Chapter 11 जीव्याद् भारतवर्षम् (पद्य – पीयूषम्)

परिचय

डॉ० चन्द्रभानु त्रिपाठी संस्कृत के उत्कृष्ट कवि एवं नाटककार हैं। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद में सन् 1925 ई० में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर तथा उच्च शिक्षा प्रयाग में हुई। प्रयाग विश्वविद्यालय के द्वारा “व्याकरण-दर्शन के विशिष्ट अध्ययन” पर आपको डी० फिल्० की उपाधि प्रदान की गयी। इन्होंने अनेक आलोचनात्मक ग्रन्थ, शोध-लेख, कविताएँ, गीत तथा नाटक लिखे हैं। इनकी रचनाओं में सर्वत्र सरलता, सरसता, लालित्य एवं स्वाभाविकता परिलक्षित होती है। प्रस्तुत गीत डॉ० चन्द्रभानु त्रिपाठी द्वारा रचित ‘गीताली’ नामक काव्य-संकलन से संकलित है। कवि ने प्रस्तुत गीत के तीन पदों में भारत को मनोरमता और भव्यता का तथा भारतीय समाज को एकजुट होकर देश की उन्नति करने का सन्देश दिया है। इनमें कवि की भारतीय संस्कृति के प्रति पूर्ण आस्था अभिव्यक्त हुई है।

पाठ-सारांश

हमारा देश भारतवर्ष चिरकाल तक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में विद्यमान रहे।
भारत की मनोरमता हिमालय भारत के सिर का मुकुट है। इस पर पड़ती हुई उदीयमान सूर्य की लाल-लाल किरणें मणियों की भ्रान्ति उत्पन्न करती हैं। समुद्र अपनी लहरों से सदैव इसके चरणों को धोता रहता है। नदियाँ इसके वक्षःस्थल पर पड़े हुए हार हैं, विन्ध्यपर्वत इसकी करधनी है तो सघन वनराशि इसके नवीन वस्त्र हैं।

समाज के नव-निर्माण की आवश्यकता सभी ज्ञानी, विद्वान्, सम्मानित लोग, पूँजीपति, श्रेष्ठ व्यापारी, श्रमिक एवं वीर सभी वर्गों के लोग एक साथ मिलकर नये समाज का निर्माण करें। पुराने धर्म का परिष्कार करके मानवधर्म का यत्र-तत्र सर्वत्र प्रसार करें। भारत का प्रत्येक निवासी आत्म-बल से युक्त होकर उन्नति एवं प्रगति के नये-नये पाठों को पढ़ता रहे।

भारतीय संस्कृति में आस्था पवित्र लहरों वाली गंगा हमारे देश की महिमा को प्रसृत करती हुई सदैव प्रवाहित होती रहे। महावीर की अहिंसा, गौतम की करुणा और सत्य का सन्देश सर्वत्र फैले। भारतवासी गीता के कर्म के महत्त्व पर आस्था रखें और भारत के वीर सपूतों की गाथाओं का सर्वत्र गान हो। हमारे देश के लोग सुखी, स्वस्थ और दीन भाव से रहित हों तथा भारत एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में चिरकाल तक जीवित रहे।

पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
भारतवर्ष राष्ट्रं जीव्याच्चिरकालं स्वाधीनम्।
सन्मित्रं भूयाच्च समृद्धं जीयाच्छत्रु-विहीनम् ॥

हिमगिरिरस्य किरीटो मौलेररुण-किरण-मणि-माली।
कर-कल्लोलैर्जलधिविलसति पादान्त-प्रक्षाली
सरितो वक्षसि हारा विन्ध्यो भाति मेखला-मानम्।
पल्लव-लसिता निबिड-वनाली रुचिरं नव-परिधानम् ॥
आस्ते कविकुलमस्य मनोरम-रूप-वर्णने लीनम्। [2006]

शब्दार्थ जीव्यात् = अमर रहे। चिरकालम् = चिरकाल तका स्वाधीनम् = स्वतन्त्र सन्मित्रं = सच्चा मित्र। समृद्धं = समृद्धिशाली। जीयात् = विजयी हो। शत्रु-विहीनम् = शत्रुरहित। हिमगिरिः = हिमालय पर्वत। अस्य = इसके। किरीटः = मुकुट। मौलेः = मस्तक का। अरुण-किरण-मणि-| (सूर्य की) किरणरूपी मणियों की माला वाला। कर-कल्लोलैः = विशाल लहरोंरूपी हाथों से। जलधिः = समुद्रा विलसति = शोभित होता है। पादान्त प्रक्षाली = पैरों के अग्रभाग को धोने वाला। सरितः = नदियाँ। वक्षसि = वक्षःस्थल पर, छाती पर हारा = हार हैं। विन्ध्य = विन्ध्याचल। भाति = शोभित होता है, सुशोभित है। मेखलामानम् = करधनी की भाँति। पल्लव-लसिता = पत्तों से सुसज्जित। निबिडवनाली = घनी वनपंक्ति रुचिरम् = सुन्दर। परिधानम् = वस्त्र। आस्ते = है। कविकुलम् = कवियों का समूह। मनोरम-रूप-वर्णने = मनोहर सुन्दरता का वर्णन करने में। लीनम् = तल्लीन।

सन्दर्भ प्रस्तुत गीत-पद हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘जीव्याद् भारतवर्षम्’ शीर्षक गीत से लिया गया है।

[संकेत इस पाठ के शेष सभी पद्यों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत पद में भारत की मनोरमता और भव्यता का सुन्दर चित्र अंकित किया गया है।

अन्वय भारतवर्ष राष्ट्रं चिरकालं स्वाधीनं जीव्यात्, (इदं) सन्मित्रं समृद्धं भूयात्, (इदं) शत्रुविहीनं जीयात्। अरुण-किरण-मणि-माली हिमगिरिः अस्य किरीटः (अस्ति)। जलधिः कर-कल्लोलैः (अस्य) पादान्त प्रक्षाली (सन्) विलसति। (अस्य) वक्षसि सरितः हाराः (सन्ति)। विन्ध्यः (अस्य) मेखलामानं भाति। पल्लवलसिता निबिडवनाली (अस्य) रुचिरं नवपरिधानम् अस्ति। कविकुलम् अस्य मनोरमरूपवर्णने लीनम् आस्ते।

व्याख्या हमारी राष्ट्र भारतवर्ष चिरकाल तक स्वाधीन होकर अमर रहे। यह अच्छे मित्रों वाला और वैभवपूर्ण हो, यह शत्रुरहित होकर विजयी रहे। सूर्य की लाल किरणों की मणियों की माला वाला हिमालय इसका ( भारतवर्ष का) मुकुट है। समुद्र अपने विशाल लहरोंरूपी हाथों से इसके पैरों के अग्रभाग को धोने वाला सुशोभित होता है। इसके वक्षस्थल पर नदियाँ हार के समान हैं। विन्ध्य पर्वत इसकी मेखला अर्थात् करधनी के समान शोभित होता है। कोमल पत्तों से शोभित घनी वनपंक्ति इसका सुन्दर नया वस्त्र है। कवियों का समूह इसके सौन्दर्य के वर्णन में लीन हो रहा है।

(2)
सर्वे ज्ञान-धना बुध-वर्या मान-धना रण-धीराः ।।
स्वर्ण-धना व्यवसायि-धुरीणास्तथा श्रम-धना वीराः ॥

कुर्वन्त्वेकीभूय समेता नव-समाज-निर्माणम्।
मान्यो मानव-धर्मः प्रसरतु सम्परिशोध्य पुराणम् ॥
आत्मशक्ति-संवलित-मानवः पाठं पठेन्नवीनम् ॥

शब्दार्थ ज्ञान-धनाः = ज्ञानरूपी धन वाले। बुध-वर्याः = श्रेष्ठ विद्वान्। मानधनाः = यशरूपी धन वाले। रणधीराः = युद्ध में विचलित न होने वाले स्वर्ण-धनाः = स्वर्णरूपी धन वाले व्यवसायि-धुरीणाः = व्यापारियों में अग्रणी, श्रेष्ठ व्यवसायी। श्रमधनाः = परिश्रमरूपी धन वाले। एकीभूय = एक होकर समेताः = एक साथ मिलकर। मान्यः = सबके मानने योग्य मानव-धर्मः = मानवता के मूल्यों को सुरक्षित रखने वाला धर्म। प्रसरतु = फैले। सम्परिशोध्य = परिष्कार करके, सुधार करके। पुराणम् = पुराना। आत्मशक्ति-संवलित-मानवः = आत्मा की शक्ति से युक्त मनुष्य। पाठं पठेत् नवीनम् = नया पाठ पढ़े।

प्रसंग प्रस्तुत पद में भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग को एकजुट होकर देश की उन्नति करने की सलाह दी गयी है।

अन्वय सर्वे ज्ञानधनाः, बुध-वर्याः, मानधनाः, रणधीराः, स्वर्णधनाः, व्यवसायिधुरीणाः तथा श्रमधंनाः वीराः समेताः एकीभूय नवसमाज-निर्माणः कुर्वन्तु। पुराणं सम्परिशोध्य मान्यः मानव-धर्मः प्रसरतु। आत्मशक्ति-संवलित-मानव: नवीनं पाठं पठेत्।।

व्याख्या सभी ज्ञान को धन समझने वाले (बौद्धिक वर्ग), श्रेष्ठ विद्वान्, प्रतिष्ठा को धन समझने वाले, युद्ध में विचलित न होने वाले, स्वर्णरूपी धन वाले, व्यापारियों में श्रेष्ठ तथा श्रम को धन समझने वाले (श्रमिक वर्ग), वीर लोग एक साथ मिलकर एकजुट होकर नये समाज का निर्माण करें। (धर्म के) पुराने रूप का परिष्कार करके मानवता के मूल्यों को सुरक्षित रखने वाला धर्म (सर्वत्र) फैले। आत्मशक्ति से युक्त मानव नया पाठ पढ़े।

(3)
प्रवहतु गङ्गा पूततरङ्गा प्रथयन्ती महिमानम्।            [2007]
गायतु गीता कर्ममहत्त्वं योग-क्षेम-विधानम्॥           
भवेदहिंसा करुणासिक्ता तथा सूनृती वाणी।।
प्रसरे भारत-सद्वीराणां गाथा भुवि कल्याणी।।
देशे स्वस्थः सुखितो लोको भावं भजेन्न दीनम्।
भारतवर्षं राष्ट्रं जीव्याच्चिरकालं स्वाधीनम् ॥

शब्दार्थ प्रवहतु = बहे। पूततरङ्गा = पवित्र लहरों वाली। प्रथयन्ती = फैलाती हुई। महिमानम् = महिमा को। गायतु = गाये, गान करे। कर्ममहत्त्वं = कर्म के महत्त्व का। योगक्षेम-विधानम् = योग (अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा) की व्यवस्था वाले। अहिंसा = जीवों को न सताना। करुणासिक्ता = करुणा से युक्त। सूनृता = सत्य और मनोरम प्रसरेत् = फैल जाए। सद्वीराणाम् = श्रेष्ठ वीरों की। गाथा = कथा। भुवि = पृथ्वी पर कल्याणी = मंगलमयी। देशे = देश में। सुखितः = सुखी। लोकः = जनता। भावं = भाव को। दीनं = दीनता को। न भजेत् = प्राप्त न हो।

प्रसंग प्रस्तुत पद में कवि ने भारतीय संस्कृति में अपनी पूर्ण आस्था व्यक्त की है।

अन्वय पूततरङ्गा गङ्गा (भारतवर्षस्य) महिमानं प्रथयन्ती प्रवहतु। गीता योग-क्षेमविधानं कर्ममहत्त्वं गायतु। अहिंसा करुणासिक्ता तथा वाणी सूनृता भवेत्। भारत-सद्वीराणां कल्याणी गाथा भुवि प्रसरेत्। देशे स्वस्थ: सुखितः लोकः दीनं भावं न भजेत्। भारतवर्ष चिरकालस्वाधीनं राष्ट्रं जीव्यात्।।

व्याख्या पवित्र लहरों वाली गंगा (भारतवर्ष की) महिमा को फैलाती हुई प्रवाहित हो। गीता, योग और क्षेम की व्यवस्था वाले कर्म के महत्त्व का गान करे। (देशवासियों के हृदय में) अहिंसा की भावना करुणा से सिंचित हो तथा वाणी सत्य और मनोरम हो। भारत के श्रेष्ठ वीरों की कल्याणमयी कथा पृथ्वी पर फैल जाए। देश में स्वस्थ और सुखी लोग दीनता को प्राप्त न करें। भारतवर्ष एक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में चिरकाल तक जीवित रहे।

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) भारतवर्षं राष्ट्रं जीव्याच्चिरकालं स्वाधीनम्। [2008,09, 11, 14]

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के जीव्याद् भारतवर्षम्’ नामक पाठ से अवतरित है।

प्रसंग इस सूक्ति में स्वतन्त्र भारत राष्ट्र के बहुमुखी विकास की कामना की गयी है।

अर्थ भारतवर्ष एक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में चिरकाल तक जीवित रहे।

व्याख्या संसार का प्रत्येक व्यक्ति यही चाहता है कि वह और उसका देश बहुमुखी विकास करके अपनी कीर्ति सभी दिशाओं में फैलाये। अपनी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता चाहने के साथ-साथ वह यह भी चाहता है। कि वह जिस देश अथवा जाति का सदस्य है, वह भी स्वतन्त्र हो; अर्थात् उस पर किसी का अंकुश न हो। उसका नाम सदैव के लिए संसार में अमर हो जाए। प्रस्तुत सूक्ति में भी कवि यही कामना कर रहा है कि हमारा देश भारत कभी किसी के अधीन न हो। वह सदैव स्वतन्त्र रहे और चिरकाल तक विश्व का सिरमौर बना रहे।

(2) आत्मशक्ति-संवलित-मानवः-पाठं-पठेन्नवीनम्। [2007, 14]

सन्दर्भ पूर्ववत्।।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में आत्मा की शक्ति से युक्त मनुष्य को कुछ नया करने के लिए प्रेरित किया गया है।

अर्थ आत्मशक्ति से युक्त मानव नया पाठ पढ़े।

व्याख्या भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग के व्यक्तियों को एक साथ मिलकर नये समाज का निर्माण करना चाहिए। उन्हें धर्म के पुराने स्वरूप को परिष्कार करके मानवीय मूल्यों को संरक्षित करने वाले धर्म का प्रसार करना चाहिए। इसके लिए भारतीय समाज के प्रत्येक मनुष्य को आत्मशक्ति से युक्त होना आवश्यक है। साथ ही उसे प्रगति और समृद्धि के नित नवीन क्षेत्रों का ज्ञान करने के लिए अध्ययन करते रहना भी आवश्यक है, क्योंकि ज्ञान की नवीनता के बिना परिष्कार सम्भव नहीं है और परिष्कार के लिए व्यक्ति का आत्म-शक्ति से युक्त होना भी अत्यावश्यक है।

(3) गायतु गीता कर्ममहत्त्वं योगक्षेमविधानम्। [2014]

सन्दर्भ पूर्ववत्।।

प्रसंग प्रस्तुत पंक्ति में श्रीमद्भगवद्गीता के महत्त्व का प्रतिपादन .कया गया है।

अर्थ गीता योग और क्षेम की व्यवस्था वाले कर्म के महत्त्व का गान करे।

व्याख्या प्राचीन भारतीय वाङ्मय के समस्त ग्रन्थों में गीता अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान सर्वोपरि है और इसे पूजनीय ग्रन्थ माना जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता मुख्य रूप से कर्म के महत्त्व और योग-क्षेम की व्यवस्था का प्रतिपादन करती है। श्रीमद्भगवद्गीता का कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति को उचित-अनुचित और कर्मफल की भावना को छोड़कर सतत कर्म करते रहना चाहिए। व्यक्ति को कभी भी अकर्म अथवा कर्महीनता की स्थिति में नहीं रहना चाहिए। कर्महीनता की स्थिति व्यक्ति के लिए अत्यधिक घातक है। योग और क्षेम के अनेकानेक अर्थों को समाहित करते हुए भी गीता कर्म की श्रेष्ठता को ही सिद्ध करती है। स्वाभाविक है कि जब तक व्यक्ति कर्म में तत्पर नहीं होगा, तब तक स्वयं उसकी उन्नति सम्भव नहीं होगी। व्यक्ति की उन्नति में ही राष्ट्र की उन्नति निहित होती है। एक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में भारत चिरकाल तक जीवित रहे, इसके लिए प्रत्येक भारतवासी को योग-क्षेम और कार्य की महत्ता का ज्ञान आवश्यक है।

श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) भारतवर्ष राष्टं ………………………………………………………. जीयाच्छत्रुविहीनम् ॥ (श्लोक 1)
संस्कृतार्थः अस्मिन् पद्ये कविः कामनां करोति यत् अस्माकं भारतराष्ट्रं चिरकालं स्वाधीनं जीवेत्। अस्य राष्ट्रस्य सम्मित्राणि भवेयुः। राष्ट्रं शत्रुविहीनं समृद्धं च भूयात्।।

(2)
प्रवहतु गङ्गा”………………………………………………………. कालं स्वाधीनम् ॥ (श्लोक 3)

प्रवहतु गङ्गा”………………………………………………………. योगक्षेमविधानम् ॥ [2008, 12, 13]
संस्कृतार्थः अस्मिन् पद्ये कविः श्री चन्द्रभानु त्रिपाठी कामनां करोति यत् भारतवर्षे भारत महिमानं वर्धन्ति, पवित्र गङ्गा नदी प्रवहतु, योग-क्षेम-विधान कर्म-महत्त्वं प्रतिपादिका गीता भवतु, करुणायुक्ता पवित्रा अहिंसा वाणी सर्वत्र प्रसरतु, भारतस्य वीराणां कल्याणकारी पवित्रा गाथा सर्वत्र प्रसरेत्। भारतदेशे सर्वे जना: सुखिना: भवन्तु, कोऽपि दीनभावं न प्राप्नुयात्। एतादृशाः अस्माकं भारतवर्ष: स्वाधीन: सन् चिरञ्जीवी भूयात्।