Rajasthan Board RBSE Class 12 Biology Chapter 1

पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आवृतबीजी पौधों में पादप शरीर होता है –
(अ) द्विगुणित बीजाणुभिद्
(ब)अगुणित बीजाणुभिद्
(स) द्विगुणित युग्मकोभिद्
(द) अगुणित युग्मकोभिद्

प्रश्न 2.
कायिक जनन के लिए उपयोग में लिए जाने वाले पादप अंग को कहते हैं –
(अ) बाह्यदल पुंज
(ब) दलपुंज
(स) जायांग
(द) प्रवर्ध

प्रश्न 3.
कन्द द्वारा कायिक प्रवर्धन पाया जाता है –
(अ) मुराया में
(ब) आलू में
(स) ब्रायोफिल्लम में
(द) प्याज में

प्रश्न 4.
कर्तन द्वारा कृत्रिम कायिक प्रवर्धन होता है –
(अ) गन्ना में
(ब) चमेली में
(स) मोगरा में
(द) उपरोक्त सभी में

प्रश्न 5.
पुष्प एक रूपान्तरित………है –
(अ) जड़
(ब) पर्व
(स) प्ररोह
(द) मूल शीर्ष

उत्तरमाला
1. (अ)
2. (द)
3. (ब)
4. (द)
5. (ब)

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पुष्प के विभिन्न भागों या चक्रों के नाम बताइए।
उत्तर
पुष्प के विभिन्न भाग या चक्र

  1. बाह्यदल पुंज
  2. दलपुंज
  3. पुमंग तथा
  4. जायांग।

प्रश्न 2.
कायिक जनन किसे कहते हैं?
उत्तर
कायिक जनन (Vegetative reproduction) – प्रजनन की वह विधि जिसमें पौधे के किसी कायिक भाग; जैसे-जड़, तेना, पत्ती आदि से नये पौधे का निर्माण होता है, कायिक जनन कहलाती है।

प्रश्न 3.
गुलाब व मोगरे में कायिक प्रवर्धन कैसे होता है?
उत्तर
गुलाब में स्तम्भ कर्तन (Stem cutting) द्वारा तथा मोगरा में टीला दाब (Mound layering) द्वारा कायिक प्रवर्धन होता है।

प्रश्न 4.
कलम, रोपण तथा दाब लगाना विधियों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

  • कलम या कर्तन (Cutting) – किसी पौधे के पर्वसंधियों युक्त छोटे-छोटे टुकड़ों को जमीन में दबाकर नया पौधा तैयार करना कर्तन कहलाता है।
  • रोपण (Grafting) – दो भिन्न गुणों वाले पौधों के भागों को जोड़कर नये पौधों का निर्माण रोपण कहलाता है।
  • दाब (Layering) – पौधे की किसी शाखा को मातृ पौधे से अलग किए बिना जमीन में दबाकर नया पौधा तैयार करना दाब कहलाता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अनिषेकबीजता किसे कहते हैं?
उत्तर
अनिषेकबीजता (Agamosperrmy) – बिना निषेचन के बीज के निर्माण की प्रक्रिया को अनिषेकबीजता कहते हैं। इस प्रक्रिया में बीजाण्ड बिना निषेचन के ही बीज (Seed) में परिवर्तित हो जाता है। अर्थात् इसमें नर एवं मादा युग्मक के संयुग्मन की आवश्यकता नहीं होती है। बीजाण्ड में अर्द्धसूत्री विभाजन भी नहीं होता है जिससे गुणसूत्रों की संख्या द्विगुणित ही बनी रहती है। इस प्रकार निर्मित बीज जननक्षम (Viable) होते हैं अर्थात् नये पौधे को जन्म दे सकते हैं। उदाहरण – धतूरा, मक्का।

प्रश्न 2.
विभिन्न प्रकार की रोपण विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
रोपण की विधियाँ (Methods of Grafting)

  1. जिह्वा या व्हिप रोपण (Tongue or Whip grafting) – इस प्रकार के रोपण में समान मोटाई वाले कलम और स्कन्ध होते हैं। दोनों में 5-8 सेमी. लम्बा चीरा लगाया जाता है। इसके बाद स्कन्ध में V आकार का चीरा लगाते हैं। कलम को भी इस प्रकार का चीरा लगाते हैं कि वह स्कन्ध में फिट हो जाए। अब कलम को स्कन्ध में फंसाकर बाँध दिया जाता है।
  2. फच्चर रोपण (Wedge grafting) – इसमें स्कन्ध एवं कलम का व्यास समान होता है। स्कन्ध में V आकार का चीरा लगाते हैं। जबकि कलम में वेज आकार का चीरा लगाया जाता है। इन दोनों को जोड़कर बाँध दिया जाता है।
  3. किरीटि या मुकुट रोपण (Crown grafting) – इसमें स्कन्ध की मोटाई कलम से कई गुना अधिक होती है और एक स्कन्ध पर कई कलमें (Scions) रोपी जा सकती हैं।
  4. कलिका रोपण (Bud grafting) – इस विधि में एक कलिका को स्कन्ध की छाल में T आकार का चीरा लगाकर फंसा दिया जाता हैं। इसके बाद कलिका को खुला छोड़कर आधार पर बाँध दिया जाता है।

प्रश्न 3.
तनों द्वारा कायिक प्रवर्धन की विधियों का संक्षेप वर्णन कीजिए।
उत्तर
तनों द्वारा कायिक प्रवर्धन (Vegetative propagation by stems) – रूपान्तरित तने; जैसे – प्रकन्द, जैसे – अदरक, कन्द, जैसे – आलू, शल्ककंद; जैसे-प्याज, घनकंद; जैसे – अरबी, उपरिभूस्तारी; जैसे – दूब घास, अन्तः भूस्तारी; जैसे-पोदीना, भूस्तारी; जैसे – स्ट्राबेरी इत्यादि अनुकूल परिस्थितियों में पौधे के गुणन में सहायक होते हैं।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आवृतबीजी में अलैंगिक जनन का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर
आवृतबीजी में अलैंगिक जनन (Asexual reproduction in Angiosperms) – आवृतबीजियों में जनन का वह प्रकार जिसमें अर्द्धसूत्रण (Meiosis) एवं युग्मकों का संलयन नहीं होता है, अलैगिक जन्न कहलाता है। अलैंगिक जनन की दो प्रमुख विधियाँ हैं – अनिषेकबीजता तथा कायिक जनन।
1. अनिषेकबीजता (Agamospermy) – बिना निषेचन के बीज का निर्माण अनिषेकबीजता कहलाता है अर्थात् इसमें बीजाणु बिना निषेचन के ही बीज में परिवर्तित हो जाता है।

2. कायिक जनन (Vegetative propagation) – पौधे के किसी कायिक भाग, जैसे-जड़, तना, पत्ती आदि से नये पौधे का निर्माण कायिक प्रवर्धन कहलाता है।
कायिक प्रवर्धन दो विधियों से होता है –
(A) प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन तथा
(B) कृत्रिम कायिक प्रवर्धन

(A) प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन (Natural vegetative propagation) – विभिन्न पादप अंग प्राकृतिक रूप से नये पौधों का निर्माण करते हैं। इसमें अग्रलिखित प्रमुख हैं –

  • तनों द्वारा कायिक प्रवर्धन – रूपान्तरित तने; जैसे – कन्द, शल्क कंद, घनकंद, उपरि भूस्तारी, अन्त:भूस्तारी आदि अनुकूल परिस्थितियों में पौधे के गुणन में सहायक होते हैं।
  • जड़ों द्वारा कायिक प्रवर्धन – कुछ काष्ठीय पौधों की जड़े प्ररोह को उत्पन्न करती हैं जो नए पौधे के रूप में वृद्धि करते हैं। जैसे – चमेली, शीशम, नीम आदि। कुछ पौधों में कंदीय मूल होती हैं जो अपस्थानिक कलिकाओं को उत्पन्न करती हैं। जो नए पौधों को उत्पन्न करती हैं।
  • पत्तियों द्वारा कायिक प्रवर्धन – पत्थरचट्टा में पत्तियों के किनारों तथा बिगोनिया में पर्णवृन्त तथा पर्ण शिराओं की सतह से कलिकाएँ उत्पन्न होकर नए पौधों का निर्माण करती हैं।
  • जननांगों द्वारा कायिक प्रवर्धन – कुछ पौधों में पुष्प कलिकाओं के स्थान पर बहुकोशिक पत्रप्रकलिका (Bulbils) बन जाती हैं जो भूमि पर गिरकर नये पौधों का निर्माण करती हैं। जैसे – रामबांस।

(B) कृत्रिम कायिक प्रवर्धन (Artificial vegetative propagation) – ये विधियाँ मानव द्वारा पादपों के वाणिज्यिक उत्पादन के लिए उपयोग की जाती हैं।
ये निम्न प्रकार हैं –

  • कर्तन (Cutting) – इसमें स्तम्भ कर्तन व मूल कर्तन शामिल हैं।
  • दाब लगाना (Layering) – इसमें टोला दाब, वायु दाव या गूटी लगाना शामिल हैं।
  • रोपण (Grafting) – इसमें जिव्हा रोपण, फच्चर रोपण, मुकुट रोपण तथा कलिका रोपण शामिल हैं।

प्रश्न 2.
आवृतबीजी में पुष्प के विभिन्न अंगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
पुष्प के विभिन्न अंग (Various organs of a flower) – पुष्प आवृतबीजी पौधे का एक आकर्षक एवं महत्वपूर्ण अंग है जिसमें जननांग उपस्थित होते हैं। पुष्प एक सीमित वृद्धि करने वाला रूपान्तरित प्ररोह हैं। पुष्प पौधे की शाखा पर एक वृन्त द्वारा लगा होता है जिसे पुष्पवृन्त कहते हैं। पुष्पवृन्त का शीर्ष भाग चौड़ा होकर पुष्पासन (Thalamus) बनाता है। इस पर विभिन्न पुष्पांग व्यवस्थित होते हैं। एक प्रारूपिक पुष्प में पुष्पासन पर चार मुख्य पुष्पांग या चक्र पाए जाते हैं। जब पुष्प में ये चारों चक्र उपस्थित होते हैं तब यह पूर्ण पुष्प कहलाता है यदि कोई एक चक्र भी अनुपस्थित होता है तब इसे अपूर्ण पुष्प कहते हैं।
एक प्रारूपिक पुष्प के निम्नलिखित चार चक्र होते हैं –

  1. बाह्यदल पुंज (Calyx) – यह पुष्प का सबसे बाहरी चक्र होता है। यह प्रायः हरे रंग का होता है और अनेक बाह्य दलों (Sepals) से मिलकर बना होता है यह कलिका अवस्था में पुष्य की रक्षा करता हैं।
  2. दल पुंज (Corolla) – यह पुष्प का दूसरा चक्र है जो अनेक दलों (Petals) से मिलकर बना होता हैं। दल प्राय: रंगीन होते हैं और कीटों को परागण हेतु आकर्षित करते हैं।
  3. पुमंग (Androecium) – यह पुष्प का तीसरा चक्र है जो अनेक पुंकेसरों (Stamens) का बना होता है। पुंकेसर पुष्प के नर जननांग होते हैं। प्रत्येक पुंकेसर के तीन भाग होते हैं – परागकोष (Anther), पुर्ततु (Filament) तथा योजी (Connective)
  4. जायांग (Gynoecium) – यह पुष्प का सबसे भीतरी चक्र होता है। यह स्वयं अण्डपो (Carpels) से मिलकर बना होता है। यह पुष्य का मादी जननांग है। प्रत्येक अण्डप के तीन भाग होते हैं – अण्डाशय (Ovary), वर्तिका (Style) तथा वर्तिकाग्र (Stigma)। जायांग को स्त्रीकेसर (Pistil) भी कहते हैं।

अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आवृतबीजियों में जनन के मुख्य दो प्रकारों के नाम लिखिए।
उत्तर

  • अलैंगिक जनन
  • लैंगिक जनन।

प्रश्न 2.
आवृतबीजियों में बीजाणुभिदी अवस्था किससे निरूपित होती है?
उत्तर
आवृतबीजियों में बीजणुभिदी अवस्था मूल, प्ररोह तथा पत्तियों द्वारा निरूपित होती है।

प्रश्न 3.
पुष्पी पादपों में अर्द्धसूत्रण कहाँ होता है?
उत्तर
पुष्पी पादपो में अर्द्धसूत्रण युग्मक निर्माण के समय होता है।

प्रश्न 4.
अलैंगिक जनन को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है?
उत्तर
अलैगिक जनन को असंगजनन (Apomixis) के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 5.
कायिक प्रवर्धन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर.
पौधे के किसी कायिक भाग; जैसे-जड़, तना, पत्ती आदि से नये पौधे का विकास होना कायिक प्रवर्धन कहलाता है।

प्रश्न 6.
शल्क कन्द द्वारा कायिक प्रवर्धन के दो उदाहरण लिखिए।
उत्तर
शल्क कन्द द्वारा कायिक प्रवर्धन के उदाहरण हैं –

  • प्याज (Onion) तथा
  • लहसुन (Garlic)।

प्रश्न 7.
अन्तः भूस्तारी का उदाहरण दीजिए।
उत्तर
अन्तः भूस्तारी का उदाहरण-पोदीना (Mint)।

प्रश्न 8.
भूस्तारी का उदाहरण दीजिए।
उत्तर
भूस्तारी का उदाहरण-स्ट्राबेरी (Strawbery)।

प्रश्न 9.
ऐसे किसी पौधे का नाम बताइए जिसमें कन्दीय मूलों द्वारा कायिक प्रजनन होता है?
उत्तर
शकरकन्द (Sweet potato) में कन्दीय मूल (Tuberous roots) द्वारा कायिक प्रजनन होता है।

प्रश्न 10.
आलू के कन्द में उपस्थित आँखें वास्तव में क्या होती हैं?
उत्तर
आलू के कन्द में उपस्थित आँखें अपस्थानिक कलिकाएँ होती हैं।

प्रश्न 11.
दो पौधों के नाम लिखिए जिनमें पत्तियों द्वारा कायिक प्रवर्धन हो सकता है।
उत्तर

  • पत्थरचट्टा (ब्रायोफिल्लम),
  • बिगोनिया

प्रश्न 12.
दो पौधों के नाम लिखिए जिनमें पत्रप्रकलिकाओं द्वारा कायिक प्रजनन होता है।
उत्तर

  • रामबांस (Agaue)
  • रतालू (Diosorea)।

प्रश्न 13.
गन्ना में मुख्य रूप से किस प्रकार का प्रवर्धन कराया जाता है?
उत्तर
गन्ना में मुख्य रूप से स्तम्भ कर्तन (Cutting) द्वारा कायिक प्रवर्धन कराया जाता है।

प्रश्न 14.
गृटी विधि का प्रयोग किस प्रकार के पौधों से नये पौधे उत्पन्न करने के लिए किया जाता है?
उत्तर
वृक्षों से, जिनकी शाखाएँ मोटी होती है।

प्रश्न 15.
किस विधि में एक ही स्कन्ध पर कई कलमें लगाई जा सकती है।
उत्तर
किरीट या मुकुट रोपण विधि में।

प्रश्न 16.
पुष्प क्या है?
उत्तर
पुष्प रूपान्तरित प्ररोह है जिसमें पौधे के जननांग उपस्थित होते हैं।

प्रश्न 17.
पुष्प के दो जननांगों के नाम लिखिए।
उत्तर

  • नर जननांग – पुमंग (Androeciurm)।
  • मादा जननांग – जायांग (GyneCituna)

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पीढ़ी एकान्तरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
पीढी एकान्तरण (Alternation of generation) – आवृतबीजी पादपों में मुख्य तथा दीर्घजीवी अवस्था बीजाणुभिद् (Sporophyte) कहलाती हैं जो कि, मूल, प्ररोह तथा पत्तियों द्वारा निरूपित होती हैं। यह द्विगुणित (Diploidy होती हैं। बीजाणुद्भिद पर अर्द्धसूत्रण (MIeiosis) द्वारा युग्मकों का निर्माण होता है। युग्मक, अगुणित होते हैं और युग्मकोभिद् (Gametophyte) अवस्था को प्रदर्शित करते हैं अत: यह अवस्था अगुणित होती हैं। युग्मकों के संयुजन से पुनः द्विगुणित बीजाणुभिद् अवस्था स्थापित होती है। इस प्रकार युग्मकोभिद् तथा बीजाणुभिद् अवस्थाओं के एकान्तरण को पीढ़ी एकान्तरण कहते है।

प्रश्न 2.
असंगजनन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
असंगजनन (Appormixis) : यह अलैगिक जनन का ही एक प्रकार है। इसमें बीजाण्डकाय (Nucellus) को द्विगुणित कोशिकाओं या अध्यावरण (Integument). द्विगुणित अण्ड या कुछ अन्य युग्मकोभिद् कोशिकाओं से सीधे ही वृद्धि करने वाले भूण के साथ बीज या नयी व्यष्टियों का निर्माण होता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए –
(1) कन्द
(2) प्रकन्द
उत्तर

  1. कन्द (Tubers) – यह रूपान्तरित भूमिगत तना होता है, जिसमें प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए भोजन संचित रहता है। इस पर पर्वसन्धियाँ अपह्वासित हो जाती हैं। अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर इस पर उपस्थित अपस्थानिक कलिकाएँ प्रस्फुटित होकर नये पौधों का निर्माण करती हैं। उदाहरण-आलू (Potato)।
  2. प्रकन्द (Rhizome) – प्रकन्द मुख्य भूमिगत तना होता है, जिस पर स्पष्ट पर्व एवं पर्वसन्धियां पायी जाती हैं। प्रकन्द में प्रतिकूल परिस्थितियों में सुसुप्तता के लिए भोजन एकत्र रहता है। इनकी पर्व सन्धियों पर अपस्थानिक कलिकाएँ पायी जाती हैं जो अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर वायवीय प्ररोह बनाती हैं। उदाहरण – अदरक, हल्दी।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए
(1) बल्ब
(2) घनकन्द
उत्तर

  1. बल्ब (Bulb) – बल्व भूमिगत संघनित तने होते हैं, जिनके ऊपर एक या अधिक कलिकाएँ पायी जाती हैं। जब इनको जमीन में बोया जाता है तब बल्ब के अन्दर पायी जाने वाली कलियाँ प्रस्फुटित होकर नये पौधे का निर्माण करती हैं। उदाहरण-प्याज, लहसुन।
  2. घनकन्द (Corm) – ये अशाखित भूमिगत फूले हुए (Swollen) तने हैं जिनके ऊपर वृत्ताकार गाँठे (Circular nodes) पायी जाती हैं। इन्हीं गाँठों पर कलिकाएँ पायी जाती हैं जो नए पौधे को जन्म देती हैं। उदाहरण – जिमीकन्द, क्रोकस आदि।

प्रश्न 5.
प्रकन्द एवं घनकन्द में अन्तर लिखिए।
उत्तर
प्रकन्द एवं घनकन्द में अन्तर –

 प्रकद (Rhizome)घनकद (Corm)
1.यह चपटा, बेलनाकार होता है।यह अण्डाकार होता हैं।
2.भूमि के अन्दर समानान्तर बढ़ता हैं।भूमि के अन्दर ऊध्वधर वृद्धि करता है।
3.अपस्थानिक जड़े पर्व सन्धियों से निकलती हैं।अपस्थानिक जड़े तने के आधारी भाग से निकलती हैं।
4.शाखाएँ शीर्षस्थ कलिका से निकलती हैं।शाखाएँ कक्षस्थ कलिका से निकलती हैं।

प्रश्न 6.
उपरि भूस्तारी तथा अन्त: भूस्तारी में अन्तर लिखिए।
उत्तर
उपरि भूस्तारी तथा अन्त: भूस्तारी में अन्तर –

 उपरि भूस्तारी (Runner)अन्तः भूस्तारी (Suckers)
1.ये भूमि की सतह के ऊपर रेंगकर आगे बढ़ते हैं।ये भूमि की सतह के अन्दर क्षैतिज वृद्धि करते हैं।
2.नियमित अन्तराल पर पर्व सन्धियाँ पायी जाती हैं।पर्व सन्धियां नियमित अन्तराल पर पायी जाती हैं।
3.पर्व सन्धि से नीचे की ओर अपस्थानिक जड़े निकलती हैं।
उदाहरण – दूब घास।
पर्व सन्धि से ऊपर की ओर वायवीय शाखाएँ निकलती हैं।
उदाहरण – पोदीना।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित के दो-दो उदाहरण लिखिए –
(1) कन्दीय मूल द्वारा कायिक प्रजनन
(2) पत्तियों द्वारा कायिक प्रजनन
(3) बुलबिल्स द्वारा कायिक प्रजनन
उत्तर

  1. कन्दीय मूलो द्वारा कायिक प्रजनन – एस्पेरेगस, डहेलिया।
  2. पत्तियों द्वारा कायिक प्रजनन – ब्रायोफिल्लम, विगोनिया।
  3. बुलविल्स द्वारा कायिक प्रजनन – रामबांस, रतालू।

प्रश्न 8.
आवृतबीजी पादपों में प्रजनन की विभिन्न विधियों का प्रवाह आरेख बनाइए।
उत्तर
आवृतबीजी पादपों में प्रजनन की विधियों का प्रवाह चित्र

प्रश्न 9.
कलिका रोपण का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर
कलिका रोपण (Bud grafting) – यह कृत्रिम कायिक प्रवर्धन की एक विधि हैं। इस विधि में उत्तम गुणों वाले पौधे की स्वस्थ कलिका को इसके आन्तरिक ऊतकों सहित निकाल लिया जाता है। अब स्कन्ध (जिस पौधे में कलिका का रोपण करना है) में एक T आकार का चीरा लगाते हैं। ध्यान रहे कि स्कन्ध की छाल को अलग नहीं करते हैं। अब कलिका को स्कन्ध के T आकार में फंसा कर छाल को पुनः उसकी जगह व्यवस्थित कर देते हैं। अब इसे अन्य ठीक प्रकार से बाँध दिया जाता है। कुछ समय बाद कलिका वृद्धि करने लगती हैं और गुणों वाली शाखा बनाती हैं।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित का एक-एक कार्य लिखिए –
(1) बाह्य दल पत्रे
(2) दल पत्र
(3) पुमंग
(4) जायग
उत्तर

  1. बाह्य दल पत्र – कलिका अवस्था में पुष्प के अंगों की रक्षा करना।
  2. दल पत्र – परागण हेतु कीटों को आकर्षित करना।
  3. पुमंग – परागकणों का निर्माण करना।
  4. जायांग – बीजाणु का निर्माण करना।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –
(i) स्तम्भ कर्तन
(ii) मूल कर्तन
(iii) टीला दाब
(iv) गूटी
उत्तर
(i) स्तम्भ कर्तन (Stem cutting) – इस विधि में पौधे के स्तम्भ भाग को उपयुक्त आकार के टुकड़ों (प्रायः 20-30 सेमी०) में काटकर जमीन में रोपा जाता है। टुकड़ों में शीघ्र जड़े उत्पन्न कराने के लिए इन टुकड़ों के निचले भाग को जमीन में रोपने से पहले कुछ मिनट तक उपयुक्त रसायन में डुबोया जाता है। कर्तन द्वारा कायिक प्रवर्धन को अनेक कारक प्रभावित करते हैं; जैसे – प्रवर्ध की लम्बाई, मातृ पादप की आयु, रोपाई का वातावरण आदि।
उदाहरण – गन्ना (Sugarcane), अंगूर (Grapes), गुलाब (Rose), बोगेनविलिया (Bougainvillea), चाय (Tea), गुड़हल (China rose), डुरेन्टा (Durantu) आदि पादपों का कायिक प्रवर्धन स्तम्भ कर्तन द्वारा आसानी से कराया जा सकता है।

(ii) मूल कर्तन (Root cutting) – इस विधि में जड़ों के लम्बे टुकड़े लेकर इन्हें जमीन में रोपा जाता है। जड़ के इन टुकड़ों में अपस्थानिक जड़े एवं अपस्थानिक कलिकाएँ विकसित करने की क्षमता होनी चाहिए। मूल कर्तन के अन्तर्गत मूल के टुकड़ों या कर्तन को सामान्यतः ऊर्ध्व स्थिति में लगाया जाता है जिससे कि शीर्ष पर उपस्थित अपस्थानिक कलिकाएँ प्रस्फुटित (Sprout) हो सकें।
उदाहरण – नींबू (Lemon), अमरूद (Guava), सेब (Apple), चेरी (Cherry) आदि पादपों का कायिक प्रवर्धन मूल कर्तन द्वारा कराया जाता है।

(iii) टीला दाब (Mound layering) – इस विधि में तने की झुकी हुई शाखा को जमीन में दबा दिया जाता है। जमीन में दबाते समय यह ध्यान रखा जाता है कि एक या एक से अधिक पर्व सन्धियाँ जमीन में दब जाएँ व शाखा का शीर्ष भाग जिस पर पत्तियाँ लगी हों वह जमीन से ऊपर हो। कुछ समय बाद जमीन में गड़े स्तम्भ की पर्वसन्धियों से अपस्थानिक जड़े फूटने लगती हैं। उचित समय के पश्चात् इस शाखा को मातृ पौधे से । काटकर मिट्टी के पिण्ड सहित अलग कर लिया जाता है।
उदाहरण – चमेली (Chameli), मोंगरा (Mongra) आदि।

(iv) वायु दाब या गूटी लगाना (Air layering or Gootee) – इस विधि का। उपयोग वृक्षों में किया जाता है जिनकी शाखाएँ मोटी व काष्ठीय होती हैं। इस विधि में उपयुक्त शाखा के सामान्य मोटे स्वस्थ भाग पर चारों ओर बाहरी परत या छाल को वलय के रूप में हटा दिया जाता है। अब छाल रहित भाग मॉस (Mass), गीली मिट्टी या रुई (Cotton) से ढक दिया जाता है जो इस भाग को नम एवं सुरक्षित रखते हैं। इस ढके हुए भाग को गूटी कहते हैं। गूटी भाग पर बूंद-बूंद करके पानी टपकाया जाता है। इसके लिए चित्रानुसार एक घड़ा वृक्ष की किसी ऊपरी शाखा पर लटका दिया जाता है और उसकी तली में एक छेद करके उसमें रस्सी का टुकड़ा लगा दिया जाता है। 4-8 सप्ताह बाद गूटी के ऊपरी भाग से जड़े निकलती दिखाई देती हैं। इस जड़ युक्त भाग को मुख्य पौधे से अलग करके मिट्टी में रोप दिया जाता है।
उदाहरण – लीची (Litchi), अनार (Pomegranate), गुड़हल (China rose), अमरूद (Guava), सन्तरा (Orange), नींबू (Lemon) आदि।

प्रश्न 2.
रोपण की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
रोपण (Grafting) – कायिक प्रवर्धन की इस कृत्रिम विधि में दो अलग-अलग पौधों के भागों को इस प्रकार जोड़ते हैं कि वे संयुक्त होकर एक नये पौधे के रूप में वृद्धि कर सके। उत्तम किस्म (Veriety) के पादप के उस भाग को जिसका रोपण किया जाता है, कलम (Scion) कहते हैं। दूसरा निम्न गुणों वाला स्थानीय पादप जिस पर रोपण किया जाता है अर्थात् कलम को लगाया जाता | है और नये पौधे का आधार बनाता है इसे स्कन्ध (Stock) कहते हैं। कलम | और स्कन्ध को इस प्रकार काटकर और कसकर बाँध देते हैं जिससे कि दोनों के एधा (Cambium) एक-दूसरे के सम्पर्क में आ जाएँ। कुछ सप्ताह में दोनों भागों की एधाएँ आपस में जुड़ जाती हैं व इनकी कोशिकाएँ विभाजित होना प्रारम्भ कर देती हैं। अब कलम और स्कन्ध दोनों के संवहन | ऊतक आपस में सम्पर्क स्थापित कर लेते हैं।
उदाहरण – रोपण विधि आर्थिक रूप से उपयोगी पौधों; जैसे – गुलाब (Rose), आम (Mango), अमरूद (Guava), सेब (Apple), नींबू (Lemon), नाशपाती (Pear), बेर (Plum), पीच (Peach) आदि पौधों के प्रवर्धन के लिए उपयोग की जाती है।
रोपण की निम्नलिखित प्रमुख विधियाँ हैं –

1. व्हिप या जीभी या जिह्वा रोपण (Whip or Tongue grafting) – इस प्रकार के रोपण में समान मोटाई वाले स्तम्भों को कलम एवं स्कन्ध के लिए चुना जाता है। कलम एवं स्कन्ध दोनों में 5-8 सेमी का चीरा लगाया जाता है। इसके बाद स्कन्ध में V अकार का चीरा लगाते हैं। कलम को भी इस प्रकार से चीरा लगाया जाता है जिससे कि यह स्कन्ध में ठीक प्रकार से फिट हो जाए। कलम को स्कन्ध में लगाने के बाद दोनों को कसकर बाँध देते हैं।

2. फच्चर रोपण (Wedge grafting) – इस विधि में कलम और स्कन्ध का व्यास समान होना चाहिए। स्कन्ध (Stock) में V आकार का चीरा लगाते हैं जबकि कलम (Scion) में वेज के आकार (Wedge shaped) का चीरा लगाते हैं। कलम को स्कन्ध में फँसाकर अच्छी तरह बाँध दिया जाता है।

3. किरीट या मुकुट रोपण (Crown grafting) – इस विधि में कई कलमों (Scions) को चयनित करके उनके आधार (Base) को काटकर स्फानवत् (Wedge shaped) बना लेते हैं। अब स्कन्ध के किनारों पर कई दरारें बनाकर कलमों के आधारों को इनमें फंसा दिया जाता है। इसके पश्चात् इसे कसकर बाँध दिया जाता है। इसमें स्कन्ध का व्यास कलमों के व्यास की अपेक्षा कई गुना अधिक होता है।

4. कलिका रोपण (Bud grafting) – इस विधि में एक कलिका (Bud) का रोपण किसी उपयुक्त स्तम्भ (Stock) में किया जाता है। इसमें उत्तम गुणों वाले पौधे की स्वस्थ कलिका को तेज चाकू की सहायता से काफी गहराई तक से निकाला जाता है। अब किसी अन्य पौधे के स्तम्भ में, जिसमें कलिका का रोपण किया जाता है, में T आकार का कटान (Cut) बनाते हैं। छाल को इस प्रकार उठाते हैं कि एधा (Cambium) दिखने लगे। अब ली गई कलिका को स्तम्भ के कटान में घुसाकर उठाई गई छाल (Bark) को पुनः मूल अवस्था में कर देते हैं। कली को खुला रखते हैं तथा इसके जोड़ पर रोपण मोम (Grafting wax) लगाकर बाँध देते हैं। 3-4 सप्ताह में कली प्रस्फुटित हो जाती है। मूल वृन्त की पत्तियों और कलियों को तोड़कर अलग कर देते हैं। कुछ समय बाद स्कन्ध के लिए प्रयुक्त पौधे के शीर्ष भाग को रोपित कलिका के ऊपर से काट देते हैं। कलिका रोपण सेब (Apple), नाशपाती (Pear), गुलाब (Rose) आदि में किया जाता है।