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सामाजिक विज्ञान (Social Science)हिंदी माध्यम2026-27

RBSE Class 10 SST Chapter 2 Solutions in Hindi — [इतिहास] भारत में राष्ट्रवाद | पासबुक हल, नोट्स

📅 अंतिम अपडेट: 2026-09-10📖 RBSE/NCERT Solutions
भाग 1 — समाधान (इतिहास पाठ 2)

📖 1. समाधान: पाठगत एवं पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नोत्तर

राजस्थान बोर्ड कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान (इतिहास) — सभी पाठगत प्रश्नों एवं पाठ्यपुस्तक अभ्यास के संपूर्ण सटीक उत्तर।

पाठगत प्रश्न

गतिविधि-पृष्ठ 31

प्रश्न- स्रोत-क को ध्यान से पढ़ें। जब महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह को सक्रिय प्रतिरोध कहा, तो इससे उनका क्या आशय था?

उत्तर— जब महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह को सक्रिय प्रतिरोध कहा तब इससे उनका आशय था-सत्याग्रह शुद्ध आत्मबल है। यह शारीरिक बल नहीं है। इसके लिए सघन सक्रियता चाहिए। सत्याग्रही अपने शत्रु को कष्ट नहीं पहुँचाता है। इसके द्वारा वह शत्रु के मस्तिष्क को प्रेम, करुणा एवं सत्य के द्वारा विध्वंसक विचारों से हटाकर उसमें रचनात्मक विचारों को आरोपित करता है।

गतिविधि-पृष्ठ 35

प्रश्न- अगर आप 1920 में उत्तर प्रदेश में किसान होते तो स्वराज के लिए गाँधीजी के आह्वान पर क्या प्रतिक्रिया देते? अपने उत्तर के साथ कारण भी बताइए।

उत्तर— अगर मैं 1920 में उत्तर प्रदेश में एक किसान होता तो गाँधीजी के आह्वान पर सकारात्मक अहिंसात्मक आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेता क्योंकि उस समय उत्तर प्रदेश के जमींदार तथा तालुकदार किसानों से भारी लगान तथा अनेक प्रकार के कर वसूल कर रहे थे तथा बेगार लेकर उनका शोषण कर रहे थे। गाँधीजी ने अत्यधिक करों तथा बेगार का विरोध किया था। स्थानीय नेता किसानों को आश्वासन दे रहे थे कि गाँधीजी ने घोषणा कर दी है कि अब कोई लगान नहीं भरेगा और जमीन गरीबों में बाँट दी जाएगी।

गतिविधि-पृष्ठ 36

प्रश्न- राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल ऐसे अन्य लोगों के बारे में पता लगाइये जिन्हें अंग्रेजों ने पकड़ कर मौत के घाट उतार दिया था। क्या ऐसा ही उदाहरण आप इंडो-चाइना के राष्ट्रीय आन्दोलन में भी बता सकते हैं?

उत्तर— पंजाब में क्रान्तिकारियों ने 1915 में सैनिक छावनियों में विद्रोह भड़काने की योजना बनाई जो असफल हो गई। 46 देशभक्तों को अंग्रेजों ने पकड़ कर मौत के घाट उतार दिया। 8 मई, 1915 को मास्टर अमीरचन्द, अवध बिहारी, बाल मुकुन्द बिस्सा तथा बसन्त कुमार को फांसी की सजा दी गई। इनके अलावा राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल लोगों में दामोदर हरि चापेकर, अनन्त कान्हेरे, विनायक राव देशपाण्डे, खुदीराम बोस, मदनलाल ढींगरा, सरदार भगतसिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह, राजेन्द्र लाहिड़ी, राजगुरु, सुखदेव, सरदार ऊधमसिंह आदि को फांसी की सजा दी गई। 1930 में अब्दुल गफ्फार खाँ को गिरफ्तार करने पर सत्याग्रही सड़कों पर उतर आए और पुलिस की गोलियों का शिकार बनते हुए सैकड़ों देशभक्त मारे गए।

इंडो-चाइना के राष्ट्रीय आन्दोलन में लाखों वियतनामियों ने राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय भाग लिया। उन्होंने साम्राज्यवादियों के चंगुल से अपने देश को स्वतन्त्र कराने के लिए दीर्घकाल तक संघर्ष किया जिसमें हजारों वियतनामी देशभक्त मारे गए। ट्रंग बहनों तथा त्रियू अयू नामक महिलाओं ने चीनी साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिये।

चर्चा करें-पृष्ठ 43

प्रश्न- सविनय अवज्ञा आन्दोलन में विभिन्न वर्गों और समूहों ने क्यों हिस्सा लिया?

उत्तर— सविनय अवज्ञा आन्दोलन में विभिन्न वर्गों और समूहों द्वारा हिस्सा लेना-सविनय अवज्ञा आन्दोलन में विभिन्न वर्गों और समूहों ने हिस्सा लिया। उनके सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भाग लेने के निम्नलिखित कारण थे-

(1) सम्पन्न किसानों के भाग लेने के कारण- धनी किसानों के लिए स्वराज का अर्थ था-भारी लगान के विरुद्ध लड़ाई।

(2) गरीब किसान और सविनय अवज्ञा आन्दोलन- गरीब किसानों के लिए स्वराज का अर्थ था, उनके पास जमीनें होंगी, उन्हें जमीन का किराया नहीं देना पड़ेगा व बेगार भी नहीं करनी पड़ेगी।

(3) व्यवसायी वर्ग और सविनय अवज्ञा आन्दोलन- अधिकांश व्यवसायी स्वराज को एक ऐसे युग के रूप में देखते थे जहाँ व्यापार पर औपनिवेशिक पाबंदियाँ नहीं होंगी तथा व्यापार व उद्योग बिना किसी रुकावट के प्रगति कर सकेंगे।

(4) औद्योगिक श्रमिक वर्ग- औद्योगिक श्रमिक सविनय अवज्ञा आन्दोलन को उच्च वेतन एवं अच्छी कार्य-

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स्थितियों के रूप में देखते थे, क्योंकि उनमें कम वेतन दिये जाने तथा असंतोषजनक कार्य स्थितियों के कारण असंतोष व्याप्त था।

( 5 ) महिलाएँ और सविनय अवज्ञा आन्दोलन-महिलाएँ सविनय अवज्ञा आन्दोलन में गाँधीजी के आह्वान पर शामिल हुईं क्योंकि उनको राष्ट्र की सेवा करना अपना पवित्र दायित्व दिखाई देने लगा था।

चर्चा करें-पृष्ठ 45

प्रश्न-स्रोत-घ ( पाठ्यपुस्तक में ) को ध्यान से पढ़ें। क्या आप सांप्रदायिकता के बारे में इकबाल के विचारों से सहमत हैं? क्या आप सांप्रदायिकता को अलग प्रकार से परिभाषित कर सकते हैं?

उत्तर-नहीं, मैं सांप्रदायिकता के बारे में इकबाल के विचारों से सहमत नहीं हूँ क्योंकि इकबाल की विचारधारा सम्प्रदाय हित को राष्ट्र से भी ऊपर रखती है। वह सम्प्रदाय के आधार पर पृथक निर्वाचिका की माँग करते हैं जो कि आगे चलकर देश के लिए विनाशकारी साबित होती। इनके विचारों से प्रेरित होकर ही आगे पाकिस्तान की माँग उठी।

जी हाँ, मैं सांप्रदायिकता को अलग प्रकार से परिभाषित कर सकता हूँ। मेरे विचार में साम्प्रदायिकता से आशय दो भिन्न सम्प्रदायों की दार्शनिक अवधारणाओं के बीच वैचारिक अन्तर से होता है। इसके आधार पर राष्ट्र का निर्माण नहीं किया जा सकता है। एक ही राष्ट्र में विभिन्न सम्प्रदायों को फलने-फूलने का अवसर मिलना चाहिए। सम्प्रदाय राष्ट्रहित के ऊपर नहीं हो सकता।

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पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

संक्षेप में लिखें-

प्रश्न 1. व्याख्या करें-

( क ) उपनिवेशों में राष्ट्रवाद के उदय की प्रक्रिया उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन से जुड़ी हुई क्यों थी?

( ख ) पहले विश्व युद्ध ने भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन के विकास में किस प्रकार योगदान दिया?

( ग ) भारत के लोग रॉलेट एक्ट के विरोध में क्यों थे?

( घ ) गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन को वापस लेने का फैसला क्यों लिया?

उत्तर-( क ) उपनिवेशों में राष्ट्रवाद की प्रक्रिया उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन से गहरे तौर पर जुड़ी हुई थी। औपनिवेशिक शासकों के विरुद्ध संघर्ष के दौरान लोग आपसी एकता को पहचानने लगे थे। उत्पीड़न और दमन के साझा भाव ने विभिन्न समूहों को एक-दूसरे से बाँध दिया था। उन्होंने महसूस किया कि औपनिवेशिक शासन को समाप्त किये बिना उनके कष्टों का अन्त नहीं होगा। इस विचार ने भी राष्ट्रवाद की भावना को उपनिवेश विरोधी आन्दोलन से जोड़ दिया था।

( ख ) भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन के विकास में प्रथम विश्व युद्ध के योगदान का वर्णन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत दिया जा सकता है-

( 1 ) करों में वृद्धि-प्रथम विश्व युद्ध के कारण रक्षा-व्यय में अत्यधिक वृद्धि हुई। इस खर्चे की पूर्ति के लिए युद्ध के नाम पर कर्जे लिए गए और करों में वृद्धि की गई। सीमा-शुल्क भी बढ़ा दिया गया तथा आयकर नामक एक नया कर भी लगा दिया गया। इससे भारतीयों में घोर असंतोष उत्पन्न हुआ जिसने राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया।

( 2 ) मूल्यों में वृद्धि-प्रथम विश्व युद्ध के दौरान कीमतें लगभग दोगुना हो चुकी थीं। बढ़ते हुए मूल्य के कारण जनसाधारण की कठिनाइयाँ बढ़ गई थीं और उन्हें जीवन-निर्वाह करना भी कठिन हो रहा था।

( 3 ) सैनिकों की जबरन भर्ती-प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गाँवों में भारतीय नवयुवकों को सेना में जबरदस्ती भर्ती किया गया। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में आक्रोश व्याप्त था।

( 4 ) दुर्भिक्ष और महामारी का प्रकोप-1918-19 तथा 1920-21 में देश के बहुत सारे हिस्सों में फसल खराब हो गई जिसके कारण खाद्य पदार्थों की भारी कमी हो गई। उसी समय फ्लू की महामारी फैल गई। 1921 की जनगणना के अनुसार दुर्भिक्ष तथा महामारी के कारण 120-130 लाख भारतीय मौत के मुँह में चले गए।

( 5 ) जनता की आकांक्षाएँ पूरी न होना-भारतीयों को आशा थी कि प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् उनके कष्टों और कठिनाइयों का अन्त हो जाएगा। परन्तु उनकी आकांक्षाएँ पूरी नहीं हुईं। इस कारण भी भारतीयों में घोर असंतोष व्याप्त था। स्पष्ट है कि प्रथम विश्व युद्ध के कारण पैदा हुए उपर्युक्त सभी तथ्यों ने भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन के विकास में योगदान दिया।

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(ग) (1) रॉलेट एक्ट के द्वारा ब्रिटिश सरकार को राजनीतिक गतिविधियों का दमन करने तथा राजनीतिक कैदियों को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में बन्द रखने का अधिकार मिल गया था।

(2) भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद रॉलेट एक्ट को इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउन्सिल ने बहुत जल्दबाजी में पारित कर दिया था।

अतः भारतीयों ने रॉलेट एक्ट का विरोध करने का निश्चय किया।

(घ) जब असहयोग आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर था, उस समय फरवरी, 1922 में गोरखपुर स्थित चौरी-चौरा नामक स्थान पर सत्याग्रहियों और पुलिस के बीच हिंसक टकराव हो गया। गाँधीजी ने इस हिंसात्मक घटना से दुःखी होकर असहयोग आन्दोलन वापिस लेने का फैसला ले लिया।

प्रश्न 2. सत्याग्रह के विचार का क्या मतलब है?

अथवा

सत्याग्रह पर महात्मा गाँधी के विचार बतलाइये।

उत्तर— सत्याग्रह के विचार में सत्य की शक्ति पर आग्रह तथा सत्य की खोज पर बल दिया जाता है।

सत्याग्रह पर महात्मा गाँधी के विचार—

(1) सत्याग्रह सक्रिय प्रतिरोध है—सत्याग्रह निष्क्रिय प्रतिरोध नहीं बल्कि सक्रिय प्रतिरोध है। सत्याग्रह के लिए तो सघन सक्रियता चाहिए।

(2) सत्याग्रह शारीरिक बल नहीं है—गाँधीजी के अनुसार सत्याग्रह शारीरिक बल नहीं है। सत्याग्रही अपने शत्रु को कष्ट नहीं पहुँचाता। वह अपने शत्रु का विनाश नहीं चाहता। सत्याग्रह के प्रयोग में प्रतिशोध या दुर्भावना की भावना नहीं होती है। यदि आपका संघर्ष अन्याय के विरुद्ध है तो उत्पीड़कों से मुकाबला करने के लिए आपको किसी शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है।

(3) सत्याग्रह शुद्ध आत्मबल है—सत्याग्रह शुद्ध आत्मबल है। सत्य ही आत्मा का आधार होता है। इसलिए इस बल को सत्याग्रह की संज्ञा दी गई है। आत्मा ज्ञानयुक्त होती है। यह प्रेम से ओत-प्रोत है। अहिंसा सर्वोच्च धर्म है।

(4) सत्य की विजय—इस संघर्ष में अन्ततः सत्य की ही विजय होती है। गाँधीजी के अनुसार अहिंसा का यह धर्म सभी भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँध सकता है।

प्रश्न 3. निम्नलिखित पर अखबार के लिए रिपोर्ट लिखें—

(क) जलियाँवाला बाग हत्याकांड

(ख) साइमन कमीशन।

उत्तर—(क) जलियाँवाला बाग हत्याकांड—

13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में हत्याकांड हुआ। सैकड़ों लोग मारे गये। 13 अप्रैल को बैसाखी मेले में शामिल होने हेतु बहुत सारे ग्रामीण जलियाँवाला बाग मैदान में एकत्रित हुए। बहुत सारे लोग तो रॉलेट एक्ट तथा अपने प्रिय नेताओं की गिरफ्तारी का विरोध करने के लिए एकत्रित हुए। शहर से बाहर होने के कारण वहाँ जुटे लोगों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि शहर में मार्शल लॉ लागू किया जा चुका है। जनरल डायर सशस्त्र सैनिकों को लेकर वहाँ पहुँचा और उसने मैदान से बाहर निकलने के समस्त मार्ग बन्द करवा दिए। इसके बाद उसके आदेश पर सैनिकों ने शान्तिपूर्ण भीड़ पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चला दीं। इसके फलस्वरूप सैकड़ों लोग मारे गए तथा अनेक घायल हो गए। जैसे-जैसे इस हत्याकांड की खबर फैली, उत्तर भारत के बहुत सारे शहरों में लोग सड़क पर उतरने लगे, हड़तालें होने लगीं, लोग पुलिस से मोर्चा लेने लगे और सरकारी इमारतों पर हमला करने लगे।

(ख) साइमन कमीशन—

भारत के राष्ट्रव्यापी आन्दोलन के जवाब में ब्रिटिश सरकार ने एक वैधानिक आयोग का गठन किया जिसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे। इस आयोग को भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करना था और उसके बारे में अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करनी थीं। इस आयोग में सभी सदस्य अंग्रेज थे। इसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। इसलिए भारतवासियों ने साइमन कमीशन का बहिष्कार करने का निश्चय किया।

1928 में जब साइमन कमीशन भारत पहुँचा, तो उसका स्वागत साइमन कमीशन वापस जाओ (साइमन कमीशन गो बैक) के नारों और काले झण्डों से किया गया। कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य सभी दलों ने साइमन कमीशन के विरुद्ध प्रदर्शनों में भाग लिया। इस विरोध को शान्त करने के लिए वायसराय लॉर्ड इरविन ने अक्टूबर, 1929 में भारत के लिए 'डोमिनियन स्टेटस' का गोलमाल-सा ऐलान कर दिया।

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प्रश्न 4. इस अध्याय में दी गई भारतमाता की छवि और अध्याय 1 में दी गई जर्मेनिया की छवि की तुलना कीजिए।

उत्तर— (1) 1905 में प्रसिद्ध चित्रकार अवनिन्द्रनाथ टैगोर ने भारतमाता की छवि बनाई थी जबकि 1848 में चित्रकार फिलिप वेट ने जर्मेनिया की छवि बनाई थी।

(2) भारतमाता भारत राष्ट्र की तथा जर्मेनिया जर्मन राष्ट्र की प्रतीक है।

(3) अवनिन्द्रनाथ के चित्र में भारतमाता को एक संन्यासिनी के रूप में दर्शाया गया है। वह शान्त, गम्भीर, दैवी और आध्यात्मिक गुणों से युक्त दिखाई देती है। भारतमाता की छवि शिक्षा, भोजन और कपड़े दे रही है। एक हाथ में माला उसके संन्यासिनी गुण को प्रकट करती है। दूसरी ओर जर्मेनिया को बलूत वृक्ष के पत्तों का मुकुट पहने दिखाया गया है क्योंकि जर्मनी का बलूत वीरता का प्रतीक है। जर्मेनिया को एक वीर, साहसी तथा देश की रक्षा करने वाली महिला के रूप में दर्शाया गया है।

(4) भारत माता की दूसरी छवि में भारत माता के हाथों में त्रिशूल है और वह हाथी व शेर के बीच खड़ी है। ये दोनों ही शक्ति और सत्ता के प्रतीक हैं। जर्मेनिया का दूसरा चित्र जर्मन नदी पर पहरा देते हुए बनाया गया है। जर्मेनिया के हाथ में तलवार है और उस तलवार पर उत्कीर्ण है—"जर्मन तलवार जर्मन राइन की रक्षा करती है।"

(5) भारत माता की छवि सच्चे अर्थों में भारतीय संस्कृति से प्रेरित है जबकि जर्मेनिया की छवि जर्मन इतिहास एवं संस्कृति से प्रेरित थी।

चर्चा करें—

प्रश्न 1. 1921 में असहयोग आन्दोलन में शामिल होने वाले सभी सामाजिक समूहों की सूची बनाइए। इसके बाद उनमें से किन्हीं तीन को चुनकर उनकी आशाओं और संघर्षों के बारे में लिखते हुए यह दर्शाइये कि वे आन्दोलन में शामिल क्यों हुए?

उत्तर— 1921 में असहयोग आन्दोलन में शामिल होने वाले सामाजिक समूह—1921 में असहयोग आन्दोलन में शामिल होने वाले सामाजिक समूह थे- (1) शहरी मध्यवर्गीय समूह (विद्यार्थी, शिक्षक, अध्यापक और वकील आदि), (2) व्यापारी, (3) कारखाना श्रमिक, (4) किसान, (5) आदिवासी, (6) बागानी मजदूर, (7) महिलाएँ।

विभिन्न सामाजिक समूहों की आकांक्षाएँ तथा संघर्ष— असहयोग आन्दोलन में भाग लेने वाले सभी सामाजिक समूहों की अपनी-अपनी आकांक्षाएँ थीं। सभी ने गाँधीजी के स्वराज के आह्वान को स्वीकार किया, परन्तु उनके संघर्ष उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप थे। इन समूहों में से निम्नलिखित तीन समूहों की आशाओं और संघर्षों को दर्शाया गया है-

(1) शहरी मध्यवर्गीय समूह— भारत के शहरी मध्यवर्ग ने महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन को स्वीकार कर लिया। वे इस बात से प्रेरित होकर आन्दोलन में शामिल हुए कि यदि भारत के लोग सरकार से अपना सहयोग वापस ले लेंगे तो साल भर के भीतर ब्रिटिश शासन ढह जायेगा और स्वराज्य की स्थापना हो जाएगी। हजारों की संख्या में विद्यार्थियों ने विद्यालय-महाविद्यालय छोड़ दिए; प्रधानाध्यापकों और अध्यापकों ने अपने पद से त्याग-पत्र दे दिए तथा वकीलों ने मुकदमा लड़ना बन्द कर दिया। मद्रास के अतिरिक्त अधिकांश प्रान्तों में परिषद चुनावों का बहिष्कार किया गया।

(2) आदिवासी किसान— आन्ध्रप्रदेश की गूडेम पहाड़ियों में रहने वाले आदिवासी किसानों में ब्रिटिश सरकार की नीतियों के विरुद्ध आक्रोश व्याप्त था। अंग्रेजी सरकार ने बड़े-बड़े जंगलों में लोगों के प्रवेश पर पाबन्दी लगा दी थी। लोग इन जंगलों में न तो पशुओं को चरा सकते थे और न ही जलावन के लिए लकड़ी तथा फल बीन सकते थे। इससे उनका जीवन-निर्वाह करना कठिन हो रहा था। इसके अतिरिक्त उन्हें सड़कें बनाने के लिए बेगार भी करनी पड़ती थी।

राजू द्वारा आदिवासियों का नेतृत्व— इन समस्याओं और कठिनाइयों के कारण आदिवासियों ने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया। अल्लूरी सीताराम राजू नामक व्यक्ति ने इन आदिवासियों का नेतृत्व किया। राजू ने लोगों को खादी पहनने तथा शराब छोड़ने के लिए प्रेरित किया। लेकिन उनकी मान्यता थी कि भारत अहिंसा के बल पर नहीं, बल्कि केवल बल-प्रयोग के द्वारा ही स्वतन्त्र हो सकता है। इसलिए गूडेम विद्रोहियों ने पुलिस थानों पर हमले किए, ब्रिटिश अधिकारियों को मारने का प्रयास किया तथा गुरिल्ला युद्ध चलाते रहे।

(3) बागानी मजदूर— असम के बागानी मजदूरों के लिए स्वतन्त्रता का अर्थ यह था कि वे स्वतन्त्र रूप से बागानों से आ-जा सकते हैं जिनमें उनको बन्द करके रखा गया था तथा वे अपने गाँवों से सम्पर्क रख पायेंगे। 1859 के 'इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट' के अन्तर्गत बागानों में काम करने वाले मजदूरों को बिना अनुमति के बाहर जाने का निषेध

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था। अतः बागानी मजदूर असहयोग आन्दोलन में शामिल हो गए। वे अपने अधिकारियों की अवहेलना करने लगे। उन्होंने बागान छोड़ दिए और अपने-अपने गाँव की ओर चल दिए। उन्होंने महसूस किया कि अब गाँधी-राज आ रहा है और अब सभी को गाँव में जमीन मिल जाएगी। अतः वे असहयोग आन्दोलन में शामिल हुए।

प्रश्न 2. नमक यात्रा की चर्चा करते हुए स्पष्ट करें कि यह उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक था।

अथवा

''महात्मा गाँधी की दांडी यात्रा ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध का असरदार प्रतीक थी।'' समझाइए।

अथवा

महात्मा गाँधी की नमक यात्रा का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

उत्तर— नमक यात्रा (दांडी मार्च) - 31 जनवरी, 1930 को गाँधीजी ने वायसराय इरविन को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने 11 माँगों का उल्लेख किया। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण माँग नमक-कर को समाप्त करने के बारे में थी। नमक का अमीर-गरीब सभी इस्तेमाल करते थे। यह भोजन का एक अभिन्न हिस्सा था। इसलिए नमक पर कर और उसके उत्पादन पर सरकारी नियन्त्रण को महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश शासन का सबसे दमनकारी पहलू बताया था। उन्होंने ब्रिटिश सरकार को यह चेतावनी दी कि यदि 11 मार्च तक उनकी माँगें नहीं मानी गईं, तो कांग्रेस सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू कर देगी।

माँगें नहीं माने जाने पर गाँधीजी ने अपने 78 विश्वस्त कार्यकर्ताओं के साथ नमक यात्रा शुरू कर दी। यह यात्रा गाँधीजी के साबरमती आश्रम से 240 किलोमीटर दूर दाण्डी नामक गुजराती तटीय कस्बे में जाकर खत्म होनी थी। गाँधीजी की टोली ने यह यात्रा पैदल चलकर 24 दिन में तय की। गाँधीजी जहाँ भी ठहरते थे, हजारों लोग उनके भाषण सुनने के लिए आते थे। इन सभाओं में गाँधीजी ने स्वराज का अर्थ स्पष्ट किया और आह्वान किया कि लोग अंग्रेजों की शान्तिपूर्वक अवज्ञा करें। 6 अप्रैल को गाँधीजी दांडी पहुँचे और उन्होंने समुद्र का पानी उबाल कर नमक बनाना शुरू कर दिया। इस प्रकार उन्होंने नमक कानून भंग किया।

शीघ्र ही सविनय अवज्ञा आन्दोलन सम्पूर्ण देश में फैल गया। अनेक स्थानों पर लोगों ने नमक कानून तोड़ा और सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किये। ब्रिटिश सरकार ने इस आन्दोलन को कुचलने के लिए दमनात्मक नीति अपनाई। अब्दुल गफ्फार खान, महात्मा गाँधी आदि को गिरफ्तार कर लिया गया। लगभग एक लाख लोगों को जेलों में बन्द कर दिया गया।

नमक यात्रा उपनिवेशवाद के विरुद्ध प्रतिरोध का एक प्रभावशाली प्रतीक था। इस यात्रा ने राष्ट्रीय आन्दोलन को व्यापक बनाया। इस बार लोगों को न केवल अंग्रेजों का सहयोग न करने के लिए बल्कि औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन करने के लिए आह्वान किया गया था। लाखों भारतीयों ने निडरतापूर्वक ब्रिटिश सरकार के दमनात्मक कानूनों का उल्लंघन किया और उन्होंने अपनी मातृभूमि को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने के लिए हँसते-हँसते जेलों को भरना शुरू कर दिया। इस आन्दोलन में महिलाओं ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया और औपनिवेशिक कानूनों को तोड़ने के लिए सत्याग्रह किया।

प्रश्न 3. कल्पना कीजिए कि आप सिविल नाफरमानी आन्दोलन (सविनय अवज्ञा आन्दोलन) में हिस्सा लेने वाली महिला हैं। बताइए कि इस अनुभव का आपके जीवन में क्या अर्थ होता?

उत्तर— सिविल नाफरमानी आन्दोलन में महिलाओं के रूप में भाग लेने पर मेरे अनुभव-

(1) महिलाओं द्वारा आन्दोलन में भाग लेना-गाँधीजी के इस सत्याग्रह आन्दोलन के समय बड़ी संख्या में स्त्रियाँ उनकी बातें सुनने के लिए अपने घरों से बाहर आ जाती थीं।

(2) औपनिवेशिक कानूनों का विरोध करना और जेल जाना-उस समय हम महिलाओं में बड़ा जोश था। मैंने अन्य महिलाओं के साथ अनेक जुलूसों में भाग लिया, नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा, विदेशी कपड़ों तथा शराब की दुकानों पर धरना दिया। सरकार ने दमनकारी नीति अपनाते हुए अनेक महिलाओं को गिरफ्तार कर जेलों में भेज दिया। हमें जेल जाते समय तनिक भी डर नहीं लगा और हमने हँसते-हँसते अपने आपको गिरफ्तारी के लिए प्रस्तुत किया।

(3) शहरी क्षेत्रों में उच्च जाति की महिलाओं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में सम्पन्न किसान परिवारों की महिलाओं का सक्रिय होना-इस आन्दोलन में मैंने यह भी अनुभव किया कि शहरी क्षेत्रों में अधिकतर उच्च जातियों की महिलाएँ आन्दोलन में सक्रिय थीं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में सम्पन्न किसान परिवारों की महिलाएँ सक्रिय रूप से आन्दोलन में भाग ले रही थीं।

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(4) राष्ट्र की सेवा करने की प्रेरणा - गाँधीजी के आह्वान पर हम महिलाओं को राष्ट्र की सेवा करने की प्रेरणा मिली। मैंने अनुभव किया कि मेरा कार्य केवल घर चलाना, चूल्हा-चौका सम्भालना, अच्छी माँ एवं अच्छी पत्नी की भूमिका निभाना ही नहीं है, बल्कि राष्ट्र की सेवा करना भी है।

प्रश्न 4. भारत में विभिन्न राजनीतिक नेता पृथक् निर्वाचिका के सवाल पर क्यों बँटे हुए थे?

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)

उत्तर— पृथक् निर्वाचिका के प्रश्न पर राजनीतिक नेताओं का बँटा हुआ होना—भावी विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर राजनीतिक नेताओं में तीव्र मतभेद थे। मुस्लिम नेता तथा पिछड़े हुए वर्गों के नेता पृथक् निर्वाचिका के समर्थक थे। परन्तु हिन्दू महासभा, कांग्रेस के नेता पृथक् निर्वाचिका के विरुद्ध थे।

(1) मुस्लिम लीग के नेताओं द्वारा पृथक् निर्वाचिका का समर्थन—मुस्लिम लीग के नेताओं की मान्यता थी कि भारतीय मुसलमान सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक क्षेत्रों में पिछड़े हुए हैं। अतः उनके राजनीतिक हितों की रक्षा के उद्देश्य से पृथक् निर्वाचिका की व्यवस्था बनाए रखी जाए। अनेक मुस्लिम नेता भारत में अल्पसंख्यकों के रूप में मुसलमानों की स्थिति को लेकर चिन्तित थे। उनको भय था कि बहुसंख्यक हिन्दुओं का वर्चस्व स्थापित होने पर उनकी संस्कृति और पहचान नष्ट हो जायेगी। मोहम्मद अली जिन्ना, मोहम्मद इकबाल आदि मुसलमानों की माँग का नेतृत्व कर रहे थे।

(2) दलित नेताओं द्वारा पृथक् निर्वाचिका का समर्थन—अनेक दलित नेता पिछड़े हुए वर्गों की समस्याओं का अलग राजनीतिक समाधान ढूँढना चाहते थे। कांग्रेस ने लम्बे समय तक दलितों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया था। इसलिए उन्होंने दलित वर्ग के लिए पृथक् निर्वाचिका की माँग की। दलितों के प्रसिद्ध नेता डॉ. अम्बेडकर ने दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भी पृथक् निर्वाचन की व्यवस्था पर बल दिया।

(3) कांग्रेस के नेताओं द्वारा पृथक् निर्वाचिका का विरोध—कांग्रेस के नेता राष्ट्रीय एकता के प्रबल समर्थक थे। वे सम्पूर्ण भारत को एकता के सूत्र में बाँधे रखना चाहते थे। उनकी मान्यता थी कि पृथक् निर्वाचिका की व्यवस्था को बनाए रखने से विभिन्न सम्प्रदायों एवं समुदायों में ईर्ष्या एवं द्वेष की भावना बढ़ेगी तथा राष्ट्रीय एकता को आघात पहुँचेगा।

(4) हिन्दू महासभा के नेताओं द्वारा पृथक् निर्वाचिका का विरोध—1928 में आयोजित किए गए एक सर्वदलीय सम्मेलन में हिन्दू महासभा के नेता एम.आर. जयकर ने पृथक् निर्वाचिका का विरोध किया।

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भाग 2 — रिवीजन नोट्स (Notes & Summary)

📝 2. नोट्स: पाठ-सार, मुख्य बिंदु एवं शब्दावली

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं, भौगोलिक परिभाषाएं, राजनीतिक सिद्धांत एवं संपूर्ण अध्याय का सारगर्भित सारांश।

2. भारत में राष्ट्रवाद

पाठ-सार

1. प्रथम विश्व-युद्ध, खिलाफत और असहयोग—प्रथम विश्व-युद्ध के दौरान कीमतें दोगुनी हो गईं। गाँवों में सिपाहियों को जबरदस्ती भर्ती किया गया। 1918 से 1921 के काल में पड़े दुर्भिक्ष और महामारी के कारण 120-130 लाख लोग मारे गए थे। लोगों को उम्मीद थी कि युद्ध खत्म होने के बाद उनकी मुसीबतें कम हो जाएँगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस कारण भारतीयों में आक्रोश व्याप्त था। इसी समय एक नया नेता सामने आया और उसने संघर्ष का एक नया ढंग, एक नया तरीका प्रस्तुत किया।

1.1 सत्याग्रह का विचार—महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह के विचार को प्रस्तुत किया तथा 1917-18 में चम्पारन, खेड़ा तथा अहमदाबाद में सत्याग्रह आन्दोलन चलाए।

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 31

1.2 रॉलेट एक्ट-ब्रिटिश सरकार ने 1919 में रॉलेट एक्ट पारित किया, जिसके अनुसार सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने तथा राजनीतिक बन्दियों को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में बन्द करने का अधिकार मिल गया था। महात्मा गाँधी ने इसके विरुद्ध एक राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह अहिंसक आन्दोलन शुरू किया। इस दौरान 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग हत्याकांड हुआ। इसकी प्रतिक्रिया में बहुत सारे शहरों में लोग सड़कों पर उतरे, हड़तालें हुईं, लोग पुलिस से मोर्चा लेने लगे, सरकारी इमारतों पर हमला करने लगे। सरकार ने इस आन्दोलन को निर्ममता से कुचलना प्रारम्भ कर दिया। हिंसा फैलते देख गाँधीजी ने रॉलेट आन्दोलन को वापस ले लिया।

1.3 खिलाफत आन्दोलन-अभी तक सत्याग्रह आन्दोलन शहरों और कस्बों तक ही सीमित था, जबकि महात्मा गाँधी इसे पूरे भारत में व्यापक जनाधार वाला आन्दोलन खड़ा करना चाहते थे। लेकिन उनका मानना था कि हिन्दू-मुसलमानों को एक-दूसरे के नजदीक लाए बिना यह सम्भव नहीं था। फलतः महात्मा गाँधी ने हिन्दुओं और मुसलमानों में एकता स्थापित करने के लिए खिलाफत आन्दोलन का समर्थन किया।

1.4 असहयोग ही क्यों?-महात्मा गाँधी ने सितम्बर, 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में दूसरे नेताओं को इस बात के लिए राजी कर लिया कि खिलाफत के समर्थन और स्वराज्य के लिए एक असहयोग आन्दोलन शुरू किया जाना चाहिए। गाँधीजी का कहना था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था, इसी सहयोग के कारण अंग्रेजों का शासन चल पा रहा है। अगर भारत के लोग अपना सहयोग वापस ले लें तो सालभर के भीतर ब्रिटिश शासन ढह जायेगा और स्वशासन की स्थापना हो जायेगी। दिसम्बर, 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में असहयोग कार्यक्रम पर स्वीकृति की मोहर लगा दी गई।

2. आन्दोलन के भीतर अलग-अलग धाराएँ-जनवरी, 1921 में गाँधीजी ने असहयोग-खिलाफत आन्दोलन शुरू किया। इस आन्दोलन में विभिन्न सामाजिक समूहों ने भाग लिया, लेकिन प्रत्येक की अपनी-अपनी आकांक्षाएँ थीं, स्वराज्य का अर्थ उनके अलग-अलग था।

2.1 शहरों में आन्दोलन-इस आन्दोलन के दौरान विदेशी माल का बहिष्कार किया गया, शराब की दुकानों पर धरना दिया गया तथा विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई। हजारों विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए तथा शिक्षकों ने त्याग-पत्र सौंप दिये। मद्रास के अतिरिक्त अधिकतर प्रान्तों में परिषद चुनावों का बहिष्कार किया गया।

2.2 ग्रामीण इलाकों में विद्रोह-शहरों से बढ़कर असहयोग आन्दोलन देहात में भी फैल गया था। युद्ध के बाद देश के विभिन्न भागों में चले किसानों व आदिवासियों के संघर्ष भी इस आन्दोलन में समा गए। लेकिन किसानों के आन्दोलन के ऐसे स्वरूप जैसे तालुकदारों और व्यापारियों के मकानों पर हमला करना, बाजारों में लूट-पाट करना तथा अनाज के गोदामों पर कब्जा करना आदि विकसित हो चुके थे जिनसे कांग्रेस का नेतृत्व खुश नहीं था।

महात्मा गाँधी का नाम लेकर स्थानीय किसान नेता अपनी सारी कार्यवाहियों और आकांक्षाओं को सही ठहरा रहे थे। आदिवासी किसानों ने स्वराज्य के विचार का कुछ और ही अर्थ निकाला और उन्होंने गुरिल्ला युद्ध चालू कर दिया। उनका मानना था कि बल प्रयोग से ही देश आजाद हो सकता है। उदाहरण के लिए आन्ध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों के आदिवासी विद्रोहियों ने 1920 में स्वराज्य प्राप्ति के लिए गुरिल्ला युद्ध चलाए।

2.3 बागानों में स्वराज्य-महात्मा गाँधी के विचारों और स्वराज्य की अवधारणा के बारे में मजदूरों की अपनी समझ थी। असम के बागानी मजदूरों के लिए आजादी का मतलब यह था कि वे उन चारदीवारियों से जब चाहे आ-जा सकते हैं जिनमें उनको बंद करके रखा गया था अर्थात् वे अपने गाँवों से सम्पर्क रख पायेंगे। असहयोग आन्दोलन के दौरान ऐसे हजारों मजदूर अपने अधिकारियों की अवहेलना करने लगे; उन्होंने बागान छोड़ दिए और अपने घर चले गए।

इन स्थानीय आन्दोलनों की अपेक्षाओं और दृष्टियों को कांग्रेस के कार्यक्रम में परिभाषित नहीं किया गया था। फिर भी जब इन आदिवासियों व मजदूरों ने गाँधीजी के नाम पर नारा लगाया और स्वतन्त्र भारत की हुँकार भरी तो वे अखिल भारतीय असहयोग आन्दोलन से भावात्मक रूप से जुड़े हुए थे।

असहयोग आन्दोलन को वापस लेना-चौरी-चौरा में 1922 में एक शान्तिपूर्ण जुलूस पुलिस के साथ हिंसक टकराव में बदल गया। इस घटना के बाद गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन को रोकने का आह्वान किया।

3. सविनय अवज्ञा की ओर-असहयोग आन्दोलन को वापस लेने के बाद सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने परिषद् राजनीति में वापस लौटने के लिए कांग्रेस के भीतर ही स्वराज पार्टी का गठन कर डाला। दूसरी तरफ, सुभाष चन्द्र बोस और जवाहरलाल नेहरू जैसे युवा नेता उग्र जन आन्दोलन का दबाव बनाए हुए थे। आन्तरिक

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बहस और असहमति के इस माहौल में विश्वव्यापी आर्थिक मंदी तथा कृषि उत्पादों की गिरती कीमतों ने भारतीय राजनीति की रूपरेखा में बदलाव ला दिया। इसी पृष्ठभूमि में नई ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया। इसमें सात सदस्य थे जो सभी अंग्रेज थे। अतः कांग्रेस ने साइमन कमीशन का बहिष्कार करने का निश्चय किया। 1928 में जब साइमन कमीशन भारत पहुँचा, तो उसका स्वागत 'साइमन कमीशन वापस जाओ' के नारों से किया गया। दिसम्बर 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' की माँग को औपचारिक रूप से मान लिया गया। तय किया गया कि 26 जनवरी, 1930 को स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

3.1 नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा आन्दोलन-इरविन द्वारा गाँधीजी की 11 मांगों की अनदेखी करने के कारण गाँधीजी ने अपने 78 कार्यकर्त्ताओं के साथ नमक यात्रा शुरू की। यह यात्रा साबरमती में गाँधीजी के आश्रम से 240 किलोमीटर दूर दांडी नामक स्थान पर जाकर समाप्त होनी थी। 6 अप्रैल को गाँधीजी दांडी पहुँचे और वहाँ नमक बनाकर सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू किया। हजारों लोगों ने नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा। यहीं से सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू होता है। इस बार लोगों को न केवल अंग्रेजों का सहयोग न करने के लिए, बल्कि औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन करने के लिए भी आह्वान किया गया। आन्दोलन फैला तो अनेक स्थानों पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई और शराब की दुकानों पर धरना दिया गया। किसानों ने लगान नहीं दिया, वन कानूनों का उल्लंघन किया गया। सरकार ने दमन चक्र चलाया।

महात्मा गाँधी ने एक बार फिर 5 मार्च, 1931 को आन्दोलन वापस ले लिया और इरविन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए जिसमें गाँधीजी ने लंदन में होने वाले दूसरे गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी। गोलमेज सम्मेलन विफल होने पर गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन पुनः शुरू किया। लेकिन 1934 तक आते-आते इसकी गति मंद पड़ने लगी थी।

3.2 लोगों ने आन्दोलन को कैसे लिया?-(i) सम्पन्न किसानों ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन का बढ़-चढ़कर समर्थन किया। उनके लिए स्वराज की लड़ाई भारी लगान के खिलाफ लड़ाई थी। जब 1931 में लगानों के घटे बिना आन्दोलन वापस ले लिया तो उन्हें बड़ी निराशा हुई। फलस्वरूप 1932 में आन्दोलन पुनः शुरू हुआ तो उनमें से बहुतों ने हिस्सा नहीं लिया।

(ii) गरीब किसान भाड़ा विरोधी आन्दोलन कर रहे थे। कांग्रेस अमीर किसानों और ज़मींदारों की नाराजगी के कारण इन आन्दोलनों को समर्थन नहीं दे रही थी। इसी कारण गरीब किसान और कांग्रेस के बीच सम्बन्ध अनिश्चित बने रहे।

(iii) भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नियन्त्रण का विरोध किया तथा पहले सविनय अवज्ञा आन्दोलन का समर्थन किया। उनका मानना था कि औपनिवेशिक पाबंदियों के हटने से व्यापार व उद्योग निर्बाध ढंग से फल-फूल सकेंगे। लेकिन गोलमेज सम्मेलन की विफलता, प्रशासन के दमन चक्र और कांग्रेस में बढ़ते समाजवादी प्रभाव के कारण दूसरे सविनय अवज्ञा आन्दोलन में उनका उत्साह मंद पड़ गया था।

(iv) औद्योगिक श्रमिक वर्ग ने इस आन्दोलन में नागपुर के अलावा और कहीं भी बहुत बड़ी संख्या में हिस्सा नहीं लिया। फिर भी 1930 में रेलवे कामगारों की तथा 1932 में गोदी कामगारों की हड़ताल हुई। 1930 में छोटा नागपुर में हजारों मजदूरों ने रैलियों और बहिष्कार अभियानों में भाग लिया।

(v) सविनय अवज्ञा आन्दोलन में औरतों ने बड़े पैमाने पर भाग लिया। शहरी क्षेत्रों में ऊँची जातियों की महिलाएँ तथा ग्रामीण क्षेत्रों में सम्पन्न परिवारों की महिलाएँ आन्दोलन में सक्रिय रहीं।

3.3 सविनय अवज्ञा की सीमाएँ-(i) गाँधीजी ने अस्पृश्यता (छुआछूत) को समाप्त करने पर बल दिया। अनेक दलित नेताओं ने अछूतों को शिक्षा संस्थानों में आरक्षण दिए जाने की माँग की और अलग निर्वाचन क्षेत्रों की बात कही। डॉ. अम्बेडकर ने 1930 में 'दलित वर्ग एसोसिएशन' की स्थापना की। जब ब्रिटिश सरकार ने दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की माँग मान ली, तो गाँधीजी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। अन्त में 1932 में गाँधीजी तथा डॉ. अम्बेडकर के बीच 'पूना पैक्ट' हो गया। (ii) सविनय अवज्ञा आन्दोलन में कुछ मुस्लिम राजनीतिक संगठनों ने भी विशेष उत्साह नहीं दिखाया। उनको भय था कि हिन्दू बहुसंख्य के वर्चस्व की स्थिति में अल्पसंख्यकों की संस्कृति और पहचान खो जाएगी।

4. सामूहिक अपनेपन का भाव तथा भारतमाता की छवि-(i) भारत में सामूहिक अपनेपन की भावना आंशिक रूप से संयुक्त संघर्षों के चलते उत्पन्न हुई थी। (ii) बीसवीं सदी में राष्ट्रवाद के विकास के साथ भारत की

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 33

पहचान भी भारतमाता की छवि का रूप लेने लगी। 1870 के दशक में बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने मातृभूमि की स्तुति के रूप में 'वन्दे मातरम्' गीत लिखा था। इसके बाद अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारतमाता की विख्यात छवि को चित्रित किया। (iii) आगे चलकर राष्ट्रवादी नेताओं ने लोगों को एकजुट करने तथा राष्ट्रवाद की भावना भरने के लिए विभिन्न प्रकार के चिह्नों व प्रतीकों का प्रयोग किया; अतीत का गौरवगान किया गया, लेकिन यह गौरवगान हिन्दुओं के अतीत का गौरवगान था; छवियाँ हिन्दू प्रतीक थीं; इसलिए अन्य समुदायों के लोग अलग-अलग महसूस करने लगे।

निष्कर्ष-अंग्रेज सरकार के विरुद्ध बढ़ता गुस्सा भारतीय समूहों तथा वर्गों के लिए स्वतन्त्रता का साझा संघर्ष बनता जा रहा था।

महत्त्वपूर्ण तिथियाँ एवं घटनाएँ

[महत्त्वपूर्ण तिथियाँ एवं घटनाएँ तालिका]

कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान पाठ 2 भारत में राष्ट्रवाद चित्र 1

क्र. सं.

तिथि

घटनाएँ

1.

6 नवम्बर, 1913

गाँधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में अश्वेतों के अधिकारों का हनन करने वाले नस्लभेदी कानूनों के खिलाफ न्यूकैसल से ट्रांसवाल तक निकाले गये जुलूस में मजदूरों का नेतृत्व किया।

2.

जनवरी, 1915

महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से वापस भारत लौटे।

3.

1917

गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों की मदद के लिए गाँधीजी ने सत्याग्रह का आयोजन किया।

4.

1918

गाँधीजी सूती कपड़ा कारखानों के मजदूरों के बीच सत्याग्रह आन्दोलन चलाने अहमदाबाद गए।

5.

1918-19

बाबा रामचन्द्र उत्तर प्रदेश के किसानों को संगठित करते हैं।

6.

अप्रैल, 1919

रॉलेट एक्ट के खिलाफ गाँधीवादी हड़ताल, जलियाँवाला बाग हत्याकांड।

7.

जनवरी, 1921

असहयोग और खिलाफत आन्दोलन शुरू।

8.

फरवरी, 1922

चौरी-चौरा काण्ड, गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को वापस लेना।

9.

मई, 1924

अल्लूरी सीताराम राजू की गिरफ्तारी; दो वर्ष से चला आ रहा हथियारबंद आदिवासी संघर्ष समाप्त।

10.

1927

भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ का गठन।

11.

दिसम्बर, 1929

जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य की माँग को स्वीकार कर लिया।

12.

26 जनवरी, 1930

26 जनवरी, 1930 को स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय।

13.

मार्च, 1930

गाँधीजी ने 78 विश्वस्त वॉलंटियरों के साथ दाण्डी के लिए नमक यात्रा शुरू की।

14.

6 अप्रैल, 1930

गाँधीजी ने दाण्डी पहुँचकर, वहाँ समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाना शुरू कर नमक कानून का उल्लंघन किया। सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रारम्भ।

15.

1930

डॉ. अम्बेडकर ने दलितों को दलित वर्ग एसोसिएशन में संगठित किया।

16.

1931

मार्च, 1931 में महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन वापस ले लिया, दूसरे गोलमेज सम्मेलन के लिए गाँधी-इरविन समझौता हुआ तथा दिसम्बर, 1931 को दूसरा गोलमेज सम्मेलन।

17.

1932

सविनय अवज्ञा आन्दोलन पुनः शुरू किया।

18.

1942

8 अगस्त, 1942 को भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ किया।

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भाग 3 — परीक्षा उपयोगी प्रश्न (Important Questions)

3. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), रिक्त स्थान, अतिलघूत्तरात्मक, लघूत्तरात्मक एवं निबंधात्मक परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

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● बहुविकल्पीय प्रश्न—

1. भारत छोड़ो आन्दोलन कब प्रारंभ हुआ? (प्रश्न बैंक)

(अ) 1939 (ब) 1940 (स) 1941 (द) 1942

2. रॉलेट एक्ट कब पारित हुआ— (प्रश्न बैंक)

(अ) 1917 (ब) 1919 (स) 1920 (द) 1922

3. जलियाँवाला हत्याकाण्ड कब हुआ था? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)

(अ) 9 अप्रैल, 1919 (ब) 10 अप्रैल, 1919 (स) 13 अप्रैल, 1919 (द) 19 अप्रैल, 1919

4. महात्मा गाँधी ने कौनसे गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया था? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)

(अ) प्रथम (ब) द्वितीय (स) तृतीय (द) इनमें से कोई नहीं

5. 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में शान्तिपूर्ण भीड़ पर गोलियाँ चलवाने वाला कौन अधिकारी था?

(अ) लॉरेन्स (ब) नील (स) हैवलाक (द) जनरल डायर

6. असहयोग आंदोलन कब शुरू हुआ? (प्रश्न बैंक)

(अ) नवम्बर, 1920 (ब) जनवरी, 1921 (स) मार्च, 1923 (द) दिसम्बर, 2021

7. साइमन कमीशन भारत कब आया? (प्रश्न बैंक)

(अ) 1930 (ब) 1929 (स) 1928 (द) 1932

8. गाँधी-इरविन समझौता कब हुआ? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)

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(अ) 5 जनवरी, 1930 (ब) 5 मार्च, 1931 (स) 15 जनवरी, 1931 (द) 5 मार्च, 1930

9. महात्मा गाँधी ने नमक यात्रा कहाँ से शुरू की थी? (प्रश्न बैंक)

(अ) उत्तरप्रदेश (ब) साबरमती (स) दांडी (द) चम्पारन

10. 'हिंद स्वराज' नामक पुस्तक के लेखक हैं- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)

(अ) नेल्सन मंडेला (ब) जवाहर लाल नेहरू (स) महात्मा गाँधी (द) भगतसिंह

11. 'बारदोली सत्याग्रह' का नेतृत्व किसने किया था? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)

(अ) महात्मा गाँधी (ब) वल्लभ भाई पटेल

(स) जवाहर लाल नेहरू (द) भीमराव अम्बेडकर

12. कांग्रेस के किस अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' की माँग को औपचारिक रूप से मान लिया गया?

(अ) कलकत्ता अधिवेशन (ब) नागपुर अधिवेशन

(स) इलाहाबाद अधिवेशन (द) लाहौर अधिवेशन

13. अप्रैल, 1930 में महात्मा गाँधी के किस समर्पित साथी को गिरफ्तार किया गया?

(अ) अब्दुल गफ्फार खान (ब) सुभाषचन्द्र बोस

(स) जवाहर लाल नेहरू (द) मौलाना आजाद

14. 1929 का कांग्रेस अधिवेशन निम्न में से कहाँ हुआ था? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22)

(अ) इलाहाबाद (ब) कलकत्ता (स) लाहौर (द) मद्रास

15. महात्मा गाँधी ने हिन्दुओं और मुसलमानों में एकता स्थापित करने के लिए किस आन्दोलन का समर्थन किया?

(अ) खिलाफत आन्दोलन (ब) सविनय अवज्ञा आन्दोलन

(स) असहयोग आन्दोलन (द) भारत छोड़ो आन्दोलन

16. 6 अप्रैल, 1930 को दाण्डी में नमक बनाकर गाँधीजी ने जिस आन्दोलन को शुरू किया, वह था-

(अ) असहयोग आन्दोलन (ब) सविनय अवज्ञा आन्दोलन

(स) भारत छोड़ो आन्दोलन (द) चम्पारन सत्याग्रह आन्दोलन

17. 1930 में 'दलित वर्ग एसोसिएशन' की स्थापना की-

(अ) डॉ. अम्बेडकर ने (ब) महात्मा गाँधी ने (स) सर जॉन साइमन ने (द) जवाहर लाल नेहरू ने

18. गाँधीजी तथा डॉ. अम्बेडकर के बीच पूना पैक्ट हुआ-

(अ) सन् 1929 में (ब) सन् 1930 में (स) सन् 1931 में (द) सन् 1932 में

अथवा

पूना पैक्ट किन दो नेताओं के मध्य हुआ?

(अ) गाँधीजी व नेहरू (ब) नेहरू व सुभाषचन्द्र बोस

(स) गाँधीजी व सुभाषचन्द्र बोस (द) गाँधीजी व डॉ. अम्बेडकर

19. 'वन्दे मातरम्' गीत लिखा-

(अ) रवीन्द्रनाथ टैगोर ने (ब) बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने

(स) अवनीन्द्रनाथ टैगोर ने (द) नटेसा शास्त्री ने

20. महात्मा गाँधी ने जिस घटना के कारण असहयोग आन्दोलन रोकने का आह्वान किया, वह थी-

(अ) चौरी-चौरा में पुलिस के साथ हिंसक टकराव (ब) आन्ध्रप्रदेश में गुरिल्ला आन्दोलन

(स) अवध में हुई बाजारों में लूटपाट

(द) ब्रिटिश संस्थानों के स्थान पर वैकल्पिक संस्थानों की स्थापना न होना

21. गाँधीजी ने अहमदाबाद में सूती कपड़ा कारखानों के मजदूरों के बीच सत्याग्रह आन्दोलन किया-

(अ) 1917 में (ब) 1918 में (स) 1921 में (द) 1930 में

22. सविनय अवज्ञा आन्दोलन में किस वर्ग की हिस्सेदारी काफी सीमित थी?

(अ) दलित वर्ग की (ब) सम्पन्न किसान वर्ग की

(स) व्यापारियों की (द) औरतों की

23. भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ-साथ राष्ट्रवाद की भावना को विकसित करने में निम्न में से किस तथ्य ने भी अपना योगदान दिया?

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 41

(अ) 'वन्दे मातरम्' गीत (ब) भारत माता की छवि

(स) तिरंगा झण्डा (द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 24. सत्याग्रह निम्नलिखित में से क्या था?

(अ) शुद्ध आत्मिक बल (ब) कमजोर का हथियार (स) शारीरिक बल (द) हथियारों का बल

प्रश्न 25. स्वदेशी आन्दोलन की प्रेरणा से किसने भारतमाता की विख्यात छवि को संन्यासिनि के रूप में दर्शाया है?

(अ) रवीन्द्रनाथ टैगोर ने (ब) अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने

(स) बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने (द) नटेसा शास्त्री ने

प्रश्न 26. महात्मा गांधी दक्षिणी अफ्रीका से भारत कब लौटे? (प्रश्न बैंक)

(अ) 1915 (ब) 1914 (स) 1913 (द) 1912

प्रश्न 27. भारत के लिए 1929 में 'डोमीनियन स्टेटस' का गोलमोल सा ऐलान किया-

(अ) लॉर्ड इरविन (ब) सर साइमन (स) जनरल डायर (द) सर मोहम्मद

प्रश्न 28. अली बंधुओं (मोहम्मद अली व शौकत अली) का सम्बन्ध मुख्यतः किस आन्दोलन से है? (प्रश्न बैंक)

(अ) खिलाफत आन्दोलन (ब) भारत छोड़ो आन्दोलन

(स) आजाद हिंद फौज (द) रोलेट सत्याग्रह

उत्तरमाला

1. (द)

2. (ब)

3. (स)

4. (ब)

5. (द)

6. (ब)

7. (स)

8. (ब)

9. (ब)

10. (स)

11. (ब)

12. (द)

13. (अ)

14. (स)

15. (अ)

16. (ब)

17. (अ)

18. (द)

19. (ब)

20. (अ)

21. (ब)

22. (अ)

23. (द)

24. (अ)

25. (ब)

26. (अ)

27. (अ)

28. (अ)

● रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-

1. 13 अप्रैल, 1919 को ............ हत्याकांड हुआ।

2. 1930 में ........... ने दलित वर्ग एसोसिएशन की स्थापना की।

3. 1870 के दशक में 'वन्दे मातरम्' गीत की रचना ............ ने की थी। (प्रश्न बैंक)

4. मद्रास में ............ ने द फोकलोर्स ऑफ सदर्न इंडिया के नाम से तमिल लोक कथाओं का विशाल संकलन प्रकाशित किया।

5. स्वदेशी आन्दोलन की प्रेरणा से अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने ........... की विख्यात छवि को चित्रित किया।

6. गाँधीजी के नेतृत्व में हुए आन्दोलनों में हिस्सा लेने वाले विभिन्न समूह और वर्ग अलग-अलग ............ और ............ के साथ हिस्सा ले रहे थे।

7. इतिहास की ............ राष्ट्रवाद की भावना पैदा करने का एक और साधन था।

8. ............ का विचार भारतीय लोक-कथाओं को पुनर्जीवित करने के आन्दोलन से भी मजबूत हुआ।

9. 1917 में गांधी जी ने गुजरात के .................... जिले के किसानों की मदद के लिए सत्याग्रह का आयोजन किया। (प्रश्न बैंक)

10. असहयोग आन्दोलन जनवरी .................... में प्रारम्भ हुआ। (प्रश्न बैंक)

उत्तरमाला

1. जलियाँवाला बाग 2. अम्बेडकर 3. बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय 4. नटेसा शास्त्री

5. भारत माता 6. आकांक्षाओं, अपेक्षाओं 7. पुनर्व्याख्या 8. राष्ट्रवाद

9. खेड़ा 10. 1921

● अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. यह किसने कहा था कि "हम बम और पिस्तौल की उपासना नहीं करते बल्कि समाज में क्रांति चाहते हैं।"

उत्तर— यह अपने मुकदमे के दौरान भगतसिंह ने कहा था।

प्रश्न 2. गाँधीजी के नेतृत्व में चलाए गए दो प्रारम्भिक सत्याग्रह आन्दोलनों के नाम लिखिए।

उत्तर— (1) खेड़ा आन्दोलन (2) अहमदाबाद आन्दोलन।

प्रश्न 3. सन् 1917 में महात्मा गाँधी द्वारा किसानों के पक्ष में आयोजित किए गए दो मुख्य सत्याग्रहों के नाम बताइए।

उत्तर— (1) चम्पारन सत्याग्रह, 1917 (2) खेड़ा सत्याग्रह, 1917।

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प्रश्न 4. जबरन भर्ती की प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं?

उत्तर— इस प्रक्रिया के अंतर्गत अंग्रेज भारत के लोगों को जबरदस्ती सेना में भर्ती कर लेते थे।

प्रश्न 5. 'वन्देमातरम्' गीत के लेखक कौन थे? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय।

प्रश्न 6. 'हिन्द स्वराज' नामक पुस्तक किसने व कब लिखी? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— महात्मा गाँधी ने 1909 में।

प्रश्न 7. भारत में सबसे पहले महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह किस स्थान पर आयोजित किया था?

उत्तर— चंपारण (बिहार), 1917 में।

प्रश्न 8. कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम को किस अधिवेशन में स्वीकृति प्रदान की गई और कब?

उत्तर— कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम को दिसम्बर, 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में स्वीकृति प्रदान की गई।

प्रश्न 9. केन्द्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली में किन क्रान्तिकारियों ने बम फेंका और कब फेंका?

उत्तर— 1929 में सरदार भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने केन्द्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंका।

प्रश्न 10. गाँधीजी ने गुजरात के किसानों की सहायता के लिए किस स्थान पर सत्याग्रह-आन्दोलन चलाया और कब?

उत्तर— 1917 में गाँधीजी ने गुजरात के खेड़ा नामक स्थान पर किसानों की सहायता के लिए सत्याग्रह आन्दोलन चलाया।

प्रश्न 11. रॉलेट एक्ट क्या था?

अथवा

गाँधीजी ने रॉलेट एक्ट के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह आन्दोलन क्यों शुरू किया?

उत्तर— 1919 के रॉलेट एक्ट के अनुसार किसी व्यक्ति को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में बन्द किया जा सकता था। इसीलिए इस एक्ट के विरुद्ध गाँधीजी ने एक राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह आन्दोलन शुरू किया।

प्रश्न 12. जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड कब और कहाँ हुआ? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में हुआ।

प्रश्न 13. जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड के लिए कौन उत्तरदायी था?

उत्तर— जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड के लिए जनरल डायर उत्तरदायी था।

प्रश्न 14. खिलाफत आन्दोलन से आप क्या समझते हैं?

उत्तर— तुर्की के खलीफा की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापन करने के लिए भारत में खिलाफत आन्दोलन शुरू किया गया।

प्रश्न 15. गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन पर बल क्यों दिया?

उत्तर— गाँधीजी का मानना था कि यदि ब्रिटिश शासन का असहयोग किया जायेगा तो यह शासन समाप्त हो जायेगा।

प्रश्न 16. गाँधीजी ने किन कारणों से खिलाफत मुद्दे को असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित किया?

उत्तर— गाँधीजी ने मुसलमानों का सहयोग प्राप्त करने के लिए खिलाफत मुद्दे को असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित कर दिया।

प्रश्न 17. 'इनलैंड इमिग्रेशन' एक्ट क्या था?

उत्तर— इस एक्ट के अन्तर्गत बागानों में काम करने वाले मजदूरों को बिना इजाजत बागान से बाहर जाने की छूट नहीं होती थी।

प्रश्न 18. मुम्बई में खिलाफत समिति का गठन क्यों और कब किया गया?

उत्तर— खलीफा की तात्कालिक शक्तियों की रक्षा के लिए मार्च, 1919 में मुम्बई में खिलाफत समिति का गठन किया गया।

प्रश्न 19. खिलाफत आन्दोलन के दो प्रमुख नेताओं के नाम लिखिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— (1) मोहम्मद अली, (2) शौकत अली।

प्रश्न 20. 'बहिष्कार' का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 43

उत्तर—किसी के साथ सम्पर्क रखने और जुड़ने से इन्कार करना या गतिविधियों में हिस्सेदारी, वस्तुओं की खरीद एवं उपयोग आदि से इन्कार करना 'बहिष्कार' कहलाता है।

प्रश्न 21. असहयोग आन्दोलन कार्यक्रम की किन्हीं दो प्रमुख बातों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर— (1) हजारों विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए। (2) विदेशी सामानों का बहिष्कार किया गया।

प्रश्न 22. आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में किसके नेतृत्व में गुरिल्ला आन्दोलन संचालित किया गया?

उत्तर— अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में।

प्रश्न 23. आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में आदिवासी किसानों द्वारा गुरिल्ला आन्दोलन शुरू करने के क्या कारण थे?

उत्तर— (1) आदिवासियों को जंगलों में मवेशी चराने और लकड़ी तथा फल बीनने की अनुमति नहीं देना। (2) उन्हें सड़कें बनाने के लिए बेगार करने पर बाध्य करना।

प्रश्न 24. गाँधीजी ने किस घटना के कारण असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया और कब?

अथवा

असहयोग आन्दोलन वापस लेने का फैसला गाँधीजी ने कब लिया? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— चौरी-चौरा की हिंसात्मक घटना के कारण फरवरी, 1922 में असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया।

प्रश्न 25. 'स्वराज पार्टी' के निर्माता कौन थे? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू स्वराज पार्टी के निर्माता थे।

प्रश्न 26. साइमन कमीशन का गठन क्यों किया गया था?

उत्तर— भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करने के लिए साइमन कमीशन का गठन किया गया था।

प्रश्न 27. कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने साइमन कमीशन का बहिष्कार करने का निर्णय क्यों लिया?

उत्तर— साइमन कमीशन के सभी सदस्यों में से एक भी भारतीय नहीं था। इसलिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने इसका बहिष्कार करने का निर्णय लिया।

प्रश्न 28. 'पूर्ण स्वराज' की मांग कांग्रेस के किस अधिवेशन में की गई? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— कांग्रेस के 1929 ई. में लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की माँग की।

प्रश्न 29. 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के अध्यक्ष कौन थे?

अथवा

लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन कब आयोजित किया गया और किसकी अध्यक्षता में किया गया?

उत्तर— लाहौर में कांग्रेस अधिवेशन दिसम्बर, 1929 में आयोजित किया गया और इसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की।

प्रश्न 30. गाँधीजी की नमक यात्रा से आप क्या समझते हैं?

उत्तर— गाँधीजी द्वारा नमक कानून का उल्लंघन करने के लिए 1930 में साबरमती से दांडी तक की गई पैदल यात्रा को नमक यात्रा कहा जाता है।

प्रश्न 31. सविनय अवज्ञा आन्दोलन असहयोग आन्दोलन से किस प्रकार अलग था?

उत्तर— असहयोग आन्दोलन में लोगों को सरकार से सहयोग न करने के लिए कहा गया था और सविनय अवज्ञा आन्दोलन में कानूनों को तोड़ने के लिए कहा गया।

प्रश्न 32. गाँधी-इरविन समझौता कब हुआ? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— गाँधी-इरविन समझौता 5 मार्च, 1931 को हुआ था।

प्रश्न 33. गाँधी-इरविन समझौते की दो शर्तों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर— (1) गाँधीजी ने दूसरे गोलमेज सम्मेलन में शामिल होना स्वीकार कर लिया। (2) सरकार ने राजनीतिक कैदियों को रिहा करना स्वीकार कर लिया।

प्रश्न 34. 'दमित वर्ग एसोसिएशन' का गठन कब हुआ?

अथवा

दलितों की 'दमित वर्ग एसोसिएशन' की स्थापना किसने और कब की? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— 1930 में डॉ. अम्बेडकर ने दलितों की 'दमित वर्ग एसोसिएशन' की स्थापना की।

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प्रश्न 35. भारतीय अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नियंत्रण के विरोध का नेतृत्व किन उद्योगपतियों ने किया?

उत्तर— (1) पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास (2) जी.डी. बिड़ला।

प्रश्न 36. सीमान्त गाँधी किसे कहा जाता था?

उत्तर— अब्दुल गफ्फार खान को।

प्रश्न 37. 'पिकेटिंग' से क्या आशय है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— पिकेटिंग प्रदर्शन के विरोध का एक ऐसा स्वरूप है जिसमें लोग किसी दुकान, कार्यालय या कारखाने के भीतर जाने का रास्ता रोक लेते हैं।

प्रश्न 38. असहयोग आन्दोलन में भाग लेने वाले किसानों की किन्हीं दो प्रमुख माँगों के नाम लिखिए।

उत्तर— (1) लगान में कमी (2) बेगार की समाप्ति।

प्रश्न 39. दांडी किस राज्य में स्थित है?

उत्तर— गुजरात राज्य में।

प्रश्न 40. महात्मा गाँधी की दांडी यात्रा कहाँ से प्रारम्भ हुई थी?

उत्तर— साबरमती में स्थित गाँधी आश्रम से।

प्रश्न 41. गाँधीजी ने सर्वप्रथम सत्याग्रह का प्रयोग कहाँ किया था और क्यों किया था?

उत्तर— गाँधीजी ने सर्वप्रथम सत्याग्रह का प्रयोग दक्षिणी अफ्रीका में किया था क्योंकि वहाँ की सरकार रंगभेद की नीति का अनुकरण कर रही थी।

प्रश्न 42. अवध में आन्दोलन करने वाले किसानों का नेतृत्व किसने किया?

उत्तर— अवध में संन्यासी बाबा रामचंद्र ने आन्दोलन करने वाले किसानों का नेतृत्व किया।

प्रश्न 43. कांग्रेस ने किस तारीख को स्वतंत्रता दिवस मनाने का निश्चय किया?

उत्तर— कांग्रेस ने 26 जनवरी, 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निश्चय किया।

प्रश्न 44. गाँधीजी ने वायसराय लार्ड इरविन को लिखे पत्र में कितनी माँगें प्रस्तुत की थीं?

उत्तर— गाँधीजी ने वायसराय लार्ड इरविन को लिखे पत्र में 11 माँगें प्रस्तुत की थीं।

प्रश्न 45. गाँधीजी ने अपने पत्र में वायसराय को क्या अल्टीमेटम (चेतावनी) दिया था?

उत्तर— गाँधीजी ने अपने पत्र में वायसराय को यह अल्टीमेटम दिया था कि 11 मार्च तक उनकी माँगें स्वीकार न करने पर कांग्रेस सविनय अवज्ञा आन्दोलन छेड़ देगी।

प्रश्न 46. गाँधीजी किस गोलमेज सम्मेलन में सम्मिलित हुए और कब?

उत्तर— (i) द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में (ii) 1931 में।

प्रश्न 47. बारदोली आन्दोलन किसके नेतृत्व में और कब हुआ? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— बारदोली आन्दोलन सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में 1928 में हुआ।

प्रश्न 48. चौरी-चौरा घटना कब घटित हुई? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— चौरी-चौरा घटना 1922 में घटित हुई।

प्रश्न 49. पूना पैक्ट क्या था?

उत्तर— पूना पैक्ट के अनुसार दलित वर्ग के लोगों को प्रान्तीय तथा केन्द्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें प्रदान की जाएँगी तथा उनके लिए मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही होगा।

प्रश्न 50. दलित वर्गों ने अलग निर्वाचन क्षेत्रों की माँग क्यों की?

उत्तर— दलित वर्गों की मान्यता थी कि उनकी सामाजिक अपंगता केवल राजनीतिक सशक्तीकरण से ही दूर हो सकती है। इसलिए उन्होंने अलग निर्वाचन क्षेत्रों की माँग की।

प्रश्न 51. 'आनन्द मठ' के रचयिता कौन थे? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— 'आनन्द मठ' नामक उपन्यास के रचयिता बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय थे।

प्रश्न 52. लाला लाजपत राय की मृत्यु कैसे हुई?

उत्तर— साइमन कमीशन के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान ब्रिटिश पुलिस ने लाला लाजपत राय पर हमला किया। प्रदर्शन के दौरान मिले गहरे जख्मों के कारण उनकी मृत्यु हुई।

प्रश्न 53. हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (एच.एस.आर.ए.) के तीन प्रमुख नेताओं के नाम बताइये।

उत्तर— (1) भगत सिंह (2) जतिन दास (3) अजय घोष।

प्रश्न 54. 'गिरमिटिया' शब्द से आप क्या समझते हैं? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22)

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 45

उत्तर—औपनिवेशिक शासन के दौरान बहुत सारे लोगों को काम करने के लिए फिजी, गुयाना, वेस्टइंडीज आदि स्थानों पर ले जाया गया था, जिन्हें 'गिरमिटिया' कहा जाता था।

प्रश्न 55. सत्याग्रह से क्या अभिप्राय है?

उत्तर—गाँधीजी के अनुसार सत्याग्रह शुद्ध आत्मबल है और आत्मा का आधार सत्य होता है। इसीलिए इसे सत्याग्रह का नाम दिया गया है।

प्रश्न 56. बेगार क्या है? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)

अथवा

'बेगार' शब्द से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर—बिना मजदूरी दिए काम कराना बेगार कहलाता है।

● लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. पूना पैक्ट कब व किनके मध्य हुआ था? (प्रश्न बैंक)

उत्तर—पूना पैक्ट सितम्बर 1932 में महात्मा गाँधी तथा डॉ. अम्बेडकर के मध्य हुआ था। पूना पैक्ट में दलित वर्ग के लोगों को प्रान्तीय तथा केन्द्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें प्रदान की गई तथा उनके लिए मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में ही होगा-यह प्रावधान किया गया।

प्रश्न 2. इतिहास की पुनर्व्याख्या किस प्रकार भारत में राष्ट्रवाद की भावना पैदा करने में महत्त्वपूर्ण साधन सिद्ध हुई? स्पष्ट करें।

उत्तर—19वीं शताब्दी तक सारे भारतीय यह महसूस करने लगे थे कि राष्ट्र के प्रति गर्व का भाव जगाने के लिए भारतीय इतिहास को अलग ढंग से पढ़ाया जाना चाहिए। फलतः भारतीयों ने अपने गौरवपूर्ण अतीत के बारे में लिखना शुरू किया। गौरवपूर्ण अतीत की जानकारी से राष्ट्रवाद की भावना को बल मिला।

प्रश्न 3. खेड़ा जिले के किसान किस कारण लगान चुकाने की हालत में नहीं थे? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2022)

उत्तर—फसल खराब हो जाने और प्लेग की महामारी के कारण खेड़ा जिले के किसान लगान चुकाने की हालत में नहीं थे। वे चाहते थे कि लगान वसूली में ढील दी जाए।

प्रश्न 4. अंग्रेज सरकार ने रॉलेट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह के विरोध में क्या-क्या कदम उठाए?

उत्तर—अंग्रेज सरकार ने रॉलेट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह के विरोध में निम्न कदम उठाए-

(i) रैलियों एवं जलूसों पर रोक लगाई गई।

(ii) अमृतसर के स्थानीय नेताओं का विरोध किया गया।

(iii) दिल्ली में महात्मा गाँधी के प्रवेश पर रोक लगा दी गई।

प्रश्न 5. जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड पर टिप्पणी लिखिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22)

उत्तर—जलियाँवाला बाग की दुर्घटना अमृतसर में 1919 ई. में बैशाखी वाले दिन हुई। इस दिन अमृतसर की जनता जलियाँवाला बाग में एक सभा कर रही थी। जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के इस शान्तिपूर्ण सभा पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। इससे सैकड़ों निर्दोष व्यक्तियों की जानें गईं तथा सैकड़ों घायल हुए।

प्रश्न 6. जलियाँवाला हत्याकाण्ड के प्रभाव का वर्णन कीजिए।

उत्तर—(i) जलियाँवाला हत्याकाण्ड के प्रभावस्वरूप सारे देश में रोष की लहर फैल गई।

(ii) अब भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन जनता का संग्राम बन गया।

(iii) इसमें श्रमिक, किसान, विद्यार्थी आदि भी शामिल होने लगे।

(iv) अब स्वतंत्रता आंदोलन में बहुत जोश भर गया तथा संघर्ष की गति बहुत तीव्र हो गई।

प्रश्न 7. साइमन कमीशन क्या था? इसका भारत आने पर विरोध क्यों हुआ? (प्रश्न बैंक)

उत्तर—ब्रिटिश सरकार ने राष्ट्रीय आन्दोलन को शिथिल करने, भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करने तथा उसके बारे में सुझाव प्राप्त करने हेतु सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक वैधानिक आयोग का गठन किया, जिसको 'साइमन कमीशन' के नाम से जाना गया। इस आयोग के सारे सदस्य अंग्रेज थे। एक भी भारतीय इस आयोग में नहीं था, इस कारण इसका भारत आने पर विरोध हुआ।

--- [ पृष्ठ संख्या: 53 ] ---

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प्रश्न 8. गाँधीजी ने ब्रिटिश सरकार के प्रति असहयोग की नीति क्यों अपनाई? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— गाँधीजी का विचार था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग के कारण चल पा रहा है। यदि भारतवासी अपना सहयोग वापस ले लें तो सालभर के अन्दर ब्रिटिश शासन समाप्त हो जायेगा और स्वराज की स्थापना हो जाएगी। इसी कारण गाँधीजी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध असहयोग की नीति अपनाई।

प्रश्न 9. असहयोग आन्दोलन कार्यक्रम की चार प्रमुख बातों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर—

(1) सरकार द्वारा दी गई पदवियाँ लौटाना।

(2) सरकारी नौकरियों, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों का बहिष्कार।

(3) विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।

(4) सरकारी स्कूलों तथा कॉलेजों का बहिष्कार।

प्रश्न 10. शहरी क्षेत्रों में असहयोग आन्दोलन के शिथिल पड़ने के मुख्य दो कारण थे?

उत्तर— (1) खादी का कपड़ा मिलों में बनने वाले कपड़ों से काफी महंगा होता था। अतः गरीब मिलों के कपड़ों का लम्बे समय तक बहिष्कार नहीं कर सकते थे।

(2) ब्रिटिश संस्थानों के वैकल्पिक संस्थानों की कमी के कारण विद्यार्थी और शिक्षक सरकारी स्कूलों में लौटने लगे थे।

प्रश्न 11. साइमन कमीशन भारत क्यों आया? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)

उत्तर— राष्ट्रीय आन्दोलन के जवाब में गठित किए गए साइमन कमीशन को भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करना था और उसके बारे में सुझाव देने थे। 1928 में भारत पहुँचे इस साइमन कमीशन के सभी सदस्य अंग्रेज थे, इसलिए भारतीयों ने इसका विरोध किया।

प्रश्न 12. अवध के किसानों की क्या समस्यायें थीं?

उत्तर— अवध के किसानों की समस्यायें ये थीं-

(i) अवध के तालुकदारों एवं जमींदारों द्वारा किसानों से अधिक लगान एवं अन्य प्रकार के कर वसूले जा रहे थे।

(ii) किसानों को बेगार करनी पड़ती थी।

(iii) उन्हें बार-बार पट्टे की जमीन से हटा दिया जाता था ताकि जमीन पर उनका कोई अधिकार स्थापित न हो सके।

प्रश्न 13. मुस्लिम लीग संगठन की प्रमुख माँगें क्या थीं?

उत्तर— मुस्लिम लीग के प्रमुख नेताओं में से एक नेता मोहम्मद अली जिन्ना थे। मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए पृथक् निर्वाचन मण्डल की माँग की, किन्तु बाद में वह अपनी इस माँग को छोड़ने के लिए तैयार हुई बशर्ते कि मुसलमानों को केन्द्रीय सभा में सीटों का आरक्षण तथा मुस्लिम बहुल प्रान्तों में उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए।

प्रश्न 14. दिसम्बर, 1929 के कांग्रेस के 'लाहौर अधिवेशन' पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर— दिसम्बर, 1929 में लाहौर में पं. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का अधिवेशन शुरू हुआ, जिसमें 'पूर्ण स्वराज' का प्रस्ताव पास किया गया तथा कांग्रेस को उचित अवसर पर सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने का अधिकार दे दिया। 26 जनवरी, 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का भी निश्चय किया गया।

प्रश्न 15. सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने से पहले गाँधीजी ने क्या किया?

उत्तर— सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने से पहले गाँधीजी ने 31 जनवरी, 1930 को वायसराय इरविन को पत्र लिखकर अपनी 11 सूत्री माँगें उसके समक्ष रखीं। इन माँगों में सबसे महत्वपूर्ण माँग नमक कर को खत्म करने के बारे में थी। गाँधीजी ने पत्र में लिखा था कि अगर 11 मार्च तक उनकी माँगें नहीं मानी गईं तो कांग्रेस सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करेगी।

प्रश्न 16. महात्मा गाँधी ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध लड़ने के लिए नमक को ही अस्त्र के रूप में क्यों चुना?

उत्तर— महात्मा गाँधी ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध लड़ने के लिए नमक को ही अस्त्र के रूप में इसलिए चुना क्योंकि नमक का अमीर और गरीब सभी इस्तेमाल करते थे। यह भोजन का एक अभिन्न हिस्सा था। इस पर कर और इसके उत्पादन पर सरकारी इजारेदारी को गाँधीजी ने ब्रिटिश शासन का सबसे दमनकारी पहलू माना।

प्रश्न 17. सम्पन्न किसान समुदाय के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भाग लेने के दो कारणों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर— (1) सम्पन्न किसान लगान माफ करवाने की माँग को लेकर सविनय अवज्ञा आन्दोलन में शामिल हुए।

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(2) व्यापारिक फसलों में गिरती कीमतों से परेशान सम्पन्न किसान सविनय अवज्ञा आन्दोलन में शामिल हुए।

प्रश्न 18. सविनय अवज्ञा आन्दोलन में औद्योगिक श्रमिक वर्ग की क्या भूमिका थी?

उत्तर— मजदूरों ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का समर्थन किया। 1930 में रेलवे कामगारों की तथा 1932 में गोदी कामगारों की हड़ताल हुई। 1930 में छोटा नागपुर की टिन खानों के हजारों मजदूरों ने गाँधी टोपी पहनकर रैलियों और बहिष्कार अभियानों में भाग लिया। शोलापुर के मजदूरों ने पुलिस चौकियों पर हमले किए।

प्रश्न 19. ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन को क्यों नियुक्त किया?

उत्तर— ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक वैधानिक आयोग का गठन किया। ब्रिटिश सरकार ने राष्ट्रीय आन्दोलन को शिथिल करने, भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करने तथा उसके बारे में सुझाव प्राप्त करने के लिए साइमन कमीशन को नियुक्त किया।

प्रश्न 20. बारदोली सत्याग्रह के बारे में आप क्या जानते हैं?

उत्तर— बारदोली सत्याग्रह-1928 में वल्लभ भाई पटेल ने गुजरात के बारदोली तालुका में किसान आन्दोलन का नेतृत्व किया, जो कि भू-राजस्व को बढ़ाने के खिलाफ था। यह बारदोली सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है और यह आन्दोलन वल्लभ भाई पटेल के सक्षम नेतृत्व के तहत सफल रहा। इस संघर्ष का प्रचार व्यापक रूप से हुआ और इसे भारत के कई हिस्सों में अत्यधिक सहानुभूति प्राप्त हुई।

प्रश्न 21. गाँधी-इरविन समझौते पर कब हस्ताक्षर हुए? इस समझौते की प्रमुख बातें क्या थीं?

उत्तर— 5 मार्च, 1931 को गाँधी-इरविन समझौते पर हस्ताक्षर हुए।

इसकी मुख्य बातें थीं-(i) गाँधीजी लंदन में होने वाले दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने को सहमत हो गये।

(ii) ब्रिटिश सरकार राजनैतिक कैदियों को रिहा करने पर सहमत हो गई।

प्रश्न 22. गाँधीजी के द्वारा दलितोद्धार के लिए किए गए कार्यों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर— (1) गाँधीजी ने स्वराज की स्थापना के लिए अस्पृश्यता को समाप्त करने पर बल दिया।

(2) अछूतों को हरिजन (ईश्वर की सन्तान) बताया।

(3) मन्दिरों, सार्वजनिक तालाबों, कुँओं पर समान अधिकार दिलाने के लिए सत्याग्रह किया।

(4) ऊँची जातियों से अपना हृदय परिवर्तन करने की अपील की।

प्रश्न 23. बंगाल में स्वदेशी आन्दोलन के दौरान किस प्रकार का झण्डा तैयार किया गया था? इसकी मुख्य विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर— बंगाल में स्वदेशी आन्दोलन के दौरान एक तिरंगा झण्डा (हरा, पीला, लाल) तैयार किया गया।

मुख्य विशेषताएँ-(i) इस झण्डे में ब्रिटिश भारत के आठ प्रान्तों का प्रतिनिधित्व करते कमल के आठ फूल दर्शाए गए थे।

(ii) इसमें हिन्दुओं व मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता एक अर्द्ध-चन्द्र दर्शाया गया था।

प्रश्न 24. 1921 तक किसने 'स्वराज का झण्डा' तैयार कर लिया था? स्वराज के इस झण्डे की मुख्य विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर— 1921 तक गाँधीजी ने स्वराज का झण्डा तैयार कर लिया था। यह तिरंगा झण्डा (सफेद, हरा और लाल) था। इसके मध्य में गाँधीवादी प्रतीक चरखे को जगह दी गई थी जो स्वावलम्बन का प्रतीक था। जुलूसों में यह झण्डा थामे चलना शासन के प्रति अवज्ञा का संकेत था।

प्रश्न 25. गोलमेज सम्मेलन का उद्देश्य क्या था? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— गोलमेज सम्मेलन का उद्देश्य भारत में संवैधानिक सुधारों पर चर्चा करना था। यह सम्मेलन ब्रिटिश सरकार द्वारा आयोजित किया गया था, जिसका उद्देश्य भारतीयों को सत्ता में हिस्सा देना और देश में स्वराज या स्व-शासन की माँग को पूरा करना था।

इस सम्मेलन के माध्यम से, ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं के साथ बातचीत करने की कोशिश की, ताकि वे भारत में एक नई संवैधानिक व्यवस्था की स्थापना कर सकें। हालाँकि, यह सम्मेलन पूरी तरह से सफल नहीं हो सका।

प्रश्न 26. गिरमिटिया मजदूर कौन थे? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— गिरमिटिया मजदूर-औपनिवेशिक शासन के दौरान अनेक भारतीयों को काम करने के लिए फिजी, गुयाना, वेस्टइन्डीज आदि देशों में एक अनुबन्ध के तहत ले जाया जाता था, जिसे बाद में ये मजदूर 'गिरमिट' कहने लगे। इसी आधार पर इन श्रमिकों को 'गिरमिटिया मजदूर' कहा जाने लगा।

--- [ पृष्ठ संख्या: 55 ] ---

● दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. 'खिलाफत आन्दोलन' का अर्थ स्पष्ट कीजिए। इसमें गाँधीजी की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। (प्रश्न बैंक)

अथवा

खिलाफत आन्दोलन पर टिप्पणी लिखिए। (प्रश्न बैंक)

अथवा

खिलाफत आन्दोलन क्या था? इसके महत्त्व को बताइए।

उत्तर— खिलाफत आन्दोलन का अर्थ-तुर्की का सुल्तान इस्लामिक विश्व का आध्यात्मिक नेता अर्थात् खलीफा माना जाता था। प्रथम विश्व युद्ध में ऑटोमन तुर्की की हार हो चुकी थी। इस आशय की अफवाहें फैली हुई थीं कि ब्रिटिश सरकार द्वारा तुर्की के सुल्तान पर एक कठोर और अपमानजनक सन्धि थोप दी जाएगी। इससे भारतीय मुसलमानों में आक्रोश व्याप्त था। अतः उन्होंने खलीफा की तात्कालिक शक्तियों की रक्षा के लिए मार्च, 1919 में बम्बई में एक खिलाफत समिति का गठन किया था तथा मोहम्मद अली और शौकत अली बन्धुओं के साथ अनेक मुस्लिम नेताओं ने खिलाफत आन्दोलन की सम्भावना तलाशने के लिए महात्मा गाँधी के साथ चर्चा शुरू कर दी थी।

खिलाफत आन्दोलन में गाँधीजी की भूमिका-गाँधीजी ने हिन्दुओं और मुसलमानों में एकता उत्पन्न करने के लिए खिलाफत आन्दोलन का समर्थन किया। सितम्बर, 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाँधीजी ने दूसरे कांग्रेसी नेताओं को इस बात पर राजी कर लिया कि खिलाफत आन्दोलन के समर्थन और स्वराज के लिए एक असहयोग आन्दोलन शुरू किया जाना चाहिए।

खिलाफत आन्दोलन का महत्त्व-खिलाफत आन्दोलन ने राष्ट्रीय आन्दोलन को गति प्रदान की तथा हिन्दू व मुसलमानों में एकता स्थापित की।

प्रश्न 2. कुछ समय पश्चात् असहयोग आन्दोलन शहरों में धीमा पड़ने लगा। कारण सहित व्याख्या कीजिए।

उत्तर— कुछ समय बाद असहयोग आन्दोलन शहरों में धीमा पड़ने लगा क्योंकि-

(i) खादी का कपड़ा मिलों में बनने वाले कपड़ों की तुलना में महँगा होता था तथा समाज का गरीब तबका खादी खरीदने में समर्थ नहीं था।

(ii) आन्दोलन की कामयाबी हेतु वैकल्पिक भारतीय संस्थानों की स्थापना जरूरी थी परन्तु यह प्रक्रिया अत्यन्त धीमी होने के कारण विद्यार्थी, शिक्षक तथा वकील क्रमशः सरकारी स्कूलों तथा सरकारी अदालतों में लौटने लगे। फलस्वरूप शहरों में असहयोग आन्दोलन धीमा पड़ने लगा।

प्रश्न 3. दक्षिणी अफ्रीका से भारत आने के बाद महात्मा गाँधी द्वारा किये गये सत्याग्रह आन्दोलनों का वर्णन कीजिए।

अथवा

भारत आने के बाद गाँधीजी ने किन तीन स्थानों पर सत्याग्रह आन्दोलन चलाया?

उत्तर— (1) चम्पारन-1917 में गाँधीजी ने बिहार के चम्पारन में सत्याग्रह आन्दोलन किया। उन्होंने चम्पारन क्षेत्र का दौरा किया तथा दमनकारी बागान व्यवस्था के विरुद्ध किसानों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया।

(2) खेड़ा-1917 में गाँधीजी ने गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों की सहायता के लिए सत्याग्रह का आयोजन किया। फसल खराब हो जाने और प्लेग की महामारी के कारण खेड़ा जिले के किसान लगान चुकाने में असमर्थ थे। वे लगान वसूली में कुछ रियायत चाहते थे।

(3) अहमदाबाद-1918 में गाँधीजी ने अहमदाबाद में सत्याग्रह आन्दोलन चलाया। उन्होंने सूती कपड़ा कारखानों के मजदूरों को संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया।

प्रश्न 4. असहयोग आन्दोलन किस प्रकार शहरी मध्य वर्ग की हिस्सेदारी के साथ शहरों में प्रारम्भ हुआ? इसके आर्थिक प्रभावों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

उत्तर— भारत के शहरी मध्य वर्ग में असहयोग आन्दोलन के प्रति प्रतिक्रियाएँ-

(i) हजारों की संख्या में विद्यार्थियों ने विद्यालयों एवं महाविद्यालयों का परित्याग कर दिया।

(ii) प्रधानाध्यापकों एवं अध्यापकों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

(iii) वकीलों ने मुकदमे लड़ने बन्द कर दिए।

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 49

(iv) अधिकांश प्रान्तों में परिषद चुनावों का बहिष्कार किया गया।

असहयोग आंदोलन के आर्थिक प्रभाव-

(1) असहयोग आंदोलन में विदेशी सामानों का बहिष्कार किया गया तथा शराब की दुकानों की पिकेटिंग की गई और विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। 1921 से 1922 के बीच विदेशी कपड़ों का आयात आधा रह गया।

(2) इस आंदोलन के दौरान लोग आयातित कपड़ों को छोड़कर केवल भारतीय कपड़े पहनने लगे। इससे भारतीय मिलों और हथकरघों का उत्पादन बढ़ने लगा।

(3) कई व्यापारियों और उद्योगपतियों ने विदेशी चीजों का व्यापार करने तथा विदेशी व्यापार में पैसा लगाना बन्द कर दिया।

प्रश्न 5. असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम का वर्णन कीजिए।

अथवा

असहयोग आन्दोलन के सन्दर्भ में गाँधीजी के प्रमुख सुझावों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर— सरकार से असहयोग करने का गाँधीजी का विचार आन्दोलन कैसे बन सकता था, इस सम्बन्ध में गाँधीजी ने निम्न सुझाव दिये थे-

(1) यह आन्दोलन चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ना चाहिए।

(2) सर्वप्रथम लोगों को सरकार द्वारा दी गई पदवियाँ लौटा देनी चाहिए।

(3) इसके पश्चात् सरकारी नौकरियों, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना चाहिए।

(4) अगर सरकार दमन का रास्ता अपनाती है तो व्यापक सविनय अवज्ञा अभियान भी शुरू किया जाये।

कांग्रेस में बहुत सारे लोग इन प्रस्तावों पर सशंकित थे। लेकिन अन्ततः दिसम्बर 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में असहयोग कार्यक्रम पर स्वीकृति की मोहर दी गई।

प्रश्न 6. असहयोग आन्दोलन का शहरों में क्या प्रभाव पड़ा? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— असहयोग आन्दोलन ने शहरों में कई महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाले, जो कि निम्नलिखित थे-

(i) व्यापार और उद्योग में गिरावट- असहयोग आन्दोलन के कारण कई व्यापारियों और उद्योगपतियों ने ब्रिटिश सामान का बहिष्कार किया, जिससे व्यापार और उद्योग में गिरावट आई।

(ii) शिक्षा संस्थानों का बहिष्कार- छात्रों और शिक्षकों ने ब्रिटिश शिक्षा संस्थानों का बहिष्कार किया, जिससे कई स्कूल और कॉलेज बंद हो गए।

(iii) सामाजिक जागरूकता- आन्दोलन ने लोगों में राष्ट्रीयता और स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता बढ़ाई।

(iv) सामाजिक एकता- विभिन्न जातियों एवं धर्मों के लोग एकजुट होकर ब्रिटिश शासक के खिलाफ खड़े हुए।

(v) राजनीतिक सक्रियता- शहरों में लोगों ने राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू किया, जिससे स्वतंत्रता संग्राम को गति मिली।

प्रश्न 7. स्वराज पार्टी की स्थापना और उसके उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए।

उत्तर— चितरंजन दास देशबन्धु तथा पं. मोतीलाल नेहरू ने परिषद राजनीति में वापस लौटने के लिए कांग्रेस के भीतर ही स्वराज दल की स्थापना की। स्वराज पार्टी के निम्नलिखित उद्देश्य थे-

(1) 1919 के गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट के तहत गठित की गई प्रान्तीय परिषद् के चुनावों में भाग लेना।

(2) प्रान्तीय परिषदों में रहते हुए ब्रिटिश नीतियों का विरोध करना।

(3) सुधारों की वकालत करना और यह दिखलाना कि ये परिषदें लोकतांत्रिक संस्थाएँ नहीं हैं।

प्रश्न 8. गाँधीजी की नमक यात्रा को स्पष्ट कीजिए और सविनय अवज्ञा आंदोलन की कार्य-योजना तथा गतिविधियों को बताइए।

उत्तर— गाँधीजी की नमक यात्रा- मार्च, 1930 में गाँधीजी ने अपने 78 विश्वस्त कार्यकर्ताओं को लेकर साबरमती आश्रम से नमक कानून तोड़ने के लिए दांडी नामक कस्बे की ओर प्रस्थान किया। गाँधीजी ने 240 किलोमीटर की यह यात्रा पैदल चलकर 24 दिन में पूरी की। 6 अप्रैल को वे दांडी पहुँचे और उन्होंने समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाना शुरू कर दिया। इस प्रकार उन्होंने नमक कानून भंग किया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन की कार्ययोजना तथा उसकी गतिविधियाँ निम्न प्रकार थीं-

(1) इस बार लोगों को न केवल अंग्रेजों का सहयोग न करने के लिए बल्कि औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन करने के लिए आह्वान किया गया।

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(2) देश के विभिन्न भागों में हजारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा तथा सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किया।

(3) विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया गया तथा शराब की दुकानों की पिकेटिंग की गई।

(4) किसानों ने लगान और चौकीदारी कर चुकाने से इन्कार कर दिया।

(5) गाँवों में तैनात कर्मचारियों ने इस्तीफे दिए तथा जंगलों में रहने वालों ने वन कानूनों का उल्लंघन किया।

प्रश्न 9. जलियाँवाला बाग हत्याकांड का विस्तार से वर्णन कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— जलियाँवाला बाग हत्याकांड 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर में हुआ था। 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग में अलग-अलग कारणों से भीड़ इकट्ठा हुई थी। कुछ वहाँ सरकार की नई दमनकारी नीतियों का विरोध करने लगे तो कुछ वहाँ वार्षिक बैसाखी मेले के लिए आए थे। शहर से बाहर स्थित होने के कारण वहाँ के लोग इलाके में मार्शल लॉ लागू होने के समाचार से अनजान थे। जनरल डायर ने सैनिकों के साथ मैदान में पहुँचकर वहाँ से बाहर निकलने के सारे रास्तों को बन्द करवा दिया तत्पश्चात् वहाँ शांतिपूर्ण भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चलवाई जिसमें सैकड़ों निर्दोषों की जान चली गई।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड की खबर अन्य शहरों में फैलने पर जनता में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हुआ। अपना आक्रोश व्यक्त करने हेतु शहरों में लोग सड़कों पर उतरने लगे, हड़तालें होने लगीं, लोग पुलिस से मोर्चा लेने लगे तथा सरकारी इमारतों पर हमला करने लगे। इन कार्रवाइयों को कुचलने हेतु सरकार ने दमनत्मक रवैया अपनाया। लोगों को कोड़े मारे गए, गाँवों में बम बरसाए गए। हिंसा फैलती देख महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।

प्रश्न 10. सविनय अवज्ञा आन्दोलन में दलित वर्ग की भूमिका का विवेचन कीजिए।

उत्तर— कांग्रेस ने दीर्घकाल तक दलितों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि वह रूढ़िवादी सवर्ण हिन्दू सनातनपंथियों से भयभीत थी। दलित नेता अपने समुदाय की समस्याओं का अलग राजनीतिक समाधान ढूँढना चाहते थे। वे स्वयं को संगठित करने लगे थे और उन्होंने शिक्षा संस्थाओं में आरक्षण के लिए आवाज उठायी। उन्होंने दलितों के लिए विधानसभाओं में पृथक् निर्वाचिका की व्यवस्था किए जाने पर बल दिया। उनका कहना था कि उनका सामाजिक पिछड़ापन केवल राजनीतिक सशक्तीकरण से ही दूर हो सकता है। इसलिए सविनय अवज्ञा आन्दोलन में दलितों की हिस्सेदारी काफी सीमित थी। महाराष्ट्र तथा नागपुर क्षेत्र में यह बात खास तौर से दिखाई देती थी जहाँ उनके संगठन काफी मजबूत थे।

प्रश्न 11. अल्लूरी सीताराम राजू के व्यक्तित्व का वर्णन कीजिए।

उत्तर— अल्लूरी सीताराम राजू ने आंध्रप्रदेश के गुडेम विद्रोहियों का नेतृत्व किया था। उनके व्यक्तित्व का वर्णन निम्न प्रकार है-

(1) अल्लूरी सीताराम राजू एक दिलचस्प व्यक्ति थे। उनका दावा था कि उनके पास बहुत सारी विशेष शक्तियाँ हैं-वह सटीक खगोलीय अनुमान लगा सकते हैं, लोगों को स्वस्थ कर सकते हैं तथा गोलियाँ भी उन्हें नहीं मार सकतीं।

(2) राजू के व्यक्तित्व से चमत्कृत विद्रोहियों का विश्वास था कि वह ईश्वर का अवतार हैं।

(3) राजू महात्मा गाँधी की महानता के गुण गाते थे।

(4) उनका कहना कि वह असहयोग आंदोलन से प्रेरित हैं। उन्होंने लोगों को खादी पहनने तथा शराब छोड़ने के लिए प्रेरित किया।

(5) उन्होंने यह दावा भी किया कि भारत अहिंसा के बल पर नहीं बल्कि केवल बल प्रयोग के जरिए ही आजाद हो सकता है।

(6) 1924 में उन्हें फाँसी दे दी गई। वे अपने लोगों के बीच लोकनायक बन गये थे।

प्रश्न 12. महात्मा गाँधी ने अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए क्या-क्या कार्य किए? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2022)

अथवा

दलितों को उनके अधिकार दिलाने हेतु गाँधीजी ने क्या प्रयास किये?

उत्तर— महात्मा गाँधी का मानना था कि अस्पृश्यता (छुआछूत) को खत्म किये बिना सौ साल तक भी स्वराज की स्थापना नहीं की जा सकती। अतः दलितों को उनके अधिकार दिलाने हेतु उन्होंने निम्न कार्य किये-

(1) महात्मा गाँधी ने ‘दलितों’ को हरिजन यानि ईश्वर की संतान बताया।

(2) उन्हें मंदिरों, सार्वजनिक तालाबों, सड़कों और कुओं पर समान अधिकार दिलाने के लिए सत्याग्रह किया।

(3) मैला ढोने वालों के काम को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए वे खुद शौचालय साफ करने लगे।

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(4) महात्मा गाँधी ने ऊँची जातियों का आह्वान किया कि वे अपना हृदय परिवर्तन करें और 'अस्पृश्यता के पाप' को छोड़ें।

(5) उन्होंने दलितों को राजनीतिक रूप से सशक्तिकरण की दिशा में डॉ. अम्बेडकर के साथ पूना पैक्ट किया। इससे दलित वर्ग को केन्द्रीय तथा प्रान्तीय विधायिका में आरक्षण मिला।

प्रश्न 13. 'पूना पैक्ट' पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

अथवा

पूना पैक्ट के बारे में आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— दलितों के प्रसिद्ध नेता डॉ. अम्बेडकर ने दलितों के लिए विधानसभाओं में पृथक् निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था करने की माँग की थी। दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों के सवाल पर दूसरे गोलमेज सम्मेलन में महात्मा गाँधी के साथ डॉ. अम्बेडकर का काफी विवाद हुआ। जब ब्रिटिश सरकार ने अम्बेडकर की माँग मान ली तो गाँधीजी ने इसका विरोध किया और आमरण अनशन पर बैठ गए। उनका मत था कि दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था से समाज में उनके एकीकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ जायेगी। अन्ततः अम्बेडकर ने गाँधीजी की राय मान ली और सितम्बर 1932 में डॉ. अम्बेडकर तथा गाँधीजी के बीच एक समझौता हो गया जिसे 'पूना पैक्ट' कहते हैं। इसके अनुसार दलित वर्गों को प्रान्तीय एवं केन्द्रीय विधान परिषदों में आरक्षित सीटें मिल गईं परन्तु उनके लिए मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही होना था।

प्रश्न 14. वे कौन-कौनसे कारण थे जिनकी वजह से आन्ध्रप्रदेश की गुडेम पहाड़ियों के आदिवासी किसानों ने विद्रोह किया?

उत्तर— आन्ध्रप्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में 1920 के दशक की शुरुआत में निम्नलिखित कारणों से एक गुरिल्ला आन्दोलन फैल गया था-

(i) अन्य वन क्षेत्रों की तरह यहाँ भी अंग्रेजी सरकार ने बड़े-बड़े जंगलों में लोगों के प्रवेश पर पाबन्दी लगा दी थी।

(ii) लोग इन जंगलों में न तो मवेशियों को चरा सकते थे, न ही जलावन के लिए लकड़ी और फल बीन सकते थे।

(iii) इन प्रतिबन्धों से न केवल उनकी रोजी-रोटी पर असर पड़ रहा था बल्कि उन्हें लगता था कि उनके परम्परागत अधिकार भी छीने जा रहे हैं।

(iv) जब सरकार ने उन्हें सड़कों के निर्माण के लिए बेगार करने के लिए भी मजबूर किया तो लोगों ने बगावत कर दी।

प्रश्न 15. गाँधीजी ने नमक यात्रा क्यों शुरू की?

अथवा

गाँधीजी की नमक यात्रा को स्पष्ट कीजिए। (प्रश्न बैंक)

अथवा

गाँधीजी की नमक यात्रा का क्या उद्देश्य था?

उत्तर— देश को एकजुट करने के लिए गाँधीजी ने नमक को एक प्रभावशाली प्रतीक माना। 31 जनवरी, 1930 को उन्होंने वायसराय लार्ड इरविन को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने 11 माँगों का उल्लेख किया। गाँधीजी इन माँगों के द्वारा समाज के सभी वर्गों को अपने साथ जोड़ना चाहते थे ताकि सभी उनके आन्दोलन में शामिल हो सकें। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण माँग नमक कर को समाप्त करने के बारे में थी। नमक का अमीर-गरीब सभी प्रयोग करते थे। यह भोजन का एक अभिन्न हिस्सा था। इसलिए गाँधीजी नमक कर को ब्रिटिश शासन का सबसे दमनकारी पहलू मानते थे। अतः जब ब्रिटिश सरकार ने उनकी माँगें नहीं मानीं, तो मार्च, 1930 में गाँधीजी ने साबरमती आश्रम से नमक कानून तोड़ने के लिए दांडी नामक स्थान की ओर प्रस्थान किया। 6 अप्रैल को दांडी पहुँचकर उन्होंने नमक बनाकर नमक कानून भंग किया।

प्रश्न 16. हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (एच.एस.आर.ए.) की स्थापना कब हुई? इसके नेताओं ने अंग्रेजी सरकार के प्रति किस प्रकार विरोध प्रदर्शन किया।

उत्तर— बहुत सारे राष्ट्रवादियों को लगता था कि अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष अहिंसा के जरिए पूरा नहीं हो सकता। 1928 में दिल्ली स्थित फिरोजशाह कोटला मैदान में हुई बैठक में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (एच.एस.आर.ए.) की स्थापना की गई। इसके नेताओं में भगत सिंह, जतिन दास और अजय घोष शामिल थे।

देश के विभिन्न भागों में कार्यवाहियाँ करते हुए इसके नेताओं ने ब्रिटिश सत्ता के कई प्रतीकों को निशाना बनाया। 1929 में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंका। उसी साल उस ट्रेन को उड़ाने

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का प्रयास किया गया जिसमें लॉर्ड इरविन यात्रा कर रहे थे। इस प्रकार विभिन्न क्रांतिकारी गतिविधियों के माध्यम से इन्होंने विरोध प्रदर्शन किया। इसके अनेक नेताओं पर मुकदमा चलाकर उन्हें फांसी दे दी गई।

प्रश्न 17. सविनय अवज्ञा आन्दोलन में किसानों की भूमिका स्पष्ट कीजिए। ( प्रश्न बैंक )

उत्तर— (i) धनी किसानों की भूमिका— सविनय अवज्ञा आन्दोलन में किसानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। धनी किसान व्यावसायिक फसलों की खेती करने के कारण व्यापार में मंदी और गिरती कीमतों से बहुत परेशान थे। जब उनकी नकद आय खत्म होने लगी, तो उनके लिए सरकारी लगान चुकाना असम्भव हो गया। सरकार लगान कम करने को तैयार नहीं थी। चारों ओर असन्तोष था। अतः लगान में कमी कराने हेतु उन्होंने सविनय अवज्ञा आन्दोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने अपने समुदायों को एकजुट किया और कई बार अनिच्छुक सदस्यों को बहिष्कार के लिए मजबूर किया। उनके लिए स्वराज की लड़ाई लगान के खिलाफ लड़ाई थी। परन्तु जब 1931 में लगानों में कमी किए बिना आन्दोलन वापस ले लिया गया, तो धनी किसानों में बड़ी निराशा हुई। फलतः जब 1932 में आन्दोलन पुनः शुरू हुआ, तो उनमें से बहुतों ने उसमें भाग नहीं लिया।

(ii) गरीब किसानों की भूमिका— गरीब किसान चाहते थे कि उन्हें जमींदारों को जो भाड़ा चुकाना था, उसे माफ कर दिया जाए। इसके लिए उन्होंने कई रेडिकल आन्दोलनों में भाग लिया। परन्तु उन्हें कांग्रेस की ओर से समर्थन नहीं मिला।

प्रश्न 18. सविनय अवज्ञा आन्दोलन में महिलाओं के योगदान का वर्णन कीजिए।

उत्तर— सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भारतीय महिलाओं ने बड़े पैमाने पर भाग लिया। महिलाएँ गाँधीजी के नमक सत्याग्रह के दौरान उनके विचार सुनने के लिए अपने घरों से बाहर आ जाती थीं। उन्होंने जुलूसों में भाग लिया, नमक बनाकर नमक-कानून तोड़ा; विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों पर धरना दिया। बहुत सारी महिलाएँ जेल भी गईं। शहरी क्षेत्रों में अधिकतर ऊँची जातियों की महिलाएँ सक्रिय थीं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में सम्पन्न किसान परिवारों की महिलाएँ आन्दोलन में भाग ले रही थीं। गाँधीजी के आह्वान के बाद महिलाओं ने राष्ट्र की सेवा करना अपना पवित्र कर्तव्य समझा।

प्रश्न 19. भारत की आर्थिक और राजनैतिक स्थिति पर प्रथम विश्व युद्ध के निहितार्थों का वर्णन कीजिए।

अथवा

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में उत्पन्न नई आर्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों की व्याख्या कीजिए।

अथवा

भारत में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उत्पन्न किन्हीं पाँच प्रमुख समस्याओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर— प्रथम विश्व युद्ध ने भारत में निम्नलिखित नई आर्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियाँ पैदा कीं—

(1) रक्षा व्यय में भारी वृद्धि— प्रथम विश्व युद्ध के कारण रक्षा व्यय में भारी वृद्धि हुई। इस व्यय की भरपाई करने के लिए युद्ध के नाम पर कर्ज लिए गए और करों में वृद्धि की गई। सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया तथा आयकर शुरू किया गया।

(2) कीमतों में तीव्र वृद्धि— युद्ध के दौरान कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं। 1913 से 1918 के बीच कीमतें दो गुना हो गई थीं जिसके कारण आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गई थीं।

(3) जबरन भर्ती— गाँवों में सिपाहियों को जबरन भर्ती किया गया जिसके कारण ग्रामीण इलाकों में व्यापक गुस्सा था।

(4) खाद्य पदार्थों का अभाव— 1918-19 तथा 1920-21 के काल में देश के बहुत सारे हिस्सों में फसल खराब होने के कारण खाद्य पदार्थों का भारी अभाव पैदा हो गया था।

(5) दुर्भिक्ष और महामारी— इस काल में फैली फ्लू की महामारी तथा दुर्भिक्ष के कारण 120-130 लाख लोग मारे गए।

● निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. भारत में राष्ट्रवाद उदय के कारणों पर एक लेख लिखिए। ( माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25 )

उत्तर— भारत में राष्ट्रवाद उदय के कारण

भारत में राष्ट्रवाद उदय के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

(1) उपनिवेश विरोधी आंदोलन— भारत में राष्ट्रवाद उदय की प्रक्रिया उपनिवेश विरोधी आंदोलन से गहरे

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तौर से जुड़ी हुई थी। औपनिवेशिक शासकों के विरुद्ध संघर्ष के दौरान लोग आपसी एकता को पहचानने लगे थे। उत्पीड़न और दमन के साझा भाव ने विभिन्न समूहों को एक-दूसरे से बांध दिया था। उन्होंने महसूस किया कि औपनिवेशिक शासन को समाप्त किए बिना उनके कष्टों का अन्त नहीं होगा। इस विचार ने राष्ट्रवाद की भावना को उपनिवेश विरोधी आंदोलन से जोड़ दिया था।

(2) प्रथम विश्व युद्ध का योगदान- भारत में राष्ट्रवाद की भावना के विकास में प्रथम विश्व युद्ध के योगदान को निम्न प्रकार स्पष्ट किया गया है-

(i) करों में वृद्धि- प्रथम विश्व युद्ध के कारण रक्षा व्यय में अत्यधिक वृद्धि हुई। इस व्यय की पूर्ति के लिए कर्ज लिए गए और करों में वृद्धि की गई। सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया, आयकर नामक एक नया कर भी लगाया। इससे भारतीयों में घोर असंतोष हुआ जिसने राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया।

(ii) मूल्यों में वृद्धि- प्रथम विश्व युद्ध के दौरान कीमतें लगभग दो गुना हो चुकी थीं। बढ़ते हुए मूल्य के कारण जनसाधारण की कठिनाइयाँ बढ़ गई थीं और उन्हें जीवन-निर्वाह करना कठिन हो गया था।

(iii) सैनिकों की जबरन भर्ती- प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय नवयुवकों को सेना में जबरदस्ती भर्ती किया गया। इससे ग्रामीण जनता में आक्रोश व्याप्त हुआ।

(3) प्रथम विश्व युद्ध के बाद जनता की आकांक्षाओं का पूरा न होना- भारतीयों को आशा थी कि प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात उनके कष्टों और कठिनाइयों का अन्त हो जाएगा। परन्तु उनकी आकांक्षाएँ पूरी नहीं हुईं। इस कारण भी भारतीयों में घोर असंतोष व्याप्त हुआ जिसने भारत में राष्ट्रीयता की भावना के विकास में योगदान दिया।

(4) रॉलट एक्ट- रॉलट एक्ट के द्वारा ब्रिटिश सरकार को राजनीतिक गतिविधियों का दमन करने तथा राजनैतिक कैदियों को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में बन्द रखने का अधिकार मिल गया था। अतः भारतीयों ने इस एक्ट का विरोध करने का निश्चय किया। परिणामस्वरूप भारतीयों में राष्ट्रीय जागृति आयी।

(5) अहिंसा और सत्याग्रह का विचार तथा असहयोग आंदोलन- गाँधीजी का विश्वास था कि अहिंसा और सत्याग्रह का विचार सभी भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँध सकता है। भारत आकर गाँधीजी ने सत्याग्रह पर आधारित असहयोग, सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलन चलाए। इन आंदोलनों ने भारतीय जनता में राष्ट्रवाद की भावना को विकसित कर दिया। इन्हीं आंदोलनों के तहत बहिष्कार, असहयोग, स्वदेशी आदि कार्यक्रमों ने राष्ट्रवाद के विकास में योगदान दिया।

प्रश्न [2]. रॉलट एक्ट क्या था? गाँधीजी द्वारा रॉलट एक्ट का विरोध किये जाने का विवरण दीजिए।

अथवा

रॉलट एक्ट क्या था तथा इसका भारतीयों ने विरोध क्यों किया? (प्रश्न बैंक)

अथवा

गाँधीजी ने प्रस्तावित रॉलट एक्ट (1919) के विरुद्ध एक राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह चलाने का निर्णय क्यों लिया? इसका विरोध किस प्रकार किया गया? व्याख्या कीजिए।

उत्तर— रॉलट एक्ट- भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की बढ़ती हुई लोकप्रियता से ब्रिटिश सरकार बड़ी चिन्तित थी। अतः उसने राष्ट्रवादियों के दमन के लिए एक कठोर कानून बनाने का निश्चय किया। मार्च, 1919 में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल ने रॉलट एक्ट पारित किया। इस कानून के द्वारा ब्रिटिश सरकार को राजनीतिक गतिविधियों का दमन करने तथा राजनीतिक बन्दियों को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में बन्द रखने का अधिकार मिल गया था। इससे भारतीयों में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हुआ।

भारतीयों द्वारा रॉलट एक्ट का विरोध करने का कारण- भारतीयों द्वारा रॉलट एक्ट के विरोध करने के कारण थे-(i) इस कानून ने अंग्रेजी सरकार को यह शक्ति दे दी थी कि वह किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाये जेल में डाल दे। (ii) लोगों के लिए किसी वकील, दलील और अपील की अनुमति नहीं थी। (iii) यह कानून भारतीयों को उत्पीड़ित करने के लिए पारित किया गया था। (iv) इस एक्ट द्वारा अंग्रेजी सरकार स्वतंत्रता संग्राम की लहर को दबाना चाहती थी।

गाँधीजी द्वारा रॉलट एक्ट का विरोध- गाँधीजी ने इस अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ अहिंसक ढंग से सत्याग्रह आन्दोलन चलाने का निश्चय किया। उन्होंने सम्पूर्ण देश में 6 अप्रैल, 1919 को हड़ताल करने का आह्वान किया। गाँधीजी के आह्वान पर विभिन्न शहरों में रैली-जुलूसों का आयोजन किया गया। रेलवे वर्कशॉप्स में श्रमिक हड़ताल पर चले गए। दुकानें बंद हो गईं।

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ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति-ब्रिटिश सरकार ने इस जन-आन्दोलन को कुचलने के लिए दमनकारी नीति अपनाई। सरकार ने अमृतसर में स्थानीय राष्ट्रवादी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। गाँधीजी के दिल्ली में प्रवेश करने पर पाबन्दी लगा दी गई। 10 अप्रैल को पुलिस ने अमृतसर में एक शान्तिपूर्ण जुलूस पर गोली चला दी। इसके बाद लोग बैंकों, डाकखानों और रेलवे स्टेशनों पर हमले करने लगे। मार्शल लॉ लागू कर दिया गया और जनरल डायर ने कमान सम्भाल ली और 13 अप्रैल को जनरल डायर द्वारा जलियांवाला बाग हत्याकांड को अंजाम दिया गया।

प्रश्न 3. असहयोग आन्दोलन के दौरान शहरों की गतिविधियों का वर्णन कीजिए।

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2022)

अथवा

शहरों में असहयोग आन्दोलन की प्रगति की विवेचना कीजिए। शहरों में आन्दोलन के धीमे पड़ने के क्या कारण थे?

अथवा

शहरों में असहयोग आन्दोलन किस प्रकार फैला? समझाइए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)

अथवा

असहयोग आन्दोलन में शहरी मध्य वर्ग की भूमिका का वर्णन कीजिए।

उत्तर— शहरों में असहयोग आन्दोलन की प्रगति

अथवा

असहयोग आन्दोलन में शहरी मध्य वर्ग की भूमिका

शहरों में असहयोग आन्दोलन की प्रगति अथवा असहयोग आन्दोलन में शहरी मध्य वर्ग की भूमिका का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है-

(1) विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं वकीलों की भूमिका-असहयोग आन्दोलन के दौरान शहरों में हजारों-हजारों विद्यार्थियों ने स्कूल-कालेज छोड़ दिए। मुख्याध्यापकों और शिक्षकों ने त्याग-पत्र सौंप दिए। वकीलों ने मुकदमे लड़ना बन्द कर दिया और बड़ी संख्या में आन्दोलन में भाग लिया।

(2) परिषद् चुनावों का बहिष्कार-मद्रास के अतिरिक्त अधिकतर प्रान्तों में परिषद् चुनावों का बहिष्कार किया गया। लेकिन मद्रास में गैर-ब्राह्मणों द्वारा गठित जस्टिस पार्टी ने परिषद् चुनावों का बहिष्कार नहीं किया।

(3) आर्थिक मोर्चे पर असहयोग आन्दोलन का प्रभाव-आन्दोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया, शराब की दुकानों पर पिकेटिंग (धरना) की गई और विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। अनेक स्थानों पर व्यापारियों ने विदेशी वस्तुओं का व्यापार करने या विदेशी व्यापार में पैसा लगाने से इनकार कर दिया। फलतः विदेशी कपड़ों का आयात आधा रह गया और भारतीय कपड़ा मिलों तथा हथकरघों का उत्पादन भी बढ़ने लगा।

शहरों में असहयोग आन्दोलन के धीमे पड़ने के कारण-कालान्तर में शहरों में असहयोग आन्दोलन धीमा पड़ने लगा। इसके निम्नलिखित कारण थे-

(1) महंगा कपड़ा-खादी का कपड़ा मिलों में बड़े पैमाने पर बनने वाले कपड़ों के मुकाबले प्रायः महंगा होता था और निर्धन लोग उसे नहीं खरीद सकते थे।

(2) वैकल्पिक भारतीय संस्थानों की स्थापना की धीमी प्रक्रिया-असहयोग आन्दोलन के दौरान ब्रिटिश संस्थानों का बहिष्कार तो किया गया, परन्तु वैकल्पिक भारतीय संस्थानों की स्थापना की प्रक्रिया अत्यन्त धीमी रही। फलतः विद्यार्थी और शिक्षक सरकारी स्कूलों में लौटने लगे तथा वकील पुनः सरकारी न्यायालयों में वकालत करने लगे।

प्रश्न 4. सविनय अवज्ञा आन्दोलन की उपलब्धियों व सीमाओं की विवेचना कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— सविनय अवज्ञा आन्दोलन की उपलब्धि-सविनय अवज्ञा आन्दोलन की उपलब्धि को निम्न बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

(i) सविनय अवज्ञा आन्दोलन में विभिन्न सामाजिक समूहों ने भाग लिया। इस आन्दोलन ने राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(ii) सविनय अवज्ञा आन्दोलन का भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। इस आन्दोलन ने अंग्रेजों को भारत की स्वतंत्रता की मांग को गंभीरता से लेने को मजबूर किया।

(iii) इस आन्दोलन ने अहिंसक प्रतिरोध के नए तरीकों को लोकप्रिय बनाया। आन्दोलन में कई तरह की अहिंसक रणनीतियाँ शामिल थीं, जैसे-बहिष्कार करना, हड़ताल करना और सविनय अवज्ञा।

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 55

(iv) इसने सभी क्षेत्रों के भारतीयों को एकजुट किया। इसने महिलाओं और बच्चों की भागीदारी को भी आकर्षित किया। महिलाओं ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। वे विरोध प्रदर्शन में शामिल हुईं, विदेशी सामान और शराब की दुकानों का बहिष्कार किया।

(v) पूर्वी भारत में व्यापक प्रतिरोध के फलस्वरूप सरकार को नमक कर हटाना पड़ा। इससे ब्रिटिश सत्ता कमजोर हुई। ब्रिटिश राजस्व कम हो गया तथा उनकी प्रतिष्ठा को भी ठेस पहुँची। इस आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता के लिए आधार तैयार किया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाएँ

(i) भारत में कुछ मुस्लिम राजनीतिक संगठन इस आंदोलन के प्रति उदासीन थे। असहयोग-खिलाफत आंदोलन के पतन के बाद, मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस से अलग-थलग महसूस करने लगा।

(ii) इस आंदोलन में मुख्य रूप से शहरी मध्य वर्ग शामिल था, जबकि किसान और अन्य हाशिये पर पड़े समूह इसमें शामिल नहीं थे। आंदोलन में अछूतों की उपेक्षा की गई।

(iii) इस आंदोलन को समाज के विभिन्न वर्गों की आकांक्षाओं में सामंजस्य स्थापित करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

(iv) आंदोलन मुख्य रूप से विशिष्ट शिकायतों और माँगों पर केन्द्रित था, लेकिन ब्रिटिश शासन को बनाये रखने वाली अंतर्निहित संरचनात्मक असमानताओं को संबोधित नहीं करता था। इसने आंदोलन के दीर्घकालिक प्रभाव को सीमित कर दिया।

प्रश्न 5. शहरों से चलकर असहयोग आन्दोलन किस प्रकार देहात में फैल गया?

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)

उत्तर— देहात (ग्रामीण क्षेत्र) में असहयोग आन्दोलन का फैलना

शहरों से चलकर असहयोग आन्दोलन देहात में भी फैल गया, युद्ध के बाद देश के विभिन्न भागों में चले किसानों व आदिवासियों के संघर्ष भी इस आन्दोलन में समा गये। यथा-

(1) किसान-संघर्ष को असहयोग आन्दोलन में शामिल करना-जून, 1920 में जवाहरलाल नेहरू ने अवध के गाँवों का दौरा किया, गाँव वालों से बातचीत की और उनकी व्यथा समझने का प्रयास किया। अक्टूबर तक जवाहरलाल नेहरू, बाबा रामचंद्र तथा कुछ अन्य लोगों के नेतृत्व में अवध किसान सभा का गठन कर लिया गया। महीनेभर में इस पूरे क्षेत्र के गाँवों में संगठन की 300 से ज्यादा शाखाएँ बन चुकी थीं।

अगले वर्ष जब असहयोग आन्दोलन शुरू हुआ तो कांग्रेस ने अवध के किसान-संघर्ष को इस आन्दोलन में शामिल करने का प्रयास किया।

(2) देहातों में असहयोग आन्दोलन का स्वरूप-किसानों के असहयोग आन्दोलन में ऐसे स्वरूप विकसित हुए जिनसे कांग्रेस का नेतृत्व खुश नहीं था। यथा-

(i) 1921 में देहात में जब आन्दोलन फैला तो तालुकदारों और व्यापारियों के मकानों पर हमले होने लगे, बाजारों में लूटपाट होने लगी और अनाज के गोदामों पर कब्जा कर लिया गया।

(ii) बहुत सारे स्थानों पर स्थानीय नेता किसानों को समझा रहे थे कि गाँधीजी ने ऐलान कर दिया है कि अब कोई लगान नहीं भरेगा और जमीन गरीबों में बाँट दी जाएगी। इस तरह, महात्मा गाँधी का नाम लेकर लोग अपनी सारी कार्यवाहियों और आकांक्षाओं को सही ठहरा रहे थे।

(iii) आदिवासी किसानों ने महात्मा गाँधी के संदेश और स्वराज के विचार का कुछ और ही मतलब निकाला। 1920 के दशक की शुरुआत में वहाँ गुरिल्ला आन्दोलन फैला। गुडेम विद्रोहियों ने पुलिस थानों पर हमले किए, ब्रिटिश अधिकारियों को मारने की कोशिश की गई और स्वराज्य प्राप्ति के लिए गुरिल्ला युद्ध चलते रहे।

प्रश्न 6. असहयोग आन्दोलन से पूर्व की घटनाओं की व्याख्या कीजिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)

अथवा

असहयोग आन्दोलन के प्रारम्भ होने के पीछे कौन-कौनसी परिस्थितियाँ जिम्मेदार थीं?

अथवा

असहयोग आन्दोलन के कारणों का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर— असहयोग आन्दोलन से पूर्व की घटनाएँ/असहयोग आन्दोलन के कारण

जनवरी, 1921 में गाँधीजी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन शुरू हुआ। इस आन्दोलन के अग्रलिखित कारण थे-

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( 1 ) करों में वृद्धि-प्रथम विश्व युद्ध के कारण रक्षा-व्यय की पूर्ति के लिए ब्रिटिश सरकार ने करों में वृद्धि की, सीमा-शुल्क भी बढ़ा दिया और आयकर नामक कर शुरू किया गया। इससे भारतीयों में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हुआ।

( 2 ) मूल्यों में वृद्धि-प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मूल्यों में अत्यधिक वृद्धि हुई। जिसके फलस्वरूप जन-साधारण का जीवन-निर्वाह करना बहुत कठिन हो गया था।

( 3 ) गाँवों में सैनिकों की जबरन भर्ती-प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गाँवों में सैनिकों को जबरदस्ती भर्ती किया गया जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों में तीव्र आक्रोश व्याप्त था।

( 4 ) गाँधीजी को निराशा-प्रथम विश्व युद्ध में गाँधीजी ने अंग्रेजों की आर्थिक और सैनिक सहायता इस आशा से की थी कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों को स्वराज प्रदान करेगी। परन्तु युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सरकार की ओर से स्वराज प्रदान किए जाने के बारे में कोई कदम नहीं उठाया गया।

( 5 ) रॉलेट एक्ट-1919 में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट पारित कर दिया। इस अन्यायपूर्ण कानून से भारतीयों में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हुआ।

( 6 ) जलियाँवाला बाग हत्याकांड-अमृतसर में जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने असहयोग आन्दोलन को जनआन्दोलन में बदल दिया।

( 7 ) सरकार की दमनकारी नीति-जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी नीति अपनाई और पंजाब के लोगों पर भीषण अत्याचार किये।

( 8 ) खिलाफत आन्दोलन-गाँधीजी ने खिलाफत आन्दोलन का समर्थन किया। खिलाफत आन्दोलन से असहयोग आन्दोलन को बढ़ावा मिला।

( 9 ) गाँधीजी की असहयोग अवधारणा-अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'हिन्द स्वराज' में महात्मा गाँधी ने यह अवधारणा दी कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था और यह शासन इसी सहयोग के कारण चल पा रहा है। अगर भारत के लोग अपना सहयोग वापस ले लें तो सालभर के भीतर ब्रिटिश शासन ढह जाएगा और स्वराज की स्थापना हो जाएगी। उन्होंने आन्दोलन को क्रमबद्ध तरीके से बढ़ाने का एक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया। दिसम्बर, 1920 में उपर्युक्त सभी कारणों पर विचार करके कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में गाँधीजी के असहयोग कार्यक्रम को स्वीकृति प्रदान कर दी।

प्रश्न 7. सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कारणों का विश्लेषण कीजिए। इस आन्दोलन का क्या महत्त्व था?

अथवा

सविनय अवज्ञा आन्दोलन के क्या कारण थे? इसका महत्त्व बताइए।

अथवा

1930 में महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू करने का निर्णय कैसे किया? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर— सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कारण

1930 में गाँधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हुआ, जिसके निम्नलिखित कारण थे-

( 1 ) विश्वव्यापी आर्थिक मंदी-1930 की विश्व-व्यापी आर्थिक मंदी के कारण भारत की आर्थिक स्थिति अत्यन्त शोचनीय थी। किसानों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में महंगाई, बेरोजगारी तथा गरीबी बहुत बढ़ गई थी।

( 2 ) साइमन कमीशन-1928 में जब साइमन कमीशन भारत पहुँचा तो उसका स्वागत 'साइमन कमीशन वापस जाओ' के नारों से किया गया क्योंकि इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, सारे अंग्रेज थे।

( 3 ) लार्ड इरविन की घोषणा-भारतीयों के विरोध को शान्त करने के लिए वायसराय लार्ड इरविन ने अक्टूबर, 1929 में भारत के लिए 'औपनिवेशिक राज्य' की अस्पष्ट घोषणा की। उन्होंने केवल यह बताया कि भावी संविधान के बारे में चर्चा करने के लिए गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। इस प्रस्ताव से कांग्रेस के नेता सन्तुष्ट नहीं थे।

( 4 ) पूर्ण स्वराज की माँग-31 दिसम्बर, 1929 को कांग्रेस अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' का प्रस्ताव पास किया गया। इस अधिवेशन ने कांग्रेस को उचित अवसर पर सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने का अधिकार दे दिया।

( 5 ) गाँधीजी की माँगों को अस्वीकार करना-31 जनवरी, 1930 को गाँधीजी ने वायसराय लार्ड इरविन को एक पत्र लिखा। इस पत्र में गाँधीजी ने यह चेतावनी दी थी कि यदि 11 मार्च, 1930 तक उनकी माँगें नहीं मानी गईं, तो कांग्रेस सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू कर देगी। जब वायसराय ने गाँधीजी की बातें नहीं मानीं, तो उन्होंने सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू करने का निश्चय कर लिया।

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 57

सविनय अवज्ञा आन्दोलन का महत्त्व-

(1) राष्ट्रीय आन्दोलन को गतिशील एवं व्यापक बनाना- सविनय अवज्ञा आन्दोलन ने राष्ट्रीय आन्दोलन को गतिशील एवं व्यापक बनाया।

(2) महिलाओं में जागृति- इस आन्दोलन के फलस्वरूप महिलाओं में जागृति उत्पन्न हुई।

(3) निडरता, साहस और राष्ट्रीयता का संचार- असहयोग आन्दोलन ने देशवासियों में निर्भीकता, साहस और राष्ट्रीयता की भावनाओं का संचार किया।

(4) ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती- सविनय अवज्ञा आन्दोलन में लोगों ने अन्यायपूर्ण एवं दमनात्मक औपनिवेशिक कानून का उल्लंघन किया।

प्रश्न 8. सविनय अवज्ञा आन्दोलन का सविस्तार वर्णन कीजिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)

अथवा

सविनय अवज्ञा आन्दोलन का विस्तार से वर्णन कीजिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)

अथवा

सविनय अवज्ञा आन्दोलन का वर्णन कीजिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22)

उत्तर— सविनय अवज्ञा आन्दोलन

सविनय अवज्ञा आन्दोलन का वर्णन निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है-

(1) दांडी यात्रा- सविनय अवज्ञा आन्दोलन गाँधीजी की दांडी यात्रा से शुरू हुआ। मार्च, 1930 में गाँधीजी ने अपने 78 विश्वस्त कार्यकर्ताओं के साथ साबरमती आश्रम से दांडी नामक स्थान की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने 240 किलोमीटर की यह यात्रा पैदल चलकर 24 दिन में तय की। 6 अप्रैल को गाँधीजी दांडी पहुँचे और उन्होंने समुद्र का पानी उबाल कर नमक बनाना शुरू कर दिया। इस प्रकार उन्होंने नमक कानून का उल्लंघन किया।

(2) सविनय अवज्ञा आन्दोलन का स्वरूप- सविनय अवज्ञा आन्दोलन में लोगों को न केवल अंग्रेजों का सहयोग करने के लिए बल्कि औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन करने के लिए भी आह्वान किया गया था।

(3) सविनय अवज्ञा आन्दोलन की प्रगति- शीघ्र ही सविनय अवज्ञा आन्दोलन सम्पूर्ण देश में फैल गया। अनेक स्थानों पर लोगों ने नमक कानून तोड़ा और सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किये। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया गया तथा शराब की दुकानों पर धरना दिया गया। किसानों ने लगान और चौकीदारी कर चुकाने से इन्कार कर दिया। गाँवों में नियुक्त सरकारी कर्मचारियों ने त्याग-पत्र दे दिए। जंगलों में रहने वाले लोगों ने वन-कानूनों का उल्लंघन करते हुए आरक्षित वनों में लकड़ी बीनना तथा पशुओं को चराना शुरू कर दिया।

(4) ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति- ब्रिटिश सरकार ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को कुचलने के लिए दमनात्मक नीति अपनाई। अप्रैल 1930 में जब अब्दुल गफ्फार खान को गिरफ्तार किया गया तो गुस्साई भीड़ सशस्त्र बख्तरबंद गाड़ियों और पुलिस की गोलियों का सामना करते हुए सड़कों पर उतर आई। बहुत सारे लोग मारे गए। इससे लोगों में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हुआ। एक माह बाद गाँधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया तथा सरकार ने दमन का रास्ता अपनाते हुए शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर हमले किये, औरतों, बच्चों को मारा-पीटा गया तथा लगभग एक लाख लोग गिरफ्तार किये गए।

(5) गाँधी-इरविन समझौता- 5 मार्च, 1931 को गाँधीजी तथा वायसराय लार्ड इरविन के बीच एक समझौता हो गया जिसे 'गाँधी-इरविन समझौता' कहते हैं। इस समझौते के अनुसार गाँधीजी लन्दन में होने वाले द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए सहमत हो गए। इसके बदले में सरकार ने राजनीतिक बन्दियों को रिहा करना स्वीकार कर लिया।

(6) सविनय अवज्ञा आन्दोलन का पुनः प्रारम्भ- द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की असफलता के बाद गाँधीजी ने 1932 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन पुनः शुरू कर दिया। सरकार ने आन्दोलन को कुचलने का भरसक प्रयास किया। एक वर्ष तक सविनय अवज्ञा आन्दोलन चला। परन्तु धीरे-धीरे आन्दोलन शिथिल पड़ने लगा। अतः 1934 में गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को समाप्त कर दिया।

प्रश्न 9. राष्ट्रवाद का विचार भारतीय लोक कथाओं को पुनर्जीवित करने के आन्दोलन से भी मजबूत हुआ। कथन की व्याख्या कीजिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025, 2023)

अथवा

स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान राष्ट्रवाद को साकार करने में लोककथाओं, गीतों एवं चित्रों आदि के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।

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अथवा

भारत में सामूहिक अपनेपन का भाव किस प्रकार उत्पन्न हुआ? वर्णन कीजिये।

अथवा

भारत में राष्ट्रवाद के प्रसार में सांस्कृतिक कारकों की पहचान कीजिये। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— राष्ट्रवाद की भावना तब पनपती है जब लोग यह महसूस करने लगते हैं कि वे एक राष्ट्र के अंग हैं; जब वे एक-दूसरे को एकता के सूत्र में बाँधने वाली कोई साझा बात ढूँढ लेते हैं। भारत में विभिन्न समुदायों क्षेत्रों या भाषाओं से संबद्ध अलग-अलग समूहों में सामूहिक अपनेपन का भाव विकसित हुआ। सामूहिक अपनेपन की यह भावना आंशिक रूप से संयुक्त संघर्षों के चलते पैदा हुई थी। इनके अलावा बहुत सारी सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ भी थीं जिनके जरिए राष्ट्रवाद लोगों की कल्पना और दिलोदिमाग पर छा गया था।

इसमें लोककथाओं, गीतों एवं चित्रों आदि तत्वों का प्रमुख योगदान था। यथा-

1. भारतमाता की छवि— बीसवीं सदी में राष्ट्रवाद के विकास के साथ भारत की पहचान भी भारत माता की छवि का रूप लेने लगी। इस छवि के निर्माण का आरंभ बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने किया था। 1870 के दशक में उन्होंने मातृभूमि की स्तुति के रूप में 'वन्दे मातरम्' गीत लिखा था। यह गीत बंगाल में स्वदेशी आन्दोलन में खूब गाया गया। स्वदेशी आंदोलन की प्रेरणा से अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत माता की विख्यात छवि को चित्रित किया। इस चित्र में भारत माता एक संन्यासिनी के रूप में शांत, गम्भीर, दैवी और आध्यात्मिक गुणों से युक्त दिखाई देती है। आगे चल कर भारत माता की छवि विविध रूप ग्रहण करती गई। इस मातृ छवि के प्रति श्रद्धा को राष्ट्रवाद में आस्था का प्रतीक माना जाने लगा।

2. लोक कथाएँ एवं गीत— भारतीय लोक कथाओं को पुनर्जीवित करने से भी भारत में सामूहिक अपनेपन का अथवा राष्ट्रीयता का विचार मजबूत हुआ। उन्नीसवीं सदी के अन्त में राष्ट्रवादियों ने भाटों व चारणों द्वारा गाई-सुनाई जाने वाली लोककथाओं को दर्ज करना शुरू किया। वे लोकगीतों और जनश्रुतियों को इकट्ठा करने के लिए गाँव-गाँव घूमने लगे। उनका मानना था कि यही कहानियाँ हमारी उस परम्परागत संस्कृति की सही तस्वीर पेश करती हैं जो बाहरी ताकतों के प्रभाव से भ्रष्ट और दूषित हो चुकी है। अपनी राष्ट्रीय पहचान को ढूँढने और अपने अतीत में गौरव का भाव पैदा करने के लिए इस लोक परम्परा को बचाकर रखना जरूरी था। बंगाल में रबीन्द्रनाथ टैगोर ने लोक-गाथा में गीत, बाल गीत और मिथकों को एकत्रित किया। उन्होंने लोक परम्पराओं को पुनर्जीवित करने वाले आन्दोलन का नेतृत्व किया। मद्रास में नटेसा शास्त्री ने तमिल लोककथाओं का संकलन किया। उनका मानना था कि लोककथाएँ राष्ट्रीय साहित्य होती हैं, यह लोगों के असली विचारों और विशिष्टताओं की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति है।

3. चिन्ह एवं प्रतीक— राष्ट्रीय आंदोलन में चिन्ह एवं प्रतीकों के प्रयोग से भी लोगों में सामूहिक अपनेपन एवं राष्ट्रवाद की भावना उत्पन्न हुई। बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान एवं तिरंगा झंडा (हरा, पीला, लाल) तैयार किया गया। इसमें ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते कमल के आठ फूल और हिंदुओं व मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता एक अर्धचंद्र दर्शाया गया था। 1921 तक गाँधीजी ने भी स्वराज का झंडा तैयार कर लिया था। यह भी तिरंगा (सफेद, हरा और लाल) था। इसके मध्य में गाँधीवादी प्रतीक चरखे को जगह दी गई थी जो स्वावलंबन का प्रतीक था। जुलूसों में यह झंडा थामे चलना शासन के प्रति अवज्ञा का संकेत था।

4. इतिहास एवं साहित्य— इतिहास एवं साहित्य भी भारत में सामूहिक अपनेपन की एवं राष्ट्रवाद की भावना पैदा करने का साधन था। अनेक लोग भारत के उस गौरवमयी प्राचीन युग के बारे में लिखने लगे जब कला और वास्तुकल्प, विज्ञान और गणित, धर्म और संस्कृति, कानून और दर्शन, हस्तकला और व्यापार फल-फूल रहे थे। इस राष्ट्रवादी इतिहास में पाठकों को अतीत में भारत की महानता व उपलब्धियों पर गर्व करने और ब्रिटिश शासन के तहत दुर्दशा से मुक्ति के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया जाता था।

इस प्रकार उक्त अनेक तरीकों से लोगों में सामूहिक अपनेपन की भावना एवं राष्ट्रवाद की भावना उत्पन्न हुई।

प्रश्न 10. भारत छोड़ो आंदोलन का विस्तार से वर्णन कीजिये। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024; प्रश्न बैंक)

अथवा

भारत छोड़ो आन्दोलन के बारे में आप क्या जानते हैं? बतलाइये।

उत्तर— भारत छोड़ो आन्दोलन

भारत में क्रिप्स मिशन की असफलता एवं द्वितीय विश्व युद्ध के प्रभावों से व्यापक असंतोष फैला। इसके फलस्वरूप गाँधीजी ने एक आंदोलन शुरू किया, जिसमें उन्होंने अंग्रेजों को पूरी तरह से भारत छोड़ने पर जोर दिया। इस भारत छोड़ो आन्दोलन की प्रमुख बातें अग्र प्रकार हैं-

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 59

1. वर्धा में 14 जुलाई, 1942 को अपनी कार्यकारिणी में कांग्रेस कार्य समिति ने ऐतिहासिक 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित किया, जिसमें सत्ता का भारतीयों को तत्काल हस्तांतरण एवं भारत छोड़ने की माँग की गई।

2. 8 अगस्त, 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जिससे पूरे देश में व्यापक पैमाने पर एक अहिंसक जन संघर्ष का आह्वान किया गया।

3. इसी अवसर पर गाँधीजी ने प्रसिद्ध 'करो या मरो' भाषण दिया था।

4. 'भारत छोड़ो' के इस आह्वान ने देश के अधिकतर हिस्सों में राज्य व्यवस्था को ठप्प कर दिया, लोग स्वतः ही आन्दोलन में कूद पड़े।

5. लोगों ने हड़तालें कीं और राष्ट्रीय गीतों एवं नारों के साथ प्रदर्शन किए एवं जुलूस निकाले। यह आन्दोलन वास्तव में एक जन आन्दोलन था जिसमें छात्र, मजदूर और किसान जैसे हजारों साधारण लोगों ने हिस्सा लिया।

6. इसमें नेताओं की सक्रिय भागीदारी भी देखी गई जिनमें जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ अली एवं राम मनोहर लोहिया और बहुत सारी महिलाएँ जैसे-बंगाल से मातांगिनी हाजरा, असम से कनकलता, बरुआ और उड़ीसा से रमा देवी थीं।

7. आन्दोलनों को कुचलने हेतु अंग्रेजों द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग किया गया। इसके बावजूद इसे दबाने में एक वर्ष से अधिक समय लग गया।

प्रश्न 11. गाँधीजी द्वारा चलाए गये किन्हीं दो आन्दोलनों का विस्तार से वर्णन कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— गाँधीजी द्वारा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विभिन्न आन्दोलन चलाये गये, जिनमें से दो प्रमुख निम्नलिखित हैं-

1. असहयोग आन्दोलन— असहयोग आन्दोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। यह आन्दोलन 1920 में शुरू हुआ था और इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग करने से इनकार करना था। इस आन्दोलन के मुख्य कारण थे-जलियाँवाला बाग हत्याकांड, रॉलेट एक्ट और ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध जताना।

इस आन्दोलन के दौरान महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह का आयोजन किया, जिसमें सभी भारतीयों ने अहिंसक ढंग से ब्रिटिश सरकार का विरोध किया। भारतीयों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया, जिससे सरकार को आर्थिक नुकसान हुआ। छात्रों एवं शिक्षकों ने स्कूलों और कालेजों का बहिष्कार किया, जो कि ब्रिटिश सरकार के थे। वकीलों ने न्यायालयों का बहिष्कार किया, जिससे सरकार को कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इस प्रकार, ब्रिटिश सरकार पर दबाव डाला गया, जिसने भारतीयों की माँगों पर विचार किया।

2. सविनय अवज्ञा आन्दोलन— इस आन्दोलन की शुरुआत 1930 में महात्मा गाँधी द्वारा की गई। इस आन्दोलन के मुख्य कारणों में से एक था-ब्रिटिश सरकार द्वारा नमक कानून का उल्लंघन करने पर गाँधीजी की गिरफ्तारी और कांग्रेस को अवैध संस्था घोषित करना।

आन्दोलन के दौरान, गाँधीजी और उनके अनुयायियों ने नमक कानून तोड़ा, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और सरकारी करों का भुगतान करने से इनकार कर दिया। हालांकि, यह आन्दोलन पूरी तरह से सफल नहीं हो सका लेकिन इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया और महात्मा गाँधी को प्रमुख नेता बना दिया। आन्दोलन के परिणामस्वरूप, ब्रिटिश सरकार ने गाँधी-इरविन समझौता किया जिसके अंतर्गत कांग्रेस को वैध संस्था के रूप में मान्यता दी गई और गाँधीजी को दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने हेतु आमंत्रित किया गया।

प्रश्न 12. सत्याग्रह और अहिंसा पर गाँधीजी के विचार स्पष्ट कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह और अहिंसा को अपने जीवन और कार्य का आधार बनाया। महात्मा गाँधी के अनुसार, सत्याग्रह और अहिंसा एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने कहा, "अहिंसा सबसे शक्तिशाली हथियार है, जिसका उपयोग अन्याय और उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने के लिए किया जा सकता है।"

सत्याग्रह और अहिंसा पर गाँधीजी के विचार निम्नलिखित हैं-

(i) गाँधीजी के अनुसार, अहिंसा केवल एक नैतिक सिद्धांत नहीं है बल्कि यह एक प्रभावी राजनीतिक उपकरण भी है।

(ii) उन्होंने सत्याग्रह को एक ऐसा आन्दोलन बताया जिसमें लोग अपने मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अहिंसा, सत्य और आपसी समझ के साथ सड़क पर उतरते हैं।

(iii) गाँधीजी का मानना था कि अहिंसा सत्य के लिए होती है और प्रेम से भरपूर होती है।

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(iv) उन्होंने कहा था कि अहिंसा के माध्यम से दुनिया में बड़े से बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

(v) गाँधीजी का मानना था कि अहिंसा का धर्म सभी भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँध सकता है।

(vi) गाँधीजी के अनुसार, अगर आपका उद्देश्य सही है और आप अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं, तो आपको अपने उत्पीड़क का सामना करने के लिए किसी तरह की शारीरिक ताकत की जरूरत नहीं है।

(vii) गाँधीजी का मानना था कि राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने का एकमात्र कानूनी साधन सत्याग्रह है।

(viii) गाँधीजी ने सत्याग्रह के तीन स्वरूपों का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रयोग किया था-असहयोग, सविनय अवज्ञा और बहिष्कार।

प्रश्न 13. भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में महात्मा गाँधी के योगदान का वर्णन कीजिए।

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22)

उत्तर— भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में महात्मा गाँधी का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ अनेक आन्दोलन चलाए।

(1) ब्रिटिश सरकार ने 1919 में रॉलेट एक्ट पारित किया, जिसके अनुसार सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने तथा राजनीतिक बन्दियों को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में बन्द करने का अधिकार मिल गया था। गाँधीजी ने इसके विरुद्ध राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह आन्दोलन चलाने का फैसला लिया।

(2) 1921 में गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन चलाया। इस आन्दोलन के दौरान विदेशी माल का बहिष्कार किया गया, शराब की दुकानों पर धरना दिया गया तथा विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई। हजारों विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए तथा शिक्षकों ने त्याग-पत्र सौंप दिये। मद्रास के अतिरिक्त अधिकतर प्रान्तों में परिषद चुनावों का बहिष्कार किया गया।

(3) 12 मार्च, 1930 को गाँधीजी ने अपने 78 कार्यकर्त्ताओं के साथ नमक यात्रा शुरू कर दी। यह यात्रा साबरमती में गाँधीजी के आश्रम से 240 किलोमीटर दूर दांडी नामक स्थान पर जाकर समाप्त होनी थी। 6 अप्रैल को गाँधीजी दांडी पहुँचे और वहाँ नमक बनाकर सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू किया। हजारों लोगों ने नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा। अनेक स्थानों पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई और शराब की दुकानों पर धरना दिया गया।

(4) क्रिप्स मिशन की असफलता एवं द्वितीय विश्व युद्ध के प्रभावों ने भारत में व्यापक असंतोष को जन्म दिया। इसके फलस्वरूप गाँधीजी ने एक आन्दोलन शुरू किया, जिसमें उन्होंने अंग्रेजों के पूरी तरह से भारत छोड़ने पर जोर दिया। 8 अगस्त, 1942 को पूरे देश में व्यापक पैमाने पर एक अहिंसक जन संघर्ष का आह्वान किया गया। इसी अवसर पर गाँधीजी ने प्रसिद्ध 'करो या मरो' का नारा दिया था। 'भारत छोड़ो' के इस आह्वान ने देश के अधिकतर हिस्सों में राज्य व्यवस्था को ठप्प कर दिया, लोग स्वतः ही आन्दोलन में कूद पड़े। लोगों ने हड़तालें कीं और राष्ट्रीय गीतों एवं नारों के साथ प्रदर्शन किए एवं जुलूस निकाले। यह आन्दोलन वास्तव में एक जन आन्दोलन था जिसमें छात्र, मजदूर और किसान जैसे हजारों साधारण लोगों ने हिस्सा लिया।

प्रश्न 14. इतिहास की पुनर्व्याख्या ने किस प्रकार राष्ट्रवाद की भावना पैदा की? इसकी क्या समस्या थी?

उत्तर—इतिहास की पुनर्व्याख्या और राष्ट्रवाद- भारत में इतिहास की पुनर्व्याख्या भी राष्ट्रवाद की भावना पैदा करने का एक महत्त्वपूर्ण साधन थी। उन्नीसवीं सदी के अंत तक आते-आते बहुत सारे भारतीय यह महसूस करने लगे थे कि राष्ट्र के प्रति गर्व का भाव जगाने के लिए भारतीय इतिहास को अलग ढंग से पढ़ाया जाना चाहिए। अंग्रेजों की नजर में भारतीय पिछड़े हुए और आदिम लोग थे जो अपना शासन खुद नहीं सँभाल सकते। इसके जवाब में भारत के लोगों ने अपनी महान उपलब्धियों की खोज में इतिहास की पुनर्व्याख्या करना प्रारम्भ किया। उन्होंने उस गौरवमयी प्राचीन युग के बारे में लिखना शुरू कर दिया जब कला और वास्तुकला, विज्ञान और गणित, धर्म और संस्कृति, कानून और दर्शन, हस्तकला और व्यापार फल-फूल रहे थे। उनका कहना था कि इस महान युग के बाद पतन का समय आया और भारत को गुलाम बना लिया गया। इस राष्ट्रवादी इतिहास में पाठकों को अतीत में भारत की महानता व उपलब्धियों पर गर्व करने और ब्रिटिश शासन के तहत दुर्दशा से मुक्ति के लिए संघर्ष का मार्ग अपनाने का आह्वान किया जाता था।

इतिहास की पुनर्व्याख्या की भी अपनी समस्या थी। इसमें जिस अतीत का गौरवगान किया जा रहा था वह हिंदुओं का अतीत था। जिन छवियों का सहारा लिया जा रहा था वे हिन्दू प्रतीक थे। इससे अन्य समुदायों के लोग अलग-थलग महसूस करने लगे थे।

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 61