Rajasthan Board RBSE Class 10 Science Chapter 16 ब्रह्माण्ड एवं जैव विकास

पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

बहुचयनात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
सृष्टि बनने के पहले क्या उपस्थित था?
(क) जल।
(ख) सत
(ग) असत
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 2.
किस वैज्ञानिक ने स्थिर ब्रह्माण्ड के विचार को पुनः जीवित किया था?
(क) डार्विन
(ख) ओपेरिन
(ग) आइंसटीन
(घ) स्टेनले मिलर

प्रश्न 3.
ब्रह्माण्ड की उत्पति के विषय में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त अवधारणा कौनसी है?
(क) स्थिर ब्रह्माण्ड
(ख) बिग-बैंग
(ग) जैवकेन्द्रिकता
(घ) भारतीय अवधारणा

प्रश्न 4.
लगभग कितने वर्ष पूर्व पृथ्वी पर प्रकाशसंश्लेषी जीवन उपस्थित था?
(क) 4 अरब
(ख) 3 अरब
(ग) 5 अरब
(घ) अनिश्चित

प्रश्न 5.
पीढ़ी दर पीढ़ी अपने स्वरूप को बनाए रखने में सक्षम जीव समूह को क्या कहा जाता है?
(क) वंश
(ख) संघ
(ग) समुदाय
(घ) जाति

उत्तरमाला-
1. (घ)
2. (ग)
3. (ख)
4. (क)
5. (घ)

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न–
प्रश्न 6.
ऋग्वेद के किस सूक्त में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के विषय में विस्तार से चर्चा की गई है?
उत्तर-
ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के विषय में विस्तार से चर्चा की गई है।

प्रश्न 7.
क्या जीवन को अणुओं का समूह माना जा सकता है?
उत्तर-
जीवन अणुओं का समूह नहीं है।

प्रश्न 8.
वर्तमान जीवन किस अणु पर आधारित माना जाता है?
उत्तर-
डीएनए अणु।

प्रश्न 9.
पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल के विषय में वैज्ञानिक सोच में क्या परिवर्तन हुआ है?
उत्तर-
प्रारम्भिक वायुमण्डल मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन तथा जलवाष्प से बना होने के कारण अत्यन्त अपचायक रहा होगा।

प्रश्न 10.
प्रत्येक जाति के विकसित होने के इतिहास को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
इस इतिहास को जाति का जातिवृत्त कहते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 11.
लुप्त हो चुके जीवों के विषय में जानकारी कैसे मिलती है?
उत्तर-
लुप्त हो चुके जीवों के विषय में जानकारी उनकी निशानियाँ मिलने के कारण मिलती हैं। प्राचीन जीवों की निशानियों को ही जीवाश्म कहते हैं। लाखों वर्ष पूर्व जीवों के मिट्टी या अन्य पदार्थ में दब जाने से जीवाश्म बने हैं। हाथी जैसे एक जीव के बर्फ में दबे जीवाश्म इतने सुरक्षित मिले हैं कि देखने पर लगता है यह जीव लाखों वर्ष पूर्व नहीं अभी कुछ समय पूर्व ही मरे हैं।

प्रश्न 12.
आर्कियोप्टेरिस का जीवाश्म किस रूप में मिला था?
उत्तर-
आर्कियोप्टेरिस का जीवाश्म चित्र के रूप में मिला था। इस चित्र को देखकर पता चला कि पक्षियों की उत्पत्ति रेंगने वाले जीवों से हुई है।

प्रश्न 13.
अवशेषांग किसे कहते हैं? मानव शरीर के एक अवशेषांग का नाम लिखो।
उत्तर-
जीवों के शरीर में कुछ ऐसे अंग पाये जाते हैं, जिनका कोई उपयोग नहीं है। इन्हें अवशेषांग कहते हैं। उदाहरण के लिए, मानव में अक्कल दाढ़, आन्त्र पर पाई जाने वाली ऐपिन्डिक्स आदि का कोई उपयोग नहीं है।

प्रश्न 14.
क्या पृथ्वी के बाहर से पृथ्वी पर जीवन आ सकता है?
उत्तर-
प्रथम जीव पृथ्वी पर नहीं जन्मा अपितु सूक्ष्म जीवाणुओं के रूप में अन्तरिक्ष के किसी पिण्ड से आया है। जीव के बाहर से आने की परिकल्पना बहुत पुरानी है। केल्विन तथा होल्महोल्ट्ज़ ने इस बात को प्रतिपादित किया। नये अनुसंधानुसार ऐसे तथ्य जुटने लगे हैं जिनके आधार पर अब वैज्ञानिक कह रहे हैं कि प्रथम जीव की उत्पत्ति पृथ्वी पर नहीं हुई थी। हेडियनकाल में बनी चट्टानों से प्राप्त सूक्ष्म जीवाश्मों के अध्ययन करने से पता चला है कि लगभग 4 अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी पर प्रकाशसंश्लेषी जीवन विद्यमान था। अतः पृथ्वी पर जीवन बाहर से आ सकता है।

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 15.
सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में भारतीय सोच को समझाइए।
उत्तर-
हमारी संस्कृति में ब्रह्माण्ड या सृष्टि की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विचार वैदिककाल से होता रहा है। यह कार्य उस समय के ऋषि किया करते थे परन्तु आज वैज्ञानिक इस विषय में सोच रहे हैं । ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में विस्तार से चर्चा की गई है। पं. जवाहर लाल नेहरू ने भी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में ऋग्वेद के विचारों को प्रस्तुत किया है। स्वामी विवेकानंद ने वैदिक ज्ञान को समझाते हुए कहा कि चेतना ने एक से अनेक होते हुए ब्रह्माण्ड या सृष्टि का निर्माण किया। संसार में भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव व वस्तुएँ दिखाई देती हैं मगर वे मूल रूप से उस चेतना के ही रूप हैं। इस विश्वास को अद्वैत कहते हैं।

सृष्टि में देखते हैं कि प्रत्येक वस्तु एक बीज से प्रारम्भ होती है जो विकास करते हुए अपने चरम पर पहुँचती है तथा अन्त में बीज बनाकर नष्ट हो जाती है। यही सृष्टि का नियम है। कहा जा सकता है कि परमाणु जिस प्रकार बनता है उसी प्रकार ब्रह्माण्ड भी बनता है। महर्षि कपिल ने कहा है कि किसी का नाश होने का अर्थ उसके अपने कारण में मिल जाना है। मनुष्य का मरना उसका पंचभूतों से मिलना है। विवेकानंद के अनुसार हमें मनुष्य के रूप में प्रकट बुद्धि दिखाई देती है।

जैव केन्द्रिकता के सिद्धान्तानुसार प्रकृति की प्रत्येक घटना मानव हित में घटी लगती है। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के विषय में वर्तमान सर्वाधिक मान्यता प्राप्त अवधारणा बिगबैंग की है। इस अवधारणा के अनुसार माना गया है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, एक अत्यन्त सघन व गर्म पिण्ड से 13.8 अरब वर्ष पूर्व महाविस्फोट के कारण हुई है। किसी वस्तु के विस्फोट होने के बाद उसके टुकड़े दूर-दूर तक फैल जाते हैं, ब्रह्माण्ड के भाग अभी भी फैलते हुए एक-दूसरे से दूर जा रहे हैं।

भारत में सृष्टि सृजन के प्रकृतिवादी सिद्धान्त दिये गये हैं। जैन धर्म में सृष्टि को कभी नष्ट नहीं होने वाली माना गया है। जैन दर्शन के अनुसार यौगिक सदैव से अस्तित्व में हैं और सदैव रहेंगे।

प्रश्न 16.
सृष्टि की उत्पत्ति की जैवकेन्द्रिकता की अवधारणा समझाइए। भौतिक अवधारणा तथा इसमें प्रमुख अन्तर क्या है?
उत्तर-
20वीं शताब्दी में अनेक वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मात्र भौतिक नियमों के आधार पर सृष्टि के सृजन व संचालन को नहीं समझाया जा सकता । सम्पूर्ण विश्व इकाई है व एक ही पदार्थ का बना हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार विश्व की सब वस्तुएँ अलग-अलग दिखाई देती हैं किन्तु वास्तव में एक दूसरे से जुड़ी होती हैं। सबका अस्तित्व महासागर रूपी परमब्रह्म की बूंद की तरह है।

नोबल पुरस्कार विजेता चिकित्साशास्त्री राबर्ट लान्जा ने खगोलशास्त्री बोबे बर्मन के साथ 2007 में जैवकेन्द्रिकता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। इसके अनुसार इस विश्व का अस्तित्व जीवन के कारण है। जीवन के सृजन व विकास के लिए ही विश्व की रचना हुई है। इस सिद्धान्त में दर्शनशास्त्र से लेकर भौतिकशास्त्र के सिद्धान्तों को शामिल किया है। इसके बाद अन्य वैज्ञानिकों ने आधुनिक वैज्ञानिक तथ्यों के सन्दर्भ में जैवकेन्द्रिकता को समझाने का प्रयास किया। बाद में क्वाण्टम यान्त्रिकी को आधार बनाकर प्रस्तुत किया गया।

इस सिद्धान्त के अनुसार आइन्स्टीन की स्थान व समय की अवधारणा का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है अपितु ये सब मानव चेतना की अनुभूतियां मात्र हैं। लान्जा का मानना है कि चेतना को केन्द्र में रखकर ही भौतिकी की कई अबूझ पहेलियों जैसे हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धान्त, दोहरी झिरौं प्रयोग तथा बलों के सूक्ष्म सन्तुलन विभिन्न स्थिरांक व नियम का सजीव सृष्टि के अनुरूप होना आदि को समझा जा सकता है। राबर्ट लान्जा के अनुसार तो जीवन को केन्द्र में रखने पर ही समस्या हल हो सकती है। जैवकेन्द्रिकता के सिद्धान्त को मानने वालों का कहना है कि प्रकृति की प्रत्येक घटना मानव हित में हुई-सी लगती है। पृथ्वी पर अरबों वर्ष पूर्व हुआ उल्कापात भी मानव हित में ही हुआ जिससे डायनोसोर के नष्ट होने के कारण स्तनधारियों का तीव्र गति से विकास हो सका। यदि उल्का अपने आकार से कुछ और बड़ी होती या उसके पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश होते समय कोण कुछ अलग होता तो सम्पूर्ण जीवन नष्ट हो सकता था। वह उल्कापात मात्र एक दुर्घटना नहीं होकर प्रकृति की पूर्वनियोजित घटना थी।

व्हीलर का कहना है कि वर्तमान ही भूतकाल को निरोपित करता है तब भी विकास को पूर्व नियोजित मानना होगा। जैवकेन्द्रिकता का सिद्धान्त डार्विन के विकासवाद को स्वीकार नहीं करता। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन भौतिकी व रसायनशास्त्र की किसी दुर्घटना का परिणाम नहीं हो सकता जैसा कि विकासवाद मानता है। डार्विन के अनुसार आकस्मिक घटनाओं के आधार पर जैवविकास को छोटे स्तर पर समझाया जा सकता है किन्तु यह सरल नहीं है। एक स्वनियोजित योजना माने बिना जैवविकास को अच्छी तरह नहीं समझाया जा सकता।

प्रश्न 17.
सृष्टि की उत्पति की बिगबैंग अवधारणा क्या है? भारतीय अवधारणा तथा इसमें प्रमुख अन्तर क्या है?
उत्तर-
RBSE Solutions for Class 10 Science Chapter 16 ब्रह्माण्ड एवं जैव विकास 17
बिगबैंग अवधारणावर्तमान में यह अवधारणा ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के विषय में सबसे अधिक मान्य है। इस अवधारणा में माना गया है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एक अत्यन्त सघन वे अधिक गर्म पिण्ड से 13.8 अरब वर्ष पूर्व महाविस्फोट के कारण हुई है। जैसा कि हम जानते हैं कि विस्फोट होने के पश्चात् उसके टुकड़े दूर-दूर तक जाते हैं, ब्रह्माण्ड के भाग अभी भी फैलते हुए एक-दूसरे सेदूर जा रहे हैं। इस अवधारणा के पक्ष में विज्ञान ने अनेक प्रमाण भी एकत्रित किए हैं। ब्रह्माण्ड में हल्के तत्वों की अधिकता, अन्तरिक्ष में सूक्ष्मविकिरणों की उपस्थिति, महाकाय संरचनाओं की उपस्थिति ऐसे प्रमाण हैं। इस अवधारणा के अनुसार भौतिकी के किसी भी नियम की अवहेलना नहीं होती है।

विस्फोट के उपरान्त जैसे-जैसे ब्रह्माण्ड ठण्डा हुआ तब जाकर उप-परमाणीय कणों की उत्पत्ति हुई। उप-परमाणीय कणों से बाद में सरल परमाणु बने। परमाणुओं से प्रारम्भिक तत्वों, हाइड्रोजन, हीलियम व लिथियम के बड़े-बड़े बादल बने। गुरुत्व बल के फलस्वरूप संघनित होकर इन बादलों ने तारे व आकाशगंगाओं को जन्म दिया। प्रारम्भिक तत्वों से भारी तत्वों की उत्पति बाद में तारों या सुपरनोवाओं में होने का अनुमान है।

सुपरनोवाओं के लाल विस्थापन को मापने से यह तथ्य आया है कि ब्रह्माण्ड के फैलने की गति बढ़ रही है। यह ब्रह्माण्ड फैलता जाएगा और ठण्डा होकर जम जाएगा। अभी ब्रह्माण्ड में धूसर द्रव्य व धूसर ऊर्जा (Darak matter and dark energy) के उपस्थित होने की जानकारी प्राप्त हुई है परन्तु इसकी उपस्थिति की भूमिका का ज्ञान नहीं है। भौतिकवादियों का एक समूह चेतना के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता व इन वैज्ञानिकों को आशा है कि आने वाले समय में केवल भौतिक साधनों की सहायता से सृष्टि के सभी रहस्यों को जान लिया जाएगा जबकि दूसरे वैज्ञानिक कहते हैं कि चेतना की भूमिका को स्वीकार किये बिना सृष्टि की समग्रता को नहीं जाना जा सकता है। स्वामी विवेकानंद के विचार से विज्ञान सभी जगह, सभी में उपस्थित भारहीन चेतना के अस्तित्व को मानता है। भौतिकशास्त्री विजय कुमार पाण्डे के अनुसार सृष्टि का रहस्य अज्ञात की परिधि में न होकर अज्ञेय के विस्तार में होता है।

भारत में भी सृष्टि सृजन के प्रकृतिवादी सिद्धान्त दिए गए हैं। जैन धर्म में सृष्टि को कभी नष्ट नहीं होने वाली माना गया है। जैन दर्शन के अनुसार यौगिक हमेशा से अस्तित्व में है और हमेशा रहेंगे। ये यौगिक प्राकृतिक कानूनों द्वारा नियंत्रित हैं और अपनी ही ऊर्जा प्रक्रियाओं द्वारा चल रहे हैं। जैन दर्शन के अनुसार यौगिक शाश्वत है। ईश्वर या किसी अन्य शक्ति ने इन्हें नहीं बनाया।

प्रिंसटन विश्वविद्यालय के पॉल स्टेइंहार्ट ने एक्यापायरोटिक मॉडल प्रस्तुत कर कहा है कि ब्रह्माण्ड की उत्पति दो त्रिविमीय ब्रह्माण्डों के चौथी विमा में टकराने से हुई है। इसमें भी ब्रह्माण्ड का प्रसार होना तो माना गया है मगर बिगबैंग के प्रसार से अलग है। ब्रह्माण्ड को रबर की झिल्ली की तरह फैलता माना गया है। ब्रह्माण्ड की संरचनाएँ एक-दूसरे से दूर जा रही हैं मगर बढ़ती दूरी का कोई केन्द्रीय बिन्दु नहीं है।

प्रश्न 18.
जैव विकास से आप क्या समझते हैं? आपके अनुसार जैव विकास कैसे हुआ होगा? समझाइये।
उत्तरे-
जैव विकास से आशय-अत्यधिक धीमी गति एवं क्रमबद्ध परिवर्तनों की जिस प्रक्रिया द्वारा वर्तमान पौधे व प्राणियों की विभिन्न जातियाँ पृथ्वी पर बहुत पहले उपस्थित जातियों से विकसित हुईं, उसे जैव विकास कहते हैं । वर्तमान में स्थित जीव वैसे नहीं हैं जैसे आज से लाखों वर्ष पूर्व थे और पूर्व में पृथ्वी पर पाई जाने वाली जातियाँ आज नहीं हैं तो इससे ज्ञात होता है कि जीवजातियों का क्रमिक विकास हुआ है।

जैव विकास-संसार में मनुष्य, हाथी, चीता, मछली तथा चमगादड़ कितने भिन्न जीव दिखाई देते हैं फिर भी मनुष्य के हाथ, चीते की अगली टांग, मछली के फिन्स तथा चमगादड़ के पंख के कंकाल की मूलभूत रचना एकसमान होती है। यह इस बात का प्रमाण है कि इन सभी जीवों का उद्गम एक ही पूर्वज से हुआ होगा। सभी बहकोशीय जीवों का शरीर यूकैरियोटिक कोशिकाओं से बना होता है। प्रोटीन का पाचन करने वाला एन्जाइम ट्रिप्सिन एककोशीय जीव से लेकर मनुष्य तक क्रियाशील होता है। जीवों के गुणों को नियंत्रित करने वाला डीएनए सभी जीवों में समान प्रकार से कार्य करता है। ये सभी बातें जैव विकास को प्रमाणित करती हैं। जीवों के वर्गीकरण का अध्ययन करने पर भी यही लगता है कि एककोशीय जीवों से बहुकोशीय जीवों का क्रमिक विकास हुआ है। वनस्पति जगत से भी अनेक प्रमाण मिलते हैं।

जैव विकास की क्रियाविधि-लैमार्क ने कुछ अंगों को अधिक काम में लेने व कुछ की उपेक्षा करने पर अर्जित गुणों को वंशागत मानते हुए नई जातियों के उद्भव को समझाने का प्रयास किया। छिपकली जैसे कुछ जीवों को रेंगकर चलने से उनके बाहुओं की उपेक्षा हुई और कालान्तर में बाहु लुप्त हो गई। इस प्रकार सर्पो की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार लैमार्क ने जिराफ व बतख की जातियों के बनने को समझाया। वीजमान ने चूहों की पूँछ को निरन्तर कई पीढ़ियों तक काटकर देखा तो 10 पीढ़ी तक पूँछ पूरी तरह लम्बी ही रही। वीजमान ने कहा कि अर्जित गुणों की वंशागति नहीं होती।

चार्ल्स डार्विन ने प्रकृति वरण के माध्यम से जातियों की उत्पत्ति को समझाया। डार्विन ने कहा कि प्रत्येक जाति के जीव बड़ी संख्या में उत्पन्न होते हैं। कोई भी दो जीव एक से नहीं होते। जीवों के अधिक होने पर उनमें भोजन, स्थान व अन्य साधनों के लिए संघर्ष होता है। संघर्ष होने पर प्रकृति के अनुसार जो सर्वोत्तम होता है, उसकी संतानों की संख्या अधिक होती जाती है और एक नई जाति बन जाती है। उस समय तक मेंडल के आनुवांशिकता के नियमों का ज्ञान नहीं था। डार्विन यह स्पष्ट नहीं कर सका कि जीवों में भिन्नता किस कारण उत्पन्न होती है।

1901 में ह्यूगो डी ब्रिज ने देखा कि बगीचे में लगे प्रिमरोज के पौधों के बीच एक नई प्रकार का प्रिमरोज का पौधा उग गया है। आगे अध्ययन कर डी ब्रिज ने कहा कि जीवों में अचानक ही बड़े परिवर्तन होने से नई जातियाँ बनती हैं। डी ब्रिज ने ऐसे परिवर्तनों को उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) नाम दिया। जीवों के गुणों का निर्धारण उनकी कोशिकाओं में पाए जाने वाले डीएनए से नियंत्रित होता है। ये गुण चार क्षारकों, एडिनीन, ग्वानीन, साइटोसीन, थायमीन जिन्हें क्रमशः A, G, C, T अक्षरों से प्रदर्शित किया जाता है, की श्रृंखला के रूप होते हैं। इस श्रृंखला में परिवर्तन से जीवों के गुणों में परिवर्तन आता है।

डी ब्रिज के उत्परिवर्तनवाद को डार्विनवाद के साथ मिलाकर नवडार्विनवाद बनाया गया। जातियों के बनने का कारण के रूप में नवडार्विनवाद को ‘सत्य’ की तरह स्वीकार कर लिया गया। आप जानते हैं कि विज्ञान में सत्य कुछ भी नहीं होता। विकासवादी जीववैज्ञानिक लिन मार्गुलिस ने डार्विन के विकासवाद का खण्डन करते हुए कहा कि प्रकृति में विकास का मार्ग प्रतिस्पर्धी नहीं होकर परस्पर सहयोग का रहा है। मार्गुलिस का कहना है कि विकासवादी आज से 50 करोड़ वर्ष पूर्व से ही जन्तुओं के इतिहास की बात करते हैं जबकि पृथ्वी पर जीवन उससे बहुत पहले ही अस्तित्व में आ गया था। 400 करोड़ वर्ष से भी पुराने जीवाश्म मिलते हैं।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्रश्न 1.
‘नाशः कारणालयः’ कहने वाले थे
(अ) महर्षि वेदव्यास
(ब) महर्षि वाल्मीकि
(स) महर्षि कपिल
(द) महर्षि वशिष्ठ

प्रश्न 2.
सृष्टि के स्वरूप को समझने का सच्चा मार्ग है
(अ) चेतना
(ब) बुद्धि
(स) दर्शन
(द) भक्ति

प्रश्न 3.
जगत् में जीव निश्चित व अनिश्चित इच्छा का प्रदर्शन स्वतंत्र रूप से करता रहता है। इसे किसके द्वारा समझा जा सकता है?
(अ) बिगबैंग सिद्धान्त
(ब) जैव केन्द्रिकता सिद्धान्त
(स) भौतिक सिद्धान्त
(द) प्राकृतिक सिद्धान्त

प्रश्न 4.
अनिश्चितता का सिद्धान्त प्रतिपादित करने वाले थे
(अ) स्वामी विवेकानन्द
(ब) व्हीलर
(स) हाइजेनबर्ग
(द) लान्जा

प्रश्न 5.
डार्क मेटर व डार्क ऊर्जा सम्बन्धित है
(अ) ब्रह्माण्ड से
(ब) समुद्र से
(स) चेतना से
(द) सुपरनोवाओं से।

प्रश्न 6.
प्रत्येक जाति के विकसित होने के इतिहास को कहते हैं
(अ) जैव संरचना
(ब) जैव विकास
(स) जीवाश्म
(द) जातिवृत्त

प्रश्न 7.
जगत के कुछ समय सूक्ष्म कण में रहकर फिर प्रकट होने के समय को कहते हैं
(अ) काल
(ब) युग
(स) कल्प
(द) चरण

प्रश्न 8.
जीवों के शरीर के ऐसे भाग जिनका कोई उपयोग नहीं है, कहलाते हैं
(अ) जीवाश्म
(ब) जातिवृत्त
(स) अवशेषांग
(द) कोई नहीं

उत्तरमाला-
1. (स)
2. (अ)
3. (ब)
4. (स)
5. (अ)
6. (द)
7. (स)
8. (स)

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
ब्रह्माण्ड विज्ञान (Cosmology) किसे कहते हैं ?
उत्तर-
ब्रह्माण्ड से सम्बन्धित अध्ययन को ब्रह्माण्ड विज्ञान कहते हैं ।

प्रश्न 2.
डिस्कवरी ऑफ इण्डिया पुस्तक के लेखक कौन थे?
उत्तर-
पं. जवाहर लाल नेहरू इस पुस्तक के लेखक थे।

प्रश्न 3.
अद्वैत किसे कहते हैं ?
उत्तर-
संसार में भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव व वस्तुएँ दिखाई देती हैं किन्तु वे मूल रूप से उस चेतना के ही रूप हैं। इस विश्वास को ही अद्वैत कहते हैं।

प्रश्न 4.
‘नाशः कारणालय:’ का क्या अर्थ है?
उत्तर-
किसी का नाश होने का अर्थ है उसका अपने कारण में मिल जाना। मनुष्य का मरना उसका पंचभूतों से मिलना है।

प्रश्न 5.
कल्प किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जगत के कुछ समय सूक्ष्म रूप में रहकर फिर प्रकट होने के समय को एक कल्प कहते हैं।

प्रश्न 6.
राबर्ट लान्जा व बोब बर्मन ने कौनसा सिद्धान्त प्रतिपादित किया?
उत्तर-
जैवकेन्द्रिकता सिद्धान्त।

प्रश्न 7.
जैवकेन्द्रिकता सिद्धान्त में क्या-क्या सम्मिलित किया गया है?
उत्तर-
दर्शनशास्त्र एवं भौतिकशास्त्र के सिद्धान्तों को सम्मिलित किया गया है।

प्रश्न 8.
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के विषय में वर्तमान में कौनसी अवधारणा सर्वमान्य है?
उत्तर-
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के विषय में वर्तमान में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त अवधारणा बिगबैंग अवधारणा है।

प्रश्न 9.
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कब व किससे हुई थी?
उत्तर-
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एक अत्यन्त सघन व अत्यन्त गर्म पिण्ड से 13.8 अरब वर्ष पूर्व महाविस्फोट के कारण हुई थी।

प्रश्न 10.
जीव उत्पत्ति के विषय में ओपेरिन ने क्या सिद्धान्त दिया था?
उत्तर-
ओपेरिन ने 1924 में जीव की उत्पत्ति नाम से निर्जीव पदार्थों से जीवन की उत्पत्ति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था।

लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
स्वामी विवेकानन्द ने अद्वैत में वैदिक ज्ञान को किस प्रकार समझाया है?
उत्तर-
स्वामी विवेकानंद ने वैदिक ज्ञान को समझाते हुए कहा कि चेतना ने एक से अनेक होते हुए ब्रह्माण्ड का निर्माण किया। संसार में भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव व वस्तुएं दिखाई देती हैं किन्तु वे मूल रूप से उस चेतना के ही रूप हैं। इस विश्वास को ही अद्वैत कहते हैं। विवेकानंद ने कहा कि सृष्टि की उत्पति और विकास कैसे हुआ इस प्रश्न का उत्तर कई बार दिया गया है और अभी कई बार और दिया जाएगा, हर प्रयास के साथ अद्वैतवाद पुष्ट होता जाएगा।

प्रश्न 2.
सृष्टि का क्या नियम है? समझाइये।
उत्तर-
सृष्टि में चारों ओर नजर दौड़ाने पर देखते हैं कि प्रत्येक वस्तु का निर्माण एक बीज से प्रारम्भ होता है। जब यह वस्तु विकास करते हुए चरम पर पहुँचती है तब अन्त में बीज बनाकर नष्ट हो जाती है। पक्षी एक अण्डे से अपना जीवन प्रारम्भ करता है और उसका अस्तित्व भी अण्डे द्वारा ही आगे बना रहता है। अण्डे और पक्षी का चक्र बार-बार दोहराया जाता है। यही सम्पूर्ण सृष्टि का नियम है। परमाणु का निर्माण जिस प्रकार होता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड का निर्माण होता है। प्रत्येक कार्य के पीछे उसका कारण छिपा होता है। कारण सूक्ष्म होने के कारण दिखाई नहीं देता है।

प्रश्न 3.
सृष्टि रचनावाद या डिजाइन थ्योरी को समझाइए।
उत्तर-
स्वामी विवेकानन्द सृष्टि रचनावाद से सहमत थे और वे कहते थे कि बुद्धि ही सृष्टिक्रम का चरम विकास है। आजकल हमें मनुष्य के रूप में प्रकट बुद्धि दिखाई देती है। इसका अर्थ यह नहीं कि बुद्धि की उत्पत्ति अब हुई है। बुद्धि अप्रकट रूप से सदैव से उपस्थित रही है। पूर्णरूप से विकसित मानव के साथ ही सृष्टि का अन्त है। इस जगत् में जो बुद्धि प्रकट हो रही है, उस सर्वजनीय सर्वव्यापी बुद्धि का नाम ही ईश्वर है।

प्रश्न 4.
जैवकेन्द्रिकता के सिद्धान्त से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
20वीं शताब्दी में अनेक वैज्ञानिक इस निर्णय पर पहुँचे कि भौतिक नियमों के आधार पर सृष्टि के सृजन व संचालन को नहीं समझाया जा सकता। उन्हें ऐसा लगा कि संपूर्ण विश्व एक ही इकाई है। सम्पूर्ण सृष्टि एक ही पदार्थ की बनी है। यह स्वीकारा गया कि हमें संसार में सब वस्तुएँ अलग-अलग दिखाई देती हैं परन्तु वास्तविकता में एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। चिकित्साशास्त्री राबर्ट लान्जा व खगोलशास्त्री बोब बर्मन ने मिलकर जैवकेन्द्रिकता के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया कि इस विश्व का अस्तित्व जीवन के कारण है या यों कहें कि जीवन के सृजन व विकास के लिए ही विश्व की रचना हुई है। अतः चेतना ही सृष्टि के स्वरूप को समझने का सही मार्ग है। चेतना के बिना विश्व की कल्पना नहीं की जा सकती।

प्रश्न 5.
सुपरनोवाओं के लाल विस्थापन को मापने से क्या तथ्य सामने आया?
उत्तर-
सुपरनोवाओं के लाल विस्थापन को मापने से यह तथ्य सामने आया है कि ब्रह्माण्ड के फैलने की गति बढ़ रही है। ब्रह्माण्ड का अन्त क्या होगा इस विषय में अभी एक राय नहीं बन पाई है। एक विचार है कि यह निरन्तर फैलता ही जाएगा और ठण्डा होकर जम जाएगा। अभी हाल ही में ब्रह्माण्ड में बड़ी मात्रा में धूसर द्रव्य व धूसर ऊर्जा (डार्क मैटर व डार्क ऊर्जा) उपस्थित होने की जानकारी प्राप्त हुई। ब्रह्माण्ड में धूसर द्रव्य की क्या भूमिका है, इसको जानना अभी बाकी है।

प्रश्न 6.
जातिवृत्त (Phylogeny) से क्या अभिप्राय है? इसे स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-जैसा कि हम जानते हैं कि पृथ्वी पर विद्यमान प्रत्येक जाति का विकास पूर्ववर्ती जाति से होता है। अतः प्रत्येक जाति के विकसित होने का अपना इतिहास है। इस इतिहास को ही जाति का जातिवृत कहते हैं। वर्तमान में वैज्ञानिक विधियों का उपयोग कर अनेक जातियों का जातिवृत ज्ञात कर लिया गया है। DNA को श्रृंखलाबद्ध करने की तकनीक के विकसित हो जाने से जातिवृत बहुत अच्छी तरह व सरलता से जानना संभव हो गया है। यह देखा गया है कि जो दिखाई देता है। उसका इतिहास उसके विपरीत निकल जाता है। एक अमेरिकी, अफ्रीकी मूल के लोगों को नीचा समझकर उनका उपहास उड़ाया करता था, मगर DNA विश्लेषण कराने पर वह स्वयं अफ्रीकी मूल का निकला। अतः जाति या धर्म आदि के आधार पर भेदभाव करना उचित नहीं है क्योंकि सम्पूर्ण मानव जाति का उद्गम एक ही है।

प्रश्न 7.
मिलर के प्रयोग का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
1953 में स्टेनले मिलर ने पृथ्वी की प्रारम्भिक अवस्था में ‘अमीनो अम्लों का उत्पादन संभव’ लेख प्रकाशित कर ओपेरिन व हाल्डेन के विचारों का समर्थन किया। मिलर के इस प्रयोग का उद्देश्य उस परिकल्पना का परीक्षण करना था, जिसके अनुसार यह माना जाता है कि अमीनो अम्ल सदृश्य पदार्थ अमोनिया, जल, मीथेन जैसे प्रथम यौगिकों से बने होंगे। मिलर ने एक विशिष्ट वायुरोधक (air tight) उपकरण, जिसे विद्युत विसर्जन उपकरण कहते हैं, प्रयोग हेतु लिया। इस उपकरण में मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन (2:1:2) एवं जल का उच्च ऊर्जा वाले विद्युत स्फुलिंग (high energy electrical spark) में से परिवहन किया। जलवाष्प व उष्णता की पूर्ति उबलते हुए जल के पात्र द्वारा की गई। परिवहन करती हुई जल वाष्प ठण्डी व संघनित होकर जल में परिवर्तित हो गई। इस प्रयोग का उद्देश्य उन परिस्थितियों का निर्माण करना था जो कि जीव की उत्पत्ति के समय पृथ्वी पर रही होंगी। मिलर ने दो सप्ताह तक इस उपकरण में गैसों का परिवहन होने दिया। इसके बाद उसने उपकरण की ‘U’ नली में जमे द्रव को निकाल परीक्षण किया तो इसमें अमीनो अम्ल एवं कार्बनिक अम्लों के साथ-साथ राइबोस, शर्करा, प्यूरीन्स एवं पिरामिडिन्स आदि पाये।
RBSE Solutions for Class 10 Science Chapter 16 ब्रह्माण्ड एवं जैव विकास 7

प्रश्न 8.
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के ‘बिगबैंग सिद्धान्त’ का संक्षेप में वर्णन कीजिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2017-18 )
उत्तर-
बिगबैंग सिद्धान्त-इस अवधारणा के अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एक अत्यन्त सघन व अधिक गर्म पिण्ड से 13.8 अरब वर्ष पूर्व महाविस्फोट के कारण हुई है। जैसा कि हम जानते हैं कि विस्फोट होने के पश्चात् उसके टुकड़े दूरदूर तक जाते हैं, ब्रह्माण्ड के भाग अभी भी फैलते हुए एक-दूसरे से दूर जा रहे हैं। इस अवधारणा के पक्ष में विज्ञान ने अनेक प्रमाण भी एकत्रित किए हैं। ब्रह्माण्ड में हल्के तत्वों की अधिकता, अन्तरिक्ष में सूक्ष्मविकिरणों की उपस्थिति, महाकाय । संरचनाओं की उपस्थिति ऐसे प्रमाण हैं। इस अवधारणा के अनुसार भौतिकी के किसी भी नियम की अवहेलना नहीं होती है।

विस्फोट के उपरान्त जैसे-जैसे ब्रह्माण्ड ठण्डा हुआ तब जाकर उप-परमाणीय कणों की उत्पत्ति हुई । उप-परमाणीय कणों से बाद में सरल परमाणु बने। परमाणुओं से प्रारम्भिक तत्वों, हाइड्रोजन, हीलियम व लिथियम के बड़े-बड़े बादल बने। गुरुत्व बल के फलस्वरूप संघनित होकर इन बादलों ने तारे व आकाशगंगाओं को जन्म दिया। प्रारम्भिक तत्वों से भारी तत्वों की उत्पत्ति बाद में तारों या सुपरनोवाओं में होने का अनुमान है।

सुपरनोवाओं के लाल विस्थापन को मापने से यह तथ्य आया है कि ब्रह्माण्ड के फैलने की गति बढ़ रही है। यह ब्रह्माण्ड फैलता जाएगा और ठण्डा होकर जम जाएगा। अभी ब्रह्माण्ड में धूसर द्रव्य व धूसर ऊर्जा (Dark matter and dark energy) के उपस्थित होने की जानकारी प्राप्त हुई है परन्तु इसकी उपस्थिति की भूमिका का ज्ञान नहीं है।

प्रश्नं 9.
जीवाश्म किसे कहते हैं? मानव शरीर में पाये जाने वाले दो अवशेषांगों के नाम लिखिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2018)
उत्तर-
प्राचीन जीवों की निशानियों को ही जीवाश्म कहते हैं। लाखों वर्ष पूर्व जीवों के मिट्टी या अन्य पदार्थ में दब जाने से जीवाश्म बने हैं।
मानव शरीर में अक्कल दाढ़, आंत पर पाई जाने वाली एपेंडिक्स आदि अवशेषांग हैं।

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
जीव उत्पत्ति के आध्यात्मिक सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
वर्तमान जीवन पूर्णरूपेण DNA पर आधारित है। DNA में संग्रहित सूचना को केन्द्रक के बाहर RNA कोशिका द्रव्य में ले जाता है। कोशिका द्रव्य में उपस्थित राइबोसोम DNA से प्राप्त सूचना के अनुरूप प्रोटीन का संश्लेषण करता है। प्रोटीन के उत्प्रेरण से ही जीवन की सभी क्रियाएं निर्देशित होती हैं। DNA के निर्माण में अनेक प्रकार के प्रोटीन काम में आते हैं। अतः अब यह प्रश्न है कि जीवन विकास क्रम में पहले DNA आया या प्रोटीन? सत्य व सम्भव है कि जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में DNA नहीं था। RNA अपनी भूमिका के साथ DNA व प्रोटीन की भूमिका भी निभा रहा होगा। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि जीवन की उत्पत्ति से पूर्व अनेक उपापचय चक्रों का स्वतन्त्र रूप से विकास हो चुका होगा।

नए अनुसंधानों से यह ज्ञात हुआ है कि प्रारम्भिक वायुमण्डल में ऑक्सीजन युक्त गैसों जैसे CO2, SO2, H2O, वाष्प आदि की प्रमुखता थी। प्रथम जीव पृथ्वी पर नहीं जन्मा अपितु सूक्ष्म बीजाणुओं के रूप में अन्तरिक्ष के किसी पिण्ड से आया है। हेडियनकाल में बनी चट्टानों से प्राप्त सूक्ष्म जीवाश्मों का अध्ययन करने से ज्ञात हुआ है कि लगभग 4 अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी पर प्रकाशसंश्लेषी जीवन उपस्थित था।

आज इस बात के पक्ष में प्रबल प्रमाण मिल रहे हैं कि सूक्ष्म बीजाणु किसी एक ग्रह के वायुमण्डल से निकलकर, अन्तरिक्ष की लम्बी व कठिन यात्रा सफलता से पूरी कर, किसी अन्य ग्रह पर उतर सकते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार जीवन की उत्पति एक बार नहीं होकर, अनेक बार अनेक स्थानों पर हुई होगी। उत्पति के बाद जीवन फैलता गया।

पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य किसी भी स्थान पर जीवन नहीं है। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति को लेकर अभी भी विवाद है। पृथ्वी का वातावरण जीवन के बहुत ही अनुकूल सिद्ध हुआ है। पृथ्वी के विभिन्न भागों में पाई जाने वाली वातावरणीय भिन्नता में अपने को अनुकूलित करने के लिए जीवन ने बहुत रूप ग्रहण कर लिए हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी अपने स्वरूप को बनाए रखने में सक्षम इन समूहों को जातियाँ कहा जाता है। 3 लाख के लगभग वनस्पतियों व 12 लाख जन्तुओं व 10 लाख के लगभग सूक्ष्म जीवों की जातियाँ पाई गई हैं। नई जातियाँ बनने के साथ-साथ कुछ नष्ट भी होती रही हैं। जैसे डायनोसोर व डोडो पक्षी की जातियाँ। प्रदूषण के बढ़ती आबादी के कारण नष्ट होते आवासों के कारण अनेक जातियों के जीवों की संख्या घटती जा रही है। घरेलू चिड़िया गौरैया आदि जीव जातियों के सामने तो विलुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है।

प्रश्न 2.
पृथ्वी एक विशेष ग्रह है, इस पर अपने विचार बताइए।
उत्तर-
वास्तव में पृथ्वी ही एक ऐसा ग्रह है, जिस पर जीवन की सभी अनुकूलतायें हैं वे जीवन भी केवल मात्र इस ग्रह पर ही है। अन्तरिक्ष में जीवन न होने की पुष्टि अन्तरिक्ष यानों द्वारा बड़े-बड़े दूरदर्शी यंत्र लगाकर की गई है। वैसे पृथ्वी सूर्य से तीसरे नम्बर का ग्रह है। पृथ्वी पर सूर्य का प्रकाश न तो इतना अधिक पड़ता है कि सम्पूर्ण जल वाष्प बनकर उड़ जाए तथा न ही इतना कम पड़ता है कि सम्पूर्ण जल ठण्डा होकर कठोर बर्फ में रूपान्तरित हो जाए। पृथ्वी का यही गुण इसे जीवन योग्य बनाता है। पृथ्वी के अतिरिक्त किसी ग्रह पर जीवन तभी होगा जब वहाँ जल द्रव की अवस्था में होगा।

पृथ्वी पर एक कोशिकीय, बहुकोशिकीय, कवक व पादप, जन्तु आदि लाखों प्रकार के जीव पाए जाते हैं। वैज्ञानिक इस बात से तो सहमत हैं कि इन सबका प्रथम पूर्वज एक ही था। आज भी इस प्रश्न का उत्तर जानना शेष है कि सभी जीवों का प्रथम पूर्वज पृथ्वी पर ही जन्मा था या किसी अन्य खगोलीय पिण्ड से पृथ्वी पर आया था? प्रथम जीव की उत्पत्ति में ईश्वर जैसी किसी शक्ति की कोई भूमिका रही है या यह मात्र प्राकृतिक संयोग है? लगभग सभी धर्मों में विशिष्ट सृजन की बात कही गई है। इस मान्यता के अनुसार पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवों को ईश्वर ने ठीक वैसा ही बनाया जैसे वे वर्तमान में पाए जाते हैं। मनुष्य को सबसे बाद में बनाया गया।

प्रश्न 3.
जीवाश्मों की उत्पत्ति व प्रकार बताइए।
उत्तर-
जीवाश्मों की उत्पत्ति-पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति हुए अरबों वर्ष बीत चुके हैं। प्राचीन समय के जीवनरूप में तथा वर्तमान के जीवनरूप में अनेक परिवर्तन आ चुके हैं। ज्यों-ज्यों विकास होता गया, पर्यावरण में परिवर्तन आता गया, त्यों-त्यों जीवन रूपों में भी परिवर्तन आता गया। इस विकास की चरणबद्ध श्रृंखला में अनेक जीवन रूप लुप्त हो चुके हैं, जैसे डायनोसोर। लुप्त हुए समस्त जीवों के विषय में विविध प्रकार की जानकारियाँ उनकी निशानियाँ मिलने के कारण मिलती हैं। प्राचीन जीवों की निशानियाँ या अवशेष भागों को ही जीवाश्म (fossils) कहते हैं। लाखों वर्ष पूर्व जीवों के मिट्टी या अन्य पदार्थ में दब जाने व अधिक तापक्रम व दाब के कारण जीवाश्मों का निर्माण हुआ है।

जीवाश्मों के प्रकार-प्राचीन समय के हाथी जैसे एक जीव के बर्फ में दब जाने से वर्तमान में बर्फ के अन्दर जीवाश्म मिला है। ये दबे जीवाश्म इतने सुरक्षित मिले हैं कि देखने पर यह प्रतीत होता है कि यह जीव लाखों वर्ष पूर्व नहीं अभी कुछ समय पूर्व ही मरे हैं।

RBSE Solutions for Class 10 Science Chapter 16 ब्रह्माण्ड एवं जैव विकास 3
अम्बर या लाख जैसे पदार्थों में दबे जीवाश्म भी इतने ही अच्छे होते हैं। कई बार दबे हुए जीव का शरीर तो धीरेधीरे नष्ट हो जाता है किन्तु उसका चित्र अंकित हो जाता है। चित्र के रूप में मिले आर्कियोप्टेरिक्स जीवाश्म को देखकर पता चला कि पक्षियों की उत्पत्ति रेंगने वाले जीवों से हुई है। इन जीवों के मृत शरीर के कोमल भाग तो सड़कर नष्ट हो जाते हैं। किन्तु कठोर भाग जैसे हड्डियाँ, लकड़ी आदि सुरक्षित दबी मिलती हैं।
RBSE Solutions for Class 10 Science Chapter 16 ब्रह्माण्ड एवं जैव विकास 3.1
इस प्रकार के जीवाश्मों से ही हमें ज्ञात हुआ कि लोमड़ी जीव में समय-समय पर हुए परिवर्तनों से वर्तमान में घोड़ा उत्पन्न हुआ है। कभी-कभी जीवों के शरीर के कार्बनिक अणु तो नष्ट होते जाते हैं किन्तु उनका स्थान अकार्बनिक अणु लेते रहते हैं। ऐसे में जीव के स्थान पर उनकी पत्थर की मूर्ति तैयार हो जाती है जिसकी आन्तरिक व बाहरी रचना ठीक उस जीव की जैसी ही हो जाती है। भारतीय वैज्ञानिक बीरबल साहनी ने पादपों के अनेक जीवाश्म खोजे हैं तथा इन्होंने इनका अध्ययन कर बहुत सी जानकारी एकत्रित की है।

प्रश्न 4.
जीव उत्पत्ति के भौतिक सिद्धान्त की विस्तार से व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
चार्ल्स डार्विन ने सर्वप्रथम जीव की उत्पत्ति में ईश्वर की भूमिका को नकारा तथा प्राकृतिक नियमों के अनुरूप जीव उत्पत्ति के विचार रखे। ओपेरिन ने 1924 में निर्जीव पदार्थों से जीवन की उत्पत्ति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। ओपेरिन ने बताया कि लुई पाश्चर के अनुसार यह सही है कि जीव की उत्पत्ति जीव से ही होती है, किन्तु प्रथम जीव पर यह सिद्धान्त लागू नहीं होता है। विभिन्न खगोलीय पिण्डों पर मिथेन की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि पृथ्वी का प्रारम्भिक वायुमण्डल मिथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन तथा जलवाष्प से बना होने के कारण अत्यन्त अपचायक रहा होगा। इन तत्वों के संयोग से बने यौगिकों ने आगे संयोग कर जटिल यौगिकों का निर्माण किया होगा। इन यौगिकों ने ही जीवन की नींव रखी होगी।

हाल्डेन (1929) ने ओपेरिन के विचारों को और विस्तार दिया। हाल्डेन ने पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर संकेन्द्रकीय कोशिका की उत्पत्ति तक की घटनाओं को आठ चरणों में विभक्त कर समझाया। उन्होंने कहा कि सूर्य से पृथक् होकर पृथ्वी धीरे-धीरे ठण्डी हुई तो उस पर अनेक प्रकार के तत्व बन गए। भारी तत्व पृथ्वी के केन्द्र की ओर गए तथा हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, आर्गन से प्रारम्भिक वायुमण्डल बना। वायुमण्डल के इन तत्वों के आपसी संयोग से अमोनिया व जलवाष्प बने। इस क्रिया में सम्पूर्ण ऑक्सीजन के उपयोग में आ जाने के कारण वायुमण्डल अपचायक हो गया था। सूर्य प्रकाश व विद्युत विसर्जन के प्रभाव से रासायनिक क्रियाओं का दौर चलता रहा व कालान्तर में अमीनो अम्ल, शर्करा, ग्लिसरोल आदि यौगिक बनते गए तथा इन यौगिकों के जल में विलय होने से पृथ्वी पर पूर्वजीवी गर्म सूप बना। किन्तु इन कल्पनाओं का कोई प्रायोगिक आधार नहीं था। स्टेनले मिलर (1953) ने ओपेरिन व हाल्डेन के विचारों का समर्थन किया तथा इन्होंने प्रयोग के लिए एक विद्युत विसर्जन उपकरण बनाया।
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उक्त उपकरण में (चित्र) एक गोल पेंदे का फ्लास्क, एक विद्युत विसर्जन बल्ब तथा एक संघनक लगा था। गोल पेंदे के फ्लास्क में पानी भरने के बाद उपकरण में हवा निकालकर उसमें मिथेन, अमोनिया व हाइड्रोजन को 2:1:2 अनुपात में भर दिया गया। विद्युत विसर्जन के साथ-साथ पानी को उबलने दिया गया जिससे उत्पन्न भाप के प्रभाव के कारण गैस निरन्तर वृत्त में घूमती रहती। विद्युत विर्सजन बल्ब से निकलने वाली जलवाष्प के संघनित होने पर उसे विश्लेषण के लिए बाहर निकाला जा सकता था। मिलर ने निरन्तर एक सप्ताह विद्युत विर्सजन होने के बाद संघनित द्रव का विश्लेषण किया। विश्लेषण करने पर उस द्रव में अमीनो अम्ल, एसिटिक अम्ल आदि कई प्रकार के कार्बनिक पदार्थ उपस्थित पाए गए।