Rajasthan Board RBSE Class 12 English Prudence Non-Fiction Chapter 3 The Argumentative Indian

RBSE Class 12 English Prudence Non-Fiction Chapter 3 Textual Questions

Question 1.
How many times is the ‘Mahabharata’ longer than the ‘lliad’ and ‘Odyssey’ put together?
(a) 5
(b) 9
(c) 7
(d) 2
Answer:
(c) 7

Question 2.
Who translated the ‘Gita’ into English?
(a) Max Muller
(b) Amartya Sen
(c) T.S. Eliot
(d) Christopher Isherwood
Answer:
(d) Christopher Isherwood

Answer the following questions in 15-20 words each :
निम्न प्रत्येक प्रश्न का उत्तर 15-20 शब्दों में दीजिए :

Question 1.
Who was Krishna Menon and how long did he deliver his speech at the UN?
कृष्णा मेनन कौन थे तथा उन्होंने UN में कितने समय तक अपना भाषण दिया ?
Answer:
Krishna Menon was the leader of the Indian delegation to the UN and his speech lasted nine hours uninterrupted.
कृष्णा मेनन UN गए शिष्ट-मंडल का नेतृत्व कर रहे थे तथा उनका भाषण अविरत नौ घंटों तक चला।

Question 2.
Name the foreign commentators who endorsed Krishna’s moral position.
उन विदेशी टिप्पणीकारों के नाम बंताएँ जिन्होंने कृष्ण की नैतिक अवस्थिति का समर्थन किया ?
Answer:
The foreign commentators who endorsed Krishna’s moral position were C. Isherwood, T.S. Eliot and Wilhelm von Humboldt.
जिन विदेशी टिप्पणीकारों ने कृष्ण की नैतिक अवस्थिति का समर्थन किया था उनके नाम C. Isherwood, T.S. Eliot एवं Wilhelm von Humboldt थे।

Question 3.
Can we achieve immortality through wealth, according to Yajnavalkya ?
याज्ञवल्क्य के अनुसार क्या हम धन द्वारा अमरता प्राप्त कर सकते हैं ?
Answer:
No, according to Yajnavalkya one cannot achieve immortality through wealth.
नहीं, याज्ञवल्क्य के अनुसार कोई धन द्वारा अमरता प्राप्त नहीं कर सकता है।

Answer the following questions in 50 words each :
निम्न प्रत्येक प्रश्न का उत्तर 50 शब्दों में दीजिए :

Question 1.
Discuss the topic of debate between Arjuna and Krishna in the Bhagwad Gita.
भागवत गीता में अर्जुन एवं कृष्ण के मध्य वाद-विवाद के शीर्षक की विवेचना कीजिए।
Answer:
Krishna and Arjuna take two contrary position in their debate in the Gita. Krishna emphase sizes doing one’s duty and urges Arjuna to fight the battle, irrespective of consequences. While Arjuna focuses on avoiding bad consequences, even if these happen while doing one’s duty to promote adjust cause which was fighting the battle.

गीता में कृष्ण एवं अर्जुन अपने वाद-विवाद में दो विरोधी बातें कहते हैं। कृष्ण कर्त्तव्य पालन पर बल देते हैं व अर्जुन को युद्ध हेतु प्रेरित करते हैं चाहे इसके कुछ भी परिणाम हों। जबकि अर्जुन बुरे परिणामों से बचने पर ध्यान देते हैं, चाहे वे एक उचित कारण (ध्येय) हेतु किए अपने कर्तव्यपालन से ही क्यों न हो-यहाँ यह युद्ध लड़ना था।

Question 2.
In which poem does T.S. Eliot summarize Krishna’s views and how ?
किस कविता में T.S. Eliot कृष्ण के विचारों का संक्षिप्तीकरण करते हैं और कैसे ?
Answer:
T.S. Eliot summaries Krishna’s views in his poem ‘Four Quartets’ in form of an admonishment : “And do not think of the fruit of action! Fare forward”. He explains: ‘Not fare well/But fare forward, voyagers’. The emphasis here is on performing our duty, even if its results are bad.

T.S. Eliot कृष्ण के विचारों को अपनी कविता ‘Four Quartets’ में एक डाँट-भरे परामर्श द्वारा सारगर्भित करते हैं और कर्म के फल पर विचार मत करो। आगे बढ़ो !’ वे समझाते हैं : ‘अच्छा मत करो, कर्म कर आगे बढ़ो।’ यहाँ पर जोर कर्तव्यपालन पर है, चाहे इसका परिणाम बुरा ही क्यों न हो।

Question 3.
Discuss the role of women in political leadership and intellectual pursuits in India.
भारत में राजनैतिक नेतृत्व एवं बौद्धिक दौड़ में स्त्रियों की भूमिका की चर्चा कीजिए।
Answer:
The participation of women in political leadership and intellectual pursuits has been considerable in India. Many dominant political parties, both national and regional, are currently led by women -as has been in the past. Some of the most celebrated dialogues have involved women.

राजनैतिक नेतृत्व व बौद्धिक दौड़ में भारत में स्त्रियों की भागीदारी वर्णनीय रही है। अनेक महत्त्वपूर्ण राजनितिक दलों, दोनों ही राष्ट्रीय व प्रांतीय स्तर पर, की वर्तमान में नेता स्त्रियाँ हैं जैसा कि अतीत में थीं। कुछ सर्वाधिक प्रसिद्ध संवादों में स्त्रियाँ शामिल रहीं हैं।

Answer the following questions in about 100 words each :
निम्न प्रत्येक प्रश्न का उत्तर 100 शब्दों में दीजिए :

Question 1.
Do you agree that ‘fare forward’ is better than ‘fare well’? Give your views.
क्या आप इस बात से सहमत हैं कि ‘fare well’ की अपेक्षा ‘fare forward’ अधिक अच्छा है। अपने विचार लिखिए।
Answer:
In the timeless epic, the Mahabharata, while Krishna exalts performance of one’s duties, irrespective of its consequences, Arjuna is more concerned about the consequences. To my mind ‘fare well should be of more substance than ‘fare forward’. The concept of duty for a just cause is quite ambiguous. What is just for one, could well be unjust for another! If a just cause entails terrible consequences, the very cause should be questioned. On the other hand, if an action foresees benevolent results, its cause must certainly be good and just. So farewell’ should be better than ‘fare forward’ particularly in present day context.

कालजयी महाकाव्य ‘महाभारत में, जहाँ कृष्ण परिणामों की परवाह न कर, अपना कर्तव्य पालन करने की महिमा बताते हैं, वहीं अर्जुन परिणामों के विषय में अधिक चिंतित हैं। मेरे विचार में, ‘अच्छा करने हेतु आगे बढ़ो’, ‘कर्तव्य पालन कर आगे बढ़ो’ से अधिक महत्त्वपूर्ण है। न्यायोचित कारण हेतु कर्त्तव्यपालन करने की सोच काफी अस्पष्ट है। जो एक के लिए उचित है, वह अन्य के लिए अनुचित हो सकता है। यदि किसी उचित कारण हेतु किए कार्य के भयानक परिणाम होते हैं, तो उस कारण पर प्रश्न उठने चाहिए। दूसरी ओर, यदि किसी कार्य के अच्छे व सर्व-हिताय’ परिणाम परिलक्षित हैं तो उसका कारण निश्चय ही न्यायोचित एवं अच्छा होगा। अतः ‘अच्छा करने हेतु आगे बढ़ो’, ‘कर्तव्यपालन हेतु आगे बढ़ो’ से श्रेष्ठ होना चाहिए – विशेष रूप से वर्तमान के संदर्भ में।

Question 2.
Socially disadvantaged groups or classes voiced against the Brahmanical orthodoxy in ancient India. Give arguments citing examples from Buddhism and Jainism.
सामाजिक रूप से वंचित समूहों या वर्गों ने प्राचीन भारत में रूढ़िवादी ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज उठाई। बौध व जैन धर्म से उदाहरण लेकर तर्क दें।
Answer:
The challenge to religious orthodoxy has often come from representatives of socially advantaged groups, even if these were relatively affluent merchants and craftsmen. This visceral unrest defined the rapid spread of Buddhism in ancient India. Buddhist tenets and practices put down the supremacy of the Brahmin priestly class, as did Jainism. This long suppressed anger against Brahminism and its suffocating superiority founded many a rebellious movements. Considerable sections of early Buddhist and Jain literatures contain detailed explanations of such protest and resistance.

धार्मिक रूढ़िवाद को चुनौती, बहुधा सामाजिक रूप से वंचित समूहों द्वारा दी गई है, यद्यपि यह व्यापारियों व शिल्पकारों के समूह क्यों न हों – जो तुलनात्मक रूप से धनाढ्य् थे। इसी गहन असंतोष ने प्राचीन भारत में बौध-धर्म के त्वरित प्रसार को परिभाषित किया। बौध व जैन धर्म के सिद्धांतों व आचरणों ने ब्राह्मण पुरोहित वर्ग की श्रेष्ठता को नकारा। ब्राह्मणवाद व उसकी दमघोटू श्रेष्ठता के प्रति इसी बहुत समय से दबाएँ क्रोध ने अनेक क्रान्तिकारी आंदोलनों का सृजन किया। प्रारंभिक बौध व जैन साहित्य के बहुत से प्रभागों में ऐसे विरोध व प्रतिरोध की विस्तृत व्याख्याएँ हैं।

Question 3.
What is the importance of public debate and intellectual pluralism in the Indian tradition ?
भारतीय परम्परा में सार्वजनिक वाद-विवाद एवं बौद्धिक विविधता का क्या महत्त्व है ?
Answer:
In fact, the very deeply-ingrained features of public debate and intellectual pluralism in the Indian tradition have shaped the character of Indian, and to an extent, oriental school of thought which has in turn produced the most ancient civilisation in the world. Be it the epic ‘Mahabharata’, where the contrasting arguments of Krishna and Arjuna create the most exhaustive discourse in human history; or the highly intellectual battles of thoughts and concepts between numerous interlocutors in the spiritual, political and religious realms – each one of these are jewels in philosophical endeavour, as well as in the practice of day-to-day human existence.

वास्तव में भारतीय परंपरा में गहन रूप से जड़ित सार्वजनिक तर्क-वितर्क एवं बौद्धिक विविधता की विशेषताओं ने भारतीय विचारधारा, व कुछ सीमा तक पूर्वी विचारधारा को आकार दिया है – जिसने विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता को जन्म दिया। चाहे वह महाकाव्य ‘महाभारत’ हो, जहाँ कृष्ण व अर्जुन के विरोधाभासी तर्क हों जो मानव इतिहास में सबसे विस्तृत व्याख्यान है; या फिर विचारों और मुद्दों का अनेक वार्ताकारों के मध्य आध्यात्मिक, राजनीतिक व धार्मिक क्षेत्रों में श्रेष्ठ बौद्धिक शास्त्रार्थ हों – प्रत्येक दार्शनिक प्रयत्न तथा मानव-जीवन की दैनिक आचरण-शैली का रत्न है।

Question 4.
The essay discusses India’s history and identity. Explain.
यह निबंध भारत के इतिहास एवं परिचय की चर्चा करता है। व्याख्या करें।
Answer:
The essay touches on the history of India, right from the down of human civilization, to the present. It speaks about the ‘Mahabharata’, and the Vedic Age with its caste differentiation. It traces the origin and spread of Buddhism and Jainism – among the oldest religions of the world. It moves on to the Bhakti Movement in the Middle Age and finally discusses modern India and its socio-political features. In doing so, the essay also defines India’s identity, its character, its uniqueness, its age-old and yet evolving philosophy and its message to all humanity. The essay thus, reveals the very soul of India.

यह निबन्ध मानव-सभ्यता के उदय से लेकर, भारतीय इतिहास के वर्तमान को वर्णित करता है। यह ‘महाभारत’ एवं वैदिक युग व उसकी वर्ण-व्यवस्था, की बात करता है। यह विश्व के प्राचीनतम धर्मों में मान्य बौध व जैन धर्म की उत्पत्ति व विस्तार को चिन्हित करता है। यह निबन्ध मध्यकालीन भक्ति आंदोलन’ की ओर बढ़ता है वे अंततः आधुनिक भारत व उसकी सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं की चर्चा करता है। ऐसा करते हुए यह निबन्ध भारत की पहचान, उसका चरित्र, उसकी अनुपमता, उसकी युगों-पुरानी, तद्यापि सततः विकसित होती दार्शनिक सोच एवं मानव जाति के लिए उसके संदेश को परिभाषित करता है। इस प्रकार, यह निबन्ध भारत की आत्मा को उजागर करता है।

RBSE Class 12 English Prudence Non-Fiction Chapter 3 Additional Questions

RBSE Class 12 English Prudence Non-Fiction Chapter 3 Short Answer Type Questions

Answer the following questions in about 50 words each:
निम्न प्रत्येक प्रश्न का उत्तर 50 शब्दों में लिखिए :

Question 1.
What are the three major issues Sen discusses here in relation to India’s dialogic
tradition? भारत में संवाद की परम्परा के सम्बन्ध में यहाँ सेन किन तीन बड़े मुद्दों पर चर्चा करते हैं ?
Answer:
These three issues are :

  1. The tradition of dialogue has remained in India since ancient time and is still relevent for her democracy.
  2. In spite of the tradition of dialogue remaining a male domain, India has witnessed great women debators in all the fields.
  3. People of all castes and classes have participated in dialogue.

ये तीन मुद्दे हैं :

  1. भारत में संवाद की परम्परा प्राचीन काल से रही है और उसके प्रजातन्त्र के लिए अब भी प्रासंगिक है।
  2. भारत में संवाद की परम्परा में पुरुषों का प्रभुत्व रहने के बावजूद सभी. क्षेत्रों में महान महिला वाद-विवाद करने वाली रही हैं।
  3. सभी जातियों व वर्गों के लोगों ने संवाद में भाग लिया है।

Question 2.
Sen has sought here to dispel some misconceptions about democracy in India. What are these misconceptions ? (S.S. Exam 2015)
यहाँ सेन ने भारत में प्रजातन्त्र के बारे में कुछ गलत अवधारणाओं को दूर करने का प्रयास किया है। ये गलत अवधारणाएँ क्या हैं ?
Answer:
Sen tries to dispel the following two misconceptions about democracy in India :

  1. Here, democracy is taken to be just a gift of the Western world that India simply accepted when it became independent.
  2. It is assumed that there is something unique in Indian history that makes the country singularly suited to democracy.

सेन भारत में प्रजातन्त्र के बारे में निम्नलिखित दो गलत अवधारणाओं को दूर करने का प्रयास करते हैं :

  1. यहाँ प्रजातन्त्र को मात्र पश्चिमी संसार का एक उपहार समझा जाता है जिसे भारत ने स्वतन्त्र होने पर | सीधे तौर पर स्वीकार कर लिया।
  2. यह माना जाता है कि भारत के इतिहास में ऐसी कोई अनोखी बात है कि मात्र प्रजातंत्र ही इस देश के लिए उपयुक्त है।

Question 3.
How, according to Sen, has the tradition of public discussion and interactive reasoning helped the success of democracy in India ?
सेन के अनुसार सार्वजनिक बहस व अन्त:क्रिया पर आधारित तर्क-वितर्क की परम्परा ने भारत में प्रजातंत्र की सफलता में किस प्रकार सहायता की है ?
Answer:
Democracy is intimately connected with public discussion and interactive reasoning. India has since ancient times had a tradition of public discussion and reasoning based on interaction. Great debates have occurred in the history of India. It is public opinion which strengthens a democracy, and public opinion is formed only through debate and reasoning.

प्रजातंत्र का सार्वजनिक बहस का अन्त:क्रिया पर आधारित तर्क-वितर्क से घनिष्ठ सम्बन्ध है। भारत में प्राचीन समय से ही सार्वजनिक बहस व अन्तःक्रिया पर आधारित तर्क-वितर्क की परम्परा रही है। भारत के इतिहास में बड़े-बड़े शास्त्रार्थ हुए हैं। यह सार्वजनिक राय ही है जो किसी प्रजातंत्र को सदृढ़ करती है, एवं सार्वजनिक राये केवल बहस तथा तर्क-वितर्क से बनती है।

Question 4.
Does Amartya Sen see argumentation as a positive or a negative value ?
अमर्त्य सेन तर्क-वितर्क को सकारात्मक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मानते हैं या नकारात्मक दृष्टि से ?
Answer:
Amartya Sen has described argumentation as a prominent feature of India’s social life since ancient times. He describes that it has helped bringing out issues of great moral and practical value. It being closely related with democracy, has helped democracy succeed in India. Thus, Sen sees argumentation as a positive value.

अमर्त्य सेन ने तर्क-वितर्क का प्राचीन समय से ही भारत के सामाजिक जीवन की एक मुख्य विशेषता के रूप में वर्णन किया है। वह वर्णन करते हैं कि इसने महान नैतिक व व्यावहारिक महत्व के मुद्दों को प्रकाश में लाने में सहायता की है। चूँकि इसका प्रजातन्त्र से घनिष्ठ सम्बन्ध है, अतः इसने भारत में प्रजातंत्र की सफलता में सहायता की है। इस प्रकार सेन तर्क-वितर्क को सकारात्मक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मानते हैं।

Question 5.
How is the message of the Gita generally understood and portrayed ? What change in ‘ this interpretation does Sen suggest?
गीता के संदेश को सामान्यतः किस रूप में समझा व चित्रित किया जाता है ? सेन इस व्याख्या में किस परिवर्तन की सलाह देते हैं ?
Answer:
People generally believe and try to follow the preaching of Krishna that one should do one’s duty for a just cause without caring for the consequences. Sen suggests that apart from following Krishna’s message, Arjuna’s contrary arguments regarding the thought of avoiding bad consequences even if due to actions for a just cause, should also be taken into notice.

लोग सामान्यतः कृष्ण के उपदेश में विश्वास करते हैं और उसका अनुसरण करने का प्रयास करते हैं कि व्यक्ति को परिणाम की चिन्ता किये बिना न्यायोचित ध्येय हेतु अपना कर्तव्य करना चाहिए। सेन सलाह देते हैं कि कृष्ण के सन्देश का अनुसरण करने के साथ ही अर्जुन के बुरे परिणाम चाहे वे न्यायोचित ध्येय हेतु किए कर्म से उत्पन्न हों, उनसे बचने के विचार सम्बन्धी विरोधी तर्कों पर भी ध्यान देना चाहिए।

Question 6.
This essay is an example of argumentative writing. Supporting statements with evidence is a feature of this kind of writing. For each of the statements given below state the supportive evidence provided in the essay.
यह निबन्ध तर्कशील लेखन का एक उदाहरण है। कथनों की साक्ष्य से पुष्टि करना इस प्रकार के लेखन की एक विशेषता है। नीचे दिये गये प्रत्येक कथन के लिए निबन्ध में उपलब्ध उसकी पुष्टि करने वाला साक्ष्य बताइये।
(i) Prolicity is not alien to India.
लम्बे व उबाऊ भाषण भारत के लिए नये नहीं हैं।
Answer:
Krishna Menon was India’s Defence Minister from 1957 to 1962. He led the Indian delegation to the United Nations, and on 23 January, 1957 delivered an unprecedented 9 hour speech defending India’s stand on Kashmir.

कृष्णा मेनन 1957 से 1962 तक भारत के रक्षा मन्त्री थे। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र गये भारत के प्रतिनिधिमण्डल का नेतृत्व किया था, और 23 जनवरी, 1957 को उन्होंने भारत के कश्मीर सम्बन्धी पक्ष के बचाव में एक अभूतपूर्व नौ घण्टे को भाषण दिया था।

(ii) The arguments are also, often enough, substantive.
अधिकतर तर्क ठोस भी होते हैं।
Answer:
The famous Bhagwad Gita, which is one small section of the Mahabharata, presents a tussle between two contrary moral positions Krishna’s emphasis on doing one’s duty, on one side, and Arjuna’s focus on avoiding bad consequences (and generating good ones), on the other.

प्रसिद्ध भगवद्गीता, जो महाभारत का एक छोटा-सा अंश है, दो परस्पर विरोधी नैतिक पक्षों के बीच संघर्ष को प्रस्तुत करती है – एक ओर, कृष्ण का अपने कर्तव्य को करने पर जोर, और दूसरी ओर, अर्जुन को बुरे परिणामों से बचने (और अच्छे परिणाम उत्पन्न करने) पर ध्यान।

Question 7.
What doubts did Arjuna raise on the eve of the war of the Mahabharata?
महाभारत के युद्ध के अवसर पर अर्जुन ने क्या संशय उठाये ?
Answer:
On the eve of the war of the Mahabharata, when Arjuna saw the two armies getting ready for battle, he raised profound doubts about the correctness of his action. He was worried about the bad consequences of the battle. He was sad to think that his action of fighting the battle would bring about great slaughter and misery to his own kin.

महाभारत के युद्ध के अवसर पर जब अर्जुन ने दोनों सेनाओं को युद्ध के लिए तैयार होते हुए देखा तो उसने अपने कार्य के औचित्य पर गहरे संशय व्यक्त किये। वह युद्ध के दुष्परिणाम के विषय में सोचकर चिन्तित था। वह यह सोचकर दुखी था कि उसके युद्ध करने से उसके अपने सम्बन्धियों के वध होंगे व उनके लिए दु:ख उत्पन्न होगा।

Question 8.
What question did Arjuna raise about doing one’s duty?
अर्जुन ने व्यक्ति के कर्तव्य के बारे में क्या प्रश्न उठाया ?
Answer:
Arjuna was deeply pained to think that performance of his duty to fight would cause a great carnage. He questioned whether it was right to be concerned only with one’s own duty to promote a just cause or was it right to be indifferent to the misery and the slaughter even of one’s kin.

अर्जुन यह सोचकर अत्यधिक दुखी था कि उसके अपना कर्तव्य निभाने से महान नरसंहार होगा। उसने प्रश्न उठाया कि क्या यह सही है कि मात्र धर्म का साथ देने के अपने कर्तव्य की परवाह की जाये, या कि अपने सम्बन्धियों तक के दु:ख व वध के प्रति उदासीन होना सही है।

Question 9.
What arguments does Krishna give in favour of Arjuna’s fighting?
कृष्ण, अर्जुन के युद्ध करने के पक्ष में क्या तर्क देते हैं ?
Or
How does Krishna try to convince Arjuna to fight?
कृष्ण अर्जुन को युद्ध करने के लिए आश्वस्त करने का प्रयास किस प्रकार करते हैं ?
Answer:
Krishna argues that Arjuna must do his duty. He insists on Arjuna’s duty to fight, without caring for its consequences. He tells that it is a just cause, and, as a warrior and a general on whom his side must rely, Arjuna cannot waver from his obligations, no matter what the consequences be.

कृष्ण तर्क देते हैं कि अर्जुन को अपना कर्तव्य अवश्य करना चाहिए। वह परिणाम की परवाह किये बिना अर्जुन के उसके युद्ध करने के कर्तव्य को करने का आग्रह करते हैं। वह कहते हैं। कि यह एक औचित्यपूर्ण उद्देश्य है, और एक योद्धा व सेनापति के रूप में, जिस पर उसका पक्ष निर्भर है, अर्जुन अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हो सकता है, भले ही परिणाम कुछ भी हो।

Question 10.
Write a dialogue which took place between Yajnavalkya and Maitreyi about immortality.
अमरता के विषय में याज्ञवल्क्य व मैत्रेयी के मध्य हुए संवाद को लिखिए। (S.S. Exam 2014)
Answer:
Yajnavalkya and Maitreyi were discussing the importance of wealth. Maitreyi asks Yajnavalkya whether it could be possible that if the whole earth, full of wealth belongs to her, she could achieve immortality. Yajnavalkya replies, “No”. Maitreyi remarks, “What should I do with money by which I do not become immortal ?”

याज्ञवलक्य व मैत्रेयी धन के महत्त्व पर चर्चा कर रहे थे। मैत्रेयी याज्ञवल्क्य से पूछती है कि यदि संपूर्ण पृथ्वी का धन उसका हो जाये तो क्या वह इसके द्वारा अमरता प्राप्त कर सकती है। याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं ‘नहीं”। मैत्रेयी टिप्पणी करती है- “मैं धन का क्या करूंगी यदि इसके द्वारा मैं अमर नहीं हो सकती?”

Question 11.
Describe women’s role in India’s argumentative tradition.
भारत की तर्क करने की परम्परा में महिलाओं की भूमिका का वर्णन कीजिए।
Answer:
Many women in India have participated prominently in the country’s argumentative tradition. Many of the dominant political parties in India national as well as regional are currently led by women and have been so led in the past. In ancient India, Gargi and Maitreyi were the two prominent names that took part in arguing combats.

भारत में बहुत-सी महिलाओं ने इस देश की तर्क करने की परम्परा में प्रमुख रूप से भाग लिया है। वर्तमान में भारत में बहुत से प्रभावशाली राजनीतिक दलों – राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दोनों – की नेता महिलाएँ हैं और अतीत में भी रही हैं। प्राचीन भारत में, गार्गी और मैत्रेयी दो प्रमुख नाम थे जिन्होंने शास्त्रार्थों में भाग लिया।

Question 12.
‘The use of argumentative encounters has frequently crossed the barriers of class and caste.’ Explain.
‘तर्क युद्धों के प्रयोग ने बहुधा वर्ग व जाति के अवरोधों को पार किया है।’ व्याख्या कीजिए।
Answer:
The history of our country shows that the use of argumentative encounters has frequently crossed the barriers of class and caste. The challenge to religious orthodoxy has often come from spokesmen of socially disadvantaged groups. The Brahmin-dominated orthodoxy met argumentative revolution from all the deprived classes and castes.

भारत का इतिहास दर्शाता है कि तर्कयुद्धों के प्रयोग ने बहुधा वर्ग व जाति के अवरोधों को पार किया है। धार्मिक रूढ़िवादिता को चुनौती प्रायः सामाजिक वंचन के शिकार समूहों के प्रवक्ताओं की ओर से मिली है। सभी वंचित वर्गों व जातियों ने ब्राह्मणों के प्रभुत्व वाली रूढ़िवादिता के विरुद्ध तर्कशील विद्रोह किया।

Question 13.
How did India choose to be a democratic country?
भारत ने अपने लिए प्रजातंत्र किस प्रकार चुना ?
Answer:
India has had a tradition of public reasoning and argumentative heterodoxy which is closely connected with democracy. Besides using this tradition, India used what it had learned from the institutional experiences in Europe and America (particularly Great Britain). Thus, on the basis of both of these, India chose to be a democratic country.

भारत में सार्वजनिक बहस व तर्कशील अरूढ़िवादिता की परम्परा रही है जो प्रजातंत्र से अन्तः सम्बन्धित है। इस परम्परा को उपयोग करने के अलावा भारत ने यूरोप व अमेरिका (विशेष रूप से ग्रेट ब्रिटेन) में संस्थागत अनुभवों से जो सीखा था, उसका भी उपयोग किया। इस प्रकार इन दोनों के आधार पर भारत ने अपने लिए प्रजातंत्र चुना।

RBSE Class 12 English Prudence Non-Fiction Chapter 3 Long Answer Type Questions

Answer the following questions in about 100 words :
निम्न प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 100 शब्दों में दीजिए :

Question 1.
Arjuna says: ‘How can good come from killing so many people?’ Explain this in terms of the present day world.
अर्जुन कहता है : ‘इतने सारे लोगों को मारकर भला कैसे हो सकता है ?’ वर्तमान विश्व के संदर्भ में इसकी व्याख्या कीजिए।
Answer:
This argument of Arjuna is worth deep contemplation. The case for doing what one sees as one’s duty must be strong, but how can we be indifferent to the consequences that may follow from our doing just our duty? As we think about the visible problems of our global world – terrorism, wars, violence, epidemics, insecurity, poverty etc., it becomes important to think about Arjuna’s arguments that while doing one’s duty, one must think of avoiding bad consequences. It could well be the duty of a certain group to wage war for religious or territorial objectives, but are the terrible consequences of killing of innocent people acceptable?

अर्जुन का यह तर्क गहन चिन्तन के योग्य है। भले ही व्यक्ति जिसे अपना कर्तव्य समझता है उसका पक्ष मजबूत हो, परन्तु हम उस परिणाम के प्रति उदासीन कैसे हो सकते हैं जो हमारे उस कार्य से हो सकता है। जिसे हम मात्र अपना कर्तव्य समझते हैं ? जब हम अपने वैश्विक संसार की स्पष्ट समस्याओं, जैसे कि आतंकवाद, युद्ध, हिंसा, महामारियों, असुरक्षा, गरीबी इत्यादि पर विचार करते हैं तो व्यक्ति के अपने कर्तव्य निर्वाह हेतु अर्जुन के तर्कों के बारे में विचार करना महत्त्वपूर्ण हो जाता है। हमें बुरे परिणाम से बचने के लिए अर्जुन की चिन्ता के बारे में भी सोचना चाहिए। यह हो सकता है कि किसी समूह का कर्तव्य धार्मिक अथवा क्षेत्रीय ध्येय हेतु युद्ध करना हो, किन्तु क्या निरपराध लोगों की हत्या का भयानक परिणाम इसके लिए स्वीकार्य होगी ?

Question 2.
Find arguments from the essay against the prevalance of the caste system.
इस निबन्ध में से जातिप्रथा के प्रचलन के विरोध में प्रयुक्त तर्को को ढूंढिये।
Answer:
The arguments given in the Mahabharata by Bharadvaja are some arguments against the prevalance of the caste system. These are :

  • If different colours indicate different castes, then all castes are mixed castes.
  • We all seem to be affected by desire, anger, fear, sorrow, worry, hunger, and labour; how do we have caste differences then? The argument given in the Bhavisya Purana:
  • Since members of all the four castes are children of God, they all belong to the same caste. All human beings have the same father, and the children of the same father cannot belong to different castes. These arguments prove the prevalance of the caste system to be quite baseless and give the message that it should be uprooted.

महाभारत में भारद्वाज द्वारा दिये गये तर्क जातिप्रथा के प्रचलन के विरोध में दिये गये तर्क हैं। ये इस प्रकार

  • यदि अलग-अलग रंग अलग-अलग जातियों के सूचक हैं तो सभी जातियाँ मिश्रित जातियाँ हैं।
  • हम सभी इच्छा, क्रोध, भय, दु:ख, चिन्ता, भूख और परिश्रम (थकान) से प्रभावित लगते हैं, फिर हममें जातिगत भेद कैसे हैं ? भविष्य पुराण में दिया गया तर्क है :
  • चूँकि सभी चारों जातियों के लोग ईश्वर की सन्तान हैं, अतः वे सब एक ही जाति के हैं। सभी मनुष्यों का पिता एक ही है, और एक ही पिता की सन्तानों की अलग-अलग जातियाँ नहीं हो सकती हैं। ये तर्क जातिप्रथा के प्रचलन को बिल्कुल आधारहीन सिद्ध करते हैं और यह संदेश देते हैं कि इस प्रथा को जड़ से समाप्त कर दिया जाना चाहिए।

Question 3.
Sen quotes Eliot’s lines : ‘Not fare well/But fare forward voyagers’. Distinguish between ‘faring forward’ (Krishna’s position in the Gita) and ‘faring well’ (the position that Sen advocates].
सेन Eliot की पंक्तियाँ उधृत करते हैं : ‘अलविदा नहीं। बल्कि आगे बढो, यात्रियो’। ‘Faring forward’ (गीता में कृष्ण की स्थिति) तथा ‘faring well’ (वह स्थिति जिसकी सेन वकालत करते हैं) में अन्तर कीजिए।
Answer:
Krishna in the Gita exhorts Arjuna to fare forward i.e. move towards whatever lies before you and behave accordingly. He advises Arjuna to act on the spur of the moment and that to do his duty without any thought about the result. But Sen favours the position of faring well. He says that wherever you go, you should behave well according to the situation. He gives the voyager freedom to choose his way. But in Krishna’s preaching, the voyager i.e. the listener is bound to go forward. Also, while ‘faring forward’ involves performance of duty regardless of consequences; ‘faring well’ calls for consideration of results of one’s actions, even when done in course of duty.

गीता में कृष्ण अर्जुन को ‘Fare Forward’ का उपदेश देते हैं अर्थात् जो भी तुम्हारे सामने है, उसकी ओर बढ़ो और परिस्थिति के अनुसार व्यवहार करो। समय की माँग के अनुसार कार्य करो। व्यक्ति को परिणाम की चिंता किये बिना अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। लेकिन Eliot ‘Fare well’ की स्थिति के पक्ष में है। वह शिक्षा देता है कि तुम जहाँ भी जाओ, परिस्थिति के अनुसार व्यवहार करो। वह यात्री को, अपना मार्ग चुनने की स्वतन्त्रता देता है। लेकिन कृष्ण के उपदेश में यात्री अर्थात् श्रोता आगे जाने के लिए बाध्य है। इसके अतिरिक्त, जहाँ ‘आगे बढ़ो’ परिणामों की उपेक्षा कर कर्तव्यपालन को अगींकार करता हैं, ‘अच्छा करो’ परिणामों पर विचार करने के लिए कहता है, चाहे वे उन कर्मों से उत्पन्न हों जो कर्तव्यपालन के दौरान किए जाते हैं।

Question 4.
Sen draws a parallel between the moral dilemma in the Krishna-Arjuna dialogue and J.R. Oppenheimer’s response to the nuclear explosion in 1945. What is the basis for this ? (S.S. Exam 2013)
सेन कृष्ण-अर्जुन संवाद व 1945 में किये गये नाभिकीय विस्फोट के प्रति J.R. Oppenheimer की प्रतिक्रिया में समानता का वर्णन करते हैं। इस समानता को क्या आधार है ?
Answer:
J.R. Oppenheimer was the leader of the American team that developed the weapon that caused the nuclear explosion during the Second World War in 1945. He was greatly moved to see such a dreadful mass destruction. At this stage, he was in Arjuna’s position who was at a loss to think that he was the cause behind a great carnage. But then he could even justify his action of developing a weapon of mass destruction for the cause that he thought to be right. This was Krishna’s stand. Thus, his moral dilemma was parallel to Krishna Arjuna dialogue.

J.R. Oppenheimer उस अमेरिकी टीम के नेता थे जिसने उस अस्त्र का विकास किया था जिससे 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाभिकीय विस्फोट किया गया। ऐसा भयानक नरसंहार देखकर वह अत्यधिक – द्रवित हो गये थे। इस स्थिति में, वह अर्जुन की स्थिति में थे जो यह सोचकर आहत था कि वह एक महान नरसंहार का कारण है। लेकिन तब वह अपने जनसंहार के अस्त्र के विकास के कार्य को औचित्यपूर्ण भी ठहरा सकते थे क्योंकि उन्हें इसका उद्देश्य ठीक लगा था। यह कृष्ण का पक्ष था। इस प्रकार उनकी नैतिक दुविधा कृष्ण व अर्जुन के संवाद के समान थी।

Question 5.
Maitreyi’s remark ‘what should I do with that by which I do not become immortal’ is a rhetorical question cited to illustrate both the nature of the human predicament and the limitations of the material world. What is the connection that Sen draws between this and his concept of economic development?
मैत्रेयी की टिप्पणी – ‘मैं उस वस्तु का क्या करूँ जो मुझे अमरता नहीं दे सकती है’ – एक प्रभावशाली प्रश्न है जिसे मनुष्य की दु:खद स्थिति और भौतिक संसार की सीमाओं, दोनों की व्याख्या करने के लिए उद्धृत किया जाता है। सेन इस प्रश्न व आर्थिक विकास की अपनी अवधारणा में क्या सम्बन्ध बताते हैं?
Answer:
Maitreyi’s remark makes it clear that wealth is not the ultimate source of happiness. Amartya Sen totally favours this stand. He describes that income and achievement are two different things. We can buy commodities for wealth but it cannot buy us the actual capabilities we can enjoy. Our economic wealth cannot totally make us live the way we like. There does lie a connection between wealth and our ability to achieve what we value, but in some conditions it may be absent too. According to Sen, wealth alone cannot be the basis of our freedom to live long and live well.

मैत्रेयी की टिप्पणी यह स्पष्ट कर देती है कि धन प्रसन्नता का एकमात्र सबसे बड़ा साधन नहीं है। अमर्त्य सेन पूरी तरह इस बात के पक्ष में हैं। वे वर्णन करते हैं कि आय व उपलब्धि दो अलग-अलग चीजें हैं। हम धन से आवश्यकता की वस्तुएँ खरीद सकते हैं लेकिन वे वास्तविक क्षमताएँ नहीं जिनका हम आनन्द उठा सकें। अपनी आर्थिक समृद्धि से हम पूरी तरह अपना मनचाहा जीवन नहीं जी सकते हैं। समृद्धि व अपने महत्व की वस्तुओं को प्राप्त करने की हमारी योग्यता में सम्बन्ध है तो अवश्य परन्तु कुछ स्थितियों में ऐसा नहीं भी हो सकता है। सेन के अनुसार, मात्र धन हमारी लम्बा व स्वस्थ जीवन जीने की स्वतन्त्रता का आधार नहीं हो सकती है।

Question 6.
It is important to see that the Indian argumentative tradition has frequently crossed the barriers of gender, caste, class and community. List the examples cited by Sen to highlight this.
यह देखना महत्त्वपूर्ण है कि भारतीय तार्किक परम्परा ने बहुधा लिंग, जाति, वर्ग व सम्प्रदाय के अवरोधों को पार किया है। इस बात पर प्रकाश डालने के लिए सेन द्वारा उद्धृत किये गये उदाहरणों की सूची बनाइये।
Answer:
These examples are :

  1. Women like Sarojini Naidu and Nellie Sengupta have had prominent roles in India’s politics.
  2. Gargi and Maitreyi took part in ‘arguing combats’ in the remote past.
  3. Distinctly underprivileged castes of Indian society fought against the superiority of Brahmins. Buddhism and Jainism rose as rebellious religious movements.
  4. Kabir – a weaver; Dadu – a cotton – carder, Ravidas – a shoemaker, Sena – a barber, led the movement against social barriers. Mira Bai, Andal, Daya-bai, Sahajobai were some of the prominent women who joined the movement.

Thus, the argumentative tradition in India has frequently crossed the barriers of gender, caste, class and community.

ये उदाहरण हैं :

  1. सरोजिनी नायडू व नीलि सेनगुप्ता जैसी महिलाओं की भारतीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
  2. गार्गी और मैत्रेयी ने सुदूर अतीत में शास्त्रार्थ में भाग लिया था।
  3. भारतीय समाज की विशिष्ट रूप से वंचित जातियों ने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के विरुद्ध संघर्ष किया। बौद्धवाद व जैनवाद विद्रोही धार्मिक आन्दोलनों के रूप में उठ खड़े हुए।
  4. कबीर – एक जुलाहा, दादू – रुई से बिनौलों को अलग करने वाला, रविदास – एक मोची, सेन – एक नाई ने सामाजिक अवरोधों के विरुद्ध आन्दोलन का नेतृत्व किया। मीराबाई, अन्दल, दया-बाई, सहजो-बाई कुछ विशिष्ट महिलाएँ थीं जिन्होंने इस आन्दोलन में भाग लिया।

इस प्रकार, भारत में तर्क की परम्परा ने बहुधा लिंग, जाति, वर्ग व सम्प्रदाय के अवरोधों को पार किया है।

Question 7.
What is Sen’s interpretation of the positions taken by Krishna and Arjuna in the debate between them?
कृष्ण और अर्जुन के बीच हुए वाद-विवाद में उन दोनों के पक्षों की सेन किस प्रकार व्याख्या करते हैं?
Answer:
In the debate between Krishna and Arjuna, Krishna stands for doing one’s duty for a just cause, while Arjuna questions the propriety of doing one’s duty to promote a just cause at the cost of misery and slaughter. Sen, with due respect to Krishna’s preaching, favours the stand of Arjuna. He interprets the position of Krishna as one that teaches to do one’s duty without any thought about the result. But Arjuna seems wiser to Sen in raising doubts about the tragic outcome of his visible duty. Sen seems to be advocating Arjuna’s view of thinking about the outcome of one’s action since it appears to be the better course in context of present global scenario.

कृष्ण और अर्जुन के बीच हुए वाद-विवाद में कृष्ण अपना कर्तव्य करने का पक्ष लेते हैं जबकि अर्जुन दु:ख व वध की कीमत पर धर्म का साथ देने का अपना कर्तव्य निभाने के औचित्य पर प्रश्न उठाते हैं। सेन कृष्ण के उपदेश का पूरा सम्मान करते हुए अर्जुन की बात के पक्ष में हैं। वह कृष्ण की बात की व्याख्या इस रूप में करते हैं कि व्यक्ति को परिणाम की कोई परवाह किये बिना अपना कर्तव्य करना चाहिए। लेकिन सेन को अर्जुन अधिक बुद्धिमान लगता है जो अपने स्पष्ट कर्त्तव्य के दु:खद परिणाम के विषय में संशय उठाता है। सेन अर्जुन के इस विचार का पक्ष लेते हुए प्रतीत होते हैं कि व्यक्ति को अपने कार्य के परिणाम के विषय में विचार कर लेना चाहिए क्योंकि यह वर्तमान के वैश्विक परिवेश हेतु श्रेष्ठतर साधन है।