Rajasthan Board RBSE Class 10 Hindi क्षितिज Chapter 5 कृपाराम खिड़िया

RBSE Class 10 Hindi Chapter 5 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 10 Hindi Chapter 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. ‘राजिया’ का मूल नाम था
(क) राजा
(ख) राजाराम
(ग) रजिया
(घ) रामदेव।

2. दूध एवं जल की मिलावट को कौन अलग करता है
(क) कौआ
(ख) कोयल
(ग) तोता
(घ) राजहंस
उत्तर:
1. (ख), 2. (घ) ।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 5 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 3.
कवि के अनुसार किसके अभाव में कोई कार्य सिद्ध नहीं हो सकता है?
उत्तर:
पराक्रम और हिम्मत बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं हो सकता।

प्रश्न 4.
दूध एवं नीर (जल) को कौन अलग-अलग कर सकता है?
उत्तर:
दूध तथा जल को केवल राजहंस ही अलग-अलग कर सकता है।

प्रश्न 5.
कवि के अनुसार किन-किन का उपाय पहले ही कर लेना चाहिए?
उत्तर;
कवि के अनुसार आग, शत्रु और रोग का उपाय पहले ही (आरम्भ में ही) कर लेना चाहिए।

प्रश्न 6.
कौन-सी जगह चंदन के वृक्ष बहुतायत में पाए जाते हैं?
उत्तर:
मलय गिरि पर चंदन के वृक्ष बहुतायत से पाए जाते हैं।

प्रश्न 7.
किसके घाव कभी नहीं भरते हैं?
उत्तर:
कटु वाणी द्वारा मन में हुए घाव कभी नहीं भरते हैं।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 5 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 8.
संकलित अंश के अनुसार किस नगर में नहीं रहना चाहिए?
उत्तर:
जिस नगर में खल, गुड़ तथा अन्न को एक जैसा महत्व दिया जाता हो उस नगर में नहीं रहना चाहिए। ऐसे नगर में मूर्ख और विद्वान, गुणी और गुणहीन सभी एक जैसे हो जाएँगे। जब बिना गुण तथा विशेषताओं पर ध्यान दिए सभी वस्तुओं या व्यक्तियों से एक जैसा व्यवहार किया जाता है तो स्वाभिमानी व्यक्ति का वहाँ निर्वाह नहीं हो सकता। ऐसे स्थान पर रहने से तो किसी जंगल में जाकर रहना अच्छा है।

प्रश्न 9.
‘अस्वाभाविक मित्रता के घातक परिणाम होते हैं संकलित अंश के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
दो व्यक्तियों के बीच मित्रता तभी निभ सकती है जबकि वह दोनों के हित में और स्वाभाविक हो । यदि मित्रता स्वार्थ पर आधारित होगी और असमान स्वभाव वाले व्यक्तियों के बीच होगी हो वह अधिक दिन नहीं निभ पाएगी। संकलित अंश में चूहे द्वारा बिल्ली के साथ मित्रता किया जाना अस्वाभाविक मित्रता है क्योंकि वह शिकारी और शिकार की मित्रता है। चूहे के लिए यह मित्रता बहुत महँगी पड़ सकती है। बिल्ली कभी भी उसे अपना शिकार बना सकती है।

प्रश्न 10.
जन्मजात प्रवृत्तियों में बदलाव असंभव है।’ संकलित अंश के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हर प्राणी जन्म के साथ ही एक विशेष प्रकार का स्वभाव और आवरण लेकर आता है। यह उसका प्राकृतिक गुण होता है। इसे बदल पाना सम्भव नहीं होता। संकलित अंश में कवि ने इसे ‘आक’ नामक पौधे का उदाहरण देकर सिद्ध किया है। आक स्वाद में कड़वा होता है। यदि इसे शक्कर में पाग दिया जाय या इसे अमृत से सींचा भी जाय तब भी इसकी कड़वाहट दूर नहीं हो सकती क्योंकि वह उसकी जन्मजात विशेषता है। इसी प्रकार ईष्र्यालु या द्वेषी व्यक्ति के व्यवहार को भी बदल पाना सम्भव नहीं है।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 5 निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 11.
संकलित अंश के आधार पर हिम्मत एवं पराक्रम के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
संकलित सोरठों में कवि कृपाराम खिड़िया ने पराक्रम और हिम्मत के महत्व को प्रकाशित किया है। पराक्रम का अर्थ वीरता या तन-मन की सामर्थ्य का प्रदर्शन करना है। इसके लिए मनुष्य में हिम्मत या साहस होना परम आवश्यक है। संसार में कोई कार्य बिना पराक्रम और हिम्मत के सफल नहीं हो सकता। सिंह अपने पराक्रम के बल पर ही मृगराज बन पाता है। रंगे सियारों जैसे नकली पराक्रमियों को कितना भी जोश दिलाओ वे कभी सिंह जैसा पराक्रम नहीं दिखा सकते।
संसार में मनुष्य की कीमत उसकी हिम्मत से पता चलती है। हिम्मत दिखाने पर ही मनुष्य का सम्मान होता है। जिस व्यक्ति में साहस नहीं होता उसका कोई आदर नहीं करता। जैसे लोग रद्दी कागज को फेंक देते हैं उसी प्रकार कायर व्यक्ति की समाज में कोई इज्जत नहीं होती।

प्रश्न 12.
संकलित अंश के आधार पर वाणी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रकृति ने वाणी के रूप में मनुष्य को एक अमूल्य उपहार दिया है। यह विशेषता अन्य जीवों को प्राप्त नहीं है। इस वाणीरूपी उपहार का प्रयोग मनुष्य को बहुत सोच-समझकर ही करना चाहिए। कवि के अनुसार मनुष्य को विचारपूर्वक हितकारी और मधुर वाणी का ही प्रयोग करना चाहिए। बोलते समय सही अवसर और स्थान का ध्यान रखना चाहिए। जो बात बिना उचित अवसर का ध्यान रखे कही जाती है उसे लोग पसंद नहीं करते। वाणी द्वारा ही मनुष्य समाज में सम्मान या उपेक्षा प्राप्त करता है। कोयल अपनी मधुर वाणी से सभी के मन में प्रेमभाव और प्रसन्नता उत्पन्न कर देती है और कौआ अपनी कर्कश काँव-काँव से सभी को बुरा लगता है।

अनुभवी लोगों का कहना है कि संसार में सभी प्रकार की चोट, पीड़ा और तलवार के घाव को भी ठीक करने के उपाय हैं। किन्तु कटु और कठोर वाणी से मन में जो घाव (कष्ट) हो जाता है वह किसी भी औषधि से ठीक नहीं हो पाता। जीवनपर्यन्त उसकी याद पीड़ा देती रहती है।
इस प्रकार मानव जीवन में वाणी का बहुत महत्व है। इसका प्रयोग सावधानी से करना चाहिए।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए

(क) दूध नीर मिळ दोय, हेक जिसी आक्रित हुवै।
करै नै न्यारौ कोय, राजहंस बिना रजिया।।
उत्तर:
उपर्युक्त पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या के लिए व्याख्या भाग में पद्यांश 5 का अवलोकन करें।

(ख) घण घण साबळ घाय, नह फूटै पाहड़ जिवड़।
जड़ कोमळ भिद जाय, राय पड़े जद राजिया ।
उत्तर:
उपर्युक्त पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या के लिए व्याख्या भाग में पद्यांश 7 का अवलोकन करें।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 5 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 10 Hindi Chapter 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

1. कवि के अनुसार उस नगर में न रहना अच्छा है जहाँ
(क) अशांति हो
(ख) कोई रोग फैल रहा हो
(ग) गुण-अवगुण को सुनने-समझने वाले न हों।
(घ) परिवार संकट में हो।

2. सिंह मृगपति बनता है
(क) अपने पराक्रम से।
(ख) पशुओं द्वारा चुने जाने पर
(ग) पशुओं से कर वसूल करने के कारण।
(घ) पशुओं की रक्षा करके।

3. मनुष्य की कीमत होती है
(क) महँगे और सुन्दर आभूषणों से
(ख) उसकी हिम्मत से
(ग) उसके पद से
(घ) उसके दबकर रहने से।

4. राजहंस का अनोखा गुण है
(क) वह बहुत सुन्दर होता है।
(ख) वह तैरने में बहुत कुशल होता है।
(ग) वह बहुत तेज उड़ सकता है।
(घ) वह दूध और पानी को अलग-अलग कर सकता है।

5. असंगत मित्र का उदाहरण है
(क) चूहे और बिल्ली की मित्रता
(ख) दूध और पानी की मित्रता ।
(ग) कृष्ण और सुदामा की मित्रता,
(घ) औषधि और रोगी की मित्रता ।

6. कवि कृपाराम खिड़िया ने ‘आक’ के माध्यम से संदेश दिया है
(क) अमृत से सींचने पर भी उसका कड़वापन दूर नहीं होता
(ख) शक्कर में पागने से आक का कड़वापन दूर हो जाता है।
(ग) जन्म के साथ आई प्रवृत्ति का बदलना असम्भव है।
(घ) आक जैसे स्वभाव वालों को बहिष्कार होना चाहिए।
उत्तर:
1. (ग), 2. (क), 3. (ख), 4. (घ), 5. (क), 6. (ग)।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 5 अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
यदि किसी गाँव में गुण-अवगुण को न पहचाना जाता और न समझा जाता तो क्या करना चाहिए?
उत्तर:
ऐसे गाँव में निवास नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 2.
बलवान जहाँ भी रहता है, उच्च स्थान पर शोभा पाता है, इसका उदाहरण कवि ने क्या दिया है?
उत्तर:
इसका उदाहरण कवि ने सिंह के मृगराज बनने के रूप में दिया है।

प्रश्न 3.
पृथ्वी का स्वामी होकर उसे कौन भोगता है?
उत्तर:
जो युद्ध में तलवारों के प्रहार का सामना करते हुए विजय पाता है।

प्रश्न 4.
अग्नि, शत्रु और रोग का पहले से उपाय न करने पर क्या होता है?
उत्तर:
इनको आरम्भ में उपाय न करने पर ये प्रचंड रूप धारण कर, व्यक्ति को घोर संकट में डाल सकते हैं।

प्रश्न 5.
बिना हिम्मत वाले व्यक्ति की समाज में क्या दशा होती है?
उत्तर:
एक रद्दी कागज के समान उसे लोग कोई आदर नहीं देते।

प्रश्न 6.
कटुवाणी बोलने वाले से लोगों का व्यवहार कैसा होता है?
उत्तर:
कड़वा बोलने वाले से लोग दूर रहना चाहते हैं, जैसे-काँव-काँव करने वाला कौआ सबको अप्रिय लगता है।

प्रश्न 7.
कवि कृपाराम खिड़िया ने राजहंस को किसका प्रतीक बताया है?
उत्तर:
कवि ने राजहंस को एक ज्ञानी पुरुष का प्रतीक बताया है, जो गुण-दोष को अलग-अलग करके, गुणों को ग्रहण कर लेता है।

प्रश्न 8.
मलयगिरि पर उत्पन्न होने वाले सभी वृक्षों में क्या विशेषता आ जाती है?
उत्तर:
मलयगिरि चंदन के वृक्षों के लिए प्रसिद्ध है। वहाँ जितने भी अन्य प्रकार के वृक्ष उगते हैं, उनमें भी चंदन के संग से, चंदन की गंध आ जाती है।

प्रश्न 9.
किस घाव पर कोई औषधि काम नहीं करती?
उत्तर:
कटु वाणी द्वारा दिए गए मन के घाव पर कोई औषधि काम नहीं करती।

प्रश्न 10.
चूहे और बिल्ली की मित्रता के बारे में सारा संसार क्या जानता है?
उत्तर:
सभी लोग जानते हैं कि यह मित्रता कभी निभ नहीं सकती क्योंकि चूहा बिल्ली का प्रिय भोजन है।

प्रश्न 11.
कठोर पहाड़ में कोमल जड़ कब प्रवेश कर जाती है?
उत्तर:
जब पहाड़ में दरार पड़ जाती है तो कोमल होने पर उसमें जड़ भीतर चली जाती है।

प्रश्न 12.
शक्कर में पागने और अमृत से सींचने पर भी किसकी कड़वाहट दूर नहीं होती?
उत्तर:
शक्कर में पाये जाने या अमृत से सींचे जाने पर भी ‘आक’ (मदार) की कड़वाहट दूर नहीं होती।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 5 लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जिस नगर में कोई भी गुणों और अवगुणों को सुनना-समझना नहीं चाहता, वहाँ क्यों नहीं रहना चाहिए?
उत्तर:
ऐसा गाँव या नगर अँधेर नगरी जैसा होता है। वहाँ अच्छाई-बुराई, गुण-अवगुण सब एक समान हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप गुणवान, सज्जन और श्रेष्ठ आचरण वालों का वहाँ रह पाना कठिन हो जाता है। वे स्वयं को अपमानित अनुभव करते हैं। वहाँ पर निवास कर रहे मूर्ख लोगों के कारण उनके प्राण भी संकट में पड़ सकते हैं। अतः एक स्वाभिमानी और विवेकशील व्यक्ति को ऐसे समाज में नहीं रहना चाहिए।

प्रश्न 2.
बल, पराक्रम और साहस (हिम्मत) की जीवन में उपयोगिता पर अपने विचार संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
बल, पराक्रम और साहस ऐसे गुण हैं जिन्होंने मनुष्य को सुखी, सम्पन्न और यशस्वी बनाने में अतुलनीय भूमिका निभाई है। ये तीनों गुण परस्पर सम्बन्धित हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है। केवल बलवान होना, केवल पराक्रमी होना या केवल साहसी होना मनुष्य को लाभ नहीं पहुँचा पाता है। बलवान शरीर द्वारा साहस की प्रेरणा से ही पराक्रम दिखाया जा सकता है। सफलता पाने के लिए व्यक्ति में इन तीनों गुणों का होना आवश्यक है।

प्रश्न 3.
‘पहली कियां उपाव, दव, दुसमण, आमय दटै’। इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
संसार में कुछ चीजें ऐसी हैं जिनकी आरम्भ में उपेक्षा किए जाने पर घातक परिणाम होते हैं। देव अर्थात् आग, शत्रु और रोग पर ये तीनों आरम्भ में ही हमारा ध्यान चाहते हैं। यदि कहीं थोड़ी सी भी आग लगे तो तुरन्त उसे बुझा देने का प्रयत्न करना चाहिए। उपेक्षा करने वह भीषण रूप धारण कर सकती है और तब उस पर काबू पाने के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ेगा और जन-धन की बहुत हानि होगी। इसी प्रकार शत्रु और रोग की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, उनका तुरन्त उपाय करना चाहिए। अन्यथा ये गम्भीर हानि पहुँचा सकते हैं।

प्रश्न 4.
हीमत कीमत होय’ कवि के इस कथन के बारे में अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
जो व्यक्ति समय आने पर हिम्मत के साथ कठिनाइयों पर विजय पाने के लिए सामने आता है, उसी व्यक्ति की कीमत या महत्व लोग माना करते हैं। जो समय पर हिम्मत या साहस नहीं दिखा पाता, लोग उसे कायर और डरपोक कहकर, उसका उपहास किंया करते हैं। जीवन में बड़े काम, बड़ी सफलताएँ, सुख-सुविधाएँ और यश उन्हीं को प्राप्त होता है जो संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते हैं। जोखिम उठाना हर किसी के वश की बात नहीं होती। केवल साहसी पुरुष ही ऐसा कर पाते हैं। कवि ने ठीक ही कहा है कि साहसहीन व्यक्ति एक रद्दी कागज की तरह होता है जिसकी कोई कीमत नहीं होती।

प्रश्न 5.
‘राजिया रा सोरठा’ पाठ में संकलित उस सोरठे की व्याख्या कीजिए जिसमें संगति के प्रभाव से सुधार होना बताया गया है।
उत्तर:
संगति के प्रभाव को कवि कृपाराम खिड़िया ने अपने सोरठे में चंदन के वृक्ष को माध्यम बनाकर सिद्ध किया है। मलयगिरि पर चंदन अधिक संख्या में उगते हैं। चंदन के साथ ही वहाँ अन्य वृक्ष भी उगा करते हैं। चंदन के साथ रहने का उन वृक्षों पर यह प्रभाव पड़ता है कि उनकी लकड़ी में भी चंदन की गंध आने लगती है। इस प्रकार कवि ने संगति के द्वारा गुणों के सुधार को सिद्ध किया है।

प्रश्न 6.
‘वहै जीभ रा घाव, रती न ओखद राजिया’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कहा जाता है बोली का घाव गोली से भी बढ़कर पीड़ा देता है। तलवार आदि शस्त्रों से तन में जो घाव होता है उसे तो औषधियों द्वारा ठीक किया जा सकता है लेकिन व्यंग्य अथवा कटु और अपमानजनक वाणी से मन में जो घाव हो जाता है, वह किसी औषधि से ठीक नहीं हो पाता है। मनुष्य सबके सामने बोली से अपमानित किया जाना या नीचा दिखाया जाना जीवनभर नहीं भूल पाता।

प्रश्न 7.
‘उर कड़वाई आक, रंच न मूकै राजिया’ इस सोरठे के द्वारा कवि क्या संदेश देना चाहता है? लिखिए।
उत्तर:
इस सोरठे के द्वारा कवि बताना चाहता है कि किसी वस्तु या व्यक्ति का जो जन्मजात गुण या स्वभाव होता है, उसे बाहरी उपायों द्वारा बदला जाना सम्भव नहीं होता। आक के पौधे का स्वाद बहुत कड़वा होता है। यदि कोई उसे शक्कर में पागे या उसे अमृत से भी सींचे, तब भी उसकी कड़वाहट दूर नहीं हो सकती। अतः जो काम सम्भव नहीं हो, उसमें समय और शक्ति व्यय करना बुद्धिमानी नहीं है।

RBSE Class 10 Hindi Chapter 5 निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘राजिया रा सोरठा’ नामक पाठ में संकलित सोरठों के विषयों और विशेषताओं का परिचय दीजिए।
उत्तर:
हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘राजिया रा सोरठा’ नामक पाठ में कवि कृपाराम खिड़िया ने अपने अनुभवों और बहुज्ञता का परिचय इन सोरठों में दिया है।
कवि कहता है कि जिस स्थान पर लोग गुण-अवगुण पर ध्यान नहीं देते वहाँ नहीं रहना चाहिए। ऐसे समाज में गुणियों का सम्मान नहीं हो सकता। कवि ने जीवन में बल, पराक्रम और हिम्मत को बहुत महत्व दिया है। इनके बिना कोई भी काम सफल नहीं हो सकता। वन में सिंह (शेर) पराक्रम में बल पर ही मृगराज कहलाता है। बल और पराक्रम-प्रदर्शन करके ही वीर पुरुष पृथ्वीपति अर्थात् राजा बन जाता है। हिम्मतवाले या साहसी व्यक्ति को समाज सम्मान करता है। कठिनाइयों से भागने वाले साहसहीन लोगों का तो रद्दी कागज के समान तिरस्कार हुआ करता है।
कवि कहता है कि आग, शत्रु और रोग को आरम्भ में ही नियन्त्रित करना चाहिए। गुण-दोष की पहचान केवल विवेकशील व्यक्ति ही कर सकता है। सत्संगति से व्यक्ति गुणवान बन सकता है। समान स्वभाव वाले से ही मित्रता करनी चाहिए। नासमझ लोगों के बीच नहीं रहना चाहिए।
इस प्रकार अनेक उपयोगी विषयों पर कवि ने अपने विचार और संदेश दिए हैं।

प्रश्न 2.
साहस और पराक्रम पर कवि कृपाराम खिड़िया के क्या विचार हैं? संकलित सोरठों के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि कृपाराम खिड़िया ने अपने सोरठों में अनेक उपयोगी नीतियों और व्यावहारिक विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। संकलित सोरठों में कवि ने जीवन में साहस तथा पराक्रम के महत्व को रेखांकित करते हुए अपने उपयोगी विचार व्यक्त किए हैं। कवि कहता है कि जीवन में कोई भी काम बिना हिम्मत और पराक्रम के सिद्ध नहीं हो पाता । यही कारण है शृगाल (सियार) जैसी मनोवृत्ति वाले लोग कार्यक्षेत्र में उतरने से घबराया करते हैं। कवि सिंह का उदाहरण देकर अपने मत को सही सिद्ध करना चाहता है। जंगल में पशु मिलकर सिंह को राजा नहीं चुना करते हैं। सिंह तो अपने पराक्रम से ही मृगराज का पद प्राप्त किया करता है। साहस और पराक्रम से लोग श्रेष्ठ पद प्राप्त कर पाते हैं।
साहस और पराक्रम के बल पर ही युद्ध में विजय पाने वाले लोग भूपति बनकर वसुधा का भोग करते हैं। इस प्रकार कवि ने अपनी रचनाओं द्वारा जीवन में साहस और पराक्रम के महत्व पर प्रकाश डाला है।

प्रश्न 3.
कृपाराम खिड़िया के संकलित सोरठों से ऐसे चार सोरठों पर अपने विचार लिखिए, जिन्हें आप जीवन में महत्वपूर्ण समझते हैं।
उत्तर:
नीति काव्य का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। अनेक कवियों ने नित्य जीवन में उपयोगी, नीतिपरक रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। कृपाराम खिड़िया भी अपने नीतिपरक सोरठों के लिए प्रसिद्ध और लोकप्रिय कवि रहे हैं। संकलित सोरठों में मुझे महत्वपूर्ण लगने वाले चार दोहों पर मेरे विचार में निम्नलिखित हैं

(1) प्रथम सोरठा है-“गुण अवगुण……………. आछी रजिया।” इस सोरठे में कवि ने सीख दी है कि जिस समाज में लोग किसी व्यक्ति के गुण-अवगुणों पर ध्यान नहीं देते उसमें निवास करना बुद्धिमानी नहीं है। ऐसा समाज गुणी व्यक्ति को उचित आदर नहीं देता। उसके विचारों का लाभ नहीं उठा पाता और अवगुणी लोग उसे हानि पहुँचा सकते हैं।
(2) दूसरा सोरठा है-”पहली किया …………….. घालै रजिया।” इस सोरठे द्वारा कवि हमें सचेत कर रहा है कि आगामी संकटों से बचने का उपाय पहले से ही कर लेना बुद्धिमानी है। आग, शत्रु और रोगों की उपेक्षा करने पर जब वे प्रबल हो जाते हैं तो बहुत कष्ट भोगना पड़ता है।
(3) तीसरा सोरठा है-“हीमत कीमत ………………… ज्यूँ राजिया।” हिम्मत या साहस, जीवन में सफलता पाने और सुरक्षित रहने के लिए सबसे महत्वपूर्ण गुण है। जिस व्यक्ति में हिम्मत नहीं होती उसे कोई नहीं पूछता। साहसी लोग ही समाज को नेतृत्व करते हैं। यश और श्रेष्ठ पद प्राप्त किया करते हैं। डरपोक व्यक्ति को जीवनभर सिर झुकाकर, स्वाभिमान रहित होकर जीना पड़ता है।
(4) चौथा सोरठा है-“पय मीठा कर………………. मूकै राजिया।” इस सोरठे में कवि ने ईष्र्यालु और कुटिल स्वभाव वाले व्यक्तियों से दूर रहने की सीख दी है। इनके प्रति कितनी भी उदारता दिखाओ, ये अपना स्वभाव नहीं बदलते हैं। कवि ने आक (अकौआ) के पौधे का उदाहरण देकर अपनी बात को पुष्ट किया है। आक स्वभाव से कड़वा होता है। उसे मीठे जल या दूध में पकाने, शक्कर में पागने या अमृत से सींचने पर भी उसका कड़वापन नहीं जाता। मैं कवि के मत से पूरी तरह सहमत हूँ।

प्रश्न 4.
‘राजिया रा सोरठा’ में संकलित सोरठों की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
इन सभी सोरठों का विषय नीति उपदेश है। नीति काव्य होते हुए भी इन दोहों में नीरसता का अभाव है। इनकी काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
भाषा-शैली-कवि ने इन सोरठों की रचना सरल, प्रवाहपूर्ण और सटीक शब्दों से युक्त राजस्थानी भाषा में की है। इनकी शैली उपदेशात्मक और संदेशात्मक है। नीति शिक्षा जैसे विषय को भी कवि ने सरस और सहज हृदयंगम होने वाली भाषा-शैली में प्रस्तुत किया है।

छंद निर्वाह – कवि ने सोरठे जैसे छोटे छंद को अपनी बात कहने का माध्यम बनाया है। यह ग्यारह और तेरह मात्राओं पर यति (अल्पविराम) वाला मात्रिक छंद है। कवि ने सफलतापूर्वक इसका पालन किया है।
अलंकार – संकलित सोरठों में कवि ने अलंकारों का चमत्कार नहीं दिखाया है। सहज भाव से अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश तथा वयण सगाई आदि अलंकार प्रयुक्त हैं। अनुप्रास का एक उदाहरण है – ‘हीमत कीमत होय, बिन हीमत कीमत नहीं’।
संदेश – कवि ने सोरठे जैसे छोटे छंद के माध्यम से नीति संबंधी बड़ी बातें कही हैं। जीवन में विवेक, साहस, पराक्रम, समयानुकूल कथन, मधुर वाणी, सत्संगति, मित्रता आदि के महत्व पर प्रकाश डाला है। उपर्युक्त विशेषताओं के कारण ही ‘राजिया रा सोरठा’ एक लोकप्रिय रचना के रूप में प्रसिद्ध है।

कवि परिचय

जीवन परिचय-

कृपाराम ‘खिड़िया’ नामक चारणों (भाटों) की शाखा में जन्मे थे। इनके पिता का नाम जगराम जी था। कृपाराम एक प्रतिभाशाली और विद्वान कवि थे। सीकर के राजा देवी सिंह और उनके पुत्र लक्ष्मण सिंह ने कृपाराम की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें महाराजपुरा तथा लक्ष्मणपुरा की जागीर प्रदान की थी।

साहित्यिक परिचय-कृपाराम ने संवत् 1864 के लगभग अपनी काव्य रचना की थी। इन्होंने सोरठा छंद में बड़ी सहज, सरल एवं सरस भाषा में नीति सम्बन्धी रचनाएँ की हैं। ‘वयण सगाई’ इनके काव्य का प्रमुख अलंकार है। भाषा पर डिंगल भाषा का प्रभाव है।

रचनाएँ-कृपाराम रचित तीन ग्रन्थ माने जाते हैं। ये ‘राजिया रा सोराठा’ (काव्य रचना) ‘चालकनेसी’ (नाटक) तथा एक अलंकारों से सम्बन्धित ग्रन्थ है। वर्तमान में केवल ‘राजिया रा सोरठा’ ही उपलब्ध है।

‘राजिया रा सोरठा’ में कवि ने अपने विश्वासपात्र सेवक राजाराम को संबोधित करते हुए लगभग 140 सोरठों की रचना की है। ये सोरठे ‘नीति’ से सम्बन्धित हैं। ‘राजिया रो सोरठा’ को राजस्थानी भाषा का प्रथम संबोधनपरक नीतिकाव्य माना जाता है।

पाठ परिचय

प्रस्तुत पाठ में कवि कृपाराम रचित 15 सोरठे संकलित हैं। इन सोरठों के माध्यम से कवि ने अनेक उपयोगी नीति-उपदेश प्रस्तुत किए हैं। कवि गुणों का आदर करने वाले समाज में ही निवास करने का परामर्श देता है। कवि जीवन में पराक्रम का महत्व, अवसर के अनुकूल बात करना, मधुर वाणी का महत्व, सत्संगति का प्रभाव, समान स्वभाव वालों में मित्रता आदि लाभदायक नीतियों का परिचय कराता है। ये सोरठे कवि के गहरे अनुभवों, अनेक विषयों के ज्ञान और काव्य-रचना की कुशलता पर प्रकाश डालते हैं।

पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ

1.
गुण अवगुण जिण गांव, सुणै न कोई सांभलै।
उण नगरी विच नांव, रोही आछी राजिया॥1॥
कोरज सरै न कोय, बल प्राक्रम हिम्मत बिना।
हलकायां की होय, रंगा स्याळां, राजिया॥2॥

शब्दार्थ-सुणै = सुनता। सांभलै = समझता। रोही = निर्जन वन। आछी = अच्छी। कारज = कार्य। सरै = सफल होना। प्राक़म = पराक्रम, साहस। हलकायां = ललकारने से। की = क्या। रंगा = राँगा हुआ। स्याळां = सियारों को।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत सोरठे हमारी पाठ्य पुस्तक में संकलित कवि कृपाराम खिड़िया रचित ‘राजिया रा सोरठा’ नामक पाठ से उधृत है।

कवि अपने सेवक ‘राजिया’ (राजाराम) को सम्बोधित करते हुए गुण-अवगुण पर ध्यान देने पर और जीवन में पराक्रम के महत्व पर प्रकाश डाल रहा है।

व्याख्या-कवि कहता है कि जिस गाँव या समाज में कोई भी गुण और अवगुण पर न ध्यान देता हो और न उन्हें समझ पाता हो, उस गाँव या समाज में रहने से तो निर्जन वन में रहना अच्छा है।

कवि कहता है कि जीवन में बिना बल और पराक्रम के किसी भी कार्य में सफलता नहीं मिलती। जो रंगे सियार (पराक्रम का ढोंग करने वाले) हैं, उन्हें कितना भी ललकारो, या उकसाओ वे असफलता के भय से कभी आगे नहीं आते।

विशेष-
(1) डिंगल से प्रभावित राजस्थानी भाषा है। सरल शब्दावली में गुणों के आदर और अवगुणों के तिरस्कार का संदेश दिया गया है।
(2) गुणों-अवगुणों पर ध्यान न देने वाले लोगों के बीच रहना कभी भी संकट का कारण बन सकता है। यह चेतावनी दी गई है।
(3) जो व्यक्ति बल और पराक्रम दिखाने में समर्थ नहीं होते, वे जीवन में कभी सफलता नहीं न सकते। पराक्रमी होने का ढोंग करने वालों की जग हँसाई होती है, यह संदेश दिया गया है।

2.
मिळे सींह वन मांह, किण मिरगां मृगपत कियौ।
जोरावर अति जाह, रहै उरध गत राजिया॥3॥
आछा जुध अणपार, धार खगां सनमुख धसै।
भोगै हुये भरतार, रसा जिके नर नाजिया॥4॥

शब्दार्थ-सींह = सिंह। किण = किन। मिरगां = पशुओं ने। मृगपत = पशुओं का राजा। जोरावर = बलवान्। अति = अत्यन्त। जांह = जहाँ भी। उरध = ऊर्ध्व, ऊँचा। गत = गति। आछा = अच्छा। जुध = युद्ध। खगां = तलवार। हुय = होकर। भरतार = स्वामी, राजा। रसा = पृथ्वी, राज्य।।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत सोरठे हमारी पाठ्य पुस्तक में संकलित कवि कृपाराम खिड़िया रचित ‘राजिया रा सोरठा काव्यांश से लिये गये हैं।

कवि अपने सेवक राजिया को सम्बोधित करते हुए कह रहा है कि बलवान और पराक्रमी लोग अपने पुरुषार्थ से उच्च स्थिति प्राप्त किया करते हैं तथा युद्ध में तलवारों की धार का सामना करने वाले ही राजा बनकर पृथ्वी को भोगा करते हैं।

व्याख्या-सिंह (शेर) को ‘मृगपति’ अर्थात् पशुओं का राजा कहा जाता है किन्तु पशुओं ने कभी मिलकर उसे राजा के रूप में स्वीकार नहीं किया। वह तो अपने पराक्रम से पशुओं का राजा बना हुआ है। बलवान प्राणी जहाँ भी रहता है, ऊँचे स्थान पर सुशोभित रहता है।

युद्ध में भाग लेना अच्छा है, गौरव की बात है। जब शूरवीर तलवारों की तीखी धार का सामना करते हुए आगे बढ़ता है तभी वह पृथ्वी का स्वामी-राजा-बनकर उसे भोगता है। चुनौतियों का साहस के साथ सामना करने वाला व्यक्ति ही जीवन में उच्च स्थान पाता है।

विशेष-
(1) भाषा सरल राजस्थानी है।
(2) शैली उपदेशात्मक और नीतिपरक है।
(3) दोनों सोरठों में कवि ने पराक्रम और साहस की महिमा बताई है।

3. इणही हूं अवदात, कहणी सोच विचार करे।
बे मौसर री बात, रूड़ी लगै न राजिया ॥5॥
पहली कियां उपाव, दव दुसमण आमय दटै।।
प्रचंड हुआ विसवाव, रोभा, घालै राजिया॥6॥

शब्दार्थ-इणही = इन ही। अवदात = अच्छी, हितकारी। कहणी = कहनी। बे मौसर री = असमय की, जो उचित नहीं। रूड़ी = अच्छी। पहली = पहले ही। उपाव = उपाय, प्रयत्न। दव = दावानल, आग। दुसमण = दुश्मन, शत्रु। आमय = रोग। प्रचंड = प्रचंड, बलवान, बढ़ा हुआ। विसवाव = संकट। रोभा = कष्ट। घालै = देता है।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत सोरठे कवि कृपाराम खिड़िया द्वारा रचित हैं। ये हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘राजिया रा सोरठा’ से लिए गए हैं। पहले सोरठे में कवि ने सोच-विचारकर बात कहने की शिक्षा दी है। दूसरे सोरठे में आग, शत्रु और रोग का उपाय पहले से ही कर लेना उचित बताया है।

व्याख्या-अच्छी या हितकारी बात भी व्यक्ति को सोच-विचार कर ही कहनी चाहिए क्योंकि बिना समय और अवसर का ध्यान रखे जो बात कही जाती है वह सुनने वालों को अच्छी नहीं लगती।

मनुष्य को आग, शत्रु और रोग आदि संकटों से बचाव का उपाय पहले से ही कर लेना चाहिए। जब संकट भयानक रूप ले लेता है तो वह बहुत कष्ट देता है।

विशेष-
(1) कवि ने अपना मत सरल भाषा में व्यक्त किया है।
(2) उचित अवसर का ध्यान न रखने वाला व्यक्ति अपनी हँसी कराता है। यह संकेत किया गया है।
(3) संकट को बढ़ने न देना और आरम्भ में ही उसका उपाय कर लेना अच्छा रहता है। आग जब बढ़ जाती है तो जन धन। का विनाश करती है। शत्रु को बलवान हो जाने का अवसर देना मूर्खता का प्रमाण है। इसी प्रकार रोग का आरम्भ में ही उपचार करना चाहिए बढ़ जाने पर वह प्राणघातक तक हो सकता है।

4.
हीमत कीमत होय, बिना हीमत कीमत नहीं।
करै नै आदर कोय, रद कागद ज्यूँ राजिया॥7॥
उपजावै अनुराग, कोयल मन हरखत करै।
कडवौ लागै काग, रसना रा गुण राजिया॥8॥

शब्दार्थ-हीमत = हिम्मत, साहस। कीमत = मूल्य, सम्मान, महत्व। रद = रद्दी। कागद = कागज। ज्यूँ = जैसे, समान। कडवौ = कड़वा, कटु। काग = कौआ। रसना = जीभ, वाणी।।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत सोरठे हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि कृपाराम खिड़िया के सोरठों से लिये गये हैं। कवि इन सोरठों में क्रमशः साहस और मधुरवाणी का महत्व बता रहा है।

व्याख्या-मनुष्य का मूल्य उसके साहस-प्रदर्शन से ही प्रकट हुआ करता है। बिना साहस का परिचय दिये कोई उसको महत्व नहीं देता। चुनौतियों के सामने घबरा जाने वाले व्यक्ति को लोग रद्दी-कागज की तरह ठुकरा देते हैं।

कोयल अपनी मधुर वाणी से सुनने वालों के मन में प्रेमभाव और प्रसन्नता भर देती है। किन्तु कौए की कर्कश काँव-काँव कानों को कड़वी लगा करती है। यह मधुर और कटु वाणी का ही प्रभाव है।

विशेष-
(1) भाषा-शैली सरल और प्रसाद गुण सम्पन्न है।
(2) लेखक ने अपने अनुभवों से पाठकों को लाभान्वित किया है।
(3) “हिम्मत से ही व्यक्ति की कीमत समझ में आती है।” यह सच्चाई प्रकट की गई है।
(4) ‘वाणी को मधुर या कटु स्वरूप ही व्यक्ति को प्रिय या अप्रिय बना देता है।’ यह अनुभव की बात कवि ने बताई है।
(5) ‘कीमत-हीमत’ में अनुप्रास तथा करै न आदर……….कागद ज्यूँ’ में उपमा अलंकार है।

5. दूध नीर मिळ दोय, हेक जिसी आक्रित हुवै।
करै न न्यारौ कोय, राजहंस बिना राजिया॥9॥
मलियागिर मंझार, हर को तर चंनण हुवै।
संगत लियै सुधार, रूखा ही नै राजिया॥10॥

शब्दार्थ-नीर = जल। हेक = एक। जिसी = जैसी। आक्रित = आकृति, रूप। हुवै = हो जाती है। न्यारी = अलग-अलग। राजहंस = एक जल-पक्षी, जिसे दूध और पानी को अलग-अलग कर देने वाला माना जाता है। मलियागिर = मलय गिरि नामक पर्वत जहाँ चंदन के वृक्ष उगते हैं। मंझार = मध्य में। हर को = हर कोई, प्रत्येक। तर = वृक्ष। चंनण = चंदन। संगत = संगति, साथ रहना। रूखा = वृक्ष।।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहे हमारी पाठ्यपुस्तक के पाठ ‘राजिया रा सोरठा’ से लिए गए हैं। इनके रचयिता कवि कृपाराम खिड़िया हैं। पहले सोरठे में कवि ने दूध और पानी का उदाहरण देकर समझाया है कि ज्ञानी और गुणवान व्यक्ति ही वस्तु के गुण तथा दोष को अलग करके दिखा सकते हैं। दूसरे सोरठे में, अच्छी संगति के अच्छे परिणाम को, चंदन तथा अन्य वृक्षों के माध्यम से सिद्ध किया गया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि जब दूध और पानी को मिला दिया जाता है तो दोनों को मिल जाने पर एक जैसा रूप हो जाता है। पानी भी दूध जैसा ही दिखाई देता है। दूध और पानी को अलग-अलग कर दिखाने का गुण केवल राजहंस में ही होता है। कोई और यह कठिन कार्य नहीं कर सकता।

मलय गिरि पर्वत पर चंदन के वृक्ष उगा करते हैं किन्तु उनके साथ उगने वाले अन्य वृक्षों में भी चंदन जैसे ही गुण आ जाते हैं। यह सत्संग की ही महिमा है। चंदन का संग करने से अन्य वृक्षों ने अपने को सुधार लिया, वे भी चंदन जैसे ही हो गए।

विशेष-
(1) साहित्यिक होते हुए भी भाषा सरल है और भाव को बोधगम्य बना रही है।
(2) शैली उपदेशात्मक है।
(3) ‘राजहंस’ का प्रयोग ज्ञानी और गुणवान लोगों के लिए किया गया है।
(4) लक्षणा शब्द-शक्ति के प्रयोग से कथन को प्रभावशाली बनाया गया है।

6.
पाटी पीड़ उपाव, तन लागा तरवारिया।।
वहै जीभ रा घाव, रती न ओखद राजिया॥11॥
मूसा नै मंजार, हित कर बैठा हेकण।।
सह जाणै संसार, रस नह रहसी राजिया॥12॥

शब्दार्थ-उपाव = उपाय, चिकित्सा। तन = शरीर। तरवारिया = तलवार। वहै = बहता रहता है, ठीक नहीं होता। जीभ रा = (कटु) बोली का। रती = तनिक। ओखद = औषधि, दवा। मूसा = चूहा। मंजारे = बिल्ली। हित = मित्रता। हेकण = बिना सोचे-समझे। सह = सब, सारा। रस = सुख, मित्रता की आनन्द। नह = नहीं। रहसी = रह सकता।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत सोरठे हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘राजिया रा सोरठा’ नामक पाठ से लिए गए हैं। इनके रचयिता कवि कृपाराम खिड़िया हैं। कवि ने इन सोरठों में कटु या अपमानजनक भाषा के प्रयोग से होने वाले कष्ट का तथा जन्मजात शत्रुओं के बीच मित्रता न निभ पाने का वर्णन किया है।

व्याख्या-प्रथम सोरठे में कवि का कहना है कि तलवार के प्रहार से शरीर पर हुए घाव का और अन्य चोट आदि को ठीक करने के उपाय तो हैं, किन्तु कठोर या अपमानजनक वाणी से हृदय में जो घाव होता है, उसे ठीक करने वाली कोई औषधि नहीं है। यह मन में हो जाने वाला घाव सदा ही बहता रहता है, कष्ट दिया करता है।

कवि दूसरे सोरठे में समझा रहा है कि मित्रता समान स्वभाव वालों के बीच ही सफल और सुखदायिनी हुआ करती है। यदि कोई चूहा बिल्ली से मित्रता कर बैठे तो उसका परिणाम कभी सुखदायी नहीं हो सकता। सारा संसार इस बात को जानता है। चूहा बिल्ली का भोजन है। वह अपने बल पर बिल्ली से अपनी रक्षा नहीं कर सकता। मतभेद हो जाने पर बिल्ली उसे खा जाने में तनिक भी देर नहीं लगाएंगी।

विशेष-
(1) सरल राजस्थानी भाषा में गहरी बातें प्रस्तुत हुई हैं।
(2) शैली में उपदेश और परामर्श है।
(3) कभी किसी से कटु मत बोलो, यह संदेश निहित है। साथ ही, समान स्वभाव वाले से ही मित्रता निभ सकती है। इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है।
(4) ‘पाटा पीड़’ तथा ‘रहसी राजिया’ में अनुप्रास अलंकार है।

7.
खळ गुळ अण खूताय, एक भाव कर आदरै।
ते नगरी हुँताय, रोही आछी राजिया॥13॥
घण घण साबळ घाय, नह फूटै पाहड़ निवडू।।
जड़ कोमळ भिद जाय, राय पड़े जद राजिया॥14॥

शब्दार्थ-खळ = तेल निकालने के पश्चात् बची तलछट जो पशुओं को खिलाई जाती है। गुल = गुड़। खूताय = भूसी, छानन। आदरै = सम्मान करें, स्वीकार करें। रोही = निर्जन वन। घण घण = घने, बहुत से। साबळ = सब्बल, हथौड़ा। घाव = चोट। नह = नहीं। फूटै = टूटता है। पाहड़ = पहाड़। निवड़ = कठोर। भिद जाय = प्रवेश कर जाती है, बिंध जाती है। राय = दरार। जद = जब।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत सोरठे हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘राजिया रा सोरठा’ नामक पाठ से लिया गया है। इनके रचयिता कवि कृपाराम खिड़िया हैं।

प्रथम सोरठे में कवि ऐसे नगर से दूर जा बसने का परामर्श दे रहा है, जहाँ नासमझ लोग रहते हैं। दूसरे सोरठे में कवि अपना अनुभव साझा करते हुए कह रहा है कि मित्रता या परिवार को दरार अर्थात् फूट से बचाकर रखना चाहिए अन्यथा कोई सहज ही उसे हानि पहुँचा सकता है।

व्याख्या-कवि कहता है जिस नगर या समाज में खल, गुड़, अन्न आदि को एक समान महत्व दिया जाता हो, वहाँ नहीं रहना चाहिए। वह स्थान तो अंधेर नगरी जैसा है। वहाँ गुणवान व्यक्ति को कभी भी अपमान या उपेक्षा हो सकती है। ऐसे समाज में रहने से तो निर्जन वन में जाकर निवास करना अच्छा है। वहाँ व्यक्ति आत्मसम्मान के साथ तो रह सकता है।

दूसरे सोरठे में कवि कहता है कि सब्बल या बड़े हथौड़े से प्रबल चोट किए जाने पर भी जो कठोर पर्वत नहीं फूट पाता उसी पहाड़ में दरार पड़ जाने पर पौधे की कोमल जड़ भी सहज ही उसके भीतर प्रवेश कर जाती है। अति सुरक्षित दृढ़ दुर्ग हो, चाहे राज्य या परिवारं, दरार अर्थात् फूट पड़े जाने पर साधारण शत्रु भी उसमें प्रवेश करके उसे हानि पहुँचा सकता है।

विशेष-
(1) प्रथम सोरठे में स्वाभिमानी व्यक्ति को सावधान किया गया है कि उसे ऐसे लोगों के बीच नहीं रहना चाहिए जो ‘सब धान बाईस पँसेरी’ तौलते हैं। जिन्हें व्यक्ति या वस्तु की परख नहीं होती।
(2) दूसरे सोरठे में फूट या परस्पर अविश्वास से बचने का संदेश दिया गया है। लंका जैसा सुदृढ़ और सुरक्षित दुर्ग भी फूट के कारण रावण और राक्षसों की रक्षा नहीं कर पाया।

8.
पय मीठा कर पाक, जो इमरत सींचीजिये।
उर कड़वाई आक, रंच न मुकै राजिया॥15॥

शब्दार्थ-पय = दूध या जल। पाक = पकाओ, पागो। इमरत = अमृत। सींचीजिए = सींचा जाए। उर = हृदय या भीतर का। कड़वाई = कड़वापन। आक = अकौआ का पौधा, मदार। रंच = तनिक भी। मुकै = कम होती है।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत सोरठा हमारी पाठ्यपुस्तक के राजिया रा सोरठा’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता कवि कृपाराम खिड़िया हैं। इस दोहे में कवि ने ‘आक’ के माध्यम से संदेश दिया है कि ईष्र्यालु या कुटिल स्वभाव वालों से दूर ही रहना अच्छा है क्योंकि किसी वस्तु या व्यक्ति के स्वाभाविक दुर्गुण को बदल पाना सम्भव नहीं होता।।

व्याख्या-कवि कहता है कि आक या मदार को मीठे पानी या दूध में पकाओ, उसे शक्कर में पाग लो अथवा उसे अमृत से सींचते रहो। इन सब उपायों से उसके भीतर का कड़वापन तनिक भी कम नहीं हो सकता। भाव यह है कि जो स्वभाव से ही ईर्ष्या करने वाले या कुटिल लोग हैं, उन्हें सुधारना या मधुर स्वभाववाला बनाना सम्भव नहीं है।

विशेष-
(1) कवि ने सज्जनों और सुधारवादियों को व्यावहारिक सच्चाई से परिचित कराया है। किसी के स्वभाव को बदल पाना सम्भव नहीं है। अतः अपने परिश्रम और समय को व्यर्थ नष्ट नहीं करना चाहिए।
(2) भाषा सरल, तरल और सीधे हृदय पर प्रभाव डालने वाली है।
(3) कवि के दीर्घ अनुभव और बहुलता का परिचय उसके छोटे से छंद ‘सोरठा’ से मिल रहा है।