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Chapter 8 Secularism (धर्मनिरपेक्षता)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी बातें धर्मनिरपेक्षता के विचार से संगत हैं? कारण सहित बताइए।
(क) किसी धार्मिक समूह पर दूसरे धार्मिक समूह का वर्चस्व न होना।
(ख) किसी धर्म को राज्य के धर्म के रूप में मान्यता देना।
(ग) सभी धर्मों को राज्य का समान आश्रय होना।
(घ) विद्यालयों में अनिवार्य प्रार्थना होना।
(ङ) किसी अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पृथक शैक्षिक संस्थान बनाने की अनुमति होना।
(च) सरकार द्वारा धार्मिक संस्थाओं की प्रबन्धन समितियों की नियुक्ति करना।
(छ) किसी मन्दिर में दलितों के प्रवेश के निषेध को रोकने के लिए सरकार का हस्तक्षेप।
उत्तर-
(ङ) किसी अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पृथक् शैक्षिक संस्थान बनाने की अनुमति होना, धर्मनिरपेक्षता के विचार से संगत है। क्योंकि इसमें अल्पसंख्यक समुदाय को आगे बढ़ाने के लिए सरकार सहायता कर रही है। यह कार्य भारतीय संविधान द्वारा भी मान्यता प्राप्त है।
(छ) किसी मन्दिर में दलितों के प्रवेश के निषेध को रोकने के लिए सरकार का हस्तक्षेत्र उचित है, क्योंकि सरकार का यह व्यवहार धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को प्रकट करता है।

प्रश्न 2.
धर्मनिरपेक्षता के पश्चिमी और भारतीय मॉडल की कुछ विशेषताओं का आपस में घालमेल हो गया है। उन्हें अलग करें और एक नई सूची बनाएँ।

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 8 Secularism 2

प्रश्न 3.
धर्मनिरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या इसकी बराबरी धार्मिक सहनशीलता से की जी सकती है?
उत्तर-
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि उस राज्य में विभिन्न धर्मों तथा मत मतान्तरों को मानने वाले रहते हैं। लेकिन राज्य का अपना कोई विशिष्ट धर्म नहीं होगा तथा वह धार्मिक कार्यों में भाग भी नहीं लेगा और किसी के धर्म में रुकावट भी उत्पन्न नहीं करेगा। इसकी बराबरी धार्मिक सहनशीलता से नहीं की जा सकती है। राष्ट्र की एकता, अखण्डता तथा सुदृढ़ता के लिए धर्मनिरपेक्षता को ही अपनाना उचित है। सभी नागरिकों से एकसमान न्याय करने के उद्देश्य से भी धर्मनिरपेक्षता की नीति तर्क संगत है।

प्रश्न 4.
क्या आप नीचे दिए गए कथनों से सहमत हैं? उनके समर्थन या विरोध के कारण भी दीजिए।
(क) धर्मनिरपेक्षता हमें धार्मिक पहचान बनाए रखने की अनुमति नहीं देती है।
(ख) धर्मनिरपेक्षता किसी धार्मिक समुदाय के अन्दर या विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच
असमानता के खिलाफ है।
(ग) धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्म पश्चिमी और ईसाई समाज में हुआ है। यह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है।
उत्तर-
(क) धर्मनिरपेक्षता हमें धार्मिक पहचान बनाए रखने की अनुमति नहीं देती है। यह कथन गलत है धर्मनिरपेक्षता में हम अपनी धार्मिक पहचान बनाए रख सकते हैं। चूंकि राज्य धर्म में हस्तक्षेप नहीं करता है।
(ख) धर्मनिरपेक्षता किसी धार्मिक समुदाय के अन्दर या विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच असमानता के खिलाफ है। यह कथन सही हैं। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ही यह है कि धार्मिक समुदायों में हस्तक्षेप न किया जाए। सभी को समान दृष्टि से देखा जाए।
(ग) धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्म पश्चिमी और ईसाई समाज में हुआ है। यह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है। यह कथन गलत है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से बुनियादी रूप से भिन्न है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता भारतीय विचारकों की देन है।

प्रश्न 5.
भारतीय धर्मनिरपेक्षता का जोर धर्म और राज्य के अलगाव पर नहीं वरन उससे अधिक किन्ही बातों पर है। इस कथन को समझाइए।
उत्तर-
भारतीय धर्मनिरपेक्षता केवल धर्म और राज्य के बीच सम्बन्धविच्छेद पर बल देती है। अन्तरधार्मिक समानता भारतीय संकल्पना के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विशेषताएँ इसकी प्रकृति को स्पष्ट करती हैं। सर्वप्रथम तो भारतीय धर्मनिरपेक्षता गहरी धार्मिक विविधता के सन्दर्भ में जन्मी थी। यह विविधता पश्चिमी आधुनिक विचारों और राष्ट्रवाद के आगमन से पूर्व की चीज है। भारत में पूर्व से ही अन्तर धार्मिक सहिष्णुता’ की संस्कृति मौजूद थी। हमें याद रखना। चाहिए कि ‘सहिष्णुता’ धार्मिक वर्चस्व की विरोधी नहीं है। सम्भव है सहिष्णुता में हर किसी को कुछ मौका मिल जाए, लेकिन ऐसी स्वतन्त्रता प्रायः सीमित होती है। इसके अतिरिक्त सहिष्णुता हम में उन लोगों को बर्दाश्त करने की क्षमता उत्पन्न करती है जिन्हें हम पसन्द नहीं करते हैं। यह उस समाज के लिए तो विशिष्ट गुण है जो किसी बड़े गृहयुद्ध से उभर रहा हो मगर शान्ति के समय में नहीं जब लोग समान मान-मर्यादा के लिए संघर्षरत हों।

पश्चिमी आधुनिकता के प्रभावस्वरूप भारतीय चिन्तन में समानता की अवधारणा उभरकर सामने आई। इसने हमें समुदाय में समानता पर जोर देने की दिशा में अग्रसर किया। इसने भारतीय समाज में मौजूद श्रेणीबद्धता को हटाने के लिए अन्तर सामुदायिक समानता के विचार को भी उद्घाटित किया। इस प्रकार भारतीय समाज में पूर्व से ही मौजूद धार्मिक विविधता और पश्चिम से आए विचारों के बीच अन्त:क्रिया प्रारम्भ हुई जिसके परिणामस्वरूप भारतीय धर्मनिरपेक्षता ने विशिष्ट रूप धारण कर लिया।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता ने अन्त:धार्मिक और अन्तरधार्मिक वर्चस्व पर एक साथ ध्यान केन्द्रित किया। इसने हिन्दुओं के अन्दर महिलाओं के उत्पीड़ने और भारतीय मुसलमानों अथवा ईसाइयों के अन्दर महिलाओं के प्रति भेदभाव तथा बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों के अधिकारों पर उत्पन्न किए जा सकने वाले खतरों का समान रूप से विरोध किया। इस प्रकार, यह मुख्य धारा की पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से पहली महत्त्वपूर्ण भिन्नता है। इसी से सम्बद्ध दूसरी भिन्नता यह है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता का सम्बन्ध व्यक्तियों की धार्मिक स्वतन्त्रता से ही नहीं, अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक स्वतन्त्रता से भी है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसन्द का धर्म मानने का अधिकार है।

इसी प्रकार धार्मिक अल्पसंख्यकों को भी अपनी स्वयं की संस्कृति और शैक्षिक संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार है। एक अन्य भिन्नता भी है, चूंकि धर्मनिरपेक्ष राज्य को अन्तरधार्मिक वर्चस्व के मसले पर भी समान रूप से चिन्तित रहना है; अतः भारतीय धर्मनिरपेक्षता में राज्य समर्थित धार्मिक सुधार की जगह भी है और अनुकूलता भी। अन्त में, धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व अथवा सहिष्णुता से बहुत आगे तक जाता है। इस मुहावरे का आशय विभिन्न धर्मों के प्रति सम्मान की भावना है, तो इसमें एक अस्पष्टता है, जिसे स्पष्ट करना आवश्यक है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता विविध धर्मों में राज्य सत्ता के सैद्धान्तिक हस्तक्षेप की अनुमति प्रदान करती है। ऐसा हस्तक्षेप प्रत्येक धर्म के कुछ विशिष्ट पहलुओं के प्रति असम्मान प्रदर्शित करती है।

प्रश्न 6.
सैद्धान्तिक दूरी क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर-
भारतीय संविधान घोषणा करता है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक को देश के किसी भी भाग में स्वतन्त्रता और प्रतिष्ठा के साथ रहने का अधिकार है। मगर वास्तव में वर्जना और भेदभाव के अनेक रूप अभी दिखाई देते हैं। इसके अग्रलिखित उदाहरण प्रस्तुत हैं-

  1. सन् 1984 के दंगों में दिल्ली और देश के शेष भागों में लगभग 4,000 सिखों को मार दिया गया। पीड़ितों के परिजनों का मानना है कि दोषियों को आज तक सजा नहीं मिली है।
  2. हजारों कश्मीरी पण्डितों को घाटी में अपना घर छोड़ने के लिए विवश किया गया। वे दो दर्शकों के बाद भी अपने घर नहीं लौट सके हैं।
  3. सन् 2002 में गुजरात में लगभग 2,000 मुसलमान मारे गए। इन परिवारों के जीवित बचे हुए अनेक सदस्य अभी भी अपने गाँव वापस नहीं जा सके हैं, जहाँ से वे उजाड़ दिए गए थे।

उपर्युक्त प्रस्तुत उदाहरणों में किसी-न-किसी रूप में भेदभाव दिखाई देता है। प्रत्येक मामले में किसी एक धार्मिक समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया और उनकी धार्मिक पहचान के कारण उन्हें सताया गया। दूसरों शब्दों में नागरिकों के एक समूह को बुनियादी स्वतन्त्रता से वंचित किया गया। यह भी कहा जा सकता है कि यह समस्त उदाहरण अन्तरधार्मिक वर्चस्व और एक धार्मिक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के उत्पीड़न के प्रकरण हैं। धर्मनिरपेक्षता को सर्वप्रथम और सर्वप्रमुख रूप से ऐसा सिद्धान्त समझा जाना चाहिए जो अन्तर धार्मिक वर्चस्व का विरोध करता है। हालाँकि यह धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा के महत्त्वपूर्ण पहलुओं में से केवल एक है।
धर्मनिरपेक्षता का इतना ही महत्त्वपूर्ण दूसरा पहलू अन्त:धार्मिक वर्चस्व अर्थात् धर्म में । छिपे वर्चस्व का विरोध करना है। यही सैद्धान्तिक दूरी है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है?
(क) पाकिस्तान
ख) भूटान
(ग) भारत
(घ) चीन
उत्तर-
(ग) भारत।

प्रश्न 2.
जन समुदाय के लिए अफीम किसे माना गया है?
(क) धर्म को
(ख) राष्ट्र को
(ग) साम्प्रदायिकता को
(घ) प्रशासन को
उत्तर-
(क) धर्म को।

प्रश्न 3.
मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने धर्मनिरपेक्षता का मॉडल किस राज्य में प्रस्तुत किया?
(क) तुर्की में
(ख) फ्रांस में
(ग) चीन में
(घ) भारत में
उत्तर-
(क) तुर्की में।

प्रश्न 4.
भारत में धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार संविधान के किस अनुच्छेद में दिया गया है?
(क) अनुच्छेद 25-28
(ख) अनुच्छेद 26-27
(ग) अनुच्छेद 31-32
(घ) अनुच्छेद 30-35
उत्तर-
(क) अनुच्छेद 25-28.

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘धर्मनिरपेक्ष शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर-
‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द अंग्रेजी भाषा के सेक्युलर’ (Secular) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। Secular शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘सरक्युलम’ (Sarculum) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है-‘संसार’ अथवा ‘युग’।

प्रश्न 2.
धर्मनिरपेक्ष की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
जॉर्ज ऑस्लर के अनुसार, “धर्मनिरपेक्ष का अर्थ इस विश्व या वर्तमान जीवन से सम्बन्धित है, जो धार्मिक द्वैतवादी विचारों से बँधा हुआ न हो।”

प्रश्न 3.
धर्मनिरपेक्ष राज्य की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
एच० बी० कामथ के अनुसार, “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर रहित राज्य है, न ही यह अधर्मी राज्य है और न ही धर्म-विरोधी। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का अर्थ यह है कि इसमें ईश्वर पर आधारित धर्म के अस्तित्व को नहीं माना जाता।”

प्रश्न 4.
धर्मनिरपेक्षता किस प्रकार की अवधारणा है?
उत्तर-
धर्मनिरपेक्षता मूल रूप से एक लोकतान्त्रिक अवधारणा है।

प्रश्न 5.
धर्मनिरपेक्ष राज्य के कोई दो गुण लिखिए।
उत्तर-
(i) धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में राष्ट्रीय भावनाओं को प्रोत्साहन प्राप्त होता है।
(ii) धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में साम्प्रदायिकता की भावना को कम किया जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कमाल अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
लीसवीं सदी के प्रथमार्द्ध में तुर्की में धर्मनिरपेक्षता अमल में आई। यह धर्मनिरपेक्षता संगठित धर्म से सैद्धान्तिक दूरी बनाने के स्थान पर धर्म में सक्रिय हस्तक्षेप के माध्यम से उसके दमन की पक्षधर थी। मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने इस प्रकार की धर्मनिरपेक्षता प्रस्तुत की और उसे प्रयोग में भी लाए।
अतातुर्क प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् सत्ता में आए। वे तुर्की के सार्वजनिक जीवन में खिलाफत को समाप्त कर देने के लिए कटिबद्ध थे। वे मानते थे कि परम्परागत सोच-विचार और अभिव्यक्तियों से नाता तोड़े बगैर तुर्की को उसकी दु:खद स्थिति से नहीं उभारा जा सकता। उन्होंने तुर्की को आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष बनाने के लिए आक्रामक ढंग से कदम बढ़ाए। उन्होंने स्वयं अपना नाम मुस्तफा कमाल पाशा से बदलकर अतातुर्क कर लिया। (अतातुर्क का अर्थ होता है तुर्को का पिता)। हैट कानून के माध्यम से मुसलमानों द्वारा पहनी जाने वाली परम्परागत फैज टोपी को प्रतिबन्धित कर दिया। स्त्रियों-पुरुषों के लिए पश्चिमी पोशाकों को बढ़ावा दिया गया। तुर्की पंचांग की जगह पश्चिमी (ग्रिगोरियन) पंचांग लाया गया। 1928 ई० में नई तुर्की वर्णमाला को संशोधित लैटिन रूप से अपनाया गया।

प्रश्न 2.
वास्तविक धर्मनिरपेक्ष होने के लिए राज्य के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर-
सचमुच धर्मनिरपेक्ष होने के लिए राज्य को न केवल धर्मतान्त्रिक होने से मना करना होगा बल्कि उसे किसी भी धर्म के साथ किसी भी तरह के औपचारिक कानूनी गठजोड़ से दूरी भी रखनी होगी। धर्म और राज्यसत्ता के बीच सम्बन्ध-विच्छेद धर्मनिरपेक्ष राज्यसत्ता के लिए आवश्यक है, मगर केवल यही पर्याप्त नहीं है। धर्मनिरपेक्ष राज्य को ऐसे सिद्धान्तों और लक्ष्यों के लिए अवश्य प्रतिबद्ध होना चाहिए जो अंशत: ही सही, गैर-धार्मिक स्रोतों से निकलते हों। ऐसे लक्ष्यों में शान्ति, धार्मिक स्वतन्त्रता, धार्मिक उत्पीड़न, भेदभाव और वर्जना से आजादी और साथ ही अन्तर-धार्मिक व अन्त:धार्मिक समानता सम्मिलित रहनी चाहिए।

प्रश्न 3.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
समाजवादी पन्थनिरपेक्ष राज्य।
उत्तर-
पन्थनिरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है तथा राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी धर्म का पालन करने को अधिकार होगा। राज्य, धर्म के आधार पर नागरिकों के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा तथा धार्मिक मामलों में विवेकपूर्ण निर्णय लेगा। इसके अतिरिक्त, राज्य के द्वारा सभी व्यक्तियों के धार्मिक अधिकारों को सुनिश्चित एवं सुरक्षित करने का प्रयास किया जाएगा। राज्य धार्मिक मामलों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगा, वरन् धार्मिक सहिष्णुता एवं धार्मिक समभाव की नीति को प्रोत्साहित करने का प्रयास करेगा। धर्म के सम्बन्ध में राज्य सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार करेगा। इस प्रकार की पन्थ-निरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षता का पालन करने वाले शासन को पन्थनिरपेक्ष या धर्मनिरपेक्ष राज्य कहते हैं।

प्रश्न 4.
भारत में धर्मनिरपेक्षता को अपनाना क्यों आवश्यक था?
उत्तर-
हम सभी जानते हैं कि भारत एक विशाल लोकतान्त्रिक देश है। ऐसे देश में राज्य को धर्म-निरपेक्ष बनाना सर्वथा आवश्यक है, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता मूल रूप से एक लोकतान्त्रिक अवधारणा है। यदि हम इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्मनिरपेक्षता एवं लोकतन्त्र सहगामी हैं। जब कभी धर्म की आड़ में राजाओं ने जनता पर अत्याचार किए तब जनता ने उनके शासन के विरुद्ध विद्रोह करना प्रारम्भ किया। भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध 1857 ई० की क्रान्ति को प्रमुख कारण यह था कि ब्रिटिश शासकों ने हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही धर्मों के मानने वालों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का प्रयास किया था। कालान्तर में धर्मनिरपेक्षता एवं लोकतन्त्र दोनों को मान्यता मिली। इसके अतिरिक्त, एक लोकतान्त्रिक देश में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना इसलिए भी उचित होती है कि स्वतन्त्रता, समानता, भ्रातत्व एवं सहिष्णुता के जिन आदर्शों की स्थापना लोकतन्त्र द्वारा होती है, वे धर्मनिरपेक्षता के भी आदर्श होते हैं।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धर्मनिरपेक्ष से क्या अभिप्राय है? धर्मनिरपेक्ष राज्य की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द अंग्रेजी भाषा के सेक्युलर’ (Secular) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। Secular शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘सरक्युलम’ (Sarculum) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है–‘संसार’ अथवा युग’। इस प्रकार शब्द-व्युत्पत्ति के आधार पर ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द से अभिप्राय सांसारिक, लौकिक अथवा ऐतिहासिक से है। दूसरे शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष धार्मिक अथवा पारलौकिक का प्रतिलोम है।” धर्मनिरपेक्ष राज्य की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं
जॉर्ज ऑस्लर के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष का अर्थ इस विश्व या वर्तमान जीवन से सम्बन्धित है, जो धार्मिक या द्वैतवादी विचारों से बँधा हुआ न हो।”
एच०बी० कामथ के अनुसार, “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर-रहित है, न ही यह अधर्मी राज्य है। और न ही धर्मविरोधी। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का अर्थ यह है कि इसमें ईश्वर पर आधारित धर्म के अस्तित्व को नहीं माना जाता।”
डोनाल्ड स्मिथ के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष राज्य वह है, जिसके अन्तर्गत धर्म-विषयक व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वतन्त्रता सुरक्षित रहती है; जो व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय धर्म को बीच में नहीं लाता; जो संवैधानिक रूप से किसी धर्म से सम्बन्धित नहीं है और न किसी धर्म की उन्नति का प्रयास करता है तथा न ही किसी धर्म के मामले में हस्तक्षेप करता है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य से अभिप्राय एक ऐसे राज्य से है जिसका अपना कोई धर्म नहीं होता और जो धर्म के आधार पर व्यक्तियों में कोई भेदभाव नहीं करता है। इसका अर्थ एक धर्म-विरोधी, अधर्मी या ईश्वररहित राज्य से नहीं है, वरन् एक ऐसे राज्य से है जो धार्मिक मामलों में पूर्णतया तटस्थ रहता है क्योंकि यह धर्म को व्यक्ति की व्यक्तिगत वस्तु मानता है।

प्रश्न 2.
भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य का स्वरूप क्या है?
उत्तर-
भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य का रूप
भारत संविधान से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि संविधान निर्माताओं ने भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य को स्थापित करने का पूर्ण प्रयास किया है। भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य के दो आधार हैं

प्रथम, भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न केवल इस बात का उल्लेख किया गया है कि यहाँ सभी नागरिकों को विचार-अभिव्यक्ति, विश्वास व धर्म की उपासना की स्वतन्त्रता प्रदान करने का प्रयास किया जाएगा।” वरन् इसमें 42वें संशोधन द्वारा ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को जोड़कर स्थिति और भी स्पष्ट कर दी गई है।

द्वितीय, संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना का दूसरा आधार भारतीय नागरिकों को मूल अधिकार के रूप में, धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान किया जाना है। संविधान के 25वें से 28वें अनुच्छेद नागरिकों की धार्मिक स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार का उल्लेख करते हैं।

भारत में धर्मनिरपेक्षता के आदर्श को न केवल सिद्धान्त में वरन् व्यवहार में भी अपनाया गया है। भारत में धार्मिक आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता, वरन् यहाँ सभी धर्मों को समान रूप से मान्यता दी गई है। उदाहरण के लिए-1956 ई० में दिल्ली में आयोजित ‘बौद्ध धर्म सम्मेलन’ तथा 1964 ई० में मुम्बई में आयोजित ईसाई धर्म सम्मेलन को सफल बनाने के लिए सरकार ने वित्तीय सहायता और प्रशासनिक सहयोग भी दिया। इसके अतिरिक्त, भारत में धर्म-निरपेक्षता के सिद्धान्त का लागू किया जाना इस बात से भी सिद्ध होता है कि यहाँ धर्मों के प्रतिभाशाली व्यक्ति शासन में उच्च पदों पर आसीन रहे हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना को न केवल भारत के लिए उचित समझा जाता है, वरन् भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य के आदर्श को लागू भी किया गया है।

प्रश्न 3.
धर्मनिरपेक्षता वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देती है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? तर्क पूर्ण उत्तरदीजिए।
उत्तर-
धर्मनिरपेक्षता वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देती है। अनुभवजन्य रूप में यह पूर्णतः असत्य भी नहीं है। प्रथमतः लोकतन्त्र में राजनेताओं के लिए वोट पाना आवश्यक है। यह उनके काम का अंग है और लोकतान्त्रिक राजनीतिक बहुत कुछ ऐसी ही है। लोगों के किसी समूह के पीछे लगने या उनका वोट प्राप्त करने की खातिर कोई नीति बनाने का वादा करने के लिए राजनेताओं को दोष देना उचित नहीं होगा। वास्तविक रूप से प्रश्न तो यह है कि वे ठीक-ठीक किस उद्देश्य से वोट पाना चाहते हैं? इसमें सिर्फ उन्हीं का हित है या विचाराधीन समूह का भी हित है। यदि किसी राजनेता को वोट देने वाला समूह उसके द्वारा बनवाई गई नीति से लाभान्वित नहीं हुआ, तो बेशक वह राजनेता दोषी होगा।

यदि अल्पसंख्यकों को वोट चाहने वाले धर्मनिरपेक्ष राजनेता उनकी इच्छा पूरी करने में समर्थ होते हैं, तो यह उस धर्मनिरपेक्ष परियोजना की सफलता होगी, जो आखिरकार अल्पसंख्यकों के हितों की भी रक्षा करती है।

लेकिन, अगर कोई व्यक्ति विचाराधीन समूह का कल्याण अन्य समूहों के कल्याण और अधिकारों की कीमत पर करना चाहे, तब क्या होगा? यदि ये धर्मनिरपेक्ष राजनेता बहुसंख्यकों के हितों को नुकसान, पहुँचाएँ, तब क्या होगा? तब एक नया अन्याय सामने आएगा। लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि पूरा राजनीति तन्त्र अल्पसंख्यकों के पक्ष में झुका हुआ हो परन्तु भारत में ऐसा कुछ हुआ है, इसका कोई प्रमाण नहीं है। संक्षेप में, वोट बैंक की राजनीति स्वयं में इतनी गलत नहीं है। गलत तो वोट बैंक की वैसी राजनीति है, जो अन्याय को जन्म देती है। केवल यह तथ्य कि धर्मनिरपेक्ष दल वोट बैंक का प्रयोग करते हैं, कष्टकारक नहीं है। भारत में हर समुदाय के सन्दर्भ में सभी दल ऐसा करते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय धर्मनिरपेक्षता की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर-
भारतीय धर्मनिरपेक्षता की आलोचना के लिए निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं-

1. धर्म-विरोधी- धर्मनिरपेक्षता, धर्म-विरोधी है। हम सम्भवतया यह दिखा पाने में सफल हुए हैं। | कि धर्मनिरपेक्षता संस्थाबद्ध धार्मिक वर्चस्व का विरोध करती है। यह धर्म-विरोधी होने का पर्याय नहीं है।

2. पश्चिम से आयातित- धर्मनिरपेक्षता के विषय में कहा जा सकता है कि यह पश्चिम से आयातित है अर्थात् यह ईसाइयतं से सम्बद्ध है। यह आलोचना बड़ी विचित्र है। पश्चिमी राष्ट्र तब ,धर्म-निरपेक्ष बने, जब एक महत्त्वपूर्ण स्तर पर उन्होंने ईसाइयत से सम्बन्ध समाप्त कर लिया। पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता में वैसी कोई ईसाइयत नहीं है। धर्म धर्म और राज्य का पारस्परिक निषेध, जिसे पश्चिमी धर्मनिरपेक्ष समाजों का आदर्श माना जाता है, सभी धर्मनिरपेक्ष राज्य सत्ता की प्रमुख विशेषता भी नहीं है। सम्बन्धविच्छेद के विचार की व्याख्या अलग-अलग प्रकार से की जा सकती है। कोई धर्मनिरपेक्ष राज्य सत्ता समुदायों के बीच शान्ति को बढ़ावा देने के लिए धर्म से सैद्धान्तिक दूरी बनाए रख सकती है और विशिष्ट समुदायों की रक्षा के लिए वह उसमें हस्तक्षेप भी कर सकती है। भारत में ठीक यही बात हुई, यहाँ ऐसी धर्मनिरपेक्षता विकसित हुई है, जो न तो पूरी तरह ईसाइयत से सम्बद्ध है न भारतीय जमीन पर सीधे-सीधे पश्चिमी आरोपण ही है। तथ्य तो यह है कि धर्मनिरपेक्षता का विगत इतिहास पश्चिमी और गैर-पश्चिमी, दोनों मार्गों का अनुसरण करता दिखाई देता है। पश्चिमी में राज्य और चर्च का सम्बन्ध विच्छेद का प्रश्न केन्द्रीय था और भारत जैसे देशों में शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व जैसे प्रश्न महत्त्वपूर्ण रहे हैं।

3. अल्पसंख्यकवाद- धर्मनिरपेक्षता पर अल्पसंख्यकवाद का आरोप भी लगाया जाता है। यह सच है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता अल्संख्यक अधिकारों की पैरवी करती है। मगर यह पैरवी न्यायोचित रूप से करती है, आलोचकों को अल्पसंख्यक अधिकारों को विशेष सुविधाओं के रूप में नहीं देखना चाहिए।

4. अधिक हस्तक्षेप- कुछ आलोचक कहते हैं कि धर्मनिरपेक्षता उत्पीड़नकारी है और समुदायों।
की धार्मिक स्वतन्त्रता में अधिक हस्तक्षेप करती है। यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता के बारे में गलत समझ है। यह सच है कि पारस्परिक निषेध के रूप में धर्म और राज्य में सम्बन्ध-विच्छेद के विचार को न मानकर भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म में हस्तक्षेप को अस्वीकार कर देती है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि यह अधिक हस्तक्षेपकारी है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म से सैद्धान्तिक दूरी बनाकर रखती है, साथ-साथ कुछ हस्तक्षेप की गुंजाइश भी रखती है किन्तु इस हस्तक्षेप का आशय उत्पीड़नकारी हस्तक्षेप नहीं होता।

प्रश्न 2.
“भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में
प्राचीनकाल से ही धर्म का बहुत महत्त्व रहा है तथा भारतीय सामाजिक और राजनीतिक जीवन धर्म से ओत-प्रोत रहा है। वर्तमान भारत का लोकतान्त्रिक गणराज्य नैतिकता, आध्यात्मिकता और मानव धर्म पर आधारित है। भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य को सुदृढ़ करने के लिए संविधान में निम्नलिखित व्यवस्थाएँ की गई हैं

1. राज्य का अपना कोई धर्म नहीं- संविधान के अनुसार भारत का अपना कोई धर्म नहीं है। राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हैं।

2. धार्मिक आधार पर भेदभाव समाप्त- भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को यह विश्वास | दिलाया गया है कि धर्म के आधार पर उनके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

3. कानून की दृष्टि से सभी व्यक्ति समान- संविधान के अनुच्छेद 14 अनुसार भारतीय राज्य-क्षेत्र में सभी व्यक्ति कानून की दृष्टि से समान होंगे और धर्म, जाति अथवा लिंग के | आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

4. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार- भारतीय संविधान द्वारा प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 25-28 द्वारा धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार प्रदान किया गया है। इसमें नागरिकों को अपने अन्त:करण के अनुसार किसी भी धर्म का पालन करने, छोड़ने, प्रचार करने आदि का पूर्ण अधिकार है। किसी भी नागरिक को किसी धर्म-विशेष का पालन करने या न करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।

5. धार्मिक संस्थाओं की स्थापना और धर्म-प्रचार की स्वतन्त्रता- संविधान के अनुसार सभी , धर्मों को स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। इसके अनुसार प्रत्येक नागरिक को धार्मिक तथा परोपकारी उद्देश्य के लिए संस्थाएँ स्थापित करने, उनका संचालन करने, धार्मिक मामलों का प्रबन्ध करने, चल व अचल सम्पत्ति रखने और प्राप्त करने तथा ऐसी सम्पत्ति का कानून के अनुसार प्रबन्ध करने का अधिकार है।

6. धार्मिक शिक्षा का निषेध- अनुच्छेद 28 के अनुसार सरकारी शिक्षण संस्थाओं में किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती तथा सरकार से आर्थिक सहायता यी मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में भी किसी को धार्मिक गतिविधियों तथा कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।

7. धार्मिक कार्यों के लिए किया जाने वाला व्यय कर-मुक्त- भारतीय संविधान अपने नागरिकों को न केवल धार्मिक स्वतन्त्रता और धार्मिक संस्थाओं की स्थापना की स्वतन्त्रता प्रदान करता है, वरन् संविधान के अन्तर्गत धार्मिक कार्यों के लिए किए जाने वाले व्यय को भी कर-मुक्त घोषित किया गया है।

8. साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का अन्त- संविधान द्वारा साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का अन्त कर दिया गया है। अब प्रत्येक धर्म के अनुयायी को वयस्क मताधिकार के आधार पर मत देने का अधिकार दिया गया है।
भारत का संविधान देश की एकता तथा अखण्डता को बनाए रखने तथा सार्वजनिक हित की। दृष्टि से धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार पर कुछ प्रतिबन्ध भी आरोपित करता है। भारत में सच्चे धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की गई है।

Chapter 8 Secularism (धर्मनिरपेक्षता)