Rajasthan Board RBSE Class 10 Hindi क्षितिज Chapter 3 सेनापति

RBSE Class 10 Hindi Chapter 3 पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 10 Hindi Chapter 3 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. कवि ने किस ऋतु को ‘रितुराज’ कहा है
(क) हेमन्त
(ख) शिशिर
(ग) ग्रीष्म
(घ) वसन्त

2. सुरचाप का अर्थ है
(क) इन्द्र धनुष
(ख) देवता
(ग) अर्धवृत्त
(घ) घटा
उत्तर:
1. (घ), 2. (क)।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 3 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 3.
कविता में बंदीजन किसे कहा गया है?
उत्तर:
कविता में बंदीजन कोयल को कहा गया है।

प्रश्न 4.
प्रिय ने किस ऋतु में वापस आने के लिए प्रेयसी को कहा था?
उत्तर:
प्रिय ने प्रेयसी से वर्षा ऋतु में वापस आने को कहा था।

प्रश्न 5.
ऋतुवर्णन में ऋतुराज किसे कहा गया है?
उत्तर:
ऋतुवर्णन में वसंत को ऋतुराज कहा गया है।

प्रश्न 6.
‘निबल अनल’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
तात्पर्य यह है कि बहुत अधिक ठण्ड के कारण आग की गर्मी भी कम प्रतीत हो रही है।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 3 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 7.
‘चतुरंग दल’ से सेनापति का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
‘चतुरंग दल’ का अर्थ चार अंगों से युक्त सेना होता है। ये चार अंग हैं-हाथी सवार, घुड़सवार, रथ सवार और पैदल सैनिक। कवि ने वसंत ऋतु में फूलों से युक्त वनों और उपवनों में स्थित वृक्षों को ऋतुराज वसंत की चतुरंगिणी सेना बताया है जो ऋतुओं के राजा वसंत के आगमन की सूचना दे रही है।

प्रश्न 8.
सावन के माह में कामदेव नायिका को परेशान कैसे कर रहा है?
उत्तर:
सावन का महीना आते ही आकाश में काली घटाएँ घिर आई हैं। बार-बार बिजली चमक रही है और बादल भयंकर ध्वनि में गरज रहे हैं। कोयल, मोर आदि पक्षी कलरव कर रहे हैं। नन्हीं बूंदों से शीतल पवन चल रही है। ऐसे वातावरण में प्रेयसी को कामदेव के प्रभाव से विरहरूपी बुखार चढ़ आया है। वह प्रिय से मिलने को तरस रही है।

प्रश्न 9.
ग्रीष्म ऋतु में बादल और हवा की क्या स्थिति हो गई है?
उत्तर:
कवि सेनापति ने छन्द में ग्रीष्म और वर्षा ऋतुओं का श्लेष अलंकार के माध्यम से एक साथ वर्णन किया है। ग्रीष्म ऋतु आने से धरती और आकाश तप रहे हैं और गर्म हवा आग की लपट के समान होकर शरीर को झुलसा रही है। सभी लोग ग्रीष्म के ताप से व्याकुल होकर बादलों की शीतल छाया की चाह करते हुए व्याकुल हो रहे हैं।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 3 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 10.
सेनापति का ऋतुवर्णन हिन्दी साहित्य में अनूठा क्यों है?
उत्तर:
हिन्दी के कवियों में सेनापति अपने प्रकृति वर्णन के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। सेनापति रीतिकालीन कवि थे। रीतिकालीन अधिकांश कवियों ने श्रृंगार रस प्रधान रचनाएँ की हैं। सेनापति ने विस्तार से प्रकृति वर्णन भी किया है। प्रकृति वर्णन के दो स्वरूप रहे हैं। उद्दीपन रूप तथा आलम्बन रूप। उद्दीपन प्रधान रूप में प्रकृति केवल भावों को उत्तेजित करने वाली दिखाई गई है और आलम्बन प्रधान रूप में प्रकृति को ही कविता का विषय बनाया गया है। कवि सेनापति के प्रकृति वर्णन की विशेषता यही है कि उन्होंने लीक से हटकर आलम्बन प्रधान प्रकृति का वर्णन किया है। सेनापति ने सभी ऋतुओं का विविधतापूर्ण चित्रण किया है। सभी ऋतुओं के दृश्यों का विस्तार और सजीवता से वर्णन हुआ है। इस वर्णन में सेनापति के सूक्ष्म निरीक्षण का परिचय मिलता है। वह ऋतुओं का शब्दचित्र उपस्थित करने में निपुण हैं। हमारी पाठ्य-पुस्तक में सेनापति के प्रकृति वर्णन पर आधारित चार कवित्त संकलित हैं। इनमें वसंत, ग्रीष्म और वर्षा का श्लेष अलंकार पर आधारित संयुक्त वर्णन तथा वर्षा और शीत ऋतु का वर्णन सम्मिलित है। इनमें सेनापति के प्रकृति वर्णन की सभी विशेषताएँ विद्यमान हैं।

प्रश्न 11.
पठित काव्यांश के आधार पर शीत ऋतु का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शीत ऋतु ने अपनी प्रबल सेना के साथ जगत पर आक्रमण किया तो आग की शक्ति क्षीण हो गई और सूर्य का ताप भी ठण्डा पड़ गया। बर्फ जैसी ठण्डी वायु चलने लगी है जो शरीर में तीर की भाँति चुभ रही है। शीत के भय से गर्मी भाग कर घरों के कोनों में जा छिपी है अर्थात् घरों के भीतर ही ठण्ड से कुछ रक्षा हो रही है। लोगों ने शीत से बचने के लिए अलाव जला लिए। तापने वालों की आँखों से धुएँ के कारण पानी बह रहा था। मानो ठण्ड के भय से रो रहे हों। लोग ठण्ड दूर करने के लिए आग पर गिर पड़ रहे हैं। आग के जरा-सा सुलगते ही लोग उस पर झुककर तापने लगते हैं। आग पर हाथ फैलाकर झुके हुए लोगों को देखकर ऐसा लग रहा है कि आग को ठण्ड से भयभीत देखकर लोगों ने उस पर हाथ फैलाकर और झुककर उसे अपनी छातियों के नीचे छिपा रखा है।

प्रश्न 12.
वसंत ऋतु के सौन्दर्य पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
वसंत को ऋतुराज (ऋतुओं का राजा) कहा गया है। शीत ऋतु के पश्चात् वसंत ऋतु के आगमन से ऐसा लग रहा है मानो शीत को पराजित करने और जीव-जगत को आनन्दित करने के लिए, ऋतुओं के राजा वसंत ने चतुरंगिणी सेना सजाकर चढ़ाई कर दी हो। राजा वसंत के स्वागत में कोयलरूपी बंदीजन (प्रशंसा करने वाले) उसका गुणगान कर रहे हैं। भौंरों की गुंजार के रूप में राजा के मनोरंजन के लिए गायकों द्वारा गीत गाए जा रहे हैं। चारों ओर छाई फूलों की सुगंध सोने में सुगंध’ का दृश्य उपस्थित कर रही है। सरसों के पीले खेत राजा के स्वागत में बिछे सुगंध से युक्त सोने के बिछौने हैं। | इस प्रकार वसंत के स्वागत में आज धरती पर चारों ओर शोभा छाई हुई है और सभी प्रकार की सुखदायी साज-सज्जा दिखाई दे रही है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) बरन-बरन तरु फूले उपबन बन……………आवत बसंत रितुराज कहियतुं है।
उत्तर:
उक्त पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या के लिए व्याख्या भाग में पद्यांश 1 का अवलोकन करें।

(ख) सीत कौ प्रबल सेनापति कोपि चढ्यौ दल……………… छतियाँ की छाँह राख्यौ पाउक छिपाइ कै।।
उत्तर:
उक्त पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या के लिए व्याख्या भाग में पद्यांश 4 का अवलोकन करें।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 3 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 10 Hindi Chapter 3 वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

1. ‘कवि सेनापति’ ने वसंत की चतुरंगिणी सेना बताया है
(क) वन-उपवनों को
(ख) फूलों से सज्जित वृक्षों को
(ग) मोर और कोयलों को।
(घ) प्रसन्न युवक-युवतियों को।

2. कवि सेनापति ने कोयल को बताया है
(क) एक लोकप्रिय पक्षी
(ख) मधुरभाषी
(ग) वसंत का बंदीजन
(घ) वसंत का दूत।

3. ‘सेनापति’ ने अपनी चतुराई से ग्रीष्मऋतु को दिखाया है
(क) वसंत ऋतु के समाने
(ख) शीत ऋतु के समान
(ग) वर्षा ऋतु के समान
(घ) सुखदायी ऋतु के समान।

4. ‘सेनापति’ की नायिका के मन में काम भाव जगा रहा है
(क) बादलों का घोरे गर्जन
(ख) कोयलों और मोरों का स्वर
(ग) प्रिय के आने का संदेश
(घ) सावन का मास।

5. कवि सेनापति के अनुसार शीत ऋतु से भयभीत है
(क) सूर्य
(ख) पशु-पक्षी
(ग) अग्नि
(घ) पवन।
उत्तर:
1. (ख), 2. (ग), 3. (ग), 4. (घ), 5. (ग)।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 3 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि सेनापति ने ऋतुराज वसंत की सेना किसे बताया है?
उत्तर:
कवि ने वनों, उपवनों और फूलों से भरे नाना प्रकार के वृक्षों को वसंत की सेना बताया है।

प्रश्न 2.
सेनापति ने भौंरों की गुंजार को क्या बताया है?
उत्तर:
भौंरों की गुंजार को कवि ने वसंत का गुणगान बताया है।

प्रश्न 3.
वसंत वर्णन में कवि सेनापति ने ‘सोने की सुगंध’ किसे बताया है?
उत्तर:
कवि ने पीले रंग के पुष्पों से आती सुगंध को सोने की सुगंध’ बताया है।

प्रश्न 4.
“तिन तरबर सब ही कौं रूप हरयौ है” इस पंक्ति का वर्षा ऋतु के पक्ष में क्या अर्थ है?
उत्तर:
इसका अर्थ यह है कि वर्षा ऋतु के आने से घास और वृक्षों का रूप हरा हो गया है।

प्रश्न 5.
श्लेष अलंकार के आधार पर ‘भादव’ शब्द के दो अर्थ कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
‘भादव’ के दो अर्थ क्रमशः वन की अग्नि (दावानल) तथा भादों का महीना है।

प्रश्न 6.
सेनापति ने ग्रीष्म ऋतु के वर्णन में अपनी क्या चतुराई दिखाई है?
उत्तर:
कवि ने अपनी चतुराई से ग्रीष्म ऋतु को वर्षा ऋतु के समान बना दिया है।

प्रश्न 7.
सावन के महीने में सेनापति ने आकाश का वर्णन किस प्रकार किया है?
उत्तर:
कवि ने आकाश में बिजली की चमक, इन्द्रधनुष की धमक, काली घटा की रिमझिम और घोर गर्जन करते बादलों का वर्णन किया है।

प्रश्न 8.
सावन में जहाँ-जहाँ कौन कुक रहे हैं?
उत्तर:
सावन में जहाँ-तहाँ कोयल और मोर कूक रहे हैं।

प्रश्न 9.
सावन में नायिका को कौन तरसा रहा है?
उत्तर:
सावन में नायिका को वियोग का ज्वर तरसा रहा है।

प्रश्न 10.
सावन में नायिका के पास कौन आने वाला है?
उत्तर:
नायिका के पास उसके मन को अच्छा लगने वाला उसका प्रेमी आने वाला है।

प्रश्न 11.
शीत ऋतु के आने का अग्नि और सूर्य पर क्या प्रभाव पड़ा है?
उत्तर:
शीत ऋतु के आने से अग्नि और सूर्य दोनों का ताप घट गया है।

प्रश्न 12.
कवि सेनापति ने शीत ऋतु की अत्यंत ठण्डी वायु को क्या बताया है?
उत्तर:
कवि ने ठण्डी वायु को भयंकर तीर बताया है।

प्रश्न 13.
शीत के भय से गर्मी कहाँ जा छिपी है?
उत्तर:
शीत के भय से गर्मी घरों के कोनों में छिप गई है।

प्रश्न 14.
शीत के कारण आग पर तापने वालों की क्या दशा हो रही है?
उत्तर:
तापने वालों की आँखों से धुएँ के कारण पानी बह रहा है और वे गर्मी पाने के लिए आग पर झुके जा रहे हैं।

प्रश्न 15.
शीत से भयभीत आग को लोगों ने कैसे छिपा रखा है?
उत्तर:
लोगों ने हाथ फैलाकर आग को अपनी छातियों के नीचे छिपा लिया है।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 3 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ऋतुराज वसंत के आगमन पर प्रकृति में क्या-क्या दृश्य दिखाई दे रहे हैं? ‘ऋतु वर्णन’ में संकलित छंद के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
राजा वसंत के स्वागत में प्रकृति ने अनेक प्रकार की साज-सज्जा की है। वनों और उपवनों में विविध प्रकार के वृक्ष फूलों से सज्जित हो गए हैं। कवि उनको ऋतुराज वसंत की चतुरंगिणी सेना बता रहा है। वसंत के स्वागत में कोयले कूक रही हैं। कवि के अनुसार ये राजा वसंत की प्रशंसा करने वाले बंदीजन (भाट या चारण) हैं। गुंजार करते भौंरे गुणी गायक या संगीतकार हैं। सरसों आदि के पीले फूलों की सुगंध, ‘सोने में सुगंध’ का दृश्य प्रस्तुत कर रही है।

प्रश्न 2.
ग्रीष्म ऋतु के वर्णन में कवि सेनापति ने धरती, आकाश, वृक्ष और वायु आदि का जो चित्रण किया है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
ग्रीष्म ऋतु के कारण धरती और आकाश चारों ओर जलते से प्रतीत हो रहे हैं। भयंकर ताप के कारण तृण (घास) और वृक्षों की सुन्दरता नष्ट हो गई है। गर्मी की लपटें जैसे शरीर को झुलसा रही हैं। भीषण ताप के कारण वनों में आग लगने से उजाला-सा होता दिख रहा है। अत्यन्त तपती हुई वायु के स्पर्श से लोगों के शरीरों की सिकाई सी हो रही है। लोग सूर्य के ताप से बचने के लिए. नदियों के जल का सहारा ले रहे हैं और शीतल घनी छाया की चाह कर रहे हैं।

प्रश्न 3.
सेनापति ने ग्रीष्म ऋतु के वर्णन में क्या चतुराई दिखाई है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि सेनापति ने ग्रीष्म ऋतु का वर्णन करते हुए ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जिनका ग्रीष्म और वर्षा दोनों ऋतुओं के पक्ष में अर्थ निकाला जा सकता है। इस प्रकार कवि ने श्लेष अलंकार के प्रयोग द्वारा चमत्कारपूर्ण काव्य-रचना में अपनी चतुराई का प्रदर्शन किया है। उदाहरण के लिए “देखें छिति अम्बर जलै है चारि ओर छोर” पंक्ति में ‘जल है’ शब्द ‘जलने’ और ‘जलमय होने’ दो अर्थ प्रकट कर रहा है। पहला अर्थ गर्मी के पक्ष में और दूसरा अर्थ वर्षा के पक्ष में सार्थक है।

प्रश्न 4.
सावन के आने पर प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों का कवि सेनापति ने जो वर्णन किया है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
सावन आने पर आकाश में छाए बादलों में बिजली चमकने लगी है। अनेक रंगों वाले इन्द्रधनुष दिखाई दे रहे हैं। काली घटाओं से झम-झम शब्द करती छोटी-छोटी बूंदें बरस रही हैं और उमड़-घुमड़कर अते बादल भयंकर ध्वनि से गरज रहे हैं। वर्षा से प्रसन्न होकर कोयल और मोर आदि पक्षी मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रहे हैं। वर्षा की बूंदों से शीतल पवन के झकोर तन-मन को सुख दे रहे हैं।

प्रश्न 5.
वर्षा ऋतु के आगमन का विरहिणी नायिका के मन पर क्या प्रभाव पड़ा है? लिखिए।
उत्तर-:
वर्षा ऋतु आने पर नायिका को अपने से दूर स्थित प्रेमी या पति के आगमन का संदेश मिला है। इस सूचना ने उसके वियोग के कष्ट को और बढ़ा दिया है। उसका मन अपने प्रिय से मिलने को और भी अधिक व्याकुल हो रहा है। इस विरहिणी के मन में सावन आने पर प्रिय मिलने की इच्छा बार-बार जारी रही है।

प्रश्न 6.
शीत ऋतु के वर्णन में कवि सेनापति ने शीत को किस रूप में प्रस्तुत किया है? छन्द के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
कवि ने शीत ऋतु को एक बलवान योद्धा या राजा के रूप में प्रस्तुत किया है। इस शीतरूपी राजा ने शीत से रक्षा करने वाले अग्नि, सूर्य और ताप पर सेना लेकर आक्रमण कर दिया है। इसके भय से आग और सूरज का ताप घट गया है। शीत की सेना, बर्फ जैसी शीतल हवा के रूप में तीखे बाण मार रही है। गरमी भागकर घरों के भीतर छिप गई है। लोग शीत से बचाने वाली अग्नि की सुरक्षा के लिए उसे हाथों और छातियों से ढककर छिपाने की चेष्टा कर रहे हैं।

प्रश्न 7.
पाठ्य-पुस्तक में संकलित सेनापति के ‘ऋतुवर्णन’ प्रसंग में प्रयुक्त हुए अलंकारों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
‘ऋतुवर्णन’ के छन्दों में कवि सेनापति ने शब्दालंकारों और अर्थालंकारों का प्रयोग करके कविता की शोभा बढ़ाई है। प्रयुक्त हुए अलंकारों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है अनुप्रास अलंकार-‘बिरद बीर’, ‘गान गुन गहियतु’, ‘कोकिला, कलापी कल कूजत’, ‘छतियाँ की छाँह’ आदि।

श्लेष-अलंकार-जलै है = ‘जल रहे हैं’ तथा ‘जल ही जल’, हयौ = ‘हर लिया है’ तथा ‘हरा हो गया है’, तरनि = सूर्य तथा नाव।।
उपमा अलंकार-“बंदी जिमि ……………. कोकिल हैं।”
उत्प्रेक्षा अलंकार-“जलद …………… पर्यो है।”, “मानो भीत ……………. छिपाइ है।”

RBSE Class 10 Hindi Chapter 3 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘ऋतु वर्णन’ पाठ से संकलित छन्दों के आधार पर इसमें किए गए ऋतु वर्णन का विस्तारपूर्वक परिचय दीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पाठ में कवि सेनापति रचित वसंत, ग्रीष्म, वर्षा तथा शीत ऋतु के वर्णन से सम्बन्धित चार छंद संकलित किए गए हैं। प्रथम छन्द में कवि ने वसंत ऋतु का वर्णन किया है। वसंत ऋतु को ऋतुओं का राजा अर्थात् सबसे अधिक आनंददायक ऋतु माना गया है। वसंत का आगमन होने पर वनों और बागों के वृक्ष फूलों से सज जाते हैं। कवि ने इस वृक्षों को राजा वसंत की सेना कहा है। वसंत में कोयल कूक रही है। वे राजा वसंत का गुणगान करने वाले चारण (भाट) हैं। गुंजार करते भौरे संगीतकार हैं। इस प्रकार कवि ने वसंत ऋतु की शोभा का रूपक के माध्यम से वर्णन किया है।

ग्रीष्म ऋतु आने पर भीषण तपन के कारण धरती और आकाश जलते हुए से प्रतीत हो रहे हैं। वृक्षों की हरियाली नष्ट हो गई है। गर्मी की लपटें-सी निकल रही हैं। वनों में आग लग रही है। अत्यंत गर्म हवा के चलने से शरीर सिंकी जा रहा है। लोग नदियों आदि में स्नान द्वारा ग्रीष्म ऋतु के कष्ट से बच रहे हैं। सभी शीतल और घनी छाया में रहना चाह रहे हैं।
वर्षा ऋतु के सावन मास में बिजली दमक रही है, सतरंगे इन्द्रधनुष आकाश में चमक रहे हैं। कोयल और मोर कूक रहे हैं। ठण्डी-ठण्डी सुखदायी वायु चल रही है। विरहिणी नारियाँ अपने प्रिय से मिलने को आतुर हो रही हैं। सावन सभी प्रेमियों के मन । में मिलन की इच्छा बढ़ा रहा है।

शीत ऋतु की प्रबल सेना ने जीव जगत पर आक्रमण कर दिया है। आगे और सूर्य शीत के सामने तेजहीन हो रहे हैं। केवल घरों में ठण्ड से बचाव हो रहा है। लोग जलते अलावों के पास बैठकर आग पर हाथ फैलाकर और झुककर ताप रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो वे भयभीत अग्नि की रक्षा के लिए उसे छिपा रहे हैं।

प्रश्न 2.
‘ऋतु वर्णन’ पाठ के आधार पर कवि सेनापति के प्रकृति वर्णन की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
संकलित छंदों के आधार पर सेनापति के प्रकृति वर्णन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
कलापक्ष-भाषा-कवि ने परिमार्जित और साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। भाषा प्रवाहपूर्ण और शब्द चयन सटीक है।

शैली – कवि ने वर्णनात्मक, आलंकारिक तथा शब्दचित्रात्मक शैलियों का प्रयोग किया है। जैसे-“धूम नैन बहैं, लोग आगि पर गिरे रहैं।” “हिए सौं, लगाई रहैं नैंक सुलगाई कै” (वर्णनात्मक शैली), “देखें छिति अंबर जलै है चारि ओर छोर” “तिन तरबर

सब ही कौं रूप हयौ है” (आलंकारिक शैली, श्लेष अलंकार का प्रयोग), “दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम घटा की झमक अति घोर घनघोर तें” (शब्द चित्रात्मक शैली) आदि।।
छन्द-कवि ने इस संग्रह में कवित्त छन्द को अपनाया है। अलंकार-अलंकारों में शब्दालंकार तथा अर्थालंकार दोनों का ही प्रयोग किया गया है”सोभा कौं समाज, सेनापति सुख-साज, आज” (अनुप्रास अर्थालंकार) “दारुन तरनि तरै नदी सुख पावें सब” (श्लेष अलंकार) बंदी जिमि बोलत बिरद बीर कोकिल हैं” (उपमा अलंकार) मानो भीत जानि महा सीत तें पसारि पानि, छतियाँ की छाँह राख्यौ पाउक छिपाइ के।” (उत्प्रेक्षा अलंकार)

भाव पक्ष-कवि ने विभिन्न ऋतुओं में मनुष्य तथा अन्य प्राणियों के व्यवहार का सजीव वर्णन किया है। वसंत ऋतु में चारों ओर उल्लास छाया है। प्रकृति के सुन्दर दृश्य मन को आनन्दित करने वाले हैं। वृक्ष पुष्पित हो गए हैं। पक्षी कलरव कर रहे हैं। फूल की सुगंध चारों ओर छा गई है। इसी प्रकार ग्रीष्म ऋतु में लोगों की व्याकुलता का चित्रण हुआ है। वर्षा ऋतु में विरहीजन अपने प्रियजनों से मिलने के लिए तरस रहे हैं। शीत ऋतु में आग तापते लोगों की चेष्टाएँ बड़े स्वाभाविक रूप से प्रस्तुत हुई हैं। इस प्रकार ‘ऋतु वर्णन’ काव्यांश के दोनों पक्ष पुष्ट और आकर्षक हैं।

प्रश्न 3.
“कवि सेनापति ‘श्लेष’ अलंकार के चमत्कारपूर्ण प्रयोग के लिए प्रसिद्ध हैं।” पाठ्य-पुस्तक में संकलित छन्दों के आधार पर सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
पाठ्य – पुस्तक में विद्यमान कवि सेनापति के ‘ऋतु वर्णन’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित छन्द संख्या दो में कवि ने ग्रीष्म ऋतु के वर्णन को अपने ‘श्लेष अलंकार के प्रयोग की चतुराई से ‘वर्षा वर्णन’ भी बना दिया है। इस छन्द की प्रथम छः पंक्तियों में कवि ने एक साथ ग्रीष्म और वर्षा का वर्णन किया है। उदाहरण प्रस्तुत है।

देखें छिति अंबर जलै है चारि ओर छोर,
तिन तरबर सब ही कौं रूप हर्यौ है।

इन पंक्तियों में ‘जलै है’ और ‘हयौ है’ शब्दों के दो-दो अर्थ हैं। ग्रीष्म ऋतु के पक्ष में ‘जलै है’ का अर्थ ‘जल रहा है’ होता है तथा वर्षा ऋतु के पक्ष में अर्थ करने पर जल ही जल है’ अर्थ निकाला जा सकता है। इसी प्रकार ‘हयौ है’ का ग्रीष्म ऋतु के पक्ष में अर्थ है। हर लिया है और वर्षा ऋतु के पक्ष में ‘हरा है’ होता है। अत: इन पंक्तियों का ग्रीष्म ऋतु के अनुसार अर्थ है, ‘धरती और आकाश जलते हुए प्रतीत हो रहे हैं और भीषण ताप ने घास और वृक्षों का रूप (सुंदरता) नष्ट कर दिया है। वर्षा ऋतु के अनुसार अर्थ करने पर ‘धरती और आकाश में चारों ओर जल ही जलं दिखाई दे रहा है और घास तथा वृक्ष हरे-भरे हो गए हैं। अर्थ होगा। श्लेष के प्रयोग द्वारा दोनों ऋतुओं का साथ-साथ वर्णन किया गया है। कवि सेनापति के श्लेष अलंकार के प्रयोग में प्रवीणता का यह छन्द प्रमाण दे रहा है।

प्रश्न 4.
संकलित छंद के आधार पर सेनापति के शीतवर्णन की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
सेनापति ने अपने प्रकृति वर्णन में रूपक और सांगरूपक का प्रयोग खूब किया है। शीत ऋतु के वर्णन में भी कवि ने शीत को एक प्रबल सेनापति का रूप दिया है। इस क्रोधित सेनापति शीत ने संसार पर चढ़ाई कर दी है। इसके भय से अग्नि बलहीन सा हो गया है और सूरज भी ठंडा पड़ गया है। शीत की सेना के तीर बर्फीली वायु है जो शरीर में तीर सी चुभकर बेहाल किए दे रही है।

आलंकारिक शैली के साथ ही सेनापति ने इस छंद में शीत के प्रभाव का बड़ा स्वाभाविक और सजीव वर्णन भी किया है। ठंड से बचने को लोग आग पर ताप रहे हैं। लकड़ियों का धुआँ उनकी आँखों में लग रहा है और आँखों से पानी बह रहा है फिर भी लोग गर्मी पाने को आग पर गिरे पड़ रहे हैं। शीत से बचाने वाली अग्नि को लोगों ने जैसे हृदय से लगा रखा है। यह दृश्य ऐसा लग रहा है कि शीत से आग की रक्षा करने को लोगों ने शीत से भयभीत आग को मानो अपनी छाती के नीचे छिपा रखा है।
इस प्रकार सेनापति को शीतवर्णन शिल्प और भाव दोनों ही दृष्टि से रोचक और प्रभावशाली है।

कवि परिचय

जीवन परिचय-

कवि सेनापति के जन्म और मृत्यु से सम्बन्धित तथ्यों पर विद्वान एकमत नहीं रहे हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा कुछ अन्य विद्वान सेनापति का जन्म संवत् 1646 (1589 ई.) मानते हैं। कुछ अन्य शोधकर्ता सेनापति का जन्म संवत 1616 (1559 ई.) मानते हैं। सेनापति ने स्वयं को ‘अनूपवस्ती’ का निवासी बताया है। कुछ विद्वान अनूपवस्ती को आज का अनूपशहर मानते हैं। सेनापति के पिता गंगाधर दीक्षित बताए जाते हैं। कुछ लोग ‘सेनापति’ को कवि का उपनाम मानते हैं किन्तु इनका मूल नाम अज्ञात है। सेनापति की मृत्यु का समय भी अनिश्चित है।

साहित्यिक परिचय-सेनापति रीतिकालीन कवि थे। अन्य रीतिकालीन कवियों की लीक से हटकर सेनापति ने मौलिक : काव्य रचनाएँ की हैं। सेनापति अपने प्रकृति वर्णन के लिए प्रसिद्ध और लोकप्रिय कवि रहे हैं। आपने प्रकृति को ही विषय बनाकर उसका आलम्बन रूप में वर्णन किया है। प्रकृति की विभिन्न ऋतुओं को कवि ने सूक्ष्म निरीक्षण से पूर्ण यथार्थ चित्रण किया है।

सेनापति ने रीतिकालीन परम्परा के अनुसार नायिकाओं का नख-शिख वर्णन भी किया है। उनकी कविता में भाव प्रवणता, मार्मिकता और चमत्कार का रोचक मिश्रण है। आप श्लेष अलंकार के प्रयोग में सिद्धहस्त कवि माने गए हैं। कवि ने राम भक्ति पर आधारित रचनाएँ भी की हैं जो भावुकतापूर्ण हैं। रचनाएँ-सेनापति की दो रचनाएँ प्रसिद्ध हैं। ‘काव्यकल्पद्रुम’ तथा ‘कवित्तरत्नाकर’। काव्यकल्पद्रुम अब प्राप्य नहीं है। केवल ‘कवित्तं रत्नाकर’ ही उनकी कीर्ति की ध्वजा बनी हुई है।

पाठ परिचय

पाठ्य-पुस्तक में संकलित चार कवित्त कवि की रचना ‘कवित्त रत्नाकर’ से संकलित हैं। प्रथम कवित्त में कवि ने बसंत ऋतु का वर्णन किया है। कवि ने वसंत को ‘ऋतुराज’ के रूप में प्रस्तुत करते हुए वसंत ऋतु की सभी दृश्यावलियों का चित्रण किया है। खिले हुए फूल, कोकिल की कूक, भौंरों की गुंजार, फूलों की मधुर गंध-यह सब रूपक अलंकार के माध्यम से प्रस्तुत हुआ है।

द्वितीय कवित्त में कवि ने ग्रीष्म ऋतु का श्लेष के माध्यम से वर्षा के रूप में वर्णन किया है। प्रत्येक पंक्ति का ग्रीष्म तथा वर्षा के पक्ष में अर्थ निकलता है।

तीसरे कवित्त में वर्षा ऋतु के श्रावण मास के दृश्य चित्रित हैं। चमकती बिजली, इन्द्रधनुष, श्याम घटा, कोयल-मोर का कलरव तथा चारों ओर बरसते जल का शब्द-चित्र अंकित हुआ है।

चौथा कवित्त शीत ऋतु को समर्पित है। इस छंद में कवि ने शीत को संसार पर आक्रमण करने वाले योद्धा का रूप प्रदान किया है। साथ ही शीत ऋतु के विविध दृश्यों को भी चित्रण हुआ है।

पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ

(1) बरन-बरन तरू फुले उपबन बन,
सोई चतुरंग संग दल लहियतु है।
बंदी जिमि बोलत बिरद बीर कोकिल हैं,
गुंजत मधुप गान गुन गहियतु हैं।
आवै आस-पास पुहूपन की सुबास सोई,
सोने के सुगंध माँझ सने रहियतु हैं।
सोभा क समाज, सेनापति सुख-साज, आज,
आवत बसंत रितुराज कहियतु है॥

शब्दार्थ-बरन-बरन = अलग-अलग रंगों के। तरू = वृक्ष। फूले = फूलों से भर गए। चतुरंग = सेना के चार अंग-हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक दल = सेना। लहियतु है = संग लिए है। बंदी = यशगान करने वाले। जिमि = जैसे, के समान। बिरद = यश। कोकिल = कोयल। मधुप = भौरे। गहियतु हैं = ग्रहण करते हैं। पुहूपन की = फूलों की। सुबास = सुगंध। माँझ = बीच में। रितुराज = सभी ऋतुओं का राजा, सबसे सुन्दर ऋतु।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत कवित्त छंद कवि सेनापति की रचना ‘कवित्त रत्नाकर’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘ऋतु वर्णन’ पाठ से लिया गया है। इस कवित्त में कवि ने वसंत ऋतु को ऋतराज बताते हुए उसके आगमन पर प्रकृति के विविध दृश्यों का वर्णन किया है।

व्याख्या-ऋतुओं के राजा वसंत आ रहे हैं। उनके साथ उनका सारा राज-समाज भी है। वसंत ऋतु आने पर वनों और उपवनों में विविध रंग-रूपों वाले वृक्ष फूलों से सज गए हैं। ये ही ऋतुओं के राजा वसंत के साथ आ रही चतुरंगिणी सेना है। कोयलों का कूकना ही राजा वसंत के गुणगायकों द्वारा उनके यश का वर्णन है। फूलों पर गुंजार कर रहे भौरे संगीतकारों का रूप ग्रहण किए हुए हैं। चारों ओर से फूलों की सुगंध आ रही है जो सोने में सुगंध होने की-दुगुना आनन्द होने की-कहावत सिद्ध कर रही है अथवा सरसों के सोने जैसे पीले फूलों के साथ सुगंध का छा जाना, सोने में सुगंध होने की बात प्रत्यक्ष कर रहा है। आज चारों ओर सुंदरता छाई हुई है। सभी प्राणी सुखी हो रहे हैं। यह सारा साज-बाज ऋतुराज वसंत के आगमन के उपलक्ष्य में हो रहा है।

विशेष-
(1) रचना साहित्यिक ब्रज भाषा में है। कवि भाषा के प्रभावशाली प्रयोग में निपुण है।
(2) शैली आलंकारिक, वर्णनात्मक तथा शब्द-चित्रांकनमयी है।
(3) ‘बरन बरन’ में पुनरुक्ति,’बोलत बिरद बीर’, ‘गान गुन गहियतु’ तथा ‘सुबास सोई, सोने के सुगंध’ में अनुप्रास अलंकार है। पूरे छंद में सांगरूपक अलंकार है।

(2) देखें छिति अंबर जलै है चारि ओर छोर,
तिन तरबर सब ही कौं रूप हर्यौ है।
महाझर लागै जोति भादव की होति चलै,
जलद पवन तन सेक मानों पर्यौ है।
दारून तरनि तरें नदी सुख पावें सब,।
सीरी घन छाँह चाहिबौई चित्त धर्यौ है।
देखौ चतुराई सेनापति कविताई की जू,
ग्रीषम विषम बरसा की सम कयौ है॥

शब्दार्थ-छिति = पृथ्वी। अंबर = आकाश। जलै हैं = जल अथवा जल रहे हैं। तिन = घास। तरबर = वृक्ष। हरयौ है। = हरे रंग का है अथवा हर लिया है, सुखा दिया है। झर = वर्षा की झड़ी। भादवे = भादों का महीना अथवा दावानल, जंगल की आग। जलद = तपती हुई वायु अथवा बादल और शीतल पवन। सेक = सुखदाई स्पर्श अथवा गर्म सैकाई। दारून = कष्टदायक अथवा काठ की। तरनि = नाव अथवा सूर्य। तरें = नीचे। सीरी = ठंडी। घन छाँह = बादलों की छाया। चाहिबौई = चाहना ही। ग्रीषम = गर्मी की ऋतु। विषम = भयानक। सम = समान।

सन्दर्भ तथा प्रसंग = प्रस्तुत छंद कवि सेनापति की रचना है। यह हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कवि सेनापति के छंदों से लिया गया है। इस छंद में कवि द्वारा भयंकर ग्रीष्म ऋतु को अपनी कल्पना और काव्य कौशल से वर्षा ऋतु का रूप दिया गया है।

व्याख्या-ग्रीष्म ऋतु के पक्ष में-भयंकर गर्मी के कारण धरती और आकाश चारों ओर दूर-दूर तक जलते हुए से दिखाई दे रहे हैं। भीषण ताप ने घास और वृक्षों सभी को झुलसाकर उनका रूप नष्ट कर दिया है। सूर्य की प्रचंड किरणों से शरीर को अग्नि का ताप पीड़ित कर रहा है। चारों ओर वन में लगी आग को-सा प्रकाश फैलता जा रहा है। तपती हुई वायु से शरीर की सेंकाई-सी हो रही है। भयंकर रूप से तप रहे सूर्य के नीचे लोग नदियों में ही सुख पा रहे हैं। बादलों की शीतल छाया, पानी ही सभी के मन को अच्छा लग रहा है। कवि सेनापति कहते हैं कि उनकी कविता रचने की चतुराई को सभी कविता प्रेमी देखें। उन्होंने भयंकर ग्रीष्म ऋतु को भी अपनी काव्य कुशलता से वर्षा ऋतु के समान बना दिया है।

(वर्षा ऋतु के पक्ष में) धरती और आकाश में वर्षा ऋतु आने के कारण चारों ओर दूर तक जल ही जल दिखाई दे रहा है। घास और वृक्ष सभी का रंग हरा हो गया है। वर्षा की भारी झड़ी लगी हुई है और भादों के मास में बिजली चमकने का प्रकाश होता चल रहा है। बादलों को छूकर आ रही शीतल पवन के स्पर्श से शरीर को बड़ा सुख मिल रहा है। सभी लोग काठ की नावों से नदियों को पार करके आनंदित हो रहे हैं। सभी बादलों की शीतल छाया में रहना चाह रहे हैं। कवि सेनापति अपनी कविता की बड़ाई करते हुए कह रहे हैं कि उन्होंने अपनी चतुराई से भीषण ग्रीष्म ऋतु को वर्षा ऋतु का रूप दे दिया है।

विशेष-
1. द्विअर्थक शब्दों के प्रयोग से भाषा पर कवि के पूर्ण अधिकार का प्रमाण मिल रहा है।
2. शैली चमत्कार प्रदर्शन वाली है।
3. श्लेष और सांगरूपक अलंकारों का प्रयोग है।
4. श्लेष अलंकार के प्रयोग से कवि ने अपनी प्रसिद्ध प्रवीणता का परिचय कराया है।

(3) दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम।
घटा की झमक अति घोर घनघोर तें। कोकिला,
कलापी कल कूजत हैं जित-तित,
सीकर ते सीतल समीर की झकोर हैं।
सेनापति आवन कयो है मनभावन सु।
लाग्यौ तरसावन विरह-जुर जोर हैं।
आयौ सखी सावन मदन सरसावन,
लग्यौ है बरसावन सलिल चहुँ और तें॥

शब्दार्थ-दामिनी = बादलों में चमकने वाली बिजली। सुरचाप = इन्द्रधनुष। स्याम = काली। झमक = मंद-मंद बरसती बूंदों की ध्वनि, झमझम शब्द। घोर = भयंकर, अत्यधिक। घनघोर = बादल का गर्जन। कलापी = मोर। कल = मंद, मधुर। कूजत = कूकता, बोलते हैं। जित-तित = इधर-उधर। सीकर = जल की बूंदें। समीर = वायु। झकोर = झकोरा, झोंका। मनभावन = मन को प्रिय लगने वाले (श्रीकृष्ण)। तरसावन = व्याकुल करना। बिरह-जुर = वियोगरूपी ज्वर, विरह-वेदना। मदन = कामदेव, मिलन की इच्छा। सरसावन = उत्पन्न करने वाला। सलिल = जल।।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत छंद हमारी पाठ्य पुस्तक में कवि सेनापति की ‘कवित्त रत्नाकर’ नामक रचना से संकलित ‘ऋतु वर्णन’ काव्यांश से लिया गया है। इस कवित्त में वर्षा ऋतु के सावन के मास के आने पर दिखाई देने वाले दृश्यों का एक नारी अपनी सखी से वर्णन कर रही है और अपने मन की दशा बता रही है।

व्याख्या-देखो सखि! श्रावण मास आने पर बादलों में बिजली चमकने लगी है। आकाश में विविध रंगों वाला इन्द्रधनुष भी अपनी छटा बिखेर रहा है। काली घटा से बरसती मन्द-मन्द बूंदों की ध्वनि सुनाई दे रही है और घने बादल डराने वाला गर्जन कर रहे हैं। कोयल और मोर मन्द और मधुर स्वर में जहाँ-तहाँ बोल रहे हैं। वर्षा की बूंदों से शीतल पवन के झोंके
आ रहे हैं। मेरे प्रिय ने मुझे आने का संदेश दिया है। अब तो उनसे मिलने के लिए मेरा वियोगी हृदय तरस रहा है। हे सखि ! देखो मिलन की इच्छा जगाने वाला सावन का महीना आ गया है और चारों ओर जल बरस रहा है।

विशेष-
1. भाषा ध्वनि-सौन्दर्य से गमक रही है। दमक, चमक, झमक कानों को गुंजित कर रहे हैं।
2. वर्षा के दृश्यों का सुखद संयोजन किया गया है।
3. प्रकृति को मनोभावों को उत्तेजित करने में प्रयोग हुआ है।
4. ‘कोकिला, कलापी कल कूजत’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है। ‘विरह-जुर’ में रूपक अलंकार है।
5. वियोग शृंगार रस की झलक दिखाई दे रही है।

(4) सीत कौ प्रबल सेनापति कोपि चढ्यौ दल,
निबल अनल, गयौ सूरि सियराइ है।
हिम के समीर, तेई बरसैं विषम तीर,
रही है गरम भौन कोनन मैं जाइ है।
धूम नैन बहैं, लोग आगि पर गिरे हैं,
हिए सौं लगाइ रहैं नैंक सुलगाई है।
मानौ भीत जानि महा सीत तें पसारि पानि,
छतियाँ की छाँह राख्यौ पाउक छिपाई कै॥

शब्दार्थ-सीत = ठण्ड, शीत ऋतु। कोपि = क्रोध करके। चढ्यौ = चढ़ाई कर दी है, आक्रमण कर दिया है। दल = सेना। निबल = निर्बल, प्रभावहीन। अनल = अग्नि। सूरि = सूर्य। सियराइ = ठण्डा हो जाना। हिम = बर्फ, घोर ठण्ड। गरम = गरमी, ताप। भौन = भवन, घर। कौनन = कोनों में। धूम = धुआँ। नैन बहैं = आँसू बह रहे हैं। हिए = हृदय। भीत = डरा हुआ। पसारि = फैलाकर। पानि = हाथ। छतियाँ की छाँह = छाती की ओट में। पाउक = आग।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत छंद हमारी पाठ्यपुस्तक में ‘ऋतुवर्णन’ शीर्षक के अन्तर्गत संकलित कवि सेनापति के कवित्तों से लिया गया है। इस छन्द में कवि ने शीत को एक आक्रमणकारी के रूप में चित्रित किया है।

व्याख्या-कवि सेनापति कहते हैं कि शीत ऋतु की शक्तिशाली सेना ने जग-जीवन पर क्रोधित होकर चढ़ाई कर दी है। इसके कारण अग्नि शक्तिहीन हो गई है और सूर्य ठण्डा पड़ गया है। इन दोनों का प्रभाव लोगों की शीत से रक्षा नहीं कर पा रहा है। बर्फ जैसी ठण्डी पवन ही शीत की सेना द्वारा बरसाए जा रहे भयंकर तीरों के समान है। शीत के भय से बेचारी गर्मी घरों के कोनों में जा छिपी है। आग तापने वाले लोगों की आँखों से धुंए के कारण जल बह रहा है। लोग ठण्ड से बचने के लिए आग पर झुके जा रहे हैं। आग के तनिक-सा सुलगते ही लोग उसे तापने लगते हैं। इस दृश्य को देखकर ऐसा लग रहा है मानो आग को शीत से भयभीत जानकर लोगों ने उसे प्रचण्ड ठण्ड से बचाने के लिए हाथ फैलाकर अपने छातियों की छाया में छिपा लिया है।

विशेष-
1. साहित्यिक और समर्थ ब्रज भाषा का प्रयोग हुआ है।
2. शैली शब्द चित्रात्मक है। कवि ने सटीक शब्दों का चयन करके शीतकालीन दृश्यों को साकार कर दिया है।
3. भयानक रस की झलक है।
4. ‘सूरि सियराइ’, ‘बरसैं, बिषम’, ‘पसारि पानि’, आदि में अनुप्रास अलंकार है। सम्पूर्ण छंद में सांगरूपक का निर्वाह किया गया है। “मानो भीत जानि …………………………. छिपाइ कै” में उत्प्रेक्षा अलंकार है।