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Chapter 17 सामाजिक विषमताओं तथा विछेदनों का निराकरण

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
विषमता को आशय है।
(a) जीवन स्तर एवं जीवन-शैली में मिन्नता
(b) शिक्षा में अन्तर
(c) आयु में असमानता
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(a) जीवन-शर एवं जीवन-शैली में भिन्नता

प्रश्न 2.
सामाजिक विषमता की उत्पत्ति के विषय में प्रचलित व्याख्याओं में शामिल हैं।
(a) प्राकृतिक विभेद
(b) शम्न विभाजन एवं वर्ग निर्माण
(c) प्रकार्यात्मक आवश्यकता
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन विषमता के कारणों में सम्मिलित नहीं है?
(a) अर्जित आय
(b) व्यवसाय
(c) जन्म, जाति एवं प्रजाति
(d) बटाईदार
उत्तर:
(d) बटाईदार

प्रश्न 4.
भारत में किस तरह की समाज्ञ यवस्था पाई जाती है?
(a) मुली समज व्यवस्था
(b) द समाज व्यवस्था
(c) अर्ब बुली समाज व्यवस्था
(d) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर:
(b) बन्द अमात्र ब्यवस्था

प्रश्न 5,
समाज विछेदन का तात्पर्य हैं।
(a) सन्या दूट जाना
(b) सम्बन्धों में अलगाव
(c) ” और ” दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) ‘a’ और ‘b’ दोनों

प्रश्न 6.
सामाजिक विजेदन के कारणों में सम्मिलित हैं
(a) जातिवाद
(b) जनसंख्या वृमि
(c) सामाजिक कुरीतियों
(d) में सनी
उत्तर:
(d) ये सभी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
विषमता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
विषमता का तात्पर्य एक समाज के लोगों के जीवन स्तर तथा जीवन-शैली को भिताओं में है।

प्रश्न 2. विषमता की उत्पत्ति को लेकर कितने मत प्रचलित हैं?
उत्तर:
विषमता की उत्पत्ति को लेकर प्रमुख रूप से दो प्रकार के मत प्रचलित हैं।

प्रश्न 3.
समाज में सामाजिक विषमता कैसे उत्पन्न होती है? (2018)
अक्षा सामाजिक विषमता के दो कारणों को लिखिए।
उत्तर:
सामाजिक विषमता उत्पन्न होने के दो मुख्य कारण इस प्रकार हैं।

  • अर्जित आय
  • व्यवसाय

प्रश्न 4.
भारत किस तरह की समाज व्यवस्था का उदाहरण प्रस्तुत करता है?
उत्तर:
भारत परम्परावादी खेतिहर समाज का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहाँ जाति के साथ साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि सुधार होने तक कृषि व्यवस्था में छः स्तर देखने को मिलते हैं।

  • गैर-खेतिहर भूस्वामी
  • गैर खेतिहर पट्टेदार
  • खेतिहर भूस्वामी
  • खेतिहर रैय्यत
  • बटाईदार
  • भूमिहीन खेतिहर मजदूर

प्रश्न 5.
सामाजिक विछेदन कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
सामाजिक विच्छेदन दो प्रकार के होते हैं, जो निम्नलिखित है।

  • भक्तिगत विच्छेदन
  • सामाजिक विच्छेदन

प्रश्न 6.
सामाजिक विच्छेदन के किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक विछेदन के दो कारण निम्नलिखित हैं।

  • आतिवाद
  • जनसंख्या वृद्धि

प्रश्न 7.
सामाजिक विषमता एवं विच्छेदन को दूर करने के लिए किन्हीं दो पाय को बताए।
उत्तर:
समाज में विषमता एवं विच्छेदन को दूर करने के उपाय हैं।

  • पूंजी एवं आय का पुनर्वितरण
  • आधुनिकीकरण

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
सामाजिक विषमता का क्या अर्थ है: समझाए।
उत्तर:
सामाजिक विषमता से आशय एक समाज के लोगों के जीवन स्तर तथा जीवन-शैली को भिन्नताओं से है, जो सामाजिक परिस्थितियों में इनकी विषम स्थिति में रहने के कारण होती हैं। उदाहरण के रूप में पूरयामो तथा भूमिहीन श्रमिक या ब्राह्मण व इरिजन को सामाजिक परिस्थितियों में पाए जाने वाले अनार के कारण उन्हें प्राप्त जीवन-स्तरों तथा जोवन-शैलियों में भी अन्तर देखने को मिलता है। सामाजिक विषमता की उत्पत्ति के विषय में निम्न माएँ प्रनित हैं।

  • प्राकृतिक विभेद
  • व्यझिागत सम्पत्ति
  • श्रम विभाजन एवं वर्ग निर्माण
  • युद्ध एवं विजय
  • प्रकार्यात्मक आवश्यकता
  • अभिमत एवं शक्ति

विषमता की उत्पत्ति को लेकर प्रमुख रूप से दो प्रकार के मत प्रतित हैं। एक मत के अनुसार विषमता एक ऐतिहासिक तथ्य है, जो समय के साथ-साथ अपने आप समाप्त हो जाएगी, लेकिन सो मतानुसार विषमता को समाज में समाप्त नहीं किया जा सकता, यह शाश्वत र निरन्तर बेनी रहेगी।

प्रश्न 2.
विषमता के कारणों में शिक्षा किस प्रकार उत्तरदायी है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा सम्बन्धी अन्तर विषमता को जन्म देते हैं। जहाँ सिद्धान्त रूप में शिक्षा की समान मुविधा की बात की जाती है, वहीं व्यवहुप्त रूप में अनेक अन्तर देखने को मिलते हैं जहाँ मापन सम्पन्न लोगों के बच्चों को निजी रसों में पढ़ने की सुविधा उपलब्ध है, वहीं गरीब लोगों के बच्चों अभावमय स्थिति में पड़ना पड़ता है। जहाँ एक और कुछ गिने-चुने लोगों को उच्च एवं आवसायिक शिश प्राप्त करने तथा प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से उच्च पदों पर आसीन होने के अवसर प्राप्त है, वहीं दूसरी और अधिकांश लोगों को इस तरह के अवसर समान रूप में उपलब्ध नहीं है, जहाँ एक और आर्थिक विषमता शिक्षा को असमान सुविधाओं के लिए उत्तरदायी है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा सम्बन्धी असमान सुपिधाएँ विषमता की खाई और अधिक बढ़ाने में योगदान देती हैं। अदि शिक्षा सम्बन्धी अवसर सभी वर्गों एवं व्यक्तियों के लिए उपलब्ध हो जाए, तो समाज में व्याप्त सामाजिक विषमता को पनपने से रोका जा सकता है। इस प्रकार शिक्षा की असमनता के कारण भी समाज में विषमता पनपती हैं, जोकि स्वस्थ समाज के विकास हेतु उपयुक्त नहीं है।

प्रश्न 3.
भारत में सामाजिक विषमता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भारत परम्परावादी खेतिहर समाज का उदाहरण है, जहां बन्द समाज व्यवस्था पाई जाती हैं। यहाँ जाति के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि सुधार होने तक कृषि-व्यवस्था के दिन छः स्तर देखने को मिलते हैं, जिनमें एक संतरण व्यवस्था है।

  • गैर-खेतिहर भूस्वामी
  • गैर खेतिहर पट्टेदार
  • तर भूस्वामी
  • खेतिहर रैय्यत
  • बटाईदार
  • भूमिहीन खेतिहर मजदूर

इन छ: स्तरों के बीच सामाजिक विषमता के कई रूप देखने को मिलते हैं। उदाहरण के रूप में ब्रेतिहर भूस्वामी तथा भूमिहीन खेतिहर मजदूर के जीवन-स्तर तथा जीवन शैली में पर्याप्त अन्तर पाए जाते हैं। परम्परागत कृषि उत्पादन संगठन के दो प्रमुख पक्ष ऐसे हैं, जिनका सामाजिक विषमता को समस्या पर विशेष प्रभाव पड़ता है। पहला, भूस्वामिण एवं नियन्त्रण तथा शारारिक भ्रम के बीच विपरीत सम्बन्ध है। और दुसरा, मध्यम वर्ग को प्रपुर मात्रा में विकास। अधिकांश परम्परागत कृषि समाजों में से दो प्रवृत्तियों पाई जाती हैं। इसका तात्पर्य यह है कि परम्परागत भारतीय समाज में भूमि के नियन्त्रण एवं उपयोग में विषमताएँ केवल व्यवहार रूप में व्याप्त ही नहीं थीं, बल्कि इसे न्यायसंगत रूप में स्वीकार भी किया गया था।

प्रश्न 4.
सामाजिक विचदिन का क्या तात्पर्य है? विचम्दन के दो कारणों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक विच्छेदन का पर्य यह है कि किसी समूह या परिवार के सदस्यों के मध्य सम्बन्ध टूट जाना या अलगाव उत्पन्न हो जाना। सामाजिक विच्छेदन व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों प्रकार का होता है। इस सम्बन्ध में पी.एच, लेडिस ने अपनी पुस्तक ऐन इण्ट्रोडक्शन दू सोशियोलॉजी’ में बताया है कि सामाजिक नियन्त्रण की व्यवस्था का भंग होना और विश्रृंखला उत्पन्न होना ही सामाजिक विपटन है। सामाजिक विच्छेदन के कारण सामाजिक दिन के कारण निम्नलिखित है।

  1. जातिवाद .के. एन.शर्मा के अनुसार, जातिवाद या जाति शक्ति एक ही जाति के व्यक्तियों की उस भावना को कहा जाता है, जो देश व समाज के सामान्य हितों का ध्यान न रखते हुए केवल अपनी जाति के सदस्यों के उत्थान, जातीय एकता और जाति को सामाजिक परिस्थिति को दृढ़ रखने के लिए प्रेरित करती हैं।
  2. जनसंख्या वृद्धि जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है, जिससे रोजगार के अवसरों में कमी आ रही है। प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार उपलब्ध कराना एक चुनौती बन गया है। बेरोजगारी की स्थिति में कोई भी व्यक्ति परिवार के अन्य सदस्यों के लिए साधन सुविधाएँ जुटाने में असमर्थ होता है, जिसके कारण विच्छेदन होने लगता है।

प्रश्न 5.
विषमता एवं विच्छेदन के निराकरण में नवीन औद्योगिकी का समुचित विकास किस प्रकार किया जाना चाहिए?
उत्तर:
वर्तमान युग । कृषि क्षेत्र में नवीन प्रौद्योगिकी के विकास ने भूमि के साथ-साथ पूँजी के मित्र को भी विषमता का प्रमुख आधार बना दिया है, जो पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उदाहरणों में स्पष्ट है। इन क्षेत्रों में जिन शु स्वामियों के पास पूँजी थी, उन्होंने अपने खेतों के पास ही ऊंची कीमतों पर भूमि को खरीदकर बड़े बड़े फार्म बना लिए हैं। अब ये पैगी की सहायता से ट्रैक्टर, पम्पिंग सैट, पावर भैसर तथा अन्य मशीनों को कृषि के लिए काफी प्रयोग करने लगे हैं। ऐसे में वो किन गरी ए -साकारी दोनों ही सोते से अधिक ऋण लेने में सफल रहे हैं। परिणामस्वरूप विषमता कम होने के अतिरिक्त और बने लगी है। इसी प्रकार पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से चलाए गए विकास कार्यक्रमों से देश की आर्थिक प्रगति तो हुई है, लेकिन इनका लाभ भी कुछ गिने-चुने शक्ति सम्पन्न लोगों को ही मिल पाया है। अतः विषमता दूर करने के लिए हमें वास्तविकत के धरातल पर आना होगा और सही दिशा में कारगर उपाय अपनाने होंगे।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अक)

प्रश्न 1.
सामाजिक विषमता से आप क्या समझते हैं। भारत में सामाजिक विषमता के स्तर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक विषमता से आशय एक समाज के लोगों के जीवन-स्तर तथा जीवन-सी की भिन्नताओं से है, जो सामाजिक परिस्थितियों में इनकी विषम स्थिति में रहने के कारण होती हैं। उदाहरण के रूप में भूस्वामी तद्दा भूमिहीन श्रमिक या ब्राह्मण व हरिजन की सामाजिक परिस्थितियों में पाए आने वाले अनार के कारण उन्हें प्राप्त जीवन-स्तरों तथा जीवन-शैलियों में मो अन्तर देखने को मिलता है।

सामाजिक विषमता की उत्पत्ति के विषय में निम्नलिखित व्याख्याएँ प्रचलित हैं।

  • प्राकृतिक विभेद
  • व्यक्तिगत सम्पत्ति
  • श्रम विभाजन एवं वर्ग निर्माण
  • सुद्ध एवं विजय
  • प्रकार्यात्मक आवश्यकता है
  • अभिमत एवं शक्ति

विषमता की उन को लेकर प्रमुख रूप से दो प्रकार के मत प्रचलित हैं। एक मत के अनुसार, विषमता एक ऐतिहासिक तथ्य है, जो समय के साथ-साथ अपने आप समाप्त हो जाएगी, लेकिन दूसरे मतानुसार, विषमता को समाज से समाप्त नहीं किया जा सकता, यह शाश्वत और निरन्तर बनी रहेगी।

भारत में सामाजिक विषमता
भारत परम्परावादी खेतिहर समाज का उदाहरण हैं, जहाँ बन्द समाज-व्यवस्था पाई जाती रही हैं। यहाँ जाति के साथ-साथ शामीण क्षेत्रों में भूमि सुधार होने तक कृषि-व्यवस्था के निम्न छः स्तर देखने को मिलते हैं, जिनमें एक अंतरण व्यवस्था है ।

  • गैर-खेतिहर भूस्वामी
  • गैर-खेतिहर पट्टेदार
  • खेतिहर भूस्वामी
  • खेतिहर रैय्यत
  • बटाईदार
  • भूमिहीन खेतिहर मजदूर

उपरोक्त छ: स्तरों के बीच सामाजिक विषमता के कई कप देखने को मिलते हैं। उदाहरण के रूप में खेतिहर भूस्वामी तथा भूमिहीन खेतिहर मजदूर के जीवन-स्तर तथा जीवन-शैली में पर्याप्त अन्तर पाए जाते हैं। परम्परागत कृषि उत्पादन संगठन के दो प्रमुख पक्ष ऐसे हैं, जिनका सामाजिक विषमता को समस्या पर विशेष प्रभाव पड़ता है। पहला, भूस्वामित्व एवं नियन्त्रण तथा शारीरिक श्रम के बीच विपरीत सम्बन्ध है और दूसरा, मध्यवर्ती वर्गों को प्रचुर मात्रा में विकास अधिकांश परम्परागत कृषि समाजों में ये दो प्रवृत्तियां हई जाती हैं। भारतीय कृषि व्यवस्था अपने लम्बे इतिहास की अवधि में प्रमुखतः संस्तरजात्मक रही हैं। सामान्यतः अध्ययनों के आधार पर पाया गया है कि बड़े शू स्वामी ऊँची जाति के, भूमिहीन मजदूर निम्न या किसी अस्पृश्य जाति के सदस्य थे। इन दोनों के बीच मध्य स्तरीय किसान थे, जो खेतिहर जातियों के अन्तर्गत आते थे। इसका तात्पर्य यह है कि परम्परागत भारतीय समाज में भूमि के नियन्त्रण एवं उपयोग में विषमताएँ केवल पहार रूप में प्राप्त हो नहीं दी, बल्कि इसे न्यायसंगत रूप में स्वीकार भी किया गया था।

प्रश्न 2.
सामाजिक विषमता के कारणों की विस्तारपूर्वक विवेचना कीजिए।
उत्तर:
विभिन्न समाजों में विषमता के भिन्न-भिन्न कारण देखने को मिलते हैं। यद्यपि कुछ कारण सभी समाजों में समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। विषमता के प्रमुख कारण इस प्रकार है

  1. अर्जित आय एक ही समाज के लोगों की आय में पर्याप्त भिन्नता देखने को मिलती हैं। आथ सम्बन्धी इस भिन्नता के परिणामस्वरूप व्यक्तियों के भोजन, वस्त्र, मकान, आभूषण तथा जीवन-स्तर में अन्तर पाए जाते हैं। इन अन्तरों के कारण विषमताएं उत्पन्न होती हैं।
  2. व्यवसाय विषमता का एक प्रमुख कारण मसाय सम्बन्धी भेद भी हैं। व्यवसायों में ऊंच-नीच का एक संस्मरण पाया जाता है। जहां किसी व्यवसाय को अधिक प्रतिष्ठित माना जाता है, वहीं किसी व्यवसाय को होनता की दृष्टि से भी देखा जाता है। विभिन्न व्यवसायों का इस प्रकार का मूल्यांकन इनमें लगे हुए व्यकियों में विषमता को बढ़ावा देता है।
  3. शिक्षा जहाँ एक और आर्थिक विषमता शिक्षा को असमान सुविधाओं के लिए उत्तरदायी है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा सम्बन्धी असमान सुविधाएँ विषमता की खाई को और अधिक बढ़ाने में योगदान देती हैं।
  4. पद पद का सम्बन्ध सम्पति एवं शक्ति में नहीं वरन् आदर और प्रतिष्ठा से है। विभिन्न समाज भिन्न-भिन्न गुणों का आदर भिनभिन्न रूप से करते हैं। पद सम्बन्धी अन्तर के आधार अलग-अलग होने के कारण विषमता पनपती है।
  5. सम्पत्ति सम्मान के आधार पर सभी समाजों में स्तरीकरण किया जाता है। आदिम समाजों में भी सम्पत्ति के आधार पर ऊँच-नीच का भेद पाया जाता है। समाज में वे लोग ऊँचे माने जाते हैं, जिनके पास अधिक सम्पति होती है तथा जो सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं को जुटाने में सक्षम होते हैं।
  6. शमित शक्ति एवं सत्ता के वितरण में असमानता भी विषमता के लिए उत्तरदायी है। जिन लोगों के पास सैनिक शक्ति, सना शासन की बागडोर होती है, उनको स्थिति उन लोगों से ऊँची होती हैं, जो सत्ता एवं शक्तिविहीन होते हैं।
  7. जन्म, जाति एवं प्रजाति जो लोग उच्च समझे जाने माने कुल, मंत्र, राति एवं प्रजाति में जन्म लेते हैं, वे स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानते हैं और इस आधार पर विषमता पनपती हैं। ग्रामीण भारत में जति समस्या सामाजिक विषमता का एक प्रमुख आधार है।

प्रत्येक समाज में एक संस्कृति या सामूहिक प्रतिनिधानों का एक पुत्र होता हैं, मूल्यांकन जिसका एक महत्वपुर्ण लक्षण है और यह विषमता के मौलिक स्रोत को प्रस्तुत करता है। आन्द्रे येतेई ने अपने अध्ययनों के आधार पर बताया है कि मूल्यांकन विषमता का एक सार्वभौमिक स्रोत है। इसका दूसरा झोत बल, शकित तथा प्रभुत्व है।

प्रश्न 3.
सामाजिक विच्छेदन के कारणों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डालिए।
उत्तर:
सामाजिक विच्छेदन के कारण निम्नलिखित हैं
1. जातिवाद डॉ. के. एन. शर्मा के अनुसार, जातिवाद या जाति-शक्ति एक ही जाति के प्रतियों को उस सामना को कहा जाता है, जो देश में समाज के सामान्य हितों का ख्याल न रखते हुए केवल अपनी जाति के सदस्यों के उत्थान, जातीय एकता और जाति की सामाजिक परिस्थिति को छ रखने के लिए प्रेरित करती है।

2. जनसंख्या वृद्धि जनसंख्या
 में जौन गति से वृद्धि हो रही है, जिससे रोजगार के अवसरों में कमी आ रही है। प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार उपलब्ध कराना एक चुनौती बन गया है। बेरोजगारी पात में कोई भी व्यक्ति परिवार के अन्य सदस्यों के लिए साधन सुविधाएँ जुटाने में असमर्थ होता है, जिसके कारण विछेदन हुने लगता है।

3. राजनैतिक भ्रष्टाचार
 राजनैतिक ग्वार्थों के चलते विभिन्न जाति के लोगों में आपस में तय उत्पन्न कर अनेक वर्गों में विभाजित कर दिया जाता है। इससे किसी एक वर्ग को विशेष सुविधा उपलब्ध कराकर आकर्षित किया ता है। इससे उनमें राष्ट्रीयता की भावना रागापत होकर अपने वर्ग को ही भावना रह जाती है, जिसके कारण सामाजिक विच्छेदन होने लगता है।

4. सामाजिक कुरीतियों
 मारतीय समाज में अनेक तरह की कुरीतियों व्याप्त है, जिने चाल विवाह या हि पर रोक, बेमेल विवाह, विवाह-विद आदि हैं। इन कुरीतियों के कारण परिवार के सभी सदस्यों में सामंजस्य नहीं बन पाता और सम्बन्ध–विच्छेद होने लगते हैं। यहां तक कि परिवार टूट जाते

5. धार्मिक दृष्टिकोण
 भारतीय समाज अनेक वर्षों में विभाजित हैं, जिनमें अस्पृश्य वर्ग को जोवन-स्तर अत्यन्त निम्न है। सवर्णों द्वारा इन पर अनेक प्रकार के फतव्यों का बोझ डाला जाता है, जिससे इनमें तीन भावना आ जाती हैं और कता पनपने लगती हैं।

6. साम्प्रदायिकता
 की भावना वर्तमान समाज में धर्म, जाति तथा भाषा आदि के आधार पर अनेक वर्ग बन गए हैं, जिनमें एक-दूसरे के प्रति विरोध उत्पन्न हो गया है। आपस में संघर्ष और तनाव की स्थिति के कारण सामाजिक सम्बन्धों में विच्छेदन होने लगा है।

7. नए-पुराने में संघर्ष
 नई और पुरानी पड़ी में तनाव उत्पन्न होने से विच्छेदन को स्थिति बनती है, क्योकि युवा वर्ग और पुराने लोगों के विचारों में टकराहट होने से संघर्ष पैदा हो जाता है, जो विच्छेदन तक पहुँच जाता है। है,

8. दोषप्रद शिक्षा प्रणाली
 अव के शिक्षित युवा पुरानी मर्यादाओं तथा मापदों का मूल्य नहीं समझ पाते हैं। उनके लिए इनका कोई औचित्य नहीं हैं, लेकिन पुरानी पीढ़ी इन पर जोर देती है, जिसके कारण दोनों वर्षों में विच्छेदन उत्पन्न हो जाता है।

9, नैतिक मूल्यों का हास
 धनी वर्ग सम्पन्न और समृद्ध होता है, इसलिए उसके पास पैसा और समय दोनों प्रचुर मात्रा में होते हैं। यही कारण है कि इस वर्ग को जीवन-शैली और जीवन-स्तर पर पाश्चात्य प्रभाव अधिक रहता है। पाश्चात्य जीवन-शैली परिवार के उन सदस्यों को उचित नहीं लगती, जो परम्पराओं और नैतिक मूल्यों का निर्वहन करते हैं। इस स्थिति में परिवार में तनाव और संघर्ष उत्पन्न हो जाता है, जो विच्छेदन के रूप में परित होता है।

प्रश्न 4.
विषमता एवं विच्छेदन के निराकरण पर एक निवन्ध्र लिखिए।
उत्तर:
समाज में विषमता एवं विच्छेदन को दूर करने के उपाय निम्नलिखित हैं।
1. पूँजी एवं आय का पुनर्वितरण विषमता एवं विच्छेदन दूर करने के लिए जहां भूमि एवं पूँजी का पुनर्वितरण आवश्यक है, वहीं आय का पुनर्वितरण भी जरूरी हैं। जिन क्षेत्रों में नवीन प्रौद्योगिकी का सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा सकता है, वहीं भू-स्वामियों का मुनाफा अवश्य बढ़ा है, परन्तु साथ ही कृषि श्रमिकों की मजदूरी भी बढ़ी है और कई शानों पर तो तेजी से तथा पर्याप्त मात्रा में, लेकिन कृषि मजदूरों की सुरक्षा के लिए इन आर्थिक स्थायी आर प्रदान किया जाना चाहिए और इस हेतु कुटीर योग-धन्धों को तेजी से विकास किया जाए।

2. आधुनिकीकरण
 आधुनिकीकरण की दिशा में तेजी से आगे बने से विषमता को दूर किया जा सकता है। आधुनिकीकरण से समाज का दृष्टिकोण विकसित तथा एक नए माहौल में समरसता का भाव पनव सकेगा, जोकि स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए आवश्यक हैं।

3. प्रजातान्त्रिक मूल्यों एवं मानवतावादी दृष्टिकोण
 विषमता के आधारों पर चोट करने के लिए प्रजातान्त्रिक मूल्यों एवं मानवतावादी दृष्टिकोण का व्यापक प्रचार-प्रसार करना चाहिए, क्योंकि समाजीकरण की प्रक्रिया के दौरान ही प्रजातान्त्रिक एवं मानवतावादी मूल्यों के प्रति आस्था पैदा की जा सकती है।

4. जनैतिक परिवर्तन
 विषमता एवं विच्छेदन को दूर करने के लिए कानूनी एवं राजनैतिक परिवर्तन भी आवश्यक हैं। टी.एच.मार्शल ने इंग्लैण्ड़ में पहले कानुनी समता, फिर राजनौतिक समता और अन्त में नागरिक समता के विकास का विस्तार से वर्णन किया है। अतः राजनैतिक तथा प्रशासनिक कार्यक्रमों द्वारा विषमता को कम किया जा सकता है।

5. आर्थिक विकास
 पूर्व यूरोपीय विद्वानों द्वारा बिषमता को समाप्त करने के लिए आर्थिक विकास को आवश्यक माना गया है। आन्द्रे बेतेई के अनुसार, अषक विकास के माध्यम से गरीबों, दरिद्रता एवं बेरोजगारी की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। यदि आर्थिक क्षेत्र में विषमता को कम किया जा सका तो अन्य क्षेत्रों में विषमता धीरे-धीरे कम होने लगेगी। इसका प्रमुख कारण यह है कि आज आय, सम्पत्ति, भौतिक साधन अर्थात् आर्थिक शक्ति व्यक्ति को सामाजिक प्रस्थिति के निर्धारण में प्रमुख रूप से महत्त्वपूर्ण है।

6. नवीन प्रौद्योगिकी का समुचित विकास
 नौन प्रौद्योगिकी विकास से इन भू-स्वामियों को अधिक लाभ मिल पाया, जिनके पास पर्याप्त मात्रा में पूँजी थी। इसी प्रकार पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से चलाए गए विकास कार्यक्रम से देश को आर्थिक प्रगति तो हुई है, लेकिन इनका लाभ भी कुछ गिने-चुने शक्ति-सम्पन्न लोगों को ही मिला है। अतः विषमता दूर करने के लिए सही दिशा में कारगर उपाय अपनाने होंगे, जो निम्न हैं।

  • जनसंख्या नियन्त्रण जनसंख्या नियन्त्रण से आवास तथा भोजन जैसी मूलभूत समस्याओं से छुटकारा पाया जाता है। जनसंख्या वृद्धि से इन सुविधाओं का अभाव हो जाता है, जिसमें तनाव और संघर्ष होता है, इसलिए जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण से विषमता और विच्छेद को रोका जा सकता है।
  • साम्प्रदायिक सद्भावना समाज सामाजिक समता स्थापित करने तथा विच्छेदन को रोकने के लिए आपसी सौहार्दू एवं सद्भावना को बनाए रखना आवश्यक है, जो लोग अपने-अपने धर्मों की सर्वश्रेष्ठता स्थापित करने के उद्देश्य से आपसी तनाव पैदा करते हैं, उन्हें आपस में मिल-जुलकर रहना चाहिए, ताकि सद्भावना बनी रहे।
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