Chapter 11 केदारनाथ सिंह (काव्य-खण्ड).

कवि-परिचय

प्रश्न 1.
केदारनाथ सिंह के जीवन-परिचय और काव्य-कृतियों (रचनाओं) पर प्रकाश डालिए। या केदारनाथ सिंह का जीवन-परिचय दीजिए एवं उनकी एक रचना का नाम लिखिए। [2013, 14, 15]
उत्तर
कवि केदारनाथ सिंह ने अपने समकालीन कवियों की तुलना में बहुत कम कविताएँ लिखी हैं। परन्तु इनकी कविताएँ निजत्व की विशिष्टता से परिपूर्ण हैं। शहर में रहते हुए भी ये गंगा और घाघरा के मध्य की अपनी धरती को भूले नहीं थे। खुले कछार, हरियाली से लहलहाती फसलें और दूर-दूर तक जाने वाली पगडण्डियाँ इनके हृदय को भाव-विह्वल बनाती थीं।

जीवन-परिचय-केदारनाथ सिंह जी का जन्म 7 जुलाई, सन् 1934 ई० को उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के चकिया नामक गाँव में हुआ था। इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1956 ई० में एम० ए० और 1964 ई० में पीएच० डी० की। सन् 1978 ई० में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा विभाग में हिन्दी भाषा के प्रोफेसर (आचार्य) नियुक्त होने के पूर्व इन्होंने वाराणसी, गोरखपुर और पडरौना के कई स्नातक-स्नातकोत्तर विद्यालयों में अध्यापन कार्य किया। सन् 1999 में इन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर पद से अवकाश-ग्रहण किया और इसके बाद ये यहीं से मानद प्रोफेसर के रूप में जुड़े हुए थे।

केदारनाथ सिंह जी को अनेक सम्माननीय सम्मानों से सम्मानित किया गया है। सन् 1980 में इन्हें ‘कुमारन असन’ कविता-पुरस्कार तथा सन् 1989 में ‘अकाल में सारस’ रचना के लिए ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। कतिपय कारणों से इन्होंने हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा प्रदत्त सर्वोच्च शलाका सम्मान ठुकरा दिया।

लम्बी बीमारी के कारण 19 मार्च, 2018 को इनको निधन हो गया।

रचनाएँ–केदारनाथ सिंह द्वारा कविता व गद्य की अनेक पुस्तकों की रचना की गयी है, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं

(1) कविता-संग्रह-अभी बिलकुल अभी’, ‘जमीन पक रही है’, ‘यहाँ से देखो’, ‘अकाल में सारस’, ‘टॉल्सटॉय और साइकिल’ एवं ‘तीसरा सप्तक’ में संकलित प्रकाशित कविताएँ। ‘बाघ’ इनकी प्रमुख लम्बी कविता है, जो मील का पत्थर मानी जा सकती है। ‘जीने के लिए कुछ शर्ते, ‘प्रक्रिया’, ‘सूर्य’, ‘एक प्रेम-कविता को पढ़कर’, ‘आधी रात’, ‘बादल ओ’, ‘रात’, ‘अनागत’, ‘माँझी का पुल’, ‘फर्क नहीं पड़ता’, आदि इनकी प्रमुख कविताएँ हैं।
(2) निबन्ध और कहानियाँ-‘मेरे समय के शब्द’, ‘कल्पना और छायावाद’, ‘हिन्दी कविता में बिम्ब-विधान्’, ‘कब्रिस्तान में पंचायत’ आदि।
(3) अन्य-‘ताना-बाना’।

साहित्य में स्थान–कवि केदारनाथ सिंह के मूल्यांकन के लिए आवश्यक है कि इनकी 1960 ई० और उसके बाद की कविताओं के बीच एक विभाजक रेखा खींच दी जाए। अपनी कविताओं के माध्यम से ये भ्रष्टाचार, विषमता और मूल्यहीनता पर सधा हुआ प्रहार करते थे। प्रगतिशील लेखक संघ से सम्बद्ध श्री केदारनाथ सिंह जी समकालीन हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर और आधुनिक हिन्दी कवियों में उच्च स्थान के अधिकारी हैं।

पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या

नदी
प्रश्न 1.
अगर धीरे चलो
वह तुम्हें छू लेगी
दौड़ो तो छूट जायेगी नदी
अगर ले लो साथ
वह चलती चली जायेगी कहीं भी
यहाँ तक-कि कबाड़ी की दुकान तक भी।
उत्तर
सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘काव्य-खण्ड में संकलित ‘नदी’ शीर्षक कविता से उधृत हैं। इन पंक्तियों के रचयिता श्री केदारनाथ सिंह जी हैं।

[विशेष—इस शीर्षक के अन्तर्गत आने वाले सभी पद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।] |

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में कवि कहता है कि नदी का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। यह जीवन में प्रत्येक क्षण हमारा साथ देती है।

व्याख्या-कवि कहता है कि यदि हम नदी के बारे में, उसके गुणों के बारे में, उसके महत्त्व के बारे में सोचते हैं तो वह हमारे अन्तस्तल को स्पर्श करती प्रतीत होती है। नदी हमारा पालन-पोषण उसी प्रकार करती है, जिस प्रकार हमारी माँ। जिस प्रकार अपनी माँ से हम अपने-आपको अलग नहीं कर सकते, उसी प्रकार हम नदी से भी अपने को अलग नहीं कर सकते। यदि हम सामान्य गति से चलते रहते हैं तो यह हमें स्पर्श करती प्रतीत होती है लेकिन जब हम सांसारिकता में पड़कर भाग-दौड़ में पड़ जाते हैं तो यह हमारा साथ छोड़ देती है। यदि हम इसे साथ लेकर चलें तो यह प्रत्येक परिस्थिति में किसी-न-किसी रूप में हमारे साथ रहती है; क्योंकि यह हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। न तो वह हमसे अलग हो सकती है और न हम उससे।

काव्यगत-सौन्दर्य-

  1. कवि ने नदी के महत्त्व का वर्णन किया है कि यह हमारे जीवन के प्रत्येक क्षण में किसी-न-किसी रूप में हमारे साथ रहती है।
  2. भाषा-सहज और सरल खड़ी बोली।
  3. शैली-वर्णनात्मक व प्रतीकात्मक।
  4. छन्द-अतुकान्त और मुक्त।
  5. अलंकार-अनुप्रास का सामान्य प्रयोग।

प्रश्न 2.
छोड़ दो
तो वहीं अँधेरे में
करोड़ों तारों की आँख बचाकर
वह चुपके से रच लेगी
एक समूची दुनिया
एक छोटे-से घोंघे में
संचाई यह है
कि तुम कहीं भी रहो।
तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी
प्यार करती है एक नदी
उत्तर
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में कवि कहता है कि नदी पृथ्वी पर ही नहीं आकाश में भी विचरण करती है. अर्थात् सभी स्थानों पर हमारे साथ रहती है।

व्याख्या-कवि कहता है कि यदि हम सदा साथ रहने वाली नदी को किसी अनुचित स्थान पर छोड़ दें तो वह वहाँ रुकी नहीं रहेगी वरन् अनगिनत लोगों की आँखों से बचकर वह वहाँ भी अपनी एक नवीन दुनिया उसी प्रकार बसा लेगी जिस प्रकार एक छोटा-सा घोंघा अपने आस-पास सीप की रचना कर लेता है। आशय यह है कि नदी की यह दुनिया अत्यधिक लघु रूप में भी सीमित हो सकती है। कवि का कहना है कि हम कहीं पर भी रहें, वर्ष के सबसे कठिन माने जाने वाले ग्रीष्म के दिनों में भी यह हमें अपने स्नेहरूपी जल से सिक्त करती है और अतिशय प्रेम प्रदान करती है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. नदी सर्वत्र विद्यमान है, वह दुर्गम परिस्थितियों में भी अपनी दुनिया बसा लेती है।
  2. भाषा-सहज और सरल खड़ी बोली।
  3. शैली-वर्णनात्मक व प्रतीकात्मक।
  4. छन्द-अतुकान्त और मुक्त।।

प्रश्न 3.
नदी जो इस समय नहीं है इस घर में
पर होगी जरूर कहीं न कहीं
किसी चटाई या फूलदान के नीचे
चुपचाप बहती हुई
उत्तर
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में कवि नदी की सर्वव्यापकता की ओर संकेत कर रहा है।

व्याख्या-नदी की सर्वव्यापकता की ओर संकेत करता हुआ कवि कहता है कि जो नदी विभिन्न स्थलों के मध्य से अनवरत प्रवाहित होती रहती है वह किसी-न-किसी रूप में हमारे घरों में भी प्रवाहित होती हुई हमें सुख और आनन्द की अनुभूति देती है। इसके बहने की ध्वनि हमें किसी चटाई या फूलदान से भी सुनाई पड़ सकती है और इसको हम मन-ही-मन अनुभव भी कर लेते हैं। आशय यह है कि नदी और व्यक्ति का गहरा और अटूट सम्बन्ध पहले से ही रहा है और आगे भी रहेगा।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. नदी से अटूट सम्बन्ध का वर्णन करते हुए कहा गया है कि नदी घरों में भी चुपचाप बहती रहती है।
  2. भाषा-सहज और सरल खड़ी बोली।
  3. शैली–प्रतीकात्मक।
  4. छन्द ……. अतुकान्त और मुक्त।

प्रश्न 4.
कभी सुनना
जब सारा शहर सो जाय
तो किवाड़ों पर कान लगा
धीरे-धीरे सुनना
कहीं आसपास
एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह
सुनाई देगी नदी।
उत्तर
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में कवि कहता है कि नदी प्रत्येक समय हमारे बीच उपस्थित रहती है।

व्याख्या-कवि कहता है कि यदि आप इस बात से सन्तुष्ट नहीं है कि नदी हमारे-आपके बीच हमेशा विद्यमान रहती है तो अपनी सन्तुष्टि के लिए; जब मनुष्यों के सभी क्रिया-कलाप बन्द हो जाएँ और समस्त चराचर प्रकृति शान्त रूप में हो; अर्थात् सारा शहर गहरी निद्रा में सो रहा हो; उस समय आप घरों के दरवाजों से कान लगाकर, एकाग्रचित्त होकर नदी की आवाज को सुनने का प्रयास कीजिए। आपको अनुभव होगा कि नदी की प्रवाहित होने वाली मधुर ध्वनि एक मादा मगरमच्छ की दर्दयुक्त कराह जैसी आती प्रतीत होगी। स्पष्ट है कि नदी किसी-न-किसी रूप में सदैव हमारे साथ रहती है।

काव्यगत सौन्दर्य–

  1. नदी की निरन्तरता का जीवन्त रूप में वर्णन किया गया है।
  2. भाषा-सहज और सरल खड़ी बोली।
  3. शैली–प्रतीकात्मक।
  4.  छन्द–अतुकान्त और मुक्त।
  5.  अलंकार-पुनरुक्तिप्रकाश और अनुप्रास।

काव्य-सौदर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है?
(क) अगर ले लो साथ वह चलती चली जाएगी कहीं भी,
यहाँ तक कि कबाड़ी की दुकान तक भी।
(ख) वह चुपके से रच लेगी।
एक समूची दुनिया
एक छोटे से घोंघे में
उत्तर
(क) ल, च, क की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार।
(ख) ‘ए, क, च’ की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार।