Rajasthan Board RBSE Class 10 Hindi रचना निबंध-लेखन

निबंध लेखन के लिए कुछ उपयोगी संकेत –

  1. निबन्ध-लेखन का अभ्यास सरल और वर्णन-प्रधान विषयों से प्रारम्भ करना चाहिए ।
  2. चुने गये विषय पर विभिन्न लेखकों द्वारा लिखे गये निबन्धों को ध्यान से पढ़ना चाहिए ।
  3. विषय को क्रमानुसार उपशीर्षकों में बाँट लेना और एक रूपरेखा बना लेना सदैव सुविधाजनक होता है।
  4. निबन्ध का आकार बड़ा होना आवश्यक नहीं होता । सामग्री को तर्कपूर्ण और सुगठित रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।
  5. पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों से विविध विषयों पर दी गयी सुन्दर उक्तियों और उद्धरणों को संग्रह करना चाहिए । निबन्ध लिखते समय उचित स्थलों पर उन्हें उद्धृत करना अच्छा रहता है।

यहाँ कुछ आदर्श निबन्ध दिए जा रहे हैं

प्रश्न
निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर दिए गए संकेत-बिंदुओं के आधार पर एक निबन्ध लिखिए ।

1. स्वच्छ भारत : स्वस्थ भारत
अथवा
स्वच्छ भारत अभियान

संकेत बिन्दुः

  1. स्वच्छता क्या है?
  2. स्वच्छता के प्रकार
  3. स्वच्छता के लाभ
  4. स्वच्छता: हमारा योगदान
  5. उपसंहार।

स्वच्छता क्या है?- निरंतर प्रयोग में आने पर या वातावरण के प्रभाव से वस्तु या स्थान मलिन होता रहता है। धूल, पानी, धूप, कूड़ा-करकट की पर्त को साफ करना, धोना, मैल और गंदगी को हटाना ही स्वच्छता कही जाती है। अपने शरीर, वस्त्रों, घरों, गलियों, नालियों, यहाँ तक कि अपने मोहल्लों और नगरों को स्वच्छ रखना हम सभी का दायित्व है।

स्वच्छता के प्रकार – स्वच्छता को मोटे रूप में दो प्रकार से देखा जा सकता है- व्यक्तिगत स्वच्छता और सार्वजनिक स्वच्छता । व्यक्तिगत स्वच्छता में अपने शरीर को स्नान आदि से स्वच्छ बनाना, घरों में झाडू-पोंछा लगाना, स्नानगृह तथा शौचालय को विसंक्रामक पदार्थों द्वारा स्वच्छ रखना। घर और घर के सामने से बहने वाली नालियों की सफाई, ये सभी व्यक्तिगत स्वच्छता के अंतर्गत आते हैं। सार्वजनिक स्वच्छता में मोहल्ले और नगर की स्वच्छता आती है जो प्रायः नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायतों पर निर्भर रहती है। सार्वजनिक स्वच्छता भी व्यक्तिगत सहयोग के बिना पूर्ण नहीं हो सकती।

स्वच्छता के लाभ – कहा गया है कि स्वच्छता ईश्वर को भी प्रिय है।’ ईश्वर का कृपापात्र बनने की दृष्टि से ही नहीं अपितु अपने मानव जीवन को सुखी, सुरक्षित और तनावमुक्त बनाए रखने के लिए भी स्वच्छता आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। मलिनता या गंदगी न केवल आँखों को बुरी लगती है, बल्कि इसको हमारे स्वास्थ्य से भी सीधा संबंध है। गंदगी रोगों को जन्म देती है। प्रदूषण की जननी है और हमारी असभ्यता की निशानी है। अतः व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्वच्छता बनाए रखने में योगदान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।
स्वच्छता के उपर्युक्त प्रत्यक्ष लाभों के अतिरिक्त इसके कुछ अप्रत्यक्ष और दूरगामी लाभ भी हैं। सार्वजनिक स्वच्छता से व्यक्ति और शासन दोनों लाभान्वित होते हैं। बीमारियों पर होने वाले खर्च में कमी आती है तथा स्वास्थ्य सेवाओं पर व्यय होने वाले सरकारी खर्च में भी कमी आती है। इस बचत को अन्य सेवाओं में उपयोग किया जा सकता है।

स्वच्छता : हमारा योगदान- स्वच्छता केवल प्रशासनिक उपायों के बलबूते नहीं चल सकती। इसमें प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी परम आवश्यक होती है। हम अनेक प्रकार से स्वच्छता से योगदान कर सकते हैं, जो निम्नलिखित हो सकते हैं

घर का कूड़ा-करकट गली या सड़क पर न फेंकें। उसे सफाईकर्मी के आने पर उसकी ठेल या वाहन में ही डालें। कूड़े-कचरे को नालियों में न बहाएँ। इससे नालियाँ अवरुद्ध हो जाती हैं। गंदा पानी सड़कों पर बहने लगता है।
पालीथिन का बिल्कुल प्रयोग न करें। यह गंदगी बढ़ाने वाली वस्तुः तो है ही, पशुओं के लिए भी बहुत घातक है। घरों के शौचालयों की गंदगी नालियों में न बहाएँ। खुले में शौच न करें तथा बच्चों को नालियों या गलियों में शौच न कराएँ। नगर पालिका के सफाईकर्मियों का सहयोग करें।

उपसंहार- प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान चलाया है। इसका प्रचार-प्रसार मीडिया के माध्यम से निरंतर किया जा रहा है। अनेक जन प्रतिनिधि, अधिकारी-कर्मचारी, सेलेब्रिटीज (प्रसिद्ध लोग) इसमें भाग ले रहे हैं। जनता को इसमें अपने स्तर से पूरा सहयोग देना चाहिए। इसके साथ गाँवों में खुले में शौच करने की प्रथा को समाप्त करने के लिए लोगों को घरों में शौचालय बनवाने के प्रेरित किया जा रहा है। उसके लिए आर्थिक सहायता भी प्रदान की जा रही है। इन अभियानों में समाज के प्रत्येक वर्ग को पूरा सहयोग करना चाहिए।

2. डिजिटल इंडिया
अथवा
भारत : डिजिटलीकरण की ओर

परिचय – ‘डिजिटल इंडिया’ भारतीय समाज को अंतर्राष्ट्रीय रीति-नीतियों से कदम मिलाकर चलने की प्रेरणा देने वाला एक प्रशंसनीय और साहसिक प्रयास है। यह भारत सरकार की एक नई पहल है। भारत के भावी स्वरूप को ध्यान में रखकर की गई एक दूरदर्शितापूर्ण संकल्पना है।

उद्देश्य – इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य भारत को डिजिटल दृष्टि से सशक्त समाज और ज्ञानाधारित अर्थव्यवस्था में बदलना है। इस संकल्प के अंतर्गत भारतीय प्रतिभा को सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़कर कल के भारत की रचना करना है। इस दृष्टि से ‘डिजिटल इंडिया’ के तीन प्रमुख लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं

  1. हर नागरिक के लिए एक उपयोगी डिजिटल ढाँचा तैयार करना।
  2. जनता की माँग पर आधारित डिजिटल सेवाओं को संचालन तथा उन्हें लोगों को उपलब्ध कराना।
  3. लोगों को डिजिटल उपकरणों के प्रयोग में दक्षता प्रदान करना।

डिजिटल होने का अर्थ – आम आदमी के लिए डिजिटल बनने का आशय है कि नकद लेन-देन से बचकर आनलाइन (मोबाइल, पेटीएम, डेविट कार्ड आदि) लेन-देन का प्रयोग करना, कागजी काम को कम से कम किया जाना। सरकारी तथा बैंकिंग कार्यों में और व्यापारिक गतिविधियों में पारदर्शिता आना। ठगी और रिश्वत से बचाव होना आदि हैं।

डिजिटल अभियान के लाभ – यह अभियान समाज के सभी वर्गों को लाभ पहुँचाने वाला है

  • यह व्यवस्था गृहणियों को पारवारिक आय-व्यय, खरीददारी, मासिक और वार्षिक प्रबंधन आदि में सहायक हैं।
  • छात्रों के लिए उपयुक्त विद्यालय के चयन, अध्ययन सामग्री की सहज उपलब्धता, छात्रवृत्ति आदि के लिए आन लाइन प्रार्थना-पत्र भेजने में, पुस्तकों के बोझ को कम करने में सहायक होगा।
  • बेरोजगार नौजवान उपयुक्त नौकरियों की तलाश सरलता से कर पाएँगे तथा डिजिटल प्रार्थना-पत्रों के प्रयोग से पारदर्शी चयन प्रणाली का लाभ उठाएँगे। अनलाइन प्रमाण-पत्र जमा कर सकेंगे।
  • व्यापारी और उद्योगी भी इससे लाभान्वित होंगे, नकद लेन-देन के झंझट से बचाव होगा। ग्राहक संतुष्ट रहग। सरकारी कामों, आयकर, ट्रांसपोर्ट तथा व्यापार के विस्तार में पारदर्शिता आएगी।
  • अभिलेखों की सुरक्षा, ई-हस्ताक्षर, मोबाइल बैंकिंग, सरकारी कामों में दलालों से मुक्ति, जमीन-जायदाद के क्रय-विक्रय में पारदर्शिता, ई-पंजीकरण आदि ‘डिजिटल इंडिया’ के अनेक लाभ हैं।

चुनौतियाँ – डिजिटल प्रणाली को लागू करने के अभियान में अनेक चुनौतियाँ भी हैं। सबसे प्रमुख चुनौती है- जनता को इसके प्रति आश्वस्त करके इसमें भागीदार बनाना। नगरवासियों को भले ही डिजिटल उपकरणों का प्रयोग आसान लगता हो, लेकिन करोड़ों ग्रामवासियों, अशिक्षितों को इसके प्रयोग में सक्षम बनाना एक लम्बी और धैर्यशाली प्रक्रिया है। इसके अतिरिक्त कर चोरी के प्रेमियों को यह प्रणाली रास नहीं आएगी। इलेक्ट्रानिक सुरक्षा के प्रति लोगों में भरोसा जमाना होगा। साइबर अपराधों, हैकिंग और ठगों से जनता को सुरक्षा प्रदान करनी होगी।

आगे बढ़ें – चुनौतियाँ, शंकाएँ और बाधाएँ तो हर नए और हितकारी काम में आती रही हैं। शासकीय ईमानदारी और जन-सहयोग से, इस प्रणाली को स्वीकार्य और सफल बनाना, देशहित की दृष्टि से बड़ा आवश्यक है। आशा है, हम सफल होंगे।

3. खुला शौच-मुक्त गाँव

संकेत बिन्दु

  1. खुला शौच मुक्त से आशय
  2. सरकारी प्रयास
  3. जन-जागरण
  4. हमारा योगदान
  5. महत्व/उपसंहार

खुला शौच मुक्त से आशय – ‘खुला शौच मुक्त’ को सरल भाषा में कहें तो ‘खुले में शौच क्रिया से मुक्त होना इसका आशय है। ऐसा गाँव जहाँ लोग बाहर खेतों या जंगलों में शौच के लिए न जाते हों, घरों में ही शौचालय हों, ‘खुला शौच मुक्त गाँव कहा जाता है। गाँवों में खुले में शौच के लिए जाने की प्रथा शताब्दियों पुरानी है। जनसंख्या सीमित होने तथा सामाजिक मर्यादाओं का सम्मान किए जाने के कारण इस परंपरा से कई लाभ जुड़े हुए थे। गाँव से दूर शौच क्रिया किए जाने से ‘मैला ढोने के काम से मुक्ति तथा स्वच्छता दोनों का साधन होता था। मल स्वतः विकरित होकर खेतों में खाद का काम स्थितियों में खुले में शौच, रोगों को खुला आमंत्रण बन गया है। साथ ही इससे उत्पन्न महिलाओं की असुरक्षा ने इसे विकट समस्या बना दिया है। अतः इस परंपरा का यथाशीघ्र समाधान, स्वच्छता, स्वास्थ्य और महिला सुरक्षा की दृष्टि से परम आवश्यक हो गया है।

सरकारी प्रयास – कुछ वर्ष पहले तक इस दिशा में सरकारी प्रयास शून्य के बराबर ही थे। गाँवों में कुछ सम्पन्न और सुरुचि युक्त परिवारों में ही घरों में शौचालय का प्रबन्ध होता था। वह भी केवल महिला सदस्यों के लिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब ग्रामीण महिलाओं और विशेषकर किशोरियों के साथ होने वाली लज्जाजनक घटनाओं पर ध्यान दिया तो स्वच्छता अभियान के साथ ‘खुला शौच मुक्त गाँव अभियान’ को भी जोड़ दिया। इस दिशा में सरकारी प्रयास निरंतर चल रहे हैं।
घरों में शौचालय बनाने वालों को सरकार की ओर से आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। समाचार पत्रों तथा टी. वी. विज्ञापनों में प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से घरों में शौचालय बनाने की प्रेरणा दी जा रही है।

जन जागरण – किसी प्राचीन कुप्रथा से मुक्त होने में भारतीय ग्रामीण समुदाय को बहुत हिचक होती है। उन पर सरकारी प्रयास की अपेक्षा, अपने बीच के प्रभावशाली व्यक्तियों, धार्मचार्यों तथा मनोवैज्ञानिक प्रेरणाओं का प्रभाव अधिक पड़ता है। अतः ‘खुले में शौच’ की समाप्ति के लिए जन जागरण परम आवश्यक है। इसके लिए कुछ स्वयंसेवी संस्थाएँ भी प्रयास कर रही हैं। इसके साथ ही धार्मिक आयोजन में प्रवक्ताओं द्वारा इस प्रथा के परिणाम की प्रेरणा दी जानी चाहिए। शिक्षक, छात्र-छात्राओं के द्वारा प्रदर्शन का सहारा लेना चाहिए। गाँव के शिक्षित युवाओं को इस प्रयास में हाथ बँटाना चाहिए। ऐसे जन जागरण के प्रयास मीडिया द्वारा तथा गाँव के सक्रिय किशोरों और युवाओं द्वारा किए भी जा रहे हैं। खुले में शौच करते व्यक्ति को देखकर सीटी बजाना ऐसा ही रोचक प्रयास है।

हमारा योगदान – ‘हमारा’ में छात्र-छात्रों, शिक्षक, राजनेता, व्यवसायी, जागरूक नागरिक आदि सभी लोग सम्मिलित हैं। सभी के सामूहिक प्रयास से बुराई को समाप्त किया जा सकता है। ग्रामीण जनता को खुले में शौच से होने वाली हानियों के बारे में समझाना चाहिए। उन्हें बताया जाना चाहिए कि इससे रोग फैलते हैं और धन तथा समय की बरबादी होती है। साथ ही यह एक अशोभनीय आदत है। यह महिलाओं के लिए अनेक समस्याएँ और संकट खड़े कर देता है। घरों में छात्र-छात्राएँ अपने माता-पिता आदि को इससे छुटकारा पाने के लिए प्रेरित करें।

उपसंहार – खुले में शौच मुक्त गाँवों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। सरकारी प्रयासों के अतिरिक्त ग्राम प्रधानों तथा स्थानीय प्रबुद्ध और प्रभावशाली लोगों को आगे आकर इस अभियान में रुचि लेनी चाहिए। इससे न केवल ग्रामीण भारत को रोगों, बीमारियों पर होने वाले व्यय से मुक्ति मिलेगी बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि भी सुधेरगी।

4. मेक इन इंडिया
अथवा
भारत में औद्योगिक क्रांति

संकेत बिन्दु

  1. भूमिका,
  2. सम्पन्नता क्यों ?
  3. धनोपार्जन और उद्योग,
  4. मेक इन इंडिया,
  5. विदेशी पूँजी की जरूरत,
  6. पूँजी के साथ तकनीक का आगमन,
  7. उपसंहार।

भूमिका – वस्तुओं पर ”मेड इन इंडिया” की छाप देख हमारा मन गर्व से भर जाता है। यह देश में स्वदेशी उद्योगों के निरंतर विकास का सूचक तो होता ही है साथ ही हर भारतीय को आत्मविश्वास से भरने वाला भी होता है। किन्तु हमारे प्रधानमंत्री जी ने इसके साथ-साथ ‘मेक इन इंडिया’ नारा भी दिया है, जिसका आशय है विदेशी निवेशकों को भारत में उद्योग स्थापित करने के लिए आमंत्रण देना। औद्योगिक प्रगति और संपन्नता की दृष्टि से यह एक नई सोच है।

सम्पन्नता क्यों – प्रश्न उठता है कि मनुष्य सम्पन्न होना क्यों चाहता है ? हमारे जीवन में अनेक आवश्यकताएँ होती हैं। उनकी पूर्ति के लिए साधन चाहिए। ये साधन हमको सम्पन्न होने पर ही प्राप्त होंगे। आवश्यकता की पूर्ति न होने पर हम सुख से नहीं रह सकते। अत: धन कमाना और सम्पन्न होना आवश्यक है।

धनोपार्जन और उद्योग – धन कमाने के लिए कुछ करना होगा, कुछ पैदा भी करना होगा। कृषि और उद्योग उत्पादन के माध्यम हैं। व्यापार भी इसका एक साधन है। हमें कुछ पैदा करें, कुछ वस्तुओं का उत्पादन करें यह जरूरी है। देश को आगे बढ़ाने और समृद्धिशाली बनाने के लिए हमें अपनी आवश्यकता की ही नहीं, दूसरों की आवश्यकता की वस्तुएँ भी बनानी होंगी।

मेक इन इंडिया – आजकल छोटे-छोटे देश अपने यहाँ उत्पादित वस्तुओं को विदेशों में निर्यात करके अपनी समृद्धि को बढ़ा रहे हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में नष्ट हुआ जापान स्वदेशी के बल पर ही अपने पैरों पर खड़ा हो सका है। भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ का नारा दिया है। इसका उद्देश्य विदेशी पूँजी को भारत में आकर्षित करना तथा उससे यहाँ उद्योगों की स्थापना करना है। इन उद्योगों में बनी वस्तुएँ भारत में निर्मित होंगी। उनको विश्व के अन्य देशों के बाजारों में बेचा जायेगा। इससे धन का प्रवाह भारत की ओर बढ़ेगा और वह एक समृद्ध राष्ट्र बन सकेगा।

विदेशी पूँजी की जरूरत – उद्योगों की स्थापना तथा उत्पादन करने और उसकी वृद्धि करने के लिए पूँजी की आवश्यकता होगी ही। अभी भारत के पास इतनी पूँजी नहीं हैं कि वह अपने साधनों से बड़े-बड़े उद्योग स्थापित कर सके तथा उन्हें संचालित कर सके। हमारे प्रधानमंत्री चाहते हैं कि विदेशों में रहने वाले सम्पन्न भारतीय तथा अन्य उद्योगपति भारत आयें और, यहाँ पर अपनी पूँजी से उद्योग लगायें। उत्पादित माल के लिए उनको भारतीय बाजार तो प्राप्त होगा ही, वे विदेशी बाजारों में भी अपना उत्पादन बेचकर मुनाफा कमी सकेंगे। उससे भारत के साथ ही उनको भी लाभ होगा।

पूँजी के साथ तकनीक का आगमन – प्रधानमंत्री जानते हैं कि भारत को पूँजी ही नहीं नवीन तकनीक की भी । आवश्यकता है। वह विदेशी उद्योगपतियों को भारत में उत्पादन के लिए आमंत्रित करके पूँजी के साथ नवीन तकनीक की। प्राप्ति के द्वार भी खोलना चाहते हैं । यह सोच उनकी दूरदृष्टि को प्रकट करने वाली है। बच्चा चलना सीखता है, तो उसको किसी की उँगली पकड़ने की आवश्यकता होती है। फिर तो वह सरपट दौड़ने लगता है। भारत भी कुशल उद्योगपतियों के अनुभव का लाभ उठाकर एक शक्तिशाली औद्योगिक देश बन सकता है।

उपसंहार – ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता के लिए हमें अनेक प्रबंध करने और कदम उठाने होंगे। देश में ऐसा औद्योगिक वातावरण बनाना होगा जिससे विदेशी निवेशक यहाँ अपने उद्योग लगाने को प्रेरित हों । सड़क, बिजली, परिवहन के क्षेत्र में सुधार करने होंगे। उद्योग-स्थापना में कानूनी जटिलताएँ दूर हो और विभागीय अनुभूतियाँ सरलता तथा शीघ्रता से प्राप्त हों, ऐसा प्रबन्ध करना होगा। भारत सरकार इस दिशा में निरंतर समुचित कदम उठा रही है।

5. बाल श्रम से जूझता बचपन
अथवा
बाल श्रमिक और शोषण

संकेत बिंदु

  1. बाल श्रमिक कौन
  2. बाल श्रमिक की दिनचर्या
  3. गृहस्वामियों व उद्यमियों द्वारा शोषण
  4. सुधार हेतु सामाजिक एवं कानूनी प्रयास ।

बाल श्रमिक कौन -14 वर्ष से कम आयु के मजदूरी या उद्योगों में काम करने वाले बालक आते हैं । खेलने-कूदने और पढ़ने की उम्र में मेहनत-मजदूरी की चक्की में पिसता देश का बचपन समाज की सोच पर एक कलंक है । ढाबों, कारखानों और घरों में अत्यन्त दयनीय स्थितियों में काम करने वाले ये बाल-श्रमिक देश की तथाकथित प्रगति के गाल पर एक तमाचा हैं। इनकी संख्या लाखों में है ।

बाल श्रमिक की दिनचर्या – इन बाल श्रमिकों की दिनचर्या पूरी तरह इनके मालिकों या नियोजकों पर निर्भर होती है । गर्मी हो, वर्षा यी शीत इनको सबेरे जल्दी उठकर काम पर जाना होता है । इनको भोजन साथ ले जाना पड़ता है। या फिर मालिकों की दया पर निर्भर रहना पड़ता है। इनके काम के घंटे नियत नहीं होते । बारह से चौदह घण्टे तक भी काम करना पड़ता है। कुछ तो चौबीस घण्टे के बँधुआ मजदूर होते हैं। बीमारी या किसी अन्य कारण से अनुपस्थित होने पर इनसे कठोर व्यवहार यहाँ तक कि निर्मम पिटाई भी होती है ।

गृहस्वामियों व उद्यमियों द्वारा शोषण – घरों में या कारखानों में काम करने वाले इन बालकों का तरह-तरह से शोषण होता है । इनको बहुत कम वेतन दिया जाता है । काम के घण्टे नियत नहीं होते । बीमार होने या अन्य कारण से अनुपस्थित होने पर वेतन काट लिया जाता है । इनकी कार्य-स्थल पर बडी दयनीय दशा होती है । सोने और खाने की कोई व्यवस्था नहीं होती है । नंगी भूमि पर खुले आसमान या कहीं कौने में सोने को मजबूर होते हैं । रूखा-सूखा या झूठन खाने को दी जाती है । बात-बात पर डाँट-फटकार, पिटाई, काम से निकाल देना तो रोज की कहानी है । यदि दुर्भाग्य से कोई नुकसान हो गया तो पिटाई या वेतन काट लेना आदि साधारण बातें हैं । वयस्क मजदूरों की तो यूनियनें हैं। जिनके द्वारा वह अन्याय और अत्याचार का विरोध कर पाते हैं किन्तु इन बेचारों की सुनने वाला कोई नहीं । केवल इतना ही नहीं मालिकों और दलालों द्वारा इनका शारीरिक शोषण भी होता है ।

सुधार हेतु सामाजिक एवं कानूनी प्रयास – बाल श्रमिकों की समस्या बहुत पुरानी है । इसके पीछे गरीबी के साथ ही माँ-बाप का लोभ और पारिवारिक परिस्थिति कारण होती है । इस समस्या से निपटने के लिए सामाजिक और शासन के स्तर पर प्रयास आवश्यक हैं । सामाजिक स्तर पर माँ-बाप को. बालकों को शिक्षित बनाने के लिए समझाया जाना आवश्यक है । इस दिशा में स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है । सरकारी स्तर पर बाल श्रम रोकने को कठोर कानून बनाए गए हैं। लेकिन उनका परिपालन भी सही ढंग से होना आवश्यक है । विद्यालयों में पोषाहार एवं छात्रवृत्ति आदि की सुविधाएँ दिया जाना, बाल श्रमिकों के माता-पिता की आर्थिक स्थिति में सुधार किया जाना आदि प्रयासों से यह समस्या समाप्त हो सकती है ।

6. बेटी बचाओ : बेटी पढ़ाओ
अथवा
कन्या भ्रूण हत्या : महापाप

संकेत बिन्दु:

  • घोर पाप
  • कन्या भ्रूण हत्या के कारण
  • कन्या भ्रूण हत्या के दुष्परिणाम
  • कन्या-भ्रूण हत्या रोकने के उपाय ।

घोर पाप – हमारी भारतीय संस्कृति में कन्या को देवी का स्वरूप माना जाता है । नवरात्रि और देवी जागरण के समय कन्या-पूजन की परम्परा से सभी परिचित हैं। हमारे धर्मग्रन्थ भी नारी की महिमा का गुणगान करते हैं । आज उसी भारत में कन्या को माँ के गर्भ में ही समाप्त कर देने की लज्जाजनक परम्परा चल रही है। इस घोर पाप ने सभ्य जगत के सामने हमारे मस्तक को झुका दिया है।

कन्या-भ्रूण हत्या के कारण – कन्या-भ्रूण को समाप्त करा देने के पीछे अनेक कारण हैं । कुछ राजवंशों और सामन्त परिवारों में विवाह के समय वर-पक्ष के सामने न झुकने के झूठे अहंकार ने कन्याओं की बलि ली । पुत्री की महत्व दिया जाना, धन लोलुपता, दहेज प्रथा तथा कन्या के लालन-पालन और सुरक्षा में आ रही समस्याओं ने भी इस निन्दनीय कार्य को बढ़ावा दिया है । दहेज लोभियों ने भी इस समस्या को विकट बना दिया है । झूठी शान के प्रदर्शन के कारण कन्या का विवाह सामान्य परिवारों के लिए बोझ बन गया है ।।

कन्या-भ्रूण हत्या के दुष्परिणाम – चिकित्सा विज्ञान को प्रगति के कारण आज गर्भ में ही संतान के लिंग का पता लगाना सम्भव हो गया है । अल्ट्रासाउण्ड मशीन से पता लग जाता है कि गर्भ में लड़की है या लडका । यदि गर्भ में लड़की है, तो कुबुद्धि-लोग उसे डॉक्टरों की सहायता से नष्ट करा देते हैं । इस निन्दनीय आचरण के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। देश के अनेक राज्यों में लड़कियों और लड़कों के अनुपात में चिन्ताजनक गिरावट आ गई है । लड़कियों की कमी हो जाने से अनेक युवक कुँवारे घूम रहे हैं । अगर सभी लोग पुत्र ही पुत्र चाहेंगे तो पुत्रियाँ कहाँ से आएँगी । विवाह कहाँ से होंगे ? वंश कैसे चलेंगे ? इस महापाप में नारियों का भी सहमत होना बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है ।

कन्या-भ्रूण हत्या रोकने के उपाय – कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए जनता और सरकार ने लिंग परीक्षण को अपराध घोषित करके कठोर दण्ड का प्रावधान किया है फिर भी चोरी छिपे यह काम चल रहा है। इसमें डॉक्टरों तथा परिवारीजन दोनों का सहयोग रहता है । इस समस्या का हल तभी सम्भव है जब लोगों में लड़कियों के लिए हीन भावना समाप्त हो । पुत्र और पुत्री में कोई भेद नहीं किया जाये ।

कन्या भ्रूण हत्या भारतीय समाज के मस्तक पर कलंक है । इस महापाप में किसी भी प्रकार का सहयोग करने वालों को समाज से बाहर कर दिया जाना चाहिए और कठोर कानून बनाकर दण्डित किया जाना। कर दण्डित किया जाना चाहिए । कन्या-भ्रूण हत्या मानवता के विरुद्ध अपराध है ।

बेटी बचाओ – बेटियाँ देश की सम्पत्ति हैं। उनको बचाना सभी भारतवासियों का कर्तव्य है। वे बेटों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। परिवार तथा देश के उत्थान में उनका योगदान बेटों से भी अधिक है। उसके लिए उनकी सुरक्षा के साथ ही उनको सुशिक्षित बनाना भी जरूरी है। हमारे प्रधानमंत्री ने यह सोचकर ही ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का नारा दिया है।

7. राष्ट्रीय एकता की सुरक्षा- हमारा कर्तव्य

संकेत बिंदु:

  1. राष्ट्रीय एकता का अभिप्राय
  2. राष्ट्रीय एकता-अखण्डता की आवश्यकता
  3. राष्ट्रीय
  4. एकता, अखण्डता की सांस्कृतिक विरासत
  5. राष्ट्रीय एकता का वर्तमान स्वरूप
  6. राष्ट्रीय एकता और हमारा कर्तव्य
  7. उपसंहार।

राष्ट्रीय एकता का अभिप्राय – राष्ट्रीय एकता का अर्थ है- हमारी एक राष्ट्र के रूप में पहचान । हम सर्वप्रथम भारतीय हैं इसके बाद हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, सिख आदि हैं। अनेक विविधताओं और भिन्नताओं के रहते हुए भी आन्तरिक एकता की भावना, देश के सभी धर्मों, परम्पराओं, आचार-विचारों, भाषाओं और उपसंस्कृतियों का आदर करना, भारतभूमि और सभी भारतवासियों से हार्दिक लगाव बनाए रखना, यही राष्ट्रीय एकता का स्वरूप है। भारत एक विशाल-विस्तृत सागर के समान हैं । जिस प्रकार अनेक नदियाँ बहकर सागर में जा मिलती हैं और उनकी पृथकता मिट जाती है, उसी प्रकार विविध वर्णा, धर्मा, जातियों, विचारधाराओं के लोग भारतीयता की भावना से बँधकर एक हो जाते हैं । जिस प्रकार अनेक पेड़-पौधे मिलकर एक वन प्रदेश का निर्माण करते हैं, उसी प्रकार विविध मतावलम्बियों की का निर्माण हुआ है ।

राष्ट्रीय एकता – अखण्डता आवश्यकता – भारत विविधताओं का देश है । यह एक संघ-राज्य है । अनेक राज्यों या प्रदेशों का एकात्म स्वरूप है । यहाँ हरे राज्य में भिन्न-भिन्न रूप, रंग, आचार, विचार, भाषा और धर्म के लोग निवास करते हैं। इन प्रदेशों की स्थानीय संस्कृतियाँ और परम्पराएँ हैं । इन सभी से मिलकर हमारी राष्ट्रीय या भारतीय संस्कृति का विकास हुआ है । हम सब भारतीय हैं, यही भावना सारी विभिन्नताओं को बाँधने वाला सूत्र है । यही हमारी राष्ट्रीय एकता का अर्थ और आधार है । विविधता में एकता भारत राष्ट्र की प्रमुख विशेषता है। उसमें अनेक धर्मों और सांस्कृतिक विचारधाराओं का समन्वय है । भारतीयता के सूत्र में बँधकर ही हम दृढ़ एकता प्राप्त कर सकते हैं। राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के बिना भारत का भविष्य अंधकारमय है ।

राष्ट्रीय एकता – अखण्डता सांस्कृतिक विरासत- राष्ट्रीय एकता और अखण्डता भारतीय संस्कृति की देन है। भारत विभिन्न धर्मों, विचारों और मतों को मानने वालों का निवास रहा है। भारतीय संस्कृति इन विभिन्नताओं का समन्वित स्वरूप है। भारत की भौगोलिक स्थिति ने भी इसे सामाजिक संस्कृति के निर्माण में योगदान किया है। विभिन्न आघात सहकर भी भारतीय एकता सुरक्षित रही है, इसका कारण उसका भारत की सामाजिक संस्कृति से जन्म होना ही है।

राष्ट्रीय एकता का वर्तमान स्वरूप – आज हमारी राष्ट्रीय एकता संकट में है। यह संकट बाहरी नहीं आंतरिक है । हमारे राजनेता और शासकों ने अपने भ्रष्ट आचरण से देश की एकता को संकट में डाल दिया है। अपने वोट बैंक को बनाए रखने के प्रयास में इन्होंने भारतीय समाज को जाति-धर्म, आरक्षित-अनारक्षित, अगड़े-पिछड़े, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक और प्रादेशिक कट्टरता के आधार पर बाँट दिया है। इन बड़बोले, कायर और स्वार्थी लोगों ने राष्ट्रीय एकता को संकट में डाल दिया है।

राष्ट्रीय एकता और हमारा कर्तव्य – राष्ट्रीय एकता पर हो रहे इन प्रहारों ने राष्ट्र के रूप में भारत के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। इस संकट का समाधान किसी कानून के पास नहीं है । आज हर राष्ट्रप्रेमी नागरिक को भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़ा होना है । आपसी सद्भाव और सम्मान के साथ प्रेमभाव को बढ़ावा देना है। समाज के नेतृत्व व संगठन का दायित्व राजनेताओं से छीनकर नि:स्वार्थ समाजसेवियों के हाथों में सौंपना है । इस महान कार्य में समाज का हर एक वर्ग अपनी भूमिका निभा सकता है । राष्ट्रीय एकता को बचाए रखना हमारा परम कर्तव्य है।

उपसंहार – भारत विश्व का एक महत्वपूर्ण जनतंत्र है। लम्बी पराधीनता के बाद वह विकास के पथ पर अग्रसर है। भारत की प्रगति के लिए उसकी एकता-अखण्डता का बना रहना आवश्यक है, प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है कि भारत की अखण्डता को सुनिश्चित करे ।

8. भारत के उन्नति की ओर बढ़ते कदम
अथवा
भारत का उज्ज्वल भविष्य

संकेत बिंदु

  1. उज्ज्वल भविष्य के संकेत
  2. प्रगति के आधार
  3. विविध क्षेत्रों में प्रगति
  4. बाधाएँ और निराकरण
  5. भारतीयों की भूमिका ।

उज्ज्वल भविष्य के संकेत – इक्कीसवीं सदी भारत की होगी । भारत विश्व की महाशक्ति बनेगा । ऐसी घोषणाएँ भारत के राजनेताओं, अर्थशास्त्रियों और वैज्ञानिकों ने की है। अनेक विदेशी विद्वानों ने भी भारत के उज्ज्वल भविष्य की भविष्यवाणियाँ की हैं। क्या यह सपना सच होगा ? क्या वास्तव में हम महाशक्ति, विकसित राष्ट्र बनने के मार्ग पर बढ़ रहे हैं ? इन प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक है।

प्रगति के आधार – भारत की चहुंमुखी उन्नति के इन दावों और भविष्यवाणियों के पीछे कुछ ठोस आधार दिखायी देते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने सभी क्षेत्रों में अपनी योग्यता का लोहा मनवाया है। हमने अपने आपको विश्व का सबसे बड़ा और स्थिर लोकतंत्र साबित किया है । हमारी अर्थव्यवस्था निरन्तर प्रगति कर रही है। पिछली विश्वव्यापी मंदी को हमने अपनी सूझ-बूझ से परास्त किया है। हमारी अनेक कम्पनियों ने विदेशी कम्पनियों का अधिग्रहण करके भारत की औद्योगिक कुशलता का प्रमाण दिया है। हमारे शिक्षक, वैज्ञानिक और उद्योगपति विदेशों में भी अपनी प्रतिभा का डंका बजा रहे हैं । विज्ञान, चिकित्सा, व्यवसाय, कला, सैन्य-शक्ति, शिक्षा और संस्कृति, हर क्षेत्र में हमने नए-नए कीर्तिमान स्थापित किये हैं। ये सभी बातें भारत के उज्ज्वल भविष्य में हमारा विश्वास दृढ़ करती हैं ।

विविध क्षेत्रों में प्रगति – इसमें संदेह नहीं कि भारत ने विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। हमारे वैज्ञानिकों ने अनेक मौलिक खोजें की हैं । अंतरिक्ष विज्ञान, चिकित्सा, अस्त्र-शस्त्रों का विकास, औद्योगिक कुशलता, दूर-संचार, परमाणु-शक्ति आदि क्षेत्रों में हमारी प्रगति उल्लेखनीय है । आर्थिक क्षेत्र में हमारी प्रगति का प्रमाण हमारी अर्थव्यवस्था की स्थिरता और निरंतर विकास से मिलता है । जब विश्वव्यापी मंदी से संसार की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ ढह रहीं थीं तब भारतीय अर्थव्यवस्था ने इससे अप्रभावित रहकर अपनी विश्वसनीयता प्रमाणित की । विदेशी निवेश का बढ़ना और विदेशी कम्पनियों का अधिग्रहण भी हमारी अर्थव्यवस्था की सफलता का प्रमाण देता है । इसके अतिरिक्त शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में भी हमने उल्लेखनीय प्रगति की है।

बाधाएँ और निराकरण – भारत की प्रगति-यात्रा के मार्ग में अनेक बाधाएँ भी हैं। ढाँचागत सुविधाओं का अभाव, गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, राजनीतिक़ अपराधीकरण, वोट की राजनीति, महिलाओं की उपेक्षा, आतंकवाद और नक्सलवाद आदि बाधाओं पर विजय पाए बिना हमारे सारे सपने अधूरे रह जायेंगे । चरित्र की दृढ़ता, पारदर्शिता और दृढ़ प्रशासन, जनता और सरकार का तालमेल आदि ऐसे उपाय हैं जिनसे हम इन बाधाओं को दूर कर सकते हैं ।

भारतीयों की भूमिका – भारत के भविष्य को उज्ज्वल बनाने में जनता की भी अनिवार्य भूमिका है। जाति, संप्रदाय, निजी स्वार्थ आदि को ठुकराकर आपसी सद्भाव स्थापित करना हर नागरिक का कर्तव्य है । सभी भारतीय जन संगठित होकर बुराइयों का विनाश करें और राष्ट्र की उन्नति में सहयोग करें तभी भारत विश्व की महाशक्ति बनेगा ।

9. मुझे गर्व – मेरे भारत पर
अथवा
स्वर्णिम भारतं

संकेत बिंदु –

  1. जन्मभूमि से स्वाभाविक प्रेम
  2. नामकरण और भौगोलिक स्थिति
  3. इतिहास और संस्कृति
  4. प्राकृतिक वैभव
  5. वर्तमान स्थिति
  6. हमारा कर्तव्य ।

जन्मभूमि से स्वाभाविक प्रेम –

“अरुण यह मधुमय देश हमारा ।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।”

‘स्वर्णिम देश है मेरा भारत । मुझे इससे गहरा प्रेम है।” हर प्राणी को अपनी जन्मभूमि से स्वाभाविक प्रेम होता है । स्वदेश के अन्न, जल और वायु से ही मनुष्य को जीवन मिलता है । उसका इतिहास और परम्पराएँ उसके सिर को गर्व से ऊँचा करती हैं । अतः मुझे भी अपने भारत से असीम प्यार है । मुझे अपने भारतीय होने पर गर्व है ।

नामकरण एवं भौगोलिक स्थिति- ऐसा माना जाता है कि राजा दुष्यंत और शकुन्तला के प्रतापी पुत्र सम्राट भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत हुआ । भरतखण्ड, जम्बूद्वीप, आर्यावर्त, हिन्दुस्तान, इंडिया भी भारत के अन्य नाम रहे हैं। हमारा देश एशिया महाद्वीप के दक्षिण में स्थित है । इसके उत्तर में हिमालय के धवल शिखर हैं और दक्षिण में हिन्द महासागर । पूर्वी सीमा पर असम, नागालैण्ड, त्रिपुरा और पश्चिम में राजस्थान तथा गुजरात प्रदेश हैं ।

इतिहास एवं संस्कृति- भारत विश्व के प्राचीनतम देशों में गिना जाता है । भारत के प्राचीन वैभव का परिचय हमें वेद, उपनिषद् एवं पुराण आदि ग्रन्थों से मिलता है । भारतीय-संस्कृति संसार की प्राचीनतम एवं महानतम संस्कृति रही है । इस संस्कृति ने ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ अर्थात् सब सुखी रहें, सारी पृथ्वी के निवासी एक परिवार के समान हैं, ऐसे महान संदेश दिये हैं। इस संस्कृति ने सत्य, अहिंसा, परोपकार, दान, क्षमा आदि श्रेष्ठ जीवन मूल्यों को अपनाया है । दधीचि, शिवि, रंतिदेव, कर्ण जैसे दानी और परोपकारी; राम, कृष्ण, अर्जुन जैसे वीर; हरिश्चन्द्र जैसे सत्यनिष्ठ; बुद्ध और महावीर जैसे अहिंसा के पालक भारतीय-संस्कृति की ही देन हैं । भारतीय-संस्कृति सभी धर्मों को सम्मान देने का संदेश देती है । ‘अनेकता में एकता’ भारतीय-संस्कृति की ही विशेषता है ।

प्राकृतिक वैभव – मेरी भारत-भूमि पर प्रकृति ने अपार प्रेम बरसाया है । बारी-बारी से छः ऋतुएँ इसका श्रृंगार करती हैं । मधुकंठ विहगों की अवली, नित मंगलगीत सुनाती हैं । नभस्पर्शी हिमालय हरे-भरे विस्तृत मैदान, बलखाती नदियाँ, दर्पण से झील-ताल, वनस्पतियों से भरे वनांचल और सागर के अनंत विस्तार-क्या नहीं दिया है प्रकृति ने भारत को ।

वर्तमान स्थिति – आज मेरा भारत विश्व का विशालतम और स्थिर लोकतंत्र है । अपने बहुमुखी विकास में जुटा हुआ है । ज्ञान-विज्ञान, व्यवसाय, शिक्षा एवं अध्यात्म हर क्षेत्र में अपनी प्रगति के ‘परचम फहरा रहा है । आज हमारा देश विश्व की महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है ।

हमारा कर्तव्य- भारत फिर अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त कर विश्व गुरु के आसन पर आसीन होग, । इस महायज्ञ में हम सभी भारतवासी अपनी-अपनी आहुति दें । राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की रक्षा के लिए, अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार और आततायियों के विनाश के लिए कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जायें और एक बार फिर आकाश में गूंज उठे-वंदे मातरम्, वंदे मातरम् । किसी कवि ने ठीक ही कहा है

जो भरा नहीं है भावों से , बहती जिसमें रसधार नहीं,
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ।

10. यदि मैं भारत का प्रधानमन्त्री होता!

संकेत बिन्दु-

  1. प्रस्तावना
  2. राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य
  3. युवा पीढ़ी के प्रति कर्तव्य
  4. बुजुर्गों के प्रति कर्त्तव्य
  5. उपसंहार।

प्रस्तावना – भारत में प्रधानमन्त्री का पद अति महत्त्वपूर्ण है इसलिए प्रधानमन्त्री बनना किसी भी भारतीय नागरिक के लिए गौरव की बात है। प्रधानमन्त्री का पद जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही अधिक जिम्मेदारी भरा भी, इसके बावजूद लगभग हर भारतीय का सपना प्रधानमन्त्री बनना होता है। यदि मैं भी जीवन में कभी इस पद पर पहुँचने में कामयाब रहा, तो यह मेरे लिए गौरव की बात होगी। यदि मैं भारत का प्रधानमन्त्री होता, तो अपनी समस्त क्षमताओं का उपयोग राष्ट्र की उन्नति के लिए करता।

राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य – भारत के प्रधानमन्त्री के रूप में मेरी राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों में निम्नलिखित प्राथमिकताएँ होंगी

(i) शिक्षा का उचित प्रसार – देश के प्रधानमन्त्री के रूप में सबसे पहले मैं भारत में शिक्षा के उचित प्रसार पर ध्यान देता। किसी भी देश का आर्थिक विकास इस बात पर निर्भर करता है कि उसके नागरिक कितने शिक्षित हैं। मैं शिक्षा द्वारा उत्पादकता बढ़ाने के लिए विज्ञान की शिक्षा, कार्यानुभव एवं व्यावसायिक शिक्षा पर जोर देता।

(ii) आन्तरिक सुरक्षा सुदृढ़ करना – एक देश तब ही प्रगति की राह पर अग्रसर रह सकता है, जब उसके नागरिक अपने देश में सुरक्षित हों। असुरक्षा की भावना न केवल नागरिकों का जीना दूभर कर देती है, बल्कि इससे देश की शान्ति एवं सुव्यवस्था के साथ-साथ इसकी प्रगति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद, आतंकवाद, अलगाववाद, भाषावाद, नक्सलवाद इत्यादि भारत की आन्तरिक सुरक्षा के समक्ष कुछ खतरनाक चुनौतियाँ हैं। मैं इन समस्याओं का समाधान कर आन्तरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने का प्रयास करता और देश की अखण्डता सुरक्षित रखता।

(iii) राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा – राष्ट्र की आन्तिरिक शान्ति तथा सुव्यवस्था और बाहरी दुश्मनों से रक्षा के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है। यदि हम भारतवासी आपसी मतभेदों में ही उलझे रहे तो अन्य देश हमारी स्वतन्त्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे इसलिए मैं भारत की सबसे बड़ी विशेषता विविधता में एकता को महत्त्व देते हुए भारत की राष्ट्रीय एकता की बढ़ाने का प्रयास करता।

(iv) आर्थिक चुनौतियों का समाधान – जनसंख्या वृद्धि, आर्थिक विषमता, भ्रष्टाचार, गरीबी, सामाजिक शोषण, बेरोजगारी, अशिक्षा, औद्योगीकरण की मन्द प्रक्रिया इत्यादि भारत में आर्थिक विकास की कुछ मुख्य चुनौतियाँ हैं। प्रधानमन्त्री के रूप में मैं इन आर्थिक चुनौतियों का समाधान करने की कोशिश करता।

(v) भारतीय विदेश नीति में सुधार – अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में किसी भी देश की स्थिति तब ही सुदृढ़ हो सकती है, जब उसकी विदेश नीति सही हो। भारत एक शान्तिप्रिय देश है। दुनियाभर में शान्ति को बढ़ावा देने एवं परस्पर सहयोग के लिए मैं भारतीय विदेश नीति में सुधार करता।

युवा पीढ़ी के प्रति कर्त्तव्य-किसी भी देश की शक्ति उसकी युवा पीढ़ी ही होती है। आज भारत की युवा पीढ़ी को बेरोजगारी का दंश बहुत बुरी तरह झेलना पड़ रहा है, जिसके कारण युवा वर्ग हताशा से भरकर, नशा, चोरी तथा आपराधिक कृत्यों को करने लगा है। मैं प्रधानमंत्री के रूप में रोजगार के अनेकों अवसर पैदा करता। जिससे युवा शक्ति का सुनियोजन भली प्रकार हो पाता।।

बुजुर्गों के प्रति कर्त्तव्य – बुजुर्ग राष्ट्र का अनुभव होते हैं। उनके अनुभवों का लाभ देश को मिलता रहे, ऐसी व्यवस्था वस्था की कुछ चुनौतियाँ जैसे–स्वास्थ्य, सुरक्षा, पेंशन आदि की भली प्रकार व्यवस्था करके बुजुर्गों का जीवन खुशहाल बनाने का प्रयास करता।

उपसंहार – स्पष्ट है कि यदि मैं भारत का प्रधानमन्त्री होता तो देश एवं देश की जनता को सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं शैक्षिक स्तर पर सुदृढ़ कर भारत को पूर्णत: विकसित ही नहीं खुशहाल देश बनाने का अपना सपना साकार करता।

11. राष्ट्रीय विकास के लिए परिवार नियोजन की आवश्यकता

प्रस्तावना – स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् भारत विकास के पथ पर तेजी से दौड़ रहा है। कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, संचार, सुरक्षा आदि क्षेत्रों में नित्य नई प्रगति हो रही है। इन सबके साथ देश की जनसंख्या भी द्रुत गति से बढ़ रही है। अब हम एक अरब पच्चीस करोड़ से अधिक मानव-शक्ति वाला राष्ट्र बन चुके हैं।

बढ़ती हुई जनसंख्या का संकट-देश की तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या हमारे लिए संकट का कारण बन चुकी है। जनसंख्या की वृद्धि दो गुणा दो के गुणात्मक सिद्धान्त पर होती है जबकि उत्पादन के साधनों की वृद्धि ‘एक धन एक’ के योग के सिद्धान्त से होती है अर्थात् जब आवश्यकता की वस्तुएँ एक से दो होती हैं, तब तक उपभोक्ताजनों की संख्या दो से चार हो जाती है। इस तरह विकास के सभी उपाय तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या के सामने छोटे पड़ जाते हैं और समाज में वस्तुओं का अभाव बना रहता है। भोजन, वस्त्र और आवास की कमी बढ़ती ही जाती है। यही बढ़ती हुई जनसंख्या का संकट है।

जनसंख्या का दबाव – भारत में हर क्षेत्र में विकास हुआ है परन्तु उस पर जनसंख्या वृद्धि का भीषण दबाव है। हरित क्रान्ति हुई है, खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ी है किन्तु फिर भी भूख की समस्या हल नहीं हो रही है। एक बहुत बड़ी संख्या में लोगों को आधे पेट या खाली पेट रहना पड़ता है। इतने विशाल देश में जगह का अभाव है। स्कूल में प्रवेश नहीं मिलता, बीमार होने पर अस्पताल में बैड नहीं मिलता, रेलों और बसों में सीट नहीं मिलती। प्रत्येक क्षेत्र में अभाव है। माँग बढ़ती ही जा रही है किन्तु आपूर्ति नहीं बढ़ रही है। इतनी लम्बी-चौड़ी दुनिया है फिर भी इसमें जगह नहीं है। रहने को घर नहीं है, सारा जहाँ हमारा।

जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण – जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। अन्य देशों ने इस कार्य में सफलता पाई है। जापान का प्रयास अनुकरणीय है। चीन ने भी अपनी जनसंख्या वृद्धि को कठोरता से नियंत्रित किया है। किन्तु हम इस दिशा को कोई ठोस नीति ही निर्धारित नहीं कर सके हैं। हम लोगों को कुछ लालच देकर बढ़ती हुई जनसंख्या
को रोकने का भ्रम पाले बैठे हैं।

कारण – भारत में जनसंख्या पर नियन्त्रण न होने के अनेक कारण हैं। यहाँ परिवार नियोजन पर बातें करना उचित नहीं माना जाता। बालक के जन्म को ईश्वर की देन माना जाता है। पुत्र का जन्म परिवार के लिए आवश्यक और गौरवपूर्ण माना जाता है। बेटा पैदा होने की आशा में बेटियों को बार-बार जन्म दिया जाता है। गरीब परिवार में बच्चों को भी किसी काम में लगाकर कुछ न कुछ कमाई कराई जाती है। भारत में अनेक धर्म और जातियों के लोग रहते हैं। कुछ समझदार लोगों को छोड़कर हर जाति-धर्म के लोग अपनी संख्या बढ़ाने के विचार से परिवार नियोजन का विरोध करते हैं। सरकार केवल पुरस्कार देकर परिवार नियोजन कराना चाहती है। इसके लिए किसी कठोर दण्ड की व्यवस्था नहीं करती।

निवारण परिवार नियोजन पर खुलकर विचार होना आवश्यक है। कवि, लेखकों, धार्मिक पुरुषों, राजनैतिक नेताओं तथा मीडिया के लोगों को इस पर खुलकर आन्दोलन चलाना चाहिए। धर्म-जाति का भेदभाव छोड़कर जनसंख्या वृद्धि पर रोक के लिए एक समान कानून बनाना चाहिए, इसके साथ ही सब्सिडी आदि के रूप में मिलने वाली सरकारी सहायता भी उन्हीं लोगों को मिलनी चाहिए जो परिवार नियोजन को अपनाएँ।

उपसंहार–परिवार नियोजन की उपेक्षा खतरनाक होगी। देश में भूखे-नंगों की बढ़ती हुई संख्या विकास को ध्वस्त कर देगी। भयंकर अशांति और हिंसा भी होगी। महामारी और युद्ध से भी भीषण संकट आयेगा। सब कुछ उलट-पुलट हो जायेगा, सरकारी योजनायें धरी की धरी रह जायेंगी। अतः उस विषय पर कहना तो पड़ेगा ही, कुछ करना भी पड़ेगा।

नहीं तो
इक वंश वृक्ष ऐसा बढ़ेगा
कि वन हो जायेगा
और कठिन ही नहीं,
असम्भव उसमें जीवन हो जायेगा।

12. राष्ट्रीय सुरक्षा और विज्ञान

प्रस्तावना – युद्ध मानव की दूषित प्रवृत्तियों में से एक है। इसे निन्दनीय कहा गया है। इसमें मनुष्य की बर्बरता ही प्रकट होती है। जीवित रहने का अधिकार प्रत्येक को है। शासक का कर्तव्य बताया गया है कि वह अपनी प्रजा की सम्पत्ति तथा जीवन की रक्षा करे। दूसरे राज्य की धन-सम्पत्ति लूटने और निरपराध लोगों का वध करने के अनेक उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है। अतः आत्मरक्षार्थ किया गया युद्ध शासन को अनिवार्य और आवश्यक कर्त्तव्य हो जाता है।

युद्ध को तुम निंद्य कहते हो मगर,
आ गया हो शत्रु जब
द्वार पर ललकारता
युद्ध तब तक विश्व में अनिवार्य है।

राष्ट्रीय सुरक्षा में विज्ञान – राष्ट्रीय सुरक्षा में विज्ञान का भी योगदान है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को विज्ञान ने प्रभावित किया है। पत्थरों के हथियारों से लेकर आज तक के तकनीक प्रधान हथियारों के आविष्कार तथा निर्माण का श्रेय विज्ञान को ही जाता है। आवश्यकता के अनुरूप नये-नये अस्त्र-शस्त्रों का आविष्कार विज्ञान के द्वारा ही हुआ है।

आग्नेय अस्त्रों का प्रयोग – आग्नेय-अस्त्र अस्त्रों की अगली सीढ़ी है। शत्रु पर दूर से प्रभावी प्रहार करने में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनमें बन्दूकें, पिस्तौल, रिवाल्वर, तोप इत्यादि हथियार आते हैं।
राष्ट्र रक्षा और सेना – राष्ट्र की रक्षा सेना करती है। सेना के तीन प्रमुख अंग हैं-थल सेना, जल सेना और वायु सेना ।
थल सेना – थल सेना सेना का प्रमुख अंग है। यह जमीन पर लड़कर शत्रु का प्रतिरोध करती है। राइफल, तोपें, जीयें, टैंक आदि थल सेना द्वारा प्रयोग किये जाते हैं। बख्तरबंद गाड़ियाँ भी प्रयोग में आती हैं।

जल सेना – जिन देशों की सीमा समुद्र से घिरी होती है, उनको उस ओर से जल-दस्युओं तथा शत्रु के आक्रमण का खतरा रहता है। इसकी रक्षा के लिए जल सेना का गठन होता है। जल सेना के पास नौकाएँ, पोत, जलयान, पनडुब्बी आदि होते हैं। विशाल युद्ध-पोत विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होते हैं। यह इतने विशाल होते हैं कि युद्धक विमान इनसे उड़ान भर सकते हैं। इन पर विशाल तोपें आदि लगी रहती हैं।

वायु सेना – आकाश मार्ग से शत्रु के आक्रमण का सामना वायु सेना करती है। वायु सेना के पास अनेक प्रकार के विमान होते हैं। ये विमान सेना को सामान तथा खाद्य पदार्थ आदि पहुँचाने के काम आते हैं। बमवर्षक विमान शत्रु पर हमला करते हैं तथा उसे क्षति पहुँचाते हैं। वायु सेना, थल सेना तथा जल सेना को संरक्षण तथा सुरक्षा भी देती है। वायु सेना अपने विमानों से परमाणु-आयुध तथा मिसाइल आदि को चलाने का काम भी लेती है।

मेडीकल तथा इंजीनियरिंग विभाग – सेना के अपने मेडीकल विभाग होते हैं। इसके अन्तर्गत अपने अस्पताल तथा डॉक्टर और स्वास्थ्य सेवायें चलती हैं। इनमें आपरेशन आदि की भी व्यवस्था होती है। युद्ध तथा सामान्य दिनों में सेना के लोगों की स्वास्थ्य सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति इनमें होती है। इंजीनियरिंग विंग सड़कें, पुल आदि बनाने, सैन्य-उपकरणों की मरम्मत करने तथा अन्य तकनीकी कार्य करता है।

परमाणु, रासायनिक तथा जीवाणु हथियार–आज राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए परम्परागत अस्त्र-शस्त्रों पर निर्भरता नहीं है। विज्ञान ने परमाणु तकनीक से निर्मित बम तथा अन्य आयुध बनाये हैं, जिनकी प्रहार क्षमता अपार है तथा लक्ष्यभेद अचूक है। तरह-तरह के रासायनिक हथियार भी आज बन चुके हैं। इससे शत्रु की प्रहार क्षमता प्रभावित होती है। इनसे शत्रु के सैनिक तथा नागरिक तो मारे जाते हैं किन्तु सम्पत्ति नष्ट नहीं होती। जीवाणु हथियारों का प्रयोग वर्जित है किन्तु इनके प्रयोग द्वारा शत्रु-सेना में मारक रोगों को फैलाया जाता है, शत्रु को सोचने-समझने तथा हमला करने का अवसर ही नहीं मिलता।

उपसंहार – राष्ट्रीय सुरक्षा में विज्ञान का अत्यन्त महत्व है। विज्ञान के सहयोग के बिना राष्ट्र की सुरक्षा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। राष्ट्रीय सुरक्षा करने वालों को कदम-कदम पर विज्ञान द्वारा आविष्कृत तथा निर्मित उपकरणों की आवश्यकता होती है।

13. पर्यावरण प्रदूषण : कारण और निवारण
अथवा
पर्यावरण प्रदूषण : विकट समस्या

संकेत बिंदु –

  1. पर्यावरण क्या है ?
  2. पर्यावरण प्रदूषण के विविध प्रकार
  3. पर्यावरण प्रदूषण के कुप्रभाव
  4. निवारण के उपाय
  5. सामूहिक प्रयास आवश्यक ।

पर्यावरण क्या है ? – आकाश, वायु, भूमि, जल, हरियाली, पर्वत आदि मिलकर हमारा पर्यावरण बनाते हैं । ये सभी प्राकृतिक अंग हमारे स्वस्थ और सुखी जीवन का आधार हैं । दुर्भाग्य से मनुष्य ने इस पर्यावरण को दूषित और कुरूप बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है । आज सारा संसार पर्यावरण प्रदूषण से परेशान है ।

पर्यावरण प्रदूषण के विविध प्रकार- आज पर्यावरण का कोई भी अंग प्रदूषण से नहीं बचा है । प्रदूषण के प्रमुख स्वरूप इस प्रकार हैं –

  1. जल प्रदूषण- कल-कारखानों से निकलने वाले कचरे और हानिकारक रसायनों ने नदी, तालाब, वर्षा-जल यहाँ तक कि भूमिगत जल को भी प्रदूषित कर दिया है ।
  2. वायु प्रदूषण- वायु भी प्रदूषण से नहीं बची है । वाहनों और कारखानों से निकलने वाली हानिकारक गैसे वायुमण्डल को विषैला बना रही हैं।
  3. खाद्य प्रदूषण- प्रदूषित जल, वायु और कीटनाशक पदार्थों ने अनाज, शाक-सब्जी, फल और माँस सभी को अखाद्य बना दिया है ।।
  4. ध्वनि प्रदूषण- शोर हमें बहरा कर रहा है । इससे बहरापन, मानसिक तनाव तथा हृदय रोगों में वृद्धि हो रही है।
  5. भूमि और आकाशीय प्रदूषण- बस्तियों से निकलने वाला गंदा पानी, कूड़े के ढेरों तथा भूमि में रिसने वाले कारखानों के विषैले रसायनों ने भूमि के ऊपरी तल तथा भू-गर्भ को प्रदूषित कर डाला है । विषैली गैसों के निरंतर प्रदूषित है । भूमि-प्रदूषण में प्लास्टिक व पॉलिथिन का बढ़ता प्रचलन एक अहम् कारण है। यह भूमि की उर्वरा-शक्ति को नष्ट कर रहा है ।

पर्यावरण प्रदूषण के कुप्रभाव – इस सर्वव्यापी प्रदूषण ने मानव ही नहीं सम्पूर्ण जीवधारियों के जीवन को संकटमय बना दिया है। इससे मनुष्यों में रोगों का सामना करने की क्षमता घटती जा रही है। नए-नए घातक रोग उत्पन्न हो रहे हैं। बाढ़, भूमि का क्षरण, ऋतु-चक्र का असंतुलन, रेगिस्तानों की वृद्धि और भूमण्डल के तापमान में वृद्धि जैसे घोर संकट मानव सभ्यता के भविष्य को अंधकारमय बना रहे हैं ।

निवारण के उपाय – पर्यावरण प्रदूषण का संकट मनुष्य द्वारा ही उत्पन्न किया गया है, अतः मानव के आत्म-नियंत्रण से ही यह संकट दूर हो सकता है । वाहनों के इंजनों में सुधार, बैटरी चालित दोपहिया वाहनों के प्रयोग, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर नियंत्रण तथा प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर रोक द्वारा प्रदूषण पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

सामूहिक प्रयास आवश्यक – विकसित देश ही प्रदूषण के बढ़ते जाने के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं। कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैस जो वायु प्रदूषण तथा तापमान-वृद्धि का प्रमुख कारण है विकसित देशों द्वारा ही सर्वाधिक उत्पन्न की जा रही है। ये देश विकासशील देशों द्वारा प्रदुषण-नियंत्रण पर जोर देते हैं, स्वयं उस पर अमल नहीं करना चाहते । पर्यावरण प्रदूषण विश्वव्यापी समस्या है। सभी देशों के प्रयास से इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है ।

14. आतंकवाद : विश्वव्यापी समस्या
अथवा
बढ़ता आतंकवाद : एक चुनौती

संकेत,बिंदु:

  1. आतंकवाद क्या है ?
  2. आतंकवाद विश्वव्यापी समस्या
  3. आतंकवाद की नर्सरी
  4. भारत में आतंकी विस्तार
  5. मुम्बई में ताज पर हमला
  6. समाप्ति के उपाय ।

आतंकवाद क्या है ? – संसार का कोई भी धर्म मनुष्य को हिंसा और परपीड़न की शिक्षा नहीं देता । तुलसीदास कहते हैं- ‘परहित सरिस धरम नहिं भाई । पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।’ धर्म की आड़ लेकर निर्दोष लोगों की हत्या करने वाला महान पापी और नीच है । आज कुछ धर्मान्ध और सत्ता के भूखे लोग स्वयं को ‘जेहादी’ कहकर निर्दोष स्त्री, पुरुष, बालक और वृद्धों के प्राण ले रहे हैं । ये आतंकी लोग इस घृणित कार्य से अपने धर्म को ही लज्जित और बदनाम कर रहे हैं। आतंक फैलाकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति करना ही आतंकवाद है ।

आतंकवाद विश्वव्यापी समस्या – आज संसार का हर देश आतंकवाद का निशाना बना हुआ है । अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन जैसे महाशक्ति कहलाने वाले देश भी इनके आघात को झेल चुके हैं। भारत तो लग आतंकी घटनाओं से लहूलुहान हो रहा है। आज आतंकवाद एक विश्वव्यापी समस्या बन चुका है। इस समस्या के विस्तार के लिए ऐसे देश जिम्मेदार हैं जो अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों के लिए आतंकवाद को संरक्षण दे रहे हैं।

आतंकवाद की नर्सरी – आज अनेक देशों में विभिन्न नामों से आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं । पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश, सीरिया, फिलिस्तीन, इंडोनेशिया, फिलीपींस आदि देशों में आतंकी घटनाएँ होती रहती हैं । लेकिन इन सभी देशों में पाकिस्तान आतंक की पौधशाला बना हुआ है । यहाँ न केवल कुख्यात आतंकवादी आश्रय पाते हैं बल्कि यहाँ आतंकवादियों के प्रशिक्षण शिविर भी संचालित हो रहे हैं । पाकिस्तान भले ही इससे इन्कार करता रहे लेकिन अमेरिकी कमांडो दल द्वारा पाकिस्तान के एबटाबाद में तालिबान प्रमुख, संसार के सबसे दुर्दान्त आतंकवादी ओसामा बिन लादेन के मारे जाने से पाकिस्तान का असली चरित्र संसार के सामने उजागर हो चुका है।

भारत में आतंकी विस्तार – भारत में आतंकवादी घटनाओं को आरम्भ उत्तर-पूर्वी राज्यों मिजोरम, नागालैण्ड, असम आदि से हुआ। इसके बाद पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवादी घटनाएँ कश्मीर और पंजाब में चरम स्थिति पर जा पहुँची । मुम्बई में 1992 के विस्फोटों के पश्चात् धीरे-धीरे सारे देश में आतंकवाद का विस्तार हो चुका है । महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बँगलूरू, पंजाब में अनेक आतंकवादी घटनाएँ हो चुकी हैं। कश्मीर में तो आतंकियों के हमले होते ही रहते हैं। 2016 में उड़ी के वायुसेना बेस पर भयंकर आतंकी हमला हुआ था, जिसमें लगभग 150 सैनिक शहीद हुए थे।

समाप्ति के उपाय – आतंकवाद से टुकड़ों में नहीं निपटा जा सकता । अब तो संसार के सभी जिम्मेदार राष्ट्रों को संगठित होकर आतंकवाद के विनाश में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
मोदी सरकार आने के बाद भारत ने आतंकवाद के विरुद्ध शून्य सहनशीलता (जीरोटालरेंस) की नीति अपनाई है। उडी की घटनाओं को अंजाम देने वाले पाकिस्तानी आतंकवादियों के क्रूर तथा कायराना हमले के । बाद भारत ने सर्जीकल स्ट्राइक द्वारा न केवल पाकिस्तान को, बल्कि पूरी दुनिया को कठोर संदेश दिया है।
आतंकवाद मानव-सभ्यता पर कलंक है । उसे धर्म का अंग बताकर निर्दोषों का खून बहाने वाले मानव नहीं दानव हैं । उनका संहार करना हर सभ्य राष्ट्र का दायित्व है ।

15. बेरोजगारी : समस्या और समाधान

संकेत बिंदु –

  1. रोजगार अनिवार्य आवश्यकता
  2. बेरोजगारी बढ़ने के कारण
  3. बेरोजगारी के दुष्परिणाम
  4. बेरोजगारी दूर करने के उपाय ।

रोजगार अनिवार्य आवश्यकता – मनुष्य को जीवन-यापन करने के लिए भोजन, वस्त्र इत्यादि अनेक चीजों की आवश्यकता होती है । इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसको धन चाहिए । धन का उपार्जन नौकरी, खेती अथवा व्यापार करके ही किया जा सकता है। समाज में रहने वाले हर व्यक्ति को जीवन-यापन के लिए कोई न कोई आजीविका का साधन या रोजगार अवश्य चाहिए । दुर्भाग्यवश हमारे देश में बेरोजगारी की समस्या विकट होती जा रही है।

बेरोजगारी बढ़ने के कारण- हमारे देश में बेरोजगारी बढ़ने के अनेक कारण हैं, जो संक्षेप में इस प्रकार हैं

  1. जनसंख्या बढ़ते जाने से बेरोजगारी भी बढ़ती जाती है । जिस गति से जनसंख्या बढ़ती है, उस गति से रोजगार के अवसर नहीं बढ़ते ।
  2. हमारा देश कृषिप्रधान देश है लेकिन उद्योगों को आगे बढ़ाने और कृषि की उपेक्षा करने के कारण लोग खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं ।
  3. हमारी शिक्षा-व्यवस्था समय के अनुकूल नहीं है। तकनीकी शिक्षा बहुत महँगी है। नौकरी पर ही जोर है। स्वरोजगार का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है।
  4. हमारी अर्थ-व्यवस्था विदेशों की नकल पर चल रही है । खेती की उपेक्षा हो रही है ।
  5. विदेशी बाजारों में होने वाली मंदी भी रोजगार को प्रभावित करती है।
  6. नवम्बर 2016 में विमुद्रीकरण (नोटबंदी) ने भी बेरोजगारी बढ़ाई है।

बेरोजगारी के दुष्परिणाम – बेरोजगारी बढ़ने के दुष्परिणाम दिन-प्रतिदिन हमारे सामने आ रहे हैं। देश की अधिकांश पूँजी थोडे से लोगों के हाथों में सिमटती जा रही है । अमीर और अमीर तथा गरीब और अधिक गरीब होता जा रहा है। बेरोजगार नौजवान. अपराधों की ओर मुड़ रहे हैं । आम आदमी में भीतर ही भीतर वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश और असंतोष धधकने लगा है। यह स्थिति कभी भी विस्फोट का रूप ले सकती है। इससे हमारी राष्ट्रीय एकता तथा स्वतंत्रता को भी संकट पैदा हो सकता है।

बेरोजगारी दूर करने के उपाय- बेरोजगारी बढ़ाने वाले कारणों का निवारण करके ही रोजगारों की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है । जनसंख्या पर नियंत्रण किया जाना चाहिए । एक या दो बच्चों वाले परिवारों को रोजगार में सुविधा दी जानी चाहिए । शिक्षा प्रणाली सस्ती और रोजगार के योग्य बनाने वाली होनी चाहिए । बड़े-बड़े उद्योगों पर ही जोर न देकर अतिलघु और कुटीर उद्योगों का जाल फैलाया जाना चाहिए और उन्हें विशालकाय उद्योगों के मुकाबले सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए । हमारी अर्थव्यवस्था और योजनाएँ अधिक से अधिक रोजगार के अवसर उत्पन्न करने वाली होनी चाहिए ।

सरकारी प्रयास – बेरोजगारी दूर करने के लिए सरकारी स्तर भी काफी प्रयास किए जा रहे हैं। मनरेगा से भ्रष्टाचार की समाप्ति, स्वरोजगार के लिए बैंकों से सस्ते ऋण की व्यवस्था, विदेशी पूँजी आकर्षित करने के लिए जी. एस. टी. आदि कर प्रणाली में सुधार, मुद्रा, स्टेण्डअप उद्योग स्थापना में सरकारी अनुमतियों की सुलभता अनेक उपाय सरकार ने किए हैं।
राज्य सरकारों का सहयोग तथा युवाओं का नौकरियों के पीछे भटकना छोड़ स्वरोजगारों की ओर मुड़ना भी बेरोजगारी से मुक्ति दिलाने के लिए आवश्यक है।

16. बढ़ती जनसंख्या : विकट चुनौती
अथवा
विकास बनाम जनसंख्या वृद्धि

संकेत बिंदु –

  1. समस्याओं की जड़
  2. जनसंख्या वृद्धि के कारण
  3. बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणाम
  4. नियंत्रण के उपाय।

समस्याओं की जड़ – यदि यह कहा जाय कि बढ़ती जनसंख्या देश की सारी समस्याओं की जड़ है तो यह बात बहुत कुछ सच माननी पड़ेगी ।
बाजारों में चलना दुश्वार है, रेलों और बसों में मारामार है।
महँगाई से हाहाकार है, राशन पानी, नौकरी के लिए लम्बी कतार है।
एक खाली जगह के लिए प्रार्थना-पत्र हजारों हजार हैं ।
सिर्फ जनसंख्या वृद्धि के कारण सारे विकास कार्यों का बन्टाढार है ।
संक्षेप में कहें तो ‘सौ बीमार हैं और एक अनार है । यह देश लगभग एक सौ इक्कीस करोड़ से भी अधिक लोगों का भार ढो रहा है ।

जनसंख्या वृद्धि के कारण – जनसंख्या में वृद्धि के अनेक कारण हैं । धार्मिक अंधविश्वास इसका एक प्रमुख कारण है । संतान को ईश्वर का वरदान मानने वाले लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं । चाहे खिलाने के लिए रोटी, पहनाने के लिए वस्त्र, पढ़ाने को धन और रहने को एक छप्पर न हो लेकिन ये मूढ़ लोग भूखे, अधनंगे, अनपढ़ बच्चों की कतारें खड़ी करने में नहीं शरमाते । पुत्र को पुत्री से अधिक महत्त्व देना, गरीबी, बाल-विवाह, असुरक्षा की भावना आदि अन्य कारण भी जनसंख्या को बढ़ाने वाले हैं ।

बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणाम- जनसंख्या की अबाध वृद्धि ने देश में अनेक समस्याएँ खड़ी कर दी हैं । विकट बेरोजगारी, हाहाकार मचाती महँगाई, गरीबी, अशिक्षा, बढ़ते अपराध, कुपोषण, बढ़ता प्रदूषण आदि जनसंख्या वृद्धि के ही कुपरिणाम हैं । बिजली, पानी, सड़क एवं स्वास्थ्य सेवाएँ दुर्लभ होते जा रहे हैं । जनसंख्या का यह विकराल दैत्य सारे विकास कार्यों और प्रगति को हजम कर जाता है । राजनेता भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं । इस राष्ट्रीय समस्या पर भी उनका दृष्टिकोण सम्प्रदायवादी है ।

नियंत्रण के उपाय – जनसंख्या पर नियंत्रण किया जाना अत्यन्त आवश्यक है । इस समस्या के हल के लिए विवाह की न्यूनतम आयु में वृद्धि होनी चाहिए । परिवार को सीमित रखने के उपायों का समुचित प्रचार होना चाहिए । सरकार की ओर से छोटे परिवार वालों को प्रोत्साहन और विशेष सुविधाएँ मिलनी चाहिए । मनोवैज्ञानिक प्रचार भी बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है किन्तु वह आजकल टीवी पर दिखाए जाने वाले भौंडे और अश्लील विज्ञापनों जैसा न हो। इसके अतिरिक्त कुछ कठोर उपाय भी अपनाने होंगे। दो बच्चों से अधिक पैदा करने वालों को राशन की सुविधा से वंचित किया जाय । आरक्षण या छूट केवल दो या तीन बच्चों तक ही सीमित रहे । धर्माचार्यों को भी अंधविश्वासों पर प्रहार करते हुए लोगों का सही मार्गदर्शन करना चाहिए ।

बढ़ती जनसंख्या पूरी मानव जाति के लिए खतरे की घंटी है । यदि हम इसी तरह आँख बंद करके जनसंख्या बढ़ाते रहे तो हमारी धरती एक दिन भूखी-नंगी, उजाड़ और हिंसक मनुष्यों की निवास स्थली बनकर रह जायेगी ।

17. जल बचाओ : जीवन बचाओ
अथवा
जल संकट : एक विकट समस्या
अथवा
जल संरक्षण की आवश्यकता

संकेत बिंदु –

  1. जल की महत्ता
  2. जल संरक्षण का तात्पर्य
  3. राजस्थान में जल संरक्षण
  4. जल संर उपाय
  5. जल संरक्षण सभी का दायित्व ।

जल की महत्ता – ‘जल’ का एक नाम ‘जीवन’ भी है । सचमुच इस भूमंडल पर जल ही जीवन का आधार है । जल नहीं तो जीवन भी नहीं । प्रकृति ने मानव को भूमि, वायु, प्रकाश आदि की भाँति जल भी बड़ी उदारता से प्रदान किया है लेकिन मनुष्य ने अपनी मूर्खता और स्वार्थ के कारण प्रकृति के इस वरदान को भी दूषित और दुर्लभ बना दिया है।

जल संरक्षण का तात्पर्य – जल संरक्षण का तात्पर्य है- जल का अपव्यय रोकना और वर्षा के समय व्यर्थ बह जाने वाले जल को भविष्य के लिए सुरक्षित करके रखना । बताया जाता है कि धरती का तीन-चौथाई भाग जल से ढका हुआ है किन्तु पीने योग्य या उपयोगी जल की मात्रा बहुत सीमित है । हम प्रायः धरती के भीतर स्थित जल को उपयोग में लाते हैं । कुएँ, हैण्डपंप, नलकूप, सबमर्सिबिल पम्प आदि से यह जल प्राप्त होता है । धरती के ऊपर नदी, तालाब, झील, झरनों आदि का जल उपयोग में आता है किन्तु प्रदूषण के चलते ये जल के स्रोत अनुपयोगी होते जा रहे हैं । धरती के भीतर स्थित जल की अंधाधुंध खिंचाई के कारण जल का स्तर निरंतर नीचे जा रहा है। यह भविष्य में जंल के घोर संकट का संकेत है । अतः जल का संरक्षण करना अनिवार्य हो गयी है ।

राजस्थान में जल संरक्षण – राजस्थान में धरती के अंदर जल का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। भू-गर्भ के जल का यहाँ जल-सुंरक्षण बहुत जरूरी है। संतुलन वर्षा के जल से होता है जो राजस्थान में अत्यन्त कम होती है अतः धरती को वापस नहीं मिल पाता । अब जल-संरक्षण की चेतना जाग्रत हो रही है। लोग परम्परागत रीतियों से जल का भण्डारण कर रहे हैं। सरकार भी इस दिशा में प्रयास कर रही है । खेती में जल की बरबादी रोकने के लिए सिंचाई की फब्बारा पद्धति, पाइप लाइन से आपूर्ति, हौज-पद्धति, खेत में ही तालाब बनाने आदि को अपनाया जा रहा है । मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त श्री राजेन्द्र सिंह का ‘तरुण भारत संघ’ तथा अन्य स्वयंसेवी संगठन भी सहयोग कर रहे हैं।

जल संरक्षण के अन्य उपाय – उपर्युक्त उपायों के अतिरिक्त जल संरक्षण के अन्य उपायों का अपनाया जाना भी परम आवश्यक है । शीतल पेय बनाने वाली कम्पनियों तथा बोतल बंद जल बेचने वाले संस्थानों पर नियंत्रण किया जाना चाहिए । वर्षा के जल को संग्रह करके रखने के लिए तालाब, पोखर आदि अधिक से अधिक बनाये जाने चाहिए । नगरों में पानी का अपव्यय बहुत हो रहा है । अतः जल के अपव्यय पर कठोर नियंत्रण हो तथा सबमर्सिबिल पम्प आदि के साथ एक रिचार्ज बोरिंग अनिवार्य कर दी जानी चाहिए।

जल संरक्षण सभी का दायित्व – धरती के अंदर जल-स्तर का गिरते जाना आने वाले जल-संकट की चेतावनी है। भूमण्डल का वातावरण गर्म हो रहा है । इससे नदियों के जन्म-स्थल ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि हमारी प्रसिद्ध नदियों का नाम ही मात्र शेष रह जाये । यदि जल संकट इसी तरह बढ़ता गया तो निकट भविष्य में यह संघर्ष का कारण बन सकता है। कुछ विचारकों का कहना है कि अगर तीसरा विश्वयुद्ध हुआ तो वह जल पर अधिकार को लेकर होगा । अतः हम सभी का दायित्व है कि जल के संरक्षण में तन, मन, धन से योगदान करें ।

18. भ्रष्टाचार : प्रगति का शत्रु ।
अथवा
भ्रष्टाचार : एक देशद्रोह

संकेत बिंदु –

  1. भ्रष्टाचार से आशय ?
  2. विभिन्न क्षेत्रों में भ्रष्टाचार की स्थिति
  3. भ्रष्टाचार के कारण तथा समाज पर प्रभाव
  4. भ्रष्टचार उन्मूलन के लिए सुझाव
  5. उपसंहार।

भ्रष्टाचार से आशय ? -अच्छे गुणों को आचरण में उतारना सदाचार कहा जाता है । सदाचार के विपरीत चलना ही भ्रष्टाचार है।’ भ्रष्ट’ अर्थात् गिरा हुआ ‘आचार’ अर्थात् आचरण । कानून तथा नैतिक मूल्यों की उपेक्षा करके स्वार्थ-सिद्धि में लगा हुआ मनुष्य भ्रष्टाचारी है। दुर्भाग्यवश आज हमारे समाज में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। चरित्रवान् लोग नाममात्र को ही रह गये हैं।

विभिन्न क्षेत्रों में भ्रष्टाचार की स्थिति-आज देश में जीवन को कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जहाँ भ्रष्टाचार का प्रवेश न हो । शिक्षा व्यापार बन गयी है। धन के बल पर मनचाहे परीक्षाफल प्राप्त हो सकते हैं । व्यापार में मुनाफाखोरी, मिलावट और कर चोरी व्याप्त है । धर्म के नाम पर पाखण्ड और दिखावे का जोर है । जेहाद और फतवों के नाम पर निर्दोष लोगों के प्राण लिए जा रहे हैं। सेना में कमीशन खोरी के काण्ड उजागर होते रहे हैं । भ्रष्टाचार का सबसे निकृष्ट रूप राजनीति में देखा जा सकता है। हमारे राजनेता वोट बैंक बढ़ाने के लिए देशहित को दाँव पर लगा रहे हैं । सांसद और विधायक प्रश्न पूछने तक के लिए रिश्वत ले रहे हैं। न्याय के मन्दिर कहे जाने वाले न्यायालय भी भ्रष्टाचार की पंक में सने दिखाई देते हैं ।

भ्रष्टाचार के कारण तथा समाज पर प्रभाव – देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के अनेक कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण है। हमारे चरित्र का पतन होना । थोड़े से लोभ और लाभ के लिए मनुष्य अपना चरित्र डिगा रहा है । शानदार भवन, कीमती वस्त्र, चमचमाती कार, ए.सी., टेलीविजन, वाशिंग मशीन आदि पाने के लिए लोग पागल हैं । वे उचित-अनुचित कोई भी. उपाय करने के लिए तैयार हैं । वोट पाने के लिए हमारे राजनेता निकृष्ट हथकण्डे अपना रहे हैं । हमारे धर्माचार्य भक्ति, ज्ञान, त्याग आदि पर प्रवचन देते हैं और स्वयं लाखों की फीस लेकर घर भरने में लगे हैं। इनके अतिरिक्त बेरोजगारी, महँगाई और जनसंख्या में दिनों-दिन होती वृद्धि भी लोगों को भ्रष्ट बना रही है ।

भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए सुझाव – हम चरित्र की महत्ता को भूल चुके हैं । धन के पुजारी बन गये हैं । चरित्र को सँवारे बिना भ्रष्टाचार से मुक्त होना असम्भव है । इसके साथ ही लोगों को जागरूक करना भी आवश्यक है । जनता को भी चाहिए कि वह चरित्रवान् लोगों को ही मत देकर सत्ता में पहुँचाए । मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध छेड़ रखा है। विमुद्रीकरण (नोटबंदी) को भ्रष्टाचार उन्मूलन का प्रथम चरण बताया गया है। इसके तकनीकों का प्रयोग और उन्हें प्रोत्साहन देकर भ्रष्टाचार समाप्ति के प्रयास हो रहे हैं। डिजिटल इंडिया’ अभियान ऐसा ही प्रयास है। जब लेन-देन नकद न होकर आन लाईन होंगे तो सारी प्रक्रिया पारदर्शी बनेगी और भ्रष्टाचार में निश्चय ही उल्लेखनीय कमी आएगी। सरकारी काम भी पारदर्शी बनेगी। अतः आनलाइन क्रिया कलापों में जनता को भी पूरी रुचि लेनी चाहिए।

एक सच बड़ा कठोर और अप्रिय है। लोग कहते हैं कि जनता स्वयं ही भ्रष्टाचार समाप्त नहीं करना चाहती । इसका नमूना नोटबंदी के समय नंगा हो चुका है। हम यानी ‘जनता’ अपना सही या गलत काम शीघ्र और सुगमता से कराने के लिए रिश्वत देने में संकोच नहीं करते हैं ।
अतः भ्रष्टाचार मिटाने के लिए शासन और जनता, दोनों को मिलकर सच्चे मन से प्रयास करने होंगे।
उपसंहार- भ्रष्टाचार प्रच्छन्न देशद्रोह है । भ्रष्टाचारियों के लिए कठोरतम दण्ड की व्यवस्था हो और जनता को भ्रष्ट शासकों को वापस बुलाने का अधिकार प्राप्त हो ।

19. आरक्षण व्यवस्था : क्यों और कैसे
अथवा
आरक्षण का आधार क्या हो
अथवा
आरक्षण : एक राजनीतिक हथियार

संकेत बिंदु –

  1. आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य
  2. आरक्षण का वर्तमान स्वरूप
  3. आरक्षण के पक्ष और विपक्ष
  4. राजनीतिक दुरुपयोग
  5. आदर्श स्वरूप ।

आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य – हमारे संविधान-निर्माताओं ने समाज के दलित और पिछड़े वर्ग को निर्धनता, अपमान और शोषण से मुक्त करने के लिए संविधान में विशेष व्यवस्था की। उन्होंने दलित जातियों की सूची बनायी तथा पिछड़ी जातियों की भी अलग से गणना करायी । अनुसूचित तथा पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण दिये जाने की व्यवस्था की गयी । यह आरक्षण सरकारी नौकरियों में स्थान सुरक्षित करके दिया गया । आरम्भ में यह व्यवस्था केवल दस वर्ष के लिए थी किन्तु अनेक बार इसकी अवधि बढाई गयी । अब तो लगता है कि यह व्यवस्था सदा के लिए मान ली गयी है ।

आरक्षण का वर्तमान स्वरूप – आरक्षण अब एक लोक कल्याणकारी व्यवस्था न रहकर एक सामाजिक समस्या का रूप लेता जा रहा है। अब पदोन्नति में भी आरक्षण आ गया है । शिक्षण संस्थाओं में भी आरक्षण है और देश की प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाएँ आई.आई.टी. आदि में भी आरक्षण का प्रवेश हो चुका है। अब यह वोट बटोरने का हथियार बन चुका है । सच्चाई यह है कि आरक्षण जाति-प्रथा को स्थायी बनाए रखने का सुविचारित षड्यंत्र प्रतीत हो रहा है । प्रतिभा और कुशलता के सिर पर आरक्षण की तलवार लटका दी गयी है ।

आरक्षण के पक्ष और विपक्ष – आरक्षण को बनाये रखने के समर्थकों का मानना है कि सैकड़ों वर्षों से शोषण और उपेक्षा भोगने वाली जातियों को केवल अनिवार्य आरक्षण से ही सम्मानजनक स्थान मिल सकता है । आरक्षण के समर्थक आरक्षण की कोई समय सीमा भी स्वीकार नहीं करना चाहते । आरक्षण के वर्तमान स्वरूप के विरोधियों का कहना है कि जाति के आधार पर सीमाहीन आरक्षण से प्रतिभा, परिश्रम और कार्यकुशलती की हानि हो रही है । आधुनिक अर्थव्यवस्था का आधार विशेषज्ञता और कार्य कुशलता है । मुक्त व्यापार और विश्वव्यापी प्रतियोगिता की चुनौतियों का सामना आरक्षण के चलते नहीं किया जा सकता । आरक्षण जाति के आधार पर नहीं आर्थिक स्थिति के आधार पर होना चाहिए । आरक्षण सामाजिक विघटन और जातीय द्वेष को बढ़ा रहा है ।

राजनीतिक दुरुपयोग – अब यह पूर्ण रूप से स्पष्ट हो चुका है कि आरक्षण का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए हो रहा है । सत्ता लोलुपे राजनेता अपना वोट-बैंक बनाने के लिए आरक्षण का दुरुपयोग कर रहे हैं । स्वार्थी राजनीतिक लोग अब सेना में भी अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण का नारा लगा रहे हैं। राजनेताओं का यह पाखण्ड देश की सुरक्षा और एकता के लिए खतरा बनता जा रहा है।

आदर्श स्वरूप – आरक्षण की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता लेकिन इसका आधार तार्किक और न्यायोचित होना चाहिए । केवल जातीय आधार पर आरक्षण दिया जाना सवर्ण जातियों के निर्धन और पिछड़े लोगों के साथ अन्याय है । आरक्षण की नित्य नई माँग को लेकर सार्वजनिक जीवन को अशांत बनाने के साथ राष्ट्रीय सम्पत्ति को नष्ट करना कदापि उचित नहीं है ।

20. नारी का शत्रु : दहेज
अथवा
दहेज प्रथा : विकट समस्या

संकेत बिन्दु –

  1. नारी का स्थान
  2. दहेज का वर्तमान स्वरूप
  3. दहेज के कुपरिणाम
  4. समस्या का समाधान।

नारी का स्थान- भारतीय नारी के सम्मान को सबसे अधिक आघात पहुँचाने वाली समस्या दहेज प्रथा है । भारतीय महापुरुषों ने और धर्मग्रन्थों ने नारी की महिमा में बड़े सुन्दर-सुन्दर वाक्य रचे हैं किन्तु दहेज ने इस सभी कीर्तिगानों को उपहास का साधन बना दिया है । आज दहेज के भूखे और पुत्रों की ही कामना करने वाले लोग गर्भ में ही कन्याओं की हत्या करा देने का महापाप कर रहे हैं ।

दहेज का वर्तमान रूप- आज दहेज कन्या के पति प्राप्ति की फीस’ बन गया है । दहेज के लोभी बहुओं को जीवित जला रहे हैं, फाँसी पर चढ़ा रहे है। समाज के धनी लोगों ने अपनी कन्याओं के विवाह में धन के प्रदर्शन की जो कुत्सिते परम्परा चला दी, वह दहेज की आग में घी का काम कर रही है । साधारण लोग भी इस मूर्खतापूर्ण होड़ में शामिल होकर अपना भविष्य दांव पर लगा रहे हैं।

दहेज के दुष्परिणाम – दहेज के कारण एक साधारण परिवार की कन्या और कन्या के पिता का सम्मानसहित जीना कठिन हो गया है । इस प्रथा की बलिवेदी पर न जाने कितने कन्या-कुसुम बलिदान हो चुके हैं । लाखों परिवारों के जीवन की शान्ति को नष्ट करने और मानव की सच्चरित्रता को मिटाने का अपराध इस प्रथा ने किया है ।

समस्या का समाधान – इस कुरीति से मुक्ति का उपाय क्या है ? इसके दो पक्ष हैं – जनता और शासन । शासन कानून बनाकर इसे समाप्त कर सकता है और कर भी रहा है, किन्तु विना जन-महयोग के ये कानून फलदायक नहीं हो सकते। इसलिए महिला वर्ग को और कन्याओं को स्वयं संघर्पशील बनना होगा. स्वावलम्वी बनना होगा । ऐसे वरों का तिरस्कार करना होगा जो उन्हें केवल धन-प्राप्ति का साधन मात्र समझते हैं ।

इसके अतिरिक्त विवाहों में सम्पन्नता के प्रदर्शन तथा अपव्यय पर भी कठोर नियंत्रण आवश्यक है । विवाह में व्यय की एक सीमा निर्धारित की जाय और उसका कठोरता से पालन कराया जाय । यद्यपि दहेज विरोधी कानून काफी समय से अस्तित्व में है, किन्तु प्रशासन की ओर से इस पर ध्यान नहीं दिया जाता ।

आयकर विभाग, जो निरंतर नए-नए करों को थोपकर सामान्य जन को त्रस्त करता है, इस ओर क्यों ध्यान नहीं देता ? विवाहों में एक निश्चित सीमा से अधिक व्यय पर अच्छा-खासा कर लगाया जाय । साधु-संत और धर्मोपदेशक क्यों नहीं इस नारी-विरोधी प्रथा की आलोचना करते हैं ? जनता और प्रशासन दोनों को ही इस दिशा में सक्रिय होना चाहिए और इस सामाजिक कलंक को समाप्त कर देना चाहिए ।

21. बढ़ती महँगाई : दुःखद जीवन

संकेत बिन्द-

  1. प्रस्तावना,
  2. महँगाई का ताण्डव,
  3. महँगाई के कारण,
  4. महँगाई का प्रभाव,
  5. महँगाई रोकने के उपाय,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना – मुक्त बाजार, भूमण्डलीकरण का दुष्प्रचार, विनिवेश का बुखार, छलाँग लगाता शेयर बाजार, विदेशी निवेश के लिए पलक पाँवड़े बिछाती हमारी सरकार, उधार बाँटने को बैंकों के मुक्त द्वार, इतने पर भी गरीब और निम्न मध्यम वर्ग पर महँगाई की मार, यह विकास की कैसी विचित्र अवधारणा है। हमारे करमंत्री (वित्तमंत्री) नए-नए करों की जुगाड़ में तो जुटे रहते हैं, किन्तु महँगाई पर अंकुश लगाने में उनके सारे हाईटेक हथियार कुंद हो रहे हैं।

महँगाई का ताण्डव – जीवन-यापन की वस्तुओं के मूल्य असाधारण रूप से बढ़ जानी महँगाई कहलाती है। हमारे देश में महँगाई एक निरंतर चलने वाली समस्या बन चुकी है। इसकी सबसे अधिक मार सीमित आय वाले परिवार पर पड़ती है। आज आम आदमी बाजार में कदम रखते हुए घबड़ाता है। दैनिक उपभोग की वस्तुओं के भाव बढ़ते ही जा रहे हैं। आज वही वस्तुएँ सबसे अधिक महँगी हो रही हैं जिनके बिना गरीब आदमी का काम नहीं चल सकता ।

महँगाई के कारण-महँगाई बढ़ने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं –

  1. उत्पादन कम और माँग अधिक।
  2. जमाखोरी की प्रवृत्ति।
  3. सरकार की अदूरदर्शी नीतियाँ तथा भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों और भ्रष्ट व्यवसायियों की साँठगाँठ।
  4. जनता में वस्तुओं के संग्रह की प्रवृत्ति।
  5. अंध-परम्परा और दिखावे के कारण अपव्यय।
  6. जनसंख्या में निरन्तर हो रही वृद्धि।
  7. सरकारी वितरण-व्यवस्था की असफलता ।
  8. अगाऊ सौदे और सट्टेबाजी।

फिजूलखर्ची और प्रदर्शनप्रियता भी महँगाई बढ़ने का एक कारण है। ऐसे लोग शादी-विवाह में अनाप-शनाप खर्च करते हैं और रहने को राजाओं जैसे महल बनाते हैं। आज राजतंत्र तो नहीं है किन्तु ये लोग लोकतंत्र में भी राजाओं की तरह जीते हैं। उनको कबीर का यह कथन याद नहीं रहा है

कहा चिनावै मेड़िया लाँबी भीति उसारि।
घर तो साढ़े तीन हथ, घणा त पौने च्यारि।।

महँगाई का प्रभाव – महँगाई ने भारतीय समाज को आर्थिक रूप से जर्जर कर दिया है, पेट तो भरना ही होगा, कपड़े मोटे-झोटे पहनने ही होंगे, सिर पर एक छत का इन्तजाम करना ही होगा। मगर शुद्ध और मर्यादित आमदनी से तो यह सम्भव नहीं है परिणामस्वरूप अनैतिकता और भ्रष्टाचार के चरणों में समर्पण करना पड़ता है। निम्न वर्ग और मध्यम वर्ग का तो जीवन ही दुष्कर हो गया है। महँगाई के कारण ही अर्थव्यवस्था में स्थिरता नहीं आ पा रही है।

महँगाई रोकने के उपाय – महँगाई को रोकने के लिए आवश्यक है कि

  1. बैंकें अति उदारता से ऋण देने पर नियन्त्रण करें। इससे बाजार में मुद्रा प्रवाह बढ़ता है।
  2. जीवन-स्तर और प्रदर्शन के नाम पर धन का अपव्यय रोका जाना चाहिए।
  3. जमाखोरी और आवश्यक वस्तुओं के वायदा कारोबार पर रोक लगनी चाहिए।
  4. आयात और निर्यात व्यापार में सन्तुलन

रखा जाना चाहिए। अन्तिम उपाय है कि जनता महँगाई के विरुद्ध सीधी कार्यवाही करे। भ्रष्ट अधिकारियों तथा बेईमान व्यापारियों का घिराव, सामाजिक बहिष्कार तथा तिरस्कार किया जाय ।

उपसंहार – महँगाई विश्वव्यापी समस्या है। अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ भी देश में महँगाई के लिए उत्तरदायी हैं। उदारीकरण के नाम पर विदेशी पूँजीनिवेशकों को शुल्कों में छूट तथा करों से मुक्ति प्रदान करना भी महँगाई को बढ़ाता है। यह विचार योग्य बात है कि महँगाई खाने-पीने की चीजों पर ही क्यों बढ़ती है, मोटरकारों, ए. सी. तथा विलासिता की अन्य
वस्तुओं पर क्यों नहीं ?

22. विज्ञान और मानव जीवन
अथवा
वैज्ञानिक आविष्कार

संकेत बिंदु –

  1. विज्ञान की व्यापकता
  2. विभिन्न क्षेत्रों में विज्ञान का योगदान
  3. विज्ञान और मानव का आदर्श संबंध
  4. विज्ञान और मानव का भविष्य ।

विज्ञान की व्यापकता – आज विज्ञान मानव जीवन के हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है । विज्ञान के आविष्कारों से जीवन की हर गतिविधि प्रभावित हो रही है ।

विज्ञान ने मनुष्य को अकल्पनीय सुख – सुविधाएँ प्रदान की हैं । । विभिन्न क्षेत्रों में विज्ञान का योगदान- विभिन्न क्षेत्रों में वैज्ञानिक आविष्कारों से प्राप्त लाभ और सुविधाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है

कृषि और खाद्य पदार्थों के क्षेत्र में – विज्ञान ने खेती के कठिन कार्य को नए-नए यंत्रों के द्वारा बहुत सुविधाजनक बना दिया है । मशीनी हल, श्रेशर, कटर, कीटनाशक, रासायनिक खादें, भण्डारण की सुविधा, सिंचाई की फब्बारा पद्धति आदि ने कृषि और खाद्य क्षेत्र में अपूर्व प्रगति की है। अधिक उत्पादन को बीजों की नई किस्में आविष्कृत की गई हैं।

चिकित्सा के क्षेत्र में – चिकित्सा एवं शरीर-विज्ञान के क्षेत्र में विज्ञान ने क्रान्तिकारी आविष्कार प्रदान किए हैं । एक्सरे, अल्ट्रासाउण्ड, कैट स्केन से रोग निदान सरल और सुनिश्चित हो गया है । शल्यचिकित्सा में जो चमत्कार हुए हैं। उनमें अंग प्रत्यारोपण ऐसा ही चमत्कार है । सामान्य अंगों के प्रत्यारोपण के साथ ही गुर्दा, फेफड़ा, हृदय और मस्तिष्क प्रत्यारोपण जैसे कठिन कार्य भी संभव हो रहे हैं । जीन्स के क्षेत्र में नित्य नयी खोजों ने कैसर और एड्स जैसे असाध्य रोगों की चिकित्सा में अपूर्व प्रगति की है। शरीर विज्ञान की दिशा में क्लोन’ के विकास ने आदर्श रोग मुक्त मानव की संभावनाएँ बढ़ा दी हैं।

संवाद-संचार के क्षेत्र में – संवाद-संचार के क्षेत्र में टेलीफोन, टेलीप्रिंटर, फैक्स, ई-मेल, मोबाइल, फोटो फोन, इण्टरनेट, एप जैसे लाभदायक आविष्कार हो चुके हैं जिनसे हमें जीवन में अपार सुविधाएँ प्राप्त हुई हैं ।

सुरक्षा, ऊर्जा एवं अन्य क्षेत्र – इसी प्रकार सुरक्षा के क्षेत्र में नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और सामूहिक विनाश के साधन भी उपलब्ध कराए गए हैं । मिसाइलें, परमाणु बम, रासायनिक और जीवाणुबम आदि को सुरक्षा के साधन कहा जाए या विनाश के, यह एक विचारणीय विषय है । ऊर्जा के अनेकानेक साधनों का आविष्कार हो रहा है । जल, ताप और अणुशक्ति जैसे परम्परागत साधनों के अतिरिक्त अक्षय ऊर्जा, जैसे-सौर ऊर्जा, वायु और समुद्री लहरों से प्राप्त ऊर्जा के साधनों का भी विस्तार हो रहा है । पेट्रोल, डीजल और प्राकृतिक गैस आदि से आगे हाइड्रोजनं चालित, सौर ऊर्जा चालित इंजिनों का विकास हो रहा है। इनके अतिरिक्त वस्त्र, भवन, मनोरंजन आदि के क्षेत्र में भी विज्ञान ने मानव जीवन को अनेक सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं।

विज्ञान और मानव को आदर्श संबंध – विज्ञान जीवन को सुखी, उन्नत और सुरक्षित बनाने की युक्तियाँ प्रदान करने वाला ज्ञान है । इसको जीवन का सहायक उपकरण बनाना तो ठीक है लेकिन इस पर पूरी तरह आश्रित हो जाना संकट का कारण हो सकता है । विज्ञान एक अच्छा सेवक है लेकिन बुरा स्वामी है । विज्ञान दुधारी तलवार है इसका प्रयोग अत्यन्त सावधानी से किया जाना चाहिए ।

विज्ञान और मानव का भविष्य – विज्ञान और मानव के भावी संबंध कैसे होंगे, इसका निर्णय मनुष्य की बुद्धिमत्ता पर निर्भर है ? विज्ञान ने मानव जीवन के विकास के ही नहीं विनाश के साधन भी उपलब्ध करा दिए हैं । अतः विज्ञान मनुष्य के लिए है मनुष्य विज्ञान के लिए नहीं, इस सूत्र वाक्य को ध्यान में रखते हुए विज्ञान को उसकी सीमाओं से बाहर नहीं जाने देना चाहिए।

23. कम्प्यूटर की बढ़ती उपयोगिता

संकेत बिंदु –

  1. एक महान आविष्कार
  2. कम्प्यूटर के बढ़ते चरण
  3. भारत में कम्प्यूटर का विस्तार
  4. कम्प्यूटर से लाभ-हानि
  5. कम्प्यूटर का भविष्य ।

एक महान आविष्कार – यदि विज्ञान के सबसे अधिक उपयोगी आविष्कारों की गणना की जाये तो निश्चय ही कम्प्यूटर को उनमें प्रथम स्थान प्राप्त होगा । आज ज्ञान, विज्ञान, साहित्य, व्यवसाय, सुरक्षा, ज्योतिष, शिक्षा, खेल आदि कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जहाँ कम्प्यूटर ने अपनी उपयोगिता प्रमाणित न की हो । कम्प्यूटर के बिना सामाजिक-जीवन की कल्पना भी कठिन प्रतीत होती है ।

कम्प्यूटर के बढ़ते चरण – आज जीवन के हर क्षेत्र में कम्प्यूटर का प्रवेश होता जा रहा है । शिक्षा, परीक्षा, अनुसंधान, व्यवसाय, अंतरिक्ष-अभियान, उद्योग-संचालन, शस्त्र-परीक्षण, युद्ध-संचालन आदि विविध क्षेत्रों में कम्प्यूटर की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो गयी है । इंटरनेट के माध्यम से कम्प्यूटर घर बैठे सारी सूचनाएँ उपलब्ध करा रहा है । वैज्ञानिक कम्प्यूटर को निरंतर अधिक उपयोगी और सक्षम बनाने में जुटे हुए हैं।

भारत में कम्प्युटर का विस्तार – हमारे देश में भी कम्प्यूटर का प्रसार बड़ी तेजी से हो रहा है । बैंक, व्यवसाय, विद्यालय, कार्यालय सभी स्थानों पर कम्प्यूटर का प्रवेश निरंतर हो रहा है । कम्प्यूटर पर आधारित व्यवसाय देश की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं । देश से कम्प्यूटर साफ्टवेयर का निर्यात और आउटसोर्सिंग लाखों लोगों को रोजगार प्राप्त करा रहे हैं ।

कम्प्यूटर के लाभ – कम्प्यूटर विज्ञान का एक अद्भुत चमत्कार है। इसने मानव-समाज की जीवन-शैली को ही बदल डाला है । कम्प्यूटर से मनुष्य की कार्य-क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है । सैकड़ों व्यक्तियों का कार्य अकेला कम्प्यूटर कर देता है । अब कम्प्यूटर की स्क्रीन पर बिना जोखिम के घातक अस्त्रों का परीक्षण और उसका परिणाम देखा जा सकता है। आज जीवन के हर क्षेत्र में कम्प्यूटर एक आवश्यक अंग बन गया है ।

कम्प्यूटर से हानियाँ – कम्प्यूटर से जहाँ अनेक सुविधाएँ प्राप्त हुई हैं, वहीं अनेक हानियाँ भी सामने आयी हैं। अकेले ही सैकड़ों का कार्य करने की क्षमता के कारण कम्प्यूटर ने बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न की है। कम्प्यूटर के प्रयोग से मनुष्य की शारीरिक और मानसिक क्षमताएँ क्षीण होती जा रही हैं। निरंतर कम्प्यूटर पर काम करने वाले व्यक्ति की आँखों पर बुरा प्रभाव पड़ता है और सिरदर्द तथा मानसिक तनाव की समस्याएँ भी उत्पन्न हो गयी हैं। कम्प्यूटर-खेलों ने बच्चों और युवाओं को अध्ययन से विमुख और एकांतजीवी बना दिया है।

कम्प्यूटर का भविष्य – कम्प्यूटर ने मनुष्य के हाथों में एक ऐसी क्षमता दे दी है जो प्रगति और सुख-सुविधा के साथ ही अनेक अमंगलों की आशंका भी उत्पन्न कर रही है। गलत लोगों के द्वारा धोखाधड़ी और आतंकवादी घटनाओं को भी कम्प्यूटर द्वारा अंजाम दिया जा रहा है। फिर भी कम्प्यूटर का हमारे दैनिक जीवन में अधिकाधिक प्रवेश होते जाना अनिवार्य प्रतीत होता है। हर पेशे और व्यवसाय के अलावा अब तो हर गृहणी के लिए भी कम्प्यूटर-शिक्षित होना आवश्यक बनता जा रहा है ।

24. इंटरनेट : ज्ञान का भण्डार
अथवा
इंटरनेट : लाभ और हानि

संकेत बिंदु –

  1. इंटरनेट का परिचय और व्यापकता
  2. कार्यविधि
  3. भारत में इंटरनेट का प्रसार
  4. इंटरनेट से लाभ
  5. इंटरनेट से हानि
  6. इंटरनेट का भविष्य ।

इंटरनेट का परिचय और व्यापकता – इंटरनेट का सामान्य अर्थ है- सूचना-भण्डारों को सर्वसुलभ बनाने वाली तकनीक । आज इंटरनेट दूरसंचार का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और आवश्यक अंग बन चुका है. । कम्प्यूटर तथा इंटरनेट का चोली-दामन का साथ है । कम्प्यूटर के प्रसार के साथ-साथ इंटरनेट का भी विस्तार होता जा रहा है । घर बैठे ज्ञान-विज्ञान सम्बन्धी सूचना-भण्डार से जुड़ जाना इंटरनेट ने ही सम्भव बनाया है ।

इंटरनेट की कार्यविधि – सारे संसार में स्थित टेलीफोन प्रणाली अथवा उपग्रह संचार-व्यवस्था की सहायता से एक-दूसरे से जुड़े कम्प्यूटरों का नेटवर्क ही इंटरनेट है । इस नेटवर्क से अपने कम्प्यूटर को सम्बद्ध करके कोई भी व्यक्ति नेटवर्क से जुड़े अन्य कम्प्यूटरों में संग्रहित सामग्री से परिचित हो सकता है । इस उपलब्ध सामग्री को संक्षेप में w.w.w. (वर्ल्ड वाइड वेव) कहा जाता है।

भारत में इंटरनेट का प्रसार- भारत में इंटरनेट का निरंतर प्रसार हो रहा है । बहुउपयोगी होने के कारण हर क्षेत्र के लोग इससे जुड़ रहे हैं। शिक्षा-संस्थान, औद्योगिक-प्रतिष्ठान, प्रशासनिक-विभाग, मीडिया, मनोरंजन-संस्थाएँ, संग्रहालय, पुस्तकालय सभी धीरे-धीरे इंटरनेट पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं । ऐसा अनुमान है कि इंटरनेट से जुड़े व्यक्तियों एवं संस्थाओं की संख्या करोड़ों तक पहुँच चुकी है।

इंटरनेट से लाभ – इंटरनेट की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। इंटरनेट कनेक्शन धारक व्यक्ति किसी भी समय, किसी भी विषय पर तत्काल इच्छित जानकारी प्राप्त कर सकता है । छात्र, शिक्षक, वैज्ञानिक, व्यापारी, खिलाड़ी, मनोरंजन-इच्छुक तथा सरकारी विभाग इंटरनेट से अपनी आवश्यकता और रुचि के अनुसार सूचनाएँ प्राप्त कर सकते हैं । युवा वर्ग के लिए तो इंटरनेट ने ज्ञान और मनोरंजन के असंख्य द्वार खोल दिये हैं। ई-मेल, टेली-बैंकिंग, हवाई और रेल-यात्रा के लिए अग्रिम टिकट-खरीद, विभिन्न बिलों का भुगतान, ई-मार्केटिंग इत्यादि नई-नई सुविधाएँ इंटरनेट द्वारा उपलब्ध करायी जा रही हैं। इंटरनेट द्वारा राजनेताओं और सरकारों के कुटिल कर्मों और दोहरे चरित्रों का पर्दाफाश किया जा रहा है। विकलीक्स’ इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है । हमारे देश की कई जनहितकारी योजनाएँ इंटरनेट द्वारा उपलब्धा सुविधाओं के आधार पर चल रही हैं।

इंटरनेट से हानि – आज नगरों में स्थान-स्थान पर इंटरनेट ढाबे (साइबर कैफे) खुलते जा रहे हैं। इनमें आने वाले युवा ज्ञानवर्धन के लिए कम, अश्लील मनोरंजन के लिए अधिक आते हैं। इंटरनेट के माध्यम से कम्प्यूटर में संचित गोपनीय सामग्री सुरक्षित नहीं रह गयी है । वायरस का प्रवेश कराके उसे नष्ट किया जा सकता है । विरोधी देश एक-दूसरे की गोपनीय सूचनाएँ चुरा रहे हैं। इंटरनेट ने साइबर अपराधों को जन्म दिया है । इंटरनेट से अब व्यक्ति की निजता भी असुरक्षित हो गई है।

इंटरनेट का भविष्य – इंटरनेट का सदुपयोग मानव-समाज के लिए वरदान बन सकता है । इंटरनेट सारे विश्व को एक ग्राम के समान छोटा बना रहा है। लोगों को पास-पास ला रहा है। देशों की सीमाओं को ढहा रहा है । इंटरनेट के साथ अनेक उपयोगी संभावनाएँ जुड़ी हैं। भविष्य में एक मर्यादित और नियंत्रित इंटरनेट व्यवस्था विश्व में राजनीतिक अनुशासन, विश्वव्यापी जनमत के निर्माण तथा एक अधिक सुलझे हुए मानव-समाज की संरचना में सहायक हो सकती है ।

25. मोबाइल फोन : दैनिक जीवन में
अथवा
मोबाइल फोन : वरदान या अभिशाप
अथवा
मोबाइल फोन का दुरुपयोग

संकेत बिंद –

  1. मोबाइल फोन का बढ़ता प्रचार
  2. मोबाइल फोन से लाभ
  3. मोबाइल फोन से हानि
  4. मोबाइल का संयमित प्रयोग ।

मोबाइल फोन का बढ़ता प्रचार – विज्ञान ने हमारे जीवन को अनेक सुख-सुविधाएँ प्रदान की हैं। वैज्ञानिक आविष्कारों ने हमारे जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन किया है । मोबाइल फोन भी विज्ञान का ऐसा ही आविष्कार है जो आज हमारे दैनिक जीवन का अटूट अंग बन गया है। शिक्षक हो या छात्र, सब्जी विक्रेता हो या चाय वाला, मजदूर हो या सफाईकर्मी, व्यवसायी हो या किसान, मोबाईल फोन सब के हाथों की शोभा बढ़ाता दिखायी देता है ।

मोबाइल फोन से लाभ – मोबाइल फोन जेब में रहे तो व्यक्ति अपनों से जुड़ा रहता है । वह देश में हो या विदेश में, जब चाहे इच्छित व्यक्ति से सम्पर्क कर सकता है । मोबाइल फोन ने हमें अनेक सुविधाएँ प्रदान की हैं। यह संकट का साथी है। किसी विपत्ति में पड़ने पर या दुर्घटना हो जाने पर हम अपने परिवारीजन और पुलिस को सूचित कर सकते हैं । व्यापारी, डॉक्टर, छात्र, सैनिक, गृहिणी, किशोर, युवा और वृद्ध मोबाइल सभी का विश्वसनीय साथी है । मोबाइल मनोरंजन का भी साधन है। अब तो इससे इंटरनेट, ई-मेल, ई-बैंकिंग, टिकिट-बुकिंग जैसी अनेक सुविधाएँ प्राप्त हैं । इसमें लगा कैमरा भी बहुउपयोगी है । अपराधियों को पकड़ने में भी मोबाइल सर्विलांस सहायक होता है ।

मोबाइल फोन से हानि – मोबाइल फोन ने जहाँ अनेक सुविधाएँ प्रदान की हैं वहीं इसने अनेक संकटों और असुविधाओं को भी जन्म दिया है । मोबाइल फोन का अनावश्यक प्रयोग समय की बरबादी करता है । गलत नम्बर मिल जाना, असमय बज उठना, सभा-सोसाइटियों के कार्यक्रम में विघ्न डालना, दुष्ट लोगों द्वारा अश्लील संदेश भेजना, अपराधी प्रकृति के लोगों द्वारा दुरुपयोग आदि मोबाइल फोन की असुविधाएँ हैं। आजकल छात्राओं की अश्लील फिल्में बनाकर उन्हें ब्लैकमेल और बदनाम करने में भी मोबाइल का योगदान सामने आ रहा है । मोबाइल पर अनचाहे विज्ञापन और सूचनाएँ भी मोबाइलधारक को परेशान करती रहती हैं। छात्र इसका प्रयोग नकल करने में करने लगे हैं । इन सबसे बढकर जो हानि हो रही है वह है ‘मोबाइल का अस्वास्थ्यकर प्रभाव । मोबाइल के . लगातार और लम्बे समय तक प्रयोग से बहरापन हो सकता है । इससे निकलने वाली तरंगें मस्तिष्क को हानि पहुँचाती हैं। इससे हृदय रोग हो सकते हैं।

मोबाइल का संयमित प्रयोग – इसमें संदेह नहीं कि मोबाइल फोन ने हमारे सामाजिक-जीवन में एक क्रांति-सी ला दी है, लेकिन इस यंत्र का अनियंत्रित प्रयोग गंभीर संकट का कारण भी बन सकता है । वाहन चलाते समय इसका प्रयोग जान भी ले सकता है । विद्यालयों के वातावरण को बिगाड़ने तथा सामाजिक-जीवन में स्वच्छंदता और अनैतिकता के कुरूप दृश्य दिखाने में मोबाइल फोन सहायक बना है। हमें इसका समझ-बूझ और संयम से प्रयोग करके लाभ उठाना चाहिए । इसका दास नहीं बन जाना चाहिए ।

26. दूरदर्शन : वरदान या अभिशाप
अथवा
दूरदर्शन का प्रभाव

संकेत बिंदु –

  1. दूरदर्शन की व्यापकता
  2. दूरदर्शन एक सशक्त माध्यम
  3. दूरदर्शन का प्रभाव
  4. दूरदर्शन वरदान या अभिशाप
  5. दूरदर्शन को सदुपयोग ।

दूरदर्शन की व्यापकता – दूरदर्शन हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है । घर-घर में इस ‘बुद्ध बक्से’ ने अपनी पैठ बना ली है। अब यह केवल मनोरंजन या समाचार का माध्यम मात्र नहीं रह गया है बल्कि हमारे जीवन के हर क्षेत्र और हर पक्ष में अपनी उपस्थिति और उपयोगिता का प्रमाण दे रहा है । इसकी बढ़ती उपयोगिता और व्यापकता इसे अधिकाधिक लोकप्रिय बनाती जा रही है ।

दूरदर्शन एक सशक्त माध्यम – प्रभाव के मामले में दूरदर्शन ने समाचार-पत्र, रेडियो, सिनेमा आदि सभी को पीछे छोड़ दिया है । इसमें श्रव्य (सुनने) और दृश्य (देखने) दोनों माध्यमों का आनंद लिया जा सकता है, वह भी घर बैठे । आज शिक्षा, मनोरंजन, व्यवसाय, राज-काज, सामाजिक-क्षेत्र, सुरक्षा एवं कला आदि सभी दूरदर्शन से लाभान्वित हो रहे दूरदर्शन का प्रभाव- दूरदर्शन से हमारे जीवन का कोई क्षेत्र प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका है । मनोरंजन का तो यह भण्डार है । युवाओं की भाषा, वेशभूषा, फैशन, संस्कृति, रुचि आदि सब दूरदर्शन से प्रभावित हो रहे हैं।

दूरदर्शन ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति-सी ला दी है । हर विषय को दूरदर्शन की सहायता से अधिक स्पष्ट और ज्ञानवर्धक बनाया जा सकता है। व्यापार का आधार विज्ञापन है । दूरदर्शन नए-नए उत्पादों का परिचय कराता है । घर बैठे अपनी रुचि की वस्तुएँ खरीदना दूरदर्शन से ही संभव है । सारी राजनैतिक गतिविधियाँ, सभा, रैली आदि को दूरदर्शन का सहारा चाहिए । घर बैठे तीर्थ-यात्राओं का आनंद लेना, प्रवचन सुनना, नृत्य, संगीत, शिल्प तथा साहित्यिक आयोजनों को जन-जन तक पहुँचाना, अपराध-नियंत्रण, शान्ति-व्यवस्था में सहायता, दूरदर्शन ने ही सम्भव बनाया है । इस प्रकार हमारे सामाजिक-जीवन के हर क्षेत्र पर आज दूरदर्शन का व्यापक और गहरा प्रभाव है।

दूरदर्शन वरदान या अभिशाप – लगता है दूरदर्शन समाज के लिए बहुत बड़ा वरदान है किन्तु इससे पड़ने वाले कुप्रभावों को भी नहीं भुलाया जा सकता । दूरदर्शन ने देश के युवा-वर्ग को सबसे अधिक कुप्रभावित किया है। युवक-युवतियों की वेश-भूषा, खान-पान, हाव-भाव, व्यवहार, स्वच्छन्दता, चरित्र की शिथिलता सभी दूरदर्शन से प्रभावित हैं। छात्रों का बहुत सारा समय दूरदर्शन की भेंट चढ़ रहा है । विदेशी संस्कृति और आचार-विचार को अन्धानुकरण हमारे राष्ट्रीय-चरित्र को छिन्न-भिन्न कर रहा है । आज तो दूरदर्शन, दर्शकों के मानसिक और आर्थिक शोषण का साधन भी बन गया है । अपनी दर्शक संख्या बढ़ाने की लालसा में दूरदर्शन चैनल सनसनीखेज खबरों की तलाश में रहते हैं । भ्रामक और अंधविश्वासों को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम दिखाए जाते हैं।

दूरदर्शन का सदुपयोग – दूरदर्शन के प्रायोजित चैनल घोर व्यावसायिक दृष्टि से संचालित हो रहे हैं । इनको अपने सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों की चिंता नहीं रह गई है। अब समय आ गया है कि दूरदर्शन के कार्यक्रमों के लिए एक आचार-संहिता बनाई जाए । दूरदर्शन को अपनी सीमाएँ और मर्यादाएँ सुनिश्चित करनी चाहिए। दूरदर्शन का सदुपयोग होना चाहिए । उसकी स्वच्छन्दता पर नियंत्रण लगना चाहिए।

27. बढ़ता भूमण्डलीय ताप : संकट की पदचाप
अथवा
तापमान में वृद्धि : जल प्रलय का संकेत संकेत

बिंदु –

  1. ‘ग्लोबल वार्मिंग’ क्या है ?
  2. तापमान में वृद्धि के कारण
  3. तापमान बढ़ने के दुष्परिणाम
  4. नियंत्रण के उपाय
  5. संकट से सावधान हो जाएँ।

ग्लोबल वार्मिंग क्या है ? – आजकल मीडिया में और पर्यावरण के प्रति जागरूक लोगों के बीच एक समस्या की बार-बार चर्चा सुनाई दे रही है । यह समस्या या भावी संकट ‘ग्लोबल वार्मिंग’ या भूमण्डल के तापमान में होती जा रही वृद्धि है । जीवधारियों के लिए शीत और ताप दोनों ही आवश्यक हैं । प्रकृति ने ताप और शीत के बीच एक संतुलन बना रखा है। मनुष्य अपनी औद्योगिक गतिविधियों से इस संतुलन को अस्थिर बनाता आ रहा है । प्रकृति से यह आपराधिक छेड़-छाड़ मनुष्य के लिए बहुत भारी पड़ सकती है ।

तापमान में वृद्धि के कारण – प्रकृति ने ताप और शीत का एक संतुलन बना रखा है । यदि धरातल या पर्यावरण के ताप में वृद्धि होगी तो पृथ्वी का प्राकृतिक संतुलन गड़बड़ा जायेगा । वैज्ञानिक कहते हैं कि भू-मण्डल के तापक्रम में वृद्धि हो रही है । इसका प्रमुख कारण वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड गैस की मात्रा का बढ़ना है । इसके लिए मनुष्य ही मुख्य रूप से जिम्मेदार है । लकड़ी और कोयले का ईंधन के रूप में प्रयोग होना तथा डीजल और पेट्रोल से चलने वाले वाहनों से कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्सर्जन होता है। पेड़-पौधे वातावरण से कार्बन डाई-ऑक्साइड ग्रहण करके आक्सीजन छोड़ते हैं लेकिन मनुष्य ने जंगलों का विनाश करके इस प्राकृतिक लाभ को भी पूँवा दिया है । इसके अतिरिक्त अनेक उद्योग भी वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ा रहे हैं ।

तापमान बढ़ने के दुष्परिणाम – ‘ग्लोबल वार्मिंग’ का वैज्ञानिकों ने जो चित्र खींचा है वह बड़ा भयावह है । तापमान बढ़ने से नदियों को जल देने वाले ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे भविष्य में जहाँ भयंकर बाढ़ आ सकती हैं वहीं नदियों में जल की मात्रा घटती चली जाएगी । एक दिन गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र आदि नदियाँ सरस्वती की भाँति लुप्त हो सकती हैं। पहले ध्रुव प्रदेशों को तापमान की वृद्धि से अप्रभावित समझा जाता था परन्तु अब उत्तरी ध्रुव के हिमखण्ड भी पिघलने लगे हैं। यदि ध्रुव प्रदेशों में हजारों वर्षों से जमी बर्फ पिघली तो समुद्र के जल स्तर में वृद्धि होगी और संसार के अनेक समुद्र तट पर स्थित नगर डूब जाएँगे । इसके अतिरिक्त तापमान बढ़ने से ऋतु-चक्र भी गड़बड़ा जाएगा । इसका प्रमाण देखने को मिल रहा है । गर्मियाँ लम्बी होती जा रही हैं और शीत ऋतु सिकुड़ती जा रही है । वर्षा अनिश्चित हो रही है । इस प्रकार तापमान वृद्धि से एक भयंकर संकट की पदचाप सुनाई दे रही है।

नियंत्रण के उपाय – ग्लोबल वार्मिंग ऐसा संकट है जिसे मनुष्य ने स्वयं पैदा किया है । यह एक विश्वव्यापी विपत्ति है । इससे बचने के लिए सभी देशों को ईमानदारी से सहयोग करना पड़ेगा । ग्रीन हाउस गैसों का सर्जन न्यूनतम करना होगा । विकसित तकनीक अपना कर पैट्रोलियम आधारित वाहनों के इंजनों में सुधार करना होगा । ईंधन के रूप में लकड़ी तथा कोयले के प्रयोग पर नियंत्रण करना होगा। सौर ऊर्जा का अधिक से अधिक प्रयोग करना होगा । जंगलों का विनाश रोकना होगा और वन क्षेत्र को अधिक से अधिक बढ़ाना होगा ।

संकट से सावधान हो जाएँ – भौतिक सुख-सुविधाओं के विस्तार और विकास के नाम पर मनुष्य ने अपने ही पर्यावरण को अत्यन्त हानि पहुँचाई है । आर्थिक लाभ की अन्धी दौड़ में फँसा मानव अपने ही विनाश को आमंत्रित कर रहा है। समय रहते तापमान वृद्धि के संकट से बचाव के उपाय तुरन्त नहीं अपनाए गए तो यह रोग लाइलाज हो जाएगा ।

28. सैटेलाइट चैनलों का बढ़ता जाल : प्रभाव और प्रदूषण

संकेत बिंदु –

  1. टी. वी. संस्कृति और उसका दुष्प्रभाव
  2. किशोरों के मन पर कलुषित प्रभाव
  3. मर्यादाविहीन आचरण को प्रोत्साहन सांस्कृतिक मूल्यों में गिरावट
  4. समय का दुरुपयोग
  5. उपसंहार ।

टी. वी. संस्कृति और उसका दुष्प्रभाव – टी. वी. आज हमारे नित्य-जीवन का एक अंग बन गया है । सैकड़ों की संख्या में प्रदर्शित हो रहे टी.वी. चैनल्स ने अपनी विविधता, मोहकता और सुविचारित व्यावसायिकता के बल पर समाज के एक बड़े भाग पर अपनी सांस्कृतिक साम्राज्य स्थापित कर लिया है। जिसे टी. वी. संस्कृति कहा जाता है वह उपभोग प्रधान, दिखावे से परिपूर्ण पाश्चात्य संस्कृति है। इस टी. वी. संस्कृति ने देश के युवावर्ग को गहराई से प्रभावित किया है । दूरदर्शन संस्कृति ने युवाओं में भारतीय जीवन मूल्यों के प्रति अवज्ञा तो उत्पन्न की ही है, उसे उसके पारंपरिक संस्कारों से भी विमुख कर दिया है। उसकी भाषा, वेशभूषा, खान-पान, हाव-भाव सब टी.वी. के रंग में रंगे हुए हैं।

किशोरों के मन पर कलुषित प्रभाव – किशोर-मन बडा संवेदनशील और बाहरी चमक-दमक से सहज प्रभावित होने वाला होता है । टी. वी. ने किशोर वर्ग की इस दुर्बलता का पूरा लाभ उठाया है । उसे फैशन प्रिय, मिथ्या प्रेम-प्रसंगों का दीवाना और सामाजिक मर्यादाओं का विरोधी बना दिया है । टी. वी. कार्यक्रमों में मन को दूषित करने वाले दृश्यों की भरमार होती है ।

मर्यादाविहीन आचरण को प्रोत्साहन – टी. वी. कार्यक्रम युवा और किशोर वर्ग को व्यक्तित्व निर्माण और उचित पथ-प्रदर्शन के बजाय सस्ता मनोरंजन परोस रहे हैं। टी. वी. कार्यक्रमों में युवा पीढ़ी को स्वतंत्रता के नाम पर सामाजिक और पारिवारिक मर्यादाओं को तोड़ने के लिए उकसाया जाता है । इससे जहाँ परिवार बिखर रहे हैं वहीं जीवन तनावों से भरता जा रहा है ।

सांस्कृतिक मूल्यों में गिरावट – पश्चिम की ‘खाओ-पिओ’ प्रधान संस्कृति ने भारतीय संस्कृति के महान मूल्यों की उपेक्षा कराई है । सत्य, न्याय, अहिंसा, शील, करुणा आदि पिछड़ेपन की निशानी बन गई है । इस स्थिति के लिए दूरदर्शन बहुत हद तक जिम्मेदार है।

समय का दुरुपयोग – टी. वी. के कारण समय का भी दुरुपयोग हो रहा है । बच्चे, किशोर और युवा टी. वी. देखने में अपना बहुत-सा समय नष्ट कर देते हैं। इससे इनकी दिनचर्या अव्यवस्थित होती है और स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है ।

उपसंहार – यद्यपि अनेक चैनल ज्ञान-वर्धक, सांस्कृतिक और चरित्र-निर्माण की प्रेरणा देने वाले कार्यक्रम भी प्रस्तुत करते हैं, लेकिन उनमें नई पीढ़ी की कोई रुचि नहीं होती । दूरदर्शन एक बड़ा प्रभावपूर्ण माध्यम है । यदि उसका उपयोग नई पीढ़ी को सँवारने में हो तो एक आदर्श युवा शक्ति का निर्माण हो सकता है लेकिन आज, तो दूरदर्शन ‘बोतल से बाहर आए जिन्न’ के समान है जिसे सम्हाल पाना बड़ा कठिन प्रतीत होता है ।

29. बचना कठिन है : विज्ञापन के जाल से
अथवा
विज्ञापनों का बढ़ती प्रभाव

संकेत बिन्दु –

  1. विज्ञापन का अर्थ
  2. विज्ञान के उद्देश्य
  3. विज्ञापनों का वर्तमान स्वरूप
  4. विज्ञापनों से लाभ हानि
  5. उपसंहार ।

विज्ञापन का अर्थ – विज्ञापन का अर्थ है किसी वस्तु या व्यक्ति का परिचय युक्त प्रचार करना । आज विज्ञापन हमारे दैनिक जीवन का अंग बन गये हैं। इसके रूप-रंग और तकनीक बहुत बदल चुके हैं। भोजन, वस्त्र, शिक्षा, व्यवसाय कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ विज्ञापन का जादू न चल रहा हो ।

विज्ञापन का उद्देश्य – विज्ञापन का उद्देश्य किसी वस्तु को लोकप्रिय बनाना और अपने व्यवसाय को बढ़ाना है। इसके लिए तरह-तरह के उपाय और तकनीक अपनाई जाती है। वस्तु के गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है। विज्ञापन द्वारा लोगों को नई-नई सुविधाओं और लाभों से परिचित कराया जाता है। मनोवैज्ञानिक प्रभाव का उपयोग करके लोगों को वस्तुएँ खरीदने के लिए प्रेरित किया जाता है । आज विज्ञापन का प्रयोग गलत तरीके से भी किया जा रहा है। विज्ञापन लोगों को भ्रमित कर रहे हैं।

विज्ञापनों का वर्तमान स्वरूप – आज विज्ञापन स्वयं में एक उद्योग बन गया है। उचित, अनुचित हरं उपाय से लोगों की जेबें खाली कराना ही विज्ञापन का मूल-मंत्र बन गया है । टी.वी., समाचार-पत्र, रेडियो यहाँ तक कि हमारा मोबाइल फोन भी विज्ञापन के माया-जाल को फैलाने के साधन बन गये हैं। बड़ी चतुराई से हमें समझाया जाता है कि एक खास बिस्कुट के खाने से शरीर में दुगनी ताकत आ जाती है । एक विशेष क्रीम या साबुन का प्रयोग करने से हम सात दिन में काले से गोरे हो सकते हैं । एक खास उत्पाद के सेवन से हमारी लम्बाई दुगनी गति से बढ़ सकती है। एक खास शैम्पू या तेल के प्रयोग से हमारे केश घुटनों तक लम्बे और कोमल बन जाते हैं।

विज्ञापनों ने शिक्षा के क्षेत्र में धूम मचा रखी है। कुछ विद्यालय दसवीं कक्षा पास को सीधे ग्रेजुएट बनाने का दावा करते हैं। कुछ शिक्षा संस्थाएँ 100 प्रतिशत नौकरी की गारंटी देती हैं । वाहन और भवन खरीदने को आपको ऋण की सुविधाएँ दिलायी जा रही हैं।

विज्ञापनों से लाभ-हानि- विज्ञापनों के अनेक लाभ भी हैं। नौकरी से सम्बन्धित, विवाह से सम्बन्धित, विद्यालयों में प्रवेश से सम्बन्धित, विभिन्न विषयों से सम्बन्धित आवश्यक सूचनाओं से सम्बन्धित, विभिन्न विषयों की शिक्षा से सम्बन्धित विज्ञापनों से हमें बहुत सुविधा और लाभ प्राप्त होता है । इसके साथ ही बहुत से विज्ञापन भ्रामक और धोखाधड़ी वाले भी होते हैं। किसी वस्तु या उत्फ्द्र की झूठी खूबियाँ बतायी जाती हैं। ऐसे विज्ञापनों से लोगों का धन और समय बर्बाद होता हैं।

उपसंहार – विज्ञापनों के प्रति हमें पूर्ण सावधानी बरतनी चाहिए। अपनी बुद्धि तथा औरों के अनुभवों का उपयोग करते हुए विज्ञापन की वास्तविकता जाननी चाहिए । लम्बे-चौड़े दावों और चमत्कार पूर्ण प्रभावों में फंस कर अपना धने बर्बाद नहीं करना चाहिए ।

30. समाचार-पत्रों का महत्व
अथवा
प्रजातंत्र और समाचार-पत्र

संकेत बिन्दु –

  1. समाचार-पत्रों का महत्व
  2. समाचार-पत्रों का वर्तमान स्वरूप
  3. समाचार-पत्रों का दायित्व
  4. प्रचलित प्रमुख पत्र-पत्रिकाएँ
  5. उपसंहार ।

समाचार-पत्रों का महत्व – समाचारों का प्रसारण ही समाचार-पत्रों का एकमात्र कार्य नहीं बल्कि समाज को सचेत, जागरूक और संक्रिय रखना भी इन्हीं का कार्य है । समाज की राजनीतिक, सामाजिक, नैतिक एवं आर्थिक तस्वीर को सही रूप में प्रस्तुत करना और एकता, राष्ट्रीयता, स्वस्थ चिंतन तथा विकास में योगदान करना भी समाचार-पत्रों का दायित्व है। | अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में समाचार-पत्र आज एक अतिमहत्त्वपूर्ण अंग बन चुका है । विश्व की राजनीति को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाले समाचार-पत्र ही हैं । निष्पक्ष समाचार एवं टिप्पणी से समाचार-पत्रों का महत्त्व बढ़ता है । लोग उन पर विश्वास करते हैं ।

प्रजातन्त्र शासन में तो समाचार – पत्रों की भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण होती है, ये प्रजातन्त्र के प्रहरी होते हैं । शासनारूढ़ राजनीतिक दल को सचेत करना, उसकी गलत नीतियों की आलोचना करना, जनता को जागरूक बनाना आदि इनके कार्य हैं । समाचार-पत्र जनता के मत और आकांक्षा को प्रकट करते हैं, देश की प्रगति की सच्ची तस्वीर जनता के सामने प्रस्तुत करते हैं । यही कारण है कि समाचार-पत्रों को विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के अतिरिक्त प्रजातंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है ।

समाचार-पत्रों का वर्तमान स्वरूप – समाचार-पत्र पर शब्द आज पूरी तरह लाक्षणिक हो गया है। अब समाचार-पत्र केवल समाचारों से पूर्ण पत्र नहीं रह गया है, बल्कि यह साहित्य, राजनीति, धर्म, विज्ञान आदि विविध विधाओं को भी अपनी कलेवर सीमा में सँभाले चल रहा है। किन्तु वर्तमान स्वरूप में आते-आते समाचार-पत्र ने एक लम्बी यात्रा तय की है । आज ज्योतिष, अंधविश्वास, भविष्यवाणी, भाग्यफल सभी कुछ समाचार-पत्रों का अंग बनाए गए हैं ।

समाचार-पत्रों का दायित्व – समाचार-पत्रों के विश्वव्यापी महत्त्व को देखते हुए उनसे कुछ दायित्वों का निर्वहन आवश्यक माना गया है । अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समाचार-पत्रों से आशा की जाती है कि वे विश्व-शक्ति और श्वबंधुत्व की भावना को प्रोत्साहित करे । उनके समाचार राष्ट्रीय या वर्ग-विशेष के हितों से प्रभावित न हों उनमें पारदर्शिता और तटस्थता हो । राष्ट्रीय स्तर पर प्रजातंत्रीय मूल्यों की रक्षा और जनता को जागरूक बनाना तथा शासन की गलत नीतियों की आलोचना करना भी समाचार-पत्रों का दायित्व है । सामाजिक-सौहार्द और धार्मिक समरसता को प्रोत्साहित करना भी समाचार-पत्रों का महत्वपूर्ण उद्देश्य होना चाहिए ।

प्रचलित प्रमुख पत्र-पत्रिकाएँ – आज हिन्दी, अंग्रेजी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं । हिन्दी भाषा में प्रकाशित- नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, जनमत, पंजाब केसरी, नवजीवन, जनयुग, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला, भारत, आज, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर आदि हैं तथा अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित-टाइम्स ऑफ । इण्डिया, इण्डियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स, नार्दन इण्डिया पत्रिका, स्टेट्समैन आदि हैं । इनके अतिरिक्त अनेक साप्ताहिक, पाक्षिक एवं मासिक पत्रिकाएँ भी प्रकाशित हो रही हैं ।

उपसंहार- समाचार-पत्रों को देश की भावी तस्वीर बनाने में, नागरिकों को लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदार बनाने में । और शासकों पर नियंत्रण रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है । व्यावसायिकता से ऊपर उठकर ही समाचार-पत्र अपनी सही भूमिका निभा सकते हैं ।

31. जनतंत्र और मीडिया
अथवा
जनतंत्र की प्रहरी पत्रकारिता

प्रस्तावना – जनतंत्र में मीडिया का महत्वपूर्ण स्थान है। मीडिया को लोकतंत्र का प्रहरी तथा चौथा स्तम्भ माना जाता है। विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका द्वारा हुई चूक को सामने लाकर वह लोकतंत्र की सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देता है। मीडिया के कारण ही अनेक घोटाले उजागर होते हैं तथा जनता के अधिकारों की रक्षा होती है।

मीडिया का स्वरूप – मीडिया पत्रकारिता को ही कहते हैं। यद्यपि पत्रकारिता शब्द समाचार-पत्रों से सम्बन्धित है। किन्तु आज उसका व्यापक रूप मीडिया ही है। मीडिया के दो रूप हैं-एक मुद्रित या प्रिन्ट मीडिया तथा दूसरा, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया। मुद्रित मीडिया के अन्तर्गत दैनिक समाचार-पत्र, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक पत्र-पत्रिकायें आदि आते हैं। इनमें समाचारों के अतिरिक्त विभिन्न घटनाओं और सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक इत्यादि विषयों के बारे में प्रकाशित किया जाता है। टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट आदि इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के अन्तर्गत आते हैं। आज इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रभाव तथा प्रसार बढ़ने के कारण मुद्रित पत्रकारिता पिछड़ गई है किन्तु उसकी आवश्यकता कम नहीं हुई है।

समाचार-पत्रों का विकास-समाचार-पत्र शब्द आज पूरी तरह लाक्षणिक हो गया है। अब समाचार-पत्र केवल समाचारों से पूर्ण पत्र नहीं रह गया है, बल्कि यह साहित्य, राजनीति, धर्म, विज्ञान आदि विविध विधाओं को भी अपनी कलेवर-सीमा में सँभाले चल रहा है। किन्तु वर्तमान स्वरूप में आते-आते समाचार-पत्र ने एक लम्बी यात्रा तय की है । भारत में अंग्रेजी शासन के साथ समाचार-पत्र का आगमन हुआ। इसके विकास और प्रसार में ईसाई मिशनरियों, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर और राजा राममोहन राय का योगदान महत्त्वपूर्ण रहा ।

प्रचलित पत्र-पत्रिकाएँ तथा चैनल-देश के स्वतन्त्र होने के पश्चात् समाचार-पत्रों का तीव्रता से विकास हुआ और आज अनेक अखिल भारतीय एवं क्षेत्रीय समाचार-पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। इनमें हिन्दी भाषा में प्रकाशित – नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, जनसत्ता, पंजाब केसरी, नवजीवन, जनयुग, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला, भारत, आज, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर आदि हैं तथा अँग्रेजी भाषा में प्रकाशित – टाइम्स ऑफ इण्डिया, इण्डियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स, नार्दर्न इण्डिया, स्टेट्समैन आदि हैं। इनके अतिरिक्त अनेक साप्ताहिक, पाक्षिक एवं मासिक पत्रिकाएँ भी प्रकाशित हो रही हैं ।

इलेक्ट्रोनिक मीडिया – मुद्रित मीडिया के साथ ही इलेक्ट्रोनिक मीडिया (रेडियो, दूरदर्शन के न्यूज चैनल) को भी देश में बड़ी तेजी से प्रसार हुआ है। टी. वी. पर चैनलों की बाढ़ आई हुई जो चौबीस घंटे दर्शकों को समाचारों के साथ-साथ अनेक रोचक सामग्रियाँ परोसते रहते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी भी आजकल दृश्य मीडिया या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पूरा सहयोग कर रही है।

मीडिया जनतंत्र का प्रहरी – मीडिया एक सूचना प्रदायक और मनोरंजन का उपकरण मात्र नहीं है। जनतंत्र की सुरक्षा और विकास में भी इसका बड़ा योगदान रहा है। आजकल मीडिया जनमत के निर्माण, जनतंत्र को सही दिशा देना, जनतंत्रीय संस्थाओं के गौरव की रक्षा करना, निर्वाचन प्रणाली की विवेचना, चुनावों के समय जनता को नव्यतम सूचनाओं से अवगत कराना आदि महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ अदा कर रहा है।

मीडिया के दायित्व – एक सशक्त माधयम होने के कारण मीडिया के कुछ दायित्व भी बनते हैं, उसे आत्मनियंत्रण और आत्मानुशासन की प्रणाली विकसित करनी चाहिए। पाठकों और दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए, सनसनीखेज खबरों, कठिन भाव-भंगिमाओं और विवादों से बचते हुए जनतंत्र को प्रौढ़ और स्थायी बनाने में अपनी महती भूमिका अदा करनी चाहिए।
आशा है, भारतीय मीडिया जनतंत्र का सच्चा प्रहरी बनकर जनगणना का सच्चा मित्र बनेगा।

32. वृक्ष हमारे सच्चे मित्र

संकेत बिन्दुः

  1. वृक्षों का महत्व
  2. वृक्षों के लाभ
  3. वृक्षों का विकास
  4. हमारा दायित्व ।

वृक्षों का महत्व – वृक्ष और मानव दोनों ही प्रकृति माता की संतान हैं। वृक्ष अग्रज हैं जो उन पर निर्भर मानव उनके अनुज हैं। हमारे जीवन में वृक्षों को सदा से महत्व रहा है। वृक्ष हमारे सच्चे मित्र हैं। सुख-दुख के साथी हैं। इनका हृदय बड़ा उदार है। ये हमें देते ही देते हैं। हमसे बदले में केवल मित्रता की आशा रखते हैं। ये पर्यावरण के संरक्षक हैं। वृक्षों के अभाव में सुखी- समृद्ध जीवन की कल्पना असंभव है।

वृक्षों के लाभ – वृक्षों का सामूहिक नाम वन या जंगल है। प्रकृति ने मुनष्य को अपार वन-संपदा की अमूल्य भेट दी है। हमारे जीवन के लगभग हर क्षेत्र में वृक्षों की महत्वपूर्ण उपस्थिति है। वृक्षों से हमें अनेक लाभ हैं।
वृक्ष सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों का सृजन करते हैं। मन की प्रसन्नता और शान्ति प्रदान करते हैं।
वृक्षों से हमें अनेक लाभदायक और आवश्यक पदार्थ प्राप्त होते है। ईंधन, चारा, फल, फूल, औषधियाँ आदि ऐसी ही वस्तुएँ हैं।
अनेक उद्योग वृक्षों पर ही आश्रित हैं। फर्नीचर उद्योग, भवन निर्माण उद्योग, खाद्य पदार्थ-तेल मसाले, अनाज आदि से संबंधित उद्योग, औषधि उद्योग वृक्षों पर निर्भर हैं। वृक्ष पर्यावरण को शुद्ध करते हैं। बाढ़ों को रोकते हैं। वर्षा को आकर्षित करते हैं। उपयोगी मिट्टी के क्षरण को रोकते वृक्षों का विकास- ऐसे निष्कपट, परोपकारी सच्चे मित्रों का विकास करना, हमारा नैतिक ही नहीं लाभप्रद दायित्व भी है। यद्यपि प्रकृति वृक्षों का स्वयं ही विकास करती है। किन्तु आज के उद्योग प्रधान और सुख-साधनों पर केन्द्रित मानव-जीवन ने वृक्षों के विनाश में ही अधिक योगदान किया है। मानव-समाज का विकास वक्षों के विकास का शत्र सा बन गया है। अतः हमें वृक्षो के विकास और संरक्षण पर अधिक ध्यान देना अपरिहार्य हो गया है।

वृक्षों का विकास अधिकाधिक वृक्षारोपण और वनों, उपवनों, पार्को आदि के संरक्षण से ही संभव है। नई-नई योजनाओं में वृक्षों की अविवेकपूर्ण और अंधाधुंध कटाई पर नियंत्रण भी परम आवश्यक है। वृक्षों और वनों के साथ ही मानव जाति का कुशल-क्षेम जुड़ा हुआ है। अतः वन संपदा का संरक्षण परम आवश्यक है। वृक्षारोपण और वृक्ष-संरक्षण को एक अभियान के रूप में चलाना शासन का दायित्व है।

हमारा दायित्व – यद्यपि शासन और प्रशासन के स्तर से वृक्ष (हरियाली) संरक्षण की दिशा में अधिक सक्रियता की आशा है तथापि हमारा अर्थात् समाज के प्रत्येक वर्ग का, यह दायित्व है कि वह अपनी-अपनी क्षमता और संसाधनों से वृक्षमित्रों की सुरक्षा में तत्पर हों।

वृक्षों को हानि पहुँचाने वालों की सूचना N.G.T. (राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण) को दें।
राष्ट्रीय, धार्मिक तथा सामाजिक पर्वो, उत्सवों, दिवसों आदि पर वृक्षारोपण कराए जाएँ।
छात्र-छात्राएँ वृक्षारोपण में विशेष रुचि लें।
गृहणियाँ घरों में गृहवाटिकाएँ (किचिन गार्डन) लगाने में रुचि लें। विवाह में गोदान नहीं, वृक्ष-दान की परंपरा चलाएँ। समाज के प्रतिष्ठित और प्रभावशाली महाशय विभिन्न आयोजनों में तथा मीडिया के माध्यम से वृक्षों की सुरक्षा और आरोपण की प्रेरणा दें।

पर उपकारी विरछ सौ, नाहिं बिरछ सौ मित्र।
पाथर मारें देत फल, तरु की नीति विचित्र।।

33. कटते जंगल : घटता मंगल
अथवा
का महत्व
अथवा
वन बचाओ : सुख-समृद्धि लाओ

संकेत बिन्दु –

  1. वनों का महत्व
  2. वनों से लाभ
  3. वन विनाश के दुष्परिणाम
  4. वनों की रक्षा के उपाय ।

वनों का महत्त्व – भारत में वन हमारी भव्य-संस्कृति की पाठशाला और विकास-भूमि रहे हैं। हमारे मुनि और मनीषियों ने वनों में रहकर ही मानव-मंगल का चिन्तन किया था। केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं, जंगलों का मनुष्य के सामाजिक और आर्थिक जीवन के लिए सदा से विशेष महत्त्व रहा है । यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि मंगलकारी वनों का मनुष्य ने विकास के नाम पर और तुच्छ आर्थिक लाभ के लिए निर्ममता से विनाश किया है ।

वनों से लाभ – जंगलों का हमारे जीवन में अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण स्थान है । वनों की हरीतिमा जहाँ नयनों को प्रसन्नता प्रदान करती है, वहीं काष्ठ, ईंधन, औषधि एवं अन्य औद्योगिक पदार्थों द्वारा जंगल हमारे जीवन में मंगल का विधान करते हैं । जंगल बाढों की तीव्रता को कम करके विनाश से रक्षा करते हैं । जंगलों की हरियाली बादलों को बरसने के लिए प्रेरित करती है । जंगल भूमि के कटाव को रोकते हैं । वे कार्बन डाइऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसों का शोषण करके प्राणदायिनी ऑक्सीजन गैस का उत्सर्जन करते हैं । जंगल नाना प्रकार के दुर्लभ जीवों की शरणस्थली होते हैं । जंगलों के कारण ही हमारे पर्यावरण का संतुलन बना रहता है । इस प्रकार जंगल मानव-समाज के परम मित्र और मंगल विधाता हैं।

वन विनाश के दुष्परिणाम – जंगलों के कम होते जाने के अनेक दुष्परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं। वन-क्षेत्र घट जाने का पर्यावरण पर कु-प्रभाव पड़ रहा है । ऋतु-चक्र गड़बड़ा गया है । वायु मण्डल का गैसीय संगठन असंतुलित हो रहा है। रेगिस्तानों का विस्तार हो रहा है। सबसे बड़े संकट, ‘भूमण्डलीय ताप वृद्धि’ (ग्लोबल वार्मिंग) की पदचाप सुनाई दे रही है । बाढों की तीव्रता और जन-धन की हानि बढ़ रही है । पर्वतीय जंगलों के कटने से चट्टानें खिसकने, भूमि धसकने की घटनाएँ प्रायः सुनाई दे रही हैं । वनों के कटने से देश की जैव विविधता नष्ट होती जा रही है । जंगली जानवर बस्तियों की ओर आने लगे हैं ।

वनों की सुरक्षा के उपाय- वनों से प्राप्त होने वाली उपयोगी वस्तुओं की आवश्यकता सदा बनी रहेगी । अतः वन्य पदार्थों के उपयोग को नियमित और नियन्त्रित किया जाना चाहिए । जो भी उद्योग वनों से कच्चा माल ग्रहण करते हैं। उनके लिए वृक्षारोपण कराना अनिवार्य बना देना चाहिए । वनों की सुरक्षा के लिए बनाये गये कानूनों का कड़ाई से पालन होना चाहिए । वन महोत्सव तथा वृक्षारोपण जैसे अभियानों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

यदि संसार में पेड़, पौधे न रहे तो यह धरती कितनी कुरूप हो जायेगी ? वनों के नष्ट हो जाने पर मनुष्य का जीवन ही संकट में पड़ जाएगा । अतः आज समाज में वन चेतना जगाने की आवश्यकता है । वनों की रक्षा में ही सुखी जीवन की रक्षा निहित है ।

34. राष्ट्र-निर्माण में छात्रों का योगदान
अथवा
देश के सामने चुनौतियाँ और युवा शक्ति
अथवा
युवा वर्ग : भारत का भविष्य

संकेत बिंदु –

  1. युवावस्था का महत्व
  2. राष्ट्र निर्माण का स्वरूप
  3. युवा वर्ग और छात्रों का योगदान
  4. वयोवृद्धों से अपेक्षा छात्र और युवा आगे बढ़ें ।

युवावस्था का महत्व – अदम्य उत्साह, अटूट साहस, अपार ऊर्जा और सुनहले सपने, यदि इन सभी को एक नाम दिया जाय तो वह होगा ‘जवानी’ युवावस्था प्रकृति का अनमोल उपहार है, जीवन का श्रृंगार है । युवा वर्ग राष्ट्र की बहुमूल्य धरोहर है। इस युवा शक्ति का सही प्रयोग राष्ट्र को उन्नति के शिखर पर ले जा सकता है।

राष्ट्र-निर्माण का स्वरूप – राष्ट्र का निर्माण राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करना है । भूमि, भूमि पर निवास करने वाले लोग और उनकी एक साझा संस्कृति, इन तीनों से मिलकर एक राष्ट्र बनता है । अतः राष्ट्र के इन तीनों अंगों की सुरक्षा, सम्पन्नता और सम्मान के लिए परिश्रम करना ही राष्ट्र-निर्माण है। भारत एक विशाल भूखण्ड पर स्थित देश है। इसमें विविध रूप-रंग, भाषा, आचार-विचार, धर्म और उपसंस्कृति वाले लोग निवास करते हैं । इन सभी को सुखी, समृद्ध और परस्पर प्रेमभाव से पूर्ण बनाना ही राष्ट्र-निर्माण है।

युवा वर्ग और छात्रों का योगदान – कुछ वर्षों बाद भारत युवकों का देश होने वाला है । अतः राष्ट्र निर्माण में सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान देश के युवा ही कर सकते हैं। छात्रों के रूप में वे अनुशासनबद्ध और सुशिक्षित होकर देश को शक्ति-सम्पन्न और प्रगतिशील बना सकते हैं । सैनिकों के रूप में वे देश की सुरक्षा में योगदान कर सकते हैं । व्यवसायियों के रूप में देश को सम्पन्न और सुख-समृद्धि से पूर्ण बना सकते हैं । जागरूक नागरिक बनकर देश को भ्रष्टाचार और सामाजिक समस्याओं से छुटकारा दिला सकते हैं । राजनीति में भाग लेकर वे भ्रष्ट, पदलोलुप और समाज को बाँटने वाले राजनेताओं की छुट्टी कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कलाकार, वैज्ञानिक, समाज सुधारक, चिकित्सक, कृषक आदि अनेक भूमिकाओं द्वारा भारत को उन्नति के शिखर पर ले जा सकते हैं।

वयोवृद्धों से अपेक्षा – युवा वर्ग राष्ट्र का भविष्य होता है। उसे सही मार्गदर्शन करना और जिम्मेदारी सम्हालने योग्य बनाना देश की वयोवृद्ध पीढ़ी का कर्तव्य होता है । यदि वृद्ध लोग सत्ता और स्वार्थ के मोह से ग्रस्त होकर अपने पदों से चिपके रहेंगे तो देश का भविष्य कभी उज्ज्वल नहीं हो सकता । अतः यवाओं को योग्य बनाक सौंप देनी चाहिए ।

आगे बढ़ें – आज राष्ट्र-निर्माण का ठेका बूढे, कुटिल, साहसविहीन, सत्ता लोलुप राजनेताओं ने ले रखा है। इन लोगों के भ्रष्ट आचरण के नित्य नए कारनामे जनता के सामने आ रहे हैं । इन लोगों ने अपने वोट बैंक’ को बनाए रखने के लिए देश के सम्मान और सुरक्षा को भी दांव पर लगा दिया है। अब छात्रों और युवा पीढ़ी को इनके जाल से मुक्त होकर राष्ट्र-निर्माण का कार्य अपने हाथों में लेना होगा।

35. आदर्श विद्यार्थी जीवन
अथवा
आदर्श विद्यार्थी

संकेत बिंदु –

  1. विद्यार्थी जीवन का आशय ?
  2. विद्यार्थी जीवन का आदर्श
  3. विद्यार्थी जीवन के विशेष गुण
  4. विद्यार्थी जीवन के उद्देश्य
  5. विद्यार्थी से समाज व राष्ट्र की अपेक्षाएँ
  6. उपसंहार।

विद्यार्थी जीवन का आशय – जो विद्या या ज्ञान का इच्छुक है या ‘अर्थी’ है, वही विद्यार्थी है । इस विद्यारूपी धन की प्राप्ति गुरु की कृपा से होती है. प्राचीन समय में गुरु को ईश्वर के समकक्ष स्थान प्राप्त था । शिष्य समर्पण और श्रद्धा-भाव से गुरु की शरण में जाता था और गुरु उसे पुत्रवत् स्वीकार करके उसके सर्वांगीण विकास का पूरा प्रयास करते थे । आज विभिन्न कालेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा देने की व्यवस्था है । जो युवक वहाँ रह कर शिक्षा प्राप्त करते हैं, वे विद्यार्थी कहलाते हैं। शिक्षा प्राप्त करने में बिताया गया समय विद्यार्थी जीवन कहा जाता है।

विद्यार्थी-जीवन का आदर्श – विद्यार्थी-जीवन मनुष्य के जीवन, चरित्र और आजीविका की आधारशिला है । व्यक्ति को क्या बनना है, यह उसका विद्यार्थी-जीवन ही तय करता है । आज का विद्यार्थी ही कल देश का कर्णधार बनने वाला है । उसकी अपनी उन्नति, उसके देश की प्रगति, सभी कुछ उसी के ऊपर निर्भर है । देश के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, साहित्यिक सभी क्षेत्रों में विद्यार्थी को ही जाना है। विद्यार्थी का जीवन ऐसा होना चाहिए कि वह इन सभी लक्ष्यों को प्राप्त करने में समर्थ हो सके। इसके लिए उसको परिश्रमी होना चाहिए। उसे अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होना चाहिए । उसका जीवन सरल-सादा और दोष रहित होना चाहिए। उसे सादा, स्वास्थ्यप्रद भोजन करना चाहिए तथा स्वच्छ वस्त्र पहनने चाहिए। उसे दिखावे से बचना चाहिए। उसे शान्त, सहनशील और अध्ययनशील होना चाहिए। उसके सामने उसका उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए तथा उसकी प्राप्ति के लिए उसे सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए। उसे बड़ों तथा अपने शिक्षकों के प्रति विनम्र और सत्कारभाव से पूर्ण होना चाहिए।

विद्यार्थी जीवन के विशेष गुण – प्राचीन भारत में विद्यार्थी-जीवन साधना का जीवन था । अतः उस युग में विद्यार्थियों के पाँच प्रधान लक्षण माने जाते थे

“काक-चेष्टा, वको ध्यानं, श्वान-निद्रा तथैव च।
स्वल्पाहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थी पञ्च-लक्षणम् ॥”

कौए जैसा सतर्क, बगुले जैसा एकाग्र, कुत्ते जैसी सचेत नींद सोने वाला, ढूंस-ठूस कर न खाने वाला, घर के झंझटों से दूर रहने वाला ये पाँच लक्षण विद्यार्थी के माने गये हैं। किन्तु समय के परिवर्तन के साथ नियम व लक्षण भी बदल जाते हैं। इसी कारण आज इन पाँचों लक्षणों को इसी रूप में मान्यता देना संभव नहीं है। आजकल के विद्यार्थियों के मुख्य गुण-अध्यवसाय, आज्ञाकारिता, अनुशासन, परिश्रम तथा उदारता हैं । खेलों में रुचि, आस-पास के समाज और विश्व में घटित होने वाली प्रमुख घटनाओं से परिचय और सामान्य ज्ञान का उच्च स्तर; यह सभी बातें आज के विद्यार्थी के लिए आवश्यक हैं ।

विद्यार्थी जीवन के उद्देश्य – विद्यालय में रहते हुए सादा जीवन बिताना तथा शिक्षा प्राप्त करने के लिए निरन्तर श्रमशील रहना विद्यार्थी जीवन का उद्देश्य है। शिक्षा-प्राप्ति का काम पूरा होने के बाद प्राप्तं योग्यता का उपयोग देश और समाज के हितार्थ करना भी विद्यार्थी जीवन का उद्देश्य है। यदि विद्यार्थी अपने देश और समाज की प्रगति में सहायक नहीं बनती तो उसका जीवन उद्देश्यविहीन माना जायेगा।

विद्यार्थी से समाज राष्ट्र की अपेक्षाएँ – शिक्षा प्राप्त करने के बाद विद्यार्थी अपने समाज तथा राष्ट्र से जुड़ता है। वह अपने ज्ञान का लाभ देकर उनकी सेवा करता है। समाज और राष्ट्र को भी यह अपेक्षा रहती है कि विद्यार्थी सुशिक्षित और समर्थ होकर उनकी समस्याओं का समाधान करेंगे प्रत्येक राष्ट्र और समाज अपने सुशिक्षित और सुयोग्य युवकों के श्रम और सहयोग से ही प्रगति करता है।

उपसंहार- केवल अपने बल पर कोई छात्र आदर्श विद्यार्थी नहीं बन सकता । इसके लिए विद्यालयों का वातावरण भी शिक्षामय होना चाहिए । शिक्षकों को भी कर्तव्यनिष्ठ, व्यसनरहित और अपने विषय का पूर्ण ज्ञाता होना चाहिए । आज नकले पर आश्रित छात्रों ने शिक्षकों का महत्व तो गिराया ही है, परिश्रमी और मेधावी छात्रों को भी हताश कर दिया है ।। नकल करने-कराने पर कठोरता से रोक लगनी चाहिए। आजकल हमारे अनेक प्रसिद्ध शिक्षा संस्थान और विश्वविद्यालय राजनीति के केन्द्र बन गए हैं। उनको राजनीतिक विचारधाराओं में बाँट दिया है। बोलने की स्वतंत्रता को पाखण्ड की आड़ में इन विद्यामंदिरों में खुलेआम देशद्रोही हरकतों को अंजाम दिया जा रहा है। इस पर नियंत्रण आवश्यक हो गया है।

36. विद्यार्थी और अनुशासन

संकेत बिंदु –

  1. अनुशासन का अर्थ और महत्त्व
  2. विद्यार्थी जीवन में अनुशासन की आवश्यकता
  3. विद्यालयों में अनुशासन की स्थिति
  4. विद्यार्थियों के जीवन-निर्माण में अनुशासन का प्रभाव
  5. उपसंहार।

अनुशासन का अर्थ और महत्त्व – जिस जीवन में कोई नियम या व्यवस्था नहीं, जिसकी कोई आस्था और आदर्श नहीं, वह मानव जीवन नहीं पशु जीवन ही हो सकता है । ऊपर से स्थापित नियंत्रण या शासन सभी को अखरता है । इसीलिए अपने शासन में रहना सबसे सखदायी होता है। बिना किसी भय या लोभ के नियमों का पालन अनुशासन है । विद्यालयों में तो अनुशासन में रहना और भी आवश्यक हो जाता है ।

विद्यार्थी-जीवन में अनुशासन की आवश्यकता – वैसे तो जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासन आवश्यक है किन्तु जहाँ राष्ट्र की भावी पीढ़ियाँ ढलती हैं उस विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का होना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है किन्तु आज विद्यालयों में अनुशासन की स्थिति अत्यन्त शोचनीय है । अनुशासन में रहना आज के विद्यार्थियों को शायद अपनी शान के खिलाफ लगता है । अध्ययन के बजाय अन्य बातों में छात्रों की रुचि अधिक देखने में आती है।

विद्यालयों में अनुशासन की स्थिति- विद्यालयों में बढ़ती अनुशासनहीनता के पीछे मात्र छात्रों की उद्दण्डता ही कारण नहीं है सामाजिक परिस्थितियाँ और बदलती जीवन-शैली भी इसके लिए जिम्मेदार है । टीवी ने छात्र को समय से पूर्व ही युवा बनाना प्रारम्भ कर दिया है। उसे फैशन और आडम्बरों में उलझाकर उसका मानसिक और आर्थिक शोषण किया जा रहा है । बेरोजगारी, उचित मार्गदर्शन न मिलना तथा अभिभावकों को जिम्मेदारी से आँख चुराना भी अनुशासनहीनता के कारण हैं ।

विद्यार्थियों के जीवन-निर्माण में अनुशासन का प्रभाव- छात्रों में बढ़ती अनुशासनहीनता न केवल इनके भविष्य को अंधकारमय बना रही है बल्कि देश की भावी तस्वीर को भी बिगाड़ रही है । आज चुनौती और प्रतियोगिता का जमाना है। हर संस्था और कम्पनी श्रेष्ठ युवकों की तलाश में है। इस स्थिति में नकल से उत्तीर्ण और अनुशासनहीन छात्र कहाँ ठहर पायेंगे ? आदमी की शान अनुशासन तोड़ने में नहीं उसका स्वाभिमान के साथ पालन करने में है । विद्यार्थियों के जीवन-निर्माण में अनुशासन का प्रभाव स्पष्ट है। अनुशासित विद्यार्थी ही भविष्य में उत्तम नागरिक बन सकता है।

उपसंहार – आज का विद्यार्थी आँख बंद करके आदेशों का पालन करने वाला नहीं है । उसकी आँखें और कान, दो खुले हैं। समाज में जो कुछ घटित होगा वह छात्र के जीवन में भी प्रतिबिम्बित होगी । यदि समाज अपने आपको सँभाले तो छात्र स्वयं सँभल जायेगा । समाज के हर वर्ग को अनुशासन का पालन करना होगा तभी छात्रों से अनुशासित होने की अपेक्षा की जा सकती है ।

37. मेरे सपनों का जीवन
अथवा
मेरे जीवन का उद्देश्य
अथवा
मेरा जीवन-स्वप्न

संकेत बिंदु

  1. छात्र जीवन और सपने
  2. सोद्देश्य जीवन ही जीवन है
  3. मेरे जीवन का लक्ष्य और मेरी योजना
  4. मेरा संकल्प ।

छात्र-जीवन और सपने – छात्र-जीवन तो सपने सँजोने की उम्र होती है। सपने देखने का अर्थ जीवन की वास्तविकता से पलायन करना नहीं है । भावी जीवन को व्यवस्थित ढंग से चलाने का विचार करना ही सपने देखना है । वैसे भी मनुष्य स्वप्न-दृष्टा प्राणी है । वह अपने जीवन को सफल बनाने के लिए नाना प्रकार की कल्पनाएँ करता है । कोई वकील तो कोई व्यवसायी बनना चाहता है । कोई वैज्ञानिक तो कोई सैनिक बनकर देश की सेवा करना चाहता है । कोई खिलाड़ी, कोई अध्यापक और कोई डॉक्टर बनकर मान-सम्मान और धन अर्जित करने के सपने देखता है ।

सोद्देश्य जीवन ही जीवन है -जीवन में एक उद्देश्य का होना आवश्यक होता है । उद्देश्य, लक्ष्य या मंजिल ही मनुष्य को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं । छात्र भी अपने उद्देश्य को ध्यान में रखकर विषयों का चयन करता है । कोई साहित्य और कला संबंधी विषय चुनते हैं और कोई विज्ञान या वाणिज्य संबंधी विषय चुनते हैं । छात्र जीवन में ही हमारे भावी जीवन की दिशा निश्चित होती है । अतः हमें अपनी रुचि, योग्यता और आने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखकर अपने लक्ष्य का चुनाव करना चाहिए । केवल दूसरों की देखा-देखी आँख बंद करके जीवन का लक्ष्य बना लेना बुद्धिमानी नहीं होती ।

मेरे जीवन का लक्ष्य और मेरी योजना – मेरे जीवन का लक्ष्य है एक कुशल चिकित्सक बनना । इस पेशे को मैं धन कमाने के लिए नहीं बल्कि मानव-सेवा के लिए अपनाना चाहता हूँ । रोगियों की बढ़ती भीड़, डॉक्टरों का घोर पेशेवर रंवैया, महँगी चिकित्सा, ये सभी मुझे विचलित कर देते हैं । मेरा सपना है कि मैं एक कुशल चिकित्सक बनँ । प्रत्येक चिकित्सा-पद्धति की श्रेष्ठतम बातों का उपयोग करके रोगी को स्वस्थ बनाऊँ । उचित शुल्क, सही निर्देश और सेवाभाव से काम करूं । एक ऐसी नि:शुल्क सेवा-व्यवस्था संचालित करू जो जनता को स्वास्थ्य-रक्षा की शिक्षा दे । महिलाओं और बच्चों के लिए चिकित्सा की विशेष व्यवस्था करू ।

मेरा संकल्प – मेरा यह दृढ़ संकल्प रहेगा कि मैं अपने पेशे की पवित्रता और गरिमा को लांछित न होने दें । मैं चाहँगा कि अन्य सेवाभावी चिकित्सक मेरे साथ आएँ और मानव-सेवा में हाथ बँटाकर यश और आत्मसंतोष प्राप्त करें ।

मैं एक ऐसा चिकित्सा-केन्द्र चलाना चाहता हूँ, जहाँ नाम-मात्र की धनराशि पर रोगी का परीक्षण और उपचार किया जायेगा । मैं इसमें उन चिकित्सकों की सेवाएँ आमंत्रित करूंगा, जो पीड़ित मानवता की सेवा करके उसे स्वास्थ्य और प्रसन्नता देने के लक्ष्य के प्रति समर्पित रहेंगे । राजा रन्तिदेव का यह आदर्श मेरी प्रेरणा रहेगा- ”न तो मुझे राज्य की कामना है, न स्वर्ग-प्राप्ति की इच्छा है । मैं पुनर्जन्म भी नहीं चाहता मैं तो दु:खी प्राणियों के दु:खों को मिटाने की ही कामना करता हूँ।” मेरा प्रयास होगा –

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दुख माऽभवेत ।

38. छात्र और शिक्षक
अथवा
गुरु-शिष्य संबंध

संकेत बिंदु

  1. परम्परागत गुरु-शिष्य संबंध
  2. वर्तमान स्थिति
  3. परिवर्तन के कारण
  4. दुष्परिणाम
  5. समाधान के उपाय।

परम्परागत गुरु-शिष्य संबंध – भारतीय संस्कृति और सामाजिक व्यवहार में गुरु को बहुत सम्माननीय स्थान दिया गया है । गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, शिव ही नहीं साक्षात् परब्रह्म के तुल्य माना गया है। गुरु को यह सम्मान उनके चरित्र की महानता और विद्या को जीवन में अत्यन्त महत्व दिए जाने के कारण प्राप्त हुआ था । गुरु में श्रद्धा रखने के संस्कार शिष्य को परिवार से ही प्राप्त हो जाते थे ।

वर्तमान स्थिति – आज गुरु शिक्षक और शिष्य छात्र बन गया है । कुछ अपवादों को छोड़ दें तो गुरु-शिष्य के बीच अब केवल औपचारिक या व्यावसायिक संबंध ही शेष रह गए हैं । चिकित्सा, वकालत, व्यापार आदि की तरह शिक्षण भी एक व्यवसाय मात्र रह गया है । छात्र शुल्क देता है और बदले में उसे शिक्षकों की सेवाएँ प्राप्त होती हैं । श्रद्धा, सम्मान, दायित्व जैसे भावनात्मक संबंधों की कोई उपयोगिता नहीं रह गई है । आज विद्यालयों में शैक्षिक वातावरण दुर्लभ हो गया है । हड़ताल, प्रदर्शन, गुटबंदी, मारपीट ये विद्यालयों के आम दृश्य हो गए हैं । न छात्रों में शिक्षकों के प्रति श्रद्धाभाव है और न शिक्षकों में छात्रों के प्रति दायित्व की भावना ।

परिवर्तन के कारण – विद्या मंदिरों बल्कि कहें तो शिक्षालयों के वातावरण और गुरु-शिष्य संबंधों के विघटन के अनेक कारण हैं। सर्वप्रथम है पारिवारिक संस्कारों का क्षय । आज परिवार में गुरु के प्रति श्रद्धाभाव की शिक्षा नहीं मिलती । इसके अतिरिक्त शिक्षक भी अपने आचरण की श्रेष्ठता को भुला बैठे हैं। उनकी छात्र के जीवन-निर्माण में बहुत सीमित भूमिका रह गई है। छात्रों को अध्यापक से अधिक भरोसा कोचिंग और ट्युशन पर है । शिक्षा-माफिया के उदय से शिक्षकों और विद्यालयों की उपयोगिता मजाक बनकर रह गई है । डंके की चोट पर होती नकल को बोर्ड, विद्यालय और प्रशासन रोक पाने में असमर्थ हैं । पास कराने के ठेकेदारों को निश्चित रकम सौंपने के बाद छात्र को विद्यालय जाने, शिक्षकों के समक्ष सिर झुकाने या फिर किताबों में सिर खपाने की क्या आवश्यकता ?

दुष्परिणाम – छात्र और शिक्षक के बीच भावनात्मक संबंध समाप्त हो जाने से पूरा शिक्षा-तंत्र प्रभावित हुआ है। एक प्रकार से धन-बल ने शिक्षा-तंत्र में शिक्षक की भूमिका शून्य जैसी कर दी है । आज विद्यालय छात्रों के लिए एक पंजीकरण केन्द्र से अधिक महत्व नहीं रखता । वे मौज-मस्ती करने, मोबाइल पर प्रेमालाप करने, झगड़े-झंझटों के षड्यंत्र रचने के लिए विद्यालय जाते हैं । इस दूषित वातावरण ने परिश्रमी, योग्यता बढ़ाने के इच्छुक और प्रतिभाशाली छात्रों का भविष्य अंधकारमय बना दिया है । नकल के बल पर उत्तीर्ण होने वाले छात्र इस देश और समाज को कहाँ ले जाएँगे, यह एक विचारणीय प्रश्न है ।

समाधान के उपाय – शैक्षिक अराजकता के बढ़ते जा रहे तूफान को शिक्षक और छात्रों के बीच संतुलित और सम्मानजनक संबंधों से ही नियंत्रित किया जा सकता है। समाज और प्रशासन को भी अपने दायित्वों को ईमानदारी से निभाना होगा । कबीरदास ने गुरु-शिष्य संबंध का आदर्श स्वरूप प्रस्तुत किया है इसी में शिक्षा जगत का कुशल-क्षेम निहित है

शिष को ऐसा चाहिए, गुरु को सरबस देय।
गुरु को ऐसा चाहिए, शिष से कछु न लेय ॥

39. भारतीय नारी : प्रगति की ओर
अथवा
नारी : सशक्तिकरण

संकेत बिन्दु

  1. नारी सशक्तिकरण से आशय
  2. वर्तमान समाज में नारी की स्थिति
  3. नारी सशक्तिकरण हेतु किये जा रहे प्रयास
  4. भविष्य की नारी
  5. उपसंहार ।

नारी शक्तिकरण से आशय – प्राचीन भारत में नारी को समाज तथा परिवार में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। उस समय स्त्रियाँ सुशिक्षित और समर्थ होती थीं । समाज और राज्य के संचालन में भी उनका योगदान होता था । भारत में पराधीनता के प्रवेश के साथ ही नारी का पतन आरम्भ हो गया। उसकी स्वतंत्रता प्रतिबंधित हो गई, उसको शिक्षा प्राप्त करने तथा देश-समाज के प्रति कर्तव्यपालन से रोक दिया गया। वह अशक्त और असमर्थ हो गई ।

स्वाधीन भारत के लिए नारी की अशक्तता कदापि हितकर नहीं । वह देश के नागरिकों की आधी संख्या है । उनके बिना देश का भविष्य उज्जवल हो ही नहीं सकता । अतः नारी के सबल, शिक्षित और समर्थ बनाने की आवश्यकता को गहराई से महसूस किया गया। उसको शिक्षा प्राप्त करने, घर से बाहर जाकर काम करने, समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने के लिए अवसर दिए जाना जरूरी हो गया। घर से बाहर कार्यालयों, उद्योगों, राजनैतिक संस्थानों में नारी को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाना राष्ट्र की आवश्यकता बन चुका है। नारी के सशक्त बनाने का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है परन्तु संसद तथा विधान सभाओं में उसके लिए स्थान आरक्षित होना अभी भी शेष है ।

नारी को सशक्त बनाने के प्रयास हो रहे हैं। उद्योग व्यापार, उच्चशिक्षा वैज्ञानिक शोध एवं प्रशासन के क्षेत्रों वह निरन्तर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। स्थानीय शासन में उसे 33 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त हो चुका है। संसद और विधानसभाओं भी उसे आरक्षण प्राप्त होना सुनिश्चित है। अच्छी शिक्षा प्राप्त होने पर वह स्वयं ही सशक्त हो जायेगी।

वर्तमान समाज में नारी की स्थिति – स्वतंत्र भारत की नारी ने अंगड़ाई ली है। वह फिर से अपने पूर्व-गौरव को पाने के लिए बेचैन हो उठी है। शिक्षा व्यवस्था, विज्ञान, सैन्य सेवा, चिकित्सा, कला, राजनीति, हर क्षेत्र में वह पुरुष के कदम से कदम मिलाकर चल रही है। वह सरपंच है, जिला अध्यक्ष है, मेयर है, मुख्यमंत्री है, प्रधानमंत्री है, राष्ट्रपति है । लेकिन अभी तक तो यह सौभाग्य नगर-निवासिनी नारी के ही हिस्से में दिखाई देता है । उसकी ग्रामवासिनी करोड़ों बहनें अभी भी अशिक्षा, उपेक्षा और पुरुष के अत्याचार झेलने को विवश हैं। एक ओर नारी के सशक्तीकरण (समर्थ बनाने) की, उसे संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बातें हो रही हैं तो दूसरी और पुरुष वर्ग उसे नाना प्रकार के पाखण्डों और प्रलोभन से छलने में लगा हुआ है।

सशक्तिकरण हेतु किये जा रहे प्रयास – भारतीय नारी का भविष्य उज्ज्वल है। वह स्वावलम्बी बनना चाहती है। अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाना चाहती है। सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है।

देश की प्रमुख सशक्तं नारियों का परिचय – स्वतंत्रता के लिए होने वाले आन्दोलन में अनेक नारियों ने अपना योगदान देकर नारी-शक्ति का परिचय दिया था। रानी लक्ष्मीबाई से कौन अपरिचित है। सरोजिनी नायडू, विजय लक्ष्मी पंडित, सुचेता कृपलानी, राजकुमारी अमृत कौर, अरुणा आसफअली आदि को कौन नहीं जानता। भारत की इंदिरा गांधी, जय ललिता, मायावती, महादेवी, मन्नू भंडारी, लता मंगेशकर, सानिया मिर्जा, बछेन्द्री पाल, कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स आदि नारियों ने विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सफलता अर्जित की है। देशीय और अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारतीय नारियों ने कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इनमें मल्ल विद्या (पहलवानी) का उल्लेख विशेष उल्लेखनीय है।

उपसंहार: पुरुष और नारी के संतुलित सहयोग में ही दोनों की भलाई है। दोनों एक-दूसरे को आदर दें तथा एक-दूसरे को आगे बढ़ाने में सहयोग करें । इसी से भारत का भविष्य उज्जवल होगा।

40. शिक्षित नारी की भागीदारी
अथवा
नारी जागरण का आधार : शिक्षा
अथवा
समाज निर्माण में नारी की भूमिका

संकेत बिन्दु –

  1. भारतीय संस्कृति में नारी का स्थान
  2. नारी की वास्तविक स्थिति
  3. नारी शिक्षा का महत्व
  4. शिक्षित नारी की भूमिका
  5. शिक्षित नारी का आदर्श स्वरूप ।

भारतीय संस्कृति में नारी का स्थान – आदिकाल से हमारा देश नारीपूजक रहा है तभी तो नारायण के पूर्व लक्ष्मी, के पूर्व भवानी, राम के पूर्व सीता और कृष्ण के पूर्व राधा का नामोच्चारण होता है । भारतीय समाज में विदुषी महिलाओं की भी कोई कमी नहीं रही । रणभूमि में भी भारतीय नारी ने अपने जौहर दिखाये, लेकिन दैनिक जीवन में भारतीय नारी कभी नर के समकक्ष सम्मान की अधिकारिणी नहीं बन पायी ।

नारी की वास्तविक स्थिति – समाज को पचास प्रतिशत भाग नारी वर्ग है किन्तु समाज के निर्माण में उसकी भूमिका को । प्रायः नजरन्दाज किया जाता है, सच तो यह है कि समाज का पुरुष वर्ग नारी की भूमिका का विस्तार नहीं चाहता । उसे भय. है कि नारी-अभ्युदय से उसका महत्त्व और एकाधिकार समाप्त हो जाएगा । अशिक्षा और रूढ़िवादी दृष्टिकोण ने नारी की स्थिति को शोचनीय बना रखा है ।

नारी शिक्षा का महत्व – शिक्षित नारी तो दो कुलों का उद्धार करती है । नारी को अशिक्षित रखकर राष्ट्र की आधी क्षमता का विनाश किया जा रहा है । शिक्षित नारी ही बच्चों का लालन-पालन ठीक ढंग से कर पाती है । वह बच्चों में अच्छे संस्कार उत्पन्न कर सकती है । उसे समाज में सभ्य ढंग से जीना आता है । शिक्षा, नारी में आत्मविश्वास पैदा करती है और बुरे दिनों में उसकी सबसे विश्वसनीय सहायिका बनती है ।

शिक्षित नारी की भूमिका – नारी-शिक्षा को देश में जितना भी प्रचार-प्रसार हुआ है, उसका श्रेष्ठ परिणाम सभी के सामने है । आज नारी जीवन के हर क्षेत्र में पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर कार्य करने की क्षमता रखती है । शिक्षा, विज्ञान, राजनीति, धर्म, समाज सेवा और सेना में भी आज नारी अपनी प्रशंसनीय भूमिका निभा रही है । ग्रामीण क्षेत्रों में भी आज नारी-चेतना करवटें ले रही है । उनको स्थायी स्वशासन में 30% भागीदारी का अधिकार मिल गया है किन्तु यहाँ भी अशिक्षा ने उसकी भूमिका को पृष्ठभूमि में डाल रखा है । पंचायतों में उसके प्रतिनिधि ही भाग ले रहे हैं । नारी आज सफल व्यवसायी है, प्रबन्धक है, अध्यापक है, वकील है, मंत्री है, प्रधानमंत्री है, राज्यपाल है, मुख्यमंत्री है, वैज्ञानिक है तथा साहसिक अंतरिक्ष अभियानों में पुरुषों से होड़ लेती हैं । कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं ।

शिक्षित नारी का आदर्श स्वरूप – भारतीय नारी ने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा को प्रमाणित किया। है । कुछ महिलाएँ शिक्षित होने का अर्थ कतिपय हास्यास्पद क्रिया-कलापों से जोड़ लेती हैं । उनके अनुसार विशेष वेशभूषा अपनाना, फैशन-परेडों और किटी-पार्टियों में भाग लेना ही शिक्षा और प्रगतिशीलता की निशानी है। भारतीय नारी के कुछ महत्त्वपूर्ण दायित्व हैं उसे अपने विशाल नारी-समाज को आगे बढ़ाना है । देश की ग्रामीण बहिनों को उनके अज्ञान एवं अन्धविश्वासों से मुक्ति दिलानी है । हमें अपनी खेल सम्बन्धी महान परम्पराओं की पुनः स्थापना करनी है ।

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