Chapter 7 Security in the Contemporary World (समकालीन विश्व में सुरक्षा)

Text Book Questions

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पदों को उनके अर्थ से मिलाएँ-
(1) विश्वास बहाली के उपाय (कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स-CBMs)
(2) अस्त्र-नियन्त्रण
(3) गठबन्धन
(4) निरस्त्रीकरण
(क) कुछ खास हथियारों के इस्तेमाल से परहेज।
(ख) राष्ट्रों के बीच सुरक्षा मामलों पर सूचनाओं के आदान-प्रदान की नियमित प्रक्रिया।
(ग) सैन्य हमले की स्थिति से निबटने अथवा उसके अवरोध के लिए कुछ राष्ट्रों का आपस में मेल करना।
(घ) हथियारों के निर्माण अथवा उनको हासिल करने पर अंकुश।
उत्तर:
(1) विश्वास बहाली के उपाय (कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स-CBMs)-
(ख) राष्ट्रों के बीच सुरक्षा मामलों पर सूचनाओं के आदान-प्रदान की नियमित प्रक्रिया।

(2) अस्त्र-नियन्त्रण
(घ) हथियारों के निर्माण अथवा उनको हासिल करने पर अंकुश।

(3) गठबन्धन
(ग) सैन्य हमले की स्थिति से निबटने अथवा उसके अवरोध के लिए कुछ राष्ट्रों का आपस में मेल करना।

(4) निरस्त्रीकरण
(क) कुछ खास हथियारों के इस्तेमाल से परहेज।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से किसको आप सुरक्षा का परम्परागत सरोकार/सुरक्षा का अपारम्परिक सरोकार/खतरे की स्थिति नहीं’ का दर्जा देंगे-
(क) चिकनगुनिया/डेंगू बुखार का प्रसार।
(ख) पड़ोसी देश से कामगारों की आमद।
(ग) पड़ोसी राज्य से कामगारों की आमद।
(घ) अपने इलाके को राष्ट्र बनाने की माँग करने वाले समूह का उदय।
(ङ) अपने इलाके को अधिक स्वायत्तता दिए जाने की माँग करने वाले समूह का उदय।
(च) देश की सशस्त्र सेना को आलोचनात्मक नजर से देखने वाला अखबार।
उत्तर:
(क) अपारम्परिक सरोकार
(ख) पारम्परिक सरोकार
(ग) खतरे की स्थिति नहीं
(घ) अपारम्परिक सरोकार
(ङ) खतरे की स्थिति नहीं
(च) पारम्परिक सरोकार।

प्रश्न 3.
परम्परागत और अपारम्परिक सुरक्षा में क्या अन्तर है? गठबन्धनों का निर्माण करना और इनको बनाए रखना इनमें से किस कोटि में आता है?
उत्तर:
सुरक्षा के दो दृष्टिकोण हैं-

  1. पारम्परिक सुरक्षा एवं
  2. अपारम्परिक सुरक्षा।

1. पारम्परिक सुरक्षा-सुरक्षा की पारम्परिक धारणा में बाह्य दृष्टि से सैन्य खतरों पर ध्यान होता है तथा सुरक्षा नीति का सम्बन्ध मुख्यतया युद्ध की आशंका को रोकने से होता है। साथ ही इसमें सुरक्षा नीति में राष्ट्रों के मध्य अपने पक्ष में शक्ति सन्तुलन बनाना तथा सैनिक गठबन्धनों का निर्माण भी शामिल है। पारम्परिक धारणा में माना जाता है कि किसी देश की सुरक्षा को मुख्य खतरा उसकी सीमा के बाहर से होता है। इसका मुख्य कारण अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था का स्वरूप है जिसमें राष्ट्रीय व्यवस्था की तरह कोई केन्द्रीय सत्ता नहीं है, जो सभी राष्ट्रों को नियन्त्रित कर सके। अतः विश्व राजनीति में प्रत्येक राष्ट्र को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी पड़ती है।

परम्परागत सुरक्षा का सम्बन्ध आन्तरिक सुरक्षा से भी है। यद्यपि पश्चिमी देश द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले अपनी आन्तरिक सुरक्षा के प्रति आश्वस्त थे, लेकिन सन् 1945 के बाद शीतयुद्धजनित संघर्ष तथा उपनिवेशों में राष्ट्रवादी आन्दोलन ने आन्तरिक सुरक्षा की चुनौतियाँ उत्पन्न की। जबकि नवोदित राष्ट्रों में आन्तरिक सुरक्षा की मुख्य समस्या पड़ोसी देशों से युद्ध तथा आन्तरिक संघर्ष को लेकर उत्पन्न हुई। सुरक्षा के पारम्परिक तरीकों में निःशस्त्रीकरण, अस्त्र-नियन्त्रण तथा राष्ट्रों के मध्य शान्ति की बहाली प्रमुख थे।

2. अपारम्परिक सुरक्षा-अपारम्परिक सुरक्षा में केवल सैन्य खतरों को ही नहीं बल्कि मानवीय अस्तित्व पर चोट करने वाले व्यापक खतरों व आशंकाओं को शामिल किया जाता है। इस धारणा में सिर्फ राज्य की ही नहीं बल्कि व्यक्तियों और समुदायों या कहें समूची मानवता को सुरक्षा की आवश्यकता है। अपारम्परिक सुरक्षा को मानवता की सुरक्षा अथवा विश्व रक्षा कहा जाता है। इस सुरक्षा में सैन्य खतरों के साथ-साथ व्यक्तियों की सुरक्षा से जुड़े गैर-सैन्य खतरों; जैसे—आन्तरिक जातीय संघर्ष, अकाल, महामारी, अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद, पर्यावरण सुरक्षा (ग्लोबल वार्मिंग) आर्थिक सुरक्षा तथा मानवीय गरिमा के संकटों को शामिल किया जाता है। इसमें निर्धनता, गरीबी व असमानता जैसी समस्याएँ भी शामिल हैं।

पारम्परिक व अपारम्परिक सुरक्षा में अन्तर

(1) पारम्परिक सुरक्षा की धारणा में जहाँ आन्तरिक व बाह्य सैन्य खतरों को शामिल किया जाता है, वहीं अपारम्परिक सुरक्षा में मानवता की रक्षा व विश्व-रक्षा को शामिल किया जाता है। इसके व्यापक दृष्टिकोण में ‘अभाव से मुक्ति’ तथा ‘भय से मुक्ति’ जैसे तत्त्वों को शामिल किया जाता है।

(2) पारम्परिक सुरक्षा में जहाँ सैन्य खतरों से निपटने के लिए शक्ति-सन्तुलन, सैन्य गठबन्धन, अस्त्रनियन्त्रण, निशस्त्रीकरण तथा आपसी विश्वास जैसे तरीकों पर जोर दिया जाता है, वहीं अपारम्परिक सुरक्षा में खतरों से निबटने के लिए सैन्य संघर्ष नहीं बल्कि, अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की रणनीतियों पर बल दिया जाता है। यह सहयोग द्विपक्षीय, क्षेत्रीय अथवा वैश्विक स्तर पर हो सकता है।
सैन्य गठबन्धनों का निर्माण करना तथा उन्हें बनाए रखना पारम्परिक सुरक्षा की धारणा के अन्तर्गत शामिल किया जाता है। यह सैन्य सुरक्षा का एक साधन है।

प्रश्न 4.
तीसरी दुनिया के देशों और विकसित देशों की जनता के सामने मौजूद खतरों में क्या अन्तर है?
उत्तर:
तीसरी दुनिया के देशों और विकसित देशों की जनता के सामने मौजूद खतरों में अन्तर-

  1. विकसित देशों के लोगों को केवल बाहरी खतरे की आशंका रहती है, परन्तु तीसरी दुनिया के देशों को आन्तरिक व बाह्य दोनों प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ता है।
  2. तीसरी दुनिया के लोगों को पर्यावरण असन्तुलन के कारण विकसित देशों की जनता के मुकाबले अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

प्रश्न 5.
आतंकवाद सुरक्षा के लिए परम्परागत खतरे की श्रेणी में आता है या अपरम्परागत?
उत्तर:
अपराम्परागत खतरे की श्रेणी में आता है।

प्रश्न 6.
सुरक्षा के परम्परागत दृष्टिकोण के हिसाब से बताएं कि यदि किसी राष्ट्र पर खतरा मँडरा रहा हो तो उसके सामने क्या विकल्प होते हैं?
उत्तर:
सुरक्षा की पारम्परिक अवधारणा में सैन्य खतरे को किसी देश के लिए सबसे खतरनाक माना जाता है। परम्परागत धारणा में मुख्य रूप से सैन्य बल के प्रयोग अथवा सैन्य बल के प्रयोग की आशंका पर अंधिक बल दिया जाता है। इस धारणा में माना जाता है कि सैन्य बल से सुरक्षा को खतरा पहुँचता है और सैन्य बल से ही सुरक्षा को बनाए रखा जा सकता है। इसीलिए परम्परागत सुरक्षा में शक्ति-सन्तुलन, सैन्य गठबन्धन तथा अन्य किसी तरीके से सैन्य-शक्ति के विकास आदि पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जाता है।

मूलत: किसी राष्ट्र के पास युद्ध की स्थिति में तीन विकल्प होते हैं-

  1. शत्रु देश के सामने आत्मसमर्पण कर देना।
  2. शत्रु देश को युद्ध से होने वाले खतरे।
  3. शत्रु देश के साथ युद्ध करके, उसे पराजित करना।

उपर्युक्त विकल्पों के आलोक में सुरक्षा नीति का सम्बन्ध युद्ध की आशंका को रोकने से होता है जिसे ‘अपरोध’ कहते हैं और युद्ध को सीमित रखने तथा उन्हें समाप्त करने से होता है जिसे ‘रक्षा’ कहा जाता है।

संक्षेप में, परम्परागत सुरक्षा रणनीति में मुख्य तत्त्व विरोधी के सैन्य आक्रमण के खतरे को समाप्त करने या सीमित करने से होता है।

प्रश्न 7.
शक्ति सन्तुलन क्या है? कोई देश उसे कैसे कायम करता है?
उत्तर:
शक्ति सन्तुलन का अर्थ एवं परिभाषा शक्ति अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का केन्द्र बिन्दु है। आधुनिक विद्वानों ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को ‘शक्ति की राजनीति’ की संज्ञा प्रदान की है। शक्ति सन्तुलन सिद्धान्त की सहायता से अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक घटनाओं और राजनीतिज्ञों की नीतियों की विवेचना की जाती है। अत: शक्ति सन्तुलन की अवधारणा का अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में व्यापक महत्त्व है।

शक्ति सन्तुलन की परिभाषा

  1. श्लीचर के अनुसार, “शक्ति सन्तुलन व्यक्तियों तथा समुदायों की सापेक्ष शक्ति की ओर संकेत करता है।”
  2. मार्गेन्थो के अनुसार, “प्रत्येक राष्ट्र परिस्थिति को बनाए रखने अथवा परिवर्तित करने के लिए दूसरे राष्ट्रों की अपेक्षा अधिक शक्ति प्राप्त करने की इच्छा रखता है इसके परिणामस्वरूप जिस ढाँचे की आवश्यकता होती है, वह शक्ति सन्तुलन कहलाता है।”

सामान्य अर्थ में, शक्ति सन्तुलन का अभिप्राय यह है कि अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में किसी क्षेत्र को इतना अधिक शक्तिशाली न बनने दिया जाए, जिससे कि वह अन्य राष्ट्रों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर सके। जब कोई राष्ट्र अपनी शक्ति का विस्तार करने लगता है, तो अन्य राष्ट्र उस पर सैन्य शक्ति द्वारा अंकुश लगा देते हैं। इस अंकुश को ही हम ‘शक्ति सन्तुलन’ की संज्ञा दे सकते हैं।
शक्ति सन्तुलन बनाए रखने के उपाय-किसी देश में शक्ति सन्तुलन बनाए रखने के उपाय निम्नलिखित हैं-

  1. शक्ति सन्तुलन बनाने के लिए एक साधारण तरीका गठजोड़ है। यह प्रणाली बहुत पुरानी है। इसका उद्देश्य होता है किसी राष्ट्र की शक्ति बढ़ाना। छोटे और मध्यम राज्य इस प्रणाली द्वारा अस्तित्व बनाए रखते हैं।
  2. शक्ति सन्तुलन बनाए रखने का एक तरीका शस्त्रीकरण एवं निःशस्त्रीकरण है। शक्ति सन्तुलन बनाए । रखने के लिए विभिन्न राज्यों ने समय-समय पर शस्त्रीकरण एवं निःशस्त्रीकरण पर जोर दिया है।

प्रश्न 8.
सैन्य संगठन के क्या उद्देश्य होते हैं? किसी ऐसे सैन्य गठबन्धन का नाम बताइए जो अभी मौजूद है तथा इस गठबन्धन के उद्देश्य भी बताएँ।
उत्तर:
पारम्परिक सुरक्षा नीति का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है—सैन्य गठबन्धन बनाना। सैन्य गठबन्धन में कई देश शामिल होते हैं।
सैन्य गठबन्धन के उद्देश्य-सैन्य गठबन्धन का मुख्य उद्देश्य विपक्षी शत्रु राष्ट्र के आक्रमण को रोकना अथवा उससे रक्षा के लिए सामूहिक सैन्य कार्रवाई करना होता है।

नाटो (NATO)-अमेरिका के नेतृत्व वाले पूँजीवादी गुट का प्रमुख सैन्य संगठन NATO अथवा उत्तरी अटलाण्टिक सन्धि संगठन है जिसकी स्थापना 4 अप्रैल, 1949 में हुई थी। साम्यवादी गुट का रूस के नेतृत्व में ‘वारसा’ सन्धि संगठन प्रमुख गठबन्धन था जो सन् 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद समाप्त कर दिया गया था, परन्तु ‘नाटो’ (NATO) अभी अस्तित्व में है। वर्तमान में ‘नाटो’ संगठन में अमेरिका सहित यूरोप के 19 देश शामिल हैं। नाटो के चार्टर में 14 धाराएँ हैं।

नाटो (NATO) संगठन के प्रमुख उद्देश्य-

  1. पश्चिमी यूरोप में सोवियत गुट के प्रभाव को रोकना।
  2. धारा-5 के अनुसार नाटो के एक सदस्य पर आक्रमण सभी सदस्यों पर आक्रमण समझा जाएगा। अत: सभी सदस्य सामूहिक सैन्य प्रयास करेंगे।
  3. सदस्यों में आत्म सहायता तथा पारस्परिक सहायता का विकास करना, जिससे वे सशस्त्र आक्रमण के विरोध की क्षमता का विकास कर सकें।
  4. नाटो के अन्य उद्देश्य हैं—सदस्यों में आर्थिक सहयोग को बढ़ाना तथा उसके विवादों का शान्तिपूर्ण समाधान।

प्रश्न 9.
पर्यावरण के तेजी से हो रहे नुकसान से देशों की सुरक्षा को गम्भीर खतरा उत्पन्न हो गया है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? उदाहरण देते हुए तर्कों की पुष्टि करें।
उत्तर:
सुरक्षा के अपारम्परिक खतरों में से एक प्रमुख खतरा पर्यावरण में बढ़ रहा प्रदूषण है। पर्यावरण प्रदूषण की प्रकृति वैश्विक है। इसके दुष्परिणामों की सीमा राष्ट्रीय नहीं है। वैश्विक पर्यावरण की समस्याओं से मानव जाति को सुरक्षा का खतरा उत्पन्न हो गया है। वैश्विक पर्यावरण की चुनौती निम्नलिखित कारणों से है-

(1) कृषि योग्य भूमि, जलस्रोत तथा वायुमण्डल के प्रदूषण से खाद्य उत्पादन में कमी आई है तथा यह मानव स्वास्थ्य के लिए घातक है। वर्तमान में विकासशील देशों की लगभग एक अरब बीस करोड़ जनता को स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है।

(2) धरती के ऊपर वायुमण्डल में ओजोन गैस की कमी के कारण मानव-स्वास्थ्य के लिए गम्भीर खतरा मँडरा रहा है।

(3) सर्वाधिक खतरे का प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक ताप वृद्धि) की समस्या है जिसका प्रमुख कारण प्रदूषण है। प्रदूषण के कारण विश्वव्यापी तापमान में निरन्तर वृद्धि हो रही है। उदाहरण के लिए, वैश्विक ताप वृद्धि से ध्रुवों पर जमी बर्फ पिघल जाएगी। यदि समुद्रतल दो मीटर ऊपर उठता है तो बंगलादेश का 20 प्रतिशत हिस्सा डूब जाएगा, कमोबेश पूरा मालदीव समुद्र में समा जाएगा तथा थाईलैण्ड की 20 प्रतिशत जनसंख्या डूब जाएगी।

उपर्युक्त उदाहरण से स्पष्ट है कि पर्यावरण के नुकसान से देशों की सुरक्षा को गम्भीर खतरा उत्पन्न हो गया है। इन खतरों का सामना सैन्य तैयारी से नहीं किया जा सकता। इसके लिए विश्व स्तर पर अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है। ज्ञातव्य है कि पर्यावरण की समस्या के समाधान के लिए वर्ष 1992 में ब्राजील में ‘पृथ्वी सम्मेलन’ आयोजित किया गया था जिसमें 170 देशों ने भाग लिया था।

प्रश्न 10.
देशों के सामने फिलहाल जो खतरे मौजूद हैं उनमें परमाण्विक हथियार की सुरक्षा अथवा अवरोध के लिए बड़ा सीमित उपयोग रह गया है। इस कथन का विस्तार करें।
उत्तर:
वर्तमान में सुरक्षा की पारम्परिक धारणा सार्थक नहीं रह गयी है, क्योंकि सैन्य खतरों के अतिरिक्त, सुरक्षा के लिए खतरे; जैसे-आतंकवाद, पर्यावरण क्षरण, जातीय संघर्ष, निर्धनता व गरीबी तथा जनता के मूल मानवाधिकारों का हनन आदि उत्पन्न हो गए हैं। इन नए खतरों का सामना आण्विक हथियारों से नहीं किया जा सकता। आण्विक हथियारों की उपयोगिता पारम्परिक सैन्य आक्रमण की आशंका को रोकने में हो सकती है, लेकिन आज के समय में सुरक्षा के बड़े नवीन खतरे हैं उन्हें परमाणु शक्ति द्वारा रोका जा सकता।

उदाहरण के लिए आतंकवाद एक गुप्त युद्ध है। आतंकवाद की स्थिति में किसके विरुद्ध परमाणु हथियारों का प्रयोग किया जाएगा अथवा पर्यावरण के क्षेत्र में वैश्विक ताप वृद्धि को रोकने अथवा विश्व निर्धनता या एड्स जैसी महामारियों की रोकथाम में परमाणु शक्ति कैसे कारगर होगी। वैसे भी शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद परमाणु हथियारों की दौड़ धीमी पड़ गई है। अत: यह कथन उपयुक्त है कि सुरक्षा के वर्तमान खतरों का सामना करने में परमाणु हथियारों की उपयोगिता सीमित है।

प्रश्न 11.
भारतीय परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए किस किस्म की सुरक्षा को वरीयता दी जानी चाहिए-पारम्परिक या अपारम्परिक? अपने तर्क की पुष्टि में आप कौन-से उदाहरण देंगे?
उत्तर:
यदि भारतीय परिदृश्य पर गौर किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय सुरक्षा को पारम्परिक व अपारम्परिक दोनों ही प्रकार के खतरे हैं। अत: पारम्परिक व अपारम्परिक दोनों ही प्रकार की सुरक्षा पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है।

उदाहरण के लिए, भारत के लिए पड़ोसी देशों विशेषकर पाकिस्तान व चीन से पारम्परिक सैन्य खतरा बना हुआ है। पाकिस्तान ने 1947-48, 1965, 1971 तथा 1999 में तथा चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण किया था। पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमता का विस्तार कर रहा है तथा चीन की सैन्य क्षमता भारत से अधिक है। दूसरी तरफ भारत के कई क्षेत्रों, यथा-कश्मीर, नागालैण्ड, असम आदि में अलगाववादी हिंसक गुट तथा कुछ क्षेत्रों में नक्सलवादी समूह सक्रिय हैं। अत: भारत की आन्तरिक सुरक्षा को भी खतरा है।

ये खतरे पारम्परिक खतरों की श्रेणी में शामिल हैं। जहाँ तक अपारम्परिक सुरक्षा का सम्बन्ध है, भारत में प्रमुख चुनौती पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवादी गतिविधियों से है। आतंकवाद का विस्तार भारत में निरन्तर हो रहा है। अयोध्या व काशी में विस्फोट, मुम्बई में विस्फोट तथा संसद पर आतंकवादी हमला इसके उदाहरण हैं। अत: भारत को आतंकवाद से निपटने के लिए अपारम्परिक सुरक्षा पर भी ध्यान देना होगा। अपारम्परिक सुरक्षा की दृष्टि से एड्स जैसी महामारियों की रोकथाम, मानवाधिकारों की रक्षा, जातीय व धार्मिक संघर्ष, निर्धनता व स्वास्थ्य की समस्या का समाधान भी आवश्यक है।

निष्कर्षतः भारत में पारम्परिक व अपारम्परिक दोनों ही सुरक्षा तत्त्वों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 12.
नीचे दिए गए कार्टून को समझें। कार्टून में युद्ध और आतंकवाद का जो सम्बन्ध दिखाया गया है उसके पक्ष या विपक्ष में एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 7 Security in the Contemporary World 1
उत्तर:
दिए गए चित्र में युद्धरूपी विशाल सूअर द्वारा आतंकवादी बच्चों को दूध पिलाते दिखाया गया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि युद्ध द्वारा ही आतंकवाद को जन्म मिलता है तथा युद्ध अथवा संघर्ष की स्थिति में आतंकवाद पोषित होता है तथा फलता-फूलता है। अत: चित्र में आतंकवाद व युद्ध के मध्य दर्शाया गया सम्बन्ध उचित है।

इस सम्बन्ध के पक्ष में कई तर्क दिए जा सकते हैं-

प्रथम, युद्ध दो पक्षों के बीच वैचारिक अथवा हितों की असहमति से उपजा संघर्ष है। इसमें जो पक्ष कमजोर होता है वह अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए आतंकवाद का सहारा लेता है।

द्वितीय, यदि हम वर्तमान में विश्व स्तर पर आतंकवाद को देखें तो स्पष्ट है कि उसके पीछे किसी विचारधारा व हितों का संघर्ष निहित है।

उदाहरण के लिए, मध्यपूर्व में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के कारण इराक, ईरान, फिलिस्तीन व लेबनान में आतंकवादी गतिविधियों को बल मिला। इसी प्रकार जब सोवियत संघ की सेनाओं ने अफगानिस्तान में घुसपैठ की तो निर्वासित कट्टरपन्थियों को अमेरिका व पाकिस्तान ने सहायता पहुँचाई। यही कट्टरपन्थी तालिबान के नाम से सम्पूर्ण विश्व में आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न हैं। भारत-पाकिस्तान के मध्य सैन्य-संघर्ष की स्थिति के कारण कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा मिला है।

अतः इससे स्पष्ट है कि युद्ध द्वारा आतंकवाद को पोषित किया जाता है तथा संघर्ष की स्थिति में आतंकवाद फलता-फूलता है।

UP Board Class 12 Civics Chapter 7 InText Questions

UP Board Class 12 Civics Chapter 7 पाठान्तर्गत प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मेरी सुरक्षा के बारे में किसने फैसला किया? कुछ नेताओं और विशेषज्ञों ने? क्या मैं अपनी सुरक्षा का फैसला नहीं कर सकती?
उत्तर:
यद्यपि व्यक्ति स्वयं अपनी सुरक्षा का फैसला कर सकता है, लेकिन यदि यह फैसला नेताओं और विशेषज्ञों द्वारा किया गया है तो हम उनके अनुभव और अनुसन्धान का लाभ उठाते हुए उचित निर्णय ले सकते हैं।

प्रश्न 2.
आपने ‘शान्ति सेना’ के बारे में सुना होगा। क्या आपको लगता है कि ‘शान्ति-सेना’ का होना स्वयं में एक विरोधाभासी बात है?
UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 7 Security in the Contemporary World 2
उत्तर:
भारत द्वारा श्रीलंका में भेजी गई शान्ति-सेना के बारे में हमने समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में पढ़ा है। इस कार्टून के द्वारा यह दर्शाने का प्रयत्न किया गया है कि जो सैन्य शक्ति का प्रतीक है, जिसकी कमर पर बन्दूक और युद्ध सामग्री है, वह कबूतर पर सवार है।

कबूतर को शान्तिदूत माना जाता है लेकिन शक्ति के बल पर शान्ति स्थापित नहीं की जा सकती और यदि इसे शक्ति के बल पर स्थापित कर भी दिया गया तो वह शान्ति अस्थायी होगी तथा कुछ समय गुजरने के बाद वह एक नवीन संघर्ष, तनाव तथा हिंसात्मक घटनाओं को जन्म देगी।

प्रश्न 3.
जब कोई नया देश परमाणु शक्ति-सम्पन्न होने की दावेदारी करता है तो बड़ी ताकतें क्या रवैया अख्तियार करती हैं?
उत्तर:
जब कोई नया देश परमाणु शक्ति-सम्पन्न होने की दावेदारी करता है तो बड़ी ताकतें उसके प्रति शत्रुता एवं दोषारोपण का रवैया अख्तियार करती हैं। यथा-

प्रथमतः वे यह कहती हैं कि इससे विश्व-शान्ति एवं सुरक्षा के लिए खतरा बढ़ गया है।

दूसरे, वे यह आरोप लगाती हैं कि एक नए देश के पास परमाणु शक्ति होगी तो उसके पड़ोसी भी अपनी सुरक्षा की चिन्ता की आड़ में परमाणु परीक्षण करने लगेंगे। इससे विनाशकारी शस्त्रों की बेलगाम दौड़ शुरू हो जाएगी।

तीसरे, ये बड़ी शक्तियाँ उसकी आर्थिक नाकेबन्दी, व्यापारिक सम्बन्ध तोड़ने, निवेश बन्द करने, परमाणु निर्माण में काम आने वाले कच्चे माल की आपूर्ति रोकने आदि के लिए कदम उठा लेती हैं।

चौथे, ये शक्तियाँ उस पर परमाणु विस्तार विरोधी सन्धियों पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डालती हैं। पाँचवें, ये बड़ी शक्तियाँ उसके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप कर सत्ता को पलटने का प्रयास करती हैं।

प्रश्न 4.
हमारे पास यह कहने के क्या आधार हैं कि परमाण्विक हथियारों से लैस कुछ देशों पर तो विश्वास किया जा सकता है, परन्तु कुछ पर नहीं?
उत्तर:
हम निम्नलिखित दो आधारों पर कह सकते हैं कि परमाण्विक हथियारों से लैस कुछ देशों पर तो विश्वास नहीं किया जा सकता है लेकिन कुछ पर नहीं-

(1) जो देश परमाणु शक्ति-सम्पन्न बिरादरी के पुराने सदस्य हैं, वे कहते हैं कि यदि बड़ी शक्तियों के पास परमाणु हथियार हैं तो उनमें ‘अपरोध’ का पारस्परिक भय होगा जिसके कारण वे इन हथियारों का प्रथम प्रयोग नहीं करेंगे।

(2) परमाणु बिरादरी के देश परमाणुशील होने की दावेदारी करने वाले देशों पर यह दोष लगाते हैं कि वे आतंकवादियों की गतिविधियाँ रोक नहीं सकते। यदि कोई गलत व्यक्ति या सेनाध्यक्ष राष्ट्राध्यक्ष बन गया तो इसके काल में परमाणु हथियार किसी गलत व्यक्ति के हाथों में जा सकते हैं जो अपने पागलपन से पूरी मानव जाति को खतरे में डाल सकता है।

प्रश्न 5.
मानवाधिकारों के उल्लंघन की बात हो तो हम हमेशा बाहर क्यों देखते हैं? क्या हमारे अपने देश में इसके उदाहरण नहीं मिलते?
उत्तर:
रवाण्डा के नरसंहार, कुवैत पर इराकी हमले तथा पूर्वी तिमूर में इण्डोनेशियाई सेना के रक्तपात इत्यादि घटनाओं पर तो हमने मानवाधिकारों के उल्लंघन की दुहाई दे डाली, लेकिन अपने देश के समय-समय पर घटे मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों पर चुप्पी साध ली। इसकी प्रमुख वजह मानवीय प्रवृत्ति प्रतीत होती है, क्योंकि हमें दूसरों की बुराई तलाशने में आनन्द की अनुभूति होती है, जबकि अपने द्वारा की गई गलत बात भी सही लगती है।

प्रश्न 6.
क्या गैर-बराबरी के बढ़ने का सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर कुछ असर पड़ता है?
उत्तर:
हाँ, खुशहाली तथा बदहाली का काफी नजदीकी सम्बन्ध होता है और गैर-बराबरी बढ़ने का सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर काफी प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 7.
यहाँ जो मुद्दे दिखाए गए हैं उनसे दुनिया कैसे उबरे?
UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 7 Security in the Contemporary World 3
उत्तर:
दिए गए चित्र में आतंकवाद तथा प्राकृतिक आपदाओं के मुद्दे चित्रित किए गए हैं। आतंकवाद तथा प्राकृतिक आपदाएँ कोई नवीन मुद्दे नहीं हैं। आतंकवाद की अधिकांश घटनाएँ मध्य-पूर्व यूरोप, लैटिन अमेरिका तथा दक्षिण एशिया में हुई हैं। इससे छुटकारा पाने के लिए विश्व को एकजुट होकर इसे जड़ से उखाड़ फेंकने हेतु रचनात्मक कार्य करने होंगे। आतंकवादियों की मांगों को ठुकराकर उनकी आर्थिक शक्ति पर प्रहार करना होगा। प्रत्येक देश को यह प्रतिज्ञा लेनी होगी कि किसी भी परिस्थिति में आतंकवादियों को अपनी सीमा में शरण नहीं देनी है। इसी तरह प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी विश्व जगत् को आपदाग्रस्त देश की बिना किसी शर्त एवं भेदभाव के आधार पर भरपूर मदद करनी होगी।

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प्रश्न 1.
सुरक्षा की पारम्परिक धारणा का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सुरक्षा की पारम्परिक धारणा-सुरक्षा की पारम्परिक धारणा को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

(1) बाहरी सुरक्षा की पारम्परिक धारणा,
(2) आन्तरिक सुरक्षा की पारम्परिक धारणा।

1. बाहरी सुरक्षा की पारम्परिक धारणा-बाहरी सुरक्षा की पारम्परिक धारणा का अध्ययन अग्रलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है-

(i) सैन्य खतरा-सुरक्षा की पारम्परिक धारणा में सैन्य खतरे को किसी देश के लिए सबसे अधिक खतरनाक माना जाता है। इस खतरे का स्रोत कोई दूसरा देश होता है जो सैन्य हमले की धमकी देकर सम्प्रभुता, स्वतन्त्रता तथा संघीय अखण्डता जैसे किसी देश के केन्द्रीय मूल्यों के लिए खतरा उत्पन्न करता है।

सैन्य कार्रवाई से आम जनता को भी जन-धन की व्यापक हानि उठानी पड़ती है। प्राय: निहत्थी जनता को युद्ध में निशाना बनाया जाता है तथा उनका व उनकी सरकार का हौसला तोड़ने की कोशिश की जाती है।

(ii) युद्ध से बचने के उपाय-बुनियादी तौर पर सरकार के पास युद्ध की स्थिति में तीन विकल्प होते

(अ) आत्मसमर्पण-आत्मसमर्पण करना एवं दूसरे पक्ष की बात को बिना युद्ध किए मान लेना।

(ब) अपरोध नीति-सुरक्षा नीति का सम्बन्ध समर्पण करने से नहीं है बल्कि इसका सम्बन्ध युद्ध की आशंका को रोकने से है जिसे ‘अपरोध’ कहते हैं। इसमें एक पक्ष द्वारा युद्ध में होने वाले विनाश को इस सीमा तक बढ़ाने के संकेत दिए जाते हैं ताकि दूसरा सहमकर हमला करने से रुक जाए।

(स) रक्षा नीति-रक्षा नीति का सम्बन्ध युद्ध को सीमित रखने अथवा उसे समाप्त करने से होता है।

(iii) शक्ति सन्तुलन-परम्परागत सुरक्षा नीति का एक अन्य रूप शक्ति सन्तुलन है। प्रत्येक देश की सरकार दूसरे देश में अपने शक्ति सन्तुलन को लेकर बहुत संवेदनशील रहती है। कोई सरकार दूसरे देशों से शक्ति सन्तुलन का पलड़ा अपने पक्ष में बैठाने के लिए भरसक प्रयास करती है। शक्ति सन्तुलन बनाए रखने की यह कोशिश अधिकतर अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने की होती है, लेकिन आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी की ताकत भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सैन्य शक्ति का यही आधार है।

(iv) गठबन्धन निर्माण की नीति-पारम्परिक सुरक्षा नीति का चौथा तत्त्व है-गठबन्धन का निर्माण करना। गठबन्धन में कई देश शामिल होते हैं तथा सैन्य हमले को रोकने अथवा उससे रक्षा करने के लिए समवेत (सामूहिक) कदम उठाते हैं। अधिकांश गठबन्धनों को लिखित सन्धि के माध्यम से एक औपचारिक रूप मिलता है। गठबन्धन राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं तथा राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबन्धन भी बदल जाते हैं।

सुरक्षा की परम्परागत धारणाओं में विश्व राजनीति में प्रत्येक देश को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं उठानी पड़ती है।

2. आन्तरिक सुरक्षा की पारम्परिक धारणा-सुरक्षा की पारम्परिक धारणा का दूसरा रूप आन्तरिक सुरक्षा का है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से सुरक्षा के इस पहलू पर अधिक जोर नहीं दिया गया क्योंकि दुनिया के अधिकांश ताकतवर देश अपनी अन्दरूनी सुरक्षा के प्रति कमोबेश आश्वस्त थे। द्वितीय महायुद्ध के बाद ऐसे हालात और सन्दर्भ सामने आए कि आन्तरिक सुरक्षा पहले की तुलना में कहीं कम महत्त्व की वस्तु बन गयी।

शीतयुद्ध के दौर में दोनों गुटों, अमेरिकी गुट व सोवियत गुट, के आमने-सामने होने से इन दोनों गुटों को अपने ऊपर एक-दूसरे से सैन्य हमले का भय था। इसके अतिरिक्त कुछ यूरोपीय देशों को अपने उपनिवेशों में उपनिवेशीकृत जनता के खून-खराबे की चिन्ता सता रही थी। लेकिन 1940 के दशक के उत्तरार्द्ध से उपनिवेशों ने स्वतन्त्र होना प्रारम्भ कर दिया। एशिया और अफ्रीका के नए स्वतन्त्र हुए देशों के समक्ष दोनों प्रकार की सुरक्षा की चुनौतियाँ थीं।

  1. एक तो इन्हें अपनी पड़ोसी देशों से सैन्य हमले की आशंका थी।
  2. इन्हें आन्तरिक सैन्य संघर्ष की भी चिन्ता करनी थी। इन देशों को सीमा पार के पड़ोसी देशों से खतरा था तथा साथ ही भीतर से भी खतरे की आशंका थी।

अनेक नव-स्वतन्त्र देश संयुक्त राज्य अमेरिका या सोवियत संघ अथवा औपनिवेशिक ताकतों से कहीं अधिक अपने पड़ोसी देशों से आशंकित थे। इनके मध्य सीमा-रेखा और भू-क्षेत्र अथवा जनसंख्या पर नियन्त्रण को लेकर झगड़े हुए।

प्रश्न 2.
सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा–सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा सिर्फ सैन्य खतरों से ही सम्बन्ध नहीं है, बल्कि इसमें मानवीय अस्तित्व पर हमला करने वाले व्यापक खतरों एवं आशंकाओं को शामिल किया जाता है। सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा में सुरक्षा का दायरा व्यापक है। इसमें सिर्फ राज्य ही नहीं बल्कि व्यक्तियों, समुदायों तथा समस्त मानवता की सुरक्षा पर बल दिया जाता है। इस प्रकार की सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा के दो पक्ष हैं-

(1) मानवता की सुरक्षा,
(2) विश्व सुरक्षा।

1. मानवता की सुरक्षा-मानवता की सुरक्षा की धारणा को निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है-

(i) व्यक्तियों की सुरक्षा पर बल-मानवता की सुरक्षा की धारणा व्यक्तियों की रक्षा पर बल देती है। मानवता की रक्षा का विचार जनता की सुरक्षा को राज्यों की सुरक्षा से बढ़कर मानता है। मानवता की सुरक्षा और राज्य की सुरक्षा पूरक होनी चाहिए, लेकिन सुरक्षित रूप का आशय हमेशा सुरक्षित जनता नहीं होता। सुरक्षित राज्य नागरिकों को विदेशी हमलों से तो बचाता है, लेकिन यही पर्याप्त नहीं है क्योंकि पिछले 20 वर्षों में जितने व्यक्ति विदेशी सेना के हाथों मारे गए हैं, उससे कहीं अधिक लोग स्वयं अपनी ही सरकारों के हाथों मारे गए हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि मानवता की सुरक्षा का विचार राज्यों की सुरक्षा के विचार से व्यापक है।

(ii) मानवता की सुरक्षा के विचार का प्राथमिक लक्ष्य-मानवता की सुरक्षा के सभी समर्थकों की सहमति है कि मानवता की सुरक्षा के विचार का प्राथमिक लक्ष्य व्यक्तियों की रक्षा है, लेकिन इस बात पर मतभेद है कि ऐसे कौन-से खतरे हैं, जिनसे व्यक्तियों की रक्षा की जाए। इस सन्दर्भ में दिए गए विचारों को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

(क) मानवता की सुरक्षा का संकीर्ण अर्थ-मानवता की सुरक्षा का संकीर्ण अर्थ लेने वाले समर्थकों का जोर व्यक्तियों को हिंसक खतरों अर्थात् खून-खराबे से बचाने पर है।

(ख) मानवता की सुरक्षा का व्यापक अर्थ-मानवता की सुरक्षा का व्यापक अर्थ लेने वाले समर्थकों का तर्क है कि खतरों की सूची में अकाल, महामारी एवं आपदाओं को शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि युद्ध, संहार एवं आतंकवाद साथ मिलकर जितने लोगों को मारते हैं, उससे कहीं अधिक लोग अकाल, महामारी एवं प्राकृतिक आपदा की भेंट चढ़ जाते हैं।

(ग) मानवता की सुरक्षा का व्यापक अर्थ-मानवता की सुरक्षा का व्यापक अर्थ में युद्ध, जनसंहार, आतंकवाद, अकाल, महामारी व प्राकृतिक आपदा से सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा एवं मानवीय गरिमा की सुरक्षा को भी शामिल किया जा सकता है। इस प्रकार मानवता की सुरक्षा के व्यापकतम अर्थ में अभाव एवं भय से मुक्ति पर बल दिया जाता है।

2. विश्व सुरक्षा–सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा का दूसरा पक्ष है—विश्व सुरक्षा। विश्वव्यापी खतरे, जैसे-वैश्विक तापवृद्धि, अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद, एड्स, बर्ड फ्लू जैसी महामारियों को दृष्टिगत रखकर सन् 1990 के दशक में विश्व सुरक्षा की धारणा का विकास हुआ। कोई भी देश इन समस्याओं का समाधान अकेले नहीं कर सकता। चूँकि इन समस्याओं की प्रकृति वैश्विक है। इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

प्रश्न 3.
भारत की सुरक्षा नीति के घटकों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय सुरक्षा रणनीति के घटक-विश्व में भारत एक ऐसा देश है जो पारम्परिक एवं गैरपारम्परिक दोनों तरह के खतरों का सामना कर रहा है। यह खतरे सीमा के अन्दर तथा बाहर दोनों तरफ से हैं। भारत की सुरक्षा राजनीति के चार बड़े घटक हैं तथा अलग-अलग समय में इन्हीं घटकों के आस-पास सुरक्षा की रणनीति बनाई गयी है। संक्षेप में, भारत की सुरक्षा रणनीति के इन चारों घटकों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

1. सैन्य क्षमता-पड़ोसी देशों के आक्रमण से बचने हेतु भारत को अपनी सैन्य क्षमता को और अधिक सुदृढ़ करना होगा। भारत पर पाकिस्तान ने सन् 1947-48, 1965, 1971 तथा 1999 में तथा चीन ने 1962 में आक्रमण किया था। दक्षिण एशियाई क्षेत्र में भारत के चारों तरफ परमाणु शक्ति सम्पन्न देश हैं। अतः हमने सन् 1974 तथा 1998 में परमाणु परीक्षण किए थे।

2. अन्तर्राष्ट्रीय नियमों तथा संस्थाओं को मजबूत करना-हमारे देश ने अपने सुरक्षा हितों को बचाने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय नियमों तथा संस्थाओं को शक्तिशाली करने में अपना सहयोग प्रदान किया है। प्रथम भारतीय प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू द्वारा एशियाई एकता, औपनिवेशीकरण तथा निःशस्त्रीकरण के प्रयासों का भरपूर समर्थन किया गया। हमारे देश ने जहाँ संयुक्त राष्ट्र संघ को अन्तिम पंच मानने पर बल दिया वहीं नवीन अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की भी पुरजोर माँग उठायी। उल्लेखनीय है कि हमने दो गुटों की खेमेबाजी से अलग . रहते हुए गुटनिरपेक्षता के रूप में विश्व के समक्ष तीसरे विकल्प को खोला।

3. देश की आन्तरिक सुरक्षा तथा समस्याएँ-भारतीय सुरक्षा रणनीति का तीसरा महत्त्वपूर्ण घटक देश की आन्तरिक सुरक्षा समस्याओं से कारगर तरीके से निपटने की तैयारी है। नागालैण्ड, मिजोरम, पंजाब तथा कश्मीर आदि भारतीय संघ की इकाइयों में अलगाववादी संगठन सक्रिय रहे हैं। इस बात को दृष्टिगत रखते हुए हमारे देश ने राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने का भरसक प्रयास किया। भारत ने राजनीतिक तथा लोकतान्त्रिक व्यवस्था का पालन किया है। देश में सभी समुदायों के लोगों तथा जन-समूहों को अपनी शिकायतें रखने का पर्याप्त अवसर दिया जाता है।

4. गरीबी तथा अभाव से छुटकारा-हमारे देश ने ऐसी व्यवस्थाएँ करने का प्रयास किया है जिससे बहुसंख्यक नागरिकों को गरीबी तथा अभाव से छुटकारा मिल सके और समाज से आर्थिक असमानता समाप्त हो सके।

वैश्वीकरण तथा उदारीकरण के युग में भी अर्थव्यवस्था का इस तरह निर्देशन जरूरी है कि गरीबी, बेरोजगारी तथा असमानता की समस्याओं को शीघ्र हल किया जा सके।

अन्त में, संक्षेप में कहा जा सकता है कि भारत की सुरक्षा नीति व्यापक स्तर पर सुरक्षा की नवीन तथा प्राचीन चुनौतियों को दृष्टिगत रखते हुए निर्मित की जा रही है।

प्रश्न 4.
सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा में खतरों के प्रमुख नए स्रोतों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा के सन्दर्भ में खतरों की बदलती प्रकृति पर जोर दिया जाता है। ऐसे खतरों के प्रमुख नए स्रोत निम्नलिखित हैं जिन्हें मानवीय सुरक्षा से सम्बन्धित मुद्दे भी कह सकते हैं-

1. अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद-आतंकवाद से आशय राजनीतिक खून-खराबे से है जो जान-बूझकर और बिना किसी दयाभाव के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है। जब आतंकवाद एक से अधिक देशों में व्याप्त हो जाता है तो उसे ‘अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद’ कहते हैं। इसके निशाने पर कई देशों के नागरिक हैं। आतंकवाद के चिरपरिचित उदाहरण हैं-
विमान अपहरण, भीड़ भरी जगहों पर बम लगाना। आतंकवाद की अधिकांश घटनाएँ मध्य पूर्व, यूरोप, लैटिन अमेरिका एवं दक्षिण एशिया में हुई हैं।

2. मानवाधिकारों का हनन-1990 के दशक की कुछ घटनाओं—रवाण्डा में जनसंहार, कुवैत पर इराक का हमला एवं पूर्वी तिमूर में इण्डोनेशियाई सेना के रक्तपात के कारण बहस चल पड़ी कि संयुक्त राष्ट्र संघ को मानवाधिकारों के हनन की स्थिति में हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं। यह अभी तक विवाद का विषय बना हुआ है। क्योंकि कुछ देशों का तर्क है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ताकतवर देशों के हितों के हिसाब से ही यह निर्धारित करेगा कि किस मामले में मानवाधिकार के विरोध में कार्रवाई की जाए और किस मामले में नहीं की जाए।

3. वैश्विक निर्धनता-वैश्विक निर्धनता खतरे का एक प्रमुख स्रोत है। अनुमान है कि आगामी 50 वर्षों के विश्व के सबसे निर्धन देशों में जनसंख्या तीन गुना बढ़ेगी, जबकि इसी अवधि में अनेक धनी देशों की जनसंख्या घटेगी। प्रति व्यक्ति निम्न आय एवं जनसंख्या की तीव्र वृद्धि एक साथ मिलकर निर्धन देशों को और अधिक गरीब बनाती है।

4. आर्थिक असमानता–विश्व स्तर पर आर्थिक असमानता उत्तरी गोलार्द्ध के देशों को दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों से अलग करती है। दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों में आर्थिक असमानता में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। अफ्रीका के सहारा मरुस्थल के दक्षिणवर्ती देश विश्व में सबसे ज्यादा निर्धन हैं।

5. अप्रवासी, शरणार्थी एवं आन्तरिक रूप से विस्थापित लोगों की समस्याएँ–दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों में मौजूद निर्धनता के कारण अधिकांश लोग अच्छे जीवन की तलाश में उत्तरी गोलार्द्ध के देशों में प्रवास कर रहे हैं। इससे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मतभेद उठ खड़ा हुआ है। अनेक लोगों को युद्ध, प्राकृतिक आपदा अथवा राजनीतिक उत्पीड़न के कारण अपना घर-बार छोड़ने को मजबूर होना पड़ा है। ऐसे लोग यदि राष्ट्रीय सीमा के भीतर ही हैं तो उन्हें आन्तरिक रूप से विस्थापित जन कहा जाता है और यदि दूसरे देशों में हैं तो उन्हें शरणार्थी कहा जाता है। इन्हें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

6. महामारियाँ-एचआईवी-एड्स, बर्ड-फ्लू एवं सार्स जैसी महामारियाँ, आप्रवास, व्यवसाय, पर्यटन एवं सैन्य अभियोजनों के माध्यम से तीव्र गति से विश्व के विभिन्न देशों में फैली हैं। इन बीमारियों के फैलाव को रोकने में किसी एक देश की असफलता का प्रभाव दूसरे देशों में होने वाले संक्रमण पर पड़ता है। एक अनुमान के अनुसार सन् 2003 तक विश्व में 4 करोड़ से अधिक लोग एचआईवी से संक्रमित थे। इसके अलावा आज ऐसी अनेक खतरनाक बीमारियाँ हैं जिनके बारे में कुछ अधिक जानकारी भी नहीं है। इनमें एबोला वायरस, हैन्टावायरस और हेपेटाइटिस-सी हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
परम्परागत सुरक्षा के किन्हीं चार तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
परम्परागत सुरक्षा के चार तत्त्व निम्नवत् हैं-

1. परम्परागत खतरे-सुरक्षा की पारम्परिक अवधारणा में सैन्य खतरों को किसी भी देश के लिए सर्वाधिक माना जाता है। इसका स्रोत कोई दूसरा देश होता है जो सैनिक हमले की धमकी देकर किसी देश की सम्प्रभुता, स्वतन्त्रता तथा क्षेत्रीय अखण्डता को प्रभावित करता है।

2. युद्ध-युद्ध में साधारण लोगों के जीवन पर भी खतरा मँडराता है। किसी भी युद्ध में सिर्फ सैनिक ही घायल अथवा मारे नहीं जाते, बल्कि जन-सामान्य को भी इससे भारी नुकसान पहुंचता है।

3. शक्ति सन्तुलन-परम्परागत सुरक्षा नीति का एक अन्य महत्त्वपूर्ण तत्त्व शक्ति सन्तुलन है। कोई भी देश अपने पड़ोसी देशों की शक्ति का सही-सही आकलन करके भविष्य की नीति तैयार करता है। प्रत्येक सरकार दूसरे देशों से अपने शक्ति सन्तुलन को लेकर अत्यधिक संवेदनशील रहती है।

4. गठबन्धन करना-परम्परागत सुरक्षा नीति का एक तत्त्व गठबन्धन करना भी है। इसमें विभिन्न देश सम्मिलित होते हैं तथा सैन्य हमले को रोकने तथा उससे रक्षा करने के लिए मिल-जुलकर कदम उठाते हैं।

प्रश्न 2.
एशिया तथा अफ्रीका के नव-स्वतन्त्र देशों के समक्ष सुरक्षा की चुनौतियाँ यूरोप की चुनौतियों की तुलना में कैसे भिन्न थीं?
उत्तर:
एशिया तथा अफ्रीका के नव-स्वतन्त्र देशों के सामने सुरक्षा की चुनौतियाँ यूरोप की तुलना में निम्न प्रकार भिन्न थीं-

  1. एशिया तथा अफ्रीका के नव-स्वतन्त्र देशों का संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है, जबकि यूरोप के दो देशों को निषेधाधिकार (वीटो) का अधिकार हासिल है। इस तरह से ये देश अधिक सुरक्षित हैं।
  2. एशिया तथा अफ्रीका के देशों में औद्योगिकीकरण बाल अवस्था में है, जबकि यूरोपीय देशों में उद्योगों का चरम विकास हो चुका है। वे कच्चे माल तथा अन्य उपयोगी सामग्री के लिए एशिया तथा अफ्रीका के देशों का शोषण करने को तैयार रहते हैं।
  3. एशिया तथा अफ्रीका के देशों को अपने पड़ोसी देशों के हमलों का भय तथा देश के भीतर भी सैन्य संघर्ष और साम्प्रदायिक हिंसा बढ़ने का खतरा है। इसके विपरीत यूरोपीय देशों में ऐसा नहीं है।
  4. एशियाई तथा अफ्रीकी देशों में प्रति व्यक्ति निम्न आय है तथा जनसंख्या में तेजी से बढ़ोतरी होती चली जा रही है जबकि यूरोपीय देशों की स्थिति इसके ठीक विपरीत है।

प्रश्न 3.
आतंकवाद असैनिक स्थानों को अपना लक्ष्य क्यों चुनते हैं?
उत्तर:
आतंकवादी निम्नलिखित कारणों से असैनिक स्थानों को अपना लक्ष्य बनाते हैं-

(1) आतंकवाद अपरम्परागत श्रेणी में आता है। आतंकवाद का तात्पर्य राजनीतिक कत्ले आम है, जो जानबूझकर बिना किसी पर दयाभाव रखकर नागरिकों को अपना शिकार बनाता है। एक से अधिक देशों में व्याप्त अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के निशाने पर कई देशों के निर्दोष नागरिक हैं।

(2) किसी राजनीतिक सन्दर्भ अथवा स्थिति के मनमुताबिक न होने पर आतंकवादी समूह उसे बल प्रयोग से या शक्ति प्रयुक्त किए जाने की धमकी देकर परिवर्तित करना चाहते हैं। जनसाधारण को डराकर आतंकित करने हेतु निर्दोष लोगों को निशाना बनाया जाता है। आतंकवाद नागरिकों के असन्तोष का प्रयोग राष्ट्रीय सरकारों या संघर्षों में सम्मिलित अन्य पक्ष के विरुद्ध करता है।

(3) आतंकवादियों का मुख्य उद्देश्य आतंक फैलाना है, अत: वे असैनिक स्थानों अर्थात् जन-साधारण को अपनी दहशतगर्दी का निशाना बनाते हैं। इससे जहाँ एक तरफ वे आतंक स्थापित करके लोगों तथा विश्व का ध्यान अपनी तरफ खींचने में सफल होते हैं तो वहीं दूसरी ओर उन्हें प्रतिरोध का सामना भी नहीं करना पड़ता। नागरिक सफलतापूर्वक उनके शिकार बन जाते हैं।

प्रश्न 4.
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते आतंकवाद के पीछे क्या कारण हैं?
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रहे आतंकवाद के पीछे निम्नलिखित कारण हैं-

  1. तकनीक तथा सूचना प्रौद्योगिकी में तेजी से हुई प्रगति ने आतंकवादियों के दुस्साहस में अभिवृद्धि की है। यह एक प्रमुख कारण है कि जिसकी वजह से आतंकवाद आज सम्पूर्ण विश्व में अपने पैर जमा चुका है।
  2. तस्करी, जमाखोरी, वायुयानों के अपहरण तथा जहाजों को बन्धक बनाने जैसी घटनाओं के पीछे विश्व अर्थव्यवस्था का वैश्वीकरण है। आतंकवादियों द्वारा किसी भी देश की मुद्रा का अन्तरण करना सरल हो गया है।
  3. अत्याधुनिक हथियारों को नवीन प्रौद्योगिकी द्वारा निर्मित करके उन्हें बेचने की प्रतिस्पर्धा शीतयुद्ध दौर की शैली है। व्यापक स्तर पर उन्माद जाग्रत करके आतंकवाद की खूनी होली खेलने के हथियारों को बनाने वाली कम्पनियाँ, सरकार तथा व्यापारी समान रूप से उत्तरदायी हैं।
  4. स्वत:चलित यानों ने भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद को प्रोत्साहन दिया है।

प्रश्न 5.
युद्ध के अतिरिक्त मानव सुरक्षा के किन्हीं अन्य चार खतरों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
युद्ध के अतिरिक्त मानव सुरक्षा के अन्य चार खतरे निम्नवत् हैं-

1. वैश्विक ताप वृद्धि–वर्तमान विश्व में वैश्विक ताप वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) सम्पूर्ण मानव जाति हेतु एक गम्भीर खतरा है।

2. शरणार्थी समस्या दक्षिणी गोलार्द्ध के विभिन्न देशों में सशस्त्र संघर्ष तथा युद्ध की वजह से लाखों लोग शरणार्थी बने और सुरक्षित ठिकानों की तलाश में विभिन्न देशों में आसरा लिया।

3. अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद-आतंकवादी जान-बूझकर निर्दोष लोगों को अपना शिकार बनाते हैं तथा सम्बन्धित देश में आतंक का खतरा उत्पन्न करते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद एक से अधिक देशों में व्याप्त है तथा इसके खूनी निशाने पर विश्व के अनेक देशों के नागरिक हैं। विमान अपहरण अथवा भीड़-भरे स्थानों; जैसे-रेलगाड़ी, बस-स्टैण्ड, होटल, मॉल्स, बाजार अथवा ऐसे ही अन्य स्थानों पर विस्फोटक पदार्थ लगाना इत्यादि आतंकवाद के चिर-परिचित उदाहरण हैं।

4. प्रदूषण अथवा पर्यावरण क्षरण-पर्यावरण में हो रहे क्षरण से विश्व की सुरक्षा के समक्ष एक गम्भीर खतरा उत्पन्न हो गया है। वनों की बेतहाशा कटाई ने पर्यावरण एवं प्राकृतिक सन्तुलन को गम्भीर क्षति पहुँचाई है। जल, वायु, मृदा तथा ध्वनि प्रदूषण की वजह से मानव के सामान्य जीवन तथा शान्त वातावरण हेतु खतरा उत्पन्न हो गया है।

प्रश्न 6.
युद्ध की पारम्परिक धारणा में विश्वास बहाली के उपायों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
सुरक्षा की पारम्परिक धारणा में विश्वास बहाली के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं-

  1. विश्वास बहाली के दोनों देशों के मध्य हिंसा को कम किया जा सकता है।
  2. विश्वास बहाली की प्रक्रिया में सैन्य टकराव एवं प्रतिद्वन्द्विता वाले देशों के बीच सूचनाओं एवं विचारों का सीमित आदान-प्रदान किया जाता है।
  3. दोनों देश एक-दूसरे को अपनी सैन्य सामग्री एवं सैन्य योजनाओं की जानकारी प्रदान करते हैं। ऐसा करके दोनों देश अपने प्रतिद्वन्द्वी को इस बात का विश्वास दिलाते हैं कि वे अपनी तरफ से हमले की कोई योजना नहीं बना रहे हैं।

प्रश्न 7.
मानवाधिकारों के हनन की स्थिति में क्या संयुक्त राष्ट्र संघ को हस्तक्षेप करना चाहिए? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
मानवाधिकारों के हनन की स्थिति में संयुक्त राष्ट्र संघ को हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं। इस सम्बन्ध में बहस हो रही है-

(1) कुछ लोगों का तर्क है कि संयुक्त राष्ट्र संघ का घोषणा-पत्र अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को अधिकार देता है कि यह मानवाधिकारों की रक्षा के लिए हथियार उठाए अर्थात् संयुक्त राष्ट्र संघ को इस क्षेत्र में हस्तक्षेप करना चाहिए।

(2) कुछ देशों का तर्क है कि यह सम्भव है कि शक्तिशाली देशों के हितों से यह निर्धारित होता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार उल्लंघन के किस मामले में कार्यवाही करेगा और किसमें नहीं? इससे शक्तिशाली देशों को मानवाधिकार के बहाने उसके अन्दरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने का सरल रास्ता मिल जाएगा।

प्रश्न 8.
सहयोग मूलक सुरक्षा में भी बल प्रयोग की अनुमति कब दी जा सकती है?
उत्तर:
सहयोग मूलक सुरक्षा में भी अन्तिम उपाय के रूप में बल प्रयोग किया जा सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय उन सरकारों से निपटने के लिए बल प्रयोग की अनुमति दे सकती है जो अपनी ही जनता पर अत्याचार कर रही हो अथवा निर्धनता, महामारी एवं प्रलयकारी घटनाओं की मार झेल रही जनता के दुःख-दर्द की उपेक्षा कर रही हो।

ऐसी स्थिति में किसी एक देश द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय एवं स्वयंसेवी संगठनों आदि की इच्छा के विरुद्ध बल प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए बल्कि सामूहिक स्वीकृति से तथा सामूहिक रूप से सम्बन्धित घटना के लिए जिम्मेदार देश पर बल प्रयोग किया जाना चाहिए।

अतिलघ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सुरक्षा की पारम्परिक धारणा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
बाहरी सुरक्षा की पारम्परिक धारणा से आशय राष्ट्रीय सुरक्षा की धारणा से है। इसमें सैन्य खतरे को किसी देश के लिए सर्वाधिक घातक माना जाता है। इस खतरे का स्रोत कोई दूसरा देश होता है, जो सैन्य हमले की धमकी देकर सम्प्रभुता, स्वतन्त्रता तथा क्षेत्रीय अखण्डता को प्रभावित करता है। सैन्य कार्रवाई से जनसाधारण का जीवन भी प्रभावित होता है।

प्रश्न 2.
बुनियादी तौर से किसी सरकार के पास युद्ध की स्थिति में सुरक्षा के कितने विकल्प होते हैं। संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
बुनियादी रूप से किसी सरकार के पास युद्ध की स्थिति में सुरक्षा के तीन विकल्प होते हैं-

  1. आत्मसमर्पण करना एवं दूसरे पक्ष की बात को बिना युद्ध किए मान लेना, अथवा
  2. युद्ध से होने वाले विनाश को इस हद तक बढ़ाने का संकेत देना कि दूसरा पक्ष सहमकर हमला करने से रुक जाए, अथवा
  3. यदि युद्ध ठन जाए जो अपनी रक्षा करना या हमलावर को पराजित कर देना।

प्रश्न 3.
शक्ति सन्तुलन को कैसे बनाए रखा जा सकता है?
उत्तर:
परम्परागत सुरक्षा नीति का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व शक्ति सन्तुलन है। शक्ति सन्तुलन को बनाए रखने के लिए सैन्य शक्ति को बढ़ाना अति आवश्यक है लेकिन आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी विकास भी महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि सैन्य शक्ति का यही आधार है। प्रत्येक सरकार दूसरे देशों से अपने शक्ति सन्तुलन को लेकर अत्यन्त संवेदनशील रहती है।

प्रश्न 4.
बाहरी सुरक्षा गठबन्धन बनाने के क्या उपाय हैं?
उत्तर:
गठबन्धन पारम्परिक सुरक्षा नीति का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। एक गठबन्धन में कई देश शामिल होते हैं और सैन्य हमले को रोकने अथवा उससे रक्षा करने के लिए समवेत कदम उठाते हैं। अधिकांश गठबन्धनों को लिखित नियमों एवं उपनियमों द्वारा एक औपचारिक रूप दिया जाता है। कोई भी देश गठबन्धन प्राय: अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए करता है। गठबन्धन राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं एवं राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबन्धन भी बदल जाते हैं।

प्रश्न 5.
“राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबन्धन भी बदल जाते हैं।” एक उदाहरण देकर कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गठबन्धन राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं और राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबन्धन भी बदल जाते हैं। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1980 के दशक में तत्कालीन सोवियत संघ के विरुद्ध इस्लामी उग्रवादियों को समर्थन दिया, लेकिन ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में अलकायदा नामक समूह के आतंकवादियों ने जब 11 सितम्बर, 2001 के दिन उस पर ही हमला कर दिया तो उसने इस्लामी उग्रवादियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया।

प्रश्न 6.
सुरक्षा की परम्परागत तथा गैर-परम्परागत अवधारणाओं में क्या अन्तर अथवा भेद होता है?
उत्तर:
सुरक्षा की परम्परागत अवधारणा के अनुसार सिर्फ भूखण्ड तथा उसमें रहने वालों की सम्पदा और जानमाल की रक्षा करना, सशस्त्र सैन्य हमलों को रोकना भी है, जबकि गैर-परम्परागत अवधारणा में भू-भाग, प्राणियों तथा सम्पत्ति की सुरक्षा के साथ-साथ पर्यावरण एवं मानवाधिकारों इत्यादि की सुरक्षा भी शामिल है।

प्रश्न 7.
एशिया और अफ्रीका के नव-स्वतन्त्र देशों के समक्ष खड़ी सुरक्षा की चुनौतियाँ यूरोपीय देशों के मुकाबले किन-किन मायनों में विशिष्ट थीं?
उत्तर:

  1. एशिया और अफ्रीका के नव-स्वतन्त्र देशों को आन्तरिक एवं बाहरी दोनों प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि यूरोप के देशों को केवल बाहरी खतरों का सामना करना पड़ रहा है।
  2. एशिया और अफ्रीका के नव-स्वतन्त्र देशों को गरीबी व बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है, जबकि यूरोप के देशों को संस्कृति एवं सभ्यता के पतन का सामना करना पड़ रहा है।

प्रश्न 8.
जैविक हथियार सन्धि (बीडब्ल्यू०सी०) 1972 द्वारा क्या निर्णय लिया गया?
उत्तर:
सन् 1972 की जैविक हथियार सन्धि (बायोलॉजिकल वीपन्स कन्वेंशन-बी०डब्ल्यू०सी०) द्वारा जैविक हथियारों का निर्माण करना तथा उन्हें रखना प्रतिबन्धित कर दिया गया। यह सन्धि लगभग 155 से अधिक देशों द्वारा हस्ताक्षरित की गई थी। इसको हस्ताक्षरित करने वालों में विश्व की सभी महाशक्तियाँ भी शामिल थीं।

प्रश्न 9.
सुरक्षा के पारम्परिक तरीके के रूप में अस्त्र नियन्त्रण को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सुरक्षा के पारम्परिक तरीके के रूप में अस्त्र नियन्त्रण में हथियारों के सम्बन्ध में कुछ नियम व कानूनों का पालन करना पड़ता है। उदाहरण के रूप में, सन् 1972 की एंटी बैलेस्टिक मिसाइल सन्धि (ABM) ने संयुक्त राज्य अमेरिका एवं सोवियत संघ को बैलेस्टिक मिसाइलों के रक्षा कवच के रूप में उन्हें उपयोग करने से रोका। ऐसे प्रक्षेपास्त्रों से हमले की शुरुआत की जा सकती थी।

प्रश्न 10.
सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा को मानवता की सुरक्षा अथवा विश्व रक्षा क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा के विषय में यह कहा जाता है कि केवल राज्यों को ही सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सम्पूर्ण मानवता को सुरक्षा की आवश्यकता होती है। इस कारण सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा को मानवता की सुरक्षा अथवा विश्व रक्षा कहा जाता है।

प्रश्न 11.
मानवीय सुरक्षा का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मानवीय सुरक्षा का अभिप्राय है कि देश की सरकार को अपने नागरिकों की सुरक्षा अपने राज्य अथवा भू-भाग की सुरक्षा से बढ़कर मानना है। मानवता की सुरक्षा तथा राज्य की सुरक्षा परस्पर पूरक हैं। सुरक्षित राज्य का अभिप्राय सुरक्षित जनता नहीं होता है। देश के नागरिकों को विदेशी हमलों से बचाना सुरक्षा की गारण्टी नहीं है।

प्रश्न 12.
‘आन्तरिक रूप से विस्थापित जन’ से क्या तात्पर्य है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
आन्तरिक रूप से विस्थापित जन उन्हें कहा जाता है जो अकेले राजनीतिक उत्पीड़न, जातीय हिंसा आदि किसी कारण से अपने मूल निवास से तो विस्थापित हो चुके हों परन्तु उन्होंने उसी देश में किसी अन्य भाग पर शरणार्थी के रूप में रहना प्रारम्भ कर दिया है।
उदाहरण के रूप में, 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में हिंसा से बचने के लिए कश्मीर घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी पण्डित आन्तरिक रूप से विस्थापित जन माने जाते हैं।

प्रश्न 13.
भारत ने अपने सुरक्षा हितों को बचाने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों एवं संस्थाओं को किस प्रकार मजबूत किया?
उत्तर:
भारत ने अपने सुरक्षा हितों को बचाने के लिए एशियाई एकता अनौपनिवेशीकरण एवं निःशस्त्रीकरण के प्रयासों की हिमायत की। भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने अन्तर्राष्ट्रीय संघर्षों में संयुक्त राष्ट्र संघ को अन्तिम पंच मानने पर जोर दिया। भारत ने परमाणु हथियारों के अप्रसार के सम्बन्ध में एक सार्वभौम व बिना भेदभाव वाली नीति बनाने पर बल दिया तथा गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को बढ़ावा दिया।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
एंटी बैलेस्टिक मिसाइल सन्धि (ABM) किस वर्ष हुई-
(a) 1975 में
(b) 1978 में
(c) 1976 में
(d) 1972 में।
उत्तर:
(d) 1972 में।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सी सन्धि अस्त्र-नियन्त्रण सन्धि थी
(a) अस्त्र परिसीमन सन्धि-2 (SALT-II)
(b) सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण सन्धि (स्ट्रेटजिक आंसर रिडक्शन ट्रीटी-SART)
(c) परमाणु अप्रसार सन्धि
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 3.
व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि कब हुई-
(a) 1990 में
(b) 1992 में
(c) 1996 में
(d) 1998 में।
उत्तर:
(c) 1996 में।

प्रश्न 4.
आंशिक परमाणु प्रतिबन्ध सन्धि कब हुई-
(a) 1963 में
(b) 1965 में
(c) 1968 में
(d) 1970 में।
उत्तर:
(a) 1963 में।

प्रश्न 5. परमाणु अप्रसार सन्धि कब की गई
(a) 1968 में
(b) 1970 में
(c) 1972 में
(d) 1975 में।
उत्तर:
(a) 1968 में।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से किस सन्धि ने सोवियत संघ को बैलेस्टिक मिसाइलों के रक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल करने से रोका-
(a) जैविक हथियार सन्धि
(b) एंटी बैलेस्टिक मिसाइल सन्धि
(c) रासायनिक हथियार सन्धि
(d) परमाणु अप्रसार सन्धि।
उत्तर:
(b) एंटी बैलेस्टिक मिसाइल सन्धि।

प्रश्न 7.
भारत ने पहला परमाणु परीक्षण किया-
(a) 1974 में
(b) 1975 में
(c) 1978 में
(d) 1980 में।
उत्तर:
(a) 1974 में।

प्रश्न 8.
सुरक्षा का बुनियादी अर्थ है-
(a) खतरे से आजादी
(b) गठबन्धन
(c) नि:शस्त्रीकरण
(d) आत्मसमर्पण।
उत्तर:
(a) खतरे से आजादी।

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