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RBSE Class 10 Sanskrit Chapter 10 Solutions in Hindi — अन्योक्तयः | शेमुषी भाग-2 हल, अनुवाद

📅 अंतिम अपडेट: 2026-09-10📖 RBSE/NCERT Solutions
भाग 1 — समाधान (Textbook Solutions)

📖 1. समाधान: पाठ्यपुस्तकस्य प्रश्नोत्तराणि (अभ्यासः हल)

राजस्थान बोर्ड कक्षा 10 संस्कृत (शेमुषी भाग-2) — पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के प्रामाणिक एवं विस्तृत उत्तर।

पाठ्यपुस्तकस्य प्रश्नोत्तराणि

प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत-

(क) कस्य शोभा एकेन राजहंसेन भवति?

उत्तरम्-सरसः।

(ख) सरसः तीरे के वसन्ति?

उत्तरम्-बकसंहसम्।

(ग) कः पिपासितः म्रियते? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)

उत्तरम्-चातकः।

(घ) के रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते?

उत्तरम्-भ्रमराः।

(ङ) अम्भोदाः कुत्र सन्ति?

उत्तरम्-गगने।

प्रश्न 2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत-

(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए-)

(क) सरसः शोभा केन भवति?

(सरोवर की शोभा किससे होती है?)

उत्तरम्-सरसः शोभाः राजहंसेन भवति।

(सरोवर की शोभा राजहंस से होती है।)

(ख) चातकः किमर्थं मानी कथ्यते?

(चातक किसलिए स्वाभिमानी कहा जाता है?)

उत्तरम्-चातकः केवलं पुरन्दरं याचते अथवा वने पिपासितो म्रियते।

(चातक केवल इन्द्र से याचना करता है अथवा वन में ही प्यासा मर जाता है।)

(ग) मीनः कदा दीनां गतिं प्राप्नोति?

(मछली कब दीन गति को प्राप्त करती है?)

उत्तरम्-यदा सरोवरः सङ्कोचमच्छति तदा मीनः दीनां गतिं प्राप्नोति।

(जब सरोवर संकुचित हो जाता है तब मछली दीन गति को प्राप्त करती है।)

(घ) कानि पूरयित्वा जलदः रिक्तः भवति?

(किन्हें भरकर बादल रिक्त हो जाता है?)

उत्तरम्-नानानदीनदशतानि पूरयित्वा जलदः रिक्तः भवति।

(अनेक नदियों और सैकड़ों नदों को भरकर बादल रिक्त हो जाता है।)

--- [ पृष्ठ संख्या: 136 ] ---

123

(ङ) वृष्टिभिः वसुधां के आर्द्रयन्ति?

(वर्षा के जल से पृथ्वी को कौन भिगो देते हैं?)

उत्तरम्—केचित् अम्भोदाः वृष्टिभिः वसुधां आर्द्रयन्ति।

(वर्षा के जल से पृथ्वी को कुछ बादल भिगो देते हैं।)

---

प्रश्न 3. अधोलिखितवाक्येषु रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत— *(प्रश्न बैंक)*

(क) मालाकारः <u>तोयैः</u> तरोः पुष्टिं करोति।

(ख) भृङ्गाः <u>रसालमुकुलानि</u> समाश्रयन्ते।

(ग) <u>पतङ्गाः</u> अम्बरपथम् आपेदिरे।

(घ) <u>जलदः</u> नाना नदीनदशतानि पूरयित्वा रिक्तोऽस्ति।

(ङ) चातकः <u>वने</u> वसति।

उत्तरम्—प्रश्ननिर्माणम्—

(क) मालाकारः कैः तरोः पुष्टिं करोति?

(ख) भृङ्गाः कानि समाश्रयन्ते?

(ग) के अम्बरपथम् आपेदिरे?

(घ) कः नाना नदीनदशतानि पूरयित्वा रिक्तोऽस्ति?

(ङ) चातकः कुत्र वसति?

---

प्रश्न 4. अधोलिखितयोः श्लोकयोः भावार्थं स्वीकृतभाषया लिखत—

(अ) तोयैरल्पैरपि................................वारिदेन।

(आ) रे रे चातक................................दीनं वचः।

उत्तरम्—[नोट—पूर्व में पाठ के सभी श्लोकों का हिन्दी-अनुवाद एवं भावार्थ दिया जा चुका है, वहाँ से देखकर लिखिए।]

---

प्रश्न 5. अधोलिखितयोः श्लोकयोः अन्वयं लिखत—

(अ) आपेदिरे................................कतमां गतिमभ्युपैति॥

(आ) आश्वास्य................................सैवा तवोत्तमा श्रीः॥

उत्तरम्—[नोट—पूर्व में पाठ के सभी श्लोकों के अन्वय दिए जा चुके हैं, वहाँ से देखकर लिखिए।]

---

प्रश्न 6. उदाहरणमनुसृत्य सन्धिं/सन्धिविच्छेदं वा कुरुत—

(i) यथा— अन्य + उक्तयः = अन्योक्तयः

उत्तरम्—

(क) निपीतानि + अम्पूनि = निपीतान्यम्बूने

(ख) कृत + उपकारः = कृतोपकारः

(ग) तपन + उष्णतप्तम् = तपनोष्णतप्तम्

(घ) तव + उत्तमा = तवोत्तमा

(ङ) न + एतादृशाः = नैतादृशाः

(ii) यथा— पिपासितः + अपि = पिपासितोऽपि

उत्तरम्—

(क) कः + अपि = कोऽपि

(ख) रिक्तः + असि = रिक्तोऽसि

(ग) मीनः + अयम् = मीनोऽयम्

(घ) सर्वे + अपि = सर्वेऽपि

(iii) यथा— सरसः + भवेत् = सरसो भवेत्

उत्तरम्—

(क) खगः + मानी = खगो मानी

(ख) मीनः + नु = मीनो नु

(ग) पिपासितः + वा = पिपासितो वा

(घ) पुरतः + मा = पुरतो मा

(iv) यथा— मुनिः + अपि = मुनिरपि

उत्तरम्—

(क) तोयैः + अल्पैः = तोयैरल्पैः

--- [ पृष्ठ संख्या: 137 ] ---

(ख) अल्पैः + अपि = अल्पैरपि

(ग) तरोः + अपि = तरोरपि

(घ) वृष्टिभिः + आर्द्रयन्ति = वृष्टिभिराद्रयन्ति।

प्रश्न 7. उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितैः विग्रहपदैः समस्तपदानि रचयत-

उत्तरम्-

विग्रहपदानि

समस्त पदानि

यथा-पीतं च तत् पङ्कजम्

पीतपङ्कजम्

(क) राजा च असौ हंसः

राजहंसः

(ख) भीमः च असौ भानुः

भीमभानुः

(ग) अम्बरम् एव पन्थाः

अम्बरपथम्

(घ) उत्तमा च इयम् श्रीः

उत्तमश्रीः

(ङ) सावधानं च तत् मनः, तेन

सावधानमनसा

भाग 2 — हिन्दी अनुवाद एवं पाठ-सार (Hindi Anuvaad & Notes)

📝 2. हिन्दी-अनुवादः: अन्वय, शब्दार्थ व सप्रसंग सरलार्थ

प्रत्येक श्लोक एवं गद्यांश का संस्कृत अन्वय, कठिन शब्दार्थ, सप्रसंग हिन्दी अनुवाद एवं व्याकरण/भाषिक कार्यम्।

पाठ परिचय- अन्योक्ति अर्थात् किसी की प्रशंसा अथवा निन्दा अप्रत्यक्ष रूप से अथवा किसी बहाने से करना। जब किसी प्रतीक या माध्यम से किसी के गुण की प्रशंसा या दोष की निन्दा की जाती है, तब वह पाठकों के लिए अधिक ग्राह्य होती है। प्रस्तुत पाठ में ऐसी ही सात अन्योक्तियों का सङ्कलन है जिनमें राजहंस, कोयल, मेघ, मालाकार, सरोवर तथा चातक के माध्यम से मानव को सद्‌वृत्तियों एवं सत्कर्मों के प्रति प्रवृत्त होने का सन्देश दिया गया है।

अन्वय, कठिन-शब्दार्थ, सप्रसंग हिन्दी अनुवाद/भावार्थ एवं पठितावबोधनम्-

(1)

एकेन राजहंसेन या शोभा सरसो भवेत्।

न सा बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना॥

अन्वयः- एकेन राजहंसेन सरसः या शोभा सरसो भवेत्। परितः तीरवासिना बकसहस्रेण सा (शोभा) न (भवति)॥

कठिन शब्दार्थ-

शब्द

अर्थ

सरसः

सरोवर की, तालाब की (तड़ागस्य)

परितः

चारों ओर (सर्वतः)

तीरवासिना

किनारे पर निवास करने वाले के द्वारा (तटनिवासिना)

बकसहस्रेण

हजारों बगुलों से (बकानां सहस्रेण)

प्रसंग- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी-द्वितीयो भागः' के 'अन्योक्तयः' शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्य में राजहंस के माध्यम से गुणवान् व्यक्ति की प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि-

हिन्दी अनुवाद/भावार्थ- एक राजहंस के द्वारा तालाब की जो शोभा होती है, वह शोभा चारों ओर किनारे पर निवास करने वाले हजारों बगुलों से भी नहीं होती है।

आशय यह है कि एक गुणवान् व्यक्ति से ही सम्पूर्ण कुल सुशोभित हो जाता है, हजारों मूर्खों से नहीं।

पठितावबोधनकार्यम्-

निर्देशः- उपर्युक्तं पद्यांशं पठित्वा दत्तप्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतेन लिखत-

प्रश्नाः-

(क) एकपदेन उत्तरत-

सरसः शोभा केन भवति?

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-

सरसः शोभा केन न भवति?

(ग) भाषिककार्यम्-

(i) 'शोभा' इति कर्तृपदस्य पद्यांशे क्रियापदं किम्?

(ii) 'तीरवासिना' इति विशेषणस्य विशेष्यपदं किम्?

उत्तराणि-

(क) राजहंसेन

(ख) सरसः शोभा परितः तीरवासिना बकसहस्रेण न भवति।

(ग) (i) भवेत्। (ii) बकसहस्रेण।

(2)

भुक्ता मृणालपटली भवता निपीता-

न्यम्बूनि यत्र नलिनानि निषेवितानि।

रे राजहंस! वद तस्य सरोवरस्य,

कृत्येन केन भवितासि कृतोपकारः॥

अन्वयः- यत्र भवता मृणालपटली भुक्ता, अम्बूनि निपीतानि नलिनानि निषेवितानि। रे राजहंस! तस्य सरोवरस्य केन कृत्येन कृतोपकारः भविता असि, वद॥

--- [ पृष्ठ संख्या: 131 ] ---

कठिन शब्दार्थाः

शब्द

अर्थ

भवता

आपके द्वारा (त्वया)

मृणालपटली

कमलनाल का समूह (कमलनालसमूहः)

भुक्ता

भोगा गया है (खादिता)

अम्बूनि

जल (जलानि)

निपीतानि

भली-भाँति पीया गया (निःशेषेण पीतानि)

नलिनानि

कमलों को (कमलानि)

निषेवितानि

सेवन किये गये (सेवितानि)

कृत्येन

कार्य से (कार्येण)

कृतोपकारः

प्रत्युपकार करने वाला (कृतः उपकारः येन सः)

भविता

होगा (भविष्यति)

वद

बोलो (कथय)

प्रसंग—प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी-द्वितीयो भागः' के 'अन्योन्यतः' शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्य में सरोवर का उपभोग करने वाले राजहंस के माध्यम से हमें समाज का प्रत्युपकार करने की प्रेरणा दी गई है।

हिन्दी अनुवाद/भावार्थ—(कवि कहता है कि) अरे राजहंस! जहाँ आपके द्वारा कमलनाल के समूह को भोगा (खाया) गया है, जल को भली-भाँति पीया गया है तथा कमलों का सेवन किया गया है, उस सरोवर का किस कार्य से प्रत्युपकार करने वाले बनोगे, बोलो। अर्थात् उस तालाब के उपकार को तुम कैसे चुकाओगे।

पठितावबोधनकार्यम्—

प्रश्नाः—

(क) एकपदेन उत्तरत— (प्रश्न बैंक)

राजहंसेन कानि निपीतानि?

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत—

राजहंसेन सरोवरस्य का भुक्ता? तथा सः कस्य कृतोपकारकः भवति?

(ग) भाषिककार्यम्—

(i) 'जलानि' इति पदस्य अत्र पर्यायपदं किम्?

(ii) 'भवता' इति सर्वनामपदस्थाने संज्ञापदं लिखत।

उत्तराणि—

(क) अम्बूनि।

(ख) राजहंसेन सरोवरस्य मृणालपटली भुक्ता। तथा सः सरोवरस्य कृतोपकारकः भवति।

(ग) (i) अम्बूनि। (ii) राजहंसेन।

( 3 )

श्लोकः

तोयैरल्पैरपि करुणया भीमभानौ निदाघे,

मालाकार! व्यरचि भवता या तरोरस्य पुष्टिः।

सा किं शक्या जनयितुमिह प्रावृषेण्येन वारि,

धारासारानपि विकिरता विश्वतो वारिदेन॥

अन्वयः—हे मालाकार! भीमभानौ निदाघे अल्पैः तोयैः अपि भवता करुणया अस्य तरोः या पुष्टिः व्यरचि। वाराम् प्रावृषेण्येन विश्वतः धारासारान् अपि विकिरता वारिदेन इह जनयितुम् सा (पुष्टिः) किम् शक्या॥

कठिन शब्दार्थाः

शब्द

अर्थ

मालाकार

हे माली! (हे मालाकार!)

भीमभानौ

ग्रीष्मकाल में (सूर्य के अत्यधिक तपने पर) (भीमः भानुः यस्मिन् सः, तस्मिन्)

निदाघे

ग्रीष्मकाल में (ग्रीष्मकाले)

तोयैः

जल से (जलैः)

तरोः

वृक्ष का (वृक्षस्य)

पुष्टिः

पोषण (पुष्टा, वृद्धिः)

व्यरचि

किया गया (अरचयत्, कृता)

वाराम्

जलों के (जलानाम्)

प्रावृषेण्येन

वर्षाकालिक (वर्षाकालिकेन)

विश्वतः

सभी ओर से (सर्वतः)

धारासारान्

धाराओं का प्रवाह (धाराणां आसारान्)

विकिरता

बरसाते हुए (जलं वर्षयता)

वारिदेन

बादल के द्वारा (जलदेन)

जनयितुम्

उत्पन्न करने के लिए (उत्पादयितुम्)

शक्या

सम्भव है (सम्धवा)

प्रसंग—प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी-द्वितीयो भागः' के 'अन्योन्यतः' शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्य में वर्षाकालीन जल की अपेक्षा भीषण गर्मी में माली द्वारा वृक्षों को दिये गये जल को अत्यधिक लाभदायक बतलाते हुए विपत्ति के समय सहायता करने की प्रेरणा दी गई है।

हिन्दी अनुवाद/भावार्थ—(कवि कहता है कि) हे माली! सूर्य के अत्यधिक तपने पर भीषण ग्रीष्मकाल में अल्प जल से भी आपके द्वारा करुणा से इस वृक्ष का जो पोषण किया गया है। जलयुक्त वर्षाकाल में सभी ओर से जल की धाराओं का प्रवाह बरसाते हुए बादल के द्वारा भी क्या वह पोषण उत्पन्न किया जा सकता है, अर्थात् नहीं।

अर्थात् यहाँ वर्षाकाल में बादलों द्वारा बरसाए गए जल की अपेक्षा भीषण ग्रीष्मकाल में माली द्वारा वृक्ष में दिया गया जल अधिक लाभदायक बताया गया है। इस कथन के द्वारा असहाय एवं जरूरतमन्द निर्धन व्यक्तियों की सहायता करने की प्रेरणा दी गई है।

--- [ पृष्ठ संख्या: 132 ] ---

पठितावबोधनकार्यम्-

प्रश्नाः-

(क) एकपदेन उत्तरत-

अस्मिन् पद्यांशे कविः कस्य श्रमस्य प्रशंसां करोति?

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-

मालाकारेण निदाघे कैः तरोः पुष्टिः व्यरचि? तथा वर्षाकाले वारिदेन केन सदृशं श्रमं न कृतम्?

(ग) भाषिककार्यम्-

(i) 'ग्रीष्मकाले' इत्यस्य पद्यांशे पर्यायपदं किं प्रयुक्तम्?

(ii) 'अल्पैः तोयैः'-इत्यनयोः पदयोः विशेषणपदं किम्?

उत्तराणि-

(क) मालाकारस्य

(ख) मालाकारेण निदाघे अल्पैः तोयैः तरोः पुष्टिः व्यरचि। तथा वर्षाकाले वारिदेन मालाकारेण सदृशं श्रमं न कृतम्।

(ग) (i) निदाघे। (ii) अल्पैः।

(4)

श्लोकः

आपेदिरेऽम्बरपथं परितः पतङ्गाः,

भृङ्गा रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते।

सङ्कोचमञ्चति सरस्त्वयि दीनदीनो,

मीनो नु हन्त कतमां गतिमभ्युपैतु॥

अन्वयः- पतङ्गाः परितः अम्बरपथम् आपेदिरे, भृङ्गाः रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते। सरः त्वयि सङ्कोचम् अञ्चति, हन्त दीनदीनः मीनः नु कतमां गतिम् अभ्युपैतु।

शब्दार्थाः

शब्दः

अर्थः

पतङ्गाः

पक्षी (खगाः)

परितः

चारों ओर (सर्वतः)

अम्बरपथम्

आकाश-मार्ग को (आकाशमार्गम्)

आपेदिरे

प्राप्त कर लिए हैं (प्राप्तवन्तः)

भृङ्गाः

भँवरे (भ्रमराः)

रसालमुकुलानि

आम की मञ्जरियों को (रसालानां मुकुलानि)

समाश्रयन्ते

आश्रय लेते हैं (शरणं प्राप्नुवन्ति)

सरः

सरोवर (तडागः)

सङ्कोचम् अञ्चति

संकुचित होने पर (सङ्कोचं गच्छति)

हन्त

खेद है (खेदः)

मीनः

मछली (मत्स्यः)

कतमां

कितनी (काम्, कियत्)

अभ्युपैतु

प्राप्त करें (प्राप्नोतु)

प्रसंग- प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी-द्वितीयो भागः' के 'अन्योन्यतयः' शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्य में सरोवर को सम्बोधित करते हुए कवि ने मानव को संकुचित वृत्तियों का त्याग करने तथा सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त होने का वर्णन किया गया है।

हिन्दी अनुवाद/भावार्थ-(कवि कहता है कि) पक्षियों ने चारों ओर से आकाश मार्ग को प्राप्त कर लिया है अर्थात् घेर लिया है, भँवरे आम की मञ्जरियों पर आश्रय ले रहे हैं। हे सरोवर! तुम्हारे संकुचित होने (सूख जाने) पर बेचारी अत्यधिक दीन मछली कितनी गति को प्राप्त करे?

पठितावबोधनकार्यम्-

प्रश्नाः-

(क) एकपदेन उत्तरत-

भृङ्गाः कानि समाश्रयन्ते?

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-

कदा दीनदीनः मीनः गतिं न अभ्युपैति?

(ग) भाषिककार्यम्-

(i) 'समाश्रयन्ते' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?

(ii) 'मीनः' इति विशेष्यपदस्य पद्यांशे विशेषणं किम्?

उत्तराणि-

(क) रसालमुकुलानि।

(ख) यदा सरोवरः सङ्कोचं गच्छति तदा दीनदीनः मीनः गतिं न अभ्युपैति।

(ग) (i) भृङ्गाः। (ii) दीनदीनः।

(5)

एक एव खगो मानी वने वसति चातकः।

पिपासितो वा म्रियते याचते वा पुरन्दरम्॥

--- [ पृष्ठ संख्या: 133 ] ---

अन्वयः—एक एव मानी खगः चातकः वने वसति। वा पिपासितः म्रियते पुरन्दरम् याचते वा॥

कठिन शब्दार्थाः

शब्दः

अर्थः

मानी

स्वाभिमानी (स्वाभिमानी)

खगः

पक्षी (पक्षी)

पिपासितः

प्यासा (तृषितः)

म्रियते

मर जाता है (मरणं प्राप्नोति)

पुरन्दरम्

इन्द्र को (इन्द्रम्)

याचते

याचना करता है (याचनां करोति)

वा

अथवा (अथवा)

प्रसंग—प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी-द्वितीयो भागः' के 'अन्योन्यतयः' शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्य में चातक पक्षी के माध्यम से स्वाभिमानी व्यक्ति के गुणों की प्रशंसा की गई है।

हिन्दी अनुवाद/भावार्थ—(कवि कहता है कि) एक ही स्वाभिमानी पक्षी चातक (पपीहा) वन में रहता है। वह या तो प्यासा ही मर जाता है अथवा केवल इन्द्र से ही याचना करता है। अर्थात् स्वाभिमानी प्राणी हर किसी से याचना नहीं करता है।

पठितावबोधनकार्यम्—

प्रश्नाः—(क) एकपदेन उत्तरं लिखत— [माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24 (सं.)]

क: पिपासितो वा म्रियते?

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत—

खगः कं याचते? तथा कीदृशः खगः म्रियते?

(ग) यथानिर्देशम् उत्तरं लिखत—

(i) खगो मानी इत्यत्र विशेषणपदं लिखत।

(ii) वने वसति चातकः। इत्यत्र वाक्ये कर्तृपदं किम्?

उत्तराणि—

(क) चातकः।

(ख) खगः पुरन्दरं याचते। तथा पिपासितो मानी खगः चातकः म्रियते।

(ग) (i) मानी। (ii) चातकः।

प्रश्नाः—(क) एकपदेन उत्तरत—

क: मानी खगः वर्तते?

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत—

क: एक एव वने वसति? तथा वने पिपासितः कः म्रियते?

(ग) भाषिककार्यम्—

(i) 'याचते' इति क्रियायाः पद्यांशे कर्तृपदं किम्?

(ii) 'इन्द्रम्' इति पदस्य पद्यांशे पर्यायपदं किम्?

उत्तराणि—

(क) चातकः।

(ख) मानी खगः चातकः एक एव वने वसति। तथा वने पिपासितः मानी चातकः म्रियते।

(ग) (i) चातकः। (ii) पुरन्दरम्।

(6)

श्लोकः

आश्वास्य पर्वतकुलं तपनोष्णतप्त-

मुद्दामदावविधुराणि च काननानि।

नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा,

रिक्तोऽसि यज्जलद! सैव तवोत्तमा श्रीः॥

अन्वयः—तपनोष्णतप्तम् पर्वतकुलम् आश्वास्य उद्दामदावविधुराणि काननानि च (आश्वास्य) नानानदीनदशतानि पूरयित्वा च हे जलद! यत् रिक्तः असि तव सा एव उत्तमा श्रीः॥

कठिन शब्दार्थाः

शब्दः

अर्थः

तपनोष्णतप्तम्

सूर्य की गर्मी से तपे हुए को (तपनस्य उष्ण तप्तम्)

पर्वतकुलम्

पर्वतों के समूह को (पर्वतानां कुलम्)

आश्वास्य

सन्तुष्ट करके (समाश्वास्य)

उद्दामदावविधुराणि

ऊँचे काष्ठों (वृक्षों) से रहित को (उन्नतकाष्ठरहितानि)

काननानि

वनों को (वनानि)

नानानदीनदशतानि

अनेक नदियों और सैकड़ों नदों को (नाना नद्यः, नदानां शतानि च)

पूरयित्वा

भरकर (पूर्णं कृत्वा)

जलद

बादल (हे वारिद!)

श्रीः

शोभा, सम्पत्ति (शोभा)

प्रसंग—प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी-द्वितीयो भागः' के 'अन्योन्यतयः' शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्य में मेघ के माध्यम से कवि ने दानशीलता के कारण निर्धन हुए व्यक्ति की प्रशंसा की है।

--- [ पृष्ठ संख्या: 134 ] ---

हिन्दी अनुवाद/भावार्थ—(कवि कहता है कि) सूर्य की गर्मी से तपे हुए पर्वतों के समूह को सन्तुष्ट करके और ऊँचे वृक्षों से रहित वनों को सन्तुष्ट करके तथा अनेक नदियों और सैकड़ों नदों को भरकर हे बादल! जो तुम रिक्त (खाली) हो गये हो, तुम्हारी वही उत्तम शोभा है।

पठितावबोधनकार्यम्—

प्रश्नाः—

(क) एकपदेन उत्तरत—

रिक्तता कस्य उत्तमा श्री:?

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत—

जलद: कीदृशानि काननानि पूरयति? तथा स: कीदृशं पर्वतकुलम् आश्वासयति?

(ग) भाषिककार्यम्—

(i) 'तव' इति सर्वनामपदं पद्यांशे कस्मै प्रयुक्तम्?

(ii) 'उत्तमा श्री:'-इत्यत्र विशेष्यपदं किमस्ति?

उत्तराणि—

(क) मेघस्य।

(ख) जलद: उद्दामदावविधुराणि काननानि पूरयति। तथा स: तपनोष्णतप्तं पर्वतकुलम् आश्वासयति।

(ग) (i) जलदाय/मेघाय। (ii) श्री:।

(7)

रे रे चातक! सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूयता-

मम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः।

केचिद् वृष्टिभिराद्र्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा,

यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः॥

अन्वयः— रे रे मित्र चातक! सावधानमनसा क्षणं श्रूयताम्, गगने हि बहव: अम्भोदा: सन्ति, सर्वे अपि एतादृशा: न (सन्ति) केचित् वसुधां वृष्टिभि: आर्द्रयन्ति, केचिद् वृथा गर्जन्ति, (त्वम्) यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरत: दीनं वच: मा ब्रूहि।

शब्दार्थाः

शब्दः

अर्थः

सावधानमनसा

ध्यान से (ध्यानेन)

श्रूयताम्

सुनिए (आकर्ण्यताम्)

गगने

आकाश में (आकाशे)

बहव:

बहुत (अनेके)

अम्भोदा:

बादल (मेघा:)

एतादृशा:

इस प्रकार के (एवं विधा:)

वसुधाम्

पृथ्वी को (पृथ्वीम्)

वृष्टिभि:

वर्षा से (वर्षाया: जलेन)

आर्द्रयन्ति

जल से भिगो देते हैं (जलेन क्लेदयन्ति)

वृथा

व्यर्थ (व्यर्थमेव)

गर्जन्ति

गर्जना करते हैं [गर्जनं (ध्वनिम्) कुर्वन्ति]

पुरत:

आगे, सामने (अग्रे)

वच:

वचन (वचनम्)

मा ब्रूहि

मत बोलो (न वद्)

प्रसंग— प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी-द्वितीयो भाग:' के 'अन्योन्यतय:' शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्य में कवि ने चातक पक्षी के माध्यम से हर किसी के सामने दीनतापूर्वक याचना नहीं करने की प्रेरणा दी है।

हिन्दी अनुवाद/भावार्थ— (कवि कहता है कि) हे मित्र चातक! ध्यानपूर्वक क्षणभर के लिए सुनिए, आकाश में बहुत बादल हैं, वे सभी इसी प्रकार के (वर्षा करने वाले) नहीं हैं, कुछ तो पृथ्वी को वर्षा के जल से भिगो देते हैं और कुछ व्यर्थ ही गर्जना करते हैं। अतः तुम जिस-जिसको देखते हो उस-उसके सामने दीनता युक्त वचन मत बोलो। अर्थात् हर-किसी के सामने दीनतापूर्वक याचना नहीं करनी चाहिए।

पठितावबोधनकार्यम्— (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)

प्रश्नाः—

(क) एकपदेन उत्तरत—

अम्भोदा: कुत्र सन्ति?

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत—

वृष्टिभि: वसुधां के आर्द्रयन्ति?

(ग) भाषिककार्यम्—

(i) "गर्जन्ति केचिद् वृथा।" इत्यत्र क्रियापदं किम्?

(ii) "दीनं वच:।" इत्यत्र विशेषणपदं किम्?

उत्तराणि—

(क) गगने।

(ख) वृष्टिभि: वसुधां मेघा: आर्द्रयन्ति।

(ग) (i) गर्जन्ति (ii) दीनम्।

--- [ पृष्ठ संख्या: 135 ] ---

अथवा

प्रश्नाः-(क) एकपदेन उत्तरत-

कविः 'मित्रम्' इति शब्देन कं सम्बोधयति?

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-

गगने सर्वे मेघाः कीदृशाः न सन्ति? तथा कस्य पुरतः दीनं वचः न ब्रूयात्?

(ग) भाषिककार्यम्-

(i) 'सन्ति' इति क्रियापदस्य पद्यांशे कर्तृपदं किम्?

(ii) 'वचः' इति विशेष्यपदस्य पद्यांशे विशेषणपदं किम्?

उत्तराणि-(क) चातकम्।

(ख) गगने सर्वे मेघाः जलदायकाः न सन्ति। तथा यः वृथा गर्जति तस्य पुरतः दीनं वचः न ब्रूयात्।

(ग) (i) अम्भोदाः। (ii) दीनम्।

भाग 3 — परीक्षा उपयोगी प्रश्न (Important Q&A)

3. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तराणि (Important Q&A & MCQs)

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), एकपदेन उत्तरत, पूर्णवाक्येन उत्तरत, प्रश्ननिर्माणम्, पाठ-सार-लेखनम् एवं परीक्षा उपयोगी व्याकरण।

I. बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः-

1. सरसः शोभा केन भवति?

(अ) राजहंसेन (ब) बकेन (स) गजेन (द) मकरेण

2. सरोवरस्य राजहंसेन कानि निषेवितानि?

(अ) अम्बूनि (ब) मत्स्याः (स) नलिनानि (द) पुष्पाणि

3. रसालमुकुलानि के समाश्रयन्ते?

(अ) पतङ्गाः (ब) भृङ्गाः (स) खगाः (द) मयूराः

4. सरसः तीरे के वसन्ति?

(अ) गजाः (ब) मकराः (स) सिंहाः (द) बकाः

5. मानी खगः कः?

(अ) चातकः (ब) कपोतः (स) मयूरः (द) पिकः

6. अम्भोदाः कुत्र सन्ति?

(अ) नगरे (ब) वने (स) गगने (द) पर्वते

7. नानीनदीनशतानि पूरयित्वा कः रिक्तः भवति?

(अ) सरोवरः (ब) जलदः (स) सूर्यः (द) सागरः

8. मालाकारः निदाघे कैः तरोः पुष्टिं करोति?

(अ) पुष्पैः (ब) दुग्धेन (स) बीजैः (द) तोयैः

9. के अम्बरपथम् आपेदिरे?

(अ) पतङ्गाः (ब) जनाः (स) वानराः (द) ताराः

10. पिपासित कः म्रियते?

(अ) कपोतः (ब) शुकः (स) चातकः (द) भ्रमरः

11. कस्य शोभा एकेन राजहंसेन भवति?

(अ) कूपस्य (ब) सरसः (स) गृहस्य (द) भवनस्य

12. सरोवरे सङ्कोचमम्बुनि कः दीनां गतिं प्राप्नोति?

(अ) बकः (ब) राजहंसः (स) गजः (द) मीनः

उत्तर-तालिका

1. (अ) 2. (स) 3. (ब) 4. (द) 5. (अ) 6. (स) 7. (ब) 8. (द) 9. (अ) 10. (स) 11. (ब) 12. (द)

--- [ पृष्ठ संख्या: 138 ] ---

II. शब्दार्थ-चयनम्-

प्रश्नः—अधोलिखितवाक्येषु रेखाङ्कितपदानां प्रसङ्गानुकूलम् उचितार्थं चित्वा लिखत-

1. एकेन राजहंसेन सरसः शोभा भवेत्।

(अ) तडागस्य (ब) जलस्य (स) कूपस्य (द) सरितायाः

2. भवता अम्बूनि निपीतानि।

(अ) आम्राणि (ब) अम्लानि (स) जलानि (द) फलानि

3. भवता नलिनानि निषेवितानि।

(अ) पत्राणि (ब) कमलानि (स) वनानि (द) पुष्पाणि

4. मालाकार! भवता निदाघे तरोः पुष्टिः कृता।

(अ) शरदकाले (ब) वर्षाकाले (स) वसन्तकाले (द) ग्रीष्मकाले

5. वारिदेन सा पुष्टिः जनयितुं न शक्या।

(अ) जलदेन (ब) कृष्केण (स) सूर्येण (द) इन्द्रेण

6. ....................याचते वा पुरन्दरम्।

(अ) विष्णुम् (ब) नृपम् (स) इन्द्रम् (द) धनिकम्

7. अम्भोदाः बहवो हि सन्ति।

(अ) वृक्षाः (ब) मेघाः (स) पर्वताः (द) हंसाः

8. उद्दामदावविधुराणि च काननानि।

(अ) पुष्पाणि (ब) पर्वताः (स) पशवः (द) वनानि

9. मीनो नु हन्त कतां गतिमभ्युपैतु।

(अ) मत्स्यः (ब) हंसः (स) बकः (द) चातकः

10. वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधाम्।

(अ) गगनम् (ब) पर्वतम् (स) पृथ्वीम् (द) नदीम्

उत्तराणि—

1. (अ) तडागस्य | 2. (स) जलानि | 3. (ब) कमलानि | 4. (द) ग्रीष्मकाले | 5. (अ) जलदेन | 6. (स) इन्द्रम् | 7. (ब) मेघाः | 8. (द) वनानि | 9. (अ) मत्स्यः | 10. (स) पृथ्वीम्।

III. भावार्थ लेखनम्-

प्रश्नः—अधोलिखितपद्याशानां हिन्दीभाषायां सप्रसङ्गं भावार्थ लिखत-

(i) एकेन राजहंसेन ........................................................................................ तीरवासिना।।

(ii) भुक्ता मृणालपटली ................................................................................... कृतोपकारः।।

(iii) तोयैरल्पैरपि ............................................................................................ वारिदेन।।

(iv) एक एव खगो ........................................................................................ वा पुरन्दरम्।।

(v) आपेदिरेऽम्बरपथं ................................................................................... गतिमभ्युपैतु।।

(vi) आश्वास्य पर्वतकुलं ................................................................................. तवोत्तमा श्रीः।।

उत्तरम्—[नोट—उपर्युक्त सभी पद्यांशों के सप्रसंग हिन्दी-भावार्थ पूर्व में पाठ के हिन्दी-अनुवाद के साथ ही दिये जा चुके हैं, वहाँ से देखकर लिखिए।]

IV. अन्वये रिक्तस्थानपूर्तिः-

प्रश्नः—निम्नलिखितपद्याशानां अन्वयामाश्रित्य रिक्तस्थानानि पूरयत-

(i) एकेन राजहंसेन ........................................................................................ तीरवासिना।।

( माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025 )

अन्वयः—एकेन (i) ........................ सरसः या (ii) ........................ भवेत्, (iii) ........................ तीरवासिना (iv) ........................ सा (शोभा) न (भवति)।

शोभा, परितः, राजहंसेन, बकसहस्रेण

--- [ पृष्ठ संख्या: 139 ] ---

उत्तरम्—एकेन राजहंसेन सरस: या शोभा भवेत्, परित: तीरवासिना बकससहस्रेण सा न (भवति)।

अथवा

मञ्जूषासहायतया अन्वयं पूरयत- (प्रश्न बैंक)

अन्वय:—एकेन राजहंसेन .................... या शोभा भवेत्, .................... तीरवासिना .................... सा न भवति।

उत्तरम्—एकेन राजहंसेन सरस: या शोभा भवेत्, परित: तीरवासिना बकससहस्रेण सा न भवति।

(ii) भुक्ता मृणालपटली ........................................................................................................ कृतोपकार:।।

अन्वय:—यत्र भवता (i) .................... भुक्ता, अम्बूनि (ii) ...................., नलिनानि (iii) ....................। रे राजहंस! तस्य सरोवरस्य केन (iv) .................... कृतोपकार: भविता असि, वद।

उत्तरम्—(i) मृणालपटली, (ii) निपीतानि, (iii) निषेवितानि, (iv) कृतये।

(iii) तोयैरल्पैरपि ........................................................................................................ वारिदेन।।

अन्वय:—हे मालाकार! भीमभानौ (i) .................... अल्पै: तोयै: अपि भवता (ii) ....................अस्य तरो: या (iii) .................... व्यरचि, वाराम् प्रावृषेण्येन विश्वत: (iv) .................... अपि विकिरता वारिदेन इह जनयितुम् सा (पुष्टि:) किम् शक्या।

उत्तरम्—(i) निदाघे, (ii) करुणया, (iii) पुष्टि:, (iv) धारासारान्।

(iv) आपेदिरेऽम्बर ........................................................................................................ गतिमभ्युपैतु।।

अन्वय:—पतङ्गा: परित: (i) ....................आपेदिरे, भृङ्गा: (ii) ....................समाश्रयन्ते। सर: त्वयि (iii) .................... अज्ज्चति, हन्त दीनहीन: (iv) ....................नु कतमां गतिम् अभ्युपैतु।

उत्तरम्—(i) अम्बरपथम्, (ii) रसालमुकुलानि, (iii) सङ्कोचम्, (iv) मीन:।

(v) एक एव खगो ........................................................................................................ पुरन्दरम्।।

अन्वय:—एक एव मानी (i) ....................वने (ii) ....................। (स:) वा पिपासित: (iii) .................... पुरन्दरम् (iv) ....................वा।

उत्तरम्—(i) खग: चातक:, (ii) वसति, (iii) म्रियते, (iv) याचते।

अथवा

एक एव खगो मानी वने वसति चातक:।

पिपासितो वा म्रियते याचते वा पुरन्दरम्।।

उपर्युक्त श्लोकस्यान्वयाश्रित्य रिक्तस्थानानि पूरयत-

एक एव (i) .................... (ii) ....................(iii) .................... वने वसति। वा (iv) .................... म्रियते पुरन्दरं याचते वा।

उत्तरम्—एक एव मानी खग: चातक: वने वसति। वा पिपासित: म्रियते पुरन्दरं याचते वा।

(vi) आश्वास्य पर्वतकुलं ........................................................................................................ तवोत्तमा श्री:।।

अन्वय:—तपोष्णतप्तम् (i) ....................आश्वास्य, उद्दामदावविधुराणि (ii) ....................च (आश्वास्य), नानानीनदशतानि (iii) ....................च हे जलद! यत् रिक्त: असि तव सा एव (iv) ....................श्री:।

उत्तरम्—(i) पर्वतकुलम्, (ii) काननानि, (iii) पूरयित्वा, (iv) उत्तमा।

(vii) रे रे चातक! ........................................................................................................ दीन वच:।।

अन्वय:—रे रे मित्र चातक! (i) ....................क्षणं श्रूयताम्, गगने हि बहव: (ii) ....................सन्ति, सर्वे अपि एतादृशा: न (सन्ति), केचित् (iii) ....................वृष्टिभि: आर्द्रयन्ति, केचिद् वृथा (iv) ...................., (त्वम्) यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरत: दीनं वच: मा ब्रूहि।

उत्तरम्—(i) सावधानमनसा, (ii) अम्बोदा:, (iii) धरणीं, (iv) गर्जन्ति।

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V. प्रश्ननिर्माणम्-

प्रश्नः- अधोलिखितवाक्येषु रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-

1. <u>राजहंसेन</u> सरसः शोभा भवेत्।

2. सरसः शोभा <u>राजहंसेन</u> भवति।

3. राजहंसेन <u>मृणालपटली</u> भुक्ता।

4. राजहंसेन सरसः <u>अम्बूनि</u> निपीतानि।

5. भवान् <u>सरोवरस्य</u> स्वकृत्येन कृतोपकारः भवतु।

6. मालाकारः <u>निदाघे</u> अल्पजलेनैव वृक्षान् सिञ्चति।

7. <u>मालाकारेण</u> करुणया अस्य तरोः पुष्टिः कृता।

8. पतङ्गाः परितः <u>अम्बरपथम्</u> आपेदिरे।

9. <u>भृङ्गाः</u> रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते।

10. सरोवरे <u>दीनदीनः मीनः</u> गतिं न अभ्युपैति।

उत्तरम्-प्रश्ननिर्माणम्-

1. केन सरसः शोभा भवेत्?

2. कस्य शोभा राजहंसेन भवति?

3. राजहंसेन का भुक्ता?

4. केन सरसः अम्बूनि निपीतानि?

5. भवान् कस्य स्वकृत्येन कृतोपकारः भवतु?

6. मालाकारः कदा अल्पजलेनैव वृक्षान् सिञ्चति?

7. केन करुणया अस्य तरोः पुष्टिः कृता?

8. पतङ्गाः परितः कम् आपेदिरे?

9. के रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते?

10. सरोवरे कः गतिं न अभ्युपैति?

--- [ पृष्ठ संख्या: 141 ] ---