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RBSE Class 10 Sanskrit Chapter 2 Solutions in Hindi — बुद्धिर्बलवती सदा | शेमुषी भाग-2 हल, अनुवाद

📅 अंतिम अपडेट: 2026-09-10📖 RBSE/NCERT Solutions
भाग 1 — समाधान (Textbook Solutions)

📖 1. समाधान: पाठ्यपुस्तकस्य प्रश्नोत्तराणि (अभ्यासः हल)

राजस्थान बोर्ड कक्षा 10 संस्कृत (शेमुषी भाग-2) — पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के प्रामाणिक एवं विस्तृत उत्तर।

प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत-

(क) बुद्धिमती कुत्र व्याघ्रं ददर्श? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)

(ख) भामिनी कया विमुक्ता? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)

(ग) सर्वदा सर्वकार्येषु का बलवती?

(घ) व्याघ्रः कस्मात् बिभेति?

(ङ) प्रत्युत्पन्नमतिः बुद्धिमती किम् आक्षिपन्ती उवाच?

उत्तराणि-

(क) गहनकानने।

(ख) निजबुद्ध्या। (ग) बुद्धिः।

(घ) मानुषात्। (ङ) जम्बुकम्।

प्रश्न 2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत-

(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए।)

(क) बुद्धिमती केन उपेता पितृगृहं प्रति चलिता?

(बुद्धिमती किसके साथ पिता के घर की ओर चल दी?)

उत्तरम्- बुद्धिमती पुत्रद्वयोपेता पितृगृहं प्रति चलिता।

(बुद्धिमती दो पुत्रों के साथ पिता के घर की ओर चल दी।)

(ख) व्याघ्रः किं विचार्य पलायितः?

(बाघ क्या सोचकर भाग गया?)

उत्तरम्- व्याघ्रमारी काचिदियमिति विचार्य व्याघ्रः पलायितः।

(‘यह कोई बाघ को मारने वाली है’-ऐसा सोचकर बाघ भाग गया।)

(ग) लोके महतो भयात् कः मुच्यते?

(संसार में महान् भय से कौन मुक्त हो जाता है?)

उत्तरम्- लोके महतो भयात् बुद्धिमान् मुच्यते।

(संसार में महान् भय से बुद्धिमान् मुक्त हो जाता है।)

--- [ पृष्ठ संख्या: 32 ] ---

(घ) जम्बुकः किं वदन् व्याघ्रस्य उपहासं करोति?

(गीदड़ क्या कहकर बाघ का उपहास करता है?)

उत्तरम्—"त्वं मानुषादपि बिभेषि?" इति वदन् जम्बुकः व्याघ्रस्य उपहासं करोति।

("तुम मनुष्य से भी डरते हो"—यह कहकर गीदड़ बाघ का उपहास करता है।)

(ङ) बुद्धिमती शृगालं किम् उक्तवती?

(बुद्धिमती ने सियार से क्या कहा?)

उत्तरम्—"रे धूर्त! त्वया मह्यं पुरा व्याघ्रत्रयं दत्तम्। विश्वासाद्यैकमानीय कथं यासि वदाधुना।" इति बुद्धिमती शृगालम् उक्तवती।

('अरे धूर्त! तुमने मुझे पहले तीन बाघ दिये थे। विश्वास दिलाकर अब एक (बाघ) ही लाकर कैसे जा रहे हो, अब बोलो'—ऐसा बुद्धिमती ने सियार से कहा।)

प्रश्न 3. स्थूलपदान्याधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत— (प्रश्न बैंक)

(क) तत्र राजसिंहो नाम राजपुत्रः वसति स्म।

(ख) बुद्धिमती चपेटया पुत्रौ प्रहतवती।

(ग) व्याघ्रं दृष्ट्वा धूर्तः शृगालः अवदत्।

(घ) त्वं मानुषात् बिभेषि।

(ङ) पुरा त्वया मह्यं व्याघ्रत्रयं दत्तम्।

उत्तरम्—प्रश्ननिर्माणम्—

(क) तत्र किम् नाम राजपुत्रः वसति स्म?

(ख) बुद्धिमती कया पुत्रौ प्रहतवती?

(ग) कम् दृष्ट्वा धूर्तः शृगालः अवदत्?

(घ) त्वं कस्मात् बिभेषि?

(ङ) पुरा त्वया कस्मै व्याघ्रत्रयं दत्तम्?

प्रश्न 4. अधोलिखितानि वाक्यानि घटनाक्रमानुसारेण योजयत—

(क) व्याघ्रः व्याघ्रमारी इयमिति मत्वा पलायितः।

(ख) प्रत्युत्पन्नमतिः सा शृगालं आक्षिपन्ती उवाच।

(ग) जम्बुककृतोत्साहः व्याघ्रः पुनः काननम् आगच्छत्।

(घ) मार्गे सा एकं व्याघ्रम् अपश्यत्।

(ङ) व्याघ्रं दृष्ट्वा सा पुत्रौ ताडयन्ती उवाच—अधुना एकमेव व्याघ्रं विभज्य भुज्यताम्।

(च) बुद्धिमती पुत्रद्वयेन उपेता पितृगृहं प्रति चलिता।

(छ) 'त्वं व्याघ्रत्रयम् आनेतुं प्रतिज्ञाय एकमेव आनीतवान्।

(ज) गलबद्धशृगालकः व्याघ्रः पुनः पलायितः।

उत्तरम्—

(क) बुद्धिमती पुत्रद्वयेन उपेता पितृगृहं प्रति चलिता।

(ख) मार्गे सा एकं व्याघ्रम् अपश्यत्।

(ग) व्याघ्रं दृष्ट्वा सा पुत्रौ ताडयन्ती उवाच—अधुना एकमेव व्याघ्रं विभज्य भुज्यताम्।

(घ) व्याघ्रः व्याघ्रमारी इयमिति मत्वा पलायितः।

(ङ) जम्बुककृतोत्साहः व्याघ्रः पुनः काननम् आगच्छत्।

(च) प्रत्युत्पन्नमतिः सा शृगालं आक्षिपन्ती उवाच।

(छ) 'त्वं व्याघ्रत्रयम् आनेतुं प्रतिज्ञाय एकमेव आनीतवान्।

(ज) गलबद्धशृगालकः व्याघ्रः पुनः पलायितः।

प्रश्न 5. सन्धि/सन्धिच्छेदं वा कुरुत—

(क) पितृगृहम् - पितृ + गृहम्

(ख) एकैकः - एक + एकः

(ग) अन्योऽपि - अन्यः + अपि

(घ) इत्युक्त्वा - इति + उक्त्वा

(ङ) यत्रास्ते - यत्र + आस्ते

--- [ पृष्ठ संख्या: 33 ] ---

--- | ---

उत्तरम्— (क) पितृगृहम् - पितुः + गृहम्

(ख) एकैकः - एक + एकः

(ग) अन्योऽपि - अन्यः + अपि

(घ) इत्युक्त्वा - इति + उक्त्वा

(ङ) यत्रास्ते - यत्र + आस्ते

प्रश्न 6. अधोलिखितानां पदानाम् अर्थः कोष्ठकात् चित्वा लिखत—

(क) ददर्श - (दर्शितवान्, दृष्टवान्)

(ख) जगाद - (अकथयत्, अगच्छत्)

(ग) ययौ - (याचितवान्, गतवान्)

(घ) अतुम् - (खादितुम्, आविष्कर्तुम्)

(ङ) मुच्यते - (मुक्तो भवति, मग्नो भवति)

(च) ईक्षते - (पश्यति, इच्छति)

उत्तरम्— (क) दृष्टवान्, (ख) अकथयत्, (ग) गतवान्, (घ) खादितुम्, (ङ) मुक्तो भवति, (च) पश्यति।

प्रश्न 7. (अ) पाठात् चित्वा पर्यायपदं लिखत—

(क) वनम् - ....................

(ख) शृगालः - ....................

(ग) शीघ्रम् - ....................

(घ) पत्नी - ....................

(ङ) गच्छसि - ....................

उत्तरम्— (क) वनम् - काननम्

(ख) शृगालः - जम्बुकः

(ग) शीघ्रम् - तूर्णम्/सत्वरम्

(घ) पत्नी - भार्या

(ङ) गच्छसि - यासि

(आ) पाठात् चित्वा विपरीतार्थकं पदं लिखत—

(क) प्रथमः - ....................

(ख) उक्त्वा - ....................

(ग) अधुना - ....................

(घ) अवेला - ....................

(ङ) बुद्धिहीना - ....................

उत्तरम्— (क) प्रथमः - द्वितीयः

(ख) उक्त्वा - श्रुत्वा

(ग) अधुना - पश्चाद्

(घ) अवेला - वेला

(ङ) बुद्धिहीना - बुद्धिमती

भाषिकविस्तारः

ददर्श—दृश् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।

विभेषि—'भी' धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।

प्रहरन्ती—प्र + हृ धातु, शतृ प्रत्यय, स्त्रीलिंग प्र. वि. एकवचन।

गम्यताम्—गम् धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन।

ययौ—'या' धातु, लिट् लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन।

यासि—गच्छसि 'या' धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।

--- [ पृष्ठ संख्या: 34 ] ---

समास

समस्तपदम्

विग्रहः

गलबद्धश्रृगालः

गले बद्धः श्रृगालः यस्य सः।

प्रत्युत्पन्नमतिः

प्रत्युत्पन्ना मतिः यस्य सः।

जम्बुककृतोत्साहात्

जम्बुकेन कृतः उत्साहः यस्य सः-जम्बुककृतोत्साहः तस्मात्।

पुत्रद्वयोपेता

पुत्रद्वयेन उपेता।

भयाकुलचित्तः

भयेन आकुलः चित्तम् यस्य सः।

व्याघ्रमारी

व्याघ्रं मारयति इति।

गृहीतकरजीवितः

गृहीतं करे जीवितं येन सः।

भयङ्करा

भयं करोति या इति।

भाग 2 — हिन्दी अनुवाद एवं पाठ-सार (Hindi Anuvaad & Notes)

📝 2. हिन्दी-अनुवादः: अन्वय, शब्दार्थ व सप्रसंग सरलार्थ

प्रत्येक श्लोक एवं गद्यांश का संस्कृत अन्वय, कठिन शब्दार्थ, सप्रसंग हिन्दी अनुवाद एवं व्याकरण/भाषिक कार्यम्।

( बुद्धि सदा बलवती होती है। )

-शुकसप्ततिः

पाठ का परिचय- प्रस्तुत पाठ 'शुकसप्ततिः' नामक प्रसिद्ध कथाग्रन्थ से सम्पादित करके संकलित किया गया है। इसमें अपने दो छोटे-छोटे पुत्रों के साथ जंगल के रास्ते से पिता के घर जा रही बुद्धिमती नामक महिला के बुद्धिकौशल को दिखाया गया है जो सामने आए हुए शेर को भी डरा कर भगा देती है। यह कथा नीतिनिपुण शुक और सारिका की कथा के द्वारा सद्वृत्ति का विकास करने के लिए प्रेरित करती है।

कठिन शब्दार्थ, अन्वय, हिन्दी अनुवाद एवं पठितावबोधनम्-

(1)

अस्ति देउलाख्यो ग्रामः। तत्र राजसिंहः नाम राजपुत्रः वसति स्म। एकदा केनापि आवश्यककार्येण तस्य भार्या बुद्धिमती पुत्रद्वयोपेता पितृगृहं प्रति चलिता। मार्गे गहनकानने सा एकं व्याघ्रं ददर्श। सा व्याघ्रमागच्छन्तं दृष्ट्वा धाष्ट्र्यात् पुत्रौ चपेटया प्रहृत्य जगाद- "कथमेकैकशो व्याघ्रभक्षणाय कलहं कुरुथः? अयमेकस्तावद्विभज्य भुज्यताम्। पश्चाद अन्यो द्वितीयः कश्चिल्लक्ष्यते।"

शब्दार्थाः

शब्दः

अर्थः

देउलाख्यः

देउल नामक गाँव (देउल इत्यभिधः)

राजपुत्रः

राजकुमार (राजकुमारः)

भार्या

पत्नी (जाया)

पुत्रद्वयोपेता

दोनों पुत्रों के साथ (द्वाभ्याम् आत्मजाभ्यां सहिता)

पितृगृहम्

पिता के घर (पितृगृहं प्रति)

चलिता

चल पड़ी (प्रस्थिता)

कानने

जंगल में (वने)

ददर्श

देखा (अपश्यत्)

व्याघ्रम्

बाघ को (शार्दूलम्)

आगच्छन्तं

आता हुआ (आयान्तम्)

दृष्ट्वा

देखकर (अवलोक्य)

धाष्ट्र्यात्

ढिठाई से, धृष्टता से (धृष्टापूर्वकम्)

चपेटया

थप्पड़ से (करप्रहारेण)

प्रहृत्य

प्रहार करके, थप्पड़ मारकर (प्रहारं कृत्वा)

जगाद

कहा (उक्तवती)

एकैकशः

एक-एक (एकम् एकम्)

भक्षणाय

खाने के लिए (खादितुम्)

कलहम्

झगड़ा (विवादम्)

विभज्य

बाँटकर, अलग-अलग करके (विभक्तं कृत्वा)

भुज्यताम्

खाइए (खाद्यताम्)

पश्चाद्

इसके बाद (तदनन्तरम्)

लक्ष्यते

देखा जाएगा (दृश्यते)

हिन्दी अनुवाद- देउल नामक एक गाँव था। वहाँ राजसिंह नामक राजकुमार रहता था। एक बार किसी आवश्यक कार्य से उसकी पत्नी बुद्धिमती अपने दोनों पुत्रों के साथ पिता के घर (पीहर) की ओर जा रही थी। रास्ते में गहन जंगल में उसने एक शेर को देखा। वह शेर को आता हुआ देखकर धृष्टता से दोनों पुत्रों के थप्पड़ मारकर बोली- "क्यों एक-एक शेर को खाने के लिए झगड़ा कर रहे हो? यह एक ही है, इसे बाँटकर खा लेना। बाद में अन्य कोई दूसरा देखा (ढूँढ़ा) जाएगा।"

पठितावबोधनकार्यम्-

निर्देशः- उपर्युक्तगद्यांशं पठित्वा एतदाधारितप्रश्नानामुत्तराणि यथानिर्देशं लिखत-

[ माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22 (सं.) ]

प्रश्नाः-

(क) एकपदेन उत्तरत-

राजसिंहः कुत्र वसति स्म?

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-

राजसिंहस्य भार्या आवश्यककार्येण कुत्र चलिता?

(ग) भाषिककार्यम्-

(i) 'तस्य भार्या पितृगृहं प्रति चलिता' अत्र 'तस्य' इति सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम्?

(ii) 'ददर्श' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?

उत्तराणि-

(क) देउलाख्ये ग्रामे।

(ख) राजसिंहस्य भार्या आवश्यककार्येण पुत्रद्वयोपेता पितृगृहं प्रति चलिता।

(ग) (i) राजसिंहाय। (ii) सा (बुद्धिमती)।

--- [ पृष्ठ संख्या: 29 ] ---

अथवा

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)

प्रश्नाः-

(क) एकपदेन उत्तरत-

मार्गे गहनकानने सा किं ददर्श?

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-

व्याघ्रामागच्छन्तं दृष्ट्वा धाष्टर्यात् पुत्रौ चपेटया प्रहृत्य सा बुद्धिमती किं जगाद?

(ग) भाषिककार्यम्-

(i) "एकं व्याघ्रं ददर्श" इत्यत्र विशेषणपदं किम्?

(ii) "व्याघ्रभक्षणाय कलहं कुरुथः" इत्यत्र क्रियापदं किम्?

उत्तराणि-

(क) एकं व्याघ्रम्।

(ख) व्याघ्रामागच्छन्तं दृष्ट्वा धाष्टर्यात् पुत्रौ चपेटया प्रहृत्य सा बुद्धिमती जगाद—"कथमेकैकशौ व्याघ्रभक्षणाय कलहं कुरुथः? अयमेकस्तावद्विभज्य भुज्यताम् पश्चाद् अन्यो द्वितीयः कश्चिल्लक्ष्यते।"

(ग) (i) एकम्। (ii) कुरुथः।

( 2 )

इति श्रुत्वा व्याघ्रमारी काचिदियमिति मत्वा व्याघ्रो भयाकुलचित्तो नष्टः।

निजबुद्ध्या विमुक्ता सा भयाद् व्याघ्रस्य भामिनी।

अन्योऽपि बुद्धिमान् लोके मुच्यते महतो भयात्॥

भयाकुलं व्याघ्रं दृष्ट्वा कश्चित् धूर्तः शृगालः हसन्नाह—"भवान् कुतः भयात् पलायितः?"

व्याघ्रः- गच्छ, गच्छ जम्बुक! त्वमपि किञ्चिद् गूढप्रदेशम्। यतो व्याघ्रमारीति या शास्त्रे श्रूयते तयाहं हन्तुमारब्धः परं गृहीतकरजीवितो नष्टः शीघ्रं तदग्रतः।

शृगालः- व्याघ्र! त्वया महतौतुकम् आवेदितं यन्मानुषादपि बिभेषि?

व्याघ्रः- प्रत्यक्षमेव मया सात्मपुत्रावेकैकशो मामन्तुं कलहयमानौ चपेटया प्रहरन्ती दृष्टा।

शब्दार्थाः

शब्दः

अर्थः

श्रुत्वा

सुनकर (आकर्ण्य)

व्याघ्रमारी

बाघ को मारने वाली (शार्दूल-हन्त्री)

मत्वा

मानकर (निश्चित्य)

भयाकुलचित्तो

भय से व्याकुल मन वाला, भयभीत (व्याकुलहृदयः)

नष्टः

भाग गया (पलायितः)

निजबुद्ध्या

अपनी बुद्धि से (आत्मनः प्रज्ञया)

भामिनी

रूपवती स्त्री (रूपवती स्त्री)

लोके

संसार में (संसारे)

मुच्यते

मुक्त हो जाता है (त्यज्यते)

शृगालः

सियार (जम्बुकः)

आह

कहा (अकथयत्)

श्रूयते

सुना जाता है (आकर्ण्यते)

कुतः

कहाँ से (कस्मात्)

जम्बुकः

सियार (शृगालः)

गूढप्रदेशम्

गुप्त प्रदेश में (गुप्तस्थाने)

हन्तुम्

मारने के लिए (मारयितुम्)

गृहीतकरजीवितः

हथेली पर प्राण लेकर (हस्ते प्राणान् नीत्वा)

अग्रतः

सामने से (सम्मुखात्)

महतौतुकम्

महान् आश्चर्य से (अत्यधिकम् आश्चर्यकरम्)

आवेदितम्

बताया है (विज्ञापितम्)

मानुषादपि

मनुष्य से भी (मानवादिपि)

बिभेषि

डरते हो (भयाक्रान्तोऽसि)

प्रत्यक्षम्

सामने (सम्मुखम्)

सात्मपुत्रावेकैकशः

वह अपने दोनों पुत्रों को एक-एक करके (स्वात्मजौ एकैकं कृत्वा)

अत्तुम्

खाने के लिए (खादयितुम्)

कलहयमानौ

झगड़ा करते हुए दोनों को (कलहं कुर्वन्तौ)

प्रहरन्ती

मारती हुई, प्रहार करती हुई (प्रहार कुर्वन्तीम्)

दृष्टा

देखी गई (अवलोकिता)

श्लोक का अन्वयः- सा भामिनी निजबुद्ध्या व्याघ्रस्य भयाद् विमुक्ता। लोके अन्यः बुद्धिमान् अपि महतः भयात् मुच्यते।

हिन्दी अनुवादः- यह सुनकर यह कोई बाघ को मारने वाली स्त्री है, ऐसा मानकर बाघ भयभीत होकर भाग गया।

वह रूपवती स्त्री अपनी बुद्धि से बाघ के भय से मुक्त हो गई। संसार में अन्य बुद्धिमान् भी महान् भय से मुक्त हो जाता है। अर्थात् बुद्धिमत्ता से व्यक्ति महान् संकट से भी मुक्त हो जाता है।

भय से व्याकुल बाघ को देखकर कोई धूर्त सियार हँसता हुआ बोला—"आप किस भय से भाग रहे हो?"

बाघ- जाओ, सियार! तुम भी किसी गुप्त प्रदेश में चले जाओ। क्योंकि 'बाघ को मारने वाली स्त्री' ऐसा जो शास्त्र में सुना जाता है। वह मुझे मारने ही वाली थी किन्तु प्राण हथेली पर रखकर उसके सामने से मैं शीघ्र भाग आया हूँ।

सियार- हे बाघ! तुमने महान् आश्चर्य की बात बतलाई है कि तुम मनुष्य से भी डरते हो?

--- [ पृष्ठ संख्या: 30 ] ---

बाघ-मेरे द्वारा अपने सामने ही उसे अपने दोनों पुत्रों को एक-एक करके मुझे खाने के लिए झगड़ा करते हुए को थप्पड़ मारते हुए देखा गया है।

पठितावबोधनकार्यम्-

प्रश्नाः-

(क) एकपदेन उत्तरत-

क: भयाकुलचित्तो नष्ट:?

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-

किं मत्वा व्याघ्रो भयाकुलचित्तो नष्ट:?

(ग) भाषिककार्यम्-

(i) 'त्वया महत्कौतुकम् आवेदितम्' अत्र 'त्वया' सर्वनाम पदं कस्मै प्रयुक्तम्?

(ii) 'गच्छ' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?

उत्तराणि-

(क) व्याघ्र:।

(ख) व्याघ्रमारी काचिदियमिति मत्वा व्याघ्रो भयाकुलचित्तो नष्ट:।

(ग) (i) व्याघ्राय। (ii) त्वम्।

( 3 )

जम्बुकः-स्वामिन्! यत्रास्ते सा धूर्ता तत्र गम्यताम्। व्याघ्र! तव पुनः तत्र गतस्य सा सम्मुखमपीक्षते यदि, तर्हि त्वया अहं हन्तव्यः इति।

व्याघ्रः-शृगाल! यदि त्वं मां मुक्त्वा यासि तदा वेलाप्यवेला स्यात्।

जम्बुकः-यदि एवं तर्हि मां निजगले बद्ध्वा चल सत्वरम्। स व्याघ्रः तथा कृत्वा काननं ययौ।

शृगालेन सहितं पुनरायान्तं व्याघ्रं दूरात् दृष्ट्वा बुद्धिमती चिन्तितवती-जम्बुककृतोत्साहाद् व्याघ्रात् कथं मुच्यताम्? परं प्रत्युत्पन्नमतिः सा जम्बुकमाक्षिपन्त्यङ्गुल्या तर्जयन्त्युवाच-

रे रे धूर्त त्वया दत्तं मह्यं व्याघ्रत्रयं पुरा।

विश्वासाद्यैकमानीय कथं यासि वदाधुना॥

इत्युक्त्वा धाविता तूर्णं व्याघ्रमारी भयङ्करा।

व्याघ्रोऽपि सहसा नष्टः गलवद्धशृगालकः॥

एवं प्रकारेण बुद्धिमती व्याघ्राद् भयात् पुनरपि मुक्ताऽभवत्। अत एव उच्यते-

बुद्धिर्बलवती तन्वि सर्वकार्येषु सर्वदा॥

श्लोकयोः अन्वयः-

रे रे धूर्त! त्वया मह्यं पुरा व्याघ्रत्रयं दत्तम् विश्वास्य (अपि) अद्य एकम् आनीय कथं यासि इति अधुना वद॥

इति उक्त्वा भयङ्करा व्याघ्रमारी तूर्णं धाविता। गलवद्धशृगालकः व्याघ्रः अपि सहसा नष्टः॥

हे तन्वि! सर्वदा सर्वकार्येषु बुद्धिर्बलवती॥

शब्दार्थाः

शब्दः

अर्थः

यत्रास्ते

जहाँ है (यस्मिन् स्थाने स्थिता)

गतस्य

गये हुए के (प्राप्तस्य)

ईक्षते

देखती है (पश्यति)

हन्तव्यः

मार देना चाहिए (हनीयः)

मुक्त्वा

छोड़कर (परित्यज्य)

वेला

शर्त (समयः)

निजगले

अपने गले में (स्वकण्ठे)

बद्ध्वा

बाँधकर (संलग्नं कृत्वा)

सत्वरम्

शीघ्र (शीघ्रम्)

काननम्

जंगल में (वनम्)

ययौ

चला गया (गतवान्)

आयान्तम्

आते हुए को (आगच्छन्तम्)

आक्षिपन्ती

आक्षेप करती हुई, झिड़कती हुई, भर्त्सना करती हुई (आक्षेपं कुर्वन्ती)

तर्जयन्ती

धमकाती हुई, डाँटती हुई (प्रताडयन्ती)

उवाच

बोली (अवदत्)

पुरा

पहले (पूर्वे)

विश्वास्य

विश्वास दिलाकर (समाश्वास्य)

अद्य

आज (अधुना)

आनीय

लाकर (उपाहत्य)

यासि

जा रहे हो (गच्छसि)

भयङ्करा

भयानकता दिखलाती हुई (भीषणा)

तूर्णाम्

शीघ्र (शीघ्रम्)

धाविता

दौड़ी (अधावत्)

गलवद्धशृगालकः

गले में बँधे हुए शृगाल वाला (कण्ठे संलग्नशृगालयुक्तः)

तन्वि

कोमलाङ्गी (कोमलाङ्गि)

हिन्दी अनुवाद-

सियार- हे स्वामी! जहाँ वह धूर्ता स्त्री है वहाँ जाइए। हे बाघ! तुम्हारे फिर से वहाँ गये हुए के सामने यदि वह स्त्री देख भी लेवे तो तुम मुझे मार देना।

बाघ- हे सियार! यदि तुम मुझे छोड़कर चले जाओगे तो शर्त भी अशर्त (व्यर्थ) हो जायेगी।

सियार- यदि ऐसा है तो मुझे अपने गले में बाँधकर शीघ्र चलो।

--- [ पृष्ठ संख्या: 31 ] ---

वह बाघ वैसा ही करके जंगल में चला गया। सियार के साथ फिर से आते हुए बाघ को दूर से ही देखकर बुद्धिमती ने सोचा-सियार द्वारा उत्साहित किये गये बाघ से किस प्रकार मुक्त हुआ जाये? किन्तु प्रत्युत्पन्न बुद्धिवली वह स्त्री सियार को झिड़कती हुई और अंगुली से धमकाती हुई बोली-

अरे, अरे धूर्त! तुमने मेरे लिए पहले तीन बाघ दिये थे। विश्वास दिलाकर भी आज एक ही बाघ लाकर कैसे जा रहे हो, अब बोलो। ऐसा कहकर वह भयानक व्याघ्रमारी (बाघ को मारने वाली) शीघ्र ही दौड़ी। गले में बंधे हुए सियार वाला बाघ भी अचानक भाग गया।

इस प्रकार से वह बुद्धिमती स्त्री बाघ से उत्पन्न हुए भय से फिर से मुक्त हो गई। इसीलिए कहा गया है-

हे कोमलाङ्गी! हमेशा सभी कार्यों में बुद्धि ही बलवती होती है। बुद्धि के बल से असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं।

पठितावबोधनकार्यम्-

प्रश्नाः-

(क) एकपदेन उत्तरत-

कीदृशः व्याघ्रोऽपि सहसा नष्टः?

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-

किं दृष्ट्वा बुद्धिमती चिन्तितवती?

(ग) भाषिककार्यम्-

(i) ‘तर्हि त्वया अहं हन्तव्यः’ अत्र ‘अहम्’ इति सर्वनाम पदं कस्मै प्रयुक्तम्?

(ii) ‘ययौ’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम्?

उत्तराणि-

(क) गलबद्धश्रृगालकः।

(ख) श्रृगालेन सहितं पुनरायान्तं व्याघ्रं दृष्ट्वा बुद्धिमती चिन्तितवती।

(ग) (i) श्रृगालाय। (ii) व्याघ्रः।

भाग 3 — परीक्षा उपयोगी प्रश्न (Important Q&A)

3. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तराणि (Important Q&A & MCQs)

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), एकपदेन उत्तरत, पूर्णवाक्येन उत्तरत, प्रश्ननिर्माणम्, पाठ-सार-लेखनम् एवं परीक्षा उपयोगी व्याकरण।

I. बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः -

1. राजपुत्र-राजसिंहस्य भार्या आसीत्- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)

(अ) सत्यवती (ब) लक्ष्मीवती (स) भानुमती (द) बुद्धिमती

2. 'राजसिंहः नाम राजपुत्रः कस्मिन् ग्रामे निवसति स्म? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)

(अ) भानपुराख्यग्रामे (ब) देवपुराख्यग्रामे (स) देउलाख्यग्रामे (द) झरनाख्यग्रामे

3. राजसिंहः नाम राजपुत्रः वसति स्म- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)

(अ) जवलाख्यग्रामे (ब) देउलाख्यग्रामे (स) धवलाख्यग्रामे (द) न्वलाख्यग्रामे

4. सर्वकार्येषु सर्वदा का बलवती भवति? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)

(अ) रीतिः (ब) संस्कृतिः (स) बुद्धिः (द) नतिः

5. 'बुद्धिर्बलवती सदा' कथा कुतः संगृहीता? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)

(अ) शुकसप्ततिः (ब) बृहत्कथातः (स) पंचतन्त्रतः (द) धर्मतन्त्रतः

6. बुद्धिमती गहनकानने कं ददर्श? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2022)

(अ) सिंहम् (ब) चौरम् (स) वानरम् (द) व्याघ्रम्

7. सर्वदा सर्वकार्येषु का बलवती भवति? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2022)

(अ) बुद्धिमती (ब) बुद्धिः (स) भामिनी (द) शक्तिः

8. 'बुद्धिर्बलवती सदा' इति पाठः कस्मात् ग्रन्थात् संकलितः? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22; प्रश्न बैंक)

(अ) काकल्यः (ब) कथासंग्रहात् (स) शुकसप्ततेः (द) लसल्लतिकायाः

9. राजपुत्रः नाम किम् आसीत्? (प्रश्न बैंक)

(अ) कृष्णचन्द्रः (ब) राजचन्द्रः (स) राजसिंहः (द) श्रीचन्द्रः

10. बुद्धिमती पुत्रद्वयोपेता कुत्र गच्छति स्म?

(अ) पितृगृहम् (ब) पतिगृहम् (स) गङ्गाटटम् (द) नगरम्

11. लोके महतो भयात् कः मुच्यते?

(अ) बुद्धिमान् (ब) बलवान् (स) धूर्तः (द) कुशलः

12. भयाकुलं व्याघ्रं दृष्ट्वा कः हसति? (प्रश्न बैंक)

(अ) राजसिंहः (ब) मृगः (स) श्रृगालः (द) बुद्धिमती

13. व्याघ्रं कुत्र ददर्श? (प्रश्न बैंक)

(अ) पर्वते (ब) गुहायाम् (स) उपवने (द) गहनकानने

14. किं दृष्ट्वा बुद्धिमती चिन्तितवती? (प्रश्न बैंक)

(अ) सूकरं (ब) जम्बुकं (स) चित्रकं (द) व्याघ्रं

15. यामिनी भयात् कया विमुक्ता? (प्रश्न बैंक)

(अ) पराक्रमेण (ब) धनेन (स) निजबुद्ध्या (द) बलेन

--- [ पृष्ठ संख्या: 35 ] ---

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उत्तर-तालिका

1. (द) 2. (स) 3. (ब) 4. (स) 5. (अ) 6. (द) 7. (ब) 8. (स) 9. (स) 10. (अ)

11. (अ) 12. (स) 13. (द) 14. (द) 15. (स)

II. शब्दार्थ-चयनम्-

प्रश्न:- अधोलिखितवाक्येषु रेखाङ्कितपदानां प्रसङ्गानुकूलम् उचितार्थं चित्वा लिखत-

1. कानने सा एकं व्याघ्रं ददर्श।

(अ) उपवने (ब) वने (स) गुहायाम् (द) पर्वते

2. सा पुत्रौ चपेटया प्रहृत्य जगाद।

(अ) उक्तवती (ब) अहसत् (स) अक्रुध्यत् (द) अगच्छत्

3. इति मत्वा व्याघ्रो भयाकुलचित्तो नष्टः।

(अ) अपतत् (ब) हर्षितः (स) मृतः (द) पलायितः

4. गच्छ, गच्छ जम्बुक।

(अ) शृगालः (ब) व्याघ्रः (स) चित्रकः (द) सूकरः

5. तयाहं हन्तुम् आरब्धः।

(अ) प्रहर्तुम् (ब) द्रष्टुम् (स) मारयितुम् (द) कथयितुम्

6. तदा वेला अप्यवेला स्यात्।

(अ) कार्यम् (ब) समयः (स) जीवनम् (द) रूपम्

7. मां निजगले बद्ध्वा चल सत्वरम्।

(अ) मन्दम् (ब) शनैः शनैः (स) शीघ्रम् (द) उच्चैः

8. सः व्याघ्रः काननं ययौ।

(अ) आगतवान् (ब) अवसत् (स) मृतः (द) गतवान्

9. इत्युक्त्वा धाविता तूर्णम्।

(अ) शीघ्रम् (ब) सहसा (स) मन्दम् (द) अधुना

10. त्वया महत्कौतुकम् आवेदितम्।

(अ) विज्ञापितम् (ब) लिखितम् (स) प्रकटितम् (द) दर्शितम्

उत्तराणि- 1. (ब) वने, 2. (अ) उक्तवती, 3. (द) पलायितः, 4. (अ) शृगालः, 5. (स) मारयितुम्, 6. (ब) समयः, 7. (स) शीघ्रम्, 8. (द) गतवान्, 9. (अ) शीघ्रम्, 10. (अ) विज्ञापितम्।

III. अन्वय-लेखनम्-

प्रश्न:- मञ्जूषातः समुचितपदानि चित्वा अधोलिखित-श्लोकस्य अन्वयं पूरयत-

(i) निजबुद्ध्या ........................................................................................................ महतो भयात्॥

अन्वयः- सा (i) .................... निजबुद्ध्या (ii) .................... भयाद् विमुक्ता। लोके अन्यः (iii) .................... अपि महतः (iv) .................... मुच्यते।

बुद्धिमान्, भामिनी, भयात्, व्याघ्रस्य

उत्तरम्-(i) भामिनी, (ii) व्याघ्रस्य, (iii) बुद्धिमान्, (iv) भयात्।

(ii) रे रे धूर्त! ........................................................................................................ वदाधुना॥

अन्वयः- रे रे धूर्त! पुरा (i) .................... मह्यं (ii) .................... दत्तम्, विश्वास्य अद्य (iii) .................... आनीय कथं (iv) ...................., अधुना वद।

एकम्, त्वया, यासि, व्याघ्रत्रयम्

उत्तरम्-(i) त्वया, (ii) व्याघ्रत्रयं, (iii) एकम्, (iv) यासि।

--- [ पृष्ठ संख्या: 36 ] ---

(iii) इत्युक्त्वा धाविता........................................................................................................................श्रृगालकः॥

अन्वयः—इति उक्त्वा (i) ...............व्याघ्रमारी (ii) ................धाविता, गलबद्धशृगालकः (iii) ...................अपि सहसा (iv) ....................।

व्याघ्रः, भयङ्करा, नष्टः, तूर्णम्

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उत्तरम्—(i) भयङ्करा, (ii) तूर्णम्, (iii) व्याघ्रः, (iv) नष्टः।

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**IV. प्रश्ननिर्माणम्—**

प्रश्नः—निम्नलिखितषु वाक्येषु रेखांकितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत—

1. शृगालेन पुरा <u>त्रयः</u> व्याघ्राः आनीय दत्ताः।

2. राजसिंहस्य भार्या <u>बुद्धिमती</u> आसीत्।

3. बुद्धिमती पुत्रद्वयोपेता <u>पितुर्गृहं</u> प्रति चलिता।

4. मार्गे गहनकानने सा <u>एकं व्याघ्रं</u> ददर्श।

5. सा धाष्टर्यात् पुत्रौ <u>चपेटया</u> प्रहृत्य जगाद।

6. युवां <u>व्याघ्रभक्षणाय</u> कलहं कुरुथः।

7. अयमेकस्तावत् <u>विभज्य</u> भुज्यताम्।

8. पश्चात् अन्यो <u>द्वितीयः</u> कश्चिल्लक्ष्यते।

9. इयम् काचित् <u>व्याघ्रमारी</u> वर्तते।

10. <u>व्याघ्रो</u> भयाकुलचित्तो पलायितः।

उत्तरम्—प्रश्ननिर्माणम्—

1. शृगालेन पुरा कति व्याघ्राः आनीय दत्ताः?

2. राजसिंहस्य भार्या का आसीत्?

3. बुद्धिमती पुत्रद्वयोपेता कम् प्रति चलिता?

4. मार्गे गहनकानने सा कम् ददर्श?

5. सा धाष्टर्यात् पुत्रौ कया प्रहृत्य जगाद?

6. युवां किमर्थम् कलहं कुरुथः?

7. अयमेकस्तावत् कथं भुज्यताम्?

8. पश्चात् अन्यो कः कश्चिल्लक्ष्यते?

9. इयम् काचित् का वर्तते?

10. कः भयाकुलचित्तो पलायितः?

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**V. पाठ-सार-लेखनम्—**

प्रश्नः—'बुद्धिर्बलवती सदा' इति कथायाः सारं हिन्दीभाषायां लिखत।

*(माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023, 2022; मॉडल पेपर 2024-25; प्रश्न बैंक)*

उत्तर—पाठ-सार—'बुद्धिर्बलवती सदा' नामक पाठ मूलतः 'शुकसप्ततिः' नामक कथाग्रन्थ से संकलित किया गया है। इस पाठ में वर्णित कथा के माध्यम से बुद्धिमती नामक महिला के बुद्धि-कौशल को दर्शाया गया है। पाठानुसार 'देउल' नामक गाँव में राजसिंह नामक एक राजपूत रहता था। एक बार बुद्धिमती नामक उसकी पत्नी किसी कार्य से अपने दो पुत्रों के साथ अपने पिता के घर (पीहर) जाती है। रास्ते में गहन जंगल में उसे एक बाघ आता हुआ दिखाई दिया। वह शीघ्र ही धृष्टतापूर्वक अपने दोनों पुत्रों के थप्पड़ मारकर बोली—"क्यों एक-एक बाघ को खाने के लिए झगड़ा कर रहे हो? अभी इसे ही बाँटकर खा लेना। बाद में अन्य कोई बाघ देखा जाएगा।"

यह सुनकर बाघ उसे 'व्याघ्रमारी' मानकर भयभीत होकर भाग जाता है, किन्तु एक धूर्त शृगाल की बातों में आकर वह उस शृगाल को अपने गले में बाँधकर पुनः वहीं जंगल के मार्ग में आ जाता है। उसे देखकर प्रत्युत्पन्न बुद्धिव़ाली वह महिला शृगाल को झिड़कती हुई और धमकाती हुई भयानक रूप से शीघ्रतापूर्वक उसकी ओर दौड़ती है। यह देखकर भयभीत हुआ बाघ शृगाल सहित वहाँ से भाग जाता है।

इस प्रकार वह बुद्धिमती अपने बुद्धि-कौशल से बाघ से उत्पन्न महान् भय से मुक्त हो जाती है। इसलिए सत्य ही कहा गया है कि—"हमेशा सभी कार्यों में बुद्धि ही बलवती होती है।"

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