📖 1. समाधान: पाठ्यपुस्तकस्य प्रश्नोत्तराणि (अभ्यासः हल)
राजस्थान बोर्ड कक्षा 10 संस्कृत (शेमुषी भाग-2) — पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों के प्रामाणिक एवं विस्तृत उत्तर।
प्रश्न 1. एकपदेन उत्तरं लिखत-
(क) वृषभः दीनः इति जानन्नपि कः तं नुदन् आसीत्?
(ख) वृषभः कुत्र पपात?
(ग) दुर्बले सुते कस्याः अधिका कृपा भवति?
(घ) कयोः एकः शरीरेण दुर्बलः आसीत्?
(ङ) चण्डवातेन मेघरवेश्च सह कः समजायत?
उत्तराणि- (क) कृषकः। (ख) क्षेत्रे। (ग) मातुः। (घ) बलीवर्दयोः। (ङ) प्रवर्षः।
प्रश्न 2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत-
(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए-)
(क) कृषकः किं करोति स्म?
(किसान क्या करता था?)
उत्तरम्- कृषकः बलीवर्दाभ्यां क्षेत्रकर्षणं करोति स्म।
(किसान दो बैलों से खेत में जुताई करता था।)
(ख) माता सुरभिः किमर्थम् अश्रूणि मुञ्चति स्म?
(माता सुरभि किसलिए आँसू बहा रही थी?)
उत्तरम्- भूमौ पतिते स्वपुत्रं दृष्ट्वा माता सुरभिः अश्रूणि मुञ्चति स्म।
(भूमि पर गिरे हुए अपने पुत्र को देखकर माता सुरभि आँसू बहा रही थी।)
(ग) सुरभिः इन्द्रस्य प्रश्नस्य किमुत्तरं ददाति?
(सुरभि इन्द्र के प्रश्न का क्या उत्तर देती है?)
उत्तरम्- सुरभिः कथयति यत् "पुत्रस्य दैन्यं दृष्ट्वा अहं रोदिमि।"
(सुरभि कहती है कि "पुत्र की दीनता को देखकर मैं रो रही हूँ।)
(घ) मातुः अधिका कृपा कस्मिन् भवति? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)
(माता की अधिक कृपा किस पर होती है?)
उत्तरम्- दुर्बले सुते मातुः अधिका कृपा भवति।
(दुर्बल पुत्र पर माता की अधिक कृपा होती है।)
(ङ) इन्द्रः दुर्बलवृषभस्य कष्टानि अपाकर्तुं किं कृतवान्?
(इन्द्र ने दुर्बल बैल के कष्टों को दूर करने के लिए क्या किया?)
उत्तरम्- इन्द्रः दुर्बलवृषभस्य कष्टानि अपाकर्तुं वृष्टिं कृतवान्।
--- [ पृष्ठ संख्या: 56 ] ---
(इन्द्र ने दुर्बल बैल के कष्टों को दूर करने के लिए वर्षा की।)
(च) जननी कीदृशी भवति?
(माता कैसी होती है?)
उत्तरम्—जननी सर्वेष्वपत्येषु तुल्यवत्सला भवति।
(माता सभी सन्तानों में समान रूप से स्नेह करने वाली होती है।)
(छ) पाठेऽस्मिन् कयोः संवादः विद्यते?
(इस पाठ में किन दो का संवाद है?)
उत्तरम्—अस्मिन् पाठे गोमातुः सुरभेः इन्द्रस्य च संवादः विद्यते।
(इस पाठ में गोमाता सुरभि और इन्द्र का संवाद है।)
अथवा
'जननी तुल्यवत्सला' पाठः कस्मात् ग्रन्थात् गृहीतः? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)
उत्तरम्—इति पाठः महाभारतस्य "वनपर्व" इत्यतः गृहीतः।
प्रश्न 3. 'क' स्तम्भे दत्तानां पदानां मेलनं 'ख' स्तम्भे दत्तैः समानार्थकपदैः कुरुत—
'क' स्तम्भ | 'ख' स्तम्भ |
(क) कृच्छ्रेण | (i) वृषभः |
(ख) चक्षुभ्याम् | (ii) वासवः |
(ग) जवेन | (iii) नेत्राभ्याम् |
(घ) इन्द्रः | (iv) अचिरम् |
(ङ) पुत्राः | (v) द्रुतगत्या |
(च) शीघ्रम् | (vi) काठिन्येन |
(छ) बलीवर्दः | (vii) सुताः |
उत्तरम्—'क' स्तम्भ — 'ख' स्तम्भ
(क) कृच्छ्रेण — (vi) काठिन्येन
(ख) चक्षुभ्याम् — (iii) नेत्राभ्याम्
(ग) जवेन — (v) द्रुतगत्या
(घ) इन्द्रः — (ii) वासवः
(ङ) पुत्राः — (vii) सुताः
(च) शीघ्रम् — (iv) अचिरम्
(छ) बलीवर्दः — (i) वृषभः
प्रश्न 4. स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत— (प्रश्न बैंक)
(क) सः कृच्छ्रेण भारम् उद्वहति। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024, 2023)
(ख) सुराधिपः ताम् अपृच्छत्।
(ग) अयम् अन्येभ्यो दुर्बलः। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)
(घ) धेनूनाम् माता सुरभिः आसीत्?
(ङ) सहस्राधिकेषु पुत्रेषु सत्स्वपि सा दुःखी आसीत्।
उत्तरम्—प्रश्ननिर्माणम्—
(क) सः केन भारम् उद्वहति?
(ख) कः ताम् अपृच्छत्?
(ग) अयम् केभ्यो दुर्बलः?
(घ) कासां माता सुरभिः आसीत्?
(ङ) केषु पुत्रेषु सत्स्वपि सा दुःखी आसीत्?
प्रश्न 5. रेखांकितपदे यथास्थानं संधिं विच्छेदं वा कुरुत—
(क) कृषकः क्षेत्रकर्षणं कुर्वन् + आसीत्।
--- [ पृष्ठ संख्या: 57 ] ---
(ख) तयोरेकः वृषभः दुर्बलः आसीत्।
(ग) तथापि वृषः न + उत्थितः।
(घ) सत्स्वपि बहुषु पुत्रेषु अस्मिन् वात्सल्यं कथम्?
(ङ) तथा+अपि+अहम्+एतस्मिन् स्नेहम् अनुभवामि।
(च) मे बहूनि + अपत्यानि सन्ति।
(छ) सर्वत्र जलोपप्लवः संजातः।
उत्तरम्—
(क) कुर्वन्+आसीत्। (ख) तयोः + एकः।
(ग) न+उत्थितः। (घ) सत्सु + अपि।
(ङ) तथा+अप्यहम्+एतस्मिन्। (च) बहूनि+अपत्यानि।
(छ) जल + उपप्लवः।
प्रश्न 6. अधोलिखितेषु वाक्येषु रेखांकित सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम्?
(क) सा च अवदत् भो वासव! अहम् भृशं दुःखिता अस्मि।
(ख) पुत्रस्य दैन्यं दृष्ट्वा अहम् रोदिमि।
(ग) सः दीनः इति जानन् अपि कृषकः तं पीडयति।
(घ) मम बहूनि अपत्यानि सन्ति।
(ङ) सः ताम् एवम् असान्त्वयत्।
(च) सहस्रेषु पुत्रेषु सत्स्वपि तव अस्मिन् प्रीतिः अस्ति।
उत्तरम्—
(क) सुरभ्यै। (ख) सुरभ्यै।
(ग) वृषभाय। (घ) सुरभ्यै।
(ङ) इन्द्राय। (च) सुरभ्यै।
प्रश्न 7. 'क' स्तम्भे विशेषणपदं लिखितम्, 'ख' स्तम्भे पुनः विशेष्यपदम्। तयोः मेलनं कुरुत-
'क' स्तम्भ | 'ख' स्तम्भ | 'क' स्तम्भ | 'ख' स्तम्भ |
(क) कश्चित् | (i) वृषभम् | (ख) दुर्बलम् | (ii) कृपा |
(ग) क्रुद्धः | (iii) कृषीवलः | (घ) सहस्राधिकेषु | (iv) आखण्डलः |
(ङ) अभ्यधिका | (v) जननी | (च) विस्मितः | (vi) पुत्रेषु |
(छ) तुल्यवत्सला | (vii) कृषकः |
उत्तरम्—
'क' स्तम्भ | 'ख' स्तम्भ | 'क' स्तम्भ | 'ख' स्तम्भ |
(क) कश्चित् | (vii) कृषकः। | (ख) दुर्बलम् | (i) वृषभम्। |
(ग) क्रुद्धः | (iii) कृषीवलः। | (घ) सहस्राधिकेषु | (vi) पुत्रेषु। |
(ङ) अभ्यधिका | (ii) कृपा। | (च) विस्मितः | (iv) आखण्डलः। |
(छ) तुल्यवत्सला | (v) जननी। |
📝 2. हिन्दी-अनुवादः: अन्वय, शब्दार्थ व सप्रसंग सरलार्थ
प्रत्येक श्लोक एवं गद्यांश का संस्कृत अन्वय, कठिन शब्दार्थ, सप्रसंग हिन्दी अनुवाद एवं व्याकरण/भाषिक कार्यम्।
पाठ परिचय—प्रस्तुत पाठ महर्षि वेदव्यास विरचित ऐतिहासिक ग्रन्थ महाभारत के वनपर्व से लिया गया है। यह कथा सभी जीव-जन्तुओं के प्रति समदृष्टि की भावना जगाती है। समाज में दुर्बल लोगों अथवा जीवों के प्रति भी माँ की ममता प्रगाढ़ होती है, यह इस पाठ का अभिप्रेत है।
अन्वय, कठिन शब्दार्थ, हिन्दी-अनुवाद एवं पठितावबोधनम्—
(1)
कश्चित् कृषकः बलीवर्दाभ्यां क्षेत्रकर्षणं कुर्वन्नासीत्। तयोः बलीवर्दयोः एकः शरीरेण दुर्बलः जवेन गन्तुमशक्तश्चासीत्। अतः कृषकः तं दुर्बलं वृषभं तोदनेन नुद्यमानः अवर्तत। सः वृषभः हलमूढ्वा गन्तुमशक्तः क्षेत्रे पपात। क्रुद्धः कृषीवलः तमुत्थापयितुं बहुवारम् यत्नमकरोत्। तथापि वृषः नोत्थितः।
शब्दार्थाः
शब्दः | अर्थः |
कृषकः | किसान |
बलीवर्दाभ्याम् | दो बैलों से (वृषाभ्याम्) |
क्षेत्रकर्षणम् | खेत की जुताई (क्षेत्रस्य कर्षणम्) |
जवेन | तीव्रगति से (तीव्रगत्या) |
गन्तुम् | जाने के लिए (यातुम्) |
अशक्तः | असमर्थ (असमर्थः) |
वृषभम् | बैल को (बलिवर्दम्) |
तोदनेन | कष्ट देने से (कष्टप्रदानेन) |
नुद्यमानः | धकेला जाता हुआ, हाँका जाता हुआ (बले नीयमानः) |
हलमूढ्वा | हल उठाकर, हल ढोकर (हलम् आदाय) |
पपात | गिर गया (भूमौ अपतत्) |
कृषीवलः | किसान (कृषकः) |
उत्थापयितुम् | उठाने के लिए (उपरि नेतुम्) |
बहुवारम् | अनेक बार (बहुधा) |
यत्नम् | प्रयत्न (प्रयत्नम्) |
वृषः | बैल (वृषभः) |
हिन्दी-अनुवादः—कोई किसान दो बैलों से खेत की जुताई करता था। उन दोनों बैलों में से एक शरीर से दुर्बल और तीव्रगति से जाने में असमर्थ था। इसलिए किसान उस दुर्बल बैल को कष्ट देता हुआ हाँका करता था। वह बैल हल उठाकर चलने में असमर्थ हुआ खेत में गिर पड़ा। क्रोधित किसान ने उसे उठाने के लिए अनेक बार प्रयत्न किया। फिर भी बैल नहीं उठा।
पठितावबोधनकार्यम्—
निर्देशः—उपर्युक्तगद्यांशं पठित्वा एतदाधारितप्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतेन लिखत—
(माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)
प्रश्नोत्तराणि:
प्रश्न [क]. एकपदेन उत्तरत—
कृषकः किं कुर्वन्नासीत्?
उत्तरम्— क्षेत्रकर्षणम्।
प्रश्न [ख]. पूर्णवाक्येन उत्तरत—
वृषभः कुत्र पपात?
उत्तरम्— वृषभः क्षेत्रे पपात।
प्रश्न [ग]. भाषिककार्यम्—
(i) ‘‘कश्चित् कृषकः’’ इत्यत्र विशेषणपदं किम्?
(ii) ‘‘क्रुद्धः कृषीवलः तमुत्थापयितुं बहुवारं यत्नमकरोत्।’’ इत्यत्र क्रिया पदं किम्?
उत्तराणि—
(क) क्षेत्रकर्षणम्।
(ख) वृषभः क्षेत्रे पपात।
(ग) (i) कश्चित्। (ii) अकरोत्।
अथवा
[ माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24 (सं.) ]
प्रश्न [क]. एकपदेन उत्तरं लिखत—
कृषकः किं कुर्वन्नासीत्?
प्रश्न [ख]. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत—
कृषकः कं वृषभं तोदनेन नुदन् अवर्तत? क्रुद्धः कृषीवलः किम् अकरोत्?
--- [ पृष्ठ संख्या: 52 ] ---
(ग) यथानिर्देशम् उत्तरं लिखत-
(i) 'प्रसन्नः' इति पदस्य विलोमपदं गद्यांशे किम्?
(ii) दुर्बलः जवेन गन्तुमशक्तश्चासीत्। इत्यत्र क्रियापदं किम्?
उत्तराणि-
(क) क्षेत्रकर्षणम्।
(ख) कृषकः दुर्बलं वृषभं तोदनेन नुदन् अवर्तत। क्रुद्धः कृषीवलः तमुत्थापयितुं बहुवारं यत्नमकरोत्।
(ग) (i) क्रुद्धः। (ii) आसीत्।
अथवा
प्रश्नाः-
(क) एकपदेन उत्तरत-
कृषकः काभ्यां क्षेत्रकर्षणं कुर्वनासीत्?
(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
बलीवर्दयोः एकः कीदृशः आसीत्?
(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत-
(i) 'बलीवर्दयोः' इति संज्ञापदस्य गद्यांशे सर्वनामपदं किं प्रयुक्तम्?
(ii) गद्यांशे 'पपात' इति क्रियायाः कर्तृपदं किम्?
उत्तराणि-
(क) बलीवर्दाभ्याम्।
(ख) बलीवर्दयोः एकः शरीरेण दुर्बलः जवेन गन्तुमशक्तश्चासीत्।
(ग) (i) तयोः। (ii) वृषभः।
(2)
श्लोकः
भूमौ पतिते स्वपुत्रं दृष्ट्वा सर्वधेनूनां मातुः सुरभेः नेत्राभ्यामश्रूणि आविरासन्। सुरभिरिमामवस्थां दृष्ट्वा सुराधिपः तामपृच्छत्- "अयि शुभे! किमेवं रोदिषि? उच्चताम्" इति। सा च
विनिपातो न वः कश्चिद् दृश्यते त्रिदशाधिपः।
अहं तु पुत्रं शोचामि, तेन रोदिमि कौशिक!।।
अन्वयः- त्रिदशाधिपः! कश्चिद् विनिपातः वः न दृश्यते। कौशिक! अहं तु पुत्रं शोचामि, तेन रोदिमि।
शब्दार्थाः
शब्दः | अर्थः |
भूमौ | भूमि पर (पृथिव्याम्) |
दृष्ट्वा | देखकर (अवलोक्य) |
सर्वधेनूनाम् | सभी गायों की (सर्वासं गवाम्) |
नेत्राभ्याम् | दोनों आँखों से (चक्षुभ्याम्, नयनाभ्याम्) |
अश्रूणि | आँसू (नयनजलम्) |
आविरासन् | आने लगे, आए (आगताः) |
सुराधिपः | देवताओं के राजा (इन्द्र) (सुराणां राजा, देवानाम् अधिपः) |
उच्चताम् | कहें, कहा जाए (कथ्यताम्) |
त्रिदशाधिपः | देवताओं का राजा = इन्द्र (त्रिदशाम् अधिपः = इन्द्रः) |
हिन्दी-अनुवादः / भावार्थः
भूमि पर गिरे हुए अपने पुत्र को देखकर सभी गायों की माता सुरभि की दोनों आँखों से आँसू आने लगे। सुरभि की इस दशा को देखकर देवराज इन्द्र ने उससे पूछा- "हे शुभे! क्यों इस प्रकार रो रही हो? कहो।" और वह-
हे देवराज इन्द्र! आपको कोई भी गिरा हुआ दिखाई नहीं देता है। मैं तो (भूमि पर गिरे हुए) पुत्र का शोक कर रही हूँ, हे इन्द्र! उससे ही रो रही हूँ।
पठितावबोधनकार्यम्-
प्रश्नाः-
(क) एकपदेन उत्तरत-
सर्वधेनूनां मातुः किन्नाम आसीत्?
(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
किं दृष्ट्वा सुरभेः नेत्राभ्यामश्रूणि आविरासन्?
(ग) भाषिककार्यम्-
(i) 'पितुः' इति पदस्य विलोमपदं किम्?
(ii) 'सुराधिपः तामपृच्छत्' अत्र 'ताम्' इति सर्वनामपदं कस्यै प्रयुक्तम्?
उत्तराणि-
(क) सुरभिः।
(ख) भूमौ पतिते स्वपुत्रं दृष्ट्वा सुरभेः नेत्राभ्यामश्रूणि आविरासन्।
(ग) (i) मातुः। (ii) सुरभ्यै।
--- [ पृष्ठ संख्या: 53 ] ---
४०
(३)
"भो वासव! पुत्रस्य दैन्यं दृष्ट्वा अहं रोदिमि। सः दीन इति जानन्नपि कृषकः तं बहुधा पीडयति। सः कृच्छ्रेण भारमुद्वहति। इतरमिव धुरं वोढुं सः न शक्नोति। एतत् भवान् पश्यति न?" इति प्रत्यवोचत्। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2022)
"भद्रे! नूनम्। सहस्राधिकेषु पुत्रेषु सत्स्वपि तव अस्मिन्नेव एतादृशं वात्सल्यं कथम्?" इति इन्द्रेण पृष्टा सुरभिः प्रत्यवोचत्।
शब्दार्थाः
शब्दः | अर्थः |
वासवः | इन्द्र (इन्द्रः, देवराजः) |
दैन्यम् | दीनता को (दीनताम्) |
जानन्नपि | जानते हुए भी (ज्ञात्वाऽपि) |
कृच्छ्रेण | कठिनाई से (काठिन्येन) |
उद्वहति | ढोता है (वहनं करोति) |
इतरमिव | दूसरों के समान (भिन्नम् इव) |
धुरम् | जुए को (गाड़ी के जुए का वह भाग जो बैलों के कंधों पर रखा जाता है) |
वोढुम् | ढोने के लिए (वहनाय योग्यम्) |
प्रत्यवोचत् | जवाब दिया (उत्तरं दत्तवान्) |
नूनम् | निश्चय ही (निश्चयेन) |
सहस्र | हजार (दशशतम्) |
वात्सल्यम् | वात्सल्य/प्रेमभाव (स्नेहभावः) |
हिन्दी-अनुवादः "हे इन्द्र! पुत्र की दीनता को देखकर मैं रो रही हूँ। वह दीन है, ऐसा जानते हुए भी किसान उसको अनेक बार प्रताड़ित करता है। वह कठिनाई से भार ढोता है। दूसरों के समान जुए को ढोने के लिए वह समर्थ नहीं है। क्या आप यह नहीं देख रहे हो?" ऐसा (सुरभि ने) जवाब दिया।
"हे भद्रे! निश्चय ही (मैं देख रहा हूँ)। हजारों पुत्रों के होने पर भी तुम्हारा इसी पर ऐसा वात्सल्य क्यों है?" इस प्रकार इन्द्र के द्वारा पूछे जाने पर सुरभि ने जवाब दिया।
पठितावबोधनकार्यम्-
प्रश्नाः-
(क) एकपदेन उत्तरत-
कस्य दैन्यं दृष्ट्वा सुरभिः रोदिति?
(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
दुर्बलः वृषभः किं वोढुं न शक्नोति?
(ग) भाषिककार्यम्-
(i) 'एतत् भवान् पश्यति न?' अत्र 'भवान्' इति सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम्?
(ii) 'सहस्राधिकेषु' इति विशेषणपदस्य विशेष्यपदं किम्?
उत्तराणि-
(क) स्वपुत्रस्य।
(ख) दुर्बलः वृषभः इतरमिव धुरं वोढुं न शक्नोति।
(ग) (i) इन्द्राय। (ii) पुत्रेषु।
(४)
यदि पुत्रसहस्रं मे, सर्वत्र सममेव मे।
दीनस्य तु सुतः शक्र! पुत्रस्याभ्यधिका कृपा॥
"बहून्यपत्यानि मे सन्तीति सत्यम्। तथाप्यहमेतस्मिन् पुत्रे विशिष्ट्य आत्मवेदनामनुभवामि। यतो हि अयमन्येभ्यो दुर्बलः। सर्वेष्वपत्येषु जननी तुल्यवत्सला एव। तथापि दुर्बले सुते मातुः अभ्यधिका कृपा सहजैव" इति। सुरभिवचनं श्रुत्वा भृशं विस्मितस्याखण्डलस्यापि हृदयमद्रवत्। स च तामेवमसान्त्वयत्- "गच्छ वत्से! सर्वं भद्रं जायेत।" (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22)
श्लोकस्य अन्वयः- शक्र! यदि मे पुत्रसहस्रम् (तर्हि) सर्वत्र मे सुतः सममेव। तु दीनस्य पुत्रस्य अभ्यधिका कृपा (भवति)।
शब्दार्थाः
शब्दः | अर्थः |
शक्रः | इन्द्र (इन्द्रः) |
अपत्यानि | सन्तान (सन्ततयः) |
विशिष्ट्य | विशेषकर (विशेषतः) |
जननी | माता (माता) |
तुल्यवत्सला | समान रूप से प्यार करने वाली (समस्नेहयुता) |
वेदनाम् | कष्ट को (पीडाम्, दुःखम्) |
सुतः | पुत्र (पुत्रः, तनयः) |
अभ्यधिका | अत्यधिक |
श्रुत्वा | सुनकर (आकर्ण्य) |
भृशम् | बहुत अधिक (अत्यधिकम्) |
आखण्डलस्य | इन्द्र का (इन्द्रस्य) |
असान्त्वयत् | सान्त्वना दी/दिलासा दी (समाश्वासयत्) |
भद्रम् | शुभ (शुभम्) |
हिन्दी अनुवादः हे इन्द्र! यदि मेरे हजारों पुत्र हैं तब भी सभी में मेरा समान स्नेह भाव है, फिर भी दीन पुत्र के प्रति मेरी अधिक कृपा होती है।
--- [ पृष्ठ संख्या: 54 ] ---
"मेरी बहुत सन्तान हैं, यह सत्य है। फिर भी मैं इस पुत्र में विशेषकर कष्ट का अनुभव कर रही हूँ। क्योंकि यह अन्य पुत्रों से दुर्बल है। सभी सन्तानों में माता समान रूप से स्नेह करने वाली ही होती है। फिर भी दुर्बल पुत्र में माता की कुछ अधिक कृपा स्वभाव से ही होती है।" सुरभि के वचन को सुनकर अत्यधिक आश्चर्यचकित इन्द्र का हृदय भी द्रवित हो गया। और उसने उसको (सुरभि को) इस प्रकार सान्त्वना दी- "जाओ पुत्रि! सब कुछ अच्छा ही होगा।"
पठितावबोधनकार्यम्-
प्रश्नाः-
(क) एकपदेन उत्तरत-
सुरभेः कति अपत्यानि सन्ति?
(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
कस्मिन् मातुः अभ्यधिका कृपा सहजैव भवति?
(ग) भाषिककार्यम्-
(i) 'दुर्बले' इति विशेषणस्य विशेष्यपदं किं प्रयुक्तम्?
(ii) 'स च तामेवमसान्त्वयत्।' अत्र 'ताम्' इति सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम्?
उत्तराणि-
(क) बहूनि।
(ख) दुर्बले सुते मातुः अभ्यधिका कृपा सहजैव भवति।
(ग) (i) सुते। (ii) सुरभ्यै।
अथवा
(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)
प्रश्नाः-
(क) एकपदेन उत्तरत-
कस्मिन् सुते मातुः अभ्यधिका कृपा सहजैव?
(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
सुरभिवचनं श्रुत्वा कस्य हृदयमद्रवत्?
(ग) भाषिककार्यम्-
(i) "सर्वं भद्रं जायेत।" इत्यत्र सर्वनामपदं किम्?
(ii) "सर्वेष्वपत्येषु जननी तुल्यवत्सला एव।" इत्यत्र कर्तृपदं किम्?
उत्तराणि-
(क) दुर्बले सुते।
(ख) सुरभिवचनं श्रुत्वा आखण्डलस्य (इन्द्रस्य) हृदयमद्रवत्।
(ग) (i) सर्वम्। (ii) जननी।
( 5 )
अचिरादेव चण्डवातेन मेघरवेश्च सह प्रवर्षः समजायत। लोकानां पश्यताम् एव सर्वत्र जलोपप्लवः सञ्जातः। कृषकः हर्षातिरेकेण कर्षणविमुखः सन् वृषभौ नीत्वा गृहमागात्।
श्लोकः
अपत्येषु च सर्वेषु जननी तुल्यवत्सला।
पुत्रे दीने तु सा माता कृपार्द्रहृदया भवेत्॥
अन्वयः- सर्वेषु अपत्येषु च जननी तुल्यवत्सला। तु दीने पुत्रे सा माता कृपार्द्रहृदया भवेत्।
शब्दार्थाः
शब्दः | अर्थः |
अचिरात् | शीघ्र ही (शीघ्रम्) |
चण्डवातेन | प्रचण्ड (तीव्र) हवा से (वेगयुता वायुना) |
मेघरवः | बादलों के गर्जन से (मेघस्य गर्जनेन) |
प्रवर्षः | वर्षा (वृष्टिः) |
जलोपप्लवः | जलसंकट (जलस्य विपत्तिः) |
हर्षातिरेकेण | अत्यधिक प्रसन्नता से (अतिप्रसन्नतया) |
कर्षणविमुखः | जोतने के काम से विमुख होकर (कर्षणकर्मणा विमुखः) |
वृषभौ | दोनों बैलों को (वृषौ) |
अगात् | गया (गतवान्) |
हिन्दी-अनुवादः
शीघ्र ही तीव्र वायु और बादलों के गर्जन के साथ वर्षा होने लगी। लोगों के देखते हुए ही सभी जगह जलसंकट हो गया अर्थात् पानी ही पानी हो गया। किसान अत्यधिक प्रसन्नता से जोतने के काम से विमुख होकर दोनों बैलों को लेकर घर चला गया।
सभी सन्तानों में माता समान रूप से स्नेह करने वाली होती है, किन्तु दीन पुत्र के प्रति माता अधिक कृपायुक्त हृदय वाली होती है।
--- [ पृष्ठ संख्या: 55 ] ---
पठितावबोधनकार्यम्-
प्रश्नाः- (क) एकपदेन उत्तरत-
सर्वत्र कः सञ्जातः?
(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत-
अचिरादेव कैः सह प्रवर्षः समजायत?
(ग) भाषिककार्यम्-
(i) 'अगात्' इति क्रियायाः कर्तृपदं किम्?
(ii) 'सर्वेषु' इति विशेषणपदस्य विशेष्यपदं किम्?
उत्तराणि- (क) जलोप्प्लवः।
(ख) अचिरादेव चण्डवातेन मेघरवेश्च सह प्रवर्षः समजायत।
(ग) (i) कृषकः। (ii) अपत्येषु।
⭐ 3. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तराणि (Important Q&A & MCQs)
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), एकपदेन उत्तरत, पूर्णवाक्येन उत्तरत, प्रश्ननिर्माणम्, पाठ-सार-लेखनम् एवं परीक्षा उपयोगी व्याकरण।
I. बहुविकल्पात्मकप्रश्नाः—
1. कः क्षेत्रकर्षणं कुवन् आसीत्? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)
(अ) कृषकः (ब) शिक्षकः (स) वणिक् (द) धावकः
2. कः बलीवर्दाभ्यां क्षेत्रकर्षणं कुर्वन् आसीत्? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)
(अ) नृपः (ब) सुराधिपः (स) कृषकः (द) सुरभिः
3. दुर्बलः वृषभः कुत्र पपात? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2022)
(अ) वने (ब) क्षेत्रे (स) गृहे (द) ग्रामे
4. कस्मिन् सुते मातुः अधिका कृपा भवति? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2022)
(अ) सुन्दरसुते (ब) दुर्बले सुते (स) बलिष्ठ सुते (द) कनिष्ठ सुते
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5. माता सुरभिः किमर्थम् अश्रूणि मुञ्चति स्म? ( माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22 )
(अ) पुत्रस्य दैन्यं दृष्ट्वा (ब) कृषीवलस्य अत्याचारं दृष्ट्वा
(स) जगतः पीडां दृष्ट्वा (द) स्वविवशतां दृष्ट्वा
6. वृषभः कुत्र पपात्? ( माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22 )
(अ) आकाशे (ब) जले (स) भूमौ (द) न कुत्रापि
7. ‘जननी तुल्यवत्सला’ इति पाठस्य मूलं किम्? ( प्रश्न बैंक )
(अ) हर्षचरितम् (ब) महाभारतम् (स) कादम्बरी (द) रामायणम्
8. ‘जननी तुल्यवत्सला’ इति पाठः महाभारतस्य कस्मात् पर्वणः उद्धृतः? ( प्रश्न बैंक )
(अ) विराट् (ब) वन (स) कर्ण (द) भीष्म
9. दुर्बलः वृषभः किम् ऊढ्वा गन्तुमशक्तः आसीत्? ( प्रश्न बैंक )
(अ) कृषकम् (ब) हलम् (स) भारम् (द) अन्नम्
10. कस्याः नेत्राभ्याम्अश्रूणि आविरासन्? ( प्रश्न बैंक )
(अ) इन्द्रस्य (ब) कृषकस्य (स) सुरभे (द) वृषभस्य
11. सर्वेष्वपत्येषु जननी कीदृशी भवति? ( प्रश्न बैंक )
(अ) प्रसन्ना (ब) असमम् (स) तुल्यवत्सला (द) कातरा
12. दुर्बले सुते कस्याः अभ्यधिका कृपा भवति? ( प्रश्न बैंक )
(अ) मातुः (ब) पितुः (स) कन्यायाः (द) भगिन्याः
13. सर्वधेनूनां माता का आसीत्? ( प्रश्न बैंक )
(अ) माया (ब) सुरभिः (स) रम्भाः (द) चम्पाः
उत्तर-तालिका
1. (अ) 2. (स) 3. (ब) 4. (ब) 5. (अ) 6. (स) 7. (ब) 8. (ब) 9. (ब) 10. (स) 11. (स) 12. (अ) 13. (ब)
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II. शब्दार्थ-चयनम्-
प्रश्नः- अधोलिखितवाक्येषु रेखाङ्कितपदानां प्रसङ्गानुकूलम् उचितार्थं चित्वा लिखत-
1. दुर्बलः वृषः जवेन गन्तुमशक्तः आसीत्।
(अ) तीव्रगत्या (ब) भारेण (स) शनैः शनैः (द) मन्दं मन्दं
2. सः क्षेत्रे पपात्।
(अ) अचरत् (ब) अपिबत् (स) अपतत् (द) अगच्छत्
3. सुराधिपः तामपृच्छत्।
(अ) दैत्यराजः (ब) देवराजः (स) गजराजः (द) यमराजः
4. सः कृच्छ्रेण भारमुद्वहति।
(अ) सारल्येन (ब) सुखेन (स) काठिन्येन (द) अनायासेन
5. धुरं वोढुं सः न शक्नोति।
(अ) प्रदानाय (ब) वहनाय (स) उत्थापयितुम् (द) आरोपयितुम्
6. दुर्बले सुते मातुः अभ्यधिका कृपा सहैव।
(अ) जने (ब) मित्रे (स) अनुजे (द) पुत्रे
7. सुरभिवचनं श्रुत्वा भृशं हृदयभद्रवत्।
(अ) बहुधा (ब) अत्याधिकम् (स) अल्पम् (द) न्यूनम्
8. अचिरादेव प्रवर्षः समजायत।
(अ) वृष्टिः (ब) प्रहारः (स) झंझावातः (द) वेगः
9. कृषकः वृषभौ नीत्वा गृहम् अगात्।
(अ) अपतत् (ब) आगच्छत् (स) अगायत (द) अगच्छत्
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10. अपत्येषु च सर्वेषु।
(अ) सन्ततिषु (ब) पर्वतेषु (स) पुष्पेषु (द) अन्येषु
11. जननी तुल्यवत्सला।
(अ) कृषकः (ब) देवराजः (स) पिता (द) माता
उत्तराणि- 1. (अ) तीव्रगत्या 2. (स) अपतत् 3. (ब) देवराजः 4. (स) काठिन्येन 5. (ब) वहनाय 6. (द) पुत्रे 7. (ब) अत्यधिकम् 8. (अ) वृष्टिः 9. (द) अगच्छत् 10. (अ) सन्ततिषु 11. (द) माता।
III. अन्वय-लेखनम्-
प्रश्नः- मञ्जूषातः समुचितपदानि चित्वा अधोलिखित-श्लोकानाम् अन्वयं पूरयत-
1. विनिपातो न वः ........................................................................................ रोदिमि कौशिक! ।।
अन्वयः- त्रिदशाधिप! वः (i) .................... विनिपातः न (ii) .................... । कौशिक! अहं तु (iii) .................... शोचामि, तेन (iv) .................... ।
उत्तरम्-(i) कश्चिद्, (ii) दृश्यते, (iii) पुत्रं, (iv) रोदिमि।
2. यदि पुत्रसहस्रं मे ........................................................................................ अभ्यधिका कृपा।।
अन्वयः- शक्र! यदि मे (i) ...................., (तर्हि) सर्वत्र मे वात्सल्यं (ii) .................... (भवति)। तु (iii) .................... पुत्रस्य सत: (iv) (मम) .................... कृपा (भवति)।
उत्तरम्-(i) पुत्रसहस्रम्, (ii) समम् एव, (iii) दीनस्य, (iv) अभ्यधिका।
3. अपत्येषु च सर्वेषु ........................................................................................ कृपार्द्रहृदया भवेत्।।
अन्वयः- सर्वेषु (i) .................... च जननी (ii) .................... (भवेत्) तु दीने (iii) .................... सा माता (iv) .................... भवेत्।
उत्तरम्-(i) अपत्येषु, (ii) तुल्यवत्सला, (iii) पुत्रे, (iv) कृपार्द्रहृदया।
IV. प्रश्ननिर्माणम्-
प्रश्नः- रेखाङ्कित-पदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
(i) कृषकः क्षेत्रकर्षणं करोति स्म।
(ii) बलीवर्दः जवेन गन्तुम् अशक्तः आसीत्।
(iii) कृषकः वृषभं तोदनेन नुद्यमानः अवर्तत।
(iv) वृषभः क्षेत्रे पपात।
(v) सर्वधेनूनां माता सुरभिः आसीत्।
(vi) सुराधिपः ताम् अपृच्छत्।
(vii) पुत्रस्य दैन्यं दृष्ट्वा अहं रोदिमि।
(viii) सः कृच्छ्रेण भारमुद्वहति।
(ix) इन्द्रेण पृष्टा सुरभिः प्रत्यवोचत्।
(x) मे बहूनि अपत्यानि सन्ति।
(xi) अहम् आत्मवेदनाम् अनुभवामि।
(xii) सर्वेष्वपत्येषु जननी तुल्यवत्सला एव।
(xiii) दुर्बले सुते मातुः अभ्यधिका कृपा भवति।
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(xiv) सुरभिवचनं श्रुत्वा आखण्डलस्य हृदयमद्रवत्।
(xv) सः च ताम् असान्त्वयत्।
(xvi) अचिरादेव मेघरवः सह वृष्टिः समजायत।
(xvii) सर्वत्र जलोप्लवः सञ्जातः।
(xviii) कृषकः वृषभौ नीत्वा गृहमागात्।
उत्तरम्—प्रश्ननिर्माणम्—
(i) कृषकः किं करोति स्म?
(ii) कः जवेन गन्तुम् अशक्तः आसीत्?
(iii) कृषकः वृषभं केन नुद्यमानः अवर्तत?
(iv) वृषभः कुत्र पपात?
(v) सर्वधेनूनां माता का आसीत्?
(vi) सुराधिपः कामपृच्छत्?
(vii) कस्य दैन्यं दृष्ट्वा अहं रोदिमि?
(viii) सः केन भारमुद्वहति?
(ix) केन पृष्टा सुरभिः प्रत्यवोचत्?
(x) मे बहूनि कानि सन्ति?
(xi) अहं कामनुभवामि?
(xii) केषु जननी तुल्यवत्सला एव?
(xiii) कस्मिन् मातुः अभ्यधिका कृपा भवति?
(xiv) सुरभिवचनं श्रुत्वा कस्य हृदयमद्रवत्?
(xv) सः च काम् असान्त्वयत्?
(xvi) अचिरादेव कैः सह वृष्टिः समजायत?
(xvii) सर्वत्र कः सञ्जातः?
(xviii) कृषकः कौ नीत्वा गृहमागात्?
V. भावार्थ-लेखनम्—
प्रश्नः— निम्नलिखितपद्यांशस्य हिन्दीभाषायां सप्रसङ्गं भावार्थ लिखत—
अपत्येषु च सर्वेषु जननी तुल्यवत्सला।
पुत्रे दीने तु सा माता कृपार्द्रहृदया भवेत्॥
उत्तरम्—प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'शेमुषी-द्वितीयो भागः' के 'जननी तुल्यवत्सला' शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। मूलतः इस पाठ में वर्णित कथा 'महाभारत' के वनपर्व से संकलित है। इस पद्यांश में न केवल मनुष्यों अपितु सभी जीव-जन्तुओं के प्रति माता का समान प्रेमभाव दर्शाते हुए कहा गया है कि—
भावार्थ— यद्यपि माता के हृदय में अपनी सभी सन्ततियों के प्रति समान प्रेम होता है, परन्तु जो कमजोर (दुर्बल) सन्तान होती है उसके प्रति उस माता के मन में अत्यधिक प्रेम होता है, उस दीन सन्तान के प्रति माता अधिक कृपायुक्त हृदय वाली होती है।
VI. पाठ-सार-लेखनम्—
प्रश्नः— 'जननी तुल्यवत्सला' इति कथायाः/पाठस्य सारः हिन्दीभाषायां लिखत।
( माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024; मॉडल पेपर, 2022-23 )
उत्तर—पाठ-सार— प्रस्तुत पाठ 'जननी तुल्यवत्सला' में वर्णित कथा महाभारत के वनपर्व से ली गई है। यह कथा सभी प्राणियों में समदृष्टि की भावना जगाती है। कथा के अनुसार कोई किसान दो बैलों से खेत की जुताई कर रहा था। उन दोनों बैलों में से एक शरीर से दुर्बल तथा तेज गति से चलने में असमर्थ था। अतः किसान उस दुर्बल बैल
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को अत्यधिक कष्ट देता था। वह बैल हल उठाकर चलने में असमर्थ होकर खेत में गिर पड़ा। भूमि पर गिरे हुए अपने पुत्र (बैल) को देखकर गोमाता सुरभि की आँखों में आँसू आने लगे। सुरभि को रोता हुआ देखकर देवराज इन्द्र ने इसका कारण पूछा-
सुरभि ने इन्द्र से कहा कि "हे इन्द्र! मैं अपने पुत्र (बैल) की दीनता को देखकर रो रही हूँ। वह दीन है, ऐसा जानकर भी किसान उसे अत्यधिक प्रताड़ित करता है।" इन्द्र ने कहा कि तुम्हारे तो हजारों पुत्र हैं, फिर इसी पर इतना प्रेम क्यों है? सुरभि ने उत्तर दिया कि "मेरे हजारों पुत्र हैं, यह सत्य है, फिर भी मैं इस पुत्र में विशेष कष्ट का अनुभव कर रही हूँ। क्योंकि यह अन्य पुत्रों से दुर्बल है। सभी सन्तानों में माता का स्नेह समान भाव से होता है, फिर भी दुर्बल पुत्र के प्रति माता की अधिक कृपा होती है।"
गोमाता सुरभि के वचन सुनकर अत्यधिक आश्चर्यचकित इन्द्र का हृदय भी द्रवित हो गया तथा इन्द्र की कृपा से शीघ्र ही तेज वर्षा होने लगी। सभी जगह पानी ही पानी हो गया, इससे किसान अत्यन्त प्रसन्न होकर अपने दोनों बैलों को लेकर घर चला गया।
कथा के अन्त में कहा गया है कि सभी सन्तानों में माता का समान रूप से स्नेहभाव होता है, किन्तु दीन पुत्र के प्रति माता के मन में अतिशय प्रेम होता है।
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