Chapter 9 जैव अणु

Textbook Questions and Answers 

प्रश्न 1. 
वृहत् अणु क्या है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
रासायनिक दृष्टि से इनका अणुभार अधिक होता है अर्थात् एक हजार डाल्टन से अधिक होता है। इनकी विलेयता कम होती है। इनका निर्माण लघु जैव अणुओं के बहुलीकरण से होता है। ये अम्ल अविलेय अंश में पाए जाते हैं, उन्हें बृहत् अणु कहते हैं।
उदाहरण: प्रोटीन, न्यूक्लीक अम्ल पॉलीसैकेराइड्स व लिपिड्स।

प्रश्न 2. 
ग्लाइकोसिडिक, पेप्टाइड तथा फॉस्फो – डाइस्टर बंधों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पेप्टाइड बंध: किसी भी पॉलीपेप्टाइड या प्रोटीन में एमीनो अम्ल पेप्टाइड बंध द्वारा जुड़े होते हैं जो एक एमीनो अम्ल कार्बोक्सिल (-COOH) समूह व अगले अमीनो अम्ल के एमीनो (-NH2) समूह के बीच अभिक्रिया के उपरान्त जल अणु के निकलने के बाद बनता है।
ग्लाइकोसिडिक बंध: एक पॉलीसैकेराइड में मोनोसैकेराइड संभवत: ग्लाइकोसिडिक बंध द्वारा जुड़े रहते हैं। यह बंध भी निर्जलीकरण द्वारा बनता है। यह बंध पास के दो मोनोसैकेराइड के दो कार्बन परमाणु के बीच बनता है।
फॉस्फो – डाइस्टर बंध: न्यूक्लीक अम्ल में एक न्यूक्लीओटाइड के एक शर्करा का 3 – कार्बन अनुवर्ती न्यूक्लीओटाइड के शर्करा के 5 – कार्बन से फॉस्फेट समूह द्वारा जुड़ा होता है। शर्करा के फॉस्फेट व हाइड्रॉक्सिल समूह के बीच का बंध एक एस्टर बंध होता है। एस्टर बंध दोनों तरफ मिलता है अतः इसे फॉस्फो – डाइस्टर बंध कहते हैं।

प्रश्न 3. 
प्रोटीन की तृतीयक संरचना से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
प्रोटीन में केवल दक्षिणावर्ती कुंडलियां मिलती हैं। अन्य जगहों पर प्रोटीन की लड़ी दूसरे रूप में मुड़ी होती है, इन्हें द्वितीयक संरचना कहते हैं। इसके अतिरिक्त प्रोटीन की लम्बी कड़ी अपने ऊपर ही एक खोखले गोले के समान मुड़ी हुई होती है जिसे प्रोटीन की तृतीयक संरचना कहते हैं।

यह प्रोटीन के त्रिआयामी रूप को प्रदर्शित करता है। तृतीयक संरचना प्रोटीन के जैविक क्रियाकलापों के लिए नितांत आवश्यक है।

प्रश्न 4. 
10 ऐसे रुचिकर सूक्ष्म जैव अणुओं का पता लगाइए जो कम अणुभार वाले होते हैं व इनकी संरचना बनाइए। ऐसे उद्योगों का पता लगाइए जो इन यौगिकों का निर्माण विलयन द्वारा करते हैं। इनको खरीदने वाले कौन हैं? मालूम कीजिए।
उत्तर:
10 रुचिकर सूक्ष्म जैव अणु निम्न हैं

  1. ग्लूकोज
  2. राइबोज 
  3. ग्लाइसीन
  4. एलेनीन 
  5. सीरीन
  6. पाल्मीटिक अम्ल 
  7. ग्लिसरॉल
  8. ट्राइग्लिसराइड 
  9. फॉस्फोलिपिड (लेसीथीन) 
  10. कोलेस्टेरॉल। 

इनकी संरचना निम्न प्रकार से है:


रसायन शास्त्र की एक महत्त्वपूर्ण शाखा में जीवों के हजारों बड़े-छोटे यौगिकों का विलगन अथवा पृथक्करण किया जाता है, उनकी संरचना निर्धारित की जाती है और सम्भव हो तो उन्हें संश्लेषित किया जाता है। यदि कोई जैव अणुओं की एक तालिका बनाए तो उनमें हजारों कार्बनिक यौगिकों जैसे अमीनो अम्ल, शर्करा आदि पाए जाएंगे। उपर्युक्त सभी श्रेणी के इन यौगिकों की उपस्थिति को जिन्हें ऊपर चित्र में दर्शाया गया है, देखिये कपर चित्र में। इनका निर्माण शर्करा उद्योग, तेल एवं घी उद्योग, औषधि उद्योग आदि करते हैं। इनका सबसे बड़ा खरीददार मनुष्य ही है जो इनका उपयोग अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु करता है।

प्रश्न 5. 
प्रोटीन में प्राथमिक संरचना होती है, यदि आपको जानने हेतु ऐसी विधि दी गई है, जिसमें प्रोटीन के दोनों किनारों पर अमीनो अम्ल हैं तो क्या आप इस सूचना को प्रोटीन की शुद्धता अथवा समांगता (Homogeneity) से जोड़ सकते हैं?
उत्तर:
प्राथमिक संरचना प्रोटीन में अमीनो अम्ल के क्रम व इसके स्थान के बारे में जैसे कि पहला, दूसरा व इसी प्रकार अन्य कौनसा अमीनो अम्ल होगा, की जानकारी को प्रोटीन की प्राथमिक संरचना कहते हैं।
कल्पना करें कि प्रोटीन एक रेखा है तो इसके बाएं सिरे पर प्रथम व दाएं सिरे पर अन्तिम अमीनो अम्ल मिलता है। प्रथम अमीनो अम्ल को नाइट्रोजन सिरा अमीनो अम्ल कहते हैं, जबकि अन्तिम अमीनो अम्ल को कार्बन सिरा (c – सिरा) अमीनो अम्ल कहते हैं। अत: इन सिरों को

क्रमश: N – होर तथा C – छोर कहते हैं। इससे प्रोटीन की शुद्धता या समांगता प्रदर्शित होती है।

प्रश्न 6.
चिकित्सार्थ अभिकत्ता ( Therapeutic agents) के रूप में प्रयोग में आने वाले प्रोटीन का पता लगाइए व सूचीबद्ध कीजिए। प्रोटीन की अन्य उपयोगिताओं को बताइए (जैसे सौन्दर्य प्रसाधन आदि)।
उत्तर:
आण्विक संरचना के आधार पर प्रोटीन ग्लोब्यूलर व फाइबर प्रकार के होते हैं। ग्लोब्युलर तथा फाइबर प्रोटीन का चिकित्सार्थ अभिकर्ता के रूप में निम्न उपयोग है:

  1. ग्लोब्यूलर प्रोटीन:
    • कुछ ग्लोब्यूलर प्रोटीन जैविक क्रियाओं को नियमित करती हैं। जैसे प्रोटीन हार्मोन इन्सुलिन शर्करा का स्तर बनाये रखने के लिए है।
    • कुछ ग्लोब्यूलर प्रोटीन एन्जाइम की तरह कार्य करती हैं, जो सभी जैविक अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करती हैं। इन्सुलिन और थायरोग्लोबिन इसका उदाहरण है।
    • एंटीबोडीज का कार्य भी कुछ ग्लोब्यूलर प्रोटीन करती हैं। ये शरीर को जीवाणुओं से लड़ने के लिए तैयार करती हैं। इस प्रकार हमें रोगों से बचाती हैं।
    • रक्त में पाये जाने वाले प्रोटीन श्रोम्बिन (Thrombin) तथा फाइब्रिनोजन (fibrinogen), चोट लगने पर रधिर में थक्का (clot) जमाने में सहायक होते हैं।
    • ऐक्टिन (Actin) व मायोसिन (Myosin) नामक प्रोटीन में संकुचन का गुण होता है जिससे मांसपेशियों में संकुचन होता है।
  2. फाइबर प्रोटीन: फाइबर प्रोटीन जन्तु ऊतकों के लिए संरचनात्मक इकाई का कार्य करती है। उदाहरण के लिए करेिटिन त्वचा में, बालों में, नाखून में, ऊन, सींग और पंखों में, कोलेजन टेनडन में, मायोसिन माँसपेशियों में और फाइब्रोइन सिल्क में कार्य करती है।

रक्त में पाया जाने वाला हीमोग्लोबिन प्रोटीन श्वास द्वारा ग्रहण की गई O2 को फेफड़ों में विभिन्न कोशिकाओं तक पहुंचाता है। इस प्रोटीन अणु में एमीनो अम्ल की इकाइयाँ होती हैं। इसकी कमी से मनुष्य में दात्र कोशिका अरक्तता या सिकेल सेल ऐनीमिया नामक रोग हो जाता है। कोल्ड क्रीम में उपस्थित तेल,यादाम तेल, लीनोलीन ऑयल, पैराफिन ऑयल और मधुमक्खी का मोम हो सकते हैं। बोरेक्स (Borax) पायसीकरण में सहायता करती है।

परिमार्जक क्रीम और लोशन में सामान्यतः मधुमक्खी का मोम, बोरेक्स, खनिज तेल और जल वाले पायस (Emulsions) होते हैं। इन में अनिवार्य फूलों के तेल, पत्ते, फल, जड़ या विभिन्न पौधों की लकड़ी से प्राप्त होते हैं। टैलकम पाउडर में, बेबी पाउडर में और चेहरे के पाउडर में मैग्नीशियम सिलेकेट महत्त्वपूर्ण संघटक के रूप में होता है।

प्रश्न 7. 
ट्राइग्लिसराइड के संगठन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ट्राइग्लिसराइड (Triglyceride): सरल लिपिड्स (Simple Lipids) ये सरल, मध्यम या विशुद्ध होती हैं। इनके अणु अपेक्षाकृत बड़े – बड़े होते हैं। प्रत्येक अणु का संश्लेषण ग्लिसरॉल के एक तथा वसीय अम्लों के तीन अणुओं के ‘ईस्टर बन्धों’ द्वारा परस्पर जुड़ने से होता है। इसीलिए इन्हें ट्राइग्लिसराइड्स भी कहते हैं। घी, तेल, चर्बी आदि के तेल असंतृप्त वसाओं के उदाहरण हैं, जबकि मूंगफली, सरसों, तिल, सूरजमुखी आदि के तेल असंतृप्त वसाएँ हैं। ये इनमें ऑक्सीजन की मात्रा कम होने के कारण इनका ऑक्सीकरण अधिक होता है। अत: ये कार्योहाइड्रेट्स की अपेक्षा दुगुनी से कुछ ऊर्जा मुक्त करती हैं। ऊर्जा के लिए संचित भोजन के रूप में इनका सबसे अधिक महत्व होता है। इनका अधिकांश भण्डारण विशिष्ट वसीय ऊतकों (adipose tissues) में होता है।

प्रश्न 8. 
क्या प्रोटीन की अवधारणा के आधार पर वर्णन कर सकते हैं कि दूध कादही अथवा योगर्ट में परिवर्तन किस प्रकारहोता है?
उत्तर:
लैक्टोबैसीलस दूध की लैक्टोज शर्करा को लैक्टिक अम्ल में परिवर्तित करता है एवं प्रोटीन को जमाने में सहायता करता है। यह दूध को दही में परिवर्तित कर देता है। 

प्रश्न 9. 
क्या आप व्यापारिक दृष्टि से उपलब्ध परमाणु मॉडल (बाल व स्टिक नमूना) का प्रयोग करते हुए जैव अणुओं के उन प्रारूपों को बना सकते हैं?
उत्तर:
हाँ हम व्यापरिक दृष्टि से उपलब्ध परमाणु मॉडल (बाल व स्टिक नमूना) का प्रयोग करते हुए जैव अणुओं के उन प्रारूपों को बना सकते है। इसमें परमाणु को बॉल (ball) व बंधों को स्टिक (stick) से प्रदर्शित किया जा सकता है। दिये गये चित्र में D – ग्लूकोज का बॉल व स्टिक मॉडल बताया गया है।

प्रश्न 10. 
अमीनो अम्लों के दुर्बल क्षार से अनुमापन ( Titrate) कर अमीनो अम्ल में वियोजी क्रियात्मक समूहों का पता लगाने का प्रयास कीजिए।
उत्तर:
अमीनो अम्ल कार्बनिक यौगिक होते हैं जिनमें इसके एक ही कार्बन पर एक अमीनो समूह व एक अम्लीय समूह प्रतिस्थापित होते हैं। जब हम अमीनो अम्ल का अनुमापन दुर्बल क्षार से करते हैं तो यह विघटित होकर दो क्रियात्मक समूह बनाता है।
(a)-COOH (कार्याक्सिलिक समूह) 
(b) अमीनो समूह (NH2

प्रश्न 11.
एलेनीन अमीनो अम्ल की संरचना बताइए। 
उत्तर:
एलेनीन अमीनो अम्ल की संरचना निम्न है:

प्रश्न 12. 
गोंद किससे बने होते हैं? क्या फेविकोल इससे भिन्न है?
उत्तर:
सेलुलोस एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बहुलक है जिसकी विभिन्न पदार्थों के साथ क्रिया करवाकर गोंद प्राप्त किया जाता है।
इसके अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण पॉलिसैकेराइड गोंद (Gum) तथा पेक्टिन (Pectin) गोंद एक से अधिक प्रकार के मोनोसैकेराइडों के बहुलक होते हैं। इन्हें पेड़ – पौधों की छालों से प्राप्त किया जाता है। बबूल के पेड़ से प्राप्त गोंद का उपयोग औषधि बनाने तथा चिपकाने वाले गोंद के रूप में किया जाता है। हाँ, फेविकोल गोंद से भिन्न है क्योंकि फेविकोल निर्माण की प्रक्रिया और कच्चा माल गोंद के निर्माण की प्रक्रिया और कणे माल से भिन्न है। फेविकोल पॉलिविनाइल एल्कोहॉल (PVA) होता है।

प्रश्न 13. 
प्रोटीन, वसा व तेल अमीनो अम्लों का विश्लेषणात्मक परीक्षण बताइये एवं किसी भी फल के रस, लार, पसीना तथा मूत्र में इनका परीक्षण करें।
उत्तर:
प्रोटीन का विश्लेषणात्मक परीक्षण अण्डे की सफेदी, दूध, सेम, मटर, पनीर, मांस, मछली, सोयाबीन इत्यादि में प्रोटीन मिलता है जिससे यह परीक्षण किया जा सकता है। इनमें से किसी को भी आसुत जल में मोलकर विलायन बना लिया जाता है, यही विलयन परीक्षण करने के लिये अज्ञात विलयन के रूप में काम लिया जाता है।

(1) वाइयूरेट परीक्षण:
सामग्री: परखनली, आसक्ति जल, स्त्रिट लैम्प, टैस्ट – ट्युब होल्डर।
परीक्षण विधि: एक परखनली में थोड़ा-सा परीक्षण के लिये दिये पदार्थ को लेकर उसमें 40% NaOH विलयन को मिलाओ जिससे वह तेज शारीय बन जावे। तत्पश्चात् उसमें 1% कॉपर सल्फेट विलयन की दो बूंदें डालो।
प्रेक्षण: यदि परीक्षण के लिये दिये पदार्थ में प्रोटीन है तो विलबन बैंगनी या गुलाबी रंग का हो जाता है। (यह अभिक्रिया प्रोटीन की पेप्टाइड बन्यता के कारण होती है और पेप्टाइड प्रत्येक प्रकार की प्रोटीन में होती है। अत: यह सब प्रकार की प्रोटीन की अनुकूल अभिक्रिया है।)
निष्कर्ष: दिये गये परीक्षण पदार्थ में प्रोटीन हैं।

(2) जेन्धोप्रोटिक परीक्षण:
परीक्षण विधि:
(अ) प्रोटीन के 5% विलयन के 3 घनसेमी (∝) एक परखनली में लेकर उसमें 1 घनसेमी (∝) सान्द्र नाइट्रिक अम्ल मिलाओ। 
(ब) इससे सफेद रंग का अवक्षेप बनता है जो कि गरम करने पर पीले रंग में बदल जाता है और घुलकर पीले रंग का विलयन बनाता है। 
(स) अब इस विलयन को ठण्डा करके इसमें सोडियम हाइड्रॉक्साइड के क्रिस्टल डालो। 
(द) इससे पीले रंग का विलयन नारंगी रंग में बदल जाता है।

निष्कर्ष: दिये गये अज्ञात विलयन में प्रोटीन उपस्थित है।
वसा व तेल का विश्लेषणात्मक परीक्षण: मक्खन, घी, तेल, क्रीम इत्यादि में वसा प्रचुर होती है जिससे यह परीक्षण किया जा सकता है। ये सभी अज्ञात विलयन के रूप में काम में ली जाती हैं।

परीक्षण विधि:
1. विलेयता परीक्षण: चार परखनालियां लेकर उनमें A,B,C व D अंकित करके क्रमश: 5 घनसेमी (∝) जल, ईथर, क्लोरोफार्म व ऐल्कोहॉल लो। प्रत्येक में वसा (जैतून के तेल) की 3 – 3 बूंद मिलाओ।
प्रेक्षण:
परखनली A – वसा (तेल) जल में नहीं मिलती एवं तैरती है। 
परखनली B = वसा ईथर में मिल जावेगी। 
परखनली C = वसा क्लोरोफार्म में मिल जावेगी। 
परखनली D = वसा (तेल) ऐल्कोहॉल में तली में डूब जाती है व गरम करने पर विलेय है। 
निष्कर्ष: चूंकि वसा जल में अघुलनशील व ईथर, क्लोरोफार्म में घुलनशील है तथा ऐल्कोहॉल में गर्म करने पर विलेय है। अत: दिया हुआ पदार्थ वसा है।

2. डाई परीक्षण: एक परखनली लेकर उसमें वसा (जैतून के तेल की 20 बूंदें) लो। इसमें एक चुटकी सूडान IV पाउडर मिलाकर अच्छी तरह हिलाओ। अगर आवश्यकता पड़े तो इसे हल्का – सा गर्म भी करो।
प्रेक्षण: 5 मिनट पश्चात् डाई (stain) मुल जाती है। ऊपरी परत लाल रंग की भी हो सकती है। सूडान III के साथ भी यह प्रेक्षण प्राप्त होता है।
निष्कर्ष: चूंकि सूडान रंग केवल वसा में विलेय है अत: परीक्षण के – लिए दिया पदार्थ वसा है।
मूत्र में एल्ब्यूमिन प्रोटीन का परीक्षण:

1. एक परखनली में 3ml नमूने का मूत्र लें, अब इसमें 3ml सल्फोसिलिक अम्ला (3%) मिलायें।

विलयन का रंग सफेद दूधिया हो जाता है।

एल्ब्यूमिन निश्चित उपस्थित है।

2. एक परखनली में 3 (ml) नमूने का मूत्र लें इसमें 5 (ml) राबर्ट घोल धीर – धीरे परखनली की दीवार के सहारे मिलायें।

विलयन में दूधिया छल्ला बनता है।

एल्ब्यूमिन उपस्थित है।


प्रश्न 14. 
पता लगाइए कि जैवमण्डल में सभी पादपों द्वारा कितने सेल्यूलोज का निर्माण होता है? इसकी तुलना मनुष्यों द्वारा उत्पादित कागज से करें। मानव द्वारा प्रतिवर्ष पादप पदार्थों की कितनी खपत की जाती है? इसमें वनस्पतियों की कितनी हानि होती है?
उत्तर:
पादप में पाई जाने वाली कोशिका भित्ति सेल्यूलोज की बनी होती है। कागज पौधों की लुगदी से बना होता है जिसमें सेल्यूलोज ही होता है। रुई के धागे भी सेल्यूलोज के बने होते हैं। यह विश्व में सबसे अत्यधिक पाया जाने वाला कार्यनिक पदार्थ है। पौधों में पाये जाने वाले कुल कार्बन का लगभग पचास प्रतिशत भाग सेल्यूलोज होता है। सभी पादप कोशिकाओं की कोशिका भित्तियाँ लगभग बीस-चालीस प्रतिशत तक सेल्यूलोज से बनी होती हैं। लकड़ी में बीस-पचास प्रतिशत तक तथा कपास में नब्बे प्रतिशत तक सेल्यूलोज पाया जाता है। प्राचीन काल से ही मानव आश्रय, ईधन तथा औजारों आदि के लिए सेल्यूलोज युक्त पदार्थों पर निर्भर रहा है।

कपास लिनेन एवं पटसन के तन्तुओं का उपयोग कपड़े तथा रस्सियों का निर्माण किया जाता है। सेल्यूलोज को क्षार में छोड़कर रेयन के कृत्रिम रेशे बनाये जाते हैं। कागज तथा कपड़े बनाने में सेल्यूलोज का सर्वाधिक उपयोग होता है। जैसे – जैसे विश्व की संख्या बढ़ती जा रही है वैसे – वैसे कागज की खपत दिनोंदिन बढ़ रही है। कागज बनाने के हजारों छोटे-बड़े नए कारखाने प्रतिवर्ष लग रहे हैं। कागज के कचे माल के रूप में वनों की अंधाधुंध कटाई हो चुकी है।

वनों के नष्ट होने से पृथ्वी पर CO2 और भूताप का स्तर बढ़ता जा रहा है। वनों के कटने से हरे – भरे क्षेत्र रेगिस्तान में परिवर्तित हो रहे हैं। वन्य जीवन खतरे में पड़ गया है। वनस्पति क्षेत्र को पहुँची हानि से सूखे और बाढ़ के अवसर बढ़ गये हैं। कागज के कारखानों के कारण हमारी पृथ्वी की वनस्पति सम्पदा को बहुत हानि पहुँची है।

प्रश्न 15. 
एंजाइम के महत्त्वपूर्ण गुणों का वर्णन कीजिए। 
उत्तर:
एंजाइम के महत्त्वपूर्ण गुण निम्नलिखित हैं:
1. जैविक उद्गम (Biological origin): सजीवों में पाये जाने वाले सभी प्रकार के एंजाइम का संश्लेषण कोशिका में होता है तथा एंजाइम के द्वारा नियंत्रित अभिक्रियाएँ कोशिका में या कोशिका से बाहर हो सकती हैं। कोशिकाओं में होने वाली सभी रासायनिक अभिक्रियायें एंजाइम्स द्वारा नियंत्रित होती हैं तथा कोशिका से बाहर होने वाली अभिक्रियाओं के उदाहरणस्वरूप में, जैसे डबलरोटी पर उगने वाली कवक राइजोपस (Rhiropus) द्वारा जल अपपटनी क्रिया कोशिका से बाहर होती है।

2. कोलॉइडी प्रकृति (Colloidal nature): प्राय: एंजाइम के अणु बड़े होने के कारण कोलॉइडी स्वरूप के होते हैं। एंजाइम में प्रोटीन के समस्त गुण जैसे उच्च आण्विक भार, कोलॉइडी व्यवहार, मंद विसरण, विधुत धारा के प्रति गति तथा सजीव झिल्लियों से आर – पार होने की अक्षमता इत्यादि पाये जाते हैं। कोलॉइडी स्वरूप होने के कारण एंजाइम्स अणु का सतह क्षेत्रफल बहुत अधिक होता है, जिस पर अनेक सक्रिय स्थल होते हैं। सक्रिय स्थल का होना एंजाइम्स की मात्रात्मक दक्षता (Quantitative efficiency) को दर्शाता है।

3. अणुभार (Molecular weight): एंजाइम का अणुभार अधिक होता है, जैसे कैटालेज तथा यूरिएज (Catalase & Urease) का अणुभार 2,50,000 तथा 4,83,000 तक होता है।

4. एंजाइम विशिष्टता (Enzyme Specificity): प्रत्येक एंजाइम में विशिष्टता होती है, यह दो प्रकार की होती है:
(i) पूर्ण विशिष्टता (Absolute Specificity): जब एक एंजाइम किसी एक आधार (Substrate) विशेष का ही उत्प्रेरक होता है। जैसेमाल्टेस (Maltase) एंजाइम केवल माल्येस का ग्लूकोस में उत्प्रेरण करता है।
(ii) समूह विशिष्टता (Group Specificity): जब कोई एंजाइम आधारी पदार्थों के समूह पर क्रियाशील हो जो संरचनात्मक दृष्टि से एकदूसरे से सम्बन्धित होता है।
5. उत्प्रेरी गुण (Catalytic properties): उत्प्रेरक वे रासायनिक पदार्थ होते हैं जो स्वयं परिवर्तित या नष्ट हुए बिना रासायनिक अभिक्रियाओं को त्वरित (accelerate) करते हैं। कम मात्रा में होते हुए भी रासायनिक क्रिया को त्वरित करके, अभिक्रिया के समाप्त होने पर पुनः प्रकट हो जाते हैं। अत: एंजाइम में उत्प्रेरक के सभी गुण होते हैं। इसी कारण एंजाइम को जैव-रासायनिक उत्प्रेरक (Biochemical catalyst) कहते हैं।

6. उत्क्रमणीय गुण (Reversible properties): समस्त एंजाइम्स उत्प्रेरित क्रियाएँ उत्क्रमणीय (Reversible) होती हैं, अर्थात् रासायनिक क्रिया को दोनों दिशाओं में त्वरित करते हैं, जैसे

7. मात्रात्मक दक्षता (Quantitative efficiency): एंजाइम्स की बहुत अल्प मात्रा क्रियाधार (substrate) की अधिक मात्रा का रूपान्तरण कर देती है।

8. संवेदनशीलता (Sensitivity): एंजाइम्स ऋष्मा के प्रति संवेदनशील या ऊष्महत (Thermolabile) होते हैं अर्थात् उच्च ऊष्मा या तापक्रम 55°C से 65°C पर विकृतीकृत या नष्ट (denaturation) हो जाते हैं। एंजाइम की सर्वाधिक सक्रियता 25°C से 30°C के मध्य होती है परन्तु सूखे हुए बीज के एंजाइम 100°C से 120°C के उच्च तापक्रम (क्योंकि इनमें जल की मात्रा बहुत कम होती है) पर भी कार्यशील रहते हैं।

9. pH: प्रत्येक एंजाइम की सक्रियता हेतु एक निश्चित pH होता है। अधिकांश एंजाइम 60 से 7.5 pH के मध्य अधिक सक्रिय होते हैं।

10. एंजाइम्स के पूर्वगामी (Precursors of enzymes): सजीव कोशिकाओं में एंजाइम्स के पूर्वगामी (Precursor) निष्क्रिय (inactive) अवस्था में रहते हैं। इन्हें जाइमोजन्स या प्रोएंजाइम्स कहते हैं। कुछ यौगिकों की सहायता से जाइमोजन को एंजाइम्स में परिवर्तित किया जा सकता है। ये यौगिक काइनेजेज (Kinases) कहलाते हैं।

11. अभिक्रिया को त्वरित करना (Accelerate the rate of reaction): एंजाइम रासायनिक क्रिया की गति को त्वरित करते हैं। एंजाइम्स अभिक्रिया की साम्यावस्था (equilibrium) पर कोई प्रभाव उत्पन्न नहीं करते हैं।

Chapter 9 जैव अणु