Chapter 4 कैकेयी का अनुताप/गीत

कैकेयी का अनुताप/गीत – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2018, 17, 16, 16, 14, 13, 11, 10)

प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर: देना होता है। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म झाँसी जिले के चिरगाँव नामक स्थान पर 1886 ई. में हुआ था। इनके पिता सेठ रामचरण गुप्त को हिन्दी साहित्य से विशेष प्रेम था। गुप्त जी पर अपने पिता का पूर्ण प्रभाव प|| घर पर ही अंग्रेजी, संस्कृत एवं हिन्दी का अध्ययन करने वाले गुप्त जी की प्रारम्भिक रचनाएँ कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले ‘वैश्योपकारक’ नामक पत्र में छपती थीं। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी जी के सम्पर्क में आने पर उनके आदेश, उपदेश एवं स्नेहमय परामर्श से इनके काव्य में पर्याप्त निखार आया। 1वेदी जी को ये अपना गुरु मानते थे। राष्ट्रीय विशेषताओं से परिपूर्ण रचनाओं का सृजन करने के कारण ही महात्मा गाँधी ने इन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि दी। ‘साकेत’ महाकाव्य के लिए इन्हें हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया। 12 दिसम्बर, 1964 को माँ भारती का यह सच्चा सपूत हमेशा के लिए पंचतत्व में विलीन हो गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ
गुप्त जी ने खड़ी बोली के स्वरूप के निर्धारण एवं विकास में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। गुप्त जी की प्रारम्भिक रचनाओं भारत-भारती आदि में इति वृत्तकथन की अधिकता दिखाई देती हैं।

कृतियाँ
गुप्त जी के लगभग 40 मौलिक काव्य ग्रन्थों में ‘भारत भारती’, किसान’, ‘शकुन्तला’, ‘पंचवटी’, ‘त्रिपथगा’, ‘साकेत’, ‘यशोधरा’, ‘द्वापर’, ‘नहुष’, ‘काबा और कर्बला’ आदि रचनाएँ उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त गुप्त जी ने ‘अनघ’, तिलोत्तमा’ एवं ‘चन्द्रहास’ जैसे तीन छोटे-छोटे पद्यबद्ध रूपक भी लिखे।

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष

  1. राष्ट्रप्रेम गुप्त जी की कविता का मुख्य स्वर है। इनकी रचनाओं में आज की समस्याओं एवं विचारों के स्पष्ट दर्शन होते हैं। इसका एक मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता में राष्ट्रीय चेतना जाग्रत करना था। इन्होंने ऐसे समय में लोगों में राष्ट्रीय चेतना का स्वर फेंका, जब हमारा देश परतन्त्रता की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। देशवासियों में स्वदेश प्रेम जाग्रत करते हुए इन्होंने कहा भी है “जो भरा नहीं हैं भावों से, बहती जिसमें रस धार नहीं। वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।”
  2. नारी का महत्व गुप्त जी का हृदय नारी के प्रति करुणा व सहानुभूति से परिपूर्ण है। इन्होंने नारी की स्थिति को ऊँचा उठाने के लिए सदियों से उपेक्षित उर्मिला एवं यशोधरा जैसी नारियों के चरित्र का उदात्त चित्रण करके एक नई परम्परा का सूत्रपात किया।
  3. भारतीय संस्कृति के उन्नायक गुप्त जी भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि कवि हैं, इसीलिए इन्होंने भारत के गौरवशाली अतीत का सुन्दर वर्णन किया। इनका विश्वास था कि सुन्दर वर्तमान और स्वर्णिम भविष्य के लिए अतीत को जानना अत्यन्त आवश्यक है।
  4. प्रकृति चित्रण इनके प्रकृति चित्रण में हृदय को आकर्षित कर लेने की क्षमता एवं सरसता है। इनमें प्रकृति को आकर्षक रूप देने में अत्यधिक कुशलता है।
  5. रस योजना गुप्त जी की रचनाओं में अनेक रसों का सुन्दर समन्वय मिलता है। श्रृंगार, रौद्र, वीभत्स, हास्य एवं शान्त रसों के प्रसंगों में गुप्त जी अत्यधिक सफल रहे हैं। साकेत में श्रृंगार रस के दोनों पक्षों-संयोग एवं वियोग का सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है। प्रसंगानुसार इनके काव्य में ऐसे एथल भी हैं, जहाँ पात्र अपनी गम्भीरता को भूलकर हास्यमय हो गए हैं।

कला पक्ष

  1. भाषा रखी बोली को साहित्यिक रूप देने में गुप्त जी का महत्वपूर्ण योगदान है। गुप्त जी की भाषा में माधुर्य, भावों में तीव्रता और प्रयुक्त शब्दों का सौन्दर्य अद्भुत है। इन्होंने ब्रजभाषा के स्थान पर सरल, शुद्ध, परिष्कृत खड़ी बोली में काव्य सृर्जन करके उसे काव्य भाषा के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गम्भीर विषयों को भी सुन्दर और सरल शब्दों में प्रस्तुत करने में ये सिद्धहस्त थे। भाषा में लोकोक्तियाँ एवं मुहावरों के प्रयोग से जीवन्तता आ गई है।
  2. शैली गुप्त जी ने अपने समय में प्रचलित लगभग सभी शैलियों को प्रयोग अपनी रचनाओं में किया। ये मूलतः प्रवन्धकार थे, लेकिन प्रबन्ध के साथ-साथ मुक्तक, गीति, गीतिनाट्य, नाटक आदि क्षेत्रों में भी इन्होंने अनेक सफल रचनाएँ की हैं। इनकी रचना ‘पत्रावली’ पत्र शैली में रचित नूतन काव्य-प्रणाली का नमूना है। इनकी शैलियों में गेयता, सहज प्रवाहमयता, सरसता एवं संगीतात्मकता विद्यमान है।
  3. छन्द एवं अलंकार गुप्त जी ने सभी प्रचलित छन्दों में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। इन्होंने मन्दाक्रान्ता, वसन्ततिलका, द्रुतविलम्धित, हरिगीतिका, बरवै आदि छन्दों में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत की। इन्होंने तुकान्त, अतुकान्त एवं गीति तीनों प्रकार के छन्दों का समान अधिकार से प्रयोग किया है। अलंकार क्षेत्र में इन्होंने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, यमक, श्लेष के अतिरिक्त ध्वन्यर्थ-व्यंजना, मानवीकरण जैसे आधुनिक अलंकारों का भी प्रयोग किया। अन्त्यानुप्रास की योजना में इनका कोई जोड़ नहीं हैं।

हिन्दी साहित्य में स्थान
मैथिलीशरण गुप्त जी की राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत रचनाओं के कारण हिन्दी साहित्य में इनका अपना विशेष स्थान है। ये आधुनिक हिन्दी काव्य की धारा के साथ विकास पथ पर चलते हुए युग-प्रतिनिधि कवि स्वीकार किए गए। हिन्दी काव्य राष्ट्रीय भावों की पुनीत गंगा को बहाने का श्रेय गुप्त जी को ही है। अतः ये सच्चे अर्थों में लोगों में राष्ट्रीय भावनाओं को भरकर उनमें जन-जागृति लाने वाले सच्चे राष्ट्रकवि हैं। इनका काव्य हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर: देने होंगे।

कैकेयी का अनुताप

प्रश्न 1.
तदनन्तर बैठी सभा उटज के आगे,
नीले वितान के तले दीप बहु जागे।
टकटकी लगाए नयन सुरों के थे वे,
परिणामोत्सुक उन भयातुरों के थे वे।
उत्फुल्ल करौंदी-कुंज वायु रह-रहकर
करती थी सबको पुलक-पूर्ण मह-महकर।
वह चन्द्रलोक था, कहाँ चाँदनी वैसी,
प्रभु बोले गिरा, गम्भीर नीरनिधि जैसी।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के शीर्षक तथा कवि का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘कैकेयी का अनुताप’ नामक कविता से उद्धृत हैं तथा इसके रचनाकार द्विवेदी युगीन प्रसिद्ध राष्ट्रकवि ‘मैथिलीशरण गुप्त’ जी

(ii) प्रस्तुत पद्यांश किस प्रसंग से सम्बन्धित हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में पंचवटी की प्राकृतिक छटा का मनोहारी वर्णन किया गया है। प्रकृति के सौन्दर्य का यह वर्णन उस क्षण का है, जब यहाँ भारत के साथ अयोध्यावासियों को श्रीराम से भेंट करने हेतु रात्रि-सभा का आयोजन किया गया था।

(iii) पंचवटी के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पंचवटी का प्राकृतिक सौन्दर्य अनुपम था। खिले हुए करौंदे, पुष्पों से भरे हुए बगीचों से रह-रहकर आने वाली मन्द, शीतल व सुगन्धित पवन वहाँ उपस्थित लोगों को पुलकित कर रही थी। वहाँ ऐसी मनोहर चाँदनी छिटक रही थी, जिसका अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। वहाँ पंचवटी की सभा चन्द्रलोक सी प्रतीत हो रही थी।

(iv) प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि द्वारा किस भाव की अभिव्यक्ति हुई हैं ?
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि द्वारा रात्रि के समय पंचवटी आश्रम के आस-पास की प्राकृतिक छटा के मनोहारी होने का भाव अभिव्यक्त किया गया है।

(v) ‘तदनन्तर’ का सन्धि-विच्छेद करते हुए उसका भेद बताए।
उत्तर:
तदनन्तर तद् + अनन्तर (व्यंजन सन्धि)

प्रश्न 2.
“यह सच है तो अब लौट चलो तुम घर को।”
चौंके सब सुनकर अटल कैकेयी-स्वर को।
सबने रानी की ओर अचानक देखा,
वैधव्य-तुषारावृता यथा विधु-लेखा।।
बैठी थी अचल तथापि असंख्यतरंगा,
वह सिंहीं अब थी हा! गोमुखी गंगा—
हाँ, जनकर भी मैंने न भरत को जाना,
सब सुन लें, तुमने स्वयं अभी यह माना
यह सच है तो फिर लौट चलो घर भैया,
अपराधिन मैं हूँ तात, तुम्हारी मैया।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में किसे अपराध बोध से ग्रसित दिखाया गया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कैकेयी को अपराध-बोध से ग्रसित दिखाया गया है। राम को घर लौटने का अनुरोध करके वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होती दिख रही हैं।

(ii) कैकेयी के मुख से किस बात को सुनकर सभी विस्मित रह गए।
उत्तर:
कैकेयी के मुख से दृढ़ स्वर में कही गई इस बात को सुनकर सभी विस्मित रह गए कि यदि यह सच है, तो अब तुम अपने घर लौट चलो अर्थात् मेरी उस मूर्खता को भूलकर अयोध्या चलो, जिसके परिणामस्वरूप मैंने तुम्हारे लिए वनवास की माँग की थी।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने कैकेयी के किस रूप का वर्णन किया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में विधवा कैकेयी श्वेत वस्त्र धारण कर ऐसी प्रतीत हो रहीं थीं, मानों पुरे ने थाँदनी को ढक लिया हो। स्थिर बैठी होने के पश्चात् भी कैकेयी के मन में विचारों की अनगिनत तरंगें उठ रही थीं। कभी सिंहनी सी प्रतीत होने वाली रानी पैकेयी आज दीनता के भावों से भरी थी।

(iv) कैकेयी स्वयं को दोषी मानते हुए राम से क्या कहती हैं?
उत्तर:
कैकेयी स्वयं को दोषी मानते हुए राम से कहती हैं “यदि तुम्हारी कही बात सच है, तो तुम अयोध्या लौट चलो। अपराधिनी मैं हूँ, भरत नहीं। तुम्हें वन में भेजने का अपराध मैंने किया है। इसके लिए मुझे जो दण्ड चाहो दो, मैं उसे स्वीकार करती हैं, परन्तु घर लौट चलो, अन्यथा लोग भरतं को दोषी मानेंगे।”

(v) प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा रस दर्शाया गया हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कैकेयी के अपराध बोध से उत्पन्न शोकाकुल अवस्था के कारण करुण रस है।

प्रश्न 3.
क्या कर सकती थी, मरी मन्थरा दासी,
मेरा ही मन रह सका न निज विश्वासी।
जल पंजर-गत अब अरे अधीर, अभागे,
वे ज्वलित भाव थे स्वयं मुझी में जागे।
पर था केवल क्या ज्वलित भाव ही मन में?
क्या शेष बचा कुछ न और जन में?
कुछ मूल्य नहीं वात्सल्य-मात्र क्या तेरा?
पर आज अन्य-सा हुआ वत्स भी मेरा।।
थूके, मुझ पर त्रैलोक्य भले ही थूके,
जो कोई जो कह सके, कहे, क्यों चूके?
छीने न मातृपद किन्तु भरत का मुझसे,
रे राम, दुहाई करूं और क्या तुझसे?

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में कैकेयी की किस विवशता को प्रस्तुत किया गया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कैकेयी ने अपनी उस विवशता को प्रस्तुत किया है जब एक माँ सन्तान के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहती है, परन्तु इसके पश्चात् भी उसे अपनी सन्तान से प्यार नहीं मिलता।

(ii) कैकेयी, मन्थरा को निर्दोषी बताते हुए क्या कहती हैं?
उत्तर:
कैकेयी, मन्थरा को निर्दोष बताते हुए कहती हैं कि मन्थरा तो साधारण-सी दासी है। वह भला मेरे मन को कैसे बदल सकती हैं। सच तो यह है कि स्वयं मेरा मन ही अविश्वासी हो गया था।

(iii) कैकेयी अपने अन्तर्मन को ‘अभागा’ और ‘अधीर’ मानकर क्या कहती हैं?
उत्तर:
कैकेयी अपने अन्तर्मन को ‘अभागा’ और ‘अधीर’ मानकर कहती हैं कि मेरे मन में स्थित हे मन! ईष्र्या-द्वेष से परिपूर्ण वे ज्वलन्त भाव स्वयं तुझमें ही जागे थे।

(iv) कैकेयी अपने कर्मों पर पछताते हुए क्या कहती हैं?
उत्तर:
कैकेयी अपने कर्मों पर पछताते हुए कहती हैं कि तीनों लोक अर्थात् धरती, आकाश और पाताल मुझे क्यों न धिक्कारे, मेरे विरुद्ध जिसके मन में जो आए वह क्यों न कहे, किन्तु हे राम! मैं तुझसे दीन स्वर में बस इतनी ही विनती करती हैं कि मेरा मातृपद अर्थात् भरत को पुत्र कहने का मेरा अधिकार मुझसे न छीना जाए।

(v) ‘ज्वलित’ और ‘विश्वासी’ शब्दों में से प्रत्यय शब्दांश आँटकर लिखिए।
उत्तर:
ज्वलित-इत (प्रत्यय), विश्वासी-ई (प्रत्यय)

प्रश्न 4.
निज जन्म जन्म में सुने जीव यह मेरा
धिक्कार! उसे था महा स्वार्थ ने घेरा
सौ बार धन्य वह एक लाल की माई,
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई।”
पागल-सी प्रभु के साथ सभी चिल्लाई
सौ बार धन्य वह एक लाल की माई।”
हाँ! लाल? उसे भी आज गमाया मैंने,
विकराल कुयश ही यहाँ कमाया मैंने।
निज स्वर्ग उसी पर वार दिया था मैंने,
हर तुम तक से अधिकार लिया था मैंने।
पर वहीं आज यह दीन हुआ रोता है,
शंकित तबसे धृत हरिण-तुल्य होता हैं।
श्रीखण्ड आज अंगार- चण्ड है मेरा,
तो इससे बढ़कर कौन दण्ड है मेरा?
पटके मैंने पद-पाणि मोह के नद में,
जन क्या-क्या करते नहीं स्वप्न में, मद में?

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में क्या दर्शाया गया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में एक और कैकेयी के द्वारा स्वयं को धिक्कारने, तो दूसरी ओर राम सहित सभासदों द्वारा उनका गुणगान करने के भाव दर्शाए गए हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कैकेयी अपना पश्चाताप करते हुए क्या कह रही हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कैकेयी अपना पश्चाताप व्यक्त करते हुए कह रही है कि अब तो जन्म-जन्मान्तर तक मेरी आत्मा यह सुनने के लिए विवश होगी कि अयोध्या की रानी कैकेयी को महास्वार्थ ने घेरकर ऐसा अनुचित कर्म कराया कि उसने धर्म के मार्ग का त्याग कर अधर्म के मार्ग का अनुसरण किया।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में कैकेयी, राम के समक्ष अपनी एवं भरत की दीन दशा का वर्णन करते हुए क्या कहती हैं?
उत्तर:
पश्चाताप की अग्नि में जलती हुई कैकेयी, राम से कहती हैं कि मैंने अपने पुत्र पर अपना स्वर्ग-सुख भी न्योछावर कर दिया था और उसी कारण मैंने तुम्हारा अधिकार (राज्य) छीन लिया। मेरा वहीं पुत्र आज दीन-हीन होकर करुण-क्रन्दन कर रहा है।

(iv) सभासदों की बात सुनकर कैकेयी ने क्या प्रतिक्रिया अभिव्यक्त की?
उत्तर:
सभासदों की बात सुनकर कैकेयी ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि हाँ मैं उसी पुत्र की अभागिन माता हैं, जिसे आज मैंने खो दिया है, वह पुत्र भी अब मेरा नहीं रहा। उसने मुझे माता मानने से इनकार कर दिया है। मैंने प्रत्येक प्रकार से अपयश ही कमाया है और स्वयं को कलंकित भी कर दिया है।

(v) “निज जन्म-जन्म में सुने जीव यह मेरा।” पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति में जन्म-जन्म’ शब्द की पुनरावृत्ति के कारण ‘पुनरविप्रकाश अलंकार है।

गीत

प्रश्न 5.
मुझे फूल मत मारो,
मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो।
होकर मधु के मीत मदन, पटु, तुम कटु, गरल ने गारो,
मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो।
नहीं भोगिनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो,
बल हो तो सिन्दूर-बिन्दु यह–हरनेत्र निहारो!
रूप-दर्प कन्दर्प, तुम्हें तो मेरे पति पर वारो,
लो, यह मेरी चरणधूलि उस रति के सिर पर धारो।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) वसन्त ऋतु का विकास उर्मिला को कैसा प्रतीत हो रहा है?
उत्तर:
वसन्त ऋतु के सुहावने समय में चारों ओर खिले हुए फूल अपने रंग रूप से अपूर्व मादकता बिखेर रहे हैं, परन्तु उर्मिला को वसन्त ऋतु का विकास और “फूलों का रंग रूप लक्ष्मण के वियोग में अत्यन्त कष्टकारी प्रतीत हो रहा है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में उर्मिला ने कामदेव से क्या प्रार्थना की है।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में उर्मिला ने कामदेव से प्रार्थना करते हुए कहा कि तुम मुझे अपने पुष्पबाणों से घायल मत करो, क्योंकि मैं तो वह अबला युवती हैं जो विरहिणी है, वियोगिनी है। तुम्हें मुझ पर विचारपूर्वक दया करनी चाहिए और मुझ विरहिणी को कष्ट नहीं देना चाहिए।

(iii) “नहीं भोगिनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो।” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उर्मिला को कामदेव ने दुःख रूपी जाल में फँसाने का बहुत प्रयास किया। उर्मिला ने कामदेव के पुष्पबाण के प्रहार से स्वयं को बहुत विचलित किया, परन्तु वह उनके जाल में फंस नहीं पाई। आशय यह है कि कामदेव चाहे उर्मिला को कितना भी दुःख क्यों न दे दें, परन्तु वह भोग-विलास की छ। रखने वाली कोई विलासिनी नहीं बन सकती।

(iv) उर्मिला द्वारा कामदेव के सौन्दर्य के दर्प को कैसे तोड़ा गया है?
उत्तर:
उर्मिला ने कामदेव के सौन्दर्य के दर्प को तोड़ते हुए कामदेव से कहा कि यदि तुम्हें अपने रूप (सौन्दर्य) पर गर्व है, तो तुम अपने इस गर्व को मेरे पति (लक्ष्मण) के चरणों पर न्योछावर कर दो अर्थात् सौन्दर्य में तुम मेरे पति के चरणों की धूल के समान हो।

(v) ‘विकलता’ और ‘विफलता’ दोनों शब्दों से उपसर्ग, मूलशब्द और प्रत्यय छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
विकलता-वि (उपसर्ग), कल (मूल शब्द), ता (प्रत्यय)
विफलता-वि (उपसर्ग), फल (मूल शब्द), ता (प्रत्यय)