीय स्वशासन-नगरीय स्थानीय स्वशासन के अन्तर्गत नगरीय क्षेत्रों में रहने वाली जनता की स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व नगरीय स्थानीय शासन का होता है। नगर पालिका, नगर परिषदनगर निगम, छावनी बोर्ड, टाउन एरिया कमेटी, अधिसूचित क्षेत्र समितियाँ आदि नगरीय क्षेत्र में कार्य करने वाली स्थानीय शासन की प्रमुख संस्थाएँ है।’

प्रश्न 18.
भारत में पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए समय-समय पर उठाये गए किन्हीं तीन कदमों के बारे में बताइये। ।
उत्तर:
भारत सरकार द्वारा पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए उठाये गए तीन प्रमुख कदम निम्नलिखित हैं-
(i) 1957 ई. में भारत सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं के संबंध में बलवन्त राय मेहता समिति का गठन किया जिसकी सिफारिश के आधार पर 2 अक्टूबर 1959 को नागौर में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का शुभारंभ किया गया।

(ii) 1986 में एल.एम.सिंघवी समिति ने ग्राम पंचायतों को अतिरिक्त वित्तीय साधन देकर अधिक सक्षम बनाने एवं पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दिये जाने पर बल दिया।

(iii) देश में पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने एवं अब तक पंचायती राज व्यवस्था में अनुभव किये गये। दोषों का समाधान कर उसे प्रभावी बनाने के लिए 73 वाँ संविधान संशोधन विधेयक 1992 पारित किया गया जो 24 अप्रैल 1993 से लागू कर दिया गया है।

प्रश्न 19.
पंचायती राज से संबंधित बलवन्त राय मेहता समिति को प्रमुख सिफारिशों का उल्लेख कीजिए।…
उत्तर:
बलवन्त राय मेहता समिति-जनवरी 1957 में भारत सरकार ने पंचायती राज में सुधार हेतु एक समिति का गठन किया जिसके अध्यक्ष बलवन्त राय मेहता थे। इस समिति ने नवम्बर 1957 में अपना प्रतिवेदन सरकार को सौंपा।

समिति की सिफारिशों को वर्ष 1958 में सरकार द्वारा स्वीकार किया गया एवं राजस्थान से पंचायती राज व्यवस्था का प्रारम्भ किया गया। समिति ने अपने प्रतिवेदन में लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण की योजना की सिफारिश की, जो कि अन्ततः पंचायती राज के रूप में जानी गई। समिति के द्वारा की गई प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार हैं।

  1. त्रिस्तरीय पंचायत, ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद एवं ये आपस में अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा जुड़े होने चाहिए।
  2. ग्राम पंचायत की स्थापना प्रत्यक्ष रूप से चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से होनी चाहिए, जबकि पंचायत समिति और जिला परिषद का गठन अप्रत्यक्ष रूप से चुने सदस्यों द्वारा होना चाहिए।
    (ग) प्रतिवेदन में समिति ने अन्य समितियों के विपरीत जिला परिषद का अध्यक्ष जिलाधिकारी को बनाने की सिफारिश की।

प्रश्न 20.
पंचायती राज व्यवस्था में सुधार हेतु गठित जी.वी.राव समिति के प्रमुख सिफारिशों को लिखिए।
उत्तर:
जी.वी.के. राव समिति की प्रमुख सिफारिशें:
ग्रामीण विकास तथा गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के लिए योजना आयोग द्वारा वर्ष 1985 में जी.वी.के. राव की अध्यक्षता में गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट वर्ष 1986 में सरकार को सौंपा। समिति ने पंचायती संस्थाओं को सशक्त बनाने हेतु निम्नलिखित सिफारिशें की-

  1.  विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया में जिला परिषद की सशक्त भूमिका होनी चाहिए। क्योंकि नियोजन एवं विकास कार्य के लिए जिला एक उपयुक्त स्तर है।
  2. विकास कार्यक्रमों का पर्यवेक्षण, नियोजन, कार्यान्वयन जिला या उसके निचले स्तर की पंचायती संस्थाओं द्वारा किया जाना चाहिए।
  3. जिला विकास आयुक्त के पद का सृजन किया जाए एवं उसे जिले के विकास कार्यों का प्रभारी बनाया जाए।
  4. राज्यस्तर पर राज्य विकास परिषद, जिला स्तर पर जिला विकास परिषदमण्डल स्तर पर मण्डल पंचायत एवं ग्राम, स्तर पर ग्रामसभा की सिफारिश की गई।
  5. ग्राम पंचायतों को अधिक वित्तीय शक्तियाँ दी जायें।
  6. राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाय।
  7. संस्थाओं का कार्यकाल 8 वर्ष किया जाय।

प्रश्न 21.
पंचायती राज से संबंधित एल.एम.सिंघवी समिति की प्रमुख सिफारिशों को लिखिए।
उत्तर:
एल.एम.सिंघवी की प्रमुख सिफारिशें – वर्ष 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने लोकतंत्र व विकास के लिए पंचायती राज संस्थाओं के पुनरुद्धार के लिए एल.एम. सिंघवी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस समिति की सिफारिशें निम्नलिखित हैं-स्थानीय संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया जाए एवं उन्हें संरक्षण प्रदान किया जाए। इस कार्य के लिए संविधान का संशोधन कर एक नया अध्याय जोड़ा जाए।

साथ ही समिति ने पंचायती राज संस्थाओं का नियमित, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने की सिफारिश की। ग्राम पंचायतों को ज्यादा व्यावहारिक बनाने के लिए गाँवों का पुनर्गठन किया जाए। ग्राम पंचायतों को और अधिक वित्तीय शक्ति सम्पन्न बनाया जाए और इन संस्थाओं के । चुनाव, विघटन तथा उनके कार्यों से संबंधित निर्धारित नीतियाँ बनाई जाएँ।

प्रश्न 22.
राज्य निर्वाचन आयोग को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पंचायतों एवं नगर निकायों की संस्थाओं के निष्पक्ष व स्वतंत्र चुनाव कराने के लिए 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम में राज्य निर्वाचन आयोग का गठन किया गया है। पंचायती राज संस्थाओं के लिए गठित राज्य निर्वाचन आयोग ही नगर निकायों के निर्वाचन का दायित्व वहन करेगा। यह आयोग पंचायतों व नगर निकायों के चुनाव के लिये निर्वाचक नामावली तैयार करता है एवं निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन एवं नियत्रंण करता है।

राज्य का राज्यपाल राज्य निर्वाचन अधिकारी / आयुक्त की नियुक्ति करता है। इसकी नियुक्ति की अवधि तथा सेवा शर्ते भी राज्यपाल द्वारा ही तय की जाती हैं। राज्य निर्वाचन अधिकारी / आयुक्त को उसके पद से उन्ही कारणों और उसी रीति से हटाया जा सकता है जिन कारण और रीति से न्यायाधीश को हटाया जा सकता है।

प्रश्न 23.
राज्यवित्त आयोग पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
राज्य वित्त आयोग – पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा हेतु राज्य वित्त आयोग का गठन किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 243 तहत प्रत्येक राज्य का राज्यपाल 5 वर्ष के अंतराल पर एक राज्य वित्त आयोग का गठन करता है जिसके द्वारा पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा, आय के स्त्रोतों, धन के वितरण, राज्य सरकार द्वारा प्राप्त अनुदान, कर, चुंगी तथा इसमें सुधार हेतु किए जाने वाले उपायों के संबंध में राज्यपाल अनुशंसा करता है।

राज्य वित्त आयोग की संरचना, इसके सदस्यों की आवश्यकता, अर्हता एवं उनके चुने जाने के तरीकों को राज्य विधान मंडल निर्धारण कर सकता है। राज्य वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिशों पर की गई कार्यवाही की रिपोर्ट को राज्य विधानमंडल के पटल पर राज्यपाल रख सकता है।

RBSE Class 12 Political Science Chapter 23 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्यपाल की शक्तियों एवं अधिकारों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
राज्यपाल की शक्तियाँ एवं अधिकार: राज्यपाल राज्य का संवैधानिक अध्यक्ष होता है। राज्य में राज्यपाल की वही स्थिति है जो संघ में राष्ट्रपति की होती है। राज्यपाल की शक्तियाँ एवं अधिकार निम्नलिखित हैं
1. कार्यपालिका संबंधी शक्ति – संविधान के अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य की समस्त कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित है जिनका प्रयोग वह स्वयं तथा अधीनस्थ पदाधिकारियों द्वारा करता है। वह मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है। तथा उसके परामर्श पर अन्य मंत्रियों की।

वह महाधिवक्ता और राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति करता है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में राष्ट्रपति संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श लेता है। राज्यपाल की कार्यपालिका शक्तियाँ राज्यसूची में उल्लेखित विषयों तक विस्तृत हैं। समवर्ती सूची के विषयों पर राष्ट्रपति की स्वीकृति से वह अपने अधिकार का प्रयोग करता है।

राज्य सरकार के कार्य के संबंध में वह नियमों का निर्माण करता है। वह मंत्रियों के बीच कार्यों का विभाजन करता है। उसे मुख्यमंत्री से शासन से संबंधित सभी विषयों के संबंध में सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। वह मुख्यमंत्री को किसी मंत्री के व्यक्तिगत निर्णय को सम्पूर्ण मंत्री मण्डल के सम्मुख विचार के लिए रखने को कह सकता है।

राज्यपाल मंत्रिपरिषद के सदस्यों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाता है। उनके त्याग-पत्र स्वीकार करता है एवं उन्हें मुख्यमंत्री सहित पद विमुक्त भी करता है।

2. विधायी शक्तियाँ – राज्य पाल राज्य की व्यवस्थापिका का एक अभिभाज्य अंग है और विधायी क्षेत्र में उसे महत्वपूर्ण शक्तियाँ प्राप्त हैं। वह व्यवस्थापिका का अधिवेशन बुलाता है। स्थगित करता है और व्यवस्थापिका के निम्न सदन विधानसभा को संबोधित करता है और उसके बाद भी वह विधानमण्डल को संदेश भेज सकता है।

राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयक पर राज्यपाल की स्वीकृति आवश्यक है वह विधेयक को अस्वीकृत कर सकता है या उसे पुनर्विचार के लिए विधानमण्डल को लौटा सकता है। यदि विधानमण्डल दूसरी बार विधेयक पारित कर देता है तो राज्यपाल को स्वीकृति देनी ही होगी। कुछ विधेयकों को वह राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकता है।

यदि राज्य के विधानमण्डल का अधिवेशन न हो रहा हो तो राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकता है। अध्यादेश को राज्य विधानमंडल द्वारा पारित अधिनियमों के समान ही मान्यता प्राप्त होगी।

राज्यपाल विधानपरिषद के 1 / 6 सदस्यों को ऐसे लोगों में से नामजद करता है जिन्हें साहित्य, कला, विज्ञान, सहकारिता आंदोलन तथा समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष तथा घ्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हो। यदि वह ऐसा समझे कि विधानसभा में आंग्ल – भारतीय समुदाय को उचित प्रातिनिधित्व प्राप्त नहीं हुआ है तो वह इस वर्ग के एक सदस्य को मनोनीत कर सकता है।

3. वित्तीय शक्तियाँ – राज्यपाल को कुछ वित्तीय शक्तियां भी प्राप्त हैं। राज्य विधानसभा में राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति के बिना कोई भी धन विधेयक प्रस्तुत नही किया जा सकता। वह व्यवस्थापिका के समक्ष प्रति वर्ष बजट प्रस्तुत करवाता है और उसकी अनुमति के बिना किसी भी अनुदान की माँग नही की जा सकती। राज्यपाल विधानमण्डल से पूरक, अतिरिक्त तथा अधिक अनुदानों की माँग कर सकता है। राज्य की संचित निधि राज्यपाल के ही अधिकार में रहती है।

4. न्यायिक शक्तियाँ – अनुच्छेद 161 के अनुसार जिन विषयों पर राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार होता है। उन विषयों संबंधी किसी विधि के विरुद्ध अपराध करने वाले व्यक्तियों के दण्ड को राज्यपाल कम कर सकता है, वह अपने राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में राष्ट्रपति को सलाह देता है। वह जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। राज्यपाल पर किसी दोष के कारण उसकी पदावधि में अभियोग नही चलाया जा सकता है।

5. मंत्रियों के खिलाफ मुकदमें की अनुमति देना – सर्वोच्च न्यायालय ने अपने 5 नवम्बर सन 2004 के निर्णय में महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहाँ है कि किसी मंत्री के विरुद्ध यदि प्राथमिक तौर पर कोई मामला बनाता है तो राज्यपाल उसके खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे सकता है। भले ही मंत्री परिषद ने इसकी अनुमति देने से इनकार कर दिया हो।

6. अन्य शक्तियाँ – राज्यपाल की कुछ अन्य शक्तियाँ निम्न हैं

  1. राज्यपाल राष्ट्रपति को राज्य में संवैधानिक तंत्र की असफलता के संबंध में सूचना देता है और उसकी सूचना पर राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है।
  2. आपातकाल में राज्यपाल राष्ट्रपति के अभिकर्ता के रूप में कार्य करता है।
  3. असम का राज्यपाल असम की सरकार और इस आदिम क्षेत्र की जिला परिषदों के बीच खानों से उत्पन्न आय विभाजन के संबंध में होने वाले विवादों के संबंध में स्वविवेक के अधिकार का प्रयोग करता है।
  4. बिहार, मध्यप्रदेश तथा उड़ीसा में राज्यपाल का एक विशेष कर्तव्य है कि वह आदिम जातियों के कल्याण संबंधी कार्यों के लिए एक मंत्री की नियुक्ति करे।

प्रश्न 2.
मुख्यमंत्री के कार्य एवं शक्तियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुख्यमंत्री के कार्य एवं शक्तियाँ: मुख्यमंत्री के कार्य एवं शक्तियां निम्नलिखित हैं
1. सरकार का वास्तविक अध्यक्ष – मुख्यमंत्री सरकार का वास्तविक अध्यक्ष होता है। वह राज्यपाल को अपने मंत्रियों की नियुक्ति एवं विभागों के आवंटन, परिवर्तन या उनके त्यागपत्र स्वीकार या अस्वीकार करने का परामर्श देता है।

2. मंत्रिपरिषद की अध्यक्षता – मुख्यमंत्री मंत्री परिषद की समस्त बैठकों में अध्यक्षा करता है और यह सुनिश्चित करता है कि मंत्री परिषद सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धान्त पर कार्य करे।

3. कैबिनेट के निर्णयों से राज्यपाल को सूचित करना – वह राज्य के प्रशासन एवं विधान संबंधी प्रस्तावों के संबंध में कैबिनेट द्वारा लिए गए निर्णयों से राज्यपाल को समय-समय पर अवगत कराता है। किसी भी मंत्री द्वारा लिए गए निर्णयों को मुख्यमंत्री राज्यपाल के कहने पर पूर्व मंत्री परिषद में विचार के लिए रखवा सकता है।

4. सम्पूर्ण प्रशासन में सामंजस्य स्थापित करना – वह अपने अधीन मंत्रियों के विभागों के कार्यों की भी देखरेख करता है एवं मंत्रियों में परस्पर उत्पन्न होने वाले मतभेदों को दूर कर संपूर्ण प्रशासन में सामंजस्य स्थापित रखता है।

5. विधानमण्डल के कार्य संचालन को नेतृत्व प्रदान करना – मुख्यमंत्री विधानमंडल के कार्य संचालन में नेतृत्व प्रदान करता है। सभी सरकारी विधेयक उसके निरीक्षण में एवं उसकी सलाह के अनुसार तैयार किए जाते हैं तथा वह सदन . का समय विभाजन एवं कार्यक्रम का प्रारूप तैयार करता है और सरकारी एवं निजी कार्य का समय तय करता है।

6. राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के मध्य संपर्क सूत्र – वह राज्यपाल एवं मंत्री परिषद के मध्य संपर्क सूत्र के रूप में कार्य करता है। यदि कोई मंत्री राज्यपाल से मिलना चाहता है या राज्यपाल किसी मंत्री विशेष से बात करना चाहता है। तो इसकी पूर्व सूचना मुख्यमंत्री को देनी पड़ती है।

7. सरकार का मुख्य प्रवक्ता – राज्य विधानमण्डल में मुख्यमंत्री सरकार का मुख्य प्रवक्ता होता है। शासकीय नीति । से संबंधित अधिकृत घोषणा मुख्यमंत्री के अधिकार क्षेत्र में ही आती है।

8.राज्यपाल को परामर्श देना – एडवोकेट जनरल (महाधिवक्ता), राज्य लोकसेवा आयोग के सदस्य व अन्य महत्वपूर्ण नियुक्तियों के संबंध में मुख्यमंत्री राज्यपाल को परामर्श देता है।

9. बहुमत दल का नेता – मुख्यमंत्री बहुमत दल का नेता होता है इसलिए वह अपने दल में एकता और अनुशासन बनाए रखने के लिए दलीय सचेतकों के माध्यम से नियंत्रण रखता है।

10. विधानसभा एवं विधानपरिषद के मध्य सम्पर्क सूत्र – मुख्यमंत्री विधानसभा एवं विधान परिषद के मध्य भी संपर्क सूत्र के रूप में कार्य करता है। वह राज्यपाल को सलाह देता है कि विधानमण्डल का सत्र कब बुलाया जाए, कब स्थगित किया जाए और कब भंग किया जाए।

वह यह भी सुनिश्चित करता है कि कैबिनेट के निर्णयानुसार कौन से विधेयक विधानमंडल में प्रस्तुत किए जाएँ और विपक्ष के विरोध का किस प्रकार सामना किया जाए।

प्रश्न 3.
स्थानीय स्वशासन का महत्व व उपयोगिता बताइए।
उत्तर:
जनतान्त्रिक शासन पद्धति में स्थानीय स्वशासन प्रथम सीढ़ी है, जहाँ से लोकतन्त्र के अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। स्थानीय स्वशासन जनतन्त्र की सफलता के लिए निम्नलिखित रूप से महत्वपूर्ण व उपयोगी है

(1) जनतन्त्र की आधारशिला – शासन व्यवस्था में जनता का शासन से प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित हो, इसके लिए निचले स्तर पर अर्थात् स्थानीय स्तर पर जनता को शासन में भागीदारी का अवसर प्राप्त होता है। स्थानीय स्तर पर ही दैनिक जीवन तथा सामान्य रहन – सहन की समस्याएँ होती हैं, जिन्हें सुलझाने के लिए स्थानीय स्वशासन के आधार पर ही प्रयास करना पड़ता है।

(2) जनतन्त्र की पाठशाला – स्थानीय स्वशासन में नागरिकों को लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का अभ्यास करने का अवसर प्राप्त होता है। उसमें नागरिक कर्तव्यों के प्रति भावना जागृत होती है। उसमें ईमानदारी तथा कार्य कुशलता का अनुभव होता है। अतः स्थानीय स्वशासन को लोकतन्त्र की पाठशाला माना गया है।

(3) राजनीतिक प्रशिक्षण – स्थानीय स्वशासन इकाइयों में जनता का प्रतिनिधित्व करने से राजनीतिक प्रशिक्षण तो प्राप्त होता ही है, प्रशासनिक प्रशिक्षण भी प्राप्त होता है। 5 वर्ष तक स्थानीय इकाई में कार्य करने के पश्चात् जब वह विधान सभा अथवा संसद में पहुँचेगा तो निश्चित ही अपने प्रशिक्षण के अनुभव से लाभान्वित होकर जनता की सही रूप से सेवा कर सकेगा।

(4) केन्द्रीय तथा राज्य सरकार के कार्य – भार में कमी – स्थानीय स्वशासन को जिन कार्यों का उत्तरदायित्व सौंपा जाता है, उन कार्यों का निपटारा वहीं पर हो जाता है। उसका भार राज्य अथवा केन्द्र सरकार पर नहीं पड़ता है।

(5) गतिशील विकास – विकास योजनाओं को गतिशील रूप से क्रियान्वित करने में स्थानीय स्वशासन इकाइयों का महत्वपूर्ण योगदान होता है।

(6) स्थानीय समस्याएँ – स्थानीय समस्याएँ केवल स्थानीय निकायों में ही देखने को मिलती हैं तथा यहीं पर ही इनको हल किया जा सकता है।

(7) प्रशासनिक व्यय में बचत – स्थानीय स्वशासन इकाइयों में प्रशासनिक व्यय बहुत कम होता है। अत: व्यय में बचत होती है।

(8) व्यापक दृष्टिकोण स्थानीय स्वायत्तशासी संस्थाओं की कार्यप्रणाली व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित होती है। इन संस्थाओं के माध्यम से क्षेत्रीय प्रतिनिधि अपने क्षेत्र में सफाई, निर्माण तथा शिक्षा इत्यादि कार्यों का संचालन अपनी देख – रेख में कर सकते हैं।

(9) नागरिक गुण – स्थानीय इकाइयाँ जनता में नागरिक गुणों को विकास करती हैं। भाईचारा, सहयोग, स्वच्छता तथा समन्वय इत्यादि का ज्ञान व गुण स्थानीय निकायों द्वारा ही प्राप्त होते हैं।

(10) अन्य उपयोगिता-

  1. प्रशासनिक कार्यों में स्थानीय स्वशासी संस्थाएँ जनता को भागीदारी का अवसर प्रदान करती हैं।
  2. राज्य स्तरीय व केन्द्र सरकार के कार्यालयों में नौकरशाही से जिस प्रकार जनता को पीड़ित होना पड़ता है तथा जो भ्रष्टाचार उन कार्यालयों में देखने को मिलता है, स्थानीय स्वशासन में उससे जनता को मुक्ति मिलती है।
  3. स्थानीय निकायों के समस्त कार्य जन-भावनाओं पर आधारित होते हैं। स्वच्छता, गंदगी व प्रदूषण, महिला कल्याण तथा कमजोर व दलित वर्ग के लोगों के लिए सरकार द्वारा चलाई जाने वाली योजनाएँ प्राय: स्थानीय निकायों के माध्यम से सम्पन्न होती हैं।

प्रश्न 4.
73वें संविधान संशोधन की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
73वें संविधान संशोधन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(1) त्रिस्तरीय प्रणाली -73 वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा भारत के समस्त राज्यों के लिए त्रिस्तरीय संस्थागत ढाँचे का प्रावधान किया गया है। ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड / ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति एवं जिला स्तर पर जिला परिषद का गठन किया गया है।

(2) पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान करना – 73वें संविधान संशोधन द्वारा भारत के संविधान में एक नए अध्याय के रूप में एक नया ‘भाग – 9’ पंचायत के शीर्षक के साथ अनुच्छेद 243 और एक नई 11वीं अनुसूची जोड़ दी गई। इन संस्थाओं के क्षेत्राधिकार को व शक्ति में वृद्धि करने के लिए इन्हें 29 विषय (कार्य) दिए गए हैं। इसके साथ ही पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो गया।

(3) प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था – इस अधिनियम के द्वारा तीनों प्रकार की पंचायती राज संस्थाओं में ग्राम स्तर पर वार्ड पंच या सरपंच, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति सदस्य एवं जिला स्तर पर जिला परिषद के सदस्यों का जनता द्वारा सीधे निर्वाचन का प्रावधान किया गया है। इसके साथ-साथ प्रधान व जिला प्रमुख का चुनाव निर्वाचित सदस्यों में से किए जाने की व्यवस्था की गई है।

(4) ग्राम सभा को संवैधानिक दर्जा ग्रामीण क्षेत्रों में लोकतान्त्रिक संस्था के रूप में स्थानीय स्वशासन की एक इकाई के रूप में ग्राम सभा की संरचना की गई, जिसके लिए क्षेत्र के समस्त वयस्क मतदाताओं द्वारा मतदान किया जाता है। ग्राम सभा के अधिकारों एवं उत्तरदायित्वों का निर्धारण राज्य विधानमण्डलों द्वारा किया जाता है।

(5) पंचायतों का कार्यकाल – भारतीय संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार पंचायतों के तीनों स्तरों पर इनका कार्यकाल 5 वर्ष का निर्धारित किया गया है। इन पंचायतों का निर्वाचन 5 वर्ष का कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व ही कर लिया । जाना चाहिए।

(6) सदस्यों की योग्यताएँ: प्रत्येक मतदाता यदि वह 21 वर्ष की आयु को पूर्ण कर चुका हो तो पंचायत के निर्वाचन में भाग ले सकता है। तथा इसके साथ ही वह अदालत द्वारा अपराधी घोषित न किया जा चुका हो, पागल न हो।

(7) आरक्षण की व्यवस्था-यह संविधान संशोधन अधिनियम सभी संस्थाओं में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान करता है।

(8) करारोपण अधिकार राज्यों के विधान मण्डलों द्वारा पंचायतों को कुछ विशेष प्रकार के करों को निर्धारण करने के अधिकार सौंपे गए है। विभिन्न प्रकार के कर व शुल्क निर्धारित करने व उनको वसूल करने के अधिकार राज्य सरकार द्वारा पंचायतों को प्रदान किया गया है।

(9) राज्य निर्वाचन आयोग का गठन–पंचायतों के निर्वाचन के लिए तैयारी करना, मतदाता सूचियाँ तैयार करना, चुनाव का आयोजन करना, निरीक्षण करना आदि राज्य निर्वाचन आयोग का कार्य हैं। इस आयोग की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी। राज्यपाल निर्वाचन आयोग के कार्यों के सम्पादन के लिए उसे कर्मचारी उपलब्ध कराएगा।

(10) राज्य वित्त आयोग का गठन-इस संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए प्रत्येक 5 वर्ष पश्चात वित्त आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है। यह आयोग राज्यपाल को इन संस्थाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा, आय के स्त्रोतों, धन के वितरण, राज्य सरकार द्वारा प्राप्त अनुदान कर व चुंगी आदि के बारे में अनुशंसा करता है।

(11) लेख परीक्षण-इस संविधान संशोधन अधिनियम में यह भी प्रावधन किया गया है कि राज्य सरकार इन संस्थाओं के लेखों का समय-समय पर परीक्षक एवं जांच हेतु नियमों का निर्माण कर सकती है।

प्रश्न 5.
नगरों में स्थानीय स्वशासन से संबंधित 74 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नगरों में स्थानीय स्वशासन से संबंधित 74 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम
नगरों में स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने व उसे सक्रिय बनाने के लिए सन् 1992 में संविधान का 74 वाँ संशोधन संसद द्वारा पारित कर एक कानून बनाया गया जो 1 जून 1993 से लागू हुआ। इस अधिनियम द्वारा नगरों में स्थानीय स्वशासी संस्थाओं की स्थापना उनकी शक्तियों एवं कार्यों के संबंध में वैधानिक प्रावधान किए गए।

नगर निकायों के तीन प्रकार – इस अधिनियम द्वारा तीन प्रकार के नगर निकायों – नगर पंचायत, नगर परिषद एवं नगर निगम की व्यवस्था की गई है।
1. नगर पंचायत – इसे राजस्थान में नगर पालिका का नाम दिया गया। 10 हजार से 1 लाख तक की जनसंख्या वाले कस्बों में इसकी स्थापना की जाती है, जिसका प्रमुख चेयरमैन कहलाता है। जनसंख्या का यह आधार समय-समय पर परिवर्तनीय है।

2. नगर परिषद – संमान्यतः एक लाख से तीन लाख तक की जनसंख्या वाले नगरों में नगर परिषद की स्थापना की जाती है। इसे कई वार्डों में विभाजित कर दिया जाता है। प्रत्येक वार्ड से एक पार्षद का जनता द्वारा सीधे निर्वाचन किया जाता है। नगर परिषद के प्रमुख को अध्यक्ष या सभापति कहते हैं।

3. नगर निगम – तीन लाख से अधिक जनसंख्या वाले बड़े शहरों में नगर निगम की स्थापना की जाती है इसका प्रमुख मेयर या महापौर कहलाता है इनका चुनाव प्रत्यक्ष या परोक्ष (पार्षदों द्वारा) विधि – जो भी राज्य सरकार के विधान द्वारा निर्धारित की गई हो – द्वारा किया जाता है।

4. कार्यकाल संबंधी प्रावधान -74 वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनुसार नगर निकायों का कार्यकाल 5 वर्ष रखा गया है। यदि इससे पूर्व किसी संस्था को भंग कर दिया जाता है तो 6 माह की अवधि में उसका निर्वाचन कराना आवश्यक होगा। प्रत्येक नगर निकाय में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है।

अनुसूचित जातियों व जनजातियों का आरक्षण उस नगर निकाय क्षेत्र में इन वर्गों की जनसंख्या के अनुपात में होगा। आरक्षित स्थान चक्रानुक्रम ( रोटेशन) से आवंटित होंगे। पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने के लिए भी राज्य विधानमण्डल प्रावधान कर सकते हैं। महिलाओं के लिए कुल स्थानों के एक-तिहाई स्थान आरक्षित होंगे जिसमें अनुसूचित जातियों जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित स्थानों में भी महिलाओं का एक-तिहाई आरक्षण होगा।

5. चुनाव हेतु आयु संबंधी प्रावधान – समस्त नगरीथ निकायों में चुनाव लड़ने हेतु न्यूनतम आयु 21 वर्ष रखी गई है।

6. नगर निकायों की शक्तियाँ व दायित्व – नगर निकायों को 74 वें संविधान संशोधन द्वारा 12 वीं अनुसूची जोड़कर 18 विषयों पर शक्तियाँ व दायित्व प्रदान किये हैं। ये निम्नलिखित प्रकार से हैं-

  1. नगरीय योजना जिसके अन्तर्गत शहरी योजना भी है।
  2. भू – उपयोग नियमन व भवन निर्माण।
  3.  आर्थिक एवं सामाजिक विकास की योजनाएँ।
  4.  सड़कें एवं पुल।
  5. घरेलू, औद्योगिक एवं वाणिज्यिक प्रयोजन के लिए प्रबन्धन।
  6. सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता, सफाई एवं कचरा प्रबन्धन।
  7. समाज के विशिष्ट आवश्यकता वाले कार्य के हितों का संरक्षण।
  8. अग्निशमन सेवाएँ।
  9. नगरीय व वानिकी पर्यावरण संरक्षण एवं पारिस्थितिकी तंत्र का प्रबन्धन।
  10. शहरी निर्धनता निवारण कार्यक्रम।
  11.  गन्दी बस्ती सुधार व उन्नयन कार्यक्रम।
  12. सार्वजनिक उद्यान, खेल एवं मैदान आदि विकसित करना।
  13. शमसान कब्रिस्तान, विद्युत शवदाह ग्रहों का प्रबन्धन आदि।
  14. सांस्कृतिक, शैक्षणिक एवं सौन्दर्यपरक पहलुओं का विस्तार।
  15. कांजी गृहों का प्रबन्धन।
  16. जन्म मृत्यु पंजीयन।
  17. रोड लाइट, पार्किंग, बस स्टाफ जैसी सार्वजनिक सुविधाओं का विस्तार।
  18. वधशालाओं एवं चमड़ा उद्योग का विनियमन।
  19. राजस्थान में शहरी, स्थानीय शासन के इन तीन स्तरों के अलावा कुछ विशेष अभिकरण छावनी बोर्ड, टाउन एरिया कमेटी एवं
  20. अधिसूचित क्षेत्र समितियां आदि भी कार्य करते हैं।