Chapter 6 महादेवी वर्मा (काव्य-खण्ड).

कवयित्री-परिचय

प्रश्न 1.
महादेवी वर्मा की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए। [2009, 10]
या
कवयित्री महादेवी वर्मा का जीवन-परिचय दीजिए एवं उनकी किसी एक रचना का नाम लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 17, 18]
उत्तर
श्रीमती महादेवी वर्मा का नाम लेते ही भारतीय नारी की शालीनता, गम्भीरता, आस्था, साधना और कलाप्रियता साकार हो उठती है। महादेवी जी का मुख्य क्षेत्र काव्य है। छायावादी कवियों (पन्त, निराला, प्रसाद, महादेवी) की वृहत् कवि-चतुष्टयी में इनकी गणना होती है। इनकी कविताओं में वेदना की प्रधानता है। इन्हें आधुनिक युग की मीरा कहा जाता है।

जीवन-परिचय–श्रीमती महादेवी वर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जनपद में सन् 1907 ई० में होलिकोत्सव के दिन हुआ था। इनके पिता गोविन्दप्रसाद वर्मा भागलपुर के एक कॉलेज में प्रधानाचार्य और माता हेमरानी विदुषी और धार्मिक स्वभाव की महिला थीं। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा इन्दौर में और उच्च शिक्षा प्रयाग में हुई थी। संस्कृत में एम० ए० उत्तीर्ण करने के बाद ये प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्राचार्या हो गयीं। इनका विवाह छोटी आयु में ही हो गया था। इनके पति डॉक्टर थे। वैचारिक साम्य न होने के कारण ये अपने पति से अलग रहती थीं। कुछ समय तक इन्होंने ‘चाँद’ पत्रिका का सम्पादन किया। इनके जीवन पर महात्मा गाँधी का तथा साहित्य-साधना पर रवीन्द्रनाथ टैगोर का विशेष प्रभाव पड़ा। इन्होंने नारी-स्वातन्त्र्य के लिए सदैव संघर्ष किया और अधिकारों की रक्षा के लिए नारी.का शिक्षित होना आवश्यक बताया। कुछ वर्षों तक ये उत्तर प्रदेश विधान परिषद् की मनोनीत सदस्या भी रहीं। इनकी साहित्य-सेवाओं के लिए राष्ट्रपति ने इन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया। ‘सेकसरिया’ एवं ‘मंगलाप्रसाद’ पारितोषिक से भी इन्हें सम्मानित किया गया। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा 18 मई, 1983 ई० को इन्हें हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री के रूप में भारत-भारती’ पुरस्कार प्रदान करके सम्मानित किया गया। 28 नवम्बर, 1983 ई० को इन्हें इनकी अप्रतिम गीतात्मक काव्यकृति ‘यामा’ पर ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया। ये प्रयाग में ही रहकर जीवनपर्यन्त साहित्य-साधना करती रहीं। 11 सितम्बर, 1987 ई० को ये इस असार-संसार से विदा हो गयीं। यद्यपि आज ये हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन इनके गीत काव्य-प्रेमियों के मानस-पटल पर सदैव विराजमान रहेंगे।

रचनाएँ-महादेवी वर्मा की प्रमुख काव्य-कृतियाँ निम्नलिखित हैं

(1) नीहार—यह महादेवी वर्मा का प्रथम काव्य-संग्रह है। इसमें 47 गीत संकलित हैं। इसमें वेदना तथा करुणा का प्राधान्य है। यह भावमय गीतों का संग्रह है।
(2) रश्मि—इसमें दार्शनिक, आध्यात्मिक और रहस्यवादी 35 कविताएँ संकलित हैं।
(3) नीरजा-यह 58 गीतों का संग्रह है। इसमें संगृहीत अधिकांश गीतों में विरह से उत्पन्न प्रेम का सुन्दर चित्रण हुआ है। कुछ गीतों में प्रकृति के मनोरम चित्रों के अंकन भी हैं।
(4) सान्ध्यगीत-इसमें 54 गीत हैं। इस संकलन के गीतों में परमात्मा से मिलन का आनन्दमय चित्रण है।
(5) दीपशिखा—यह रहस्य-भावना और आध्यात्मिकता से पूर्ण 51 भावात्मक गीतों का संकलन है। इस संग्रह के अधिकांश गीत दीपक पर लिखे गये हैं, जो आत्मा का प्रतीक है।

इनके अतिरिक्त सप्तपर्णा, यामा, सन्धिनी एवं आधुनिक कवि नामक इनके गीतों के संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘प्रथम आयाम’, ‘अग्निरेखा’, ‘परिक्रमा’ आदि इनकी प्रमुख काव्य-रचनाएँ हैं। ‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’, ‘पथ के साथी’, ‘क्षणदा’, ‘साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबन्ध’, ‘संकल्पिता’, ‘मेरा परिवार’, ‘चिन्तन के क्षण’ आदि आपकी प्रसिद्ध मद्य रचनाएँ हैं।

साहित्य में स्थान-हिन्दी-साहित्य में महादेवी जी का विशिष्ट स्थान है। इन्होंने गद्य और पद्य दोनों में सृजन कर हिन्दी की अपूर्व सेवा की है। मीरा के बाद आप अकेली ऐसी महिला रचनाकार हैं, जिन्होंने ख्याति के शिखर को छुआ है। इनके गीत अपनी अनुपम अनुभूतियों और चित्रमयी व्यंजना के कारण हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। कविवर सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’ के शब्दों में–
हिन्दी के विशाल मन्दिर की वीणापाणि,
स्फूर्ति चेतना रचना की प्रतिभा कल्याणी ।

पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या

हिमालय से

प्रश्न 1.
हे चिर महान् !
यह स्वर्णरश्मि छु श्वेत भाल,
बरसा जाती रंगीन हास; ।
सेली बनता है इन्द्रधनुष,
परिमल-मल-मल जाता बतास !
परे रागहीन तू हिमनिधान !
उत्तर
[स्वर्ण-रश्मि = सुनहली किरण। सेली = पगड़ी। परिमल = सुगन्ध। बतास = वायु। रागहीन = आसक्तिरहित]

संन्दर्भ-प्रस्तुत काव्य-पंक्तियाँ हिन्दी की महान् कंवयित्री श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा रचित ‘सान्ध्यगीत’ नामक ग्रन्थ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘काव्य-खण्ड में संकलित ‘हिमालय से शीर्षक कविता से अवतरित हैं।

[ विशेष—इस शीर्षक के शेष समस्त पद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग-इन पंक्तियों में कवयित्री ने हिमालय की चिर महानता और निर्लिप्तता का वर्णन किया है।

व्याख्या–हिमालय की महानता का वर्णन करती हुई कवयित्री ने कहा है कि हे हिमालय! तुम चिरकाल से अपने गौरव एवं महानता को बनाये हुए हो। तुम्हारे श्वेत बर्फ से ढके हुए शिखरों पर जब सूर्य की सुनहली किरणें पड़ती हैं, तब लगता है कि जैसे चारों ओर तुम्हारी रंगीन हँसी बिखर गयी हो। बर्फ पर सुनहली किरणों के पड़ने से ऐसा मालूम पड़ता है, जैसे हिमालय ने अपने सिर पर इन्द्रधनुषी रंगों की पगड़ी बाँध रखी हो। फूलों के सम्पर्क से सुगन्धित वायु उसके शरीर पर मानो चन्दन का लेप कर जाती है, परन्तु हिमालय इन सभी चीजों से निर्लिप्त है। इन सभी वस्तुओं से उसे किसी प्रकार का अनुराग नहीं है; इसलिए वह महान् है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवयित्री ने इन पंक्तियों में हिमालय की महानता तथा वैराग्य का वर्णन किया है।
  2. भाषा-सरल, सुबोध खड़ी बोली।
  3.  शैली—चित्रात्मक और भावात्मक।
  4. रसशान्त।
  5. छन्द-अतुकान्त-मुक्त।
  6. गुण-माधुर्य।
  7. शब्दशक्ति-‘यह स्वर्णरश्मि छू-श्वेत भाल, बरसा जाती रंगीन हास’ में लक्षणो।
  8. अलंकार-यह स्वर्णरश्मि छु श्वेत भाल’ में रूपक, परिमल-मल-मल जाता बतास’ में पुनरुक्तिप्रकाश तथा हिमालय के मानव सदृश चित्रण में मानवीकरण का माधुर्य मन को आकर्षित करता है।

प्रश्न 2.
नभ में गर्वित झुकता न शीश,
पर अंक लिये है दीन क्षार; ।
मन गल जाता नत विश्व देख,
तन सह लेता है कुलिश भार !
कितने मृदु कितने कठिन प्राण !
उत्तर
गर्वित = गर्व से उठा हुआ। अंक = गोव। क्षार = राख। मन गल जाता = हृदय दया से भर जाता है। कुलिश = वज्र।]

प्रसंग-कवयित्री ने इन पंक्तियों में हिमालय की कठोरता और कोमलता का वर्णन किया है। |

व्याख्या-कवयित्री का कथन है कि हे हिमालय! स्वाभिमान से आकाश को छूने वाला तुम्हारा मस्तक किसी शक्ति के सम्मुख कभी नहीं झुकता है, फिर भी तुम्हारा हृदय इतना उदार है कि तुम अपनी गोद में तुच्छ धूल को भी धारण किये रहते हो। संसार को अपने चरणों में झुका देखकर तुम्हारा कोमल हृदय पिघलकर सरिताओं के रूप में प्रवाहित होने लगता है। हे हिमालय! तुम अपने शरीर पर वज्र के आघात सहकर भी विचलित नहीं होते। इस प्रकार तुम हृदय से कोमल और शरीर से कठोर हो।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. इन पंक्तियों में कवयित्री ने हिमालय का मानवीकरण करते हुए उसके कोमल एवं कठोर स्वरूप का चित्रण किया है।
  2. भाषा-सरल, साहित्यिक खड़ी बोली।
  3. शैलीचित्रात्मक और भावात्मक।
  4. रस–शान्त।
  5. छन्द-अतुकान्त-मुक्त।
  6. गुण-माधुर्य।
  7. शब्द-शक्ति–लक्षणा।
  8. अलंकार-‘कितने मृदु कितने कठिन प्राण’ में अनुप्रास एवं विरोधाभास, हिमालय के चित्रण में मानवीकरण।
  9. भावसाम्य-प्रसिद्ध संस्कृत कवि भवभूति ने श्रीराम में कोमलता : और कठोरता के विरोधाभासी लक्षणों को देखकर कहा था-

वज्रादपि कठोराणि, मृदूनि कुसुमादपि।
लोकोत्तराणां चेतांसि, को नु विज्ञातुमर्हसि ॥

प्रश्न 3.
टूटी है तेरी कब समाधि,
‘झंझा लौटे शत हार-हार;
बह चला दृगों से किन्तु नीर;
सुनकर जलते कण की पुकार !
सुख से विरक्त दुःख में समान ! [2014]
उत्तर
[ झंझा = आँधी। शत = सौ। दृग = नेत्रा नीर = पानी। जलते कण की पुकार = धूप से तप्त धूल के कणों की व्यथा।]

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में श्रीमती महादेवी वर्मा ने हिमालय की दृढ़ता तथा उसके हृदय की कोमलता का सुन्दर चित्रण किया है।

व्याख्या-महादेवी जी ने हिमालय को एक समाधिस्थ योगी के रूप में देखा है। वे उससे कहती हैं। कि हे हिमालय! सैकड़ों आँधी-तूफान तुझसे टकराते हैं और तुम्हारी दृढ़ता के सम्मुख हार मानकर लौट जाते हैं, किन्तु तुम अविचल भाव से समाधि में लीन रहते हो। इतनी बड़ी सहन-शक्ति और दृढ़ता होने पर भी तुच्छ धूल के जलते कण की करुण पुकार सुनकर तुम्हारी आँखों से करुणा के आँसू जल-धारा बनकर बहने लगते हैं। तुममें दृढ़ता है, पर हृदय की कोमलता भी है। तुम्हारी सुख-भोग में आसक्ति नहीं है। तुम सुख और दुःख में एक समान रहते हो। यह समत्व की भावना तुम्हारी उच्चता की द्योतक़ है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. जहाँ एक ओर हिमालय के बाहरी स्वरूप में कठोरता है, वहीं दूसरी ओर उसमें हृदय की करुणा भी विद्यमान है।
  2. कवयित्री ने प्रकृति का सुन्दर चित्रण किया है।
  3. भाषा-शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली।
  4. शैली-गीति।
  5. रस-शान्त।
  6. छन्द-अतुकान्त-मुक्त।
  7. गुणमाधुर्य।
  8. शब्दशक्ति-लक्षणा।
  9. अलंकार-‘हार-हार’ में पुनरुक्तिप्रकाश तथा हिमालय के चित्रण में मानवीकरण।
  10. भावसाम्य-कभी हँसना, कभी रोना और सुख-दुःख को समान भाव से ग्रहण करने के जिस जीवन-आदर्श को कवयित्री ने हिमालय के माध्यम से प्रस्तुत किया है, उसी का अपनी कविता में समर्थन करते हुए भगवतीचरण वर्मा कहते हैं छककर सुख-दुःख के घूटों को हम एक भाव से पिये चले।

प्रश्न 4.
मेरे जीवन का आज मूक,
तेरी छाया से हो मिलाप;
तन तेरी साधकता छू ले,
मन ले करुणा की थाह नाप !
उर में पावस दृग में विहान ! [2011]
उत्तर
[ साधकता = साधना का गुण। पावस = वर्षा ऋतु। विहान = प्रात:काल।]

प्रसंग-इन पंक्तियों में कवयित्री हिमालय की महानता का वर्णन करती हुई अपने जीवन को हिमालय के समान ढालना चाहती हैं। |

याख्या-महादेवी जी अपने जीवन को हिमालय की छाया में मिला देना चाहती हैं। तात्पर्य यह है। कि वे हिमालय के सद्गुणों को अपने आचरण में उतारना चाहती हैं। इसीलिए वे हिमालय से कहती हैं कि मेरी कामना है कि मेरा शरीर भी तुम्हारी तरह कठोर साधना-शक्ति से परिपूर्ण हो और हृदय में तुम्हारे जैसी करुणा का सागर भर जाए। मेरे हृदय में तुम्हारे जैसी करुणा की बरसात के कारण सरसता बनी रहे, परन्तु आँखों में ज्ञान की ज्योति जगमगाती रहे।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. महादेवी जी अपने तन-मन को हिमालय के समान साधना-शक्ति और करुणा से भर देना चाहती हैं।
  2. भाषा-साहित्यिक खड़ी बोली
  3. शैली-भावात्मक गीति।।
  4. रस-शान्त।
  5. गुण-माधुर्य।
  6. शब्दशक्ति–लक्षणा।
  7. छन्द-अतुकान्त-मुक्त।
  8. अलंकार–‘तन तेरी’ में अनुप्रास तथा हिमालय के चित्रण में मनवीकरण।
  9. भावसाम्यसुभद्राकुमारी चौहान भी करुणा से आकुल तान बनकर अपने प्रिय के प्राणों में बस जाना चाहती हैं

तुम कविता के प्राण बनो मैं ।
उन प्राणों की आकुल तान।
निर्जन वन को मुखरित कर दे
प्रिय ! अपना सम्मोहक गान ॥

वर्षा सुन्दरी के प्रति

प्रश्न 1.
रूपसि तेरा घन-केश-पाश !
श्यामल-श्यामल कोमल-कोमल
लहराता सुरभित केश-पाश ! |
नभ-गंगा की रजतधार में ।
धो आयी क्या इन्हें रात ?
कम्पित हैं तेरे सज़ल अंग,
सिहरा सा तन है सद्यस्नात!
भीगी अलकों के छोरों से
चूती बूंदें कर विविध लास !
रूपसि तेरा घन-केश-पाश ! [2013, 16, 17]
उत्तर
[ रूपसि = सुन्दरी। घन = बादल। केश-पाश = बालों का समूह। नभ-गंगा = आकाश-गंगा। रजतधार = चाँदी के समान सफेद जल की धारा। सद्यस्नात = तत्काल स्नान की हुई। अलकों = बालों। चूती = टपकती। लास = आनन्दपूर्वक नृत्य। ]

सन्दर्भ-प्रस्तुत काव्य-पंक्तियाँ श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा रचित ‘नीरजा’ नामक ग्रन्थ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘काव्य-खण्ड’ में संकलित ‘वर्षा सुन्दरी के प्रति’ शीर्षक कविता से अवतरित हैं। ||

विशेष—इस शीर्षक के शेष समस्त पद्यांशों की व्याख्या में यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।

प्रसंग–यहाँ कवयित्री ने वर्षा का सुन्दरी नायिका के रूप में चित्रण कर उसके सौन्दर्य का बड़ा ही मोहक वर्णन किया है।

व्याख्या-कवयित्री वर्षा सुन्दरी को सम्बोधित करती हुई कहती है कि हे वर्षा सुन्दरी! तेरा बादलरूपी काले-काले बालों का समूह अत्यधिक सुन्दर है। तुम्हारे कोमल, काले और सुगन्धित बाल हवा में लहरा रहे हैं, जो कि बहुत अच्छे लगते हैं। तात्पर्य यह है कि वायु से लहराते हुए बादल ही तुम्हारे सुन्दर बाल हैं।

कवयित्री पूछती है कि हे वर्षा सुन्दरी! क्या तुम अपने इन बालों को रात में आकाश-गंगा की चाँदी के समान उजली जल-धारा में धोकर आयी हो? क्योंकि तुम्हारे सम्पूर्ण अंग जल में भीगे होने के कारण शीत से काँप रहे हैं। तुम्हारे रोमांचित और सिहरते शरीर को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे तुम अभी स्नान करके आयी हो; क्योंकि तुम्हारे भीगे बालों से जल की बूंदें नृत्य करती हुई-सी नीचे टपक रही हैं। हे वर्षा सुन्दरी! तुम्हारे बादलरूपी घने बालों का समूह बहुत ही सुन्दर प्रतीत हो रहा है। |

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. वर्षा को सद्य:स्नाता सुन्दरी के रूप में चित्रित किया गया है।
  2. भाषा–साहित्यिक खड़ी बोली।
  3. शैली—चित्रात्मक
  4. रस-शृंगार।
  5. गुण-माधुर्य।
  6. छन्द-अतुकान्त-मुक्त।
  7. अलंकार-‘रूपसि तेरा घन-केश-पाश!’ में रूपक, ‘श्यामल-श्यामल कोमल-कोमल’ में पुनरुक्तिप्रकाश, वर्षा के सुन्दरी रूप में चित्रण करने के कारण मानवीकरण तथा अनुप्रास।

प्रश्न 2.
सौरभ भीनी झीना गीला
लिपटा मृदु अंजन-सा दुकूल;
चल अंचल में झर-झर झरते।
पथ में जुगनू के स्वर्ण-फूल;
दीपक से देता बार-बार |
तेरा उज्ज्वल चितवन-विलास !
रूपसि तेरा घन-केश-पाश ! [2014, 15]
उत्तर
[सौरभ = सुगन्ध। भीना = सुरभित हुआ। झीना = पतला। अंजन = काजल। दुकूल = रेशमी वस्त्र, दुपट्टा। चल = हिलते हुए, चलायमान। जुगनू के स्वर्ण-फूल = जुगनूरूपी सुनहरे फूल देता बार-बार = जला देता है। चितवन विलास = दृष्टि की भंगिमा।]

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में वर्षा सुन्दरी के श्रृंगार का अद्भुत वर्णन किया गया है।

व्याख्या–कवयित्री कहती है कि हे वर्षारूपी नायिका! तुमने बादलों के रूप में एक सुगन्धित, पारदर्शक, कुछ गीला एवं हल्का काले रंग का झीना रेशमी वस्त्र धारण कर लिया है। आकाश में चमकने वाले जुगनू ऐसे लग रहे हैं, मानो तुम्हारे हिलते हुए आँचल से मार्ग में सोने के फूल झर रहे हों। बादलों में चमकती बिजली ही तुम्हारी उज्ज्वल चितवन है। जब तुम अपनी ऐसी सुन्दर दृष्टि किसी पर डालती हो तो उसके मन में प्रेम के दीपक जगमगाने लगते हैं। हे रूपवती वर्षा सुन्दरी! तुम्हारी बादलरूपी केश-राशि अत्यधिक सुन्दर है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवयित्री ने प्रकृति के मानवीकरण के सहारे उसकी भाव-भंगिमाओं को सुन्दर वर्णन किया है।
  2. वर्षाकाल की विभिन्न वस्तुओं का वर्षा-सुन्दरी के श्रृंगार-प्रसाधनों के रूप में प्रयोग किया गया है।
  3. भाषा-साहित्यिक खड़ी बोली।
  4. शैली—चित्रात्मक और प्रतीकात्मक।
  5. रस-शृंगार।
  6. गुण-माधुर्य।
  7. छन्द-अतुकान्त-मुक्त।
  8. अलंकार–तेरा उज्ज्वल चितवन-विलास’ में रूपक, ‘मृदु अंजन-सा दुकूल’ में उपमा, वर्षा के चित्रण में मानवीकरण तथा अनुप्रास।

प्रश्न 3.
उच्छ्वसित वक्ष पर चंचल है।
बक-पाँतों का अरविन्द हार;
तेरी निश्वासे छू भू को
बन-बन जातीं मलयज बयार;
केकी-रव की नृपुर-ध्वनि सुन
जगती जगती की मूक प्यास !
रूपसि तेरा घन-केश-पाश ! [2013]
उत्तर
[उच्छ्वसित = श्वास-प्रश्वास (साँस) के कारण ऊपर-नीचे उठता हुआ। वक्ष पर = छाती पर। चंचल = चलायमान है, हिल-डुल रहा है। बक-पाँत = बगुलों की पंक्ति। अरविन्द = कमल। निश्वास = बाहर निकलने वाली श्वास। मलयज = मलय (चन्दन) के पर्वत से आने वाली। बयार = वायु। केकी-रव = मयूर की ध्वनि। नूपुर = पायल। जगती = जाग्रत होती है, संसार।].

प्रसंग-इन पंक्तियों में वर्षारूपी सुन्दर रमणी के सौन्दर्य का आलंकारिक वर्णन हुआ है।

व्याख्या-हे वर्षारूपी सुन्दरी! साँस लेने के कारण ऊपर उठे तथा कम्पित तेरे वक्ष-स्थल पर आकाश में उड़ते हुए बगुलों की पंक्तियोंरूपी श्वेत कमलों का हार हिलता हुआ-सा मालूम पड़ रहा है। जब तुम्हारे मुख से निकली बूंदरूपी साँसें पृथ्वी पर गिरती हैं तो उसके पृथ्वी के स्पर्श से उठने वाली एक प्रकार की महक, मलयगिरि की सुगन्धित वायु के समान प्रतीत होती है। तुम्हारे आगमन पर चारों ओर नृत्य करते हुए मोरों की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ने लगती है, जो कि तुम्हारे पैरों में बँधे हुए धुंघरुओं के समान मालूम पड़ती है, जिसको सुनकर लोगों के मन में मधुर प्रेम की प्यास जाग्रत होने लगती है। तात्पर्य यह है कि मोरों की मधुर आवाज से वातावरण में जो मधुरता छा जाती है, वह लोगों को आनन्द और उल्लास से जीने की प्रेरणा प्रदान करती है। उनके हृदय में मौन रूप में छिपा हुआ प्यार मुखर रूप धारण कर लेता है जो उनकी जीने की इच्छा को बलवती बनाता है। हे वर्षारूपी सुन्दरी! तुम्हारी बादलरूपी बालों की राशि अत्यधिक सुन्दर है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवयित्री ने वर्षा का मानवीकरण करके उसके मोहक रूप का चित्रण किया है।
  2. भाषा-साहित्यिक खड़ी बोली।
  3. शैली-चित्रात्मक।
  4. रस-शृंगार।
  5. गुणमाधुर्य।
  6. छन्द-अतुकान्त-मुक्त।
  7. अलंकार-उच्छ्वसित वक्ष पर चंचल है’ में रूपक, ‘बन-बन में पुनरुक्तिप्रकाश जगती, जगती’ में यमक और अनुप्रास।

प्रश्न 4.
इन स्निग्ध लटों से छा दे तन
पुलकित अंकों में भर विशाल;
झुक सस्मित शीतल चुम्बन से ।
अंकित कर इसका मृदल भाल;
दुलरा दे ना, बहला दे ना |
यह तेरा शिशु जग है उदास !
रूपसि तेरा घन-केश-पाश !
उत्तर
[ स्निग्ध = चिकनी। पुलकित = रोमांचित। सस्मित = मुस्कराते हुए। अंकित = चिह्नित। मृदल = सुन्दर। दुलराना = प्यार करना। शिशु जग = संसाररूपी बालक।]

प्रसंग-इन पंक्तियों में महादेवी वर्मा ने वर्षारूपी सुन्दरी को एक माता के रूप में चित्रित किया है।

व्याख्या-कवयित्री वर्षारूपी सुन्दरी से आग्रह करती है कि हे वर्षा सुन्दरी! तुम अपने कोमल बालों की छाया में इस संसाररूपी अपने शिशु को समेट लो। उसे अपनी रोमांचित एवं विशाल गोद में रखकर उसका सुन्दर मस्तक अपने बादलरूपी बालों से ढककर अपने हँसीयुक्त शीतल चुम्बन से चूम लो। हे सुन्दरी! तुम्हारे बादलरूपी बालों की छाया से, मधुर चुम्बन और दुलार से इस संसाररूपी; शिशु का मन बहल जाएगा और उसकी उदासी दूर हो जाएगी। हे वर्षारूपी सुन्दरी! तुम्हारी बादल रूपी काली केश-राशि बड़ी मोहक लग रही है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. वर्षा में मातृत्व का सजीव चित्रण हुआ है तथा बच्चे के प्रति माता के कर्तव्य को समझाया गया हैं।
  2. प्रकृति का ऐसा सुन्दर चित्रण कम ही देखने को मिलता है।
  3. भाषासाहित्यिक खड़ी बोली।
  4. शैली—चित्रात्मक और भावात्मक।
  5. रस-शृंगार एवं वात्सल्य।
  6. गुण-माधुर्य।
  7. छन्द-अतुकान्त-मुक्त।
  8. अलंकाररूपक और मानवीकरण।

काव्य-सौदर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है?
(क) तने सह लेता है कुलिश भार !
कितने मृदु कितने कठिन प्राण !
(ख) रूपसि तेरा घन-केश-पाश !
श्यामल-श्यामल कोमल-कोमल
लहराता सुरभित केश-पाश !
उत्तर
(क) विरोधाभास अलंकार तथा
(ख) रूपक और पुनरुक्तिप्रकाश।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पदों में उपसर्ग और प्रत्ययों को मूल-शब्दों से अलग करके लिखिए-
गर्वित, विरक्त, दुकूल, मलयज, सस्मित।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 6 महादेवी वर्मा (काव्य-खण्ड) img-1

निम्नलिखित पदों का सनाम समास-विग्रह कीजिए-
स्वर्णरश्मि, हिमनिधान, सजल, अनन्त, ऋतुराज।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 6 महादेवी वर्मा (काव्य-खण्ड) img-2