Chapter 18 अस्थियों की टूट और मोच.

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
अस्थि-भंजन से आप क्या समझती हैं? अस्थि-भंजन के कारणों एवं प्रकारों का उल्लेख कीजिए। [2008, 09, 10, 11]
या
अस्थि-भंग या फ्रेक्चर किसे कहते हैं? इनके विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 17]
या
हड्डी की टूट कितने प्रकार की होती है? चित्र द्वारा स्पष्ट कीजिए। [2011]
या
हड्डियों की टूट कितने प्रकार की होती है ? संक्षेप में लिखिए। [2009, 11]
उत्तर:
अस्थि-भंजन का अर्थ

शरीर के किसी भी अंग की अस्थि के टूट जाने को अस्थि-भंजन कहते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यदि कोई अस्थि पूरी तरह से टूटे नहीं, परन्तु उसमें साधारण-सी दरार भी आ जाए तो उसे भी अस्थि-भंजन की ही श्रेणी में रखा जाता है।

अस्थि-भंजन के कारण
आकस्मिक दुर्घटना के कारण किसी अस्थि (हड्डी) के टूट जाने को अस्थि-भंजन कहते हैं। अस्थि-भंजन होने के सामान्य कारण निम्नलिखित हैं

(1) गिरना:
अचानक गिरने अथवा फलों आदि के छिलकों से फिसलने पर प्रायः अस्थि-भंजन की सम्भावना रहती है। ठोकर खाना, छत अथवा सीढ़ियों से गिरना तथा फलों के छिलकों द्वारा फिसलना आदि इस प्रकार की सामान्य दुर्घटनाएँ हैं, जोकि अधिकांशतया अस्थि-भंजन का कारण होती हैं।

(2) टक्कर लगना:
किसी वाहन (साइकिल, कार, बस व ट्रक आदि) अथवी दीवार इत्यादि से टक्कर होने पर अस्थि-भंजन की अत्यधिक सम्भावना रहती है।

(3) दब जाना अथवा गोली लगना:
अधिक भार वाली वस्तुओं; जैसे-मशीन, पत्थर तथा वाहन आदि) के नीचे दब जाने पर अथवा गोली लगने पर भी अस्थि-भंजन की अत्यधिक सम्भावना रहती है।

अस्थि-भंजन के विभिन्न प्रकार

सामान्य रूप से अस्थियाँ प्रत्यक्ष भंजन; जैसे—किसी अंग में गोली लगने से अस्थि टूटना व अप्रत्यक्ष भंजन; जैसे-खेलते हुए यदि कोई व्यक्ति हाथों के बल गिर जाए तथा झटके से कन्धे की अस्थि का टूटना; से टूटती हैं।
अस्थि-भंजन के मुख्य प्रकारों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है

(1) साधारण अस्थि-भंजन:
इस प्रकार के अस्थि-भंजन में केवल अस्थि ही टूटती है तथा आस-पास के ऊतकों को कोई विशेष क्षति नहीं होने पाती है।

(2) संयुक्त अस्थि:
भंजन–इस प्रकार के अस्थि-भंजन में टूटने वाली अस्थि का एक सिरा मांस तथा त्वचा को फाड़कर बाहर निकल जाता है, जिसके फलस्वरूप प्रभावित अंग विकृत हो जाता है तथा रोगाणुओं द्वारा घाव के संक्रमित होने की आशंका रहती है।

(3) जटिल अस्थि-भंजन:
इसमें अस्थि टूटने पर आस-पास की रुधिर-वाहिनियों तथा अन्य कोमल अंगों; फेफड़े व मस्तिष्क आदि; को घायल कर देती हैं। जटिल टूट अनेक बार घातक भी सिद्धरो पकती है; अत: इसका तत्काल उपचार आवश्यक है। अनेक बार असावधानी के कारण अथवा अनुपयुक्त विधि से पीड़ित व्यक्ति को हिलाने-डुलाने पर अथवा स्थानान्तरित करने पर साधारण अस्थि-भंजन भी जटिल अवस्था में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए अस्थि-भंजन के रोगी की भाल नियम एवं विधिपूर्वक की जानी चाहिए।

(4) बहुखण्डी अस्थि-भंजन:
इसमें प्रभावित स्थान पर अस्थि के एक से अधिक टुक जाते हैं।

(5) पच्चड़ी अस्थि-भंजन:
इसमें टूटी हुई अस्थि के सिरे पच्चड़ की तरह एक-दूसरे में घुस जाते हैं।
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6) कच्ची अस्थि-भंजन:
इंस प्रकार की अस्थि-भंजन प्रायः बच्चों की लचीली अस्थियों में होती है। ये अस्थियाँ चोट लगने पर या तो झुक जाती हैं या उनमें दरारें पड़ जाती हैं।

प्रश्न 2:
अस्थि-भंजन के मुख्य लक्षण क्या हैं? अस्थि-भंजन की सामान्य प्राथमिक चिकित्सा आप किस प्रकार करेंगी? [2007, 08, 09, 10, 11, 12, 14, 15, 16]
या
हड्डी टूटने पर आप रोगी को क्या प्राथमिक उपचार देंगी? [2007, 08, 09, 10, 17]
या
हड्डी की टूट के लक्षण क्या हैं? हड्डी टूटने पर क्या प्राथमिक सहायता देनी चाहिए? हड्डियों के लिए किस पोषक तत्त्व की अधिक आवश्यकता होती है ? [2009]
उत्तर:
अस्थि -भंजन

अस्थियाँ शरीर के अन्दर अर्थात् त्वचा एवं मांसपेशियों के नीचे होती हैं; अत: इन्हें बाहर से देखा नहीं जा सकता। इस स्थिति में अस्थि-भंजन की जानकारी कुछ सामान्य लक्षणों के माध्यम से ही प्राप्त की जाती है। अस्थि-भंजन होने पर पीड़ित व्यक्ति दर्द के साथ अनेक प्रकार की कठिनाइयों की भी अनुभूति करता है, जिनके आधार पर प्राथमिक चिकित्सक अस्थि-भंजन की वास्तविकता का अनुमान लगा सकता है।

लक्षण: अस्थि-भंजन के सामान्य लक्षणों का विवरण निम्नलिखित है

  1. हड्डी टूटने के स्थान के निकट असहनीय पीड़ा होती है, जिससे कि पीड़ित व्यक्ति दर्द से तड़पने लगता है।
  2.  हड्डी टूटने वाले अंग की शक्ति नष्ट हो जाती है।
  3.  हड्डी टूटने पर आस-पास के स्थान पर सूजन आ जाती है।
  4. अस्थि-भंजन होने पर ऊतकों के नीचे रक्त प्रवाह के प्रभावित होने के कारण त्वचा का रंग नीला पड़ जाता है।
  5. अस्थि-भंजन के कारण प्रभावित अंग की आकृति बिगड़ जाती है।
  6. प्रभावित अंग को स्वाभाविक ढंग से हिलाने-डुलाने में पीड़ा होती है।
  7. कई बार टूटी हुई अस्थि के सिरे एक-दूसरे के ऊपर चढ़े हुए प्रतीत होते हैं।
  8.  प्रभावित अंग स्वाभाविक ढंग से हिलता-डुलारा नहीं है।
  9. त्वचा के पास हड्डी टूटने पर रोगी स्वयं इसका अनुभव कर सकता है।
  10. टूटी हुई हड्डी के टुकड़े परस्पर रगड़ खाने पर ‘कर-कर’ की ध्वनि उत्पन्न करते हैं। ऐसी अवस्था में अस्थि-भंजन का निर्णय लेने के लिए किसी योग्य चिकित्सक से भी परामर्श कर लें।
  11.  संयुक्त अथवा जटिल अस्थि-भंजन में पीड़ित व्यक्ति भारी दुर्बलता का अनुभव करता है। तथा वह मूर्च्छित भी हो सकता है।
  12. कभी-कभी टूटी हुई हड्डी मांस व खाल को फाड़कर बाहर आ जाती है।

उपर्युक्त लक्षणों के दिखाई देने पर अस्थि-भंजन की निश्चित जानकारी के लिए एक्स-रे परीक्षण आवश्यक होता है।

सामान्य प्राथमिक चिकित्सा

अस्थि-भंजन की अवस्था में पीड़ित व्यक्ति की निम्नलिखित विधियों द्वारा प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध करानी चाहिए

(1) उपयुक्त चिकित्सा सहायता:
इसके लिए अविलम्ब किसी योग्य चिकित्सक को बुलाना चाहिए। योग्य चिकित्सक के उपलब्ध न होने पर प्राथमिक चिकित्सा के आवश्यक उपाय करने चाहिए।

(2) रक्त-स्राव को रोकना:
अनेक बार अस्थि-भंजन के कारण पीड़ित व्यक्ति की रुधिर वाहिनियाँ फट जाती हैं, जिसके कारण रक्तस्राव होने लगता है। किसी स्वच्छ कपड़े के द्वारा दबाव डालकर रक्त-स्राव को रोकने का प्रयास करना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो टूर्नीकेट का प्रयोग भी किया जा सकता है।

(3) टूटी हड्डी की देखभाल:
अस्थि-भंजन का प्राथमिक उपचार दुर्घटनास्थल पर किया जाना ही उचित रहता है। रोगी की टूटी हुई हड्डी को खपच्ची, कार्ड-बोर्ड के टुकड़े, छड़ी अथवा अन्य किसी लकड़ी की सहायता से बाँधकर अचल बना देना चाहिए।

(4) घायल अंग की देखभाल:
रोगी के घावों को नि:संक्रामक घोल द्वारा साफ कर ऐन्टीसेप्टिक क्रीम लगाकर घायल अंग को स्वच्छ रूई अथवा कपड़े से ढक देना चाहिए।

(5) झोल का प्रयोग:
यदि बाहु की हड्डियाँ टूटी हों, तो रोगी को आराम देने के लिए उपयुक्त झोल का प्रयोग करना चाहिए।

(6) घायल का स्थानान्तरण:
घायल व्यक्ति को प्राथमिक उपचार देने के पश्चात् किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाना चाहिए।

(7) गर्म पेय पदार्थ देना:
यदि रोगी होश में है, तो उसे पीने के लिए गर्म दूध, चाय व कॉफी देना लाभप्रद रहता है।

(8) सान्त्वना देना एवं धैर्य बँधाना:
दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति सदमे की स्थिति में होता है, जोकि अर्धिक होने पर घातक भी हो सकता है। प्राथमिक चिकित्सक का यह दायित्व है कि वह रोगी की घबराहट दूर कर उसे धैर्य बँधाए।।

प्रश्न 3
मोच आने से क्या अभिप्राय है? मोच आने के लक्षण और उपचार लिखिए। [2007, 09, 12, 14, 15, 18]
या
मोच के सामान्य उपचार क्या हैं? [2016]
उत्तर:
मोच आना

हड्डियाँ जोड़ के स्थान पर एक-दूसरे से बन्धक-सूत्रों अथवा तन्तुओं से जुड़ी होती हैं। अचानक चलते-चलते फिसलने, ऊँचे-नीचे स्थानों पर पैर पड़ने अथवा गिर जाने के कारण बन्धक-सूत्र या तो अधिक खिंच जाते हैं अथवा टूट जाते हैं। इसे मोच आंना कहते हैं। प्राय: कलाई, गर्दन, कमर व टखने में मोच आने की भी अधिक सम्भावना रहती है।

लक्षण:
सामान्यतः मोंच आने पर पीड़ित व्यक्ति निम्नखित कठिनाइयाँ अनुभव करता है

  1. मोच से प्रभावित स्थान पर असहनीय पीड़ा होती है।
  2. जोड़ में सूजन आ जाती है और वह कमजोर हो जाता है।
  3.  मोच के स्थान पर त्वचा का रंग नीला अथवा काला पड़ जाता है।
  4.  मोच से प्रभावित अंग शिथिल हो जाता है। हिलाने-डुलाने पर मोच आए अंग में भयंकर दर्द होता है।

प्राथमिक चिकित्सा

  1.  मोच आए अंग को आरामदायक स्थिति में रखना चाहिए तथा उसे अनावश्यक हिलानाडुलाना नहीं चाहिए।
  2. यदि मोच आते समय रोगी ने जूता अथवा सैण्डिल आदि पहने हों, तो उन्हें तत्काल उतार देना चाहिए। सूजन बढ़ने पर इनका उतारना कठिन एवं कष्टदायक होता है।
  3. मोच से प्रभावित जोड़ के स्थान पर कसकर पट्टी बाँध देनी चाहिए।
  4. मोच खाए स्थान पर ठण्डे पानी की पट्टी बाँधने से लाभ होता है। पट्टी को लगातार गीला रखना चाहिए।
  5.  यदि ठण्डे पानी की पट्टी से लाभ न हो, तो गर्म पानी की पट्टी बाँधनी चाहिए अथवा एक चिलमची में गर्म पानी तथा दूसरी चिलमची में ठण्डा पानी
    लेकर मोच आए अंग को पाँच मिनट तक
    क्रमशः गर्म व ठण्डे पानी में रखने पर काफी लाभ होता है।
  6. जब उपर्युक्त पट्टियाँ लाभ देना बन्द कर दें, तो उनका प्रयोग रोक दें तथा कुछ घण्टे पश्चात् इनका फिर से प्रयोग करें।
  7. मोच खाए अंग पर धीरे-धीरे मालिश या मसाज करने से भी आराम मिलता है।
  8. मोच खाए अंग पर आयोडेक्स व मैडीक्रीम आदि मलने पर दर्द व सूजन में लाभ होता है।
  9.  मोच खाए अंग को दिन में तीन-चार बार गर्म पानी में थोड़ा नमक डालकर सेंकने से दर्द व सूजन में कमी आती है।।
  10.  प्रभावित अंग के दोनों ओर थोड़ी दूर तक कसकर पट्टी बाँधने से मोच खाया अंग अचल हो जाता है। इससे घायले बन्धक-सूत्रों को आराम मिलता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
खोपड़ी में अस्थि-भंजन होने पर आप क्या करेंगी?
उत्तर:
सिर के बल गिरने अथवा अन्य किन्हीं कारणों से सिर में चोट लगने पर सिर की कोई अस्थि टूट सकती है। सिर की अस्थि के टूटने से प्रायः व्यक्ति मूर्च्छित हो जाता है। इसके अलावा उसके मस्तिष्क को भी हानि हो सकती है। ऐसी स्थिति में सामान्यतः निम्नलिखित प्राथमिक उपचार करने चाहिए

  1. घायल व्यक्ति को कुर्सी पर सीधा बैठाना चाहिए, ताकि सिर ऊपर की ओर उठा रहे।
  2.  किसी साफ कपड़े की तह करके ठण्डे पानी में भिगोकर घायल व्यक्ति के सिर पर रखना चाहिए।
  3. घायल व्यक्ति के कपड़े ढीले कर देने चाहिए।
  4. अस्थि विशेषज्ञ से तुरन्त सम्पर्क करना चाहिए।
  5. यदि रुधिर बह रहा हो तो उसे रोकने का यथासम्भव प्रबन्ध करना चाहिए।
  6. यदि वह मूर्च्छित है, तो उसकी मूच्र्छा दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।
  7.  चिकित्सक की सलाह लेना अत्यन्त आवश्यक है।

प्रश्न 2:
पसलियाँ टूटने पर आप क्या करेंगी?
उत्तर:
अनेक बार सीने के बल गिरने या पसलियों पर सीधा आघात पहुँचने पर पसलियाँ टूट जाती हैं। पसलियों का अस्थि-भंजन साधारण, जटिल, संयुक्त या किसी अन्य प्रकार का भी हो सकता है।
घायल व्यक्ति को हिलने-डुलने में पीड़ा होती है तथा श्वास लेने में कठिनाई होती है। इस प्रकार के रोगी को प्रारम्भिक उपचार निम्न प्रकार किया जा सकता है

  1. घायल व्यक्ति को इस प्रकार लिटाना चाहिए कि प्रभावित अंग पर कम-से-कम दबाव पड़े।
  2.  पीठ के नीचे सुविधानुसार तकिया व कम्बल आदि लगाएँ।
  3. घायल व्यक्ति को बर्फ चूसने के लिए देनी चाहिए।
  4. घायल अंग से सम्बन्धित बाँह को झोली की सहायता से सहारा देकर पट्टी द्वारा बाँध देना चाहिए।
  5. अस्थि विशेषज्ञ से तत्काल परामर्श लेना चाहिए।

प्रश्न 3:
हड्डी की टूट और मोच में क्या अन्तर है? [2009, 10, 11, 12, 13, 14]
या
अस्थि-भंग तथा मोच के अन्तर को स्पष्ट कीजिए। [2007, 08, 09, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]
उत्तर:
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प्रश्न 4:
जबड़ों एवं हँसली का अस्थि-भंजन होने पर क्या करना चाहिए?
उत्तर:
जबड़ों का अस्थि-भंजन-जबड़ों का अस्थि-भंजन होने पर जबड़ों की आकृति विकृत हो जाती है तथा मुंह से खून आता है। ऐसे व्यक्ति को बोलने में कष्ट होता है। प्राथमिक उपचार के लिए

  1. हथेली की सहायता से निचले जबड़े को ऊपर वाले से मिला देना चाहिए। यह कार्य धीरे-धीरे सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
  2.  जबड़ों को तिकोनी, सँकरी पट्टी की सहायता से सही अवस्था में रखकर सिर के ऊपर बाँध देना चाहिए और एक अन्य पट्टी के द्वारा जबड़े से कान के पीछे होकर बाँध देना चाहिए।
  3. घायल व्यक्ति को बोलने नहीं देना चाहिए।
  4.  यदि उल्टी इत्यादि हो रही हो तो पट्टी खोली जा सकती है, किन्तु बाद में बाँध देनी चाहिए।
  5. अस्थि विशेषज्ञ से तुरन्त सम्पर्क करना चाहिए।
  6. रोगी के साथ सहानुभूति का प्रदर्शन करना चाहिए।

हॅसली का अस्थि-भंजन:
इस अस्थि के टूटने का मुख्य कारण हाथ या कन्धे के बल गिरना है या सामने से हँसली की अस्थि में सीधे चोट लगे, तो यह अस्थि टूट सकती है। इस अस्थि के अस्थि-भंजन से जिस ओर की अस्थि टूटती है उसी ओर की भुजा कार्य नहीं करती और कन्धा ऊपर नहीं उठाया जा सकता तथा सिर भी उसी ओर झुक जाता है जिधर की अस्थि टूटी हुई होती है। इस प्रकार के अस्थि-भंजन में निम्नलिखित उपचार करने चाहिए

  1. घायल व्यक्ति के कपड़े उतार दिए जाएँ।
  2.  पट्टी या कपड़े की तह बनाकर एक गद्दी 4-5 सेमी मोटी बनाई जाए और उसको घायल अंग की ओर वाले बाहु की बगल में रख दिया जाए।
  3.  सेण्ट जॉन झोली के द्वारा उस बाहु को छाती के साथ बाँध देना चाहिए। एक और पट्टी द्वारा कोहनी के मध्य से छाती तथा पेट की ओर घुमाकर बाँध देना चाहिए।
  4. अस्थि विशेषज्ञ से तुरन्त सलाह लेनी चाहिए।

प्रश्न 5:
जाँघ अथवा टाँग की हड्डी (अस्थि) टूटने पर आप क्या प्राथमिक उपचार करेंगी?
उत्तर:
जाँघ की हड्डी की टूट-जाँघ की हड्डी काफी लम्बी और मजबूत होती है, किन्तु अनेक कारणों से यह टूट सकती है। इसे हड्डी के टूटने से सामान्यत: घायल टाँग, स्वस्थ टाँग से छोटी हो जाती है। काफी सूजन आ जाती है तथा असह्य पीड़ा होती है। इस हड्डी के टूटने का उपचार बहुत सावधानीपूर्वक करना चाहिए और निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए

  1. घायल व्यक्ति की, पीठ को आधार मानकर लिटाना चाहिए। जिस टाँग में चोट लगी हो उसे खींचकर स्वस्थ टाँग के साथ रूई या कपड़े की गद्दी रखकर बाँध देना चाहिए।
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  1.  लम्बी खपच्चियाँ यदि उपलब्ध हों तो उन्हें टाँगों के साथ बाँध देना चाहिए। यदि ये उपलब्ध न हों, तो लाठी, बाँस इत्यादि बाँध देना उचित है, ताकि यह अपने स्थान से हिले-डुले नहीं।
  2. अस्थि विशेषज्ञ से तुरन्त सम्पर्क स्थापित करना चाहिए तथा उसके परामर्श के अनुसार शेष उपचार होना चाहिए।

टाँग की हड्डी की टूट:
टॉग में भी दो हड्डियाँ होती हैं। ये दोनों ही अथवा एक हड्डी टूट सकती है। इसके प्रमुख उपचार जाँघ की हड्डी की तरह किए जाने चाहिए अर्थात् लम्बी खपच्चियाँ, लाठी आदि की सहायता से दोनों पैरों को सीधा करके, खींचकर कसकर बाँध देना चाहिए। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पैर हिले-डुले नहीं।

प्रश्न 6:
जोड़ उतरने के क्या लक्षण हैं? कन्धे की हड्डी उतरने पर प्राथमिक उपचार आप किस प्रकार करेंगी? [2018]
या
अस्थि का खिसकना किसे कहते हैं? अस्थि के खिसकने के लक्षण एवं उपचार क्या हैं? [2007]
उत्तर:
जोड़ उतरने के लक्षण:

शरीर को गतिशील बनाये रखने के लिए शरीर के कई स्थानों; जैसे—जबड़ा, कन्धा, कोहनी, कूल्हे एवं टखने आदि पर हड्डियों के बीच में सन्धियाँ अथवा जोड़ होते हैं। हड्डियों के अपने स्थान से हट जाने को जोड़ उतरना कहते हैं। इसके मुख्य लक्षण अग्रलिखित हैं

  1. जोड़ के पास भयानक पीड़ा होती है तथा जोड़ अचल हो जाता है।
  2.  जोड़ वाला अंग विकृत हो जाता है तथा इसे हिलाने-डुलाने पर बहुत पीड़ा होती है।
  3.  जोड़ के आस-पास सूजन आ जाती है।

कन्धे की हड्डी उतरने पर प्राथमिक उपचार

  1. रोगी को बिस्तर पर आरामदायक स्थिति में लिटाना चाहिए।
  2.  प्रभावित भाग पर बर्फ की थैली रखनी चाहिए। यदि इनसे लाभ न हो तो गरम सेंक करना चाहिए।
  3. रोगी को गर्म कम्बल से ढककर रखनी चाहिए।
  4. रोगी को पीने के लिए गर्म दूध व चाय देनी चाहिए।
  5. जोड़ को चढ़ाने के लिए अस्थि-रोग विशेषज्ञ से सम्पर्क करना चाहिए। किसी नीम-हकीम को जोड़ चढ़ाने से रोकना चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
हड्डी की टूट (अस्थि-भंग) को अर्थ स्पष्ट कीजिए। [2016]
उत्तर:
शरीर की किसी भी हड्डी के टूटने अथवा उसमें दरार पड़े जाने को हड्डी की टूट (अस्थि -भंग) कहते हैं।

प्रश्न 2:
अस्थि-भंजन के मुख्य प्रकार बताइए। [2011, 12, 13, 14]
उत्तर:
अस्थि-भंजन के मुख्य प्रकार हैं

  1. साधारण अस्थि-भंजन,
  2. बहुखण्डी अस्थिभंजन,
  3.  पच्चड़ी अस्थि-भंजन,
  4. संयुक्त अस्थि-भंजन,
  5. जटिल अस्थि-भंजन तथा
  6.  कच्चा अस्थि -भंजन।

प्रश्न 3:
अस्थि-भंजन में खपच्चियों का प्रयोग क्यों किया जाता है? [2008, 11]
उत्तर:
टूटी हुई अस्थि को सहारा देने व स्थिर रखने के लिए अस्थि-भंजन में खपच्चियाँ प्रयुक्त की जाती हैं।

प्रश्न 4:
कौन-से अस्थि-भंजन में खपच्चियों का प्रयोग नहीं किया जाता?
उत्तर:
खोपड़ी, मेरुदण्ड, पसलियों व जबड़ों के अस्थि-भंजन में खपच्चियों का प्रयोग नहीं किया जाता।

प्रश्न 5:
दुर्घटनास्थल पर खपच्चियाँ उपलब्ध न होने पर आप क्या करेंगी?
उत्तर:
ऐसे अवसर पर खपच्चियों के स्थान पर लकड़ी के टुकड़ों, चप्पल व छतरी आदि का प्रयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 6:
किस प्रकार के अस्थि-भंजन में रोगी को बर्फ चूसने के लिए दी जाती है?
उत्तर:
पसलियाँ टूटने पर रोगी को बर्फ चूसने के लिए देते हैं।

प्रश्न 7:
कच्चे अस्थि-भंजन से क्या अभिप्राय है? [2007]
उत्तर:
इस प्रकार के अस्थि-भंजन में अस्थि टूटती नहीं है, बल्कि उसमें दरार पड़ जाती है।

प्रश्न 8:
घायलों को किस प्रकार स्थानान्तरित किया जाता है?
या
स्ट्रेचर की उपयोगिता लिखिए। [2009]
उत्तर:
आवश्यक प्राथमिक चिकित्सा देने के पश्चात् घायलों को आरामदायक स्थिति में स्ट्रेचर पर डालकर किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाया जाता है।

प्रश्न 9:
मोच आ जाने से आप क्या समझती हैं?
उत्तर:
शरीर के किसी भी अस्थि सन्धि स्थल के बन्धन-सूत्रों में खिंचाव आ जाने अथवा उनके टूट जाने की दशा को मोच आ जाना कहते हैं।

प्रश्न 10:
मोच के दो लक्षण लिखिए। [2008, 10, 11, 13, 14, 16]
उत्तर:
मोच के दो मुख्य लक्षण हैं

  1. सम्बन्धित अंग में दर्द का होना तथा
  2. मोच के स्थान का रंग नीला या काला हो जाना।
    का रंग नीला या काला हो जाना।

प्रश्न 11:
जोड़ उतरने से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जोड़ के स्थान से हड्डी के खिसकने अथवा हट जाने को जोड़ उतरना कहते हैं।

प्रश्न 12:
कपाल की हड्डी टूटने की क्या पहचान है?
उत्तर:
कपाल के अस्थि-भंजन में चेहरा विकृत हो जाता है तथा इस पर सूजन आ जाती है। नाक, मुँह व कान इत्यादि से रक्त-स्रार होने लगता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न-निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. अस्थियों के टूट जाने को कहते हैं [2007]
(क) अस्थि विस्थापन
(ख) अस्थि -भंग
(ग) मोच
(घ) अस्थि-संक्रमण

2. अस्थि-भंजन में होती है
(क) कम पीड़ा
(ख) असहनीय पीड़ा
(ग) सहनीय पीड़ा
(घ) कोई पीड़ा नहीं

3. अस्थि-भंजन में यदि अस्थि टूटकर खाल के बाहर आ जाए, तो उसे कहते हैं
(क) साधारण अस्थि-भंजन
(ख) कच्चा अस्थि-भंजन
(ग) पच्चड़ी अस्थि-भंजन
(घ) संयुक्त अस्थि-भंजन

4. यदि अस्थि एक से अधिक स्थान पर टूटती है, तो अस्थि-भंजन कहलाता है
(क) बहुखण्डी
(ख) कच्चा
(ग) संयुक्त
(घ) साधारण

5. मोच आने पर प्रयोग करते हैं [2008, 13]
(क) डेटॉल
(ख) आयोडेक्स
(ग) सैवलॉन
(घ) कोल्ड क्रीम

6. झटके के साथ बोझ उठाने से अधिक सम्भावना रहती है
(क) मोच आने की
(ख) जोड़ उतरने की
(ग) पेशियों के खिंचाव की
(घ) अस्थि -भंजन की

7. पसलियाँ टूट जाने पर कठिनाई होती है
(क) बैठने में
(ख) लेटने में
(ग) साँस लेने में
(घ) कोई कठिनाई नहीं होती

8. मोच आने का लक्षण है [2012, 13, 16]
(क) पीड़ा होना
(ख) सूजन होना
(ग) मांसपेशियों में खिंचाव
(घ) ये सभी

9. कौन-सी वस्तु का प्रयोग अस्थि-भंग में अधिक रक्तस्राव रोकने के लिए किया जाता है? [2016]
(क) बर्फ का प्रयोग
(ख) टूर्नीकेट का प्रयोग
(ग) रूई से दबाना
(घ) इनमें से कोई नहीं

10. अस्थि -भंग के लक्षण हैं [2016, 17]
(क) सूजन आ जाती है
(ख) दर्द होता है
(ग) अंग निष्क्रिय हो जाता है
(घ) ये सभी

उत्तर:
1. (ख) अस्थि-भंग,
2. (ख) असहनीय पीड़ा,
3. (घ) संयुक्त अस्थि-भंजन,
4. (क) बहुखण्डी,
5. (ख) आयोडेक्स,
6. (ख) जोड़ उतरने की,
7. (ग) साँस लेने में,
8. (घ) ये सभी,
9. (ख) दूनीकेट का प्रयोग,
10. (घ) ये सभी।