Chapter 5 ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से (गद्य खंड).

जीवन-परिचय एवं कृतियाँ

प्रश्न 1.
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के जीवन-परिचय एवं साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालिए। [2009]
या
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जीवन-परिचय दीजिए एवं उनकी एक रचना का नामोल्लेख कीजिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
हिन्दी के प्रसिद्ध कवि व क्रान्ति-गीतों के अमर गायक श्री रामधारी सिंह हिन्दी-साहित्याकाश के दीप्तिमान् ‘दिनकर’ हैं। इन्होंने अपनी प्रतिभा की प्रखर किरणों से हिन्दी-साहित्य-गगन को आलोकित किया है। ये हिन्दी के महान् विचारक, निबन्धकार, आलोचक और भावुक कवि हैं। इनके द्वारा कई ऐसे ग्रन्थों की रचना की गयी है, जो हिन्दी-साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

जीवन-परिचय–दिनकर जी का जन्म सन् 1908 ई० में बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया’ नामक ग्राम में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री रवि सिंह तथा माता का नाम श्रीमती मनरूप देवी था। अल्पायु में ही इनके पिता का देहान्त हो गया था। इन्होंने पटना विश्वविद्यालय से बी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की और इच्छा होते हुए भी पारिवारिक कारणों से आगे न पढ़ सके और नौकरी में लग गये। कुछ दिनों तक इन्होंने माध्यमिक विद्यालय मोकामाघाट में प्रधानाचार्य के पद पर कार्य किया। फिर सन् 1934 ई० में बिहार के सरकारी विभाग में सब-रजिस्ट्रार की नौकरी की। इसके बाद प्रचार विभाग में उपनिदेशक के पद पर स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद तक कार्य करते रहे। सन् 1950 ई० में इन्हें मुजफ्फरपुर के स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिन्दी विभाग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। सन् 1952 ई० में ये राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए। इसके बाद इन्होंने भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार के गृहविभाग में हिन्दी सलाहकार और आकाशवाणी के निदेशक के रूप में कार्य किया। सन् 1962 ई० में भागलपुर विश्वविद्यालय ने इन्हें डी० लिट्० की मानद उपाधि प्रदान की। सन् 1972 ई० में इनकी काव्य-रचना ‘उर्वशी’ पर इन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हिन्दी साहित्य-गगन का यह दिनकर 24 अप्रैल, सन् 1974 ई० को हमेशा के लिए अस्त हो गया।

रचनाएँ–साहित्य के क्षेत्र में ‘दिनकर’ जी का उदय कवि के रूप में हुआ था। बाद में गद्य के क्षेत्र में भी वे आगे आये। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नवत् हैं|

  1. दर्शन एवं संस्कृति-धर्म’, ‘भारतीय संस्कृति की एकता’, ‘संस्कृति के चार अध्याय’-ये दर्शन और संस्कृति पर आधारित ग्रन्थ हैं। संस्कृति के चार अध्याय ‘साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत रचना
  2. निबन्ध-संग्रह–अर्द्धनारीश्वर’, ‘वट-पीपल’, ‘उजली आग’, ‘मिट्टी की ओर’, रेती के फूल आदि इनके निबन्ध-संग्रह हैं। इसके अतिरिक्त विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित इनके अन्य निबन्ध भी हैं।
  3. आलोचना-ग्रेन्थ-शुद्ध कविता की खोज’, इसमें कविता के प्रति शुद्ध और व्यापक दृष्टिकोण व्यक्त हुआ है।
  4. यात्रा-साहित्य-‘देश-विदेश’।
  5. बाल-साहित्य-‘मिर्च का मजा’, ‘सूरज का ब्याह’ आदि।
  6. काव्य-रेणुका’, ‘हुंकार’, ‘रसवन्ती’, ‘कुरुक्षेत्र’, “सामधेनी’, ‘प्रणभंग’ (प्रथम काव्यरचना), ‘उर्वशी’ (महाकाव्य); ‘रश्मिरथी’ और ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ (खण्डकाव्य)-ये दिनकर जी के राष्ट्रप्रेम और क्रान्ति की ओजस्वी भावना से पूर्ण काव्य-ग्रन्थ हैं।
  7. शुद्ध कविता की खोज-दिनकर जी का एक आलोचनात्मक ग्रन्थ है, जिसमें इन्होंने काव्य के सम्बन्ध में अपना व्यापक दृष्टिकोण व्यक्त किया है।

साहित्य में स्थान-क्रान्ति का बिगुल बजाने वाले दिनकर जी कवि ही नहीं अपितु एक सफल गद्यकार भी थे। इनकी कृतियों में इनका चिन्तक एवं मनीषी रूप प्रतिबिम्बित होता है। राष्ट्रीय भावनाओं से संकलित इनकी कृतियाँ हिन्दी-साहित्य की अमूल्य निधि हैं, जो इन्हें हिन्दी साहित्याकाश का दिनकर सिद्ध करती हैं।

“गद्यांशों पर आधारित प्रश्न

प्रश्न-पत्र में केवल 3 प्रश्न (अ, ब, स) ही पूछे जाएँगे। अतिरिक्त प्रश्न अभ्यास एवं परीक्षोपयोगी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण दिए गये हैं।
प्रश्न 1.

ईष्र्या का यही अनोखा वरदान है। जिस मनुष्य के हृदय में ईष्र्या घर बना लेती है, वह उन चीजों से आनन्द नहीं उठाता, जो उसके पास मौजूद हैं, बल्कि उन वस्तुओं से दु:ख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं। वह अपनी तुलना दूसरों के साथ करता है और इस तुलना में अपने पक्ष के सभी अभाव उसके हृदय पर दंश मारते रहते हैं। दंश के इस दाह को भोगना कोई अच्छी बात नहीं है। मगर, ईष्र्यालु मनुष्य करे भी तो क्या?  आदत से लाचार होकर उसे यह वेदना भोगनी पड़ती है।
[2011, 13, 15, 18]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने क्या कहा है ?
  2. ईर्ष्यालु मनुष्य क्या करता है ?
  3. ईष्र्यालु मनुष्य को कौन-सी वेदना भोगनी पड़ती है ?
  4. लेखक ने ईष्र्या को अनोखा वरदान क्यों कहा है ?
  5. ईष्र्या का अनोखा वरदान क्या है ?
  6. ईष्र्यालु व्यक्ति को ईष्र्या से क्या कष्ट मिलता है ?

[ ईष्र्या = दूसरों से जलन, डाह। दंश मारना = डंक मारना। दाह = जलन। वेदना = पीड़ा। ]
उत्तर
(अ) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘गद्य-खण्ड में संकलित एवं श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा लिखित ‘ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से’ नामक मनोवैज्ञानिक निबन्ध से उद्धृत है। अथवा अग्रवत् लिखिए पाठ का नाम-ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से। लेखक का नाम-श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
[ विशेष—इस पीठ के शेष सभी गद्यांशों के प्रश्न ‘अ’ के उत्तर के लिए यही उत्तर लिखा जाएगा। ]

(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत अंश में लेखक ने बताया है कि ईष्र्या अपने भक्त को एक विचित्र प्रकार का वरदान देती है और वह सदैव दु:खी रहने का वरदान है। जिस मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या उत्पन्न हो जाती है, वह अकारण ही कष्ट भोगता है। वह अपने पास विद्यमान अनन्त सुख-साधनों के उपभोग द्वारा भी आनन्द नहीं उठा पाता; क्योंकि वह दूसरों की वस्तुओं को देख-देखकर मन में जलता रहता है।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी का कहना है कि जब ईष्र्यालु मनुष्य यह देखता है कि कोई वस्तु किसी अन्य के पास है लेकिन उसके पास नहीं है तो उसके मन में पनपी यह अभाव की भावना सदैव उसे डंक मारती रहती है। लेखक का कहना है कि डंक से उत्पन्न कष्ट को सहन करना उचित नहीं है। लेकिन ईष्र्यालु मनुष्य कष्ट को सहन करने के अतिरिक्त और कुछ कर भी नहीं सकता।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने ईर्ष्या से उत्पन्न पीड़ा का वर्णन किया है और कहा है कि ईष्र्यालु व्यक्ति सदा दु:खी रहता है।
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति अपनी तुलना ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों से करता है जो उससे किन्हीं बातों में श्रेष्ठ हैं। जब वह देखता है कि अमुक वस्तु दूसरे के पास तो है, लेकिन उसके पास नहीं है, तब वह स्वयं को हीन समझने लगता है। अपने अभाव उसे खटकने लगते हैं और वह अपने पास मौजूद वस्तुओं अथवा साधनों का भी आनन्द नहीं ले पाता।
  3. ईर्ष्यालु व्यक्ति रात-दिन इसी वेदना में जला करता है कि अमुक वस्तु दूसरों के पास तो है लेकिन उसके पास नहीं है। ईष्र्या की इस दाह में जलना बहुत बुरा है, लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति को यह वेदना भोगनी ही पड़ती है।
  4. लेखक ने ईष्र्या को अनोखा वरदान इसलिए कहा है क्योंकि ईष्र्यालु मनुष्य उन वस्तुओं से आनन्द नहीं प्राप्त करता जो उसके पास हैं, वरन् उन वस्तुओं से दु:ख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं।
  5. ईर्ष्या का अनोखा वरदान यह है कि ईष्र्यालु व्यक्ति उन वस्तुओं से आनन्द नहीं उठाता जो उसके पास हैं, वरन् वह उन वस्तुओं से दु:ख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं।
  6. ईष्र्यालु व्यक्ति को ईर्ष्या के कारण उन वस्तुओं से आनन्द नहीं मिलता जो उसके पास हैं वरन् वह उन वस्तुओं से दु:ख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं।

प्रश्न 2.
एक उपवन को पाकर भगवान को धन्यवाद देते हुए उसका आनन्द नहीं लेना और बराबर इस चिन्ता में निमग्न रहना कि इससे भी बड़ा उपवन क्यों नहीं मिला, एक ऐसा दोष है, जिससे ईष्र्यालु व्यक्ति का चरित्र भी भयंकर हो उठता है। अपने अभाव पर दिन-रात सोचते-सोचते वह सृष्टि की प्रक्रिया को भूलकर विनाश में लग जाता है और अपनी उन्नति के लिए उद्यम करना छोड़कर वह दूसरों को हानि पहुँचाने को ही अपना श्रेष्ठ कर्त्तव्य समझने लगता है। [2012]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति का चरित्र क्यों भयंकर हो जाता है ?
  3. ईर्ष्यालु व्यक्ति किस बात को अपना श्रेष्ठ कर्त्तव्य समझता है ?

[ ईर्ष्यालु = वह व्यक्ति जो दूसरे के सुख को देखकर दुःखी होता है। अभाव = कमी। उद्यम = कार्य, रोजगार।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत अंश में लेखक ने ईष्र्या से विमुक्ति का यही साधन बताया है कि ईश्वर ने जो वस्तुएँ कम अथवा अधिक, छोटी अथवा बड़ी, मोहक अथवा कुरूप प्रदान की हैं उनके लिए हमें ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए और उन उपलब्ध वस्तुओं से जीवन को आनन्दमय और सुखमय बनाना चाहिए। इसके विपरीत यदि हम दिन-रात इसी चिन्ता में अपना समय व्यर्थ गॅवाते रहेंगे कि मेरे पड़ोसी के पास सुख-सुविधाओं के साधन मुझसे कहीं अधिक हैं, वे सब मेरे पास क्यों
नहीं हैं; तो ऐसा सोचते रहने से ईर्ष्या बढ़ती जाती है और इस कारण ईर्ष्यालु व्यक्ति का चरित्र भयंकर होता जाता है।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक कहता है कि उत्थान-पतन, जीवन-मृत्यु; ये सब ईश्वर अर्थात् उस अदृश्य शक्ति के अधीन हैं। हमें उसके लिए प्रयास करना चाहिए, लेकिन दिन-रात उसके बारे में चिन्तामग्न रहकर अपने जीवन को दु:खमय और कष्टों से युक्त नहीं बनाना चाहिए। सृष्टि की रचना-प्रक्रिया को भूलकर मनुष्य दिन-रात दूसरे की ईष्र्या में समय गॅवाता है और उद्यम करना छोड़ देता है। वह इसी मन्थन में लगा रहता है कि मैं अमुक व्यक्ति को किस प्रकार हानि पहुँचा सकता हूँ। इसी कार्य को वह अपने जीवन का श्रेष्ठ कर्तव्य समझने लगता है, जो कि एक संकीर्ण विचारधारा है। इससे ऊपर उठकर व्यक्ति को सबके हित की सोच रखनी चाहिए।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक कहना चाहता है कि ईश्वर ने हमें उपभोग के योग्य जो वस्तुएँ प्रदान की हैं, उन्हीं का उपभोग कर जीवन का आनन्द उठाना चाहिए।
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति का चरित्र इसलिए भयंकर हो जाता है क्योंकि वह लगातार इस चिन्ता में डूबा रहता है कि उसे अमुक वस्तु से अच्छी वस्तु क्यों नहीं मिली। इस कारण वह उन वस्तुओं का भी आनन्द नहीं ले पाता, जो उसे प्राप्त हैं।
  3. ईष्र्यालु व्यक्ति यह कभी भी विचार नहीं करता कि सृष्टि की सम्पूर्ण रचना ईश्वर के अधीन है। वह अपनी कमी को सोचते-सोचते विनाश में लग जाता है। अपनी उन्नति के लिए वह कदापि प्रयत्न नहीं करता, वरन् दूसरों को कैसे हानि पहुँचा सकता है, इसी को अपना सर्वश्रेष्ठ कर्त्तव्य समझता है।

प्रश्न 3.
ईष्र्या की बड़ी बेटी का नाम निन्दा है। जो व्यक्ति ईष्र्यालु होता है, वही बुरे किस्म का निन्दक भी होता है। दूसरों को निन्दा वह इसलिए करता है कि इस प्रकार, दूसरे लोग जनता अथवा मित्रों की आँखों से गिर जाएँगे और जो स्थान रिक्त होगा, उस पर मैं अनायास ही बैठा दिया जाऊँगा। [2013, 14, 16]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईष्र्यालु व्यक्ति दूसरों की निन्दा क्या सोचकर करता है ?
  2. ईष्र्या के साथ और कौन-से अवगुण पनपते हैं ?
  3. ईष्र्यालु और निन्दक का क्या सम्बन्ध है?
  4. [निन्दक = निन्दा (बुराई) करने वाला। अनायास = बिना श्रम के।]

उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या–दिनकर जी का मत है कि जैसे ही हमारे मन में ईर्ष्या की भावना जन्म लेती है, वैसे ही निन्दा की भावना भी उत्पन्न हो जाती है। इसीलिए निन्दा को ईर्ष्या की बड़ी बेटी अथवा पहली सन्तान कहा गया है। जो व्यक्ति किसी के प्रति ईर्ष्यालु होता है, वह अत्यन्त बढ़ा-चढ़ाकर उसकी बुराई करता है। उसकी बुराई करने में उसे आनन्द का अनुभव होता है। वह चाहता है कि अन्य लोग भी उस व्यक्ति की बुराई करें। उसके निन्दा करने का उद्देश्य यह होता है कि वह व्यक्ति दूसरे लोगों की दृष्टि में गिर जाये। जब वह व्यक्ति, जिसकी वह निन्दा कर रहा है, अपने मित्रों अथवा समाज के लोगों की नजरों में गिर जाएगा तो उसके द्वारा किये गये रिक्त और उच्च स्थान पर वह बिना परिश्रम के अधिकार कर लेगा।
(स)

  1. ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की निन्दा यह सोचकर करता है कि जब निन्दित व्यक्ति समाज की नजरों से गिर जाएगा तब उसके स्थान पर वह स्वयं विराजमान हो जाएगा।
  2. ईष्र्या ही निन्दा जैसे अवगुणों की जन्मदात्री है। ईर्ष्या का भाव मन में उत्पन्न होने पर निन्दा का .. अवगुण स्वयमेव पनपने लगता है।
  3. ईष्र्यालु और निन्दक में जनक (जन्म देने वाला) और जन्मा (जन्म लेने वाला) का सम्बन्ध है। दूसरे शब्दों में, ईष्र्या का भाव मन में उत्पन्न होने पर निन्दा का अवगुण स्वयमेव पनप जाता है।

प्रश्न 4.
मगर ऐसा न आज तक हुआ है और न होगा। दूसरों को गिराने की कोशिश तो अपने को बढ़ाने की कोशिश नहीं कही जा सकती। एक बात और है कि संसार में कोई भी मनुष्य निन्दा से नहीं गिरता। उसके पतन का कारण सद्गुणों का ह्रास होता है। इसी प्रकार कोई भी मनुष्य दूसरों की निन्दा करने से अपनी उन्नति नहीं कर सकता। उन्नति तो उसकी तभी होगी, जब वह अपने चरित्र को निर्मल बनाये तथा अपने गुणों का विकास करे। | [2016, 17]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. किसी व्यक्ति की उन्नति कैसे हो सकती है ?
  2. कौन-सी बात है जो आज तक न हुई है और न होगी ?
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?

उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक का कथन है कि जो व्यक्ति ऊँचा उठना चाहता है, वह अपने ही अच्छे कार्यों से ऊँचा उठ सकता है, दूसरों की निन्दा आदि करके कभी कोई ऊपर नहीं उठ सकता। यदि किसी व्यक्ति का पतन होता है तो किसी की निन्दा से नहीं, अपितु उसके अच्छे गुणों के नष्ट हो जाने के कारण होता है। इसलिए उन्नति के लिए आवश्यक है कि मनुष्य निन्दा करना छोड़ दे और अपने चरित्र को स्वच्छ बनाये तथा अपने अन्दर मानवीय गुणों का विकास करे।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक का कहना है कि व्यक्ति अपने अन्तर्गुणों का विकास करके ही उन्नति कर सकता है, निन्दा से दूसरों को गिराकर नहीं हो सकती। |
  2. दूसरों को नीचा दिखाने के प्रयास द्वारा स्वयं को ऊँचा उठाने की प्रक्रिया न आज तक सफल हुई है। और न होगी।
  3. किसी व्यक्ति की उन्नति तब ही हो सकती है जब वह अपने चरित्र को निर्मल बनाएगा तथा अपने अन्दर सद्गुणों का विकास करेगा। |

प्रश्न 5.
ईर्ष्या का काम जलाना है, मगर सबसे पहले वह उसी को जलाती है, जिसके हृदय में उसका जन्म होता है। आप भी ऐसे बहुत-से लोगों को जानते होंगे, जो ईष्र्या और द्वेष की साकार मूर्ति हैं और जो बराबर । इस फिक्र में लगे रहते हैं कि कहाँ सुनने वाला मिले और अपने दिल का गुबार निकालने का मौका मिले। श्रोता मिलते ही उनका ग्रामोफोन बजने लगता है, और वे बड़ी ही होशियारी के साथ एक-एक काण्ड इस ढंग से सुनाते हैं, मानो विश्व-कल्याण को छोड़कर उनका और कोई ध्येय नहीं हो। अगर जरा उनके अपने इतिहास को देखिए और समझने की कोशिश कीजिए कि जब से उन्होंने इस सुकर्म का आरम्भ किया है, तब से वे अपने क्षेत्र में आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। यह भी कि वे निन्दा करने में समय वे शक्ति का अपव्यय नहीं करते तो आज इनका स्थान कहाँ होता ? [2012, 15]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईर्ष्या का काम क्या है ? वह सबसे पहले किसे जलाती है ?
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति के चरित्र का अध्ययन करने पर क्या निष्कर्ष निकलता है ?
  3. उपर्युक्त गद्यांश में ईर्ष्यालु व्यक्ति की मनोदशा कैसी बताई गयी है ?

[ श्रोता = सुनने वाला। सुकर्म = अच्छा कर्म, यहाँ पर लक्षणा (शब्द-शक्ति) से दुष्कर्म। अपव्यय = निरर्थक व्यय।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या–लेखक का कथन है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति किसी सुनने वाले के मिलते ही ग्रामोफोन के रिकॉर्ड की भाँति बजने लगते हैं और किसी अन्य के प्रति अपने हृदय की ईष्र्या के गुबार को निकालना शुरू कर देते हैं। बड़ी चतुरता के साथ वे अपनी कथा को विभिन्न अध्यायों में विभक्त कर प्रत्येक अध्याय की कथा को इस प्रकार सुनाते हैं, मानो वे यह कार्य विश्व-कल्याण की भावना से कर रहे हों और इसके अतिरिक्त उनका कोई अन्य उद्देश्य ही न हो।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक ने ऐसे व्यक्तियों को दयनीय समझते हुए कहा है कि यदि ऐसे व्यक्तियों पर ध्यान दें और उनके सन्दर्भ में यह निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करें कि जब से उन्होंने ईष्र्या में जलना प्रारम्भ किया है तब से वे स्वयं कितना आगे बढ़े हैं तो हमें ज्ञात होगा कि उनकी अवनति ही हुई है। यदि वे निन्दा-कार्य में समय नष्ट न करके स्वयं उन्नति के मार्ग पर बढ़ते तो निश्चित ही प्रगति कर गये होते। लेखक का मत है कि ऐसे लोग अपनी शक्ति का अपव्यय कर अपनी ही हानि करते हैं।
(स)

  1. ईर्ष्या का काम है जलाना। ईर्ष्या सबसे पहले उस व्यक्ति को जलाती है, जिसके हृदय में उसका जन्म होता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति किसी सुनने वाले के मिलते ही; जिस व्यक्ति से वह ईर्ष्या करता है; उसकी किसी अच्छी बात को भी बुराई के दृष्टिकोण से विस्तारपूर्वक सुनाने लगता है।
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति के चरित्र का अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि जब से उसने ईष्र्या में जलना शुरू किया है तब से उसकी प्रगति पूर्णतया अवरुद्ध हो गयी है।
  3. प्रस्तुत गद्यांश में ईष्र्यालु व्यक्ति की मनोदशा के सम्बन्ध में बताया गया है कि वह सदैव इस बात का अवसर हूँढ़ता रहता है कि श्रोता मिलते ही वह उस व्यक्ति की बुराई करना शुरू कर दे, जिससे वह ईर्ष्या करता है।

प्रश्न 6.
चिन्ता को लोग चिता कहते हैं। जिसे किसी प्रचण्ड चिन्ता ने पकड़ लिया है, उस बेचारे की जिन्दगी ही खराब हो जाती है, किन्तु ईष्र्या शायद चिन्ता से भी बदतर चीज है; क्योंकि वह मनुष्य के मौलिक गुणों को ही कुंठित बना डालती है। [2011, 17]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईर्ष्यालु और चिन्तातुरे व्यक्ति में कौन अधिक बुरा है और क्यों ?
  2. चिन्ता को लोग चिता क्यों कहते हैं ?

[ प्रचण्ड = तीव्र। बदतर = अधिक बुरी। कुंठित = मन्द, प्रभावहीन।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या–लेखक कहता है कि लोग चिन्ता को चिता के समान जलाने वाली कहते हैं। चिता तो मृत देह को ही जलाती है, परन्तु चिन्ता जीवित व्यक्ति को ही जला देती है। चिन्तित मनुष्य का जीवन अत्यधिक कष्टप्रद अवश्य हो जाता है, किन्तु ईष्र्या उससे भी अधिक हानिकारक है; क्योंकि वह दया, प्रेम, उदारता जैसे मानवीय गुणों को ही नष्ट कर देती है। इन गुणों के बिना मनुष्य का जीवन ही व्यर्थ हो जाता है।
(स)

  1. चिन्ताग्रस्त व्यक्ति का जीवन खराब हो जाता है लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति उससे भी अधिक बुरा है; क्योंकि ईष्र्या तो व्यक्ति के मौलिक गुणों को ही समाप्त कर देती है।
  2. चिन्ता को लोग चिता इसलिए कहते हैं क्योंकि चिन्ता भी व्यक्ति को चिता के समान ही जला डालती है। |

प्रश्न 7.
मृत्यु शायद फिर भी श्रेष्ठ है, बनिस्बत इसके कि हमें अपने गुणों को कुंठित बनाकर जीना पड़े। चिन्तादग्ध व्यक्ति समाज की दया का पात्र है, किन्तु ईष्र्या से जला-भुना आदमी जहर की चलती-फिरती गठरी के समान है, जो हर जगह वायु को दूषित करती फिरती है। [2011]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए। |
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स) ईष्र्यालु और चिन्ताग्रस्त व्यक्ति में क्या अन्तर है ?
[ बनिस्बत = अपेक्षाकृत। चिन्तादग्ध = चिन्ता में जला हुआ।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या–लेखक का कथन है कि मनुष्य की मानवता उसके नैतिक गुणों से प्रकट होती है। जिस व्यक्ति में प्रेम, दया, सहानुभूति, परोपकार, त्याग जैसे मानवीय गुण न हों, वह मनुष्य नहीं होता। ईर्ष्या ही वह विष है, जो मनुष्य के इन मानवीय गुणों को नष्ट कर उसका जीवन व्यर्थ कर देती है। ऐसे जीवन से तो मृत्यु कहीं अधिक अच्छी है। चिन्तित व्यक्ति किसी दूसरे का कुछ नुकसान नहीं करता। इसलिए समाज के लोग उस पर दया भी दिखा सकते हैं, पर ईर्ष्या करने वाले पर कोई दया नहीं दिखाता; क्योंकि उसका विचार ही परपीड़क होता है। वह स्वयं जहर की पोटली की तरह सारे .. समाज को दूषित करता है तथा दूसरों की निन्दा करके समाज का वातावरण गन्दा करता रहता है।
(स) चिन्ताग्रस्त व्यक्ति स्वपीड़क होता है। वह किसी दूसरे का कोई नुकसान नहीं करता। लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति परपीड़क होता है। वह विष की चलती-फिरती ऐसी गठरी के समान होता है, जो जहाँ भी रहती है, वहाँ के वातावरण को दूषित करती रहती है।

प्रश्न 8.
ईष्र्या मनुष्य का चारित्रिक दोष नहीं है, प्रत्युत इससे मनुष्य के आनन्द में भी बाधा पड़ती है। जब भी मनुष्य के हृदय में ईष्र्या का उदय होता है, सामने का सुख उसे मद्धिम-सा दिखने लगता है। पक्षियों के गीत में जादू नहीं रह जाता और फूल तो ऐसे हो जाते हैं, मानो वे देखने के योग्य ही न हों। [2015]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईष्र्यालु व्यक्ति किन सुखों से वंचित हो जाता है ?
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार क्या है ?

[ प्रत्युत = वरन्, अपितु। मद्धिम = हल्का।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक का कथन है कि ईर्ष्या मनुष्य के चरित्र का गम्भीर दोष नहीं है। यह भाव व्यक्ति के आनन्द में भी व्यवधान उपस्थित करता है। जिस मनुष्य के हृदय में ईष्र्या का भाव उत्पन्न हो जाती है, उसे अपना सुख ही हल्का प्रतीत होने लगता है। वह सुखद स्थिति में होते हुए भी सुख से वंचित हो जाता है। सुख के साधन समक्ष होने पर भी उसे सुख की अनुभूति नहीं हो पाती। पक्षियों के कलरव अथवा उनके मधुर स्वर में उसे कोई आकर्षण नहीं दीखता। उसे सुन्दर और खिले हुए पुष्पों से भी ईष्र्या होने लगती है और उनमें भी उसे किसी प्रकार के सौन्दर्य के दर्शन नहीं हो पाते।
(स)

  1. ईष्र्यालु व्यक्ति सुख के समस्त साधन सम्मुख होने पर भी सुख का अनुभव नहीं कर पाता। वह आत्मिक सुख से वंचित होने के साथ-साथ प्राकृतिक सौन्दर्य का भी आनन्द नहीं उठा पाता।।
  2. निन्दा के बाण से अपने प्रतिद्वन्द्रियों को बेधकर हँसने में एक आनन्द है और यह आनन्द ईष्र्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार है।

प्रश्न 9.
आप कहेंगे कि निन्दा के बाण से अपने प्रतिद्वन्द्रियों को बेधकर हँसने में एक आनन्द है और यह आनन्द ईर्ष्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार है। मगर, यह हँसी मनुष्य की नहीं, राक्षस की हँसी होती है। और यह आनन्द भी दैत्यों का आनन्द होता है। [2015]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति की हँसी और आनन्द कैसा होता है ?

[ प्रतिद्वन्द्वी = विरोधी।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-प्रस्तुत गद्य-अंश में लेखक ने यह बताया है कि प्रायः निन्दा करने वाला, अपने कटु वचनरूपी बाणों से अपने प्रतिद्वन्द्वी को घायल कर हँसता है और आनन्दित होता है। वह समझता है कि उसने निन्दा करके अपने प्रतिद्वन्द्वी को दूसरों की दृष्टि से नीचे गिरा दिया है और अपना स्थान दूसरों की दृष्टि में ऊँचा बना लिया है। इसीलिए वह प्रसन्न होता है और इसी प्रसन्नता को प्राप्त करना उसका लक्ष्य होता है; किन्तु सच्चे अर्थ में ईष्र्यालु व्यक्ति की यह हँसी और यह क्रूर आनन्द उसमें छिपे राक्षस की हँसी और आनन्द है। यह न तो मनुष्यता की हँसी है और न ही मानवता का आनन्द।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक कहना चाहता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति राक्षस के समान होता है।
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति की हँसी और आनन्द सामान्य मनुष्य की हँसी और आनन्द के जैसी नहीं होती वरन्। उसकी हँसी राक्षस की हँसी के समान और आनन्द दैत्यों के आनन्द के समान होता है।

प्रश्न 10.
ईर्ष्या का सम्बन्ध प्रतिद्वन्द्विता से होता है, क्योंकि भिखमंगा करोड़पति से ईर्ष्या नहीं करता। यह एक ऐसी बात है, जो ईर्ष्या के पक्ष में भी पड़ सकती है; क्योंकि प्रतिद्वन्द्विता से मनुष्य का विकास होता है, किन्तु अगर आप संसारव्यापी सुयश चाहते हैं तो आप रसेल के मतानुसार, शायद नेपोलियन से स्पर्धा करेंगे। मगर याद रखिए कि नेपोलियन भी सीज़र से स्पर्धा करता था और सीज़र सिकन्दर से तथा सिकन्दर हरकुलिस से।. [2017]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. यश की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को क्या करना चाहिए ?
  2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने ईष्र्या के सम्बन्ध में कौन-सी सकारात्मक बात कही है?
  3. विश्वव्यापी प्रसिद्धि के इच्छुक व्यक्ति किससे स्पर्धा करेंगे और उन्हें क्या याद रखना | चाहिए?
  4. प्रतिद्वन्द्विता से क्या लाभ होता है ?

उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या–लेखक का कहना है कि ईष्र्या मनुष्य का चारित्रिक दोष है; क्योंकि यह आनन्द में बाधा पहुँचाती है, किन्तु यह एक दृष्टि से लाभदायक भी हो सकती है; क्योंकि ईष्र्या के अन्दर प्रतिद्वन्द्विता का भाव निहित होता है। ईष्यवश मनुष्य किसी दूसरे से स्पर्धा करता है और इसके कारण वह अपने जीवन-स्तर को विकसित करता है। यहाँ यह बात विचार करने योग्य है कि यह स्पर्धा समान-स्तर से नहीं, अपितु अपने से कुछ अधिक स्तर रखने वाले व्यक्ति से की जानी चाहिए। यही कारण है कि भिक्षा-वृत्ति पर जीवन-यापन करने वाला व्यक्ति किसी करोड़पति से ईष्र्या नहीं करता। स्पर्धा या प्रतिद्वन्द्विता से सम्बद्ध यही एक बात ईष्र्या को उचित भी ठहरा सकती है, क्योंकि स्पर्धा से ही कोई भी मनुष्य उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है।
(स)

  1. यश की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को अपने से कुछ अधिक स्तर रखने वाले व्यक्ति से स्पर्धा अथवा प्रतिद्वन्द्विता करनी चाहिए क्योकि सार्थक प्रतिद्वन्द्विता से व्यक्ति उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है।
  2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने ईष्र्या के सम्बन्ध में एक सकारात्मक बात कही है और वह है उसमें निहित प्रतिद्वन्द्विता की भावना, जो मनुष्य को विकास की ओर ले जाती है।
  3. यदि कोई व्यक्ति विश्वव्यापी प्रसिद्धि प्राप्त करना चाहता है तो उसे नेपोलियन जैसे महत्त्वाकांक्षी शासक से स्पर्धा करनी होगी, ऐसा विद्वान् रसेल का मत है। इसके साथ ही उसे यह बात भी याद रखनी चाहिए कि नेपोलियन जूलियस सीज़र से, सीज़र सिकन्दर से और सिकन्दर हरकुलिस से स्पर्धा करता था। इन सम्राटों को विश्वविख्यात व्यक्ति इस स्पर्धा या प्रतिद्वन्द्विता की भावना ने ही बनाया था।
  4. प्रतिद्वन्द्विता से मनुष्य का विकास होता है।

प्रश्न 11.
ईष्र्या का एक पक्ष, सचमुच ही लाभदायक हो सकता है, जिसके अधीन हर आदमी, हर जाति और हर दल अपने को अपने प्रतिद्वन्द्वी का समकक्ष बनाना चाहता है, किन्तु यह तभी सम्भव है, जब कि ईर्ष्या से जो प्रेरणा आती हो, वह रचनात्मक हो। अक्सर तो ऐसा ही होता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति यह महसूस करता है कि कोई चीज है, जो उसके भीतर नहीं है, कोई वस्तु है, जो दूसरों के पास है, किन्तु वह यह नहीं समझ पाता कि इस वस्तु को प्राप्त कैसे करना चाहिए और गुस्से में आकर वह अपने किसी पड़ोसी मित्र या समकालीन व्यक्ति को अपने से श्रेष्ठ मानकर उससे जलने लगता है, जबकि ये लोग भी अपने आपसे शायद वैसे ही असन्तुष्ट हों। [2015]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईष्र्यालु व्यक्ति लोगों से क्यों ईष्र्या करने लगता है ?
  2. ईष्र्या का लाभदायक पक्ष क्या है और यह कैसे सम्भव है ?
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक द्वारा बताये गये ईष्र्या की उत्पत्ति के कारण को स्पष्ट कीजिए।

[ पक्ष = पहलू। समकक्ष = समान। समकालीन = अपने समय के।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक का कथन है कि ईष्र्या का भाव अनेक दृष्टियों से हानिकारक तो है, परन्तु इसका एक लाभदायक पहलू भी है। वह लाभदायक पहलू यह है कि प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक जाति अथवा प्रत्येक दल में अपने प्रतिद्वन्द्वी को देखकर यह विचार उत्पन्न होता है। कि वह भी अपने प्रतिद्वन्द्वी के समान बने और उसे इसके लिए जो भी प्रयास अपेक्षित हों, उन प्रयासों की ओर प्रवृत्त हो। परन्तु यह तब तक सम्भव नहीं हो सकता, जब तक ईर्ष्या से प्राप्त होने वाली प्रेरणा ध्वंसात्मक होने के स्थान पर रचनात्मक हो।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक श्री दिनकर जी का कहना है कि प्राय: ऐसा ही देखने में आता है कि किसी प्रतिद्वन्द्वी को देखकर व्यक्ति अपनी योग्यता, गुण, कौशल अथवा साधनों की वृद्धि अथवा विकास करने के स्थान पर दूसरों में ही उनके अभावों की कामना करने लगता है। उसे ईष्र्यावश दूसरे की समर्थता और अपनी असमर्थता की ही अनुभूति होती रहती है। उसे यह बोध ही नहीं हो पाता कि वह दूसरों की समृद्धि से ईष्र्या करने के स्थान पर अपने अभावों की पूर्ति किस प्रकार करे। अपनी अभावावस्था पर दु:खी और क्रोधित होकर तथा किसी भी व्यक्ति को अपने से अधिक उत्तम मानकर, वह उससे ईष्र्या करने लग जाता है, जबकि सम्भव है कि जिस व्यक्ति से वह ईर्ष्या कर रहा है, वह भी अपने किसी अभाव के कारण स्वयं से सन्तुष्ट न हो।
(स)

  1. ईर्ष्यालु व्यक्ति लोगों से इसलिए ईर्ष्या करने लगता है कि क्योंकि वह यह नहीं समझ पाता कि जो वस्तु दूसरों के पास है और उसके पास नहीं है, वह उसे किस प्रकार प्राप्त कर सकता है।
  2. ईर्ष्या का एक लाभदायक पक्ष यह है कि प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक जाति में अपने प्रतिद्वन्द्वी को देखकर यह विचार उत्पन्न होता है कि वह भी अपने प्रतिद्वन्द्वी के समान बने और इसके लिए अपेक्षित प्रयासों की ओर प्रवृत्त हो।
  3. जब कोई वस्तु किसी के पास नहीं होती और वह यह नहीं समझ पाता कि इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है तो वह उस व्यक्ति को अपने से श्रेष्ठ समझकर उससे ईष्र्या करने लगता है।

प्रश्न 12.
तो ईष्र्यालु लोगों से बचने का क्या उपाय है? नीत्से कहता है कि “बाजार की मक्खियों को छोड़कर एकान्त की ओर भागो। जो कुछ भी अमर तथा महान् है, उसकी रचना और निर्माण बाजार तथा सुयश से दूर रहकर किया जाता है। जो लोग नये मूल्यों का निर्माण करने वाले होते हैं, वे बाजारों में नहीं बसते, वे शोहरत के पास भी नहीं रहते।” जहाँ बाजार की मक्खियाँ नहीं भिनकतीं, वहाँ एकान्त है। यह तो हुआ ईष्र्यालु लोगों से बचने का उपाय, किन्तु ईष्र्या से आदमी कैसे बच सकता है? [2012]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईष्र्यालु व्यक्तियों से बचने का क्या उपाय है ?
  2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
  3. ‘बाजार की मक्खियों’ से क्या आशय है ? स्पष्ट कीजिए।
  4. नये मूल्यों का निर्माण करने वाले लोग कहाँ नहीं रहते हैं ?

[ नीत्से = यूरोप का एक प्रसिद्ध दार्शनिक, विद्वान् व लेखक। शोहरत = यश, प्रसिद्धि।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या–लेखक ईर्ष्यालु व्यक्तियों से दूर रहने की सलाह देता है। प्रसिद्ध दार्शनिक नीत्से ने ईष्र्यालु व्यक्तियों को ‘बाजार की मक्खियाँ’ कहा है। जिस प्रकार मक्खियाँ गन्दगी पर बैठकर बीमारियाँ फैलाती हैं, उसी प्रकार ईर्ष्यालु लोग दूसरों की निन्दा कर समाज के वातावरण में जहर घोलकर उसे प्रदूषित करते हैं। यदि मनुष्य अपने जीवन में कोई श्रेष्ठ कार्य करना चाहता है तो उसे एकान्त स्थान में जाना चाहिए, जहाँ ये लोग न पहुँच सकें।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी कहते हैं कि ईर्ष्यालु लोगों के साथ रहकर श्रेष्ठ रचना, नये सामाजिक मूल्यों को निर्माण अथवा कोई भी महान् कार्य नहीं किया जा सकता है। रचनात्मक महान् कार्य भीड़ से दूर रहकर ही किये जाते हैं। महान् कार्य करने के लिए प्रसिद्धि के लोभ को छोड़ना पड़ता है। जो व्यक्ति समाज के नये मूल्यों का निर्माण करते हैं, वे बाजार जैसे प्रतिस्पर्धा के स्थानों से दूर रहते हैं। नीत्से के अनुसार एकान्त स्थान वही है, जहाँ ये बाजार की मक्खियाँ (ईर्ष्यालु लोग) नहीं होती हैं।
(स)

  1. ईष्र्यालु व्यक्तियों से बचने का एकमात्र उपाय उनसे दूर रहना है; अर्थात् व्यक्तियों को ऐसे स्थान में रहना चाहिए जहाँ ईर्ष्यालु लोग न पहुँच सकें।
  2. प्रस्तुत गद्यांश में प्रसिद्ध दार्शनिक नीत्से के मत का उल्लेख करते हुए लेखक ने ईष्र्यालु व्यक्ति से दूर रहने की सलाह दी है और कहा है कि विश्व में जो भी महान् कार्य हुए हैं, वे सभी एकान्तसेवियों ने ही किये हैं।
  3. नीत्से के अनुसार बाजार की मक्खियों से आशय ईष्र्यालु व्यक्तियों से है। जिस प्रकार मक्खियाँ मिठाई के आस-पास भिनभिनाती रहती हैं, उसी प्रकार ईष्र्यालु व्यक्ति यश रूपी मिठाई अर्थात् यशस्वी लोगों के आस-पास भिनभिनाते रहते हैं और मौका मिलते ही उनकी निन्दा करते हैं और समाज के वातावरण में जहर घोलकर उसे प्रदूषित करते हैं।
  4. नये मूल्यों का निर्माण करने वाले लोग बाजार जैसे प्रतिस्पर्धा के स्थानों से और शोहरत से दूर रहते

प्रश्न 13.
ईष्र्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है। जो व्यक्ति ईर्ष्यालु स्वभाव का है, उसे फालतू बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उसे यह भी पता लगाना चाहिए कि जिस अभाव के कारण वह ईष्र्यालु बन गया है, उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका क्या है। जिस दिन उसके भीतर यह जिज्ञासा आएगी, उसी दिन से वह ईष्र्या करना कम कर देगा। . [2009, 11, 16]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईर्ष्या से बचने के लिए क्या उपाय करना चाहिए ?
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति कब से ईर्ष्या करना कम कर सकता है ?
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?

[ मानसिक अनुशासन = मन पर नियन्त्रण। जिज्ञासा = जानने की इच्छा।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक कहता है कि ईष्र्या से बचने का एकमात्र उपाय अपने मन पर नियन्त्रण करना है। मन का स्वभाव चंचल होता है। इसको वश में रखकर ही ईर्ष्या से बचा जा सकता है। जो चीजें हमारे पास नहीं हैं, उनके बारे में सोचना व्यर्थ है। जिसके मन में ईष्र्या जन्म ले लेती है, उसे यह जानना चाहिए कि किस अभाव के कारण उसके मन में ईष्र्या उत्पन्न हुई है। उसके बाद उसे उन अभावों को दूर करने का सकारात्मक प्रयत्न करना चाहिए। उसे ऐसे उपायों का पता लगाना चाहिए, जिससे उन अभावों की पूर्ति हो सके। अपने अभावों को दूर करने के लिए कोई रचनात्मक उपाय करना चाहिए।
(स)

  1. ईष्र्या से बचने के लिए व्यक्ति को अपने आपको मानसिक अनुशासन के अन्तर्गत बाँध लेना चाहिए। ।
  2. जिस दिन ईष्र्यालु व्यक्ति को यह पता चल जाएगा कि किस अभाव के कारण वह ईष्र्यालु बन गया है और उस अभाव की पूर्ति का सकारात्मक उपाय क्या है, उसी दिन से वह ईर्ष्या करना कम कर सकता है।
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने स्पष्ट किया है कि अभाव के कारण ही ईष्र्या की उत्पत्ति होती है। ईष्र्या से बचने का एकमात्र उपाय मन को वश में करना है।

व्याकरण एवं रचना-बोध

प्रश्न 1
निम्नलिखित शब्दों से उपसर्गों को पृथक् कीजिए-
अत्यन्त, दरअसल, निमग्न, निर्मल, साकार, अपव्यय, समकक्ष, दुर्भावना, अनुशासन।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से (गद्य खंड) img-1

प्रश्न 2
निम्नलिखित शब्दों से प्रत्ययों को पृथक् करके लिखिए-
ईष्र्यालु, लाभदायक, मौलिक, रचनात्मक, समकालीन, अहंकार।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से (गद्य खंड) img-2
प्रश्न 3
निम्नलिखित शब्दों का वाक्य-प्रयोग द्वारा अर्थ स्पष्ट कीजिए-
प्रतिद्वन्द्वी-प्रतिद्वन्द्विता, मूर्ति-मूर्त, जिज्ञासा-जिज्ञासु, चरित्र-चारित्रिक।
उत्तर
प्रतिद्वन्द्वी-प्रतिद्वन्द्विता–स्वस्थ प्रतिद्वन्द्विता उसे ही कहा जा सकता है, जिसमें प्रतिद्वन्द्वी एक-दूसरे से ईर्ष्या न करते हों। |
मूर्ति-मूर्त-मूर्तिकार अपनी कल्पना को अपनी मूर्ति में मूर्त रूप प्रदान करता है।
जिज्ञासा-जिज्ञासु-अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए जिज्ञासु पता नहीं कहाँ-कहाँ मारा-मारा फिरता है।
चरित्र-चारित्रिक–समाज के चारित्रिक विकास के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने चरित्र को पवित्र बनाये रखना चाहिए।