Chapter 1 कुहासा और किरण

कथावस्तु पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
‘कुहासा और किरण’ नाटक की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए।
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक की प्रमुख घटना का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। (2016)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक में वर्णित सामाजिक समस्याओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए। (2016)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक का सारांश प्रस्तुत कीजिए। (2016)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक की कथा/कथावस्तुकथानक संक्षेप में लिखिए। (2018, 16, 14, 11)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ का कथासार अपने शब्दों में लिखिए। (2012, 11)
उत्तर:
प्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखित ‘कुहासा और किरण नाटक आधुनिक भारतीय समाज की सामाजिक एवं राजनीतिक समस्या को राष्ट्रीय परिवेश में व्यंजित करता हुआ समाज में फैले भ्रष्टाचारियों एवं मुखौटाधारियों पर सीधा कुठाराघात करता है। मुल्तान में हुए वर्ष 1942 के राष्ट्रीय आन्दोलन में स्वतन्त्रता सेनानियों के विरुद्ध मुखबिरी करने वाला कृष्णदेव अपने पाखण्ड़ से स्वयं को कृष्ण चैतन्य नाम से स्वतन्त्रता सेनानी एवं राष्ट्रप्रेमी के रूप में प्रतिष्ठित कर लेता है। सम्पूर्ण नाटक तीन अंकों में विभाजित है। तीन अंकों के अध्ययन के लिए उत्तर 2, 3 व 4 देखें।

प्रश्न 2.
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रथम अंक की कथा का सार लिखिए। (2017)
उत्तर:
नाटक का आरम्भ कृष्ण चैतन्य के निवास पर अमूल्य और कृष्ण चैतन्य की सचिव (सेक्रेटरी) सुनन्दा के वार्तालाप से होता है। कृष्ण चैतन्य की पष्टिपूर्ति (60वें जन्मदिवस के अवसर पर अमूल्य एवं चैतन्य के अतिरिक्त उमेशचन्द्र, विपिन बिहारी, प्रभा आदि उन्हें बधाई देते हैं। पाखण्डी कृष्ण चैतन्य को राष्ट्र के प्रति सेवाओं के बदले १ 250 मासिक पेंशन मिलती है। वह अनेक प्रकार के गैर-कानूनी कार्य करता है। उसके घृणित कार्यों से तंग आकर ही उसकी पत्नी गायत्री भी उसे छोड़कर अपने भाई के पास चली जाती है। देशभक्त राजेन्द्र के पुत्र अमूल्य से कृष्ण चैतन्य हमेशा सशंकित रहता है। अतः उसे अपने यहाँ से हटाकर विपिन बिहारी के यहाँ हिन्दी साप्ताहिक का सम्पादन करने के लिए नियुक्त कर देने की सूचना देता है।

अमूल्य के रिश्ते की एक बहन प्रभा नारी अधिकार को लेकर लिखे गए अपने उपन्यास को १ चैतन्य के माध्यम से छपवाना चाहती है। मुल्तान षड्यन्त्र केस, जिसमें कृष्ण चैतन्य ने मुखबरी की थी, के दल के नेता डॉ. चन्द्रशेखर की पत्तमालती राजनीतिक पेशन दिलाने का आग्रह करने हेतू कृष्ण चैतन्थ के पास आती है और उसे पहचान लेती हैं। प्रभा एवं मालती के बीच बहस होती है। पुरानी स्मृतियां एवं कलई खुलने के भय से कृष्ण चैतन्य मानसिक रूप से व्याकुल हो जाता है। वहाँ उपस्थित अमूल्य को भी उसकी वास्तविकता का आभास हो जाता है।

प्रश्न 3.
‘कुहासा और किरण’ नाटक के सर्वाधिक आकर्षक स्थल का वर्णन कीजिए। (2016)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा का सारांश (2013, 12, 11)
उत्तर:
‘कुहासा और किरण’ नाटक का सर्वाधिक आकर्षक स्थल द्वितीय अंक में ही समाहित हैं। इस अंक का प्रारम्भ विपिन बिहारी के निजी कक्ष से होता है। विपिन बिहारी पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादक है, जो पत्रिका छापने के लिए मिलने वाले सरकारी कोटे के कागज को ब्लैक करता है। यह ब्लैक मार्केटिंग उमेशचन्द्र अग्रवाल की दुकान से होती है। ये दोनों देश के भ्रष्ट सम्पादकों एवं व्यापारियों के प्रतिनिधि हैं। दोनों का चरित्र आडम्बरपूर्ण एवं कृत्रिम है, जिन्हें एक अन्य भ्रष्टाचारी कृष्ण चैतन्य का संरक्षण प्राप्त है।

अमूल्य द्वारा मुल्तान षड्यन्त्र केस के बारे में जानकारी दिए जाने तथा उसमें कृष्ण चैतन्य की देशद्रोही की भूमिका को पत्रिका के माध्यम से प्रकट करने सम्बन्धी दिए गए सुझाव को विपिन बिहारी अम्वीकार कर देता है। वह कृष्ण चैतन्य के विरुद्ध कुछ भी छापने से मना कर देता है। वह कृष्ण चैतन्य के खिलाफ कुछ भी लिखने में असमर्थता व्यक्त करता है। वह सुनन्दा, प्रभा व अमूल्य को कृष्ण चैतन्य के विरुद्ध कोई भी कार्य न करने के लिए कहता है। इसी बीच वहाँ पुलिस इंस्पेक्टर आकर अमूल्य को पचास रिम कागज ब्लैक में बेचने के अपराध में गिरफ्तार कर लेता है। सुनन्दा और प्रभा कृष्णचैतन्य के इस कुकृत्य पर क्रोधित होती हैं। तभी उमेशचन्द्र आकर उन्हें अमूल्य द्वारा आत्महत्या करने के असफल प्रयास की सूचना देता है। सुनन्दा इस सम्पूर्ण घटना के विषय में गायत्री को सूचित करती है। इस घटना के पश्चात् विपिन बिहारी आत्मग्लानि का अनुभव कर कृष्ण चैतन्य के सम्मुख अपराध के इस मार्ग को छोड़ने की अपनी इच्छा प्रकट करता है, लेकिन वह तैरेंगे हम तीनों, डूबेंगे हम तीनों, कहकर उसका विरोध करता है। इसी बीच गायत्री की कार दुर्घटना में मृत्यु हो जाती हैं। पत्नी की मृत्यु के पश्चात् चैतन्य को आत्मग्लानि होती है। यहीं पर दूसरा अंक समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 4.
‘कुहासा और किरण’ नाटक के तृतीय एवं अन्तिम अंक की कथा पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए। (2008, 06)
उत्तर:
कृष्ण चैतन्य अपने निवास पर गायत्री देवी के चित्र के सम्मुख स्तब्ध भाव से बैठे अपनी पत्नी के बलिदान की महानता का अनुभव करता है। सुनन्दा मृत्यु से पूर्व गायत्री देवी द्वारा लिखे गए पत्र की सूचना पुलिस को देकर जीवित व्यक्तियों के मुखौटों को उतारना चाहती है। इसी समय सी. आई.डी. के अधिकारी आते हैं। विपिन बिहारी उन्हें अपने पत्रों के स्वामित्व परिवर्तन की सूचना देता है। प्रभा उन्हें बताती है कि अमूल्य निर्दोष है। कृष्ण चैतन्य कागज की चोरी का रहस्य स्पष्ट करते हुए कहता है कि वास्तव में चोरी की यह कहानी एक जालसाजी थी, क्योंकि अमूल्य उसका राज जान गया था कि वह कृष्ण चैतन्य नहीं, अपितु कृष्णदेव हैं-मुल्तान षड्यन्त्र को मुखबिर। इसके पश्चात् यह विपिन एवं उमेश के भ्रष्टाचार एवं चोरबाजारी का रहस्य भी खोल देता है। सी. आई. डी. के अधिकारी टमटा साहब सभी को अपने साथ ले जाने लगते हैं, तभी पेंशन न मिलने से विक्षिप्त-सी हो गई मालती आकर अपनी पेंशन की बात कहती हैं। कृष्ण चैतन्य अपना सब कुछ मालती को सौंप देता है। कृष्ण चैतन्य के साथ-साथ विपिन बिहारी एवं उमेश अग्रवाल भी गिरफ्तार कर लिए आते हैं तथा निर्दोष होने के कारण अमूल्य को छोड़ दिया जाता है। अमूल्य, प्रभा आदि सभी को अपने अन्तर अर्थात् हृदय के चोर दरवाजों को तोड़ने तथा मुखौटा लगाकर घूम रहे मगरमच्छों को पहचानने का सन्देश देता है। ‘बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता’ इस कथन के साथ नाटक समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 5.
‘कुहासा और किरण’ नाटक के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए। (2013, 12, 11, 10)
उत्तर:
प्रस्तुत नाटक के नाटककार का उद्देश्य देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर दृष्टिपात करके, उससे देश को बचाकर आदर्श स्थिति की ओर ले जाना तथा देशप्रेम एवं राष्ट्रीय चेतना की रक्षा करने का सन्देश देना है। इसी उद्देश्य के निराशा, भ्रष्टाचार, छद्म के धुन्धले कुहासापूर्ण वातावरण को देशप्रेम, अनुसार कर्तव्यनिष्ठा, आस्था, नवचेतना एवं आचरण की उज्ज्वलता की किरण के प्रकाश से स्वच्छ बना देने में लेखक की आशा एवं आकांक्षा का संकेत मिलता है।

कुहासे के रूप में कृष्ण चैतन्य, विपिन बिहारी, उमेशचन्द्र जैसे पात्र हैं, तो किरण के रूप में अमूल्य, सुनन्दा, प्रभा, गायत्री आदि पात्र हैं। ये भ्रष्टाचार और पाखण्ड के कुहासे को अपने आचरण की किरण से दूर करने के लिए प्रयत्नरत हैं। आज सम्पूर्ण समाज एवं देश को प्रष्टाचार, बेईमानी, पूर्तता आदि के कुहासे ने बुरी तरह आच्छादित कर रखा है, ऐसे में समाज एवं देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले सीमित लोग ही आशा की किरण के रूप में समग्र समाज को एक उचित मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं। इस तरह स्पष्ट होता है कि प्रस्तुत नाटक का नाम ‘कुहासा और किरण’ सर्वथा सार्थक है।

प्रश्न 6.
नाट्यकला की दृष्टि से कुहासा और किरण नाटक की समीक्षा कीजिए। (2016)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक की विशेषताएँ लिखिए। (2018, 17, 16)
अथवा
नाटक के तत्वों की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ नाटक की समीक्षा कीजिए। (2014, 13, 11, 10)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2014, 12)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक की कथावस्तु (कथानक) की समीक्षा कीजिए। (2011)
अथना
‘कुहासा और किरण’ नाटक की कथावस्तु की विशेषता बताइए। (2012)
उत्तर:
प्रस्तुत नाटक ‘कुहासा और किरण राष्ट्रीय स्तर पर व्याप्त आधुनिक भारत की सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं को उठाते हुए छद्म व्यक्तित्व, भ्रष्ट आचरण एवं मुखौटा लगाने वाले पाखण्डी लोगों पर सीधा प्रहार करता है। इसमें नाटकीय तत्त्वों के निर्वाह का समुचित ध्यान रखा गया है। प्रस्तुत नाटक का कथानक भारत की सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं से सम्बन्धित है। नाटककार ने वर्ष 1975 के वर्तमान भारत की अनुभूतिपरक प्रत्यक्ष जीवन-घटनाओं से कथानक का चयन किया है।

नाटक का कथानक तीन अंकों एवं छः दृश्यों में अत्यन्त कलात्मक ढंग से विकसित हुआ है। नाटक की कथावस्तु का आधार एक सत्य घटना है, जिसे यथार्थ एवं कल्पना के सरल सामंजस्य से नाटककार ने कृष्ण चैतन्य की कहानी का रूप देकर संजोया है। प्रधान कथावस्तु के रूप में अमूल्य की जीवन कहानी है, जो कण चैतन्य की कहानी के माध्यम से अन्य कशास्त्रों को साथ लेकर चलती है। कृष्ण चैतन्य का कृत्रिम एवं आडम्बरपूर्ण जीवन अस्तुतः निष्ठावान अमूल्य एवं स्वतन्त्रता सेनानियों के सम्मुख तुच्छ एवं तिरस्कारणीय है। मुख्य विषय-वस्तु के साथ अनेक प्रासंगिक कथाओं को बड़े सुचारु एवं संगठित रूप से जोड़ा गया है।

लेखक ने घातै प्रतिघात, उतार-चढ़ाव के आधार पर कथावस्तु का प्रारम्भ, विकास एवं अन्त अत्यन्त कौशल से संयोजित किया है। सामाजिक जीवन की समस्याओं के साथ ऐतिहासिक घटनाओं का सामंजस्य कथानक की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। स्वाभाविकता, रोचकता, यथार्थता, सुसम्बद्धता आदि सभी गुणों की दृष्टि से नाटक का कथानक परिपूर्ण है और उसमें आज के जीवन की प्रत्यक्ष झाँकी हैं। कथानक की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी प्रतीकात्मकता है। एक ओर देश एवं समाज के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देने वालों की करुण कहानी है, तो दूसरी ओर समाज के पाखण्डी नेताओं, होगी सम्पादकों तथा पूँजीपतियों एवं व्यापारियों की कुत्सित योजनाएँ।

प्रश्न 7. :देशकाल और वातावरण की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ नाटक की समीक्षा कीजिए। (2011)
उत्तर:
परिस्थितियों, प्रवृत्तियों, समस्याओं एवं विविध प्रश्नों का अंकन देशकाल तथा वातावरण के अन्तर्गत ही यथार्थ रूप से सम्भव हो सकता है। यह नाटक के आधार-तत्त्वों में प्रमुख घटक है। प्रस्तुत नाटक में देशकाल का अत्यन्त सुन्दर एवं पूर्णरूप से निर्वाह किया गया है। नाटक का सम्पूर्ण कथानक, घटनाएँ एवं पात्र वर्तमान युग की प्रवृत्तियों, परम्पराओं, दुर्बलताओं, विशिष्टताओं एवं यथातथ्य वातावरण से पूर्णतया अनुप्राणित हैं। प्रस्तुत नाटक में वर्तमान काल की सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करते हुए देश में व्याप्त भ्रष्टाचारियों, मुखबिरों, चोरबाजारियों आदि का वास्तविक निरूपण किया गया है। तथा स्वतन्त्रता सेनानियों के परिवार, पुत्र, पत्नी आदि की दीन-हीन दशा का वर्णन किया गया है।

नाटक में घटित होने वाली अधिकांश घटनाएं आज भी हमारे दैनिक जीवन में सामान्य रूप से घटित होती है। नाटक में सामाजिक व्यंग्य का पुट सर्वत्र विद्यमान है, जो भ्रष्टाचारियों एवं मखौटाधारियों पर सीधा प्रहार करता है। पूजा-पाठ में संलग्न रहने वाले, समाज एवं देश-सेवा का तथाकथित व्रत लेने वाले पाखण्डी नेता, पाँच-पाँच पत्र निकालने की खानापूर्ति कर सरकारी कोटे में मिले कागज को ब्लैक करने वाले सम्पादक-प्रकाशक, 11-11 छद्म संस्थाओं के संचालक, भ्रष्टाचारी व्यापारियों आदि का अत्यन्त सजीव चित्रण इस नाटक को प्रामाणिक बनाता है। कुल मिलाकर नाटक में युग के वातावरण, समाज एवं देश की शोचनीय एवं दयनीय दशा की स्पष्ट झलक मिलती है।

प्रश्न 8.
‘कुहासा और किरण’ का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए। (2014, 13, 12, 10)
अथवा
नाटक ‘कुहासा और किरण’ का प्रतिपाद्य क्या है? नाटक के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
‘कुहासा और किरण’ नाटक में नाटककार का एक प्रत्यक्ष उद्देश्य है-आधुनिक भारत की सामाजिक एवं राजनीतिक समस्या को राष्ट्रीय परिवेश में स्पष्ट करके भ्रष्ट आचरण और मुखौटाधारियों पर सीधा कुठाराघात करना। वह कृष्ण चैतन्य, उमेशचन्द्र, विपिन बिहारी, सुनन्दा, प्रभा और मालती की जीवन-घटनाओं को आधार बनाकर अमूल्य की करुण कहानी के माध्यम से समाज के तथाकथित नेताओं, सम्पादकों तथा व्यापारियों के पाखण्ड एवं छद्मवेश का भण्डाफोड़ करता है। इसी कारण नाटक में सामाजिक व्यंग्य का पुट सर्वत्र विद्यमान है। भ्रष्टाचारियों के मुखौटे को बेनकाब करना, मुखबिरों के रहस्य को खोलना, व्यक्ति के हृदय में व्याप्त चोर-दरवाजों को तोड़ना ही नाटक का उद्देश्य है, जिसे लेखक विभिन्न पात्रों के कथन में स्थान-स्थान पर स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है। इस प्रकार, नाटककार का उद्देश्य देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर ध्यान आकृष्ट करके उससे देश को बचाकर आदर्श स्थिति की ओर ले जाना तथा देशप्रेम एवं राष्ट्रीय चेतना की रक्षा करने का सन्देश देना है।

प्रश्न 9.
‘कुहासा और किरण’ नाटक के कथोपकथन (संवाद योजना) को संक्षेप में लिखिए। (2013, 12, 11, 10)
उत्तर:
नाटक का मूल विधायक तत्त्व माने जाने वाले संवाद के अभाव में नाटक का अस्तित्व ही सम्भव नहीं है। विषय-वस्तु के विकास के साथ पात्रों के चरित्र चित्रण में संवाद ही सहायक होते हैं। कथोपकथन को चारुता तथा कलात्मकता से नाटक के रचना विधान एवं कार्यक्षमता में एक प्रबल शक्ति आती है। प्रस्तुत नाटक ‘कुहासा और किरण’ में संवाद अत्यन्त स्वाभाविक, पात्रानुकूल एवं गतिशील हैं। छोटे एवं संक्षिप्त संवादों में पात्रों की मानसिक स्थिति, चरित्र और भावों के उतार-चढ़ाव का बोध होता है। कृष्ण चैतन्य, उमेशचन्द्र तथा विपिन बिहारी के संवाद उनके दोहरे व्यक्तित्व की स्पष्ट व्यंजना करते हैं। पात्रों के वार्तालाप से राजनीतिक तथ्य, सामाजिक भ्रष्टाचार एवं छद्मवेशी व्यक्तियों का चरित्र प्रकट होता है। कृष्ण चैतन्य तथा विपिन बिहारी के स्वगत कथन भी अत्यन्त मार्मिक है, जिनसे उनके हृदय का अन्तर्द्वन्द्व व्यक्त होता है। इस नाटक के संवादों में सामाजिक व्यंग्य एवं कटूक्तियाँ भी प्रचुर हैं।
जैसे—
टमटा: मेरा काम तो सत्य की खोज हैं।
प्रभा: सत्य को खोज लेते हैं आप?
टमटा: यथाशक्ति।
प्रभा: ईमानदारी से?
इस प्रकार, संवादों में सर्वत्र सजीवता, मनोवैज्ञानिकता, पात्रानुकूलता एवं गतिशीलता विद्यमान है। लेखक की वाक्पटुता, गहन अनुभूति, युगबोध, भाषा पर अधिकार, विचारों की स्पष्टता एवं कलात्मक अभिरुचि इस नाटक के संवाद-कौशल में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हैं।

प्रश्न 10.
‘कुहासा और किरण’ नाटक की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए। (2013, 11, 10)
उत्तर:
किसी नाटक का वस्तु-संगठन, उसके पात्रों की सजीवता, वातावरण की वास्तविकता एवं उद्देश्य की स्पष्टता नाटक की भाषा-शैली से ही अभिव्यंजित होती है। प्रस्तुत नाटक ‘कुहासा और किरण की भाषा अत्यन्त स्वाभाविक, पात्रानुकूल एवं विषय के अनुरूप है। सहज, सरल, बोल-चाल की भाषा नाटक में प्रभावोत्पादकता उत्पन्न करती है। इस नाटक में लेखक ने सरल भाषा को प्रधानता दी हैं। भाषा को सक्षमता एवं भावानुरूपता सर्वत्र प्रशंसनीय है। आत्मचिन्तन के क्षणों में कृष्ण चैतन्य की दार्शनिक भाषा तथा आम आदमी की जनभाषा में अन्तर पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है। नाटक में प्रतीकात्मक शैली और सुन्दर उक्तियों का भी प्रयोग हुआ है, जिससे नाटकीय सौन्दर्य में अभिवृद्धि हुई हैं। व्यंग्यात्मकता एवं मुहावरों के प्रयोग से भी भाषा में वक्रता, चुटीलापन एवं तीव्रता आ गई हैं।

भावावेश के समय बोलचाल की भाषा में अंग्रेजी के वाक्य एवं शब्दों का व्यवहार भी किया गया है। इससे नाटक में यथार्थता आ गई है। नाटक की रचना-शैली भारतीय एवं पाश्चात्य नाट्य कला को सम्मिश्रण है। नाटककार रंग-संकेतों एवं निर्देशों का विधान करने में अत्यन्त पटु हैं। कथावस्तु के विकास में प्रारम्भ, विकास, चरम सीमा आदि को यथास्थल प्रवेश मिलता है। एक-दो स्थानों पर गति-योजना भी की गई है। इस प्रकार, नाटक की भाषा शैली, नाटक की। कथा, विषय, पात्र, उद्देश्य आदि के अनुकूल, सार्थक एवं प्रभावोत्पादक कही जा सकती है।

प्रश्न 11.
अभिनेयता (रंगमंचीयता) की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण” नाटक की समीक्षा कीजिए। (2018, 11, 10)
उत्तर:
किसी भी नाटक की पूर्ण सफलता उसके सरलतापूर्वक अभिनीत होने में ही विद्यमान है। इस नाटक की रचना रंगमंच एवं अभिनय के समस्त आधुनिक तत्त्वों एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही की गई है। दृश्य योजना, रंग सज्जा, प्रकाश आदि का मुचारु रुप से प्रयोग किया गया हैं। रंगमंच की अनुकूलता के लिए संक्षिप्त एवं रोचक कथावस्तु, घटनाओं का उचित सगुंफन, पात्रों की सीमित संख्या, चरित्र का स्वाभाविक विकास, यथार्थता एवं सजीवता, संवाद की पिता, पात्रानुकुलता, गतिशीलता, स्वाभाविक भाषा शैली, देशकाल, वातावरण का पास्तविक प्रतिबिम्ब, उद्देश्य की स्पष्ट व्यंजना आदि गुण अपेक्षित हैं। प्रस्तुत नाटक ‘कुहासा और किरण’ में वे सभी गुण समाविष्ट हैं, जो उसे रंगमंचीय पूर्णता प्रदान करते हैं। सम्पूर्ण नाटक तीन अंकों में विभक्त है, जो आकार में उत्तरोत्तर छोटे होते गए हैं। रंग-संकेत. मंच-सज्जा, वातावरण का स्पष्टीकरण, पात्रों के व्यक्तित्व आदि को लेखक आवश्यकतानुसार स्पष्ट करता चलता है। लेखक ने संकलन अय, (विषय-वस्तु, स्थल एवं काल) का समुचित निर्वाह किया है। संकलन-त्रय के कारण नाटक की अभिनेयता में गतिशीलता आ जाती हैं। इस प्रकार, प्रस्तुत नाटक केवल नाटकीय तत्त्वों की दृष्टि से ही उत्तम नाटक नहीं हैं, अपितु अभिनेयता की दृष्टि से भी पूर्ण सफल नाटक हैं।

‘कुहासा और किरण’ नाटक में दोनों प्रकार के पात्रों का संघटन किया गया है। प्रत्यक्ष रूप से नाटक में 11 पात्र हैं, जो प्रायः समाज के सभी प्रमुख वर्गों के प्रतिनिधि कहे जा सकते हैं। प्रधान पात्रों में अमूल्य, कृष्ण चैतन्य, गायत्री, उमेशचन्द्र अग्रवाल, विपिन बिहारी एवं सुनन्दा हैं, जबकि गौण पात्रों में प्रभा, मालती, पुलिस इंस्पेक्टर, टमटा, आम आदमी उल्लेखनीय हैं। सिपाही एवं दर्शक अप्रत्यक्ष पात्रों की श्रेणी में आते हैं। सभी पात्रों में अपने घर्ग विशेष की मूल विशेषताएँ होते हुए भी अपना निजी व्यक्तित्व एवं वैशिष्ट्य भी निहित है। उनमें संस्कार एवं परिस्थितियों से संघर्ष करने की प्रवृत्ति निहित हैं। वे गतिशील एवं जीवन्त पात्र हैं। आम आदमी, पुलिस इंस्पेक्टर, टमटा आदि स्थिर पात्र हैं, जिनके चरित्र का सीमित रूप ही लक्षित होता है। अन्य सभी पात्रों में गतिशीलता दिखती हैं।

पात्र एवं चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 12.
‘कुहासा और किरण’ नाटक के आधार पर नायक का चरित्रांकन कीजिए। (2018)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ के प्रमुख पात्रों का उल्लेख करते हुए किसी एक पात्र के चरित्र की विशेषताएँ बताइए। (2018)
अथवा
कुहासा और किरण के आधार पर किसी ऐसे पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए, जिसने आप को सबसे अधिक प्रभावित किया हो। (2017)
अथवा
नाटक के नायक की विशेषताओं के आधार पर ‘कुहासा और किरण’ के नायक का मूल्यांकन कीजिए। (2016)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक के नायक का चरित्रांकन कीजिए। (2017, 16)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक में अमूल्य के चारित्रिक-वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालिए। (2014, 13, 12, 11, 10)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2018, 17, 16, 15, 14)
उत्तर:
कथा संगठन, पात्र-विशिष्टता, उद्देश्य और सन्देश की दृष्टि से प्रधान पात्र अमूल्य है, जो उस पीढ़ी का प्रतिनिधि है, जिसका जन्म भारत की स्वतन्त्रता के साथ या बाद में हुआ तथा जिसके पिता राजेन्द्र ने मुल्तान षड्यन्त्र केस में 15 वर्ष की कठोर जेल यातना सहकर अपने जीवन को देश के लिए बलिदान कर दिया। नाटक के केन्द्रीय पात्र अमूल्य के चरित्र की निम्न विशेषताएँ हैं।

  1. देशभक्ति अमूल्य के व्यक्तित्व में अपने पिता से विरासत में मिली देशभक्ति का गुण कूट कूटकर भरा है। उसका मानना है कि देश का स्थान सबसे ऊपर है, जिसे किसी भी स्थिति में कलंकित नहीं होने देना चाहिए।
  2. कर्तव्यपरायणता अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक अमूल्य किसी भी काम को पूरी निष्ठा एवं परिश्रम के साथ सम्पन्न करता है।
  3. सत्यवादिता कृष्ण चैतन्य जैसे व्यक्ति के संसर्ग में आने के पश्चात् भी वह अपनी ईमानदारी एवं सच्चाई पर कोई आंच नहीं आने देता।।
  4. निर्भकता एवं साहसीपन अपनी निर्भीकता का परिचय देते हुए वह सबके सामने विपिन बिहारी को बेईमान कहता है।
  5. आदर्श मार्गदर्शक अमूल्य का व्यक्तित्व आधुनिक युवावर्ग के लिए एक आदर्श मार्गदर्शक का है। वह भ्रष्ट आचरण करने वालों तथा मुखौटों को ओढ़कर अपनी नीचता को छिपाने वाले लोगों को बेनकाब करता है।

इस प्रकार कहा जा सकता हैं कि नाटक का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं जीवन्त पात्र अमूल्य अष्टाचार एवं निराशापूर्ण कुहासे को भेदकर कर्तव्यनिष्ठा, दृढ़ता, सत्यवादिता, देशभक्ति, निर्भीकता आदि जैसी किरणों से समाज को आलोकित करना चाहता है।

प्रश्न 13.
‘कुहासा और किरण’ के आधार पर सुनन्दा के चरित्र का मूल्यांकन कीजिए। (2018)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ की नायिका सुनन्दा का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2016)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रमुख नारी पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2018, 13, 11, 10)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक के आधार पर सुनन्दा की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2018, 16, 13, 11, 10)
उत्तर:
विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित ‘कुहासा और किरण’ नाटक की सर्वाधिक प्रमुख नारी पात्र सुनन्दा दुरदर्शी, साहसी, चतुर (चालाक), विनोदी, कर्तव्यपरायण, दृढ़संकल्पित एवं कर्मशील युवती है।। सुनन्दा की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं–

  1. भ्रष्टाचारियों एवं मुखौटाधारियों की विरोधी सुनन्दा का व्यक्तित्व ईमानदारी एवं कर्तव्यनिष्ठा से भरपूर है। वह भ्रष्टाचार को समाप्त करने तथा पाखण्डियों का रहस्य खोलने में अन्त तक अमूल्य का साथ देती हैं।
  2. जागरूकता को महत्त्व जागरूकता को महत्त्वपूर्ण मानने वाली सुनन्दा समाचार पत्रों के महत्त्व एवं उनमें निहित शक्ति को समझती है।
  3. वाकपटुता सुनन्दा के व्यक्तित्व का अत्यन्त विशिष्ट पक्ष उसकी बापटुता है। उसकी व्यंग्यों से भरी वाक्पटुता गलत मार्ग पर जा रहे लोगों को सही मार्ग पर लाने तथा उनकी आत्मा को झकझोरने में काफी हद तक सफल रहती है।
  4. सहदयता सुनन्दा अमूल्य की विवशता को समझती है। वह अमूल्य को फंसाए जाने का विरोध करते हुए अन्याय से जूझने के लिए तत्पर है। नारी सुलभ गुणों के साथ-साथ उसमें युगानुरूप चेतना एवं जागृति का भाव भी। लक्षित है।

इस तरह, कहा जा सकता है कि सुनन्दा एक प्रगतिशील, व्यवहार कुशल, दृढ़ इच्छाशक्ति, देशप्रेमी एवं तार्किक-बौद्धिक क्षमतावाली नवयुवती है, जो समाज को बेहतर बनाने के लिए हर सम्भव प्रयत्न करती है।

प्रश्न 14.
‘कुहासा और किरण’ के आधार पर गायत्री देवी का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2010)
उत्तर:
विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित नाटक ‘कुहासा और किरण’ में गायत्री देवी पाखण्ट्री कृष्ण चैतन्य की पत्नी है, जिसमें सामान्य नारी सुलभ गुण-दोष विद्यमान हैं। वह अपने पति कृष्ण चैतन्य के कपटपूर्ण व्यवहार का विरोध करती हैं। गायत्री देवी की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. अन्तरात्मा को महत्त्व गायत्री अपने पति कृष्ण चैतन्य के पाखण्डी व्यक्तित्व का समर्थन नहीं करने के पश्चात् भी प्राप्त होने वाले यश, प्रतिष्ठा एवं समृद्धि का लोभ त्याग नहीं पाती, लेकिन मुल्तान षड्यन्त्र केस के देशभक्तों के दल के नेता डॉ. चन्द्रशेखर की पत्नी मालती को देखने के पश्चात् वह अन्तरात्मा की आवाज पर अपने पति का घर छोड़ देती है। अन्तरात्मा की आवाज सुनकर ही वह अमूल्य पर किए जाने वाले अत्याचार या उसे फंसाने के लिए बुने गए जालके विरुद्ध स्वयं का उत्सर्ग कर देती है और अपने पति को एक तरह से दण्डित करती है।
  2. साहित्य-प्रेमी गायत्री को साहित्य एवं समाज के परस्पर सम्बन्ध का पर्याप्त ज्ञान है। वह एक विदुषी हैं। वह प्रभा के उपन्यास की सूक्ष्म आलोचना करती है तथा उसमें भ्रष्टाचारियों एवं मुखबिरों की कलई खोलने के लिए सुझाव देती है।
  3. भावुक हदय भावुक हदय की स्वामिनी गायत्री अमूल्य को झूठे मामले में फँसाने के अपने पति के कृत्य को सह नहीं पाती और व्याकुल होकर आत्महत्या के मार्ग को चुन लेती है।
  4. पति के हदय परिवर्तन में सहायक वह अपने पति को उचित मार्ग पर लाने हेतु स्वयं का बलिदान कर देती है। गायत्री की मृत्यु के बाद कृष्ण चैतन्य को यथार्थ में हृदय परिवर्तन हो जाता है और वह अपने अपराध को स्वीकार कर लेता है।

इस तरह, गायत्री एक सच्ची भारतीय नारी को प्रतिबिम्बित करती है, जो आत्म-बलिदान करके अपने पति को सही मार्ग पर लाने में सफल होती है। अपनी कमियों के बावजूद वह सम्मान एवं श्रद्धा की अधिकारिणी बन जाती है।

प्रश्न 15.
‘कुहासा और किरण’ के आधार पर कृष्ण चैतन्य का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2011, 10)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक का खलनायक कौन है? उसकी , चरित्रगत विशेषताएँ बताइए। (2010)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ नाटक के आधार पर कृष्ण चैतन्य के चरित्र का मूल्यांकन कीजिए। (2014, 11)
अथवा
‘कुहासा और किरण’ के आधार पर चैतन्य की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2014)
उत्तर:
‘कुहासा और किरण’ नाटक में कृष्ण चैतन्य एक खलनायक के रूप में उभरकर सामने आता है। नाटककार ने कृष्ण चैतन्य के माध्यम से आज के पाखण्डी एवं आडम्बरपूर्ण जीवन जीने वाले भ्रष्ट नेताओं की कलई खोली है। चैतन्य की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. देशद्रोही एवं कपटी कृष्ण चैतन्य मुल्तान षड्यन्त्र केस में मुखबिर बनकर अपनी जान की रक्षा करता है तथा अपने साथियों की मृत्यु का कारण बनता है। वह अपनी जान बचाने के लिए अपने साथियों को फंसा देता है, जिससे उन सभी की असामयिक मृत्यु हो जाती है। उसका चरित्र कृत्रिम एवं आडम्बरपूर्ण है। देशभक्ति का चोला पहनकर वह सरकार एवं जनता को धोखा देता है।
  2. भ्रष्टाचारी वह भ्रष्ट नेता है, जो लोगों को ब्लैकमेल करता है। यह विपिन बिहारी एवं उमेशचन्द्र के साथ मिलकर भ्रष्टाचार में लिप्त रहता है।
  3. दूरदर्शिता अपनी दूरदर्शिता के कारण ही वह अपना नाम परिवर्तित करके कृष्णदेव रखता है। विपिन बिहारी के यहां अमूल्य को नियुक्त करवाकर उसे फँसाना, उसकी दूरदर्शिता का ही परिणाम था।
  4. आत्मपरिष्कार की भावना पत्नी गायत्री देवी का बलिदान उसमें प्रायश्चित का भाव उत्पन्न कर देता है। वह अपने अपराधों को स्वीकार करके अपने दुष्कृत्यों से सभी को परिचित कराता है। इस प्रकार, कृष्ण चैतन्य का व्यक्तित्व कुछ विरोधाभासी गुणों से युक्त है और मूलतः उसमें धूर्तता छिपी है।