Rajasthan Board RBSE Class 12 Psychology Chapter 9 व्यावहारिक मनोविज्ञान

RBSE Class 12 Psychology Chapter 9 अभ्यास प्रश्न

RBSE Class 12 Psychology Chapter 9 बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्य विश्लेषण पूर्णतः सम्बन्धित है –
(अ) शिक्षा मनोविज्ञान
(ब) संप्रेषण
(स) संगठन
(द) खेल मनोविज्ञान
उत्तर:
(स) संगठन

प्रश्न 2.
सीखने के अनुभवों की व्याख्या होती है –
(अ) शिक्षा
(ब) संप्रेषण
(स) संगठन
(द) खेल मनोविज्ञान
उत्तर:
(अ) शिक्षा

प्रश्न 3.
संप्रेषण के पहलू हैं –
(अ) संसूचनात्मक
(ब) अन्योन्यक्रियात्मक
(स) प्रत्याक्षात्मक
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

प्रश्न 4.
खेल मनोविज्ञान के पिता कहा जाता है –
(अ) बुण्ट
(ब) रोजर्स
(स) कोलमेन ग्रिफिक
(द) सिंगर
उत्तर:
(स) कोलमेन ग्रिफिक

प्रश्न 5.
वृद्ध व्यक्तियों के मनोविज्ञान को कहा जाता है –
(अ) सामान्य
(ब) दिक्
(स) जरा
(द) नैदानिक
उत्तर:
(स) जरा

RBSE Class 12 Psychology Chapter 9 लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यावहारिक मनोविज्ञान का अर्थ बताइए।
उत्तर:
व्यावहारिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत मनोविज्ञान के सामान्य सिद्धान्तों, नियमों, मान्यताओं तथा मानकों का उपयोग मानव के कल्याण हेतु किया जाता है जिससे मानव जीवन को अधिक सुखी एवं समृद्ध बनाया जा सके। मनोविज्ञान की यह शाखा उद्योग, चिकित्सा, शिक्षा, व्यवसाय, विज्ञापन आदि क्षेत्रों में मानव सेवा के कार्यों में लगी है।

आधुनिक युग में व्यावहारिक मनोविज्ञान को “मनोप्रोद्यौगिकी” नाम दिया गया है। इसके अन्तर्गत मनोविज्ञान की प्रविधियाँ एवं विधियाँ मानव व्यवहार को विभिन्न सन्दर्भो में समझने, व्याख्या करने, नियन्त्रण करने तथा उसके सम्बन्ध में पूर्वकथन करने के व्यावहारिक उपयोग में लायी जाती है। अतः स्पष्ट है कि मनोविज्ञान का व्यावहारिक पक्ष ही व्यावहारिक मनोविज्ञान है।

प्रश्न 2.
शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ बताइए।
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान दो शब्दों से मिलकर बना है-शिक्षा एवं मनोविज्ञान, जिसका शाब्दिक अर्थ है शिक्षा से सम्बन्धित मनोविज्ञान अर्थात् यह मनोविज्ञान का व्यावहारिक रूप होने के साथ-साथ वह विज्ञान भी है, जो शिक्षा की प्रक्रिया में मानव व्यवहार का अध्ययन करता है।

शिक्षा के क्षेत्र में मनोविज्ञान के सिद्धान्तों के प्रयोग को शिक्षा मनोविज्ञान कहा जाता है। शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षक, शिक्षार्थी तथा शिक्षालय के मध्य समन्वय स्थापित कर शिक्षार्थी के सर्वांगीण विकास की पहल करता है।

शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत स्कूल मनोवैज्ञानिक का कार्य मुख्य रूप से प्राथमिक तथा माध्यमिक वर्ग के स्कूलों में छात्रों में उत्पन्न होने वाली समस्या के उपचार हेतु अन्य विशेषज्ञों के पास निदान के लिए भेजा जाता है।

प्रश्न 3.
संप्रेषण मनोविज्ञान का अर्थ बताइए।
उत्तर:
किसी भी कार्य में संयुक्त सक्रियता होने के लिए संप्रेषण के सम्बन्ध होना आवश्यक है। “संप्रेषण” का अर्थ है-किसी विचार या संदेश को एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रेषित करने वाले के द्वार भेजना तथा प्राप्त करने वाले के द्वारा प्राप्त करना। संप्रेषण तभी सफल होगा जब संप्रेषणकर्ता तथा प्राप्तकर्ता दोनों सहयोगात्मक प्रक्रिया में भाग लें।

संप्रेषण एक ऐसा माध्यम है, जिसमें विचारों का स्पष्ट रूप से आदान-प्रदान होता है। अतः संप्रेषण लोगों के बीच संपर्क स्थापित व विकसित करने की एक जटिल प्रक्रिया है, जिसकी जड़ें संयुक्त रूप से काम करने की आवश्यकता में होती है। किसी भी कार्य को सफल बनाने के लिए सम्पर्क यदि न हो तो कोई भी कार्य या समुदाय सफल संयुक्त कार्य नहीं कर सकता है।

प्रश्न 4.
किन क्षेत्रों में मनोविज्ञान का उपयोग किया जाता है?
उत्तर:
मनोविज्ञान का प्रयोग अनेक क्षेत्रों में किया जाता है –

  1. मनोविज्ञान का प्रयोग पर्यावरण को बचाने व उसके रख-रखाव के लिए किया जाता है।
  2. मनोविज्ञान का प्रयोग स्वास्थ्य के क्षेत्र में किया जाता है। इसके अन्तर्गत स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों का अध्ययन भी किया जाता है।
  3. मनोविज्ञान का प्रयोग व्यक्ति में सुधार लाने के लिए भी किया जाता है।
  4. मनोविज्ञान का प्रयोग व्यक्ति के दिक् में ऊँचाई पर कार्यरत होने वाले व्यक्ति के व्यवहार के परिवर्तनों का अध्ययन भी किया जाता है।
  5. मनोविज्ञान का प्रयोग व्यक्ति के जीवन में खेल-कूद के महत्व को बताने वाले क्षेत्र के लिए भी किया जा सकता है।
  6. मनोविज्ञान का प्रयोग राजनीतिक नेताओं व अधिकारियों के मध्य पाए जाने वाले सम्बन्धों को जानने के लिए भी किया जाता है।
  7. मनोविज्ञान का प्रयोग वृद्धों की मानसिक स्थिति को जानने के लिए भी किया जाता है।
  8. मनोविज्ञान का प्रयोग व्यक्ति के संवेग व संस्कृति को जानने आदि क्षेत्रों में भी किया जाता है।

RBSE Class 12 Psychology Chapter 9 दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शैक्षिक मनोविज्ञान पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
शैक्षिक मनोविज्ञान की स्थिति, प्रकृति या इसकी विशेषताओं को निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से स्पष्ट कर सकते हैं –

1. शिक्षा मनोविज्ञान सीखने और सिखाने का मनोविज्ञान है।

2. शिक्षा की प्रक्रिया में सीखने और सिखाने का एक विशेष स्थान है तथा शिक्षार्थी इस प्रक्रिया की एक बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ी है।

3. शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान विषय की व्यवहारात्मक शाखाओं में से एक है। मनोविज्ञान के सिद्धान्त, नियम एवं विधियों का प्रयोग करके यह विद्यार्थियों के अनुभवों और व्यवहार का अध्ययन करने में सहायक होता है।

4. मनोविज्ञान में जीवधारियों के जीवन की समस्त क्रियाओं से सम्बन्धित व्यवहार का अध्ययन होता है, जबकि शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षणिक पृष्ठभूमि में विद्यार्थी के व्यवहार का अध्ययन करने तक ही अपने आपको सीमित रखता है।

5. शिक्षा मनोविज्ञान “शिक्षा क्यों ?” और “शिक्षा क्या ?” जैसे प्रश्नों का उत्तर देने में अपने आपको असमर्थ पाता है। ये प्रश्न शिक्षा दर्शन द्वारा सुलझाए जाते हैं।

6. शिक्षा मनोविज्ञान विद्यार्थियों को संतोषजनक ढंग से उचित जानकारी, कौशल और तकनीकी परामर्श देने का प्रयत्न करता है।

7. शिक्षा मनोविज्ञान में अध्ययन तथा अनुसंधान करने में विज्ञानों की तरह तर्कसंगत, वस्तुगत तथा पक्षपात रहित दृष्टिकोण का प्रयोग करते हुए वैज्ञानिक विधि का सहारा लिया जाता है।

8. शिक्षा मनोविज्ञान, विज्ञान की तरह ही इस बात पर विश्वास करता है कि प्रत्येक घटना एवं व्यवहार के पीछे कोई न कोई विशेष कारण छिपे रहते हैं। इसी को आधार बनाकर शिक्षा मनोविज्ञान के व्यवहारगत कारणों को जानकर सुधार तथा उपचार के प्रयत्न किए जाते हैं।

प्रश्न 2.
संप्रेषण में मनोविज्ञान के महत्व को प्रतिपादित कीजिए।
उत्तर:
संप्रेषण में मनोविज्ञान के महत्व को निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है –

1. सूचनाओं का आदान-प्रदान:
मनोविज्ञान विषय के अन्तर्गत संप्रेषण की सहायता से व्यक्तियों के मध्य होने वाली क्रियाओं या गतिविधियों की जानकारी भी प्राप्त हो जाती है।

2. सम्पर्क का साधन:
मनोविज्ञान में संप्रेषण एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा व्यक्तियों के मध्य या व्यक्तियों के सम्पर्क स्थापित किया जा सकता है।

3. गतिशीलता का गुण:
संप्रेषण में गतिशीलता का गुण पाया जाता है। संदेशों का स्वरूप और अर्थ बदलते रहते हैं तथा संप्रेषण सन्दर्भ पर आधारित होता है।

4. कारण व प्रभाव:
मनोविज्ञान के अन्तर्गत संप्रेषण के द्वारा व्यक्तियों में होने वाली क्रियाओं के कारण तथा उन क्रियाओं का पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन भी किया जाता है।

5. बोधत्त्व का ज्ञान:
संप्रेषण में बोध का तत्व भी शामिल रहता है। प्रापक को प्राप्त सूचना से ठीक वही अर्थ निकालना चाहिए जो अर्थ प्रेषक का था। अगर ऐसा नहीं होता है तो उसे तकनीकी अर्थ में संचार या संप्रेषण नहीं कहा जाएगा। उदाहरण के लिए-यदि एक समूह में कोई व्यक्ति एक भाषा बोलता है (जैसे-संस्कृत) और दूसरा व्यक्ति इस भाषा को नहीं जानता है तो वह संस्कृत बोलने वाले व्यक्ति को ठीक ढंग से नहीं समझ सकेगा। इसलिए संचार में अर्थ का संप्रेषण तथा उसका बोध या उसे समझना दोनों ही शामिल है।

6. विषय-वस्तु:
मनोविज्ञान के संप्रेषण में व्यक्तियों द्वारा सूचनाओं, अर्थों, ज्ञान, विचार, भावों, तथ्यों तथा अनुभूतियों का स्थानांतरण होता रहता है। इसी के आधार पर मनोविज्ञान में व्यक्तियों से सम्बन्धित विषय-वस्तु की प्राप्ति होती है।

प्रश्न 3.
संगठन में किस प्रकार मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों की आवश्यकता बताइए।
उत्तर:
संगठन में मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों की आवश्यकता निम्नलिखित आधारों का विश्लेषण करने के लिए होती है –

1. कार्य-विश्लेषण:
किसी भी कर्मचारी का कार्यस्थल पर उसके कार्य का विश्लेषण के लिए मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों की आवश्यकता पड़ती है। इसकी सहायता से कर्मचारी के दृष्टिकोण को परिलक्षित कर, उसके डेटा को मात्रात्मक एवं गुणात्मक तरीकों से ज्ञात कर उसके नौकरी के चयन प्रक्रियाओं में इस्तेमाल किया जाता है।

2. कर्मचारियों की भर्ती एवं चयन:
भर्ती प्रक्रिया और व्यक्तिगत चयन की व्यवस्था को तैयार करने हेतु मनोविज्ञान संस्था के व्यवस्था को तैयार करने हेतु मनोविज्ञान संस्था के मानव साधन विशेषज्ञों के साथ मिलकर कार्य करते हैं। बड़ी विश्लेषण के आधार पर मनोवैज्ञानिकों ने यह जाना कि कुल मानसिक क्षमता ही कार्य सफलता का सबसे अच्छा भविष्य वक्ता है।

3. प्रशिक्षण तथा प्रशिक्षण शैली:
मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर कर्मचारियों के मनोभावों को प्राप्त करने का व्यवस्थित तरीका ट्रेनिंग या प्रशिक्षण कौशल होता है जिसकी मदद से दूसरे वातावरण में भी उचित तरह से कार्य किया जा सकता है। ट्रेनिंग की मदद से नौकरी में भर्ती व नए कर्मचारियों का संस्थान के सभी कार्यों को समझाने में मदद मिलती है।

4. कार्यस्थल में प्रेरणा:
किसी कार्य को कौशलता और उसे सफल बनाने की प्रेरणा या किसी कार्य को उचित तरह से निभाने के लिए मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। कार्यस्थलों में प्रेरणा बढ़ाने हेतु संगठनात्मक मनोविज्ञान का ज्ञान बहुत महत्वपूर्ण है साथ ही साथ प्रेरणा व्यवहार व प्रदर्शन को आकार देने हेतु एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रश्न 4.
एक सफल खिलाड़ी हेतु मनोविज्ञान किस प्रकार सहायक है, समझाइए।
उत्तर:
एक सफल खिलाड़ी हेतु मनोविज्ञान निम्नलिखित आधारों पर सहायक है, जो खिलाड़ी को सफल बनाने के लिए अनेक प्रकार से सहायता प्रदान करता है –

1. मानसिक प्रशिक्षण:
मनोविज्ञान खेल के मैदान में एक अच्छे खिलाड़ी को सशक्त रूप से मानसिक प्रशिक्षण प्रदान करता है, जिसमें खिलाड़ी मानसिक आधारों पर खेल के मैदान पर अपनी क्रियाओं का संचालन करते हैं।

2. उचित निर्णय लेने में सहायक:
मनोविज्ञान एक उत्तम खिलाड़ी को खेल के मैदान में खेल सम्बन्धी निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। मनोविज्ञान व्यक्ति की मानसिक स्थिति के अध्ययन में सहायक है, उसी तरह एक खिलाड़ी की मानसिक स्थिति का आकलन भी इसकी सहायता से किया जा सकता है।

3. व्यक्तित्व के विकास में सहायक:
मनोविज्ञान किसी भी व्यक्ति या खिलाड़ी के व्यक्तित्व के विकास में सहायक है। मनोविज्ञान के माध्यम से व्यक्ति की स्थिति को जानकर उसे नैतिक रूप से उच्च बनाया जा सकता है।

4. कुशल नेतृत्व का विकास:
यह विषय व्यक्ति में कुशल नेतृत्व का विकास करता है। जिससे वह क्रीड़ास्थल पर या कार्यस्थल पर एक सशक्त नेतृत्व का संचालन करता है। वह व्यक्ति या खिलाड़ी अपने सभी साथियों या सहकर्मियों का उचित मार्गदर्शन करते हुए, उन्हें सटीक दिशा-निर्देश भी देता है।

5. समस्याओं को दूर करने में सहायक:
मनोविज्ञान एक ऐसा विषय है जिसके द्वारा व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित सभी मानसिक समस्याओं को सुलझाने में सहायक सिद्ध होता है।

6. अन्य महत्व:

  • व्यक्ति को समाज में समायोजित करने में मनोविज्ञान अपनी अहं भूमिका का निर्वाह करता है।
  • व्यक्ति में आत्मविकास की वृद्धि में यह विषय काफी कारगर साबित हुआ है।
  • यह विषय व्यक्ति को उचित निर्देशन तथा परामर्श देने में भी सहायक है।
  • यह व्यक्ति के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन लाने में भी सफल हुआ है।

प्रश्न 5.
मनोविज्ञान का विभिन्न क्षेत्रों में अनुप्रयोग बताइए।
उत्तर:
सिद्धान्त एवं व्यवहार दोनों पक्षों को ध्यान में रखते हुए मनोविज्ञान के अध्ययन को विभिन्न शाखाओं या क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है, जो निम्नलिखित हैं –

1. नैदानिक मनोविज्ञान:
जब कोई व्यक्ति असामान्यता का शिकार होता है और अपने तथा अपने वातावरण से समायोजित न हो पाए तो उस अवस्था में वह मानसिक व्याधियों, रोगों तथा दुर्बलताओं से घिर जाता है। नैदानिक कुसमायोजन के कारणों एवं परिस्थितियों का उचित निदान करके उसे समायोजन में सहायता करने तथा उसके व्यवहार में उचित सुधार लाने का उत्तरदायित्व अब नैदानिक मनोविज्ञान द्वारा निभाया जाता है। इसे “उपचारात्मक मनोविज्ञान” भी कहा जाता है क्योंकि इससे असामान्य व्यवहार को सामान्य बनाने जैसा कार्य किया जाता है।

2. सामुदायिक मनोविज्ञान:
इससे आशय ऐसे मनोविज्ञान के क्षेत्र से है जो सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए मनोवैज्ञानिक नियमों, विचारों तथा तथ्यों का उपयोग करते हैं तथा इसी के साथ व्यक्ति को अपने कार्य और समूह में समायोजन करने में सहायता करते हैं।

3. परामर्श मनोविज्ञान:
व्यक्ति के साधारण सांवेगिक एवं व्यक्तिगत समस्याओं को दूर करने के प्रयास परामर्श मनोविज्ञान के तहत होता है। सामान्य व्यक्तियों को ही समायोजन क्षमता को मजबूत करने में परामर्श मनोविज्ञान एक अहम् भूमिका का निर्वाह करता है।

4. शिक्षा मनोविज्ञान:
यह एक प्रकार से सीखने तथा सिखाने का मनोविज्ञान है जो इस बात की जानकारी देता है कि पढ़ने तथा पढ़ाने व सीखने तथा सिखाने की क्रिया और परिस्थितियों आदि को किस तरह नियोजित एवं संगठित किया जाए, जिससे शिक्षण। अधिगम उद्देश्यों की सर्वोत्तम उपलब्धि सम्भव हो सके। शिक्षा मनोविज्ञान, निर्देशन तथा परामर्श प्रदान करने का कार्य भी करता है।

5. औद्योगिक मनोविज्ञान:
यह मानव व्यवहार का औद्योगिक परिस्थितियों में किया जाने वाला अध्ययन है। आपसी सम्बन्धों को ध्यान में रखकर औद्योगिक क्षमता बढ़ाना इसका उद्देश्य होता है।

6. संज्ञानात्मक मनोविज्ञान:
मनोविज्ञान की इस शाखा से जुड़े हुए मनोवैज्ञानिक व्यवहार को उद्दीपन-अनुक्रिया जैसी यंत्र चलित क्रिया नहीं मानते और न इसे आदत या अनुबन्धन के प्रतिफल के रूप में स्वीकार करते हैं बल्कि इसे पूरी तरह सोची-समझी ज्ञानात्मक संक्रिया का परिणाम मानते हैं।

7. सैन्य मनोविज्ञान:
मनोविज्ञान की इस शाखा में मनोविज्ञान के नियमों एवं सिद्धान्तों का उपयोग सैन्य जगत की गतिविधियों में वांछित परिणाम प्राप्त करने हेतु किया जाता है। सैन्य विज्ञान के विद्यार्थियों को यह एक प्रमुख विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। इसके अन्तर्गत जिन विषयों को लेकर आगे बढ़ा जाता है उनमें से कुछ प्रमुख हैं-सेना के विभिन्न अंगों में सिपाहियों का चुनाव कैसे किया जाए, अफसरों में कुशल नेतृत्व क्षमता कैसे विकसित की जाए तथा सैन्य संचालन के लिए कौन-से कदम उठाए जाएँ आदि प्रमुख हैं।

RBSE Class 12 Psychology Chapter 9 अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

RBSE Class 12 Psychology Chapter 9 बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का व्यावहारिक अनुप्रयोग करना ही ……. है –
(अ) व्यावहारिक मनोविज्ञान
(ब) सामाजिक मनोविज्ञान
(स) सामुदायिक मनोविज्ञान
(द) सैन्य मनोविज्ञान
उत्तर:
(अ) व्यावहारिक मनोविज्ञान

प्रश्न 2.
मनोचिकित्सक चिकित्सा के दौरान किन विधियों का प्रयोग करता है?
(अ) सामाजिक विधि
(ब) जैविक विधि
(स) आर्थिक विधि
(द) सांस्कृतिक विधि
उत्तर:
(ब) जैविक विधि

प्रश्न 3.
अभियांत्रिक मनोविज्ञान को कहते हैं –
(अ) जीव अभियांत्रिक
(ब) पशु अभियांत्रिक
(स) मानव अभियांत्रिक
(द) सैन्य अभियांत्रिक
उत्तर:
(स) मानव अभियांत्रिक

प्रश्न 4.
औद्योगिक मनोविज्ञान का विकसित रूप है –
(अ) सामुदायिक मनोविज्ञान
(ब) सैन्य मनोविज्ञान
(स) परामर्श मनोविज्ञान
(द) संगठनात्मक मनोविज्ञान
उत्तर:
(द) संगठनात्मक मनोविज्ञान

प्रश्न 5.
वृद्धावस्था को कितने भागों में बाँटा गया है?
(अ) तीन
(ब) चार
(स) पाँच
(द) छः
उत्तर:
(अ) तीन

प्रश्न 6.
किस वर्ष महिलाओं के लिए अमेरिकन मनोवैज्ञानिक संघ के आधार पर अलग डिवीजन बनाया गया था –
(अ) 1972
(ब) 1973
(स) 1974
(द) 1975
उत्तर:
(ब) 1973

प्रश्न 7.
कौन-सा देश है जहाँ चालान लाइसेंस का पुनर्चलन कराने में व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक परीक्षण से गुजरना अनिवार्य है?
(अ) इंग्लैण्ड
(ब) जापान
(स) स्पेन
(द) चीन
उत्तर:
(स) स्पेन

प्रश्न 8.
व्यक्तियों के मध्य विचारों एवं अनुभवों के आदान-प्रदान को कहा जाता है –
(अ) शिक्षण
(ब) विचार
(स) वाणी
(द) संचार
उत्तर:
(द) संचार

प्रश्न 9.
शारीरिक भाषा किस संचार का अंश है?
(अ) अशाब्दिक संचार
(ब) शाब्दिक संचार
(स) पार्श्विक संचार
(द) सफल संचार
उत्तर:
(अ) अशाब्दिक संचार

प्रश्न 10.
पराभाषा किस तरह का संचार है?
(अ) निजी संचार
(ब) अशाब्दिक संचार
(स) शाब्दिक संचार
(द) औपचारिक संचार
उत्तर:
(ब) अशाब्दिक संचार

प्रश्न 11.
निम्न में से किसने भाषा को सामाजिक परपराओं का संस्थान माना है –
(अ) चौमस्की
(ब) विन्च
(स) मैकडेविड एवं हरारी
(द) मैकडेविड
उत्तर:
(स) मैकडेविड एवं हरारी

प्रश्न 12.
कौन-सा संचार अशाब्दिक है?
(अ) प्रो-एक्सोमिक्स
(ब) काइनेसिक्स
(स) पराभाषा
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

RBSE Class 12 Psychology Chapter 9 लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
Psychological Institute of Defense Research नामक संस्था में मनोविज्ञान के कार्य-क्षेत्र की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारतीय सैन्य बलों में मनोविज्ञान का उपयोग करने के लिए भारत सरकार द्वारा रक्षा मंत्रालय के तहत इस संस्था का निर्माण किया गया है। इस संस्था के मनोवैज्ञानिकों का कार्य-क्षेत्र में पाँच गतिविधियाँ सम्मिलित हैं –

  1. रक्षा कर्मचारियों का अनेक स्तरों पर चयन करना।
  2. कर्मियों में विशेष कार्यक्रम द्वारा नेतृत्व गुणों को विकसित करना।
  3. कर्मियों में सुरक्षा कौशलों के विकास हेतु विशेष परीक्षण कार्यक्रमों को विकसित करना।
  4. विशेष कार्यक्रमों की मदद से सैन्य बलों में मनोबल विकसित करना।
  5. अधिक ऊँचे स्थानों में उचित व्यवहार करने सम्बन्धी सैनिकों की समस्याएँ चिन्ता और तनाव आदि कुछ विशेष समस्याओं का अध्ययन करना।

प्रश्न 2.
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार किन तीन आर्थिक प्रक्रियाओं के अध्ययन पर बल दिया जाता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार तीन प्रकार की प्रक्रियाओं के अध्ययन पर बल डाला जाता है, जो निम्नलिखित हैं –

  1. उपभोक्ताओं, उत्पादनकर्ताओं और अन्य नागरिकों के पीछे छिपे अन्य कारकों को ज्ञात करना; जैसे-विश्वास, मूल्य, पसन्द, मनोवृत्ति एवं उद्देश्य।
  2. उपभोक्ताओं, उत्पादनकर्ताओं और नागरिकों के द्वारा उनके आर्थिक व्यवहार को दूरदर्शिता निर्णय तथा सरकारी नियम आदि पर पढ़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।
  3. उपभोक्ता, नागरिकों और उत्पादनकर्ताओं के लक्ष्यों और आर्थिक आवश्यकताओं की संतुष्टि का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 3.
संप्रेषण के उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
यह (संप्रेषण) एक ऐसा माध्यम है जिसमें विचारों का स्पष्ट रूप से आदान-प्रदान होता है। संप्रेषण तभी सफल होगा जब संप्रेषकर्ता तथा प्राप्तकर्ता दोनों सहयोगात्मक प्रक्रिया में भाग लें।

संप्रेषण के उद्देश्य:

  1. समूह को संबोधित करने के कौशल का विकास करना।
  2. समूह को विषय-वस्तु से स्पष्ट या सरल ढंग से परिचित करना।
  3. संप्रेषण सामग्री या स्रोत को बोधगम्य बनाने के प्रयास करना।
  4. प्राप्तकर्ता को संप्रेषण सामग्री ग्रहण करते हेतु अभिप्रेरित करना।
  5. संयुक्त रूप से सक्रिय व्यक्तियों के मध्य सूचनाओं का आदान-प्रदान करना।

प्रश्न 4.
क्रेटी ने खेल मनोविज्ञान को कितने उपवर्गों में विभाजित किया है?
उत्तर:
खेल मनोविज्ञान में क्रेटी ने चार उपवर्ग दिए हैं, जो निम्नलिखित हैं –

  1. “अनुभावनात्मक खेल मनोविज्ञान” के अन्तर्गत उन मनोवैज्ञानिक उतार-चढ़ाव पर शोध होते हैं जो खिलाड़ी तथा उसके प्रदर्शन को प्रभावित करते हैं।
  2. “शैक्षिक खेल मनोविज्ञान” में खेल-पर्यावरण, खेल प्रदर्शन तथा खिलाड़ियों व टीमों के अंतर्वैयक्तिक प्रभावों से जुड़े प्रशिक्षकों, खिलाड़ियों व अन्य को शिक्षित किया जाता है।
  3. “क्लिनिकल खेल मनोविज्ञान” में इसका उद्देश्य मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेत्र का उपयोग कर खिलाड़ी के प्रदर्शन में सुधार लाना है एवं खिलाड़ियों को मनोवैज्ञानिक रूप से समस्याओं से बचाकर उसे बेहतर बनाना है।
  4. “विकासात्मक खेल मनोविज्ञान” में अनेक आयु वर्गों के बच्चों और युवाओं पर विभिन्न प्रतियोगिताओं में अपना असर छोड़ने वाले मनोवैज्ञानिक अस्थिरताओं से सम्बन्धित है।

प्रश्न 5.
प्रभावशाली संप्रेषण के कुछ सामान्य नियमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रभावशाली संप्रेषण के कुछ सामान्य नियम निम्नलिखित हैं –

  1. संचार का एक स्पष्ट होना चाहिए एवं उसका स्पष्ट रूप से वर्णन भी किया जाना चाहिए।
  2. संप्रेषण को प्रभावशाली बनाने के लिए एक से अधिक प्रकार के संचार का प्रयोग करना चाहिए।
  3. प्रभावशाली संचार के लिए प्रभावशाली ढंग से बोलना तथा सुनना दोनों आवश्यक होता है।
  4. संचार सामग्री का मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ तरीके से करने की आदत विकसित कीजिए।
  5. संप्रेषण करते समय यथासम्भव अपने संवेगों और मनोभावों पर नियन्त्रण बनाना सीखिए।
  6. सूचना प्राप्तिकर्ता और संचार सामग्री को ध्यान रखते हुए संप्रेषण की उपयुक्त विधि का चयन करना चाहिए।
  7. संप्रेषण की प्रक्रिया का अधिकाधिक विकास करने का प्रयास करते रहना चाहिए।

RBSE Class 12 Psychology Chapter 9 दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शिक्षा मनोविज्ञान के अधिगम सम्बन्धी कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान के विद्यार्थियों के लिए अधिगम सम्बन्धी कार्यों का वर्णन निम्नलिखित तथ्यों के द्वारा किया जा सकता है –

1. अभिप्रेरणा और अधिगम के सिद्धान्तों एवं विधियों की जानकारी विद्यार्थियों को सीखने के लिए अभिप्रेरित करना एवं उन्हें सिखाने में भली-भाँति मदद करने में सहायक बन सकती है।

2. अधिगम और प्रशिक्षण के उद्देश्यों की प्राप्ति में अपने आप से तथा अपने वातावरण से समायोजन करने में कितना लाभ है, यह जानकारी विद्यार्थियों को जीवन में सफल रहने की ओर अग्रसर कर सकती है।

3. शिक्षा मनोविज्ञान के अधिगम के द्वारा विद्यार्थियों को अपनी योग्यताओं एवं क्षमताओं को जानने तथा समझने में सहायता मिल सकती है।

4. सीखने तथा प्रशिक्षण का एक परिस्थिति से दूसरी परिस्थिति में स्थानान्तरण विद्यार्थियों के अधिगम प्रक्रिया में काफी सहयोगी सिद्ध हो सकता है।

5. अधिगम सम्बन्धी प्रक्रिया पर संसाधनों और सीखने सम्बन्धी परिस्थितियों के प्रभाव की जानकारी विद्यार्थियों को ऐसी परिस्थितियों में अधिगम ग्रहण करने को अग्रसर कर सकती है, जिनमें अधिगम के अच्छे से अच्छे परिणामों की प्राप्ति हो सके।

6. उचित व्यक्तित्व विकास के लिए सभी पक्षों का संतुलित एवं समन्वित विकास होना आवश्यक है। यह जानकारी उन्हें (विद्याथियों) सभी आयामों-शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक, नैतिक तथा सौंदर्यात्मक आदि के संतुलित विकास की ओर ध्यान दिलाकर अध्यापक तथा विद्यालय द्वारा इस ओर किए गए प्रयत्नों में सफलता हासिल करने में सहायक हो सकती है।

7. विद्यार्थियों की अधिगम प्रक्रिया को उचित दिशा प्रदान कर वांछित उद्देश्यों की पूर्ति कराने में शिक्षा मनोविज्ञान का ज्ञान काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

8. शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत वंशानुकूल तथा वातावरण के संप्रत्यय, प्रक्रिया और अधिगम पर पड़ने वाले प्रभावों की सही जानकारी विद्यार्थियों को व्यर्य के दुष्प्रचार से बचाती है।

9. स्मृति सम्बन्धी प्रक्रिया की जानकारी उन्हें ठीक प्रकार स्मरण करने, धारण शक्ति को बढ़ाने वाली उपयुक्त रूप से भण्डारण कर सकने तथा आवश्यकतानुसार स्मृति में सजोयी बातों का उपयोग कर सकने में मदद करती है।

10. मनोविज्ञान व्यवहार विज्ञान के रूप में विद्यार्थियों को दूसरों के व्यवहार को समझने, समायोजित होने तथा परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की क्षमता रखता है। शैक्षिक परिस्थितियों में विद्यार्थियों द्वारा इस दिशा में क्या किया जाना चाहिए, शिक्षा मनोविज्ञान का ज्ञान तथा कौशल उनकी इस दिशा में काफी मदद कर सकता है और परिणामस्वरूप उन्हें अधिगम में सजग रहकर ठीक प्रकार के परिणामों की प्राप्ति में अनुकूल सहायता मिल सकती है।

11. अवधान की प्रक्रिया तथा सहायक तत्वों का ज्ञान तथा व्यवधान सम्बन्धी बातों की जानकारी उन्हें सीखने की प्रक्रिया में ध्यानरत रहने में भली-भाँति सहायता कर सकती है।

प्रश्न 2.
शिक्षा मनोविज्ञान को विज्ञान मानने वाले तर्कों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान को निम्नलिखित आधारों पर विज्ञान का दर्जा दिया जाता है, जो इस प्रकार है –

1. शिक्षा मनोविज्ञान के सैद्धांतिक पक्ष में उसके पास व्यवस्थित एवं तर्कसंगत विषय-वस्तु का ऐसा भण्डार है, जिसकी उपयुक्त नियमों, सिद्धान्तों तथा सामान्यीकरणों के द्वारा उचित रूप से पुष्टि की जा सकती है।

2. विज्ञान के नियमों एवं सिद्धान्तों की तरह ही शिक्षा मनोविज्ञान के नियमों व सिद्धान्तों को पूरे विश्व में मान्यता प्राप्त है और उन्हें विज्ञान सिद्धान्तों की तरह ही शिक्षण के विभिन्न क्षेत्रों में व्यावहारिक रूप से उपयोग में लाने का प्रयत्न किया जाता है।

3. शिक्षा मनोविज्ञान, विज्ञान की तरह इस बात पर विश्वास करता है कि प्रत्येक घटना एवं व्यवहार के पीछे कोई न कोई विशेष कारण छिपे रहते हैं। इसी को आधार बनाकर शिक्षा मनोविज्ञान के व्यवहारगत कारणों को जानकर सुधार तथा उपचार के प्रयत्न किए जाते हैं।

4. जो भी नियम एवं सिद्धान्त एक बार परीक्षण, प्रयोग तथा निरीक्षण के आधार पर बना लिए जाते हैं, उनमें परिवर्तन लाने की पूरी आजादी शिक्षा मनोविज्ञान में भी वैसी ही मिलती है जैसी कि अन्य विज्ञान विषयों में है।

5. शिक्षा मनोविज्ञान में भी प्राप्त वर्तमान जानकारी के आधार पर आगे की भविष्यवाणी की जा सकती है। बालक की आगामी वृद्धि एवं विकास का मार्ग चित्र बनाया जा सकता है। जो वातावरण उसे मिल रहा है तथा जो क्षमताएँ उसके पास हैं, उसके आधार पर उसके किसी क्षेत्र विशेष में मिलने वाली सफलता का पूर्व अनुमान लगाया जा सकता है।

6. शिक्षा मनोविज्ञान में भी अध्ययन तथा अनुसंधान करने में विज्ञानों की तरह तर्कसंगत, वस्तुगत तथा पक्षपात रहित दृष्टिकोण का प्रयोग करते हुए वैज्ञानिक विधि का सहारा लिया जाता है। यहाँ वस्तुगत अवलोकन तथा प्रेक्षण पर जोर दिया जाता है।

7. उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति तथा स्वभाव विज्ञान विषयों से ही मेल खाता है, कलात्मक विषयों से नहीं।

प्रश्न 3.
स्रोत की विश्वसीनता किस प्रकार संचार को प्रभावित करती है ? संप्रेषण से सम्बन्धित तत्वों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
संदेश के स्रोत की विश्वसनीयता जितनी ही अधिक होती है, संचार का प्रभाव उतना ही अधिक पड़ता है। इस दिशा में हुए अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि संदेश स्रोत की विश्वसनीयता जितनी अधिक होती है, उतना ही संचार अधिक प्रभावशाली होता है। संप्रेषण करने वाला व्यक्ति संदेश का स्रोत है। अध्ययनों से यह पता चला है कि स्रोत की विश्वसनीयता उस व्यक्ति की प्रतिष्ठा और पद से सम्बन्धित होती है। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि जिस तरह संचार सामग्री का सम्बन्ध प्रतिष्ठित व्यक्ति से जोड़ देने पर संचार व संदेश प्रभावशाली बन जाता है, उसी तरह यदि इसी सामग्री का सम्बन्ध एक अति साधारण प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति से कर देने पर संचार व संदेश की प्रभावशीलता घट जाती है।

संप्रेषण की प्रक्रिया–संप्रेषण की प्रक्रिया द्विपक्षीय अथवा बहुपक्षीय होती है। दूसरों के विचारों तथा भावों के प्रभाव, पूर्व आदान-प्रदान के लिए प्रेषण स्रोत तथा प्राप्तकर्ता दोनों की समान एवं महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस प्रकार सूचना के आदान-प्रदान का जो रूप होता है, उससे सम्बन्धित तत्वों का विवेचन निम्न प्रकार से है –

1. संप्रेषण स्रोत:
इससे आशय उस व्यक्ति तथा समूह विशेष से होता है जो अपनी भावनाओं तथा विचारों को किसी अन्य व्यक्ति या समूह तक पहुँचाना चाहता है।

2. संप्रेषण सामग्री:
संप्रेषणकर्त्ता या स्रोत के द्वारा जिन विचारों, भावों तथा अनुभवों के रूप में अन्य व्यक्तियों को प्रेषित किया जाता है, उसे ही संप्रेषण सामग्री कहा जाता है।

3. संप्रेषण माध्यम:
अपनी भावनाओं तथा विचारों को दूसरों तक पहुँचाने के लिए दूसरों की भावनाओं और विचारों को ग्रहण कर उनके प्रति अनुक्रिया व्यक्त करने के लिए स्रोत तथा प्राप्तकर्ता द्वारा जिन माध्यमों का सहारा लिया जाता है, उन्हें संप्रेषण माध्यम कहा जाता है।

4. प्राप्तकर्ता:
स्रोत द्वारा प्रेषित संदेश, विचार तथा भावों को जिस व्यक्ति या समूह द्वारा ग्रहण किया जाता है उसे प्राप्तकर्ता कहा जाता है।

5. प्रतिपुष्टि:
प्राप्तकर्ता की अनुक्रिया को प्रतिपुष्टि कहा जाता है।

प्रश्न 4.
संचार के अवरोधकों या बाधाओं के विषय में विस्तार से बताइए।
उत्तर:
प्रेषक (Sender) तथा प्राप्तिकर्ता (Receiver) के मध्य संप्रेषण में कुछ अवरोध उत्पन्न हो जाते हैं जो संदेश को विकृत कर देते हैं, जिसके कारण प्राप्तिकर्ता प्राप्त सूचना या संदेश को समझ नहीं पाता या उसका अलग व गलत अर्थ निकाल लेता है। इन्हीं अवरोधों को संचार के बाधा या अवरोध की संज्ञा दी जाती है। संचार की ऐसी कुछ प्रमुख बाधाएँ निम्नलिखित हैं –

1. कमजोर संचार कौशल:
जब संदेश व सूचना देने वाला व्यक्ति अर्थात् प्रेषक (Sender) शाब्दिक अथवा लिखित रूप से संदेश व सूचना देने में सक्षम नहीं होता है, आवश्यक सूचना नहीं दे पाता है, तो असत्य या भ्रामक या अपर्याप्त सूचना संप्रेषित हो जाती है जिसके कारण संचार का उद्देश्य पराजित हो जाता है।

2. भाषा में अस्पष्टता:
भाषा में अस्पष्टता और जटिलता भी प्रभावी संचार की एक मुख्य बाधा है। भाषा के अस्पष्ट और जटिल होने से संचार की प्रभावशीलता में कमी आ जाती है। इसी तरह संचार में लम्बे तथा जटिल वाक्यों के उपयोग की स्थिति में भी प्राप्तिकर्ता को अर्थ समझने में दिक्कतें आती हैं जिससे संचार की प्रभावशीलता घट जाती है।

3. अस्पष्ट पूर्वकल्पना:
लगभग सभी तरह के संदेशों के पीछे कुछ असंचारित पूर्व कल्पनाएँ होती हैं जिसे कभी-कभी प्राप्तिकर्ता नहीं समझ पाते हैं। प्रायः ऐसी सूचना स्पष्ट दिखायी पड़ती हैं, परन्तु इसके असंचारित पूर्वकल्पना प्राप्तिकर्ता को उतनी स्पष्ट नहीं होती है। इससे भी संचार की प्रभावशीलता प्रभावित होती है।

4. संप्रेषक का अविश्वास:
जब संप्रेषण करने वाले व्यक्ति एवं इसको ग्रहण करने वाले व्यक्ति के मध्य अविश्वास होता है । अथवा आक्रोश की स्थिति होती है तो संदेश भी अविश्वसनीय हो जाता है।

5. अपरिपक्व मूल्यांकन:
इस तरह के मूल्यांकन से तात्पर्य उस प्रवृत्ति से होता है जिसके आधार पर संचार के आदान-प्रदान के दौरान ही, न कि इस प्रक्रिया के खत्म होने के बाद संचार का मूल्यांकन किया जाता है। ऐसे अपरिपक्व मूल्यांकन से संचार का सही अर्थ नहीं निकलता है और जो भी अर्थ निकलता है, वह अधूरा होता है। स्वभावतः संचार की प्रभावशीलता घट जाती है।

6. प्राप्तिकर्ता की अनिच्छा:
जिस व्यक्ति या व्यक्तियों के लिए कोई संदेश या सूचना प्रेषक द्वारा संचारित की जाती है, उनकी अनिच्छा भी प्रभावकारी संचार के मार्ग में एक बड़ी बाधा सिद्ध होतो है। ऐसे लोग उन सूचनाओं या संदेशों में रुचि नहीं लेते जिनसे उनको कोई लाभ मिलने की सम्भावना नहीं रहती है।

7. सूचना अतिभार:
यदि सूचना प्राप्त करने वाले व्यक्ति को एक साथ बहुत सारी सूचनाएँ दी जाती हैं, तो वह उनका संसाधन ठीक ढंग से नहीं कर पाता है। इस तरह की स्थिति को सूचना अतिभार कहा जाता है। सूचना अतिभार की स्थिति में व्यक्ति उन्हें दोहरा नहीं पाता है अथवा विशेष रूप से बल नहीं दे पाता है जिसके कारण बहुत-सी सूचनाएँ खो जाती हैं या स्मृत्ति विशेष रूप से बल नहीं दे पाता है जिसके कारण बहुत-सी सूचनाएँ खो जाती हैं या स्मृति से निकल जाती हैं। इससे संचार की प्रभावशीलता स्वत: घट जाती है।

8. ध्यानहीनता:
यदि संदेश प्राप्त करने वाला व्यक्ति संदेश पर ध्यान न दे अथवा पहले से किसी कार्य में व्यस्त हो तो संदेश की विषय-वस्तु ठीक ढंग से समझ नहीं पाएगा।