Rajasthan Board RBSE Class 10 Hindi क्षितिज Chapter 18 लोकसंत पीपा

RBSE Class 10 Hindi Chapter 18 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 10 Hindi Chapter 18 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
पीपा निम्नलिखित में से किस काव्यधारा से संबंधित है
(क) सूफी काव्य धारा
(ख) संत काव्य धारा
(ग) रामभक्ति काव्य धारा
(घ) कृष्ण भक्ति काव्य धारा

प्रश्न 2.
पीपा ने किसे कवि की परम्परा का अनुसरण किया
(क) सूरदास
(ख) मलिक मुहम्मद जायसी
(ग) तुलसीदास
(घ) कबीर

प्रश्न 3.
पीपा से मिलने का संकेत किसने अपने काव्य में किया है?
(क) सूरदास
(ख) मीरा बाई
(ग) कबीर
(घ) रामानन्द
उत्तर:
1. (ख)
2. (घ)
3. (ख)

RBSE Class 10 Hindi Chapter 18 अतिलघूत्तृरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संत पीपा का जन्म कंब एवं कहाँ हुआ था ?
उत्तर:
संत पीपा का जन्म विक्रम संवत् 1390 के आसपास राजस्थान के झालावाड़ जिले के गागरोन नामक स्थान पर हुआ था।

प्रश्न 2.
पीपा की पत्नी का नाम क्या था ?
उत्तर:
पीपा की पत्नी का नाम सीता था।

प्रश्न 3.
पीपा के आने पर स्वामी रामानन्द ने आश्रम का दरवाजा बंद क्यों करवा दिया ?
उत्तर:
स्वामी रामानन्द स्वयं को निर्धन मानते थे तथा राजा पीपा जैसे धनवान व्यक्ति से मिलना नहीं चाहतेथे।

प्रश्न 4.
संत पीपा को मन राजकाज से क्यों उचट गया ?
उत्तर:
संत पीपा पर स्वामी रामानन्द के उपदेशों का प्रभाव पड़ा फलस्वरूप उनको मन राजकाज से उचट गया।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 18 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संत पीपा की भक्ति पद्धति पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
संत पीपा पहले मूर्तिपूजक थे। वह देवी दुर्गा के उपासक थे। बाद में वह स्वामी रामानन्द के शिष्य बन गए और निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासक हो गए। वह भक्ति के माध्यम से समाज सुधार के कार्य भी करते थे तथा उपेक्षितों में आत्मचेतना उत्पन्न करते थे।

प्रश्न 2.
संत पीपा के परमात्मा के स्वरूप सम्बन्धी विचारों को बताइए।
उत्तर:
संत पीपा निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासक थे। परमात्मा उनके मत में निराकार तथा अजन्मा है। वह इस संसार का बनाने वाला तथा सभी प्राणियों का पिता है। सभी जीव उसकी संतान हैं। उसकी दृष्टि में सभी समान हैं, कोई छोटा अथवा बड़ा नहीं है। वह अपनी संतानों में भेदभाव नहीं करता।

प्रश्न 3.
पीपा ने अपनी भक्ति भावना द्वारा समाज के उपेक्षित वर्ग को किस प्रकार दृढ़ बनाया ?
उत्तर:
संत पीपा ने बताया कि परमात्मा सबका पिता है। उसकी दृष्टि में सभी समान हैं। उन्होंने भक्ति भावना के माध्यम से समाज के उपेक्षित वर्ग को आत्मनिर्भर बनाया। उन्होंने उनके मन में आत्मविश्वास, साहस तथा दृढ़ निश्चय के भाव उत्पन्न किए। उन्होंने उनमें समाज की रूढ़ियों के बन्धनों से मुक्त होने की चेतना उत्पन्न की।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 18 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निबन्धात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
लोक संत पीपा के जीवन चरित्र पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर:
लोक संत पीपा राजस्थान के एक राजवंश में उत्पन्न हुए थे। वह युवावस्था में ही गागरोन के राजा बन गये थे और एक कुशल तथा प्रजाप्रिय शासक थे। वह मूर्तिपूजक तथा देवी दुर्गा के उपासक थे। स्वामी रामानन्द का शिष्यत्व ग्रहण करने के पश्चात् पीपा निर्गुण, निराकार परम ब्रह्म की उपासना करने लगे।

उन्होंने राज्य-वैभव त्याग दिया और वैराग्य धारण कर लिया।संत पीपा मानते थे कि सभी प्राणी परमात्मा की संतान हैं। परमात्मा अपनी संतान में भेदभाव नहीं करता। उनकी दृष्टि में सभी मनुष्य समान थे।उनकी दृष्टि में ब्राह्मण तथा शूद्र में कोई ऊँचा अथवा नीचा नहीं था। संत पीपा के मन में भक्ति की दृढ़ भावना थी। वह भक्त ही नहीं एक समाज सुधारक भी थे।

वह भक्ति के माध्यम से समाज के उपेक्षित वर्ग में आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास, दृढ़ निश्चय तथा साहस की भावना उत्पन्न करते थे। वह उनमें समाज में व्याप्त रूढ़ियों को तोड़ने की चेतना जगाते थे। अपनी कर्मनिष्ठा तथा भक्ति के कारण वह आज भी जनवाणी तथा लोक गीतों का विषय बने हुए हैं। उनका देवलोक गमन वि. सं. 1470 में होना माना जाता है।

प्रश्न 2.
संत पीपा का चरित्र-चित्रण कीजिए। उत्तर–संत पीपा के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैंराजवंश में जन्म-पीपा का जन्म राजस्थान के झालावाड़ जिले के गागरोन नामक स्थान के खींची चौहान राजवंश में हुआ था। युवावस्था में ही वह वहाँ के कुशल तथा प्रजाप्रिय राजा बन गए थे।दृढ़ भक्ति भावना-पीपा के मन में ईश्वर भक्ति की भावना थी।

पहले वह मूर्तिपूजा करते थे परन्तु बाद में निर्गुणोपासक हो गए। वह स्वामी रामानन्द के शिष्य थे। उन्होंने राज्य वैभव का परित्याग कर दिया तथा वैराग्य धारण कर लिया था।विचारधारा-पीपा एक लोकसंत थे। उनके मते में सभी प्राणी ईश्वर की सन्तान थे। वह सभी मनुष्यों को समान मानते थे। उनकी दृष्टि में ब्राह्मण तथा शुद्र में कोई ऊँचा तथा नीचा नहीं था।

समाज सुधारक-संत पीपा भक्ति भावना के माध्यम से समाज-सुधार करते थे। वह उपेक्षित वर्ग में भक्ति भाव जगाकर उनको आत्मनिर्भर, साहसी, दृढ़ निश्चयी तथा आत्मविश्वासी बनाते थे। वह उनमें सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने की चेतना उत्पन्न करते थे।लोकसंत पीपा अपनी भक्ति भावना तथा कर्मनिष्ठा के कारण आज भी लोकवाणी में जीवित हैं।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों की संप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) जब त्रिकालदर्शी……………साधन बताओ।
(ख) पीपा ने अपनी भक्ति भावन……………..बड़ी विशेषता है।
उत्तर:
उपर्युक्त गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या के लिए व्याख्या भाग में गद्यांश 3 व 5 का अवलोकन कीजिए।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 18 अन्य महत्वपूर्ण प्रोत्तर

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर
1. लोक संत पीपा का जन्म हुआ था
(क) चौहान वंश में
(ख) परमार वंश में
(ग) परिहार वंश में
(घ) तोमर वंश में।

2. पहले संत पीपा उपासक थे
(क) भगवान कृष्ण के
(ख) भगवान राम के
(ग) देवी दुर्गा के
(घ) भगवान शिव के।

3. संत पीपा के गुरु थे
(क) स्वामी श्रद्धानन्द
(ख) स्वामी रामानन्द
(ग) स्वामी दयानन्द
(घ) स्वामी विवेकानन्द।

4. संत पीपा भक्ति भावना का उपयोग करते थे
(क) दान लेने में
(ख) लोगों को प्रभावित कर ठगने में
(ग) आश्रम बनाकर रहने में।
(घ) समाज के उपेक्षित जनों को जाग्रत करने में

5. संत पीपा की पत्नी थीं
(क) रानी रूपमती
(ख) रानी दुर्गा
(ग) रानी सीता
(घ) रानी सुचित्रा।

6. पीपा राजा थे
(क) गागरोन के
(ख) चित्तौड़ के
(ग) माधोपुर के
(घ) बूंदी के।

7. लोकसंत पीपा स्वामी रामानन्द के शिष्य बनने के बाद उपासना करने लगे
(क) राम की
(ख) निराकार ब्रह्म की
(ग) कृष्ण की
(घ) शिवजी की।
उत्तर:
1. (क)
2. (ग)
3. (ख)
4. (घ)
5. (ग)
6. (क)
7. (ख)

RBSE Class 10 Hindi Chapter 18 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संत पीपा के गुरु कौन थे ?
उत्तर:
संत पीपा के गुरु स्वामी रामानन्द गुसाईं थे।

प्रश्न 2.
संत पीपा ने हिन्दी साहित्य की किस काव्यधारा में अपना योगदान दिया ?
उत्तर:
संत पीपा ने हिन्दी साहित्य की निर्गुण भक्ति काव्यधारा में अपना योगदान दिया।

प्रश्न 3.
संत पीपा किस विचारधारा के पक्षधर थे ?
उत्तर:
संत पीपा जीवमात्र की समानता के प्रबल पक्षधर थे।

प्रश्न 4.
संत पीपा ने राजपाट क्यों छोड़ दिया ?
उत्तर:
संत पीपा के मन में परमात्मा के प्रति भक्तिभावना तथा वैराग्य की भावना उत्पन्न हो गई थी अतः उन्होंने राजकाज छोड़ दिया।

प्रश्न 5.
संत पीपा काशी क्यों गये ?
उत्तर:
संत पीपा स्वामी रामानन्द से मिलने काशी गये। उनके साथ उनकी पत्नी सीता भी थीं।

प्रश्न 6.
संत कबीर के विषय में संत पीपा का क्या मत था ?
उत्तर:
संत पीपा संत कबीर को झूठी सांसारिकता तथा कलियुग की अंधविश्वासी रीतियों का खण्डनकर्ता तथा भक्ति भावना का संस्थापक मानते थे।

प्रश्न 7.
“एकौ माता-पिता सबही के, विप्र छुद्र कोई नाहीं।”-संत पीपा के इस कथन का भाव क्या है ?
उत्तर:
“एकौ माता पिता सबही के, विप्र छुद्र कोई नाहीं”-संत पीपा के इस कथन का आशय है कि सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं तथा समान हैं। न कोई ब्राह्मण है, न कोई शूद्र है।

प्रश्न 8.
संत पीपा के दो रूप कौन-से थे ?
उत्तर:
संत पीपा ईश्वर-भक्त तथा समाजसुधारक दोनों थे।

प्रश्न 9.
मांस खाने के बारे में संत पीपा के कैसे विचार थे ?
उत्तर:
संत पीपा मांसाहार के विरोधी थे और उसे वर्जित मानते थे।

प्रश्न 10.
संत पीपा की समाधि, मन्दिर तथा आश्रम कहाँ पर स्थित हैं ?
उत्तर:
संत पीपा की समाधि, मन्दिर तथा आश्रम आहू और काली नदियों के संगम पर स्थित हैं।

प्रश्न 11.
संत पीपी को जन्म तथा देहावसान कब हुआ था ?
उत्तर:
संत पीपा का जन्म वि. सं. 1390 के लगभग तथा मृत्यु वि. सं. 1470 में हुई थी।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 18 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
लोक संत पीपा का जन्म कब तथा कहाँ हुआ था ?
उत्तर:
लोक संत पीपा का जन्म वि. सं. 1390 के लगभग राजस्थान के झालावाड़ जिले के गागरोन नामक स्थान पर खींची चौहान राजवंश में हुआ था। उनके पिता गागरोन के शासक थे।

प्रश्न 2.
ये प्रजा के चहेते थे’-प्रजा का चहेता कौन था तथा क्यों?
उत्तर:
लोक संत पीपा राजवंश में जन्मे थे। युवावस्था में ही उनके पिता का देहान्त हो गया। अपने शासनकाल में पीपा । ने कई बार विजय प्राप्त कर अपना राज्य विस्तार किया। पीपा स्वभाव से गम्भीर तथा धैर्यवान थे। वह एक कुशल शासक थे। इसी कारण उनकी प्रजा उनको बहुत चाहती थी।

प्रश्न 3.
संत पीपा किस कारण प्रसिद्ध हैं?
उत्तर:
संत पीपा निर्गुण परम ब्रह्म के उपासक थे। वह भक्ति के माध्यम से समाज सुधार का कार्य भी करते थे। पूर्व । मध्यकालीन भक्ति साहित्य में आपने अपनी रचनाओं द्वारा योगदान किया है। संत पीपा ने अपने काव्य में बाह्य आडम्बरों, अनुचित परम्पराओं तथा दुर्व्यसनों का विरोध किया है।

प्रश्न 4.
संत कबीर कौन थे ? संत पीपा का उनके बारे में क्या कहना है?
उत्तर:
संत कबीर हिन्दी साहित्य की निर्गुण भक्ति धारा की ज्ञानमार्गी शाखा के प्रमुख कवि तथा समाज सुधारक थे। संत पीपा मानते थे कि भक्ति-प्रतिष्ठा के लिए कबीर की मान्यताएँ अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। उनका कहना है कि यदि कबीर न होते तो सच्ची भक्तिभावना रसातल में पहुँच जाती।

प्रश्न 5.
पहले संत पीपा भक्ति किस प्रकार करते थे?
उत्तर:
प्रारम्भ में संत पीपा मूर्तिपूजा में विश्वास रखते थे। वह देवी दुर्गा के उपासक थे। वह गृहस्थ थे। रानी सीता उनकी पत्नी थीं। वह गागरोन के राजा थे। उनके घर में दुर्गा देवी की पूजा होती थी।

प्रश्न 6.
संत पीपा के गुरु कौन थे ? उनका शिष्यत्व उनको किस प्रकार प्राप्त हुआ था?
उत्तर:
संत पीपा के गुरु स्वामी रामानन्द थे। वैष्णव भक्त मण्डली के मुखिया की सलाह पर जब पीपा वाराणसी पहुँचे तो स्वामी रामानन्द ने अपने आश्रम का द्वार बंद करा दिया और कह दिया कि हम गरीबों का राजाओं से क्या मेल। पीपा ने तुरन्त अपनी धन-सम्पत्ति गरीबों में बाँट दी, लाव-लश्कर गागरौन वापस भेज दिया और रामानन्द को दण्डवत प्रणाम कर । उनसे शिष्यत्व पाने की याचना की।

प्रश्न 7.
स्वामी रामानन्द ने पीपा को क्या उपदेश दिया?
उत्तर:
स्वामी रामानन्द ने पीपा को राम नाम सुमिरन करने की आज्ञा दी। स्वामी जी ने कहा कि वह राम नाम का आँचल कभी न छोड़ें। संसार में राम नाम ही सर्वोपरि है। उसी के सहारे वह भवसागर से पार हो सकेंगे। इसके बाद स्वामी जी ने उनको अपना पूरा उपदेश प्रदान किया।

प्रश्न 8.
यह संसार और शरीर उन्हें मिथ्या लगने लगा। संत पीपा को संसार और शरीर मिथ्या किस कारण लगने लगा?
उत्तर:
संत पीपा ने काशी जाकर स्वामी रामानन्द से दीक्षा ली तथा उनके शिष्य बन गये। स्वामी रामानन्द के उपदेश सुनकर उनका मन राज-काज से उचट गया। उनके मन में वैराग्य की भावना पैदा हो गई। राजपाट को वह अहंकार उत्पन्न करने वाला, मानने लगे। वह सब कुछ त्याग कर ईश्वर भक्ति में लीन हो गये। विरक्ति की भावना मन में उत्पन्न होने के कारण उनको यह संसार तथा शरीर मिथ्या लगने लगा।

प्रश्न 9.
जो ब्रह्मण्डे सोई पिण्डे”-संत पीपा ने इन शब्दों में किस दार्शनिक सिद्धान्त का उल्लेख किया है?
उत्तर:
संत पीपा मानते हैं कि परमात्मा और आत्मा एक हैं। वे अलग नहीं हैं। उनमें कोई अन्तर नहीं है। इन शब्दों में पीपा ने ‘अद्वैतवाद’ की भावना को व्यक्त किया है। उनका मानना है कि शरीर में जो आत्मा है, वही परमात्मा है। शरीर में जो आत्मा है वह ब्रह्माण्ड में स्थित परमात्मा का ही रूप है।

प्रश्न 10.
“एकै मारग तें सब आया। एकै मारग जाहीं॥” संत पीपा के इस कथन में किस सत्य का उद्घाटन हुआ है?
उत्तर:
संत पीपा ने कहा है कि संसार के सभी प्राणी परमात्मा की संतान हैं। उनमें कोई भेद नहीं है। परमात्मा की इच्छा से ही सब इस संसार में जन्म लेते हैं तथा बाद में उसी में लीन हो जाते हैं। वही परमात्मा सबका माता-पिता है। उनमें कोई भेद नहीं है। ब्राह्मण तथा शूद्र में कोई अन्तर नहीं है। दोनों समान हैं।

प्रश्न 11.
मीरा कौन थीं ? वह संत पीपा से मिलने क्यों आई थीं?
उत्तर:
मीरा राजस्थान की कृष्णभक्त कवयित्री थीं। वह श्रीकृष्ण को अपना आराध्य तथा प्रियतम मानती थीं। हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल की कृष्णमार्गी सगुण भक्ति शाखा के कवियों में मीरा का महत्वपूर्ण स्थान है। मीरा संत पीपा की भक्ति-भावना के बारे में सुन चुकी थीं। उनकी दृढ़ भक्ति तथा समाज सुधार की भावना से प्रभावित होकर मीरा उनसे मिलने पहुँची थीं।

प्रश्न 12.
“यह उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता है।” संत पीपा से सम्बन्धित इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
संत पीपा ने अपनी दृढ़ भक्ति भावना के माध्यम से उपेक्षित वर्ग के हृदय में अत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, साहस तथा दृढ़ निश्चय की भावना जगाई थी। उन्होंने उनमें समाज के रूढ़िवादी बंधनों को तोड़ने की चेतना उत्पन्न की थी। राजा होते हुए भी वह समस्त राजकीय ऐश्वर्य त्यागकर ईश्वर-भक्ति तथा समाज-सुधार में जीवनभर लगे रहे। संत पीपा के जीवन की यही सबसे बड़ी विशेषता थी।

प्रश्न 13.
संत पीपा की अति लोकप्रियता का कारण क्या था ? इस सम्बन्ध में आपका क्या कहना है ?
उत्तर:
संत पीपा की अति लोकप्रियता का कारण यह था कि वह हिंसा के विरोधी थे। वह मांसाहार के पक्ष में नहीं थे। इस कारण उनके अनुयायी उनको बहुत चाहते थे। मेरे विचार में यह उचित कारण था। भारत के लोग हिंसा को अच्छा नहीं मानते। हमारे देश में मांसाहार को भी अच्छा नहीं माना जाता। संत पीपा इसी भारतीय मानसिकता के कारण अपने अनुयायियों में अत्यन्त प्रिय थे।

प्रश्न 14.
“वर्तमान में भी संत पीपा राजस्थानी लोकगीतों में विराजमान हैं।” कथन से संत पीपा के बारे में क्या पता चलता है ?
उत्तर:
संत पीपा कर्मठ तथा भक्तिनिष्ठ थे। उनकी भक्ति भावना तथा कर्मनिष्ठा लोकवाणी का विषय है। वर्तमान में भी राजस्थानी लोकगीतों में संत पीपा का उल्लेख मिलता है। उनकी भक्ति भावना, उपदेशों, समाज सुधार आदि का वर्णन राजस्थानी लोकगीतों में पाया जाता है। राजस्थानी लोकगीतों से जुड़कर पीपा के उपदेश अमर हो गये हैं।

प्रश्न 15.
संत पीपा की समाधि कहाँ पर स्थित है ? उस स्थान के प्रसिद्ध होने का क्या कारण है ? ।
उत्तर:
संत पीपा की समाधि आहू और काली सिंध नदियों के संगम पर स्थित है। इस स्थान पर प्राचीन जल दुर्ग बना है। यह पीपा का जन्म स्थान तथा शासन स्थल रहा है। यहाँ पर वह गहरी गुफा है जिसमें पीपा ने साधना की थी। यहाँ पर ही एक विशाल मन्दिर तथा आश्रम बना हुआ है। इन्हीं कारणों से यह स्थल प्रसिद्ध है।

प्रश्न 16.
“संत पीपा की दृष्टि में आत्मा के रूप में परमात्मा सभी प्राणियों के हृदय में रहता है।” आप किसी अन्य महापुरुष के जीवन की एक ऐसी घटना का उल्लेख कीजिए जिससे इस कथन की पुष्टि होती हो।
उत्तर:
संत पीपा मानते थे कि जो परमात्मा ब्रह्माण्ड में है, वही आत्मा के रूप में शरीर में है। इस प्रकार हर प्राणी में परमात्मा विद्यमान है। प्रसिद्ध सन्त नामदेव भी प्रत्येक जीव में परमात्मा के दर्शन करते थे। कहा जाता है कि एक बार उन्होंने रोटी बनाकर रखी। तभी एक कुत्ता उसको लेकर भागने लगा। नामदेव जी घी से भरी कटोरी लेकर उसके पीछे भाग रहे थेऔर कह रहे थे, “महाराज, रोटी चुपड़ तो लेने देते तभी तो मैं आपका भोग लगाता।”

RBSE Class 10 Hindi Chapter 18 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पीपा का जन्म किस परिवार में हुआ था ? वह लोक संत क्यों कहलाए ?
उत्तर:
पीपा का जन्म राजस्थान के झालावाड़ जिले के गागरौन नामक स्थान के खींची चौहान राजवंश में हुआ था। उनके पिता गागरोन के शासक थे। पिता की मृत्यु के बाद युवावस्था में ही पीपा गागरोन के राजा बने। उन्होंने अपने पराक्रम से राज्य का विस्तार किया। वे कुशल तथा प्रजाप्रिय राजा थे। पीपा की रुचि ईश्वर भक्ति में थी। पहले वह मूर्तिपूजक थे तथा देवी दुर्गा के उपासक थे।

स्वामी रामानन्द के शिष्य बनने के बाद निर्गुणोपासना में लीन हो गए।पीपा ने अपनी भक्ति साधना को समाज के सुधार और उत्थान का माध्यम बनाया।

उन्होंने भक्ति के द्वारा समाज के उपेक्षित वर्ग मेंआत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, साहस, दृढ़ विश्वास आदि गुण उत्पन्न किए तथा समाज में प्रचलित रूढ़ियों का विरोध करने की चेतना जाग्रत की। लोकोत्थान में लगे रहने के कारण ईश्वरभक्त पीपा लोकसंत कहलाए।

प्रश्न 2.
संत पीपा की दो प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। हिन्दी साहित्य के किस कवि में उनके समान विशेषताएँ हैं ?
उत्तर:
संत पीपा का राजस्थान के लोकसंतों में प्रमुख स्थान है। संत पीपा की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं। पहली विशेषता यह है कि वह निर्गुणोपासक थे। ईश्वर को निराकार मानकर उसकी साधना करते थे। निर्गुण भक्ति से सम्बन्धित काव्य की रचना भी उन्होंने की थी।

संत पीपा की दूसरी विशेषता है कि वह एक समाज सुधारक थे। सभी मनुष्यों को ईश्वर की सन्तान तथा समान मानते थे। वह समाज में फैली रूढ़ियों के विरोधी थे तथा उनके विरोध की चेतना लोगों में जगाते थे।

हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल के कवि संत कबीर में संत पीपा के समान ही विशेषताएँ थीं। संत कबीर निर्गुणोपासक
थे। वह निर्गुण भक्ति के सम्बन्ध में काव्य रचना करते थे। वह निर्गुण भक्ति की ज्ञानमार्गी शाखा के प्रमुख कवि थे। कवि होने के साथ कबीर एक समाज सुधारक भी थे। वह समाज में फैली रूढ़ियों तथा अन्धविश्वासों के विरोधी थे। संत पीपा संत कबीर से प्रभावित थे। दोनों ही संतों के गुरु रामानंद बताए जाते हैं।

प्रश्न 3.
संत पीपा के उपदेशों को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
पीपा राजस्थान के संतों में प्रमुख थे। संत पीपा पहले मूर्तिपूजक तथा देवी दुर्गा के उपासक थे। रामानन्द से दीक्षा लेकर वह निर्गुणोपासक हो गए।संत पीपा अपने शिष्यों तथा अनुयायियों को निर्गुण भक्ति का उपदेश देते थे। उनका मानना था कि संसार के समस्त प्राणी ईश्वर की सन्तान हैं। ईश्वर सभी का माता-पिता है। संसार के सभी मनुष्य समान हैं। कोई छोटा अथवा बड़ा नहीं है।

ब्राह्मण तथा शूद्र में कोई अन्तर नहीं है। संत पीपा ने जीव-हिंसा की निंदा की है। जो परमात्मा ब्रह्माण्ड में है वही मनुष्य के मन में स्थित है। इस प्रकार आत्मा तथा परमात्मा एक ही हैं। यह पंचतत्वों से बना शरीर ही प्रभु है।

मानव शरीर में जो आत्मा है वही परमात्मा है। पंडित बाहरी देवताओं की पूजा करते हैं किन्तु पूजन की सामग्री शरीर में है। सब तन में है। सतगुरु की कृपा से सब कुछ तन से ही प्राप्त हो सकता है।

प्रश्न 4. संत पीपा के गुरु कौन थे ? पीपा ने उनके सम्बन्ध में क्या बताया है?
उत्तर:
संत पीपा के गुरु स्वामी रामानन्द थे। रामानन्द का आश्रम काशी में था। रामानन्द ने पीपा को राम नाम का सुमिरन करने का आदेश दिया था। उन्होंने कहा था-राम का नाम सर्वोपरि है। राम नाम का पल्ला कभी न छोड़ना। गुरु के उपदेश से पीपा का मन राज-काज से विरक्त हो गया। वह वैरागी हो गए तथा राज्य का ऐश्वर्य त्याग दिया। संत पीपा निर्गुण ईश्वर की उपासना को उपदेश देते थे तथा समाज में फैली रूढ़ियों को मिटाने में लगे थे।

संत पीपा ने बताया है कि गुरु रामानन्द के शिष्य बनने से पहले वह लोहे के समान थे। स्वामी रामानन्द ने उनको सोने में बदल दिया। उनके पैरों की धूल प्राप्त होते ही पीपा संसार के माया-मोह के फंदे से मुक्त हो गया। पीपा के मन में निर्गुण भक्ति के माध्यम से आत्मज्ञान पैदा करने का श्रेय स्वामी रामानन्द को ही है।

प्रश्न 5.
ईश्वर की भक्ति को भगवान की प्राप्ति का साधन बताया गया है। संत पीपा ने उसको समाज सुधार का माध्यम क्यों बनाया ?
उत्तर:
भक्त कवियों का मानना है कि सच्ची भक्ति भावना ही ईश्वर को पाने का माध्यम है। कबीर ने कहा है-“भगति भजन हरि नाव है, दूजा दुक्ख अपार। आपा मेटि जीवित मरै तो परलै करतार ।” संत पीपा भी भगवान की प्राप्ति के लिए भक्ति मार्ग पर चलने का उपदेश देते हैं।संत पीपा भक्ति भावना को समाज सुधार का माध्यम मानते थे।

वह समाज के उपेक्षित लोगों में आत्म-सम्मान, साहस, दृढ़ विश्वास, आत्म-निर्भरता आदि गुण पैदा करके उनमें सामाजिक अंधविश्वासों के प्रति विरोध की चेतना जगाते थे।पीपा जानते थे कि लोगों को धार्मिक विचारों के द्वारा शीघ्र प्रभावित किया जा सकता है।

भक्ति को समाज सुधार तथा कुरीतियों के विरोध का माध्यम बनाने से वांछित परिणाम की प्राप्ति शीघ्र हो सकती है। समाज के लोग भी उसको अपनाने के लिए सरलता से तैयार हो जायेंगे। जैसे कि चीनी की चाशनी चढ़ी हुई दवा की गोलियों को बच्चे आसानी से निगल लेते हैं।

लेखक-परिचय

प्रश्न 1.
गजेन्द्र मोहन का जीवन परिचय देते हुए उनके साहित्यिक योगदान पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर-
जीवन-परिचय-गजेन्द्र मोहन का जन्म 4 जुलाई, 1969 को दिल्ली में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद आपने दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से स्नातक तथा स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद आपने दिल्ली विश्वविद्यालय से प्रोफेसर महेन्द्र कुमार के निर्देशन में एम. फिल और पी-एच. डी. की। आप दिल्ली के सत्यवती कॉलेज (सांध्य) तथा रामजस कॉलेज के हिन्दी विभाग में सहायक प्रोफेसर रहे। इसके बाद अजमेर के दयानन्द कालेज में सन् 1999 में अध्यापन कार्य आरम्भ किया। सन् 2011 से राजस्थान के राजकीय महाविद्यालयों में कार्यरत रहे। वर्तमान में आप राजकीय महाविद्यालय नसीराबाद में हिन्दी विभाग में कार्यरत हैं।

साहित्यिक परिचय-बाल्यकाल से ही आपकी साहित्य-रचना में रुचि रही है। विद्यालय स्तर से ही आप हिन्दी कविता लेखन तथा वाद-विवाद प्रतियोगिता में भागीदारी करते रहे हैं। आपके लेख, कविताएँ तथा शोध-पत्र राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं।

कृतियाँ-‘वक्रोक्ति सिद्धान्त और अष्टछाप के कवि नन्ददास, ‘हिन्दी में आधार पाठ्यक्रम’, ‘हिन्दी व्याकरण एवं रचना’, ‘नन्ददास की पदावली में गीतितत्व’ तथा ‘सुनीति कुमार चटर्जीः’ विद्वान एवं कलाकार (अनूदित) आदि।।

पाठ-सार

प्रश्न 2. ‘लोक संत पीपा’ पाठ का सारांश लिखिए।
उत्तर-
पाठ-परिचय-लोक संत पीपा’ गजेन्द्र मोहन द्वारा रचित संत पीपा का जीवन चरित्र है। लोक संत पीपा को राजस्थान के प्रमुख संतों में गिना जाता है। खींची चौहान राजवंश में जन्मे संत पीपा ने निर्गुण भक्ति काव्यधारा में अमूल्य योगदान दिया है। जन्म-लोक संत पीपा का जन्म वि. सं. 1390 के लगभग राजस्थान के झालावाड़ जिले के गागरौन में हुआ था।

खींची चौहान राजवंश में जन्मे पीपा का व्यक्तित्व आकर्षक था। युवावस्था में ही आपके पिता दिवंगत हो गये थे। आपने अपने पिता के स्थान पर गागरोन का राजकाज कुशलतापूर्वक सँभाला। धीर-गम्भीर स्वभाव के युवक पीपा प्रजा के चहेते थे। आपने अनेक विजय प्राप्त कर अपने राज्य का विस्तार किया।

आध्यात्मिकता की ओर झुकाव-संत पीपा का झुकाव ईश्वर-भक्ति की ओर था। आपने संत काव्यधारा में योगदान देकर हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया। संत पीपा समाज-सुधारक थे। वह बाह्य आडम्बरों तथा दुर्व्यसनों और रूढ़ियों के विरुद्ध थे। पहले वह मूर्ति पूजा में विश्वास करते थे किन्तु बाद में निर्गुण भक्ति में उनका विश्वास दृढ़ हो गया था। वह कबीर की विचारधारा के समर्थक थे।

रामानन्द के शिष्य-संत पीपा गुरु रामानन्द गुसाईं के शिष्य थे। वह रामानन्द का शिष्यत्व ग्रहण करने वाराणसी गये। उन्होंने राजवैभवे त्याग दिया और लाव लश्कर गागरौन भेज दिया। गुरु ने उनको राम नाम सुमिरन का आदेश दिया। बाद में वह गागरौन लौट गये और प्रभु-भक्ति में लीन हो गए।

लोक संत के विचार-पीपा लोक संत थे। उनके शिष्य उनका उपदेश सुनने के लिए लालायित रहते थे। वह वाणी का पाठ करते थे। उनके मत में पंचतत्व शरीर ही प्रभु है। मानव शरीर में जो आत्मा है, वही परमात्मा है। साधु-संतों का घर भी शरीर में है। पूजन की सब सामग्री शरीर में ही है। सब कुछ तन में है-

कायउ देवा काइयउ देवल काइयउ जंगम जाती।
काइयउ धूप दीप नहीं बेदा काइयउ पूजऊ पाती॥

संत पीपा के उपदेश-संत पीपा सांसारिक बाधाओं से मुक्ति के लिए गुरु भक्ति को महत्वपूर्ण मानते थे। वह अपने गुरु रामानन्द के परम भक्त थे। पीपा सभी को समान मानते थे। उनकी दृष्टि में ब्राह्मण और शूद्र में कोई भेद नहीं है। सभी परमात्मा के बन्दे हैं

एकै मारग ते सब आया। एकै मारग जाही॥
एकौ माता पिता सबही के विप्र छुद्र कोई नाहीं॥

संत पीपा जीव हत्या और हिंसा के विरोधी थे। मांस खाने के पक्ष में वह नहीं थे। वह राज-पाट त्यागकर संत बने थे। उनके अनेक शिष्य थे। उनमें राजा, नवाब तथा धनवान लोग भी थे। वह मूर्तिपूजा का खण्डन करते थे तथा निराकार ब्रह्म की उपासना का उपदेश देते थे।

कृष्ण-भक्त मीरा भी उनसे प्रभावित होकर उनसे मिलने पहुंची थी। मीरा के पीपा को प्रभु परचो दीन्हों दियो रे खजानो पूरि” कथन से यह पता चलता है। निर्गुण भक्ति के प्रचार के साथ-साथ पीपा ने समाज के सुधार तथा उत्थान का कार्य भी किया।

लोक जीवन पर प्रभाव-लोक जीवन पर संत पीपा का प्रभाव है। राजस्थानी लोकगीतों में पीपा का वर्णन मिलता है। समाज सुधारकों के लिए उनका जीवन आज भी प्रेरक है। आहू और काली सिंध नदियों के संगम पर बना प्राचीन जल दुर्ग उनका जन्म स्थल तथा शासन स्थल है। यहाँ उनकी समाधि बनी है। उनकी भक्ति साधना की गहन गुफा, विशाल मन्दिर एवं आश्रम भी यहाँ विद्यमान हैं। माना जाता है कि संत वि. सं. 1470 में स्वर्गवासी हुए थे परन्तु अपने उपदेशों के द्वारा वह आज भी हमारे हृदय में जीवित हैं।

पाठ के कठिन शब्द और उनके अर्थ।

(पृष्ठ सं. 101)
प्रख्यात = प्रसिद्ध। युवा = युवक, नौजवान। आसीन हो = बैठकर। धीर = धैर्यवान्। चहेते = प्रिय। सांसारिकता = दुनियादारी, संसार के भोग-विलास। अग्रसर हुए = आगे बढ़े। धारा = प्रवाह। अभूतपूर्व = जैसा पहले न हुआ हो, अपूर्व। योगदान देना = सहयोग करना। समृद्ध = सम्पन्न। बाह्याडम्बर = बाहरी ढोंग, भक्ति का दिखावटी प्रदर्शन। रूढ़ि परम्परा = पहले से चली आ रही अविचारपूर्ण बातें। दुर्व्यसन = बुराई, दोष। निर्गुण = जिसका कोई गुण ज्ञात न हो। निराकार = आकाररहित, शरीर रहित। परम ब्रह्म = परमात्मा। पूर्व = पहला। गौरवान्वित करना = सम्मान बढ़ाना। मान्यता = स्वीकृत बातें। सार्थक = लाभकारी। कलियुग = पौराणिक मान्यता के अनुसार चौथा युग। अंधविश्वास = विवेकहीन बातें। रसातल = पृथ्वी के नीचे का एक तत्व। रसातल में पहुँचना = पतन होना। लोक बेद = संसारी विचार।।

(पृष्ठ सं. 102)
उपासक = पूजा करने वाला। वैष्णव = हिन्दू धर्म की एक विचारधारा। बोलबाला = प्रचार, मान्यता। मुखिया = प्रधान। आराधना = उपासना, पूजा। त्रिकालदर्शी = तीनों कालों के ज्ञाता, परम ज्ञानी। लाव-लश्कर = अधिकारी तथा सेना आदि। भवसागर = संसाररूपी समुद्र। साधन = उपाय। सुमिरन = स्मरण करना। आँचल = छोर, पल्लू। दीक्षा = गुरुमंत्र। दिनचर्या = दिनभर की कार्यप्रणाली। मन उतरना = ध्यान न होना, रुचि न होना। अहंकार = घमंड। वैराग्य = संसार की सुख सुविधाओं को त्यागना। लीन होना = मग्न होना। मिथ्या = सारहीन, असत्य। पिण्डे = शरीर में। परम ततु = परमात्मा। पंचतत्व = पाँच तत्व-क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर। माना जाता है कि इन पाँच तत्वों से शरीर का निर्माण होता है। सामग्री = वस्तुएँ। कायउ, काइयउ = शरीर, काया। मोह, माया = संसार के विकार, दोष। फंदा = रस्सी की जकड़न। कंचन = सोनी।

(पृष्ठ सं. 103)
मान्यता = मानना। बन्दे = मनुष्य, सन्तान। विप्र = ब्राह्मण। क्षुद्र = शूद्र। अनन्य = अपूर्व। समर्पण = भेट। उपेक्षित = तिरस्कृत। चेतना = ज्ञान। वैभव = ऐश्वर्य। साधना = उपासना, पूजा। घोर = प्रबल। निन्दा = बुराई। वर्जित = निषिद्ध। जोगण = भोजन। परतख = प्रत्यक्ष। खण्डन = विरोध। लोकवाणी = जनता की बोली। लोकगीत = जनता में प्रचलित गीत। विराजमान = विद्यमान। संगम = मिलना। दुर्ग = किला। गहने = गहरी। समाधि = वह स्थान जहाँ किसी के अवशेष भूमि में दबाये जाते हैं। पक्षधर = मानने वाला।

महत्वपूर्ण गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. राजस्थान के प्रख्यात लोक संत एवं भक्त कवि पीपा का जन्म वि. सं. 1390 के आसपास झालावाड़ जिले के गागरोन नामक स्थान पर हुआ माना जाता है। खींची चौहान राजवंश में जन्मे पीपा आकर्षक व्यक्तित्व के धनी युवा थे। युवावस्था में ही पिता की मृत्यु के उपरान्त राजगद्दी पर आसीन हो गागरोन का राजकाज इन्होंने सँभाल लिया। कुशल शासक और धीर-गम्भीर स्वभाव के कारण ये प्रजा के चहेते थे।

(पृष्ठ सं. 101)
संदर्भ व प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित ‘लोक संत पीपा’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक गजेन्द्र मोहन हैं। लोक संत पीपा राजस्थान में जन्म लेने वाले एक प्रमुख संत थे। आपने मध्यकालीन निर्गुण भक्ति काव्य शाखा में अपना अमूल्य योगदान किया था। आप एक उपदेशक, समाज सुधारक तथा कवि थे।

व्याख्या-लोक संत पीपा का परिचय देते हुए लेखक कहता है कि वह राजस्थान के एक प्रसिद्ध संत और भक्त कवि थे। उनका जन्म विक्रम संवत् 1390 के लगभग राजस्थान के झालावाड़ जिले के गागरोन नामक स्थान पर हुआ था। आप खींची चौहान राजवंश में उत्पन्न हुए थे। युवक पीपा का व्यक्तित्व प्रभावशाली था। पिता की मृत्यु होने पर युवक पीपा ने गागरोन का राजकाज सँभाल लिया था। वह एक कुशल शासक थे तथा धैर्य और गम्भीरता उनके स्वभावगत गुण थे। इस कारण उनकी प्रजा उनको बहुत चाहती थी।

विशेष-
(i) संत पीपा के जन्म तथा युवावस्था के बारे में बताया गया है।
(ii) संत पीपा शासक के रूप में प्रजा में लोकप्रिय थे।
(iii) प्रस्तुत रचना एक जीवन चरित है।
(iv) भाषा सरल तथा शैली वर्णनात्मक है।

2. मध्यकालीन भक्ति साहित्य में महान समाज सुधारक संत पीपा ने अपनी वाणी और विचारों से जहाँ एक ओर बाह्याडम्बरों का विरोध, रूढ़ि परम्पराओं का विरोध, दुर्व्यसनों का विरोध इत्यादि किया, वहीं दूसरी ओर निर्गुण निराकार परम ब्रह्म की भक्ति कर संत काव्य धारा में अपनी उपस्थिति से हिंदी साहित्य के पूर्व मध्यकाल को गौरवान्वित किया। ये एक ऐसे संत कवि थे जिन्होंने भक्ति और समाज सुधार का अद्भुत रूप सामने रखा है। कबीर की परम्परा का अनुसरण करते हुए इन्होंने कबीर की मान्यताओं को भक्ति-प्रतिष्ठा के लिए सार्थक बताया

(पृष्ठ सं. 101)
संदर्भ व प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित ‘लोक संत पीपा’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक गजेन्द्र मोहन हैं। संत पीपा का जन्म राजपरिवार में हुआ था। वह एक कुशल शासक थे। उनकी प्रजा उनको चाहती थी। उनका झुकाव ईश्वर-भक्ति की ओर था। वह काव्य रचना भी करते थे। उनका काव्य निर्गुण भक्ति धारा से जुड़ा हुआ था। वह एक महीन समाज सुधारक भी थे।

व्याख्या-
लेखक संत पीपा का परिचय देते हुए कहता है कि संत पीपा एक महान् समाज सुधारक थे। मध्यकालीन भक्ति साहित्य में उनका यह स्वरूप व्यक्त हुआ है। वह धर्म में दिखावे और ढोंग के विरोधी थे। उन्होंने बुरी आदतों तथा पुरानी विवेकहीन विचारशून्य रीति-नीतियों का विरोध किया है। अपनी काव्य-रचनाओं में उन्होंने निर्गुण भक्ति का वर्णन किया है। उनमें निर्गुण निराकार परम ब्रह्म की भक्ति का उपदेश है। संतकाव्य में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। उनके काव्य के कारण हिन्दी साहित्य के पूर्व मध्यकाल को गौरव प्राप्त हुआ है। पीपा एक ऐसे संत कवि थे जिन्होंने भक्ति और समाज सुधार दोनों को ही अपने काव्य का विषय बनाया है। इस क्षेत्र में उनका योगदान अनुपम है। वह कबीर की काव्य परम्परा को मानने वाले थे। उनका कहना था कि कबीर के विचार भक्ति के स्थापना के लिए महत्वपूर्ण हैं।

विशेष-
(i) सन्त पीपा एक महान् कवि थे। आप भक्तिकाल की निर्गुण काव्यधारा से सम्बन्धित थे।
(ii) पीपा एक कवि ही नहीं समाज सुधारक भी थे। वे आडम्बरों के विरोधी थे।
(iii) भाषा सरल तथा विषयानुकूल है।
(iv) शैली वर्णनात्मक है।

3. जब त्रिकालदर्शी स्वामी रामानन्द को पीपा के आने का समाचार मिला तो उन्होंने आश्रम का दरवाजा यह कहकर बंद करवा दिया कि ‘हम गरीब हैं, राजाओं से हमारा क्या मेल’। पीपा ने उसी समय अपना सारा धन निर्धनों में बाँट दिया तथा लाव-लश्कर वापस गागरौन भेज दिया। तत्पश्चात् गुरु रामानन्द के पास आकर दंडवत चरण पकड़ निवेदन किया कि “महाराज इस भवसागर से पार होने का साधन बताओ।” स्वामी रामानन्द ने ‘राम’ नाम सुमिरन की आज्ञा देकर कहा-‘राम नाम का आँचल मत छोड़ना। ‘राम’ नाम ही सर्वोपरि है।” पीपा की सोई हुई। आत्मा जाग उठी। रामानन्द जी से दीक्षा लेकर वे उनके शिष्य बन गए।

(पृष्ठ सं. 102)
संदर्भ व प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित ‘लोक संत पीपा’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता गजेन्द्र मोहन हैं। संत पीपा पहले मूर्तिपूजक थे। एक बार उनके राज्य में वैष्णव भक्ते के मुखिया ने इनको निर्गुण ईश्वर की भक्ति करने तथा काशी जाकर गुरु रामानन्द गुसाईं से मिलने की सलाह दी। इस सलाह को मानकर गागरौन के शासक पीपा अपनी रानी सीता सहित काशी के लिए चल दिए।

व्याख्या–लेखक कहते हैं कि स्वामी रामानन्द भूतकाल, वर्तमान काल तथा भविष्य काले अर्थात् तीनों कालों के ज्ञाता थे। वह ध्यानमग्न होकर तीनों कालों में होने वाली घटनाओं को जान लेते थे। जब उनको पता चला कि पीपा आ रहा है तो, उन्होंने अपने आश्रम का दरवाजा बन्द करा दिया। उनका कहना था वह एक निर्धन साधु हैं तथा पीपा अमीर राजा। दोनों को मेल सम्भव नहीं था। पीपा ने यह जानकर अपनी समस्त धन-सम्पत्ति गरीबों में बाँट दी और अपनी सेना तथा अन्य राजसी सेवक दल को गागरौन वापस भेज दिया। इसके बाद पीपा ने गुरु रामानन्द के निकट जाकर उनको दण्डवत प्रणाम किया और उनके चरण पकड़कर निवेदन किया कि उनको भवसागर से पार होने का उपाय बताएँ। स्वामी रामानन्द ने उनको राम नाम। का स्मरण करने का आदेश दिया। उन्होंने कहा कि पीपा राम नाम रूपी आँचल का छोर पकड़े रहें और उसको कभी न छोड़ें। संसार में राम का नाम सबसे श्रेष्ठ है। गुरु का उपदेश सुनकर पीपा को आत्मज्ञान हो गया। वह स्वामी रामानन्द की भक्त मण्डली में दीक्षित हो गए तथा उनके शिष्य बन गए।

विशेष-
(i) संत पीपा द्वारा स्वामी रामानन्द का शिष्यत्व ग्रहण करने का वर्णन लेखक ने किया है।
(ii) संत पीपा ने स्वामी रामानन्द के उपदेश सुनकर मूर्तिपूजा छोड़ दी और निराकार ब्रह्म के उपासक बन गए।
(iii) भाष सरल है तथा पाठक की समझ में आने वाली है।
(iv) शैली वर्णनात्मक है।

4. पीपा की मान्यता थी कि समाज में कोई छोटा बड़ा नहीं है। सब एक ही ईश्वर के बन्दे हैं। ईश्वर के सामने सभी जीव समान हैं। परमपिता परमात्मा अपनी संतान में कभी भेदभाव नहीं करता। उसकी दृष्टि में कोई ब्राह्मण और कोई शूद नहीं है।

(पृष्ठ सं. 103)
संदर्भ व प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित ‘लोक संत पीपा’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक गजेन्द्र मोहन हैं। लोक संत पीपा ने स्वामी रामानन्द का शिष्यत्व ग्रहण किया और वह निराकार ब्रह्म की उपासना करने लगे। उनके अनेक अनुयायी थे। वह उनको निर्गुणोपासना, गुरुभक्ति तथा समस्त जीवों को समान मानने का उपदेश देते थे। व्याख्या–लोक संत पीपा मानते थे कि संसार में सभी जीव समान हैं। कोई छोटा अथवा बड़ा नहीं है। सभी जीवों को ईश्वर ने बनाया है। ईश्वर सभी को समान मानता है। उसकी दृष्टि में न कोई छोटा है और न बड़ा। सभी ईश्वर की सन्तान हैं। ईश्वर अपनी सभी सन्तानों के साथ भेदभाव का व्यवहार नहीं करता है। ईश्वर की दृष्टि में ब्राह्मण और शूद्र सभी एक समान हैं। उनमें कोई भी बड़ा अथवा छोटा नहीं है।

विशेष-
(i) लोक संत पीपा की दृष्टि में सभी जीव समान थे और ईश्वर की रचना थे।
(ii) संत पीपा ब्राह्मण तथा शूद्र में भेद नहीं मानते थे।
(iii) भाषा सरल तथा प्रवाहपूर्ण है।
(iv) शैली विचारात्मक-विवेचनात्मक है।

5. पीपा ने अपनी भक्ति भावना द्वारा समाज के उपेक्षित वर्ग के हृदय में आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, हिम्मत, दृढ़ निश्चय, जाग्रत करते हुए समाज के रूढ़ि बन्धनों को तोड़ने की चेतना का भाव जगाया। राजा होते हुए भी अपना सम्पूर्ण वैभव त्यागकर समाज सुधार और निर्गुण भक्ति साधना के प्रति उन्होंने अपना जीवन लगा दिया। यह उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता है।

(पृष्ठ सं. 103)
संदर्भ व प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित गजेन्द्र मोहन की रचना है। यह उनके द्वारा लिखित जीवन चरित्र ‘लोक संत पीपा’ से लिया गया है। लोक संत पीपा राज्य को त्याग कर प्रभु-भक्ति में लग गए थे। वह सभी जीवों को समान मानते थे। ब्राह्मण-शूद्र में वे भेद नहीं मानते थे। कृष्ण भक्त मीरा भी उनसे प्रभावित होकर मिली थीं। पीपा भक्ति के सहारे उपेक्षित लोगों के मन में आत्मविश्वास पैदा करते थे।

व्याख्या-लेखक कहता है कि लोक संत पीपी ईश्वर भक्ति को समाज के उपेक्षित लोगों के उद्धार का साधन मानते थे। वह भक्ति भावना के माध्यम से उनके मन में आत्मविश्वास पैदा करना चाहते थे। वह उनको दृढ़ निश्चयी, आत्मनिर्भर तथा साहसी बनाना चाहते थे। इस तरह भक्ति के सहारे वह उनके मन में चेतना का भाव जगाकर समाज में फैली हुई रूढ़ियों के बंधन से उनको मुक्त करना चाहते थे। पीपा के जीवन की बड़ी विशेषता यह थी कि राजवंश में जन्म लेकर भी उन्होंने राज्याधिकार त्याग दिया था और अपना पूरा जीवन ईश्वर की भक्ति करने और समाज सुधार में लगा दिया था।

विशेष-
(i) संत पीपा सच्चे भक्त थे। उनकी दृष्टि में कोई मनुष्य छोटा नहीं था।
(ii) उन्होंने भक्ति भावना को समाज सुधार का माध्यम बनाया था, उपेक्षित जनों में आत्मविश्वास पैदा किया था।
(iii) भाषा तत्सम शब्दमयी किन्तु बोधगम्य है।
(iv) शैली वर्णनात्मक तथा विचारात्मक है।

6. राजस्थान के लोक संत पीपा का जीवन चरित्र भारतीय समाज सुधारकों के लिए अद्भुत और अनुपम है। यही कारण है कि उनकी कर्मशीलता और भक्तिनिष्ठता लोकवाणी का विषय भी बनी। वर्तमान में भी संत पीपा राजस्थानी लोकगीतों में विराजमान हैं। उनकी वाणी अमर हो गई है। उनकी अटूट-भक्ति ने राजस्थान में समाज सुष्ट र की चेतना को विकसित किया है।

(पृष्ठ सं. 103)
संदर्भ व प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित ‘लोक संत पीपा’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक गजेन्द्र मोहन हैं। लोक संत पीपा एक राजवंश में जन्मे थे परन्तु राज्य का वैभव त्यागकर प्रभु भक्ति में लीन हो गए थे। वह निराकार ब्रह्म के उपासक थे। सभी मनुष्य उनकी दृष्टि में समान थे। वह समाज में फैले अन्धविश्वास तथा ऊँच-नीच की भावना को दूर करने में लगे थे।

व्याख्या-लेखक कहता है कि राजस्थान के लोक संत पीपा का जीवन चरित्र प्रेरणादायी है। भारत के समाज सुधारकों को उससे अद्भुत और अनुपम प्रेरणा मिलती है। संत पीपा की प्रबल भक्ति भावना तथा कर्मठता को उसी कारण लोकवाणी में स्थान प्राप्त हुआ है। उनकी भक्ति और कर्मशीलता के बारे में लोगों में अनेक बातें प्रचलित हैं। राजस्थान के लोकगीतों में भी संत पीपा का वर्णन मिलता है। संत के उपदेश जन-जीवन में आज भी विद्यमान हैं तथा अमर हो चुके हैं। संत पीपा की दृढ़ भक्ति भावना ने राजस्थान में समाज सुधार के कार्य में गहरा योगदान दिया है। उसके कारण समाज में चेतना उत्पन्न

विशेष-
(i) भाषा सरल तथा प्रवाह है।
(ii) शैली विचारात्मक-विवेचनात्मक है।
(iii) लोक संत पीपा भक्त ही नहीं समाज सुधारक भी थे। वह समाज सुधार के प्रेरणास्रोत थे।
(iv) वह आज भी लोकवाणी तथा लोकगीतों में अमर हैं