Chapter 3 वृक्षाणां चेतनत्वम् (पद्य – पीयूषम्)

परिचय

प्रस्तुत पाठ महाभारत से संकलित है। ‘महाभारत’ एक वृहद्काय ग्रन्थ है। इसे पंचम वेद भी माना जाता है। इसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी। इस पाठ में दर्शाया गया है कि वृक्ष भी अन्य प्राणियों
के समान सचेतन हैं और वे भी सुख-दुःख का अनुभव करते हैं। इस तथ्य को; पौधों में भी हमारे समान जीवन है; हमारा विज्ञान भी आज प्रमाणित कर चुका है, जब कि हमारे ऋषि-मुनियों ने यह बात सहस्राधिक
वर्ष पहले ही प्रमाणित कर दी थी। प्रस्तुत पाठ में यह सन्देश भी दिया गया है कि मनुष्य को वृक्षों-पादपों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। वार्तालाप शैली में संकलित प्रस्तुत सामग्री में प्रश्नकर्ता महर्षि भारद्वाज हैं और समाधानकर्ता महर्षि भृगु।

पाठ-सारांश

अपरिमित पदार्थों के लिए ‘महा’ शब्द का प्रयोग होता है; अतः अपरिमित प्राणियों के लिए ‘महाभूत’ शब्द उपयुक्त है। वायु, आकाश, अग्नि, जल और पृथ्वी ये पंचमहाभूत हैं और यह शरीर पाँचभौतिक। सभी स्थावर और जंगम इन पंच महाभूतों से युक्त हैं।

वृक्षों के शरीर में ये पाँच महाभूत दिखाई नहीं पड़ते; क्योंकि वे देखते और सुनते नहीं, स्पर्श का अनुभव, गन्ध और रस का सेवन नहीं करते हैं। ऐसी शंका निर्मूल है। वृक्ष यद्यपि ठोस होते हैं, फिर भी फूलों और फलों की उत्पत्ति होने के कारण इनमें आकाश तत्त्व की विद्यमानता है। गर्मी से उनके पत्ते, फल और फूल कुम्हला जाते हैं; अतः उनमें स्पर्श गुण होने के कारण वायु तत्त्व विद्यमान हैं। वायु, अग्नि और बिजली की कड़क से वृक्षों के फल और फूल बिखर जाते हैं; अतः ‘वृक्ष शब्द सुनते हैं, यह सिद्ध होता है। बेलें वृक्ष को लपेट लेती हैं और चारों ओर फैल जाती हैं; अतः इससे सिद्ध होता है कि ‘वृक्ष देखते भी हैं। अनेक प्रकार की गन्धों और धूपों से वृक्ष नीरोग रहते हैं और पुष्पित हो जाते हैं; अत: निश्चित ही उनमें गन्ध को ग्रहण करने की शक्ति विद्यमान है। अपनी जड़ों से जल पीने और रोगों को दूर करने की क्षमता होने से वृक्षों में आस्वादन की सामर्थ्य है। सुख और दु:ख का अनुभव करने, काटे जाने पर पुनः अंकुरित होने के कारण वृक्षों में जीव होता है। भोजन पचाने के कारण वृक्षों की वृद्धि देखी जाती है। वृक्षों के सचेतन होने के कारण यज्ञादि विशेष कारणों के बिना उन्हें नहीं काटना चाहिए। पुष्पित और सुगन्धित एक वृक्ष से सम्पूर्ण वन महक उठता है।

पद्यांशों की ससन्दर्भ हिन्दी व्याख्या

(1)
अमितानां महाशब्दो यान्ति भूतानि सम्भवम्।
ततस्तेषां महाभूतशब्दोऽयमुपपद्यते ॥ [2007]

शब्दार्थ अमितानां = असीमित पदार्थों के लिए। महाशब्दः =’महा’ शब्द का (प्रयोग होता है)। भूतानि = प्राणी। सम्भवं यान्ति = उत्पत्ति को प्राप्त करते हैं। ततः = उस कारण से। तेषाम् = उन (पंचमहाभूतों) के लिए। महाभूतशब्दः = असीमित के लिए वाचक शब्द। अयम् = यह, पंचमहाभूत शब्द उपपद्यते = उपयुक्त होता है।

सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘वृक्षाणां चेतनत्वम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ के शेष सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में महर्षि भृगु पंचभूतों की महत्ता का प्रतिपादन कर रहे हैं।

अन्वय अमितानी (कृते) महाशब्दः (प्रयुज्यते तेभ्यः) भूतानि सम्भवं यान्ति। ततः तेषां (कृते) अयं महाभूतशब्दः उपपद्यते।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि असीमित पदार्थों के लिए ‘महा’ शब्द का प्रयोग होता है। इन (असीमित पदार्थों) से भौतिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं। इसीलिए इन (असीमित पदार्थों) के लिए ‘महाभूत’ शब्द का प्रयोग उपयुक्त ही है।

(2)
चेष्टा वायुः खमाकाशमूष्माग्निः सलिलं द्रवः।
पृथिवी चात्र सङ्कातः शरीरं पाञ्चभौतिकम्॥

शब्दार्थ चेष्टा = गतिशीलता। खम् = खोखलापन। आकाशम् = आकाश। ऊष्मा = गर्मी। अग्निः = अग्नि सलिलं = जला द्रवः = तरल पदार्थ पृथिवी = पृथ्वी। चात्र = और यहाँ। सङ्कतिः = ठोसपन। शरीरं पाञ्चभौतिकम् = शरीर पाँच महाभूतों से बना है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में शरीर की पाँच भौतिकताएँ बतायी गयी हैं और स्पष्ट किया गया है कि शरीर पाँच महाभूतों से निर्मित है।

अन्वय अत्रे चेष्टा वायुः (अस्ति), खम् आकाशम् (अस्ति), ऊष्मा अग्निः (अस्ति), द्रवः सलिलम् (अस्ति), सङ्गातः पृथ्वी च (अस्ति)। (एवं) शरीरं पाञ्चभौतिकम् (अस्ति)।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि इन वृक्षों के शरीर में चेष्टा अर्थात् गतिशीलता वायु का रूप है, खोखलापन आकाश का रूप है, गर्मी अग्नि का रूप है, तरल पदार्थ सलिल का रूप है, ठोसपन पृथ्वी का रूप है। इस प्रकार (इन वृक्षों का यह) शरीर पाँच महाभूतों (वायु, आकाश, अग्नि, जल और पृथ्वी तत्त्वों) से बना है।

(3)
इत्येतैः पञ्चभिर्भूतैर्युक्तं स्थावर-जङ्गमम्।
श्रोत्रं घ्राणं रसः स्पर्शो दृष्टिश्चेन्द्रियसंज्ञिता ॥

शब्दार्थ इति = इस प्रकार। एतैः पञ्चभिः भूतैः = इन पाँच महाभूतों से युक्तं = युक्त है। स्थावर-जङ्गमम् = जड़ और चेतन रूप संसार। श्रोत्रम् = कर्णेन्द्रिय, कान। घ्राणम् = नासिका, नाका रसः = रसना, जीभा स्पर्शः = त्वगिन्द्रिय, त्वचा। दृष्टिः = चक्षु, आँख। इन्द्रियसंज्ञिता = इन्द्रिय नाम वाली।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में पंचमहाभूतों से उत्पन्न पाँच ज्ञानेन्द्रियों का वर्णन किया गया है। अन्वय इति एतैः पञ्चभिः भूतैः स्थावर-जङ्गमं युक्तं (अस्ति)। श्रोत्रं, घ्राणं, रसः, स्पर्शः, दृष्टिः च इन्द्रिय संज्ञिता (अस्ति)।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि यह सारा संसार इन पाँच महाभूतों (वायु, आकाश, अग्नि, जल और पृथ्वी) से ही निर्मित है, चाहे वह वृक्षादि जड़-पदार्थ हों अथवा चेतन। कान, नासिका, रसना, स्पर्श और दृष्टि; ये पाँचों ‘इन्द्रिय’ नाम वाले; श्रवणेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, स्पर्शेन्द्रिय और दर्शनेन्द्रिय; हैं।

(4)
पञ्चभिर्यदि भूतैस्तु युक्ताः स्थावरजङ्गमाः
स्थावराणां न दृश्यन्ते शरीरे पञ्चधातवः ॥ [2007, 11]

शब्दार्थ पञ्चभिः = पाँच। भूतैः =महाभूतों से। तु = तो। युक्ताः = युक्त हैं। स्थावरजङ्गमाः = जड़ और चेतन पदार्थ। स्थावराणां = स्थिर प्राणियों के न दृश्यन्ते = दिखाई नहीं देते हैं। शरीरे = शरीर में। पञ्चधातवः = पञ्चमहाभूत तत्त्व।

प्रसंग महर्षि भरद्वाज स्थावर (जड़) पदार्थों में पंच महाभूतों की सत्ता में सन्देह प्रकट कर रहे हैं।

अन्वय यदि स्थावर-जङ्गमाः पञ्चभिः भूतैः युक्ताः (सन्ति), (तर्हि) तु स्थावराणां शरीरे पञ्चधातवः (कथं) न दृश्यन्ते।

व्याख्या महर्षि भरद्वाज कहते हैं कि यदि जड़ और चेतन पदार्थ पाँच महाभूतों से युक्त हैं तो स्थावर पदार्थों के शरीर में पाँचों महाभूत तत्त्व क्यों नहीं दिखाई पड़ते?

(5)
अनूष्माणामचेष्टानां घनानां चैव तत्त्वतः।
वृक्षाणां नोपलभ्यन्ते शरीरे पञ्चधातवः ॥ [2009]

शब्दार्थ अनूष्माणाम् = ऊष्मारहित। अचेष्टानाम् = गतिशीलता से रहिता घनानाम् = ठोस रूप। तत्त्वतः = वास्तविक रूप में वृक्षाणां = वृक्षों में। न उपलभ्यन्ते = नहीं पाये जाते हैं।

प्रसंग महर्षि भरद्वाज वृक्षों के शरीर में पाँच महाभूतों की सत्ता में सन्देह कर रहे हैं।

अन्वय अनूष्माणाम् अचेष्टानां घनानां च वृक्षाणां शरीरे तत्त्वतः पञ्चधातवः न एव उपलभ्यन्ते।

व्याख्या महर्षि भरद्वाज कहते हैं कि ऊष्मारहित, चेष्टाहीन और ठोस रूप वृक्षों के शरीर में वास्तविक रूप से पाँच भूत तत्त्व नहीं पाये जाते हैं। तात्पर्य यह है कि गर्मी न होने से वृक्षों में अग्नि-तत्त्व का अभाव है, चेष्टा न होने से उनमें वायु तत्त्व भी नहीं है और ठोस होने के कारण वे आकाश-तत्त्व से भी रहित हैं।

(6)
न शृण्वन्ति न पश्यन्ति न गन्धरससेविनः।
न च स्पर्श विजानन्ति ते कथं पाञ्चभौतिकाः ॥

शब्दार्थ गन्धरससेविनः = गन्ध और रस का सेवन करते हैं; अर्थात् न सँघते हैं न स्वाद लेते हैं। विजानन्ति = जानते हैं, अनुभव करते हैं। कथं = कैसे? पाञ्चभौतिकाः = पाँच महाभूतों से युक्त।

प्रसंग महर्षि भरद्वाज वृक्षों के पाँचभौतिक होने में शंका प्रकट कर रहे हैं।

अन्वय (वृक्षाः) न शृण्वन्ति, न पश्यन्ति, न गन्ध रससेविन: (सन्ति), न च स्पर्श विजानन्ति, ते पाञ्चभौतिकाः कथं (भवितुमर्हन्ति)?

व्याख्या महर्षि भरद्वाज कहते हैं कि ये वृक्ष न तो जंगमों की तरह सुनते हैं, न,देखते हैं, गन्ध और रस का सेवन भी नहीं करते हैं, फिर वे पाँच महाभूतों से बने कैसे हो सकते हैं?

(7)
अद्रवत्वादनग्नित्वादभूमित्वादवायुतः ।।
आकाशस्याप्रमेयत्वाद् वृक्षाणां नास्ति भौतिकम् ॥

शब्दार्थ अद्रवत्वात् = द्रव रूप न होने के कारण। अनग्नित्वात् = अग्नि रूप न होने के कारण। अभूमित्वात् = भूमि का अंश न होने के कारण। अवायुतः = वायु रूप न होने के कारण। आकाशस्य अप्रमेयत्वात् = आकाश के ज्ञेयत्व न होने के कारण। भौतिकम् = पंचभूतों से सम्बन्धित।

प्रसंग वृक्षों में पाँच भूतों का अभाव होने के कारण वे कैसे पाञ्चभौतिक हो सकते हैं, इस प्रकार महर्षि भरद्वाज शंका प्रकट कर रहे हैं।

अन्वये वृक्षाणाम् अद्रवत्वात्, अनग्नित्वात्, अभूमित्वात्, अवायुत: आकाशस्य अप्रमेयत्वात् (च तेषां) भौतिकम् न अस्ति।

व्याख्या महर्षि भरद्वाज कहते हैं कि वृक्षों में द्रव (जल) तत्त्व न होने के कारण, अग्नि तत्त्व न होने के कारण, भूमि तत्त्व के न होने के कारण, वायु का अंश न होने के कारण और आकाश के ज्ञेयत्व न होने के कारण उसको रूप पंचभूतों से नहीं बना है; अर्थात् वृक्षों का पाँच महाभूतों से सम्बन्ध नहीं है।

(8)
घनानामपि वृक्षाणामाकाशोऽस्ति न संशयः
तेषां पुष्पफलव्यक्तिर्नित्यं समुपपाद्यते ॥

शब्दार्थ घनानाम् अपि = ठोस रूप होते हुए भी। वृक्षाणां = वृक्षों में। आकाशः अस्ति = आकाश तत्त्व है। न संशयः = सन्देह नहीं है। तेषां = उन (वृक्षों) के पुष्पफलव्यक्तिः = फूल और फलों की उत्पत्ति। नित्यं = निरन्तर। समुपपाद्यते = सम्भव होती है।

प्रसंग वृक्षों की भौतिकता के सन्देह का समाधान करते हुए महर्षि भृगु आकाश तत्त्व की विद्यमानता सिद्ध कर रहे हैं।

अन्वय घनानाम् अपि वृक्षाणाम् आकाशः अस्ति, (अत्र) संशयः न (अस्ति)। तेषां पुष्प-फल-व्यक्तिः नित्यं समुपपाद्यते।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि ठोस रूप होते हुए भी वृक्षों में आकाश तत्त्व अवश्य होता है, इसमें सन्देह नहीं है; क्योंकि उनमें फूल और फलों की उत्पत्ति नित्य सम्भव होती है। तात्पर्य यह है कि फलों और फूलों में आकाश तत्त्व होता है। बिना आकाश तत्त्व के उनका अस्तित्व ही नहीं है। अत: वृक्षों में आकाश-तत्त्व के अभाव में फल और फूले उत्पन्न हो ही नहीं सकते थे।

(9)
ऊष्मतो म्लायते पर्णं त्वक् फलं पुष्पमेव च।
म्लायते शीर्यते चापि स्पर्शस्तेनात्र विद्यते ॥

शब्दार्थ ऊष्मतः = गर्मी के कारण। म्लीयते = कुम्हला जाता है। पर्ण = पत्ता। त्वक् = छाला शीर्यते = बिखर जाता है। स्पर्शः = स्पर्श। तेन = इस (कारण) से। अत्र = यहाँ। विद्यते = है।

प्रसंग महर्षि भृगु यह बता रहे हैं कि वृक्षों में स्पर्श का अनुभव करने की शक्ति है।

अन्वय ऊष्मतः पर्णं म्लायते। त्वक् फलं पुष्पम् एव च म्लायते शीर्यते अपि च। तेन अत्र स्पर्शः विद्यते।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि गर्मी के कारण वृक्षों के पत्ते मुरझा जाते हैं। छाल, फल और फूल भी कुम्हला जाते हैं और बिखर जाते हैं। इस कारण वृक्षों में स्पर्श होता है क्योंकि बिना स्पर्श का अनुभव किये मुरझाना एवं सूखना सम्भव नहीं है। स्पर्श को वायु तत्त्व का गुण माना जाता है, अतः वृक्षों में वायु तत्त्व की विद्यमानता भी सिद्ध होती है।

(10)
वाय्वग्न्यशनिनिर्घोषैः फलं पुष्पं विशीर्यते
श्रोत्रेण गृह्यते शब्दस्तस्माच्छृण्वन्ति पादपाः ॥

शब्दार्थ वाय्वग्न्यशनिनिर्घोषः (वायु + अग्नि + अशनिनिर्घोषः) = वायु, अग्नि और बिजली की कड़के से। विशीर्यते = बिखर जाता है। श्रोत्रेण = कर्णेन्द्रियों के द्वारा। गृह्यते = ग्रहण किया जाता है। शब्दः = शब्द। तस्मात् = इस कारण से। शृण्वन्ति = सुनते हैं।

प्रसंग महर्षि भृगु वृक्षों में श्रवणेन्द्रिय की विद्यमानता बता रहे हैं।

अन्वय वाय्वग्न्यशनिनिर्घोषैः (वृक्षाणां) फलं पुष्पं (च) विशीर्यते। श्रोत्रेण शब्दः गृह्यते। तस्मात् पादपाः शृण्वन्ति।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि वायु, अग्नि और बिजली की कड़क से फल और फूल बिखर जाते हैं। शब्द कान से ग्रहण किया जाता है। इसलिए वृक्ष सुनते हैं, यह सिद्ध होता है। यह तो सभी जानते हैं कि आकाश का गुण शब्द होता है; अत: इससे वृक्षों में आकाश तत्त्व की विद्यमानता भी सिद्ध होती है।

(11)
वल्ली वेष्टयते वृक्षं सर्वतश्चैव गच्छति
न ह्यदृष्टेश्च मार्गोऽस्ति तस्मात् पश्यन्ति पादपाः ॥ [2008]

शब्दार्थ वल्ली = लता, बेल। वेष्टयते = लपेट लेती है। वृक्षं = वृक्ष को। सर्वतः = चारों ओर। अदृष्टेः = बिना दृष्टि वाले को मार्गोऽस्ति (मार्गः + अस्ति) = मार्ग है।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में सिद्ध किया गया है कि वृक्षों में देखने की शक्ति होती है।

अन्वय वल्ली वृक्षं वेष्टयते, सर्वतः गच्छति च। अदृष्टे: च मार्गः न अस्ति। तस्माद् (सिध्यति यत्) पादपाः पश्यन्ति।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि बेल वृक्ष को लपेट लेती है और चारों ओर फैल जाती है; अर्थात् जिधर मार्ग मिल जाता है उधर निकल जाती है। बिना दृष्टि वाले का कोई मार्ग नहीं होता। इस कारण सिद्ध होता है। कि वृक्ष देखते भी हैं।

(12)
पुण्यापुण्यैस्तथा गन्धैर्भूपैश्च विविधैरपि।
अरोगाः पुष्पिताः सन्ति तस्माज्जिघ्रन्ति पादपाः

शब्दार्थ पुण्यापुण्यैः = पुण्य और अपुण्य से, अच्छा बुरा, शुभ-अशुभ। गन्धैः = गन्धों से। धूपैः = धूपों (ओषधियों का धुआँ) से। अरोगाः = रोगरहित। पुष्पिता: = पुष्पयुक्त। जिघ्रन्ति = सँघते हैं। पादपाः = वृक्ष।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में वृक्षों का सँघना अर्थात् घ्राणेन्द्रिय की विद्यमानता सिद्ध की गयी है।

अन्वय (वृक्षाः) पुण्यापुण्यैः तथा गन्धैः विविधैः धूपैः अपि च अरोगाः पुष्पिताः सन्ति। तस्मात् पादपाः जिघ्रन्ति (इति सिध्यति)।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि वृक्ष पुण्यों और अपुण्यों से तथा अनेक प्रकार की गन्धों और धूपों से रोगमुक्त और पुष्पित होते हैं। इस कारण वृक्ष सँघते हैं, यह सिद्ध होता है।

(13)
पादैः सलिलपानाच्च व्याधीनां चापि दर्शनात्।
व्याधिप्रतिक्रियत्वाच्च विद्यते रसनं द्रुमे॥

शब्दार्थ पादैः = जड़ों से, पैरों से। सलिलपानात् = जल पीने से। व्याधीनां = रोगों के चापि (च + अपि) = और भी। दर्शनात् = दिखाई पड़ने से। व्याधिप्रतिक्रियत्वात् = रोगों की प्रतिक्रिया (चिकित्सा) होने के कारण। विद्यते = है। रसनम् = स्वाद लेने की सामर्थ्य।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में महर्षि भृगु द्वारा वृक्षों में रसनेन्द्रिय का होना सिद्ध किया गया है।

अन्वये पादैः सलिलपानात् व्याधीनां च अपि दर्शनात् व्याधि प्रतिक्रियत्वात् च द्रुमे रसनं विद्यते (इति सिध्यति)।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि अपनी जड़ों के द्वारा जल पीने के कारण और रोगों के दिखाई पड़ने के कारण और रोगों का उपचार सम्भव होने के कारण वृक्षों में स्वाद लेने की सामर्थ्य सिद्ध होती है। तात्पर्य यह है कि रसनेन्द्रिय के अभाव में जल पीना और रोगों की दवा पीना सम्भव नहीं है और बिना स्वाद के दवा का प्रभाव हो ही नहीं सकता।

(14)
वक्त्रेणोत्पलनालेन यथोर्ध्वं जलमाददेत्
यथा पवनसंयुक्तः पादैः पिबति पादपः ॥

शब्दार्थ वक्त्रेण = मुख द्वारा। उत्पलनालेन = कमल की डण्डी से। यथा = जैसे, जिस प्रकार। ऊर्ध्वम् = ऊपर की ओर। आददेत् = ग्रहण करता है। तथा = उसी प्रकार पवनसंयुक्तः = पवन से युक्त।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में वृक्षों में चेतना का होना सिद्ध किया गया है।

अन्वय यथा उत्पलनालेन वक्त्रेण जलम् ऊर्ध्वम् आददेत्। तथा पवनसंयुक्तः पादपः पादैः (जलं)। पिबति।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि जैसे कमल डण्ठल के द्वारा ऊपर की ओर जल ग्रहण करता है, अर्थात् खींचता है, उसी प्रकार वृक्ष वायु से युक्त होकर अपनी जड़ों से पानी पीता है।

(15)
सुखदुःखयोश्च ग्रहणाच्छिन्नस्य च विरोहणात्।
जीवं पश्यामि वृक्षाणामचैतन्यं न विद्यते ॥ [2008]

शब्दार्थ सुख-दुःखयोः = सुख और दुःख का। ग्रहणात् = अनुभव करने के कारण। छिन्नस्य = कटे हुए का। विरोहणात् = पुनः उगने के कारण। जीवं = जीवन को। पश्यामि = देखता हूँ, अनुभव करता हूँ। अचैतन्यम् = चेतना का अभाव।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में वृक्षों में चेतनता की विद्यमानता को सिद्ध किया गया है।

अन्वय (वृक्षाणां) सुखदुःखयोः ग्रहणात्, छिन्नस्य विरोहणात् च (अहं) वृक्षाणां जीवं पश्यामि। (तेषाम्) अचैतन्यं न विद्यते।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि सुख और दुःख का अनुभव करने के कारण तथा कटे हुए वृक्ष के पुनः उगने के कारण मैं वृक्षों में जीवन देखता हूँ। उनमें चेतना का अभाव नहीं है।

(16)
तेन तज्जलमादत्तं जरयत्यग्नि-मारुतौ ।
आहारपरिणामाच्च स्नेहो वृद्धिश्च जायते ॥

शब्दार्थ तेन = उसके (वृक्ष के) द्वारा। आदत्तम् = ग्रहण किया जाता है। तत् = वह (जल)। जरयति = पचाता है। अग्नि-मारुतौ = अग्नि और वायु को। आहारपरिणामात् = भोजन पच जाने के कारण। स्नेहः = चिकनापन, स्निग्धता। वृद्धिः = बढ़ावा।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में वृक्षों में चेतना का होना सिद्ध किया गया है।

अन्वय तेन तत् जलम् आदत्तम्। अग्निमारुतौ जरयति। आहार-परिणामात् च स्नेह: वृद्धिश्च जायते।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि उस वृक्ष के द्वारा जल ग्रहण किया जाता है। वह अग्नि और हवा को पचाता है। भोजन के पच जाने के कारण उसमें स्नेह उत्पन्न होता है और उसकी वृद्धि होती है। तात्पर्य यह है कि वृक्षों में चेतना होती है, क्योंकि जीवों में वृद्धि प्राप्त करना चेतना का द्योतक है।

(17)
एतेषां सर्ववृक्षाणां छेदनं नैव कारयेत्
चातुर्मासे विशेषेण विना यज्ञादिकारणम् ॥ [2007,12]

शब्दार्थ सर्ववृक्षाणां = सभी वृक्षों की। छेदनम् = कटाई। ‘कारयेत्’ = करना चाहिए। चातुर्मासे = वर्षा के चार महीनों में। विशेषेण = विशेष रूप से। विना यज्ञादिकारणम् = यज्ञ आदि किसी पवित्र उद्देश्य के बिना।।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में बिना किसी विशेष प्रयोजन के वृक्षों को न काटने का परामर्श दिया गया है।

अन्वय एतेषां सर्ववृक्षाणां यज्ञादिकारणं विना छेदनं न कारयेत्। विशेषेण चातुर्मासे एव (एतेषां छेदनं न कारयेत्)।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि इन सभी वृक्षों की यज्ञादि विशेष कारण के बिना कटायी नहीं करनी चाहिए; अर्थात् यज्ञादि के समय आवश्यकता पड़ने पर ही वृक्षों को काटना चाहिए। विशेष रूप से वर्षा के चार महीनों में इन्हें नहीं काटना चाहिए।

(18)
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना।
वासितं वै वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा ॥ [2008, 10, 11, 14, 15]

शब्दार्थ एकेनापि = एक भी। सुवृक्षेण = सुन्दर वृक्ष के द्वारा। पुष्पितेन = फूलों से युक्त। सुगन्धिना = सुन्दर महक (गन्ध) वाले। वासितम् = सुगन्धित हो जाता है। वनं सर्वं = सम्पूर्ण वन|

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक में पुष्पित और पल्लवित वृक्ष के माध्यम से सुपुत्र के गुणों पर प्रकाश डाला गया है।

अन्वय पुष्पितेन सुगन्धिना एकेन अपि सुवृक्षेण सर्वं वै वनं वासितं सुपुत्रेण कुलं (भवति)।

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि फूलों से युक्त तथा सुन्दर गन्ध से युक्त एक भी सुन्दर वृक्ष के द्वारा सारा वन उसी प्रकार सुगन्धित हो जाता है, जैसे एक ही सुपुत्र के द्वारा वंश प्रतिष्ठित हो जाता है।

सूक्तिपरक वाक्यांशों की व्याख्या

(1) अमितानां महाशब्दो यान्ति भूतानि सम्भवम्। [2007]

सन्दर्भ प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत’ के पद्य-खण्ड ‘पद्य-पीयूषम्’ के ‘वृक्षाणां चेतनत्वम्’ पाठ से उद्धृत है।

[ संकेत इस पाठ की शेष समस्त सूक्तियों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में महर्षि भृगु पंचभूतों और उसके लिए प्रयुक्त शब्द का वर्णन कर रहे हैं।

अर्थ असीमित पदार्थों के लिए ‘महा’ शब्द से भौतिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं।

व्याख्या महर्षि भरद्वाज से महर्षि भृगु कहते हैं कि असीमित पदार्थों के लिए ‘महा’ शब्द का प्रयोग होता है। यह शब्द के पूर्व जुड़कर उसके अर्थ में; बहुत अधिक, सर्वश्रेष्ठ, सबसे बड़ा, बहुत बड़ा आदि अर्थों का बोध कराता है; यथा-महात्मा, महाकाव्य, महादेव, महापुरुष, महाभियोग, महायज्ञ, महामारी आदि। अतः स्पष्ट है कि ‘महा’ शब्द का प्रयोग असीमित पदार्थों के लिए होता है। इन असीमित पदार्थों से ही समस्त प्राणी/भौतिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं। इसीलिए इनके लिए प्रयुक्त ‘महाभूत’ शब्द सार्थक और उपयुक्त है।

(2) शरीरं पाञ्चभौतिकम्। [2012]

प्रसंग इस सूक्ति में बताया गया है कि संसार में जितने भी प्राणी हैं उनके शरीर पाँच तत्त्वों से मिलकर बने

अर्थ शरीर पाँच भौतिक तत्त्वों से निर्मित है।

व्याख्या महर्षि भृगु वृक्षों में चेतना के होने को प्रमाणित करते हुए उनकी तुलना मनुष्य के शरीर से करते हैं। वे बताते हैं कि हमारा शरीर आकाश, वायु, जल, पृथ्वी और अग्नि-इन पाँच तत्त्वों से मिलकर बना है। हमारे शरीर की चेतना के कारण ये पाँच तत्त्व ही हैं। जिस प्रकार शरीर की गति वायु तत्त्व के कारण, खोखलापन आकाश तत्त्व के कारण, ऊष्मा अग्नि तत्त्व के कारण, रुधिर आदि का प्रवाह जल तत्त्व के कारण और ठोसपन पृथ्वी तत्त्व के कारण है, उसी प्रकार वृक्षों में भी ये पाँचों तत्त्व और लक्षण विद्यमान हैं। इसीलिए ये भी हमारी तरह ही प्राणवान हैं।

(3)
शरीरे पञ्चधातवः।
ते कथं पाञ्चभौतिकाः।

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में वृक्षों में पाँच धातुओं अर्थात् पाँच महाभूतों की विद्यमानता में सन्देह व्यक्त किया गया है।

अर्थ शरीर में पाँच धातुएँ अर्थात् पाँच महाभूत तत्त्व कैसे (हो सकते हैं)?

व्याख्या महर्षि भृगु कहते हैं कि सभी स्थावर (एक ही स्थान पर स्थित रहने वाले) और जंगम (चलने-फिरने वाले) पदार्थों में पाँच धातुओं अर्थात् पाँच महाभूतों की विद्यमानता है। इन्हीं पाँच महाभूतों से चर-अचर समस्त विश्व युक्त हैं। पाँच इन्द्रिय संज्ञक-श्रवणेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, स्पर्शेन्द्रिय और दर्शनेन्द्रिय सूक्ष्म महाभूत हैं। महर्षि भरद्वाज इन पाँच महाभूतों की विद्यमानता जंगम पदार्थों में तो स्वीकार करते हैं, लेकिन स्थावर पदार्थों में नहीं। अपने सन्देह को व्यक्त करते हुए वे विभिन्न तर्को के द्वारा अपनी बात को रखते हैं।

(4)
तथा पवनसंयुक्तः पादैः पिबति पादपः।
पादैः पिबति पादपः।। [2015]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में जीवधारियों और वृक्ष द्वारा जल-ग्रहण करने की विधि का वर्णन किया गया है।

अर्थ जैसे पवन से युक्त होकर वृक्ष जड़ों से जल पीते हैं।

व्याख्या जीवधारी वायु के सहयोग से चूषण-पद्धति द्वारा जल आदि पेय पदार्थों को ग्रहण करते हैं। यह क्रिया केवल जीवधारियों में पायी जाती है। वृक्ष भी इस पद्धति के द्वारा वायु के योग से अपनी जड़ों द्वारा पृथ्वी से जल चूसकर अपना पोषण करते हैं; अतः उनमें भी जीवन है। जिस प्रकार कमल अपनी नाल के द्वारा पानी को ऊपर पहुँचाता (खींचता) है, उसी प्रकार वृक्ष वायु की सहायता से अपने जड़रूपी पैरों से पानी पीकर वृक्ष की शाखाओं-उपशाखाओं तक ले जाते हैं। इसीलिए उनको पादप कहा जाता है। भाव यह है कि मूल ही सबका कारण होता है।

(5) एतेषां सर्ववृक्षाणां छेदनं नैव कारयेत्। [2006,07,09, 10, 12]

प्रसंग प्रस्तुत सूक्ति में महर्षि भृगु वृक्षों में चेतना होने के कारण उन्हें न काटने की ओर संकेत कर रहे हैं।

अर्थ इन सभी वृक्षों को नहीं काटना चाहिए।

व्याख्या सभी वृक्षों में जीवधारियों की तरह ही चेतना होती है। इसी कारण से वे भी हमारी तरह ही सुख और दु:ख का अनुभव करते हैं। अतः व्यर्थ काटकर उन्हें पीड़ा नहीं पहुँचानी चाहिए। वर्षा ऋतु में सभी पेड़-पौधों में नवजीवन और नवचेतना का संचार होता है। इसी समय वे सर्वाधिक वृद्धि करते हैं। अतः वर्षा ऋतु में तो उन्हें कदापि नहीं काटना चाहिए। वर्तमान समय में पर्यावरण का सन्तुलन बिगड़ रहा है, इसलिए उनकी रक्षा करना तो और भी आवश्यक हो जाता है।

(6)
वासितं वै वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा। [2006, 08,09, 10, 14]
सुपुत्रेण कुलं यथा। [2009, 14]

प्रसंग इस सूक्ति में सुपुत्र के महत्त्व को बताया गया है।

अर्थ एक ही पुष्पित एवं गन्ध वाले वृक्ष से पूरा वन सुवासित हो जाता है, जिस प्रकार एक योग्य पुत्र से कुल का यश बढ़ जाता है।

व्याख्या जब किसी वन में सुगन्धित पुष्पों वाला एक वृक्ष भली प्रकार से सुगन्धित हो उठता है, तो उसकी सुगन्ध से सारा वन महकने लगता है। ठीक इसी प्रकार से एक सुपुत्र अपने सम्पूर्ण कुल को अपने सकर्मों की सुगन्ध से महका देता है। तात्पर्य यह है कि पुत्र के सद्कर्मों से उसके सम्पूर्ण कुल की …. यश-कीर्ति चारों ओर फैल जाती है। उसके नाम से उसके कुल का नाम जाना जाने लगता है। यहाँ पर सुपुत्र की तुलना सुवृक्ष से की गयी है और यह बताया गया है कि दोनों को अपने-अपने कुल समूह के लिए महत्त्व है। भाव यह है कि एक भी अच्छा गुण व्यक्ति के विकास में सहायक होता है।

श्लोक का संस्कृत-अर्थ

(1) अमितानां महाशब्दो ……………………………… शब्दोऽयमुपपद्यते ॥ (श्लोक 1)
संस्कृतार्थः महर्षिः भृगुः उवाच-वृक्षाः असीमितपदार्थान् यच्छन्ति, अतएव एभ्यः ‘महा’ शब्दस्य प्रयोगः भवति। अस्मात् कारणात् एव इमान् ‘महाभूत’ संज्ञया अभिहितः।

(2) चेष्टा वायुः ……………………………… शरीरं पाञ्चभौतिकम् ॥ (श्लोक 2)
संस्कृतार्थः महर्षिः भृगुः उवाच–अस्मिन् वृक्षे शरीरे गतिशीलता वायोः रूपम् अस्ति, खम् आकाशस्य रूपम् अस्ति, उष्णत्वम् अग्निरूपम् अस्ति, रुधिरादयः तरलाः पदार्थाः सलिलरूपम् अस्ति, सङ्गातः पृथ्वीरूपम् अस्ति; अतः इदं शरीरं पाञ्चभौतिकम् अस्ति।

(3) पञ्चभिर्यदि भूतैस्तु ……………………………… पञ्चधातवः ॥ (श्लोक 4) [2006]
संस्कृतार्थः महर्षिः भरद्वाजः कथयति यत् यदि स्थावर-जङ्गमाः पदार्थाः पञ्चमहाभूतैः युक्ताः सन्ति तर्हि स्थावराणां पदार्थानां शरीरे पञ्चधातवः पञ्चमहाभूततत्त्व: वा कथं न दृश्यन्ते?

(4) अनूष्माणामचेष्टानां ……………………………… पञ्चधातवः ॥ (श्लोक 5)
संस्कृतार्थः महर्षिः भरद्वाजः उवाच-ऊष्मारहिताणां क्रियाशीलतारहिताणाम् अवकाशरहिताणां चे वृक्षाणां शरीरे वस्तुतः पञ्चधातवः न एव उपलभ्यन्ते।

(5) न शृण्व न्ति नं ……………………………… कथं पाञ्चभौतिकाः ॥ (श्लोक 6) (2010].
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महर्षिः भरद्वाजः शङ्कां करोति यत् ते वृक्षाः न शृण्वन्ति, न पश्यन्ति, न गन्ध-रस सेविन: न च स्पर्श विजानन्ति, अतएव ते कथं पाञ्चभौतिकाः सन्ति।

(6) ऊष्मतो म्लायते ……………………………… तेनात्र विद्यते॥ (श्लोक 9) [2009]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महर्षिः भृगुः कथयति उष्मतः अर्थात् तापकारणेन पर्णानि म्लायन्ते। एतत् अतिरिक्तं त्वक् फलं-पुष्पं च अपि म्लायते शीर्यते च। एतेन कारणेन स्पष्टः अस्ति यत् वृक्षेषु स्पर्शगुणस्य विद्यमानता अवश्यमेव भवति।

(7) वल्ली वेष्टयते ……………………………… पश्यन्ति पादपाः ॥ (श्लोक}l) [2010]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महर्षिः भृगुः कथयति यत् वृक्षेषु चक्षु-इन्द्रियम् अपि विद्यते, लता वृक्षम् आरोहति यत्र अलम्बनं मिलति तत्र सर्वत्र गच्छति। अदृष्टे मार्गे लतानाम् आरोहणे गमनं नैव सम्भवतः। तस्मात् पादपाः पश्यन्ति अपि।

(8) पुण्यापुण्यैस्तथा ……………………………… जिघ्रन्ति पादपाः ॥ (श्लोक 12)
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महर्षिः भृगुः वृक्षाणां घ्राणेन्द्रियस्य सिद्धिः करोति। वृक्षः सुगन्धं दुर्गन्धं च विचारयन्ति। गन्धैः युक्तैः धूपैः पादपाः अरोगाः पुष्पिता: सन्ति। तस्मात् कारणात् पादपाः जिघ्रन्ति।

(9) सुखदुःखयोश्य ……………………………… न विद्यते ॥ (श्लोक 15) [2010, 1]
संस्कृतार्थः महर्षिः भृगुः उवाच-अहं सुखदुःखयोः अनुभवकरणात् छिन्नस्य शरीरस्य पुनः अङ्कुरणात् च वृक्षाणां जीवं पश्यामि। तेषां निर्जीवत्वं न विद्यते। वृक्षा अपि सचेतना नैव जडाः इति भावः।।

(10) एतेषां सर्ववृक्षाणां ……………………………… यज्ञादिकारणम्॥ (श्लोक 17)
संस्कृतार्थः महर्षिः भृगुः कथयति यत् कदापि वृक्षाणाम् अकारणं कर्त्तनं न कुर्यात्। यज्ञादि कारणाय एव छेदनं कारयेत्। विशेषेण चातुर्मासे वृक्षं कर्त्तनं न कुर्यात्। शास्त्रेषु अपि वृक्षाणां कर्त्तनं निषिद्धम् अस्ति।

(11) एकेनापि सुवृक्षेण ……………………………… सुपुत्रेण कुलं यथा ॥ (श्लोक 18) [2007,08,09, 10, 11, 12, 15]
संस्कृतार्थः अस्मिन् श्लोके महर्षिः भृगु कथयति यत् यथा एकः सुपुष्पितः सुगन्धित: वृक्षः सर्वं वनं सुगन्धितं करोति तथैव एकः सुपुत्रः अपि समस्तं कुलं स्वगुणैविभूषितं करोति। अतएव वृक्षाणां समृद्धिः आवश्यकी अस्ति।