RajBoardExam
सामाजिक विज्ञान (Social Science)हिंदी माध्यम2026-27

RBSE Class 10 SST Chapter 15 Solutions in Hindi — [राजनीति विज्ञान] जाति, धर्म और लैंगिक मसले | पासबुक हल, नोट्स

📅 अंतिम अपडेट: 2026-09-10📖 RBSE/NCERT Solutions
भाग 1 — समाधान (राजनीति विज्ञान पाठ 3)

📖 1. समाधान: पाठगत एवं पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नोत्तर

राजस्थान बोर्ड कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान (राजनीति विज्ञान) — सभी पाठगत प्रश्नों एवं पाठ्यपुस्तक अभ्यास के संपूर्ण सटीक उत्तर।

[पाठगत प्रश्न]

पृष्ठ 33

प्रश्न 1. मम्मी हरदम बाहर वालों से कहती है, "मैं काम नहीं करती। मैं तो हाउस वाइफ हूँ।" पर मैं देखती हूँ कि वह लगातार काम करती रहती हैं। अगर वे जो करती हैं, उसे काम नहीं कहते तो फिर काम किसे कहते हैं?

उत्तर— समाज उसी कार्य को 'काम करने' का महत्त्व देता है जिसका प्रतिफल मौद्रिक रूप में व्यक्ति को प्राप्त होता है। इसलिए महिलाओं के घरेलू कामकाज को समाज द्वारा अधिक मूल्यवान नहीं माना जाता और उन्हें दिन-रात काम करके भी श्रम का मूल्य नहीं मिलता।

पृष्ठ 34

प्रश्न 2. भारत में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। क्या आप इसके कुछ कारण बता सकते हैं? क्या आप मानते हैं कि अमेरिका और यूरोप में महिलाओं का प्रतिनिधित्व इस स्तर तक पहुँच गया है कि उसे संतोषजनक कहा जा सके?

उत्तर— जी हाँ, भारत में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। भारत में लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या पहली बार 2019 में ही 14.36 फीसदी तक पहुँची है, वहीं राज्यों की विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व 5 फीसदी से भी कम है। इसके अनेक कारण हैं। कुछ प्रमुख कारण निम्न प्रकार हैं-

(1) भारत का समाज आज भी पितृ प्रधान समाज है।

(2) महिलाओं में शिक्षा का प्रसार बहुत कम है।

(3) महिलाओं में साक्षरता की दर अब भी मात्र 54 फीसदी ही है।

(4) राजनीति में महिलाएँ रुचि कम रखती हैं।

(5) महिला उत्पीड़न, शोषण तथा हिंसा की घटनाओं के चलते महिलाएँ इस क्षेत्र में आगे नहीं आतीं।

(6) महिला सुरक्षा की पूरी व्यवस्था न होना, आदि।

अमेरिका तथा यूरोप में महिलाओं का प्रतिनिधित्व— हमारा मानना है कि भारत की तुलना में अमेरिका तथा यूरोप में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी अच्छा है। लेकिन फिर भी इसे संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। 1 अक्टूबर, 2018 तक अमेरिका की राष्ट्रीय संसद में 29.5 प्रतिशत महिलाएँ तो यूरोप में नॉर्डिक देशों को छोड़कर 26.4 प्रतिशत महिलाएँ थीं। नॉर्डिक देशों में यह प्रतिशत 42.3 था। इस प्रकार अमेरिका तथा यूरोप में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी उनकी जनसंख्या के अनुपात से काफी कम है।

--- [ पृष्ठ संख्या: 303 ] ---

पृष्ठ 35

प्रश्न 3. अगर जातिवाद और संप्रदायवाद खराब चीज है तो नारीवाद क्यों अच्छा है? हम समाज को जाति, धर्म या लिंग के आधार पर बाँटने वाली हर बात का विरोध क्यों नहीं करते?

उत्तर— जातिवाद और संप्रदायवाद दोनों खराब चीजें हैं। जातिवाद समाज को जाति के आधार पर और संप्रदायवाद समाज को धर्म के आधार पर बाँटता है।

इनके विपरीत नारीवाद नारी के हक की बात करता है। वह समाज में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार दिलाने को जागरूक करता है। इसलिए नारीवाद अच्छा है।

हम समाज को जाति, धर्म या लिंग के आधार पर बाँटने वाली हर बात का विरोध इसलिए नहीं करते क्योंकि हमारे अन्दर जागरूकता की कमी है।

पृष्ठ 36

प्रश्न 4. मैं धार्मिक नहीं हूँ, मुझे साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की परवाह क्यों करनी चाहिए?

उत्तर— चूँकि साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन को बहुत हद तक प्रभावित करती हैं अतः हमें साम्प्रदायिकता का विरोध और धर्मनिरपेक्षता का समर्थन चाहिए, चाहे हम धार्मिक हों या न हों।

पृष्ठ 37

प्रश्न 5. मैं अक्सर दूसरे धर्म के लोगों के बारे में चुटकुले सुनाता हूँ। क्या इससे मैं भी सांप्रदायिक बन जाता हूँ?

उत्तर— हमारे देश में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। किसी एक धर्म के व्यक्ति द्वारा दूसरे धर्म के लोगों के बारे में चुटकुले सुनाना उचित नहीं है। इससे उस धर्म को मानने वाले लोगों की भावनाएँ आहत हो सकती हैं। इससे सांप्रदायिक तनाव भी पैदा हो सकता है।

पृष्ठ 39

प्रश्न 6. मुझे अपनी जाति की परवाह नहीं रहती। हम पाठ्यपुस्तक में इसकी चर्चा क्यों कर रहे हैं? क्या हम जाति पर चर्चा करके जातिवाद को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं?

उत्तर— चूँकि जातिवाद राजनीति को और राजनीति जातिवाद को प्रभावित करते हैं। जातिवाद लोकतंत्र के सफलतापूर्वक संचालन के मार्ग में बाधा उत्पन्न करता है। इस पर चर्चा करके हम इसके प्रभाव को कम करने के लिए हल ढूँढ सकते हैं और इसे बढ़ने से रोक सकते हैं।

---

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1. जीवन के उन विभिन्न पहलुओं का जिक्र करें जिनमें भारत में स्त्रियों के साथ भेदभाव होता है या वे कमजोर स्थिति में होती हैं। (प्रश्न बैंक)

अथवा

भारत में महिलाओं की स्थिति अभी भी पुरुषों से काफी पीछे है। क्यों? कोई चार की विवेचना कीजिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2022)

अथवा

"भारतीय समाज अभी भी पितृप्रधान है, जिसमें महिलाओं के साथ भेदभाव होते हैं।" इस कथन की विस्तृत विवेचना कीजिये। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)

उत्तर— भारत में आजादी के बाद से महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन वे अभी भी पुरुषों से काफी पीछे हैं। इसका कारण उनके साथ होने वाले भेदभाव हैं क्योंकि भारतीय समाज अभी भी पितृप्रधान है। भारत में स्त्रियों के साथ अभी भी निम्नलिखित पहलुओं में भेदभाव होते हैं और उनका दमन होता है-

(1) शिक्षा के क्षेत्र में भेदभाव—भारत में महिलाओं में साक्षरता की दर अब भी मात्र 54 फीसदी है, जबकि पुरुषों में 76 फीसदी।¹ इसी प्रकार स्कूल पास करने वाली लड़कियों की एक सीमित संख्या ही उच्च शिक्षा की ओर

---

1. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में महिला साक्षरता दर 65.46% तथा पुरुष साक्षरता दर 82.14% है।

--- [ पृष्ठ संख्या: 304 ] ---

सामाजिक विज्ञान (राजनीति विज्ञान) कक्षा X 297

कदम बढ़ा पाती है। क्योंकि माँ-बाप अपने संसाधनों को लड़के-लड़की दोनों पर खर्च करने की जगह लड़कों पर ज्यादा खर्च करना पसंद करते हैं।

(2) ऊँचे पदों पर महिलाओं की कम संख्या- अब भी भारत में ऊँचा वेतन और ऊँचे पदों पर पहुँचने वाली महिलाओं की संख्या बहुत ही कम है। भारत में औसतन एक स्त्री एक पुरुष की तुलना में रोजाना एक घंटा ज्यादा काम करती है पर उसको ज्यादातर काम के लिए पैसे नहीं मिलते। इसलिए अक्सर उसके काम को मूल्यवान नहीं माना जाता।

(3) समान कार्य के लिए समान मजदूरी नहीं- काम के अनेक क्षेत्रों में यानी खेल-कूद की दुनिया से लेकर खेत-खलिहान तक महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी मिलती है, भले ही दोनों ने समान काम किया हो।

(4) सिर्फ लड़के की चाह- भारत के अनेक हिस्सों में माँ-बाप को सिर्फ लड़के की चाह होती है। लड़की को जन्म लेने से पहले ही खत्म कर देने के तरीके इसी मानसिकता से पनपते हैं। इससे देश का लिंग-अनुपात गिरकर 919 रह गया है।¹

(5) महिलाओं का उत्पीड़न व शोषण- महिलाओं पर उत्पीड़न, शोषण और उन पर होने वाली हिंसा की खबरें हमें रोज पढ़ने को मिलती हैं। शहरी इलाके तो महिलाओं के लिए खासतौर से सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि वहाँ भी उन्हें मारपीट तथा अनेक तरह की घरेलू हिंसा झेलनी पड़ती है।

प्रश्न 2. विभिन्न तरह की साम्प्रदायिक राजनीति का ब्यौरा दें और सबके साथ एक-एक उदाहरण भी दें।

अथवा

भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिक राजनीति की अभिव्यक्ति के विभिन्न रूप क्या हैं?

अथवा

"साम्प्रदायिक राजनीति अनेक रूप धारण कर सकती है।" इस कथन की व्याख्या कीजिए।

उत्तर— विभिन्न तरह की साम्प्रदायिक राजनीति का ब्यौरा निम्नलिखित है-

(1) धार्मिक पूर्वाग्रह (दैनिक जीवन में साम्प्रदायिकता)- धार्मिक पूर्वाग्रह में धार्मिक समुदायों के बारे में बनी-बनाई धारणाएँ एवं एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ मानने की मान्यताएँ सम्मिलित हैं। साम्प्रदायिकता की सबसे आम अभिव्यक्ति दैनिक जीवन में ही देखने को मिलती है। इनकी ये चीजें इतनी आम हैं कि अक्सर हमारा ध्यान इस ओर नहीं जाता है, जबकि ये हमारे अन्दर ही बैठी होती हैं।

(2) बहुसंख्यकवाद- साम्प्रदायिक सोच अक्सर अपने धार्मिक समुदाय का राजनैतिक प्रभुत्व स्थापित करने की फिराक में रहती है। जो लोग बहुसंख्यक समुदाय से सम्बन्ध रखते हैं उनकी यह कोशिश बहुसंख्यकवाद का रूप ले लेती है और जो लोग अल्पसंख्यक समुदाय के होते हैं उनमें यह विश्वास अलग राजनैतिक इकाई बनाने की इच्छा का रूप ले लेता है।

(3) साम्प्रदायिक आधार पर राजनीतिक गोलबंदी- इसके अन्तर्गत धर्म के पवित्र प्रतीकों, धर्म-गुरुओं, भावनात्मक अपील एवं अपने ही लोगों के मन में डर बैठाने जैसे तरीके का उपयोग किया जाना एक सामान्य बात है। चुनावी राजनीति में एक धर्म के मतदाताओं की भावनाओं अथवा हितों की बात उठाने जैसे तरीके सामान्यतया अपनाए जाते हैं।

(4) साम्प्रदायिक हिंसा- साम्प्रदायिकता कई बार अपना सबसे बुरा रूप साम्प्रदायिक हिंसा, दंगा, नरसंहार के रूप में ग्रहण कर लेती है। उदाहरण के लिए, देश विभाजन के समय भारत व पाकिस्तान में भयावह साम्प्रदायिक दंगे हुए थे। आजादी के पश्चात् भी बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा हुई।

प्रश्न 3. बताइये कि भारत में किस तरह अभी भी जातिगत असमानताएँ जारी हैं?

उत्तर— भारत में जातीय असमानताएँ- भारत में अभी भी जातिगत असमानताएँ जारी हैं। यथा-

(1) भारत में अभी भी अधिकतर लोग अपनी जाति या कबीले में ही विवाह करते हैं।

(2) स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान के बावजूद छुआछूत की प्रथा अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

(3) जिन जातियों में पहले से ही पढ़ाई-लिखाई का चलन मौजूद था और जिनकी शिक्षा पर पकड़ थी, आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में भी उन्हीं का बोलबाला है। जिन जातियों को पहले शिक्षा से वंचित रखा जाता था, उनके सदस्य अभी भी स्वाभाविक रूप से पिछड़े हुए हैं। यही कारण है कि शहरी मध्यम वर्ग में अगड़ी जाति के लोगों का अनुपात असामान्य रूप से काफी ज्यादा है।

__________________

1. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लिंगानुपात 943 है।

--- [ पृष्ठ संख्या: 305 ] ---

(4) जाति और आर्थिक हैसियत में काफी निकट का सम्बन्ध है। ऊँची जाति के लोगों की आर्थिक स्थिति सबसे अच्छी है, दलित तथा आदिवासियों की आर्थिक स्थिति सबसे खराब है; जबकि पिछड़ी जातियाँ बीच की स्थिति में हैं।

(5) जाति व्यवस्था के अन्तर्गत सदियों से कुछ समूहों को लाभ की स्थिति में; तो कुछ समूहों को दबाकर रखा गया है। इसका प्रभाव आज तक नजर आता है।

प्रश्न 4. दो कारण बताएँ कि क्यों सिर्फ जाति के आधार पर भारत में चुनावी नतीजे तय नहीं हो सकते।

उत्तर— भारत में सिर्फ जाति के आधार पर ही चुनावी नतीजे तय नहीं होते; क्योंकि-

(1) देश के किसी भी एक संसदीय चुनाव क्षेत्र में किसी एक जाति के लोगों का बहुमत नहीं है।

(2) कभी-कभी एक ही जाति के अनेक उम्मीदवार एक ही संसदीय क्षेत्र में मैदान में होते हैं।

(3) कोई भी पार्टी किसी एक जाति या समुदाय के सभी लोगों का वोट हासिल नहीं कर सकती।

प्रश्न 5. भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति क्या है?

उत्तर— भारत की विधायिका में महिला प्रतिनिधियों का अनुपात बहुत ही कम है। भारतीय लोकतंत्र तीन स्तरों पर कार्यरत है और तीनों स्तरों पर अलग-अलग महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति है। यथा-

(1) केन्द्रीय स्तर पर संसद में स्त्रियों का प्रतिनिधित्व पहली बार 2019 में ही 14.36% तक पहुँचा है।

(2) राज्यों की विधायिकाओं में तो यह 5 प्रतिशत से भी कम है।

(3) स्थानीय शासन की विधायिकाओं में वर्तमान में महिलाओं का 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व आरक्षित है। आज भारत के ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में निर्वाचित महिलाओं की संख्या 10 लाख से ज्यादा है।

प्रश्न 6. किन्हीं दो प्रावधानों का जिक्र करें जो भारत को धर्मनिरपेक्ष देश बनाते हैं।

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25, 2023-24)

उत्तर— भारत को धर्मनिरपेक्ष देश बनाने वाले दो प्रावधान ये हैं-

(1) भारत राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है। संविधान के अनुसार सरकार किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगी।

(2) देश के सभी नागरिकों को कोई भी धर्म अपनाने की स्वतंत्रता दी गई है। नागरिक अपनी इच्छा से किसी भी धर्म को मान सकते हैं तथा उसका प्रचार कर सकते हैं।

प्रश्न 7. जब हम लैंगिक विभाजन की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय होता है :

(क) स्त्री और पुरुष के बीच जैविक अंतर।

(ख) समाज द्वारा स्त्री और पुरुष को दी गई असमान भूमिकाएँ।

(ग) बालक और बालिकाओं की संख्या का अनुपात।

(घ) लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में महिलाओं को मतदान का अधिकार न मिलना।

उत्तर— (ख) 'समाज द्वारा स्त्री और पुरुष को दी गई असमान भूमिकाएँ।'

प्रश्न 8. भारत में यहाँ औरतों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है-

(क) लोकसभा (ख) विधानसभा

(ग) मंत्रिमंडल (घ) पंचायती राज की संस्थाएँ।

अथवा

भारत में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था है- (प्रश्न बैंक)

(क) राज्यसभा में (ख) लोकसभा में

(ग) विधानसभा में (घ) पंचायती राज की संस्थाएँ

उत्तर— (घ) पंचायती राज की संस्थाएँ।

प्रश्न 9. सांप्रदायिक राजनीति के अर्थ संबंधी निम्नलिखित कथनों पर गौर करें। सांप्रदायिक राजनीति इस धारणा पर आधारित है कि :

(अ) एक धर्म दूसरों से श्रेष्ठ है।

(ब) विभिन्न धर्मों के लोग समान नागरिक के रूप में खुशी-खुशी साथ रह सकते हैं।

(स) एक धर्म के अनुयायी एक समुदाय बनाते हैं।

(द) एक धार्मिक समूह का प्रभुत्व बाकी सभी धर्मों पर कायम करने में शासन की शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

--- [ पृष्ठ संख्या: 306 ] ---

सामाजिक विज्ञान (राजनीति विज्ञान) कक्षा X 299

इनमें से कौन या कौन-कौन से कथन सही हैं?

(क) अ, ब, स और द (ख) अ, ब और द (ग) अ और स (घ) ब और द।

उत्तर—(ग) अ और स।

प्रश्न 10. भारतीय संविधान के बारे में इनमें से कौन-सा कथन गलत है?

(क) यह धर्म के आधार पर भेदभाव की मनाही करता है।

(ख) यह एक धर्म को राजकीय धर्म बताता है।

(ग) सभी लोगों को कोई भी धर्म मानने की आजादी देता है।

(घ) किसी धार्मिक समुदाय में सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है।

उत्तर—(ख) यह एक धर्म को राजकीय धर्म बताता है।

प्रश्न 11. ............... पर आधारित सामाजिक विभाजन सिर्फ भारत में ही है।

उत्तर—जाति।

प्रश्न 12. सूची I और सूची II का मेल कराएँ और आगे दिए गए कोड के आधार पर सही जवाब खोजें।

[सूची I और सूची II का मिलान तालिका]

कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान पाठ 15 जाति, धर्म और लैंगिक मसले चित्र 1

सूची-I

सूची-II

1. अधिकारों और अवसरों के मामले में स्त्री और पुरुष की बराबरी मानने वाला व्यक्ति

(क) सांप्रदायिक

2. धर्म को समुदाय का मुख्य आधार मानने वाला व्यक्ति

(ख) नारीवादी

3. जाति को समुदाय का मुख्य आधार मानने वाला व्यक्ति

(ग) धर्मनिरपेक्ष

4. व्यक्तियों के बीच धार्मिक आस्था के आधार पर भेदभाव न करने वाला व्यक्ति

(घ) जातिवादी

1

2

3

4

(सा)

(रे)

(गा)

(मा)

उत्तर—(रे) ख, क, घ, ग।

---

भाग 2 — रिवीजन नोट्स (Notes & Summary)

📝 2. नोट्स: पाठ-सार, मुख्य बिंदु एवं शब्दावली

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं, भौगोलिक परिभाषाएं, राजनीतिक सिद्धांत एवं संपूर्ण अध्याय का सारगर्भित सारांश।

[पाठ-सार]

कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान पाठ 15 जाति, धर्म और लैंगिक मसले चित्र 2

(1) लैंगिक मसले और राजनीति- सामाजिक असमानता का लैंगिक असमानता सम्बन्धी रूप हर जगह नजर आता है। लैंगिक असमानता को स्वाभाविक (प्राकृतिक) और अपरिवर्तनीय मान लिया जाता है। लेकिन लैंगिक असमानता का आधार स्त्री-पुरुष की जैविक बनावट नहीं वरन् इन दोनों के बारे में प्रचलित रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ हैं।

• संसार में लैंगिक आधार पर श्रम विभाजन बहुत आम है तथा यह सदियों से चलता आ रहा है कि स्त्रियों का कार्यक्षेत्र घर की चार-दीवारी के अन्दर है और पुरुष का बाहर। जबकि सच्चाई यह है कि अधिकतर महिलाएँ अपने घरेलू काम के अतिरिक्त अपनी आय के लिए कुछ न कुछ काम करती हैं, लेकिन उनके काम को मूल्यवान नहीं माना जाता। श्रम के इस तरह के विभाजन का नतीजा यह हुआ कि औरत घर की चारदीवारी में सिमट कर रह गई और बाहर का सार्वजनिक जीवन पुरुषों के कब्जे में आ गया।

• मनुष्य जाति की आबादी में औरतों का हिस्सा आधा है, पर सार्वजनिक जीवन में, विशेषकर राजनीति में उनकी भूमिका नगण्य है। यह बात अधिकतर समाजों पर लागू होती है।

--- [ पृष्ठ संख्या: 301 ] ---

  • नारीवादी आंदोलनों के जीवन के हर क्षेत्र में स्त्रियों की अधिक से अधिक भागीदारी की वकालत से सार्वजनिक जीवन में औरतों की भूमिका बढ़ी है तथा कुछ देशों में आज सार्वजनिक जीवन में भागीदारी का स्तर काफी ऊँचा है।
  • भारत में स्वतंत्रता के बाद से महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी वे पुरुषों से काफी पीछे हैं। इसके प्रमुख कारण हैं-पितृ-प्रधान समाज, महिलाओं में साक्षरता की कमी, महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी देना, लड़के की चाह आदि।

महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व-लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त करने के लिए नारीवादी समूह ने प्रतिनिधि संस्थाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने पर बल दिया। भारत में लोकसभा महिला सांसदों की संख्या पहली बार 2019 में ही 14.36 फीसदी तक पहुँच सकी है, जबकि राज्यों की विधायिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 5 फीसदी से भी कम है। इस समस्या को सुलझाने के लिए एक-तिहाई सीटों पर महिलाओं के आरक्षण की माँग की। स्थानीय शासन संस्थाओं में तो यह आरक्षण प्रदान कर दिया गया है लेकिन राज्य विधायिकाओं और संसद में अभी तक संभव नहीं हो पाया है। यद्यपि संसद में इस आशय का प्रस्ताव पेश कर दिया गया था किन्तु वह पास नहीं हो सका है।

(2) धर्म, साम्प्रदायिकता और राजनीति-(i) धर्म-धर्म पर आधारित असमानता-भारत समेत अनेक देशों में अलग-अलग धर्मों के मानने वाले लोग रहते हैं। धार्मिक विभाजन प्रायः राजनीति के मैदान में अभिव्यक्त होता है। लेकिन यदि शासन सभी धर्मों के साथ समान बरताव करता है तो उसके ऐसे कामों में कोई बुराई नहीं है।

(ii) साम्प्रदायिकता-साम्प्रदायिकता की समस्या तब उठ खड़ी होती है जब धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है या जब राजनीति में धर्म की अभिव्यक्ति एक समुदाय की विशिष्टता के दावे और पक्षपोषण का रूप लेने लगती है तथा इसके अनुयायी दूसरे धर्मावलम्बियों के खिलाफ मोर्चा खोलने लगते हैं। राजनीति को धर्म से इस तरह जोड़ना ही साम्प्रदायिकता है।

साम्प्रदायिकता राजनीति में अनेक रूप धारण कर सकती है-(1) एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ मानना, (2) बहुसंख्यकवाद, (3) साम्प्रदायिक आधार पर राजनीतिक गोलबन्दी।

(iii) धर्मनिरपेक्ष शासन-भारतीय संविधान निर्माताओं ने भारत के लिए धर्मनिरपेक्ष शासन का मॉडल चुना। इसमें शामिल हैं-(1) राज्य द्वारा किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में अंगीकार नहीं करना; (2) सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता; (3) धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं; (4) धार्मिक समुदायों में समानता हेतु धार्मिक मामलों में शासन का दखल का अधिकार।

(3) जाति और राजनीति-भारतीय राजनीति में सामाजिक विभाजन की एक अभिव्यक्ति जाति और राजनीति की है। इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पक्ष हैं। यथा-

जातिगत असमानताएँ-जाति पर आधारित विभाजन सिर्फ भारतीय समाज में ही देखने को मिलता है। इसमें जन्म आधारित ऊँच-नीच की व्यवस्था तथा व्यवसाय, विवाह और खान-पान की पृथकता पाई जाती है।

वर्ण-व्यवस्था-वर्ण व्यवस्था अन्य जाति-समूहों से भेदभाव और उन्हें अपने से अलग मानने की धारणा पर आधारित है।

जाति प्रथा में परिवर्तन-भारत में आर्थिक विकास, शहरीकरण, साक्षरता, शिक्षा के विकास, पेशा चुनने की आजादी और जमींदारी व्यवस्था के कमजोर पड़ने आदि कारणों से जाति-व्यवस्था की पुरातन मान्यता में बदलाव आ रहा है। लेकिन जाति प्रथा के कुछ पुराने पहलू अभी भी विद्यमान हैं, ये हैं-जातिगत विवाह तथा निम्न जातियों को दबाकर रखने की स्थिति।

राजनीति में जाति-राजनीति में जाति अनेक रूप ले सकती है-

(1) चुनाव में उम्मीदवारी का निर्धारण जातीय गणित के आधार पर।

(2) राजनीतिक दलों द्वारा वोट हेतु जातिगत भावनाओं को उकसाना।

(3) निम्न जातियों के लोगों में राजनीतिक चेतना का पैदा होना।

(4) वोट बैंक की राजनीति करना।

(5) क्षेत्र में बहुसंख्यक जाति के उम्मीदवार का ही होना।

--- [ पृष्ठ संख्या: 302 ] ---

सामाजिक विज्ञान (राजनीति विज्ञान) कक्षा X | 295

(6) जातियों और समुदायों की अलग-अलग राजनीतिक पसंद के कारण सत्ताधारी दल के प्रत्याशियों या वर्तमान विधायकों का हारना संभव।

(7) जाति के जुड़ाव के साथ ही साथ, लोगों का दलों के साथ भी जुड़ाव, जाति में गरीब तथा अमीर लोगों के अलग-अलग रुझान का होना तथा सरकार के कामकाज के प्रति लोगों का दृष्टिकोण भी राजनीति पर प्रभाव डालते हैं।

जाति के अन्दर राजनीति-

राजनीति भी जातियों को राजनीति के अखाड़े में लाकर जाति व्यवस्था और जातिगत पहचान को प्रभावित करती है। यथा-

(i) हर जाति खुद को बड़ा बनाने के लिए अपने समूह की उपजातियों को भी अपने साथ लाने की कोशिश करती है।

(ii) एक जाति सत्ता पर कब्जा करने के लिए दूसरी जातियों या समुदायों को भी साथ लाने की कोशिश करती है।

(iii) राजनीति में नए किस्म की जातिगत गोलबंदी भी हुई है, जैसे-'अगड़ा' और 'पिछड़ा'।

इस प्रकार जाति राजनीति में कई तरह की भूमिकाएँ निभाती हैं।

जातिगत राजनीति ने दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों के लिए सत्ता तक पहुँचने तथा निर्णय प्रक्रिया को बेहतर ढंग से प्रभावित करने की स्थिति भी पैदा की है।

---

भाग 3 — परीक्षा उपयोगी प्रश्न (Important Questions)

3. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), रिक्त स्थान, अतिलघूत्तरात्मक, लघूत्तरात्मक एवं निबंधात्मक परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

● बहुविकल्पीय प्रश्न-

1. एक विचारधारा जो अधिकारों एवं अवसरों के मामले में स्त्री व पुरुष को बराबर मानती है, वह है- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)

(अ) साम्प्रदायिक (ब) तानाशाही (स) नारीवादी (द) जातिवादी

अथवा

नारीवादी वह पुरुष या स्त्री है जो विश्वास करता है-

(अ) पुरुष और स्त्री के संयुक्त अधिकारों में (ब) पुरुष और स्त्री के अलग-अलग अधिकारों में

(स) पुरुष और स्त्री के समान अधिकारों में (द) उपर्युक्त में से कोई नहीं

2. निम्न में से किन देशों में सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी का स्तर सबसे ऊँचा है?

(अ) यूरोप के देशों में (ब) स्कैंडिनेवियाई देशों में

(स) एशिया के देशों में (द) अफ्रीकी देशों में

3. निम्न में से किस देश में सार्वजनिक जीवन में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सबसे कम है?

(अ) भारत (ब) स्वीडन (स) नार्वे (द) अमेरिका

4. राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व की समस्या को कैसे हल किया जा सकता है?

(अ) शिक्षा में सुविधाएँ देकर (ब) आरक्षण प्रदान करके

(स) स्त्रियों में जागरूकता पैदा करके (द) उपर्युक्त में से कोई नहीं

5. 'धर्म को कभी भी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता' यह कथन है-

--- [ पृष्ठ संख्या: 307 ] ---

(अ) महात्मा गांधी का (ब) सुभाष चन्द्र बोस का

(स) जवाहरलाल नेहरू का (द) कार्ल मार्क्स का

6. भारतीय समाज है-

(अ) मातृ प्रधान (ब) बाल प्रधान (स) पितृ प्रधान (द) मातृ-पितृ प्रधान

7. 2019 में महिला सांसदों का प्रतिशत है- (प्रश्न बैंक)

(अ) 13.36% (ब) 15.3% (स) 14.36% (द) 16.66%

8. स्थानीय सरकारों में महिलाओं के लिए कितने पद आरक्षित किये गये हैं?

(अ) एक-चौथाई (ब) एक-तिहाई (स) आधे (द) दो-तिहाई

9. धर्म को राष्ट्र का आधार मानने पर कौनसी समस्या शुरू होती है?

(अ) साम्प्रदायिकता की (ब) जातिवाद की

(स) लैंगिक असमानता की (द) क्षेत्रवाद की

10. निम्न में से कौनसा समाज सुधारक जातिगत भेदभावों से मुक्त समाज व्यवस्था बनाने की बात करता था?

(अ) पेरियार रामास्वामी नायकर (ब) डॉ. अम्बेडकर

(स) महात्मा गांधी (द) उपर्युक्त सभी

11. लैंगिक असमानता का आधार नहीं है-

(अ) स्त्री-पुरुष की जैविक बनावट (ब) स्त्री-पुरुष के बारे में प्रचलित रूढ़ छवियाँ

(स) स्त्री-पुरुष दोनों की तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ (द) उपर्युक्त सभी

12. निम्न में से किस राज्य में बाल लिंग-अनुपात 850 से कम है?

(अ) हरियाणा (ब) राजस्थान (स) तमिलनाडु (द) केरल

13. विश्व के विभिन्न क्षेत्रों की राष्ट्रीय संसदों में महिलाओं का औसत है-

(अ) 42.3% (ब) 24% (स) 11.8% (द) 29.5%

14. निम्न में से किस क्षेत्र की संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सर्वाधिक है?

(अ) भारत (ब) उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका

(स) नार्डिक देश (द) यूरोप

15. भारत में राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व है-

(अ) 12 प्रतिशत (ब) 10 प्रतिशत (स) 8 प्रतिशत (द) 5 प्रतिशत

16. किसी देश का धार्मिक विभाजन अक्सर अभिव्यक्त होता है-

(अ) आर्थिक क्षेत्र में (ब) राजनीतिक क्षेत्र में (स) सामाजिक क्षेत्र में (द) भाषायी क्षेत्र में

17. साम्प्रदायिकता राजनीति में कौनसा रूप धारण कर सकती है?

(अ) धार्मिक पूर्वाग्रह का (ब) बहुसंख्यकवाद का

(स) साम्प्रदायिक हिंसा का (द) उपर्युक्त सभी

18. जाति पर आधारित सामाजिक विभाजन जिस देश में पाया जाता है, वह है-

(अ) इंग्लैंड (ब) फ्रांस (स) भारत (द) रूस

19. जब हम लैंगिक विभाजन की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय होता है-

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22)

(अ) स्त्री और पुरुष के बीच जैविक अन्तर

(ब) समाज द्वारा स्त्री और पुरुष को दी गई असमान भूमिकाएँ

(स) बालक और बालिकाओं की संख्या का अनुपात

(द) लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में महिलाओं को मतदान का अधिकार न मिलना

20. सामाजिक विभाजन अधिकांशतः आधारित होता है- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)

(अ) मृत्यु पर (ब) वंश पर (स) परिवार पर (द) जन्म पर

21. समान मजदूरी से संबंधित अधिनियम में कहा गया है-

(अ) समान काम के लिए समान मजदूरी (ब) असमान काम के लिए समान वेतन

(स) समान काम के लिए असमान वेतन (द) किसी काम के लिए मजदूरी नहीं

--- [ पृष्ठ संख्या: 308 ] ---

सामाजिक विज्ञान (राजनीति विज्ञान) कक्षा X 301

22. जिस व्यवस्था में पेशा के वंशानुगत विभाजन को रीति-रिवाजों की मान्यता प्राप्त है, वह है-

(अ) लिंग आधारित विभाजन (ब) धर्म आधारित विभाजन

(स) जाति आधारित विभाजन (द) उपर्युक्त में से कोई नहीं

23. आज भारत में जिस कारण से जाति व्यवस्था के पुराने स्वरूप में बदलाव आ रहा है, वह कारण है-

(अ) आर्थिक विकास (ब) शहरीकरण (स) पेशा चुनने की आजादी (द) उपर्युक्त सभी

24. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में सिख समुदाय की आबादी है-

(अ) 79.8 प्रतिशत (ब) 14.2 प्रतिशत (स) 2.3 प्रतिशत (द) 1.7 प्रतिशत

25. 2011 में देश की आबादी में अनुसूचित जातियों का हिस्सा है- (प्रश्न बैंक)

(अ) 16.6% (ब) 15.5% (स) 14.4% (द) 13.3%

26. 'जाति' को समुदाय का मुख्य आधार मानने वाला व्यक्ति कहलाता है- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)

(अ) धर्मनिरपेक्ष (ब) जातिवादी (स) साम्प्रदायिक (द) नारीवादी

27. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत का लिंगानुपात है- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)

अथवा

हमारे देश में लिंगानुपात है- (प्रश्न बैंक)

(अ) 929 (ब) 943 (स) 919 (द) 939

28. भारत में निम्न में से महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था है- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)

(अ) लोक सभा (ब) राज्य सभा (स) विधानसभा (द) पंचायती राज की संस्थाएँ

29. महिलाओं की साक्षरता की वर्तमान (2011 के अनुसार) प्रतिशत दर है- (प्रश्न बैंक)

(अ) 54% (ब) 65.46% (स) 50% (द) 64%

30. 2011 की जनगणना के अनुसार हिन्दुओं की आबादी प्रतिशत है- (प्रश्न बैंक)

(अ) 60% (ब) 70% (स) 79.8% (द) 80%

31. 2011 की जनगणना के अनुसार निम्न में से किस धार्मिक समुदाय की आबादी सर्वाधिक है? (प्रश्न बैंक)

(अ) सिक्ख (ब) बौद्ध (स) मुस्लिम (द) जैन

उत्तरमाला

1. (स) 2. (ब) 3. (अ) 4. (ब) 5. (अ) 6. (स) 7. (स)

8. (ब) 9. (अ) 10. (द) 11. (अ) 12. (अ) 13. (ब) 14. (स)

15. (द) 16. (ब) 17. (द) 18. (स) 19. (ब) 20. (द) 21. (अ)

22. (स) 23. (द) 24. (द) 25. (अ) 26. (ब) 27. (ब) 28. (द)

29. (ब) 30. (स) 31. (स)।

● रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-

1. भारत में ......... के बाद से महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है।

2. साम्प्रदायिक सोच अक्सर अपने धार्मिक समुदाय का .......... स्थापित करने की फिराक में रहती है।

3. विभाजन के समय भारत और पाकिस्तान में भयावह .......... दंगे हुए थे।

4. ........ पर आधारित विभाजन सिर्फ भारतीय समाज में ही देखने को मिलता है।

5. सिर्फ .......... पहचान पर आधारित राजनीति लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं होती।

6. ............. अन्य जाति समूहों से भेदभाव और उन्हें अपने से अलग मानने की धारणा पर आधारित है। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22)

7. व्यक्तियों के बीच धार्मिक आस्था के आधार पर भेदभाव नहीं करने वाला व्यक्ति ................ कहलाता है। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2022)

8. ग्रामीण क्षेत्रों से निकलकर लोगों का शहरों में बसना ................ कहलाता है।

9. अनुसूचित जातियों में, जिन्हें आमतौर पर दलित कहा जाता है, सामान्यतः सामाजिक व्यवस्था में अछूत मानी जाने वाली ............. जातियाँ आती हैं।

10. जनगणना में अभी तक ................ की गिनती नहीं की जाती है।

--- [ पृष्ठ संख्या: 309 ] ---

11. "धर्म को राजनीति से कभी अलग नहीं किया जा सकता।" ये शब्द ............... ने कहे।

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)

12. औरतों के साथ अभी भी कई तरह के ............... होते हैं। (प्रश्न बैंक)

13. भारत के अनेक हिस्सों में मां-बाप को सिर्फ ............... चाह होती है। (प्रश्न बैंक)

14. शहरी इलाके तो ............... के लिए खास तौर पर असुरक्षित हैं। (प्रश्न बैंक)

15. समस्याएँ तब शुरू होती हैं जब ............... को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है। (प्रश्न बैंक)

16. साम्प्रदायिक आधार पर राजनीतिक ............... साम्प्रदायिकता का दूसरा रूप है। (प्रश्न बैंक)

उत्तरमाला

1. आजादी | 2. राजनीतिक प्रभुत्व | 3. साम्प्रदायिक | 4. जाति | 5. जातिगत

6. वर्ण-व्यवस्था | 7. धर्मनिरपेक्ष | 8. शहरीकरण | 9. हिन्दू | 10. अन्य पिछड़ी जातियों

11. महात्मा गाँधी | 12. भेदभाव | 13. बेटे की | 14. महिलाओं | 15. धर्म

16. गोलबंदी।

● अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. लैंगिक असमानता का आधार क्या है?

उत्तर— लैंगिक असमानता का आधार है-प्रचलित रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ।

प्रश्न 2. 'औरतों की मुख्य जिम्मेदारी गृहस्थी चलाने और बच्चों के लालन-पालन करने की है।' यह बात किस विभाजन से झलकती है?

उत्तर— यह बात श्रम के लैंगिक विभाजन से झलकती है।

प्रश्न 3. औरत और मर्द के समान अधिकारों और अवसरों में विश्वास करने वाली महिला या पुरुष को क्या कहा जाता है?

उत्तर— नारीवादी।

प्रश्न 4. सामाजिक असमानता का कौन-सा रूप प्रत्येक स्थान पर दिखाई देता है?

उत्तर— लैंगिक असमानता का।

प्रश्न 5. सन् 2011 में भारत के किन राज्यों में बाल लिंगानुपात 875 से भी कम था?

उत्तर— पंजाब, हरियाणा और जम्मू एवं कश्मीर में।

प्रश्न 6. भारत में सन् 2011 में हिन्दू धर्मावलम्बियों की जनसंख्या कितने प्रतिशत थी?

उत्तर— 79.8 प्रतिशत।

प्रश्न 7. श्रम के लैंगिक विभाजन से क्या आशय है?

उत्तर— काम के बँटवारे का वह तरीका जिसमें घर के अन्दर के सारे काम परिवार की औरतें करती हैं और बाहर के काम पुरुष।

प्रश्न 8. नारीवादी आंदोलन से क्या अभिप्राय है?

उत्तर— वे आंदोलन जो स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार दिलाने के लिए चलाए गए थे, नारीवादी आंदोलन कहे जाते हैं।

प्रश्न 9. सर्वप्रथम नारीवादी आंदोलन की शुरुआत किस देश से हुई थी?

उत्तर— अमेरिका से।

प्रश्न 10. नारीवाद का क्या अर्थ है?

उत्तर— नारीवाद एक विचार है जो यह कहता है कि स्त्रियों को भी समाज में वही स्थिति प्राप्त हो जो पुरुषों को प्राप्त है।

प्रश्न 11. भारत में स्त्रियाँ पुरुषों से इतने पीछे क्यों हैं?

उत्तर— पितृसत्तात्मक समाज तथा शिक्षा व आर्थिक उन्नति के अवसरों की कमी के कारण।

प्रश्न 12. पितृसत्तात्मक समाज कौन-सा होता है?

उत्तर— पितृसत्तात्मक समाज वह होता है जो पुरुष प्रधान होता है तथा परिवार का शासन पिता के हाथों में होता है।

प्रश्न 13. शहरीकरण से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— किसी गाँव का शहर या कस्बे के रूप में विकसित होने की प्रक्रिया को शहरीकरण कहते हैं। शहरीकरण में छोटे शहरों का विकास और विस्तार भी शामिल है।

--- [ पृष्ठ संख्या: 310 ] ---

सामाजिक विज्ञान (राजनीति विज्ञान) कक्षा X | 303

प्रश्न 14. लिंग अनुपात का क्या अर्थ है? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)

अथवा

लिंगानुपात से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— किसी क्षेत्र में 1000 लड़कों के पीछे लड़कियों की संख्या को लिंगानुपात कहते हैं। जैसे वर्ष 2011 में भारत में लिंगानुपात 943 था।

प्रश्न 15. पारिवारिक कानूनों का क्या अर्थ है?

उत्तर— पारिवारिक कानून वे कानून हैं जो पारिवारिक मसलों-विवाह, गोद, तलाक, उत्तराधिकार आदि को हल करने के लिए बने हों।

प्रश्न 16. साम्प्रदायिक राजनीति का क्या अर्थ है?

उत्तर— जब राजनीति में अन्य धर्मों की तुलना में एक धर्म की श्रेष्ठता दर्शायी जाए तो इसे साम्प्रदायिक राजनीति कहते हैं।

प्रश्न 17. विश्व के किन देशों में सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी का स्तर काफी ऊँचा है?

उत्तर— स्वीडन, नार्वे और फिनलैंड जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों में।

प्रश्न 18. जातिवाद से क्या आशय है?

उत्तर— जब राजनेता चुनावी लाभ के लिए जातिगत चेतना उकेरकर उसका लाभ उठाने का प्रयास करते हैं, तो इस प्रक्रिया को जातिवाद कहा जाता है।

प्रश्न 19. जातिवाद के हमारे समाज पर पड़ने वाले दो प्रभाव बताएँ।

उत्तर— (1) जातिवाद राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है।

(2) जातिवाद धर्मनिरपेक्ष समाज के विकास में बाधा डालता है।

प्रश्न 20. जातिगत भेदभाव से मुक्त समाज की व्यवस्था बनाने वाले दो समाज सुधारकों के नाम बताइए।

उत्तर— (i) ज्योतिबा फुले। (ii) ई.वी. रामास्वामी पेरियार।

प्रश्न 21. श्रम के लैंगिक विभाजन का क्या परिणाम निकला?

उत्तर— इससे महिलाएँ तो घर की चारदीवारी में सिमट कर रह गयीं और बाहर का सार्वजनिक जीवन पुरुषों के कब्जे में आ गया।

प्रश्न 22. भारत में जाति ने किन तरीकों से राजनीति को प्रभावित किया है?

उत्तर— (1) राजनैतिक दलों द्वारा जाति के आधार पर उम्मीदवार चुनना।

(2) सरकार में विभिन्न जातियों के लोगों को प्रतिनिधित्व देना।

प्रश्न 23. 'भारत में चुनाव में जाति के अतिरिक्त अन्य कारकों का भी प्रभाव पड़ता है।' कोई दो कारक बताइये।

उत्तर— (1) मतदाता जातियों से कहीं अधिक राजनीतिक दलों से अधिक जुड़ाव रखते हैं।

(2) एक ही जाति के अमीर और गरीब लोग प्रायः अलग-अलग पार्टियों को वोट देते हैं।

प्रश्न 24. पेशागत स्थानापन्न किसे कहते हैं?

उत्तर— जब एक व्यक्ति अपने पेशे को बदलता है अर्थात् एक पेशे को छोड़कर दूसरे पेशे को अपना लेता है तो इसे पेशागत स्थानापन्न कहते हैं।

प्रश्न 25. वर्ण व्यवस्था से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक; माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)

उत्तर— वर्ण व्यवस्था जाति समूहों का एक ऐसा पदानुक्रम है जिसमें एक जाति के लोग हर हाल में सामाजिक पायदान में सबसे ऊपर रहेंगे तो किसी अन्य जाति समूह के लोग क्रमागत के रूप में उनके नीचे रहेंगे।

प्रश्न 26. 2019 के लोकसभा निर्वाचन में महिला सांसदों की संख्या कितने प्रतिशत है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— 2019 के लोकसभा निर्वाचन में महिला सांसदों की संख्या 14.36 प्रतिशत है।

प्रश्न 27. 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जन-जातियों का हिस्सा कितना फीसदी था? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जनजातियों का हिस्सा 8.6 फीसदी था।

प्रश्न 28. 'वोट बैंक' से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— वोट बैंक का तात्पर्य ऐसे लोगों के समूह से है जो हमेशा किसी विशेष राजनीतिक दल अथवा उम्मीदवार को वोट देते हैं।

--- [ पृष्ठ संख्या: 311 ] ---

प्रश्न 29. गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले लोगों से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 1999-2000 के अनुसार गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले लोगों का मतलब है प्रति व्यक्ति प्रति माह 327 रुपये (ग्रामीण) और 455 रुपये (शहरी) से कम खर्च करने वाले लोग।

प्रश्न 30. 2011 की जनगणना के अनुसार पुरुष और महिला साक्षरता कितनी है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— 2011 की जनगणना के अनुसार पुरुष साक्षरता दर 82.14% तथा महिला साक्षरता दर 65.46% है।

प्रश्न 31. "धर्म को कभी भी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता।" यह किसने कहा था? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)

उत्तर— महात्मा गाँधी ने।

प्रश्न 32. 2011 की जनगणना के अनुसार लिंगानुपात कितना है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे देश का लिंगानुपात गिरकर 919 रह गया है।

प्रश्न 33. किन्हीं दो प्रावधानों का जिक्र करें जो भारत को धर्मनिरपेक्ष बनाते हैं। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— (i) संविधान सभी नागरिकों और समुदायों को किसी भी धर्म का पालन करने और प्रचार करने की आजादी देता है। (ii) संविधान धर्म के आधार पर किए जाने वाले किसी भी तरह के भेदभाव को अवैधानिक घोषित करता है।

● लघुत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. लैंगिक असमानता का आधार क्या है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— लैंगिक असमानता का आधार स्त्री और पुरुष दोनों के बारे में प्रचलित रूढ़ छवियाँ और तद्युदा सामाजिक भूमिकाएँ हैं। उदाहरण के लिए, औरतों की मुख्य जिम्मेदारी गृहस्थी चलाने और बच्चों का पालन-पोषण करने की है। यह चीज अधिकतर परिवारों के श्रम के लैंगिक विभाजन से झलकती है।

प्रश्न 2. लैंगिक विभाजन की राजनीतिक अभिव्यक्ति एवं राजनीतिक गोलबंदी से सार्वजनिक जीवन में औरतों पर क्या प्रभाव पड़ा है?

उत्तर— लैंगिक विभाजन की राजनीतिक अभिव्यक्ति एवं राजनीतिक गोलबंदी ने सार्वजनिक जीवन में औरतों की भूमिका बढ़ाने में मदद की है। इसी के परिणामस्वरूप आज हम वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक, कॉलेज और विश्वविद्यालयी शिक्षक जैसे पेशों में बहुत-सी औरतों को पाते हैं।

प्रश्न 3. कुछ खास किस्म के सामाजिक विभाजनों को राजनीतिक रूप देने की क्या जरूरत है?

उत्तर— कुछ खास किस्म के सामाजिक विभाजनों को राजनीतिक रूप देने की आवश्यकता है; क्योंकि इससे वंचित समूहों को लाभ मिलता है, उन्हें बराबरी का दर्जा मिलता है। उदाहरण के लिए, यदि महिलाओं से भेदभाव भरे व्यवहार का मुद्दा राजनीतिक तौर पर न उठता तो सार्वजनिक जीवन में भागीदारी नहीं मिलती।

प्रश्न 4. धर्म और राजनीति के सम्बन्ध में गाँधीजी के क्या विचार थे?

उत्तर— महात्मा गाँधी के अनुसार धर्म को कभी भी राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता। धर्म से उनका अभिप्राय नैतिक मूल्यों से था जो सभी धर्मों से जुड़े हैं। गाँधीजी का मानना था कि राजनीति धर्म द्वारा स्थापित मूल्यों से निर्देशित होनी चाहिए।

प्रश्न 5. धर्मनिरपेक्ष राज्य से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— धर्मनिरपेक्ष राज्य वह राज्य है जिसका अपना कोई राजकीय धर्म नहीं होता तथा जिसमें सभी नागरिकों को कोई भी धर्म अपनाने की स्वतंत्रता होती है। राज्य धर्म के आधार पर नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं करता है।

प्रश्न 6. साम्प्रदायिक राजनीति का क्या अर्थ है?

उत्तर— साम्प्रदायिक राजनीति का अर्थ है- राजनीति में धर्म का इस तरह प्रयोग कि एक धर्म दूसरे धर्म से श्रेष्ठ है। इनके अनेक रूप हैं। यथा-

(i) जब धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है। (ii) जब राज्य अपनी सत्ता का प्रयोग किसी एक धर्म के पक्ष में करने लगे।

प्रश्न 7. 'अनुसूचित जाति' व 'अनुसूचित जनजाति' के नाम के आगे 'अनुसूचित' शब्द क्यों लगाया जाता है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों की गिनती अलग से दर्ज की जाती है। इन दोनों व्यापक समूहों में सैकड़ों जातियाँ या जनजातियाँ शामिल हैं, जिनके नाम सरकारी अनुसूची में सूचीबद्ध हैं। इसलिए 'अनुसूचित' शब्द लगाया जाता है।

--- [ पृष्ठ संख्या: 312 ] ---

सामाजिक विज्ञान (राजनीति विज्ञान) कक्षा X 305

प्रश्न 8. गाँधीजी के अनुसार धर्म क्या है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— गाँधीजी के अनुसार धर्म का मतलब हिन्दू अथवा इस्लाम नहीं अपितु नैतिक मूल्यों से था जो सभी धर्मों से जुड़े हैं। उनके अनुसार राजनीति धर्म द्वारा स्थापित मूल्यों से निर्देशित होनी चाहिए।

प्रश्न 9. भारतीय राजनीति में जातिवाद की प्रमुख समस्यायें उल्लेखित कीजिए।

उत्तर— भारतीय राजनीति में जातिवाद की प्रमुख समस्यायें निम्नलिखित हैं-

(1) सिर्फ जातिगत पहचान पर आधारित राजनीति लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं होती।

(2) इससे अक्सर गरीबी, विकास, भ्रष्टाचार जैसे ज्यादा बड़े मुद्दों से लोगों का ध्यान भी भटकता है।

(3) कई बार जातिवाद तनाव, टकराव और हिंसा को भी बढ़ावा देता है।

प्रश्न 10. भारत में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभावों के कोई दो रूप स्पष्ट कीजिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)

उत्तर— भारत में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के दो रूप निम्नलिखित हैं-

(i) समान कार्य के लिए समान मजदूरी नहीं- काम के अनेक क्षेत्रों में यानी खेल-कूद की दुनिया से लेकर खेत-खलिहान तक महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी मिलती है, भले ही दोनों ने समान काम किया हो।

(ii) सिर्फ लड़के की चाह- आज भी भारत में अधिकतर माँ-बाप को सिर्फ लड़के की चाह होती है। लड़की को जन्म लेने से पहले ही खत्म कर देने के तरीके इसी मानसिकता से पनपते हैं। जिससे लिंग अनुपात में गिरावट आयी है।

प्रश्न 11. साम्प्रदायिकता से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— साम्प्रदायिकता- साम्प्रदायिकता की समस्या तब उठ खड़ी होती है जब धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है या जब राजनीति में धर्म की अभिव्यक्ति एक समुदाय की विशिष्टता के दावे और पक्षपोषण का रूप लेने लगती है तथा इसके अनुयायी दूसरे धर्मावलम्बियों के खिलाफ मोर्चा खोलने लगते हैं। राजनीति को धर्म से इस तरह जोड़ना ही साम्प्रदायिकता है।

प्रश्न 12. ‘पितृ प्रधान समाज’ से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— ‘पितृ प्रधान समाज’ को पितृ सत्ता भी कहा जाता है जिसका अर्थ है-‘पिता द्वारा शासन’। जिस समाज में पुरुषों का प्रभुत्व होता है, उसे पितृ प्रधान समाज कहा जाता है। इस समाज में पुरुषों के पास सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और अन्य सभी अधिकार होते हैं और महिलाओं को पुरुषों का साथ समानता करने से रोका जाता है।

प्रश्न 13. पारिवारिक कानून से क्या अभिप्राय है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— पारिवारिक कानून, परिवार से सम्बन्धित कानूनी मामलों से जुड़े हैं। इसके अन्तर्गत विवाह, तलाक, गोद लेना, बाल हिरासत और अन्य पारिवारिक मुद्दों से जुड़े मसले शामिल हैं। ये कानून परिवार के लोगों के हितों एवं अधिकारों की रक्षा करते हैं। हमारे देश में विभिन्न धर्मों के अनुयायियों पर अलग-अलग पारिवारिक कानून लागू होते हैं।

प्रश्न 14. धर्मनिरपेक्ष शासन से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— धर्मनिरपेक्ष शासन का अर्थ है कि राज्य एवं प्रशासन किसी विशेष धर्म को आधिकारिक धर्म के तौर पर मान्यता नहीं देता है। वह सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करता है और उन्हें समान संरक्षण प्रदान करता है। अर्थात् धर्मनिरपेक्ष शासन में सभी धर्मों को समान दर्जा दिया जाता है। धर्मनिरपेक्ष शासन में सभी लोग अपने-अपने धर्म का पालन एवं प्रचार-प्रसार कर सकते हैं।

प्रश्न 15. ‘नारीवादी आंदोलन’ से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— दुनियाभर में औरतों ने संगठन बनाए और अपने अधिकारों हेतु आंदोलन किए। विभिन्न देशों में महिलाओं ने आंदोलनों द्वारा वोट देने का अधिकार, राजनीतिक और वैधानिक दर्जे को ऊँचा उठाने, शिक्षा एवं रोजगार के अवसर आदि की माँग की। साथ ही, औरतों के व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी की माँग की। इन आंदोलनों को ‘नारीवादी आंदोलन’ कहा जाता है।

प्रश्न 16. श्रम के लैंगिक विभाजन से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— श्रम के लैंगिक विभाजन का अर्थ है समाज में पुरुषों और महिलाओं के बीच कार्यों का बँटवारा करना। यह विभाजन सामाजिक मानदण्डों और अपेक्षाओं पर आधारित होता है, न कि व्यक्तिगत योग्यताओं पर। यह धारणा है कि औरतों को मुख्य जिम्मेदारी गृहस्थी चलाने और बच्चों का पालन-पोषण करने की है, जबकि मर्द घर के बाहर का काम करते हैं।

--- [ पृष्ठ संख्या: 313 ] ---

● दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. भारत की सामाजिक और धार्मिक विविधता को स्पष्ट कीजिये।

उत्तर— भारत की सामाजिक विविधता-भारत में अनेक जाति समूहों के लोग रहते हैं। जनगणना में यहाँ सिर्फ दो विशिष्ट समूहों अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों की गणना अलग से दर्ज की जाती है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों की संख्या क्रमशः 16.6% तथा 8.6% है।

भारत की धार्मिक विविधता-2011 की जनगणना के अनुसार भारत में अनेक धर्मों हिन्दू 79.8%, मुसलमान 14.2%, ईसाई 2.3%, सिख 1.7%, बौद्ध 0.7%, जैन 0.4% तथा अन्य धर्मावलम्बी 0.7% तथा कोई धर्म नहीं 0.2% लोग रहते हैं।

प्रश्न 2. जाति और राजनीति में क्या संबंध है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— जाति और राजनीति में बहुत गहरा सम्बन्ध है। जातिगत पहचान और राजनीति एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। वस्तुतः जातिगत राजनीति, सामाजिक और आर्थिक विषमताओं की प्रतिक्रिया में उभरी है। जाति और राजनीति के सम्बन्ध निम्न बिन्दुओं से स्पष्ट होते हैं-

(i) चुनावों में उम्मीदवारों का चयन करते समय, पार्टियाँ मतदाताओं की जाति संरचना को ध्यान में रखती हैं।

(ii) चुनावों में राजनीतिक पार्टियाँ और उम्मीदवार जाति के आधार पर वोट माँगते हैं।

(iii) सरकार बनाते समय, राजनीतिक पार्टियाँ विभिन्न जातियों और जनजातियों के प्रतिनिधियों को शामिल करती हैं।

प्रश्न 3. जाति किस प्रकार राजनीतिग्रस्त हो जाती है? स्पष्ट करें।

उत्तर— जाति अनेक रूपों में राजनीतिग्रस्त होती है-

(1) हर जाति स्वयं को बड़ा बनाना चाहती है। इसलिए अब वह अपने समूह की सभी जातियों को अपने साथ लाने की कोशिश करती है।

(2) चूंकि एक जाति अपने दम पर सत्ता पर कब्जा नहीं कर सकती इसलिए वह ज्यादा राजनैतिक ताकत पाने के लिए दूसरी जातियों या समुदायों को साथ लेने की कोशिश करती है और इस तरह उनके बीच संवाद और मोल-तोल होता है।

(3) राजनीति में नए किस्म की जातिगत गोलबंदी भी हुई है, जैसे-'अगड़ा' और 'पिछड़ा'।

इस प्रकार जाति राजनीति में कई तरह की भूमिकाएँ निभाती है।

प्रश्न 4. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से आप क्या समझते हैं?

उत्तर— अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति भारत में दो विशिष्ट समूह हैं। इन दोनों बड़े समूहों में ऐसी सैकड़ों जातियाँ और आदिवासी समूह शामिल हैं जिनके नाम सरकारी अनुसूची में दर्ज हैं। इसी के चलते इनके नाम के साथ 'अनुसूचित' शब्द लगाया गया है।

अनुसूचित जाति-अनुसूचित जातियों में, जिन्हें आम तौर पर दलित कहा जाता है, सामान्यतः वे हिंदू जातियाँ आती हैं जिन्हें हिंदू सामाजिक व्यवस्था में अछूत माना जाता था। इन जातियों के साथ भेदभाव किया जाता था और इन्हें तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता था।

अनुसूचित जनजाति-अनुसूचित जनजातियों में जिन्हें आमतौर पर आदिवासी कहा जाता है, वे समुदाय शामिल हैं जो अमूमन पहाड़ी और जंगली इलाकों में रहते हैं और जिनका बाकी समाज में ज्यादा मेल-जोल नहीं था।

2011 में, देश की आबादी में अनुसूचित जातियों का हिस्सा 16.6 फीसदी और अनुसूचित जनजातियों का हिस्सा 8.6 फीसदी था।

प्रश्न 5. आपके अनुसार साम्प्रदायिकता कैसे एक चुनौती है, कोई तीन तर्क लिखिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22)

उत्तर— साम्प्रदायिकता हमारे समाज के सामने एक चुनौती है, क्योंकि इसके निम्न प्रभाव हो सकते हैं-

(1) धार्मिक पूर्वाग्रह-यह साम्प्रदायिकता की सबसे आम चुनौती है। इसमें धार्मिक पूर्वाग्रह, धार्मिक समुदायों के बारे में बनी-बनाई धारणाएँ तथा एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ मानने की मान्यताएँ शामिल हैं। यह विभाजन को जन्म देती है।

(2) साम्प्रदायिक आधार पर राजनीतिक गोलबंदी-साम्प्रदायिक आधार पर राजनीतिक गोलबंदी

--- [ पृष्ठ संख्या: 314 ] ---

सामाजिक विज्ञान (राजनीति विज्ञान) कक्षा X | 307

साम्प्रदायिकता का एक अन्य रूप है। इसके अन्तर्गत चुनावी राजनीति में एक धर्म के मतदाताओं की भावनाओं या उनके हितों की बात उठाने के तरीके अपनाए जाते हैं।

(3) साम्प्रदायिक हिंसा-कई बार साम्प्रदायिकता सबसे घृणित रूप लेकर सम्प्रदाय के आधार पर हिंसा, दंगा और नरसंहार करती है।

प्रश्न 6. जातिगत असमानता दूर करने के लिए अपने तीन सुझाव लिखिए।

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22)

उत्तर— जातिगत असमानता दूर करने के लिए तीन सुझाव निम्न प्रकार हैं-

(1) संवैधानिक प्रावधानों का पालन-जातिगत असमानता को दूर करने के लिए संविधान में अनेक प्रावधान किए गए हैं। इन प्रावधानों का कठोरता से पालन किया जाना चाहिए।

(2) अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन-अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन देकर भी जातिगत असमानता को दूर किया जा सकता है।

(3) शिक्षा का प्रसार-शिक्षा के प्रसार से लोगों की सोच उन्नत होती है तथा उनमें जागरूकता भी आती है। अतः शिक्षा के प्रसार से भी जातिगत असमानता को दूर किया जा सकता है।

प्रश्न 7. भारत में महिलाओं को राजनीति में प्रतिनिधित्व देने की स्थिति पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)

अथवा

"भारत में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है।" अपने विचार लिखिए। (प्रश्न बैंक)

अथवा

भारत में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की प्रगति की समीक्षा कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— भारत में महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की स्थिति-भारत में महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बहुत कम है। यथा-

(1) भारत में पंचायती राज के अन्तर्गत कुछ सांविधानिक व्यवस्था की गई है। स्थानीय सरकारों अर्थात् पंचायतों और नगरपालिकाओं में एक-तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिये गये हैं।

(2) भारत की विधायिका में महिला प्रतिनिधियों का अनुपात बहुत ही कम है, जैसे-लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या पहली बार 2019 में ही 14.36 फीसदी पहुँच सकी है। राज्यों की विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व 5 फीसदी से भी कम है। महिला संगठनों और कार्यकर्ताओं ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की भी एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की माँग की है।

(3) संसद में उक्त आशय का एक विधेयक भी पेश किया गया था जो लम्बे समय तक अटका रहा तथा अंततः 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण अधिनियम, 2023) पारित किया गया। इस अधिनियम के अन्तर्गत लोकसभा, विधानसभा और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत सीटों पर आरक्षण दिया जाएगा।

प्रश्न 8. समकालीन भारत से जाति प्रथा विदा नहीं हुई है। कथन की विस्तारपूर्वक व्याख्या कीजिए।

उत्तर— समकालीन भारत से जाति प्रथा पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुई है। यथा-

(1) जाति व्यवस्था के प्राचीन पहलू आज भी कायम हैं। जैसे-आज भी अधिकतर लोग अपनी ही जाति अथवा जनजाति में शादी करते हैं।

(2) स्पष्ट तथा सख्त संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद छुआछूत जैसी कुप्रथा का समूल विनाश नहीं हुआ है।

(3) जाति व्यवस्था के कारण प्राचीन समय में कुछ जातियों को दबाकर रखा गया तो कुछ जातियाँ लाभ की स्थिति में थीं। इसके प्रभाव आज तक समाज में महसूस किये जा रहे हैं-पुरानी व्यवस्था में जिन जातियों को शिक्षा से वंचित रखा गया वो आज भी शिक्षा में पिछड़े हैं तथा जिन जाति समूहों की शिक्षा पर पकड़ थी, उनका ही आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में बोलबाला है।

(4) जाति का आर्थिक स्थिति से गहरा सम्बन्ध बना हुआ है। शहरी मध्यम वर्ग में अगड़ी जाति के लोगों का अनुपात बहुत ज्यादा है।

प्रश्न 9. भारत में लैंगिक मसले क्या हैं? इसके सुधार हेतु उचित सुझाव दीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— भारत में लैंगिक असमानता मुख्य रूप से लड़के-लड़की से सम्बन्धित मसलों में दृष्टिगोचर होती है। उदाहरण के लिए, औरतों की मुख्य जिम्मेदारी गृहस्थी चलाने और बच्चों का पालन-पोषण है तथा मर्द घर के बाहर का काम करते हैं। इसके सुधार हेतु हम अग्र सुझाव दे सकते हैं-

--- [ पृष्ठ संख्या: 315 ] ---

(i) महिलाओं की भागीदारी विभिन्न हिस्सों में बढ़ानी चाहिए।

(ii) महिलाओं में साक्षरता दर बढ़ाने हेतु जागरूकता फैलानी चाहिए।

(iii) समान काम के लिए समान वेतन के लिए प्रावधान बनना चाहिए।

(iv) भारत के कई प्रान्तों में कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथा व्याप्त है, इस समस्या के समूल विनाश हेतु कठोर कानून बनना चाहिए।

(v) महिलाओं के उत्पीड़न, शोषण और उन पर होने वाली हिंसा से बचाने के लिए महिलाओं के हित में कानून बनना चाहिए।

(vi) विधायिका में महिला प्रतिनिधियों का अनुपात बढ़ाने हेतु आरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई सीटें आरक्षित की जानी चाहिए।

● निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. "भारतीय संविधान-निर्माताओं ने धर्मनिरपेक्ष शासन का मॉडल चुना है।" इस कथन की विस्तृत विवेचना कीजिये। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)

अथवा

धर्मनिरपेक्ष शासन के लिए भारतीय संविधान में कौनसे प्रावधान किये गये हैं? कोई चार की विवेचना कीजिये। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2022)

अथवा

हमारे देश में धर्म निरपेक्ष राज्य से आप क्या समझते हैं? विवेचना कीजिए। (प्रश्न बैंक)

अथवा

भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्ष शासन हेतु क्या प्रावधान किये गये हैं?

उत्तर— भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्ष शासन

हमारे संविधान निर्माताओं ने धर्मनिरपेक्ष शासन का मॉडल चुना और इसी आधार पर संविधान में निम्नलिखित प्रावधान किए गए हैं-

(1) कोई धर्म राजधर्म नहीं- भारतीय राज्य ने किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में अंगीकार नहीं किया है। श्रीलंका में बौद्ध धर्म, पाकिस्तान में इस्लाम और इंग्लैंड में ईसाई धर्म का जो दर्जा रहा है उसके विपरीत भारत का संविधान किसी धर्म को विशेष दर्जा नहीं देता।

(2) कोई भी धर्म अपनाने की स्वतंत्रता- संविधान सभी नागरिकों और समुदायों को किसी भी धर्म का पालन करने और प्रचार करने की आजादी देता है।

(3) धार्मिक भेदभाव का निषेध- संविधान धर्म के आधार पर किए जाने वाले किसी तरह के भेदभाव को अवैधानिक घोषित करता है।

(4) धार्मिक मामलों में शासन की इजाजत- भारत का संविधान धार्मिक समुदायों में समानता सुनिश्चित करने के लिए शासन को धार्मिक मामलों में दखल देने का अधिकार देता है। जैसे यह छुआछूत की इजाजत नहीं देता।

इससे स्पष्ट होता है कि धर्मनिरपेक्षता, भारतीय संविधान की बुनियाद है।

प्रश्न 2. जातिवाद से आप क्या समझते हैं? राजनीति में जाति के विभिन्न रूपों को स्पष्ट कीजिये।

अथवा

भारतीय राजनीति में 'जाति' की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर—जातिवाद से आशय- जातिवाद इस मान्यता पर आधारित है कि जाति ही सामाजिक समुदाय के गठन का एकमात्र आधार है। एक जाति के लोगों के हित एक जैसे होते हैं तथा दूसरी जाति के लोगों से उनके हितों का कोई मेल नहीं होता।

राजनीति में जाति के विभिन्न रूप

अथवा

भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका

भारतीय राजनीति में जाति के अनेक रूप दिखाई देते हैं। यथा-

--- [ पृष्ठ संख्या: 316 ] ---

सामाजिक विज्ञान (राजनीति विज्ञान) कक्षा X 309

(1) उम्मीदवारों का चुनाव जातियों की संख्या के हिसाब से- राजनैतिक दल चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नाम तय करते समय चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं की जातियों का हिसाब ध्यान में रखते हैं ताकि उन्हें चुनाव जीतने के लिए जरूरी वोट मिल जाएँ।

(2) सरकार के गठन में जातियों को प्रतिनिधित्व देना- सरकार का गठन करते समय भी राजनीतिक दल इस बात का ध्यान रखते हैं कि उसमें विभिन्न जातियों और कबीलों के लोगों को उचित स्थान मिले।

(3) जातिगत भावनाओं को भड़काकर वोट पाने की कोशिश- राजनीतिक दल और उम्मीदवार समर्थन हासिल करने के लिए जातिगत भावनाओं को उकसाते हैं। कुछ दलों को कुछ जातियों के मददगार और प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है।

(4) जातिगत गोलबंदी और निम्न जातियों में राजनैतिक चेतना का उदय- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और एक व्यक्ति एक वोट की व्यवस्था से उन जातियों के लोगों में नई चेतना पैदा हुई है जिन्हें अभी तक छोटा और नीचा माना जाता था। इस व्यवस्था ने राजनीतिक दलों को विवश किया कि वे लोगों का समर्थन पाने और लोगों को गोलबंद करने के लिए सक्रिय हों।

प्रश्न 3. "भारत में राजनीति में जाति और जाति के अन्दर राजनीति है।" क्या आप इस कथन से सहमत हैं? कोई तीन तर्क दीजिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)

उत्तर— भारत में 'राजनीति में जाति' है अर्थात् भारतीय राजनीति में जातिवाद का अत्यधिक प्रभाव है। यथा-

(1) भारत में जब राजनीतिक दल चुनाव के लिए उम्मीदवार के नाम तय करते हैं तो चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं की जातियों का हिसाब ध्यान में रखते हैं ताकि उन्हें चुनाव जीतने के लिए उस जाति के वोट पड़ जाएँ।

(2) जब सरकार का गठन किया जाता है तो राजनीतिक दल इस बात का ध्यान रखते हैं कि उसमें विभिन्न जातियों के लोगों को उचित स्थान मिले।

(3) राजनीतिक दल और उम्मीदवार समर्थन प्राप्त करने के लिए जातिगत भावनाओं को उकसाते हैं। कुछ दलों को कुछ जातियों के मददगार और प्रतिनिधि के रूप में भी देखा जाता है।

भारत में 'जाति के अन्दर राजनीति' है- भारत में जाति के अन्दर भी राजनीति पाई जाती है। यथा-

(1) प्रत्येक जाति स्वयं को बड़ा बनाना चाहती है। इसके लिए वह अपने समूह की जिन उपजातियों को छोटा या नीचा बताकर अपने से बाहर रखना चाहती थी, अब उन्हें अपने साथ लाने की कोशिश करती है।

(2) कोई भी एक जाति केवल अपने दम पर सत्ता हासिल नहीं कर सकती, इसलिए वह ज्यादा राजनीतिक ताकत प्राप्त करने के लिए दूसरी जातियों को भी साथ लेने की कोशिश करती है।

(3) जातियों के अन्दर भी 'अगड़ा' और 'पिछड़ा' की राजनीति होती है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में 'राजनीति में जाति' और 'जाति के अन्दर राजनीति' है।

प्रश्न 4. भारत में लैंगिक विषमता को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर— भारत में लैंगिक विषमता

लैंगिक विषमता का आधार स्त्री-पुरुष की जैविक बनावट नहीं बल्कि इन दोनों के बारे में प्रचलित रूढ़ छवियाँ और तयशुदा सामाजिक भूमिकाएँ हैं। भारत में लैंगिक विषमता को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है-

1. श्रम का लैंगिक विभाजन- भारत में लड़के-लड़कियों के पालन-पोषण के क्रम में यह मान्यता उनके मन में बैठा दी जाती है कि औरतों की मुख्य जिम्मेदारी गृहस्थी चलाने और बच्चों का पालन-पोषण करने की है। श्रम के इस तरह के विभाजन का नतीजा यह हुआ कि औरतें तो घर की चारदीवारी में सिमट कर रह गई हैं और बाहर का सार्वजनिक जीवन पुरुषों के कब्जे में आ गया है। इसी लैंगिक विषमता को दूर करने के लिए महिलाओं के शिक्षा तथा रोजगार के अवसर बढ़ाने तथा व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी की माँग उठाई है। इससे श्रम के लैंगिक विभाजन में सुधार हो रहा है।

--- [ पृष्ठ संख्या: 317 ] ---

2. पितृ-प्रधान समाज- हमारा समाज अभी भी पितृ-प्रधान है। औरतों के साथ अभी भी कई तरह के भेदभाव होते हैं, उनका दमन होता है। यथा-

(i) महिलाओं की साक्षरता दर अभी भी पुरुषों से बहुत पीछे है। इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि माँ-बाप अपने संसाधनों को लड़के-लड़की दोनों पर बराबर खर्च करने के स्थान पर लड़कों पर ज्यादा खर्च करना पसंद करते हैं। इस स्थिति के चलते अब भी ऊँची वेतन वाली और ऊँचे पदों पर पहुँचने वाली महिलाओं की संख्या बहुत ही कम है।

(ii) काम के हर क्षेत्र में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी मिलती है।

(iii) हमारे देश में लड़कियों का लिंग-अनुपात कम है जो लैंगिक विषमता के दृष्टिकोण को दर्शाता है।

(iv) महिलाओं का उत्पीड़न, शोषण और घरेलू हिंसा भी भारत में लैंगिक विषमता को दर्शाती है।

(v) भारत में विधायिका में महिला प्रतिनिधित्व का बहुत कम होना भी लैंगिक विषमता का सूचक है।

और अध्याय देखें / Explore More Chapters