Chapter 6 भाषा और आधुनिकता

भाषा और आधुनिकता – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2017, 14, 13, 12, 11)

प्रश्न-पत्र में पाठ्य-पुस्तक में संकलित पाठों में से लेखकों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित एक प्रश्न पूछा जाता है। इस प्रश्न में। किन्हीं 4 लेखकों के नाम दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक लेखक के बारे में लिखना होगा। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
श्री जी, सुन्दर रेड्डी का जन्म वर्ष 1919 में आन्ध्र प्रदेश में हुआ था। इनकी आरम्भिक शिक्षा संस्कृत एवं तेलुगू भाषा में हुई व उच्च शिक्षा हिन्दी में। श्रेष्ठ विचारक, समालोचक एवं उत्कृष्ट निबन्धकार प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी लगभग 30 वर्षों तक आन्ध्र विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे। इन्होंने हिन्दी और तेलुगू साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन पर पर्याप्त काम किया। 30 मार्च, 2005 में इनका स्वर्गवास हो गया।

साहित्यिक सेवाएँ
श्रेष्ठ विचारक, सजग समालोचक, सशक्त निबन्धकार, हिन्दी और दक्षिण की भाषाओं में मैत्री-भाव के लिए प्रयत्नशील, मानवतावादी दृष्टिकोण के पक्षपाती प्रोफेसर जी, सुन्दर रेड्डी का व्यक्तित्व और कृतित्व अत्यन्त प्रभावशाली है। ये हिन्दी के प्रकाण्ड पण्डित हैं। आन्ध्र विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर अध्ययन एवं अनुसन्धान विभाग में हिन्दी और तेलुगू साहित्यों के विविध प्रश्नों पर इन्होंने तुलनात्मक अध्ययन और शोधकार्य किया है। अहिन्दी भाषी प्रदेश के निवासी होते हुए भी प्रोफेसर रेड्डी का हिन्दी भाषा पर अच्छा अधिकार है। इन्होंने दक्षिण भारत में हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

कृतियाँ
प्रो. रेड्डी के अब तक आठ ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी जिन रचनाओं से साहित्य-संसार परिचित है, उनके नाम इस प्रकार हैं-

  1. साहित्य और समाज
  2. मेरे विचार
  3. हिन्दी और तेलुगू : एक तुलनात्मक अध्ययन
  4. दक्षिण की भाषाएँ और उनका साहित्य 5. वैचारिकी
  5. शोध और बोध
  6. वेलुगु वारुल (तेलुगू)
  7. ‘लैंग्वेज प्रॉब्लम इन इण्डिया’ (सम्पादित अंग्रेजी ग्रन्थ)

इनके अतिरिक्त हिन्दी, तेलुगू तथा अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं में इनके अनेक निबन्ध प्रकाशित हुए हैं। इनके प्रत्येक निबन्ध में इनका मानवतावादी दृष्टूिको स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।

भाषा-शैली
प्रो. जी, सुन्दर रेडी की भाषा शुद्ध, परिष्कृत, परिमार्जित था साहित्यिक खड़ी बोली है, जिसमें सरलता, स्पष्टता और सहजता का गुण विद्यमान है। इन्होंने संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ, उर्दू, फारसी तथा अंग्रेजी भाषा के शब्दों का भी प्रयोग किया है। इन्होंने अपनी भाषा को प्रभावशाली बनाने के लिए मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग भी किया है। इन्होंने प्रायः विचारात्मक, समीक्षात्मक, सूत्रात्मक, प्रश्नात्मक आदि शैलियों का प्रयोग अपने साहित्य में किया है।

हिन्दी साहित्य में स्थान
प्रो. जी, सुन्दर रेशी हिन्दी साहित्य जगत के उच्च कोटि के विचारक, समालोचक एवं निबनाकार हैं। इनकी रचनाओं में विचारों की परिपक्वता, तथ्यों की सटीक व्याख्या एवं विषय सम्बन्धी स्पष्टता दिखाई देती है। इसमें सन्देह नहीं कि अहिन्दी भाषी क्षेत्र से होते हुए भी इन्होंने हिन्दी भाषा के प्रति अपनी जिस निष्ठा व अटूट साधना का परिचय दिया है, वह अत्यन्त प्रेरणास्पद है। अपनी सशत लेखनी से | इन्होंने हिन्दी साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है।

भाषा और आधुनिकता – पाठ का सार

परीक्षा में ‘पाठ का सार’ से सम्बन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता है। यह केवल विद्यार्थियों को पाठ समझाने के उद्देश्य से दिया गया है।

प्रस्तुत निबन्ध में लेखक प्रो. जी, सुन्दर रेड्डी ने वैज्ञानिक दृष्टि से भाषा और आधुनिकता पर विचार किया है।

भाषा परिवर्तनशील है
लेखक कहता है कि भाषा में हमेशा परिवर्तन होता रहता है, भाषा परिवर्तनशील होती है। परिवर्तनशील होने का अभिप्राय यह है कि भाषा में नए भाव, नए शब्द, नए मुहावरे एवं लोकोक्तियों, नई शैलियाँ निरन्तर आती रहती हैं।

यह परिवर्तनशीलता ही भाषा में नवीनता का संचार करती है और जहाँ नवीनता है, वहीं सुन्दरता है। भाषा समृद्ध तभी होती हैं, जब उसमें नवीनता तथा आधुनिकता का पर्याप्त समावेश हो। कूपमण्डूकता भाषा के लिए विनाशकारी है। भाषा जिस दिन स्थिर हो गई, उसी दिन से उसमें क्षय आरम्भ हो जाता है। वह नए विचारों एवं भावनाओं को वहन करने में असमर्थ होने लगती है और अन्ततः नष्ट हो जाती है।

संस्कृति का अभिन्न अंग
लेखक का मानना है कि भाषा संस्कृति का अभिन्न अंग है। संस्कृति का सम्बन्ध परम्परा से होने पर भी वह गतिशील एवं परिवर्तनशील होती हैं।

उसकी गति का सम्बन्ध विज्ञान की प्रगति से भी है। नित्य होने वाले नए-नए वैज्ञानिक आविष्कार अन्ततः संस्कृति को प्रभावित ही नहीं करते, बल्कि उसे परिवर्तित भी करते हैं। इन वैज्ञानिक आविष्कारों के फलस्वरूप जो नई सांस्कृतिक हलचले उत्पन्न होती है, उसे शाब्दिक रूप देने के लिए भाषा में परिवर्तन आवश्यक हो जाता है, क्योंकि भाषा का परम्परागत प्रयोग उसे अभिव्यक्त करने में पर्याप्त सक्षम नहीं होता।

भाषा में परिवर्तन कैसे सम्भव है?
लेखक का मानना है कि भाषा को युगानुकूल बनाने के लिए किसी व्यक्ति विशेष या समूह का प्रयत्न होना चाहिए। हालाँकि भाषा की गति स्वाभाविक होने के कारण वह किसी प्रयत्न विशेष की अपेक्षा नहीं रखती, लेकिन प्रयत्न विशेष के कारण परिवर्तन की गति ती अवश्य हो जाती है। भाषा का नवीनीकरण सिर्फ कुछ पण्डितों या आचार्यों की दिमागी कसरत ही बनी रहे, तो भाषा गतिशील नहीं हो पाती। इसका सीधा सम्पन्न जनता से एवं जनता द्वारा किए जाने वाले प्रयोग से है, जो भाषा जितनी अधिक जनता द्वारा स्वीकार एवं परिवर्तित की जाती है, वह उतनी ही अधिक जीवन्त एवं चिरस्थायी होती है। साथ ही साथ, भाषा में आधुनिकता एवं युग के प्रति अनुकूलता भी तभी आ पाती है।

गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में गद्य भाग से दो गद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

प्रश्न 1.
रमणीयता और नित्य नूतनता अन्योन्याश्रित हैं, रमणीयता के अभाव में कोई भी चीज मान्य नहीं होती। नित्य नूतनता किसी भी सृजक की मौलिक उपलब्धि की प्रामाणिकता सूचित करती है और उसकी अनुपस्थिति में कोई भी चीज वस्तुत: जनता व समाज के द्वारा स्वीकार्य नहीं होती। सड़ी-गली मान्यताओं से जकड़ा हुआ समाज जैसे आगे बढ़ नहीं पाता, वैसे ही पुरानी रीतियों और शैलियों की परम्परागत लीक पर चलने वाली भाषा भी जनचेतना को गति देने में प्रायः असमर्थ ही रह जाती है। भाषा समूची युगचेतना की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है और ऐसी सशक्तता वह तभी अर्जित कर सकती है, जब वह अपने युगानुकूल सही मुहावरों को ग्रहण कर सके।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) लेखक के अनुसार किसके अभाव में कोई भी वस्तु महत्त्वपूर्ण नहीं होती?
उत्तर:
सुन्दरता के बिना कोई भी वस्तु महत्वपूर्ण नहीं हो सकती और न ही उसे मौलिकता की मान्यता मिल सकती हैं, क्योंकि जो वस्तु सुन्दर होगी, वह नवीन भी होगी, उसमें सुन्दरता भी रहेगी।

(ii) किसी लेखक की रचना में मौलिकता का बड़ा प्रमाण क्या है?
उत्तर:
किसी भी लेखक या रचनाकार की रचना में मौलिकता का सबसे बड़ा प्रमाण उसकी रचना में व्याप्त नवीनता है, क्योंकि रचना में व्याप्त नवीनता के कारण ही समाज उस रचना के प्रति आकर्षित होता है।

(iii) लेखक के अनुसार किस रचना को समाज में स्वीकृति नहीं मिल पाती?
उत्तर:
लेखक के अनुसार नवीनता के अभाव में कोई भी वस्तु जनता और समाज के द्वारा स्वीकार नहीं की जाती, क्योंकि यदि कोई रचनाकार अपनी रचना में नवीन एवं मौलिक दृष्टि का अभाव रखता हो, तो उस रचना को सामाजिक स्वीकृति नहीं मिल पाती।।

(iv) युग चेतना की अभिव्यक्ति करने का सशक्त माध्यम क्या हैं?
उत्तर:
भाषा अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। भाषा समाज, जनचेतना एवं युग के अनुरूप सटीक तथा नयीन मुहावरों को ग्रहण कर युग-चेतना लाने का एक अथक प्रयास है।

(v) ‘रमणीयता’ और ‘अभिव्यक्ति शब्दों में क्रमशः प्रत्यय एवं उपसर्ग छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
रमणीयता – ता (प्रत्यय) अभिव्यक्ति – अभि (उपसर्ग)

प्रश्न 2.
भाषा सामाजिक भाव-प्रकटीकरण की सुबोधता के लिए ही उद्दिष्ट है, उसके अतिरिक्त उसकी जरूरत ही सोची नहीं जाती। इस उपयोगिता की सार्थकता समसामयिक सामाजिक चेतना में प्राप्त (द्रष्टव्य) अनेक प्रकारों की संश्लिष्टताओं की दुरुहता का परिहार करने में निहित है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है तथा इसके लेखक कौन हैं? उत्तर: प्रस्तुत गद्यांश ‘भाषा और आधुनिकता’ पाठ से लिया गया है। इसके लेखक । प्रो. जी. सुन्दर
रेड्डी हैं।

(ii) लेखक के अनुसार भाषा का उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार भाषा का सर्वप्रमुख उद्देश्य समाज के भावों की अभिव्यक्ति को सरल बनाकर भावों एवं विचारों को सरलता से एक-दूसरे तक पहुँचाना है।

(iii) भाषा की सुबोधता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब भाषा के द्वारा सरलता से भाव व्यक्त किए जा सकें तथा अन्य से सरलता से समझ सकें, तब उसे भाषा की सुबोधता कहते हैं।

(iv) लेखक के अनुसार भाषा की उपयोगिता कब सार्थक सिद्ध हो सकती है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार भाषा की उपयोगिता तभी सार्थक सिद्ध हो सकती है, जब भाषा समसामयिक चेतना की सूक्ष्म कठिनाइयों को दूर करके विचाराभिव्यक्ति को सरल बना सके।

(v) ‘सुबोधता एवं सार्थकता’ शब्दों में क्रमशः उपसर्ग एवं प्रत्यय आँटकर लिखिए।
उत्तर:
सुबोधता – सु (उपसर्ग)
|सार्थकता – ता (प्रत्यय)

प्रश्न 3.
कभी-कभी अन्य संस्कृतियों के प्रभाव से और अन्य जातियों के संसर्ग से भाषा में नए शब्दों का प्रवेश होता है और इन शब्दों के सही पर्यायवाची शब्द अपनी भाषा में न प्राप्त हों तो उन्हें वैसे ही अपनी भाषा में स्वीकार करने में किसी भी भाषा-भाषी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यही भाषा की सजीवता होती है। भाषा की सजीवता इस नवीनता को पूर्णतः आत्मसात् करने पर ही निर्भर करती हैं।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) लेखक के अनुसार भाषा में नए शब्दों का प्रवेश किस प्रकार होता है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार अन्य संस्कृतियों के प्रभाव और जाति के सम्पर्क में आने से विभिन्न बोलियों और भाषाओं के नवीन शब्द भाषा में प्रवेश कर जाते हैं।

(ii) भाषा किस प्रकार समृद्ध होती है?
उत्तर:
नवीन शब्दों के लिए हमें पर्यायवाची शब्द भाषा में खोजने चाहिए। अगर पर्यायवाची शब्द उपलब्ध नहीं हैं, तो हमें उसके मूल को अपना लेना चाहिए। नवीन शब्दों को ग्रहण कर लेने से भाषा की भाव सम्प्रेषणीयत में वृद्धि होती है अर्थात् हमारी भाषा समृद्ध होती है।

(iii) भाषा की सजीवता के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर:
भाषा के सन्दर्भ में नवीनता से अभिप्राय भिन्न-भिन्न भाषाओं व बोलियों के शब्दों के प्रयोग से है, जिसके कारण ही भाषा में सजीवता आती है। अतः भाषा को सजीव बनाने के लिए नवीनता का समावेश होना अत्यन्त आवश्यक है।

(iv) लेखक के अनुसार भाषा में नवीनता किस प्रकार आती हैं?
उत्तर:
लेखक के अनुसार भाषा में नवीनता विभिन्न संस्कृतियों, जातियों की भाषाओं से शब्दों को ग्रहण करने आती हैं।

(v) ‘संसर्ग’ और ‘सजीवता’ शब्दों में क्रमशः उपसर्ग एवं प्रत्यय छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
संसर्ग – सम् (उपसर्ग), सजीवता – ता (प्रत्यय)

प्रश्न 4.
भाषा स्वयं संस्कृति का एक अटूट अंग है। संस्कृति परम्परा से नि:सृत होने पर भी परिवर्तनशील और गतिशील है। उसकी गति विज्ञान की प्रगति के साथ जोड़ी जाती है। वैज्ञानिक आविष्कारों के प्रभाव के कारण उद्भूत नई सांस्कृतिक हलचलों को शाब्दिक रूप देने के लिए भाषा के परम्परागत प्रयोग पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए नए प्रयोगों की, नई भाव-योजनाओं को व्यक्त करने के लिए नए शब्दों की खोज की महती आवश्यकता है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग किसे माना गया है?
उत्तर:
‘भाषा’ किसी भी संस्कृति का महत्त्वपूर्ण अंग होती है, क्योंकि भाषा का निर्माण समाज के द्वारा किया गया है। भाषा समाज में अभिव्यक्ति का महत्त्वपूर्ण साधन हैं।

(ii) भाषा परिवर्तनशील क्यों हैं?
उत्तर:
समाज द्वारा निर्मित भाषा परिवर्तनशील है, क्योंकि समय के साथ परम्पराएँ, रीतियाँ, मूल्य आदि परिवर्तित होते हैं जिसका प्रभाव भाषा पर पड़ता है, इसलिए भाषा में परिवर्तन होना आवश्यक होता है।

(iii) भाषा में नई वाक्य-संरचना की आवश्यकता क्यों पड़ती हैं?
उत्तर:
विज्ञान की प्रगति के कारण नए आविष्कारों का जन्म होता है। जिस कारण प्रत्येक देश की संस्कृति प्रभावित होती है और इन प्रभावों से संस्कृति में आए परिवर्तनों को अभिव्यक्त करने के लिए नई शब्दावली एवं नई वाक्य-संरचना की आवश्यकता पड़ती है।

(iv) प्रस्तुतः गद्यांश में लेखक ने किस बात पर बल दिया है?
उत्तर:
लेखक ने शब्दों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन करने पर ही बल दिया है, क्योंकि कोई विदेशज शब्द यदि किसी भाव को सम्प्रेषित करने में सक्षम है, | तो उसमें अनावश्यक परिवर्तन नहीं करना चाहिए।

(v) ‘विज्ञान’ एवं ‘प्रगति’ शब्दों में उपसर्ग छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
विज्ञान – वि (उपसर्ग), प्रगति – प्र (उपसर्ग)

प्रश्न 5.
कभी-कभी एक ही भाव के होते हुए भी उसके द्वारा ही उसके अन्य पहलू अथवा स्तर साफ व्यक्त नहीं होते। उस स्थिति में अपनी भाषा में ही उपस्थिति विभिन्न पर्यायवाची शब्दों का सूक्ष्म भेदों के साथ प्रयोग करना पड़ता है; जैसे—उष्ण एक भाव है। जब किसी वस्तु की उष्णता के बारे में कहना हो तो हम ‘ऊष्मा’ कहते हैं और परिणाम के सन्दर्भ में उसी को हम ‘ताप’ कहते हैं। वस्तुतः अपनी मूल भाषा में उष्ण, ताप इनमें उतना अन्तर नहीं, जितना अब समझा जाता है। पहले अभ्यास की कमी के कारण जो शब्द कुछ कटु या विपरीत से प्रतीत हो सकते हैं, वे ही कालान्तर में मामूली शब्द बनकर सर्वप्रचलित होते हैं। संक्षेप में नए शब्द, नए मुहावरे एवं नई रीतियों के प्रयोगों से युक्त भाषा को व्यावहारिकता प्रदान करना ही भाषा में आधुनिकता लाना है। दूसरे शब्दों में, केवल आधुनिक युगीन विचारधाराओं के अनुरूप नए शब्दों के गढ़ने मात्र से ही भाषा का विकास नहीं होता; वरन् नए पारिभाषिक शब्दों को एवं नूतन शैली प्रणालियों को व्यवहार में लाना ही भाषा को आधुनिकता प्रदान करना है, क्योंकि व्यावहारिकता ही भाषा का प्राण-तत्त्व है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किस बात पर बल दिया है?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने इस बात पर बल दिया है कि प्रत्येक शब्द के पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग एक दूसरे के स्थान पर नहीं किया जा सकता है। सबसे पहले हमें उनके सूक्ष्म अर्थों को समझना चाहिए, बाद में उनका यथास्थान प्रयोग करना चाहिए।

(ii) लेखक के अनुसार शब्दों के अर्थ की सूक्ष्मता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार शब्दों के अर्थ की सूक्ष्मता से अभिप्राय शब्दों के भाव से है। उष्ण, ऊष्मा और ताप ये तीनों शब्द गर्माहट के भाव में प्रयोग किए जाते हैं, लेकिन इनका प्रयोग हम एक-दूसरे के स्थान पर नहीं कर सकते, क्योंकि पर्यायवाची शब्दों के अर्थ या भाव में कोई-न-कोई सूक्ष्म अन्तर अवश्य होता है।

(iii) भाषा को आधुनिक एवं प्रगतिशील बनाने के उपायों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भाषा को आधुनिक एवं प्रगतिशील बनाने के लिए केवल आधुनिक विचारों के अनुरुप नए शब्दों को गढने मात्र से भाषा का विकास सम्भव नहीं है, अपितु भाषा को व्यावहारिक स्तर पर युग के अनुकूल बनाया जाए, तब वह भाषा समाज के अधिकांश सदस्यों द्वारा अपनाई जाएगी अर्थात् ऐसी भाषा जो आधुनिक विचारों का वहन कर सके वही भाषा आधुनिक एवं प्रगतिशील कहलाएगी

(iv) लेखक के अनुसार भाषा का प्राण तत्त्व क्या है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार व्यावहारिकता ही भाषा का प्रमाण-तच है। नए शब्दों, नए मुहावरों, नई शैलियों एवं नई पद्धतियों को व्यवहार में लाना ही आधुनिकता है। और व्यावहारिकता ही भाषा का प्राण तत्व है।

(v) उष्ण’ एवं ‘नूतन’ शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर:
उष्ण – ऊष्मा, ताप, नूतन – नवीन, नया