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सामाजिक विज्ञान (Social Science)हिंदी माध्यम2026-27

RBSE Class 10 SST Chapter 4 Solutions in Hindi — [इतिहास] औद्योगिकीकरण का युग | पासबुक हल, नोट्स

📅 अंतिम अपडेट: 2026-09-10📖 RBSE/NCERT Solutions
भाग 1 — समाधान (इतिहास पाठ 4)

📖 1. समाधान: पाठगत एवं पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नोत्तर

राजस्थान बोर्ड कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान (इतिहास) — सभी पाठगत प्रश्नों एवं पाठ्यपुस्तक अभ्यास के संपूर्ण सटीक उत्तर।

पाठगत प्रश्न

गतिविधि-पृष्ठ 80

प्रश्न - दो ऐसे उदाहरण दीजिए, जहाँ आधुनिक विकास से प्रगति की बजाय समस्याएँ पैदा हुई हैं। आप चाहें, तो पर्यावरण, आणविक हथियारों व बीमारियों से सम्बन्धित क्षेत्रों पर विचार कर सकते हैं।

उत्तर - (1) पर्यावरण प्रदूषण - आधुनिक विकास ने प्रदूषण को बढ़ावा दिया। शहरों में कारखानों से निकलने वाले धुएँ से वायु-प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हुई। शहरों में कोलाहल बढ़ गया जिसने ध्वनि-प्रदूषण को जन्म दिया। कारखानों की स्थापना से जल-प्रदूषण की समस्या भी उत्पन्न हुई।

(2) बीमारियाँ बढ़ना - आधुनिक विकास के कारण नगरों में मजदूरों को गन्दे मकानों में पशुओं की भाँति जीवन व्यतीत करना पड़ता है। उन्हें गन्दे कारखानों में काम करना पड़ता है। कारखानों में शुद्ध वायु तथा प्रकाश का अभाव होता है। गन्दी बस्तियों में रहने तथा शुद्ध पेयजल की व्यवस्था न होने से मजदूर कई प्रकार की बीमारियों के शिकार बन जाते हैं।

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गतिविधि-पृष्ठ 85

प्रश्न- कल्पना कीजिए कि आप सौदागर हैं और एक ऐसे सेल्समेन को चिट्ठी लिख रहे हैं जो आपको नई मशीन खरीदने के लिए राजी करने की कोशिश कर रहा है। अपने पत्र में बताइए कि मशीन के बारे में आपने क्या सुना है और आप नई प्रौद्योगिकी में पैसा क्यों नहीं लगाना चाहते?

उत्तर— प्रिय सेल्समैन,

मैंने सुना है कि मशीनों की कार्यप्रणाली काफी जटिल है। मशीनें प्रायः खराब हो जाती हैं और उनकी मरम्मत पर काफी खर्च आता है। वे उतनी अच्छी भी नहीं हैं जितना उनके आविष्कारकों और निर्माताओं का दावा था। इसके अतिरिक्त अनेक उत्पाद केवल हाथ से ही तैयार किए जा सकते हैं। मशीनों से एक जैसे तय किस्म के उत्पाद ही बड़ी संख्या में बनाए जा सकते हैं। परन्तु बाजार में प्रायः बारीक डिजाइन और विशेष आकारों वाली वस्तुओं की काफी माँग रहती है।

अतः मैं इस नयी प्रौद्योगिकी में पैसा लगाना नहीं चाहता हूँ।

भवदीय

सौदागर

चर्चा करें-पृष्ठ 87

प्रश्न- चित्र 3, 7 और 11 (पाठ्यपुस्तक में) को देखिए। इसके बाद स्रोत-ख को दोबारा पढ़िए। अब बताइए कि बहुत सारे मजदूर स्पिनिंग जेनी के इस्तेमाल का विरोध क्यों कर रहे थे?

उत्तर— पाठ्यपुस्तक के चित्र 3, 7 और 11 को देखने तथा स्रोत-ख को पढ़ने से पता चलता है कि जब कताई हाथ से की जाती थी तो उसमें बहुत अधिक लोगों को रोजगार प्राप्त होता था। क्योंकि स्पिनिंग जेनी के इस्तेमाल से पहले एक पहिये की मशीन केवल एक ही तकली को घुमा सकती थी। उस समय परिवार के सभी लोग इस कार्य में लगे रहते थे और कमाते थे। लेकिन जब स्पिनिंग जेनी का इस्तेमाल किया जाने लगा तो मजदूरों की माँग कम हो गई और उनके रोजगार छिन गये। क्योंकि इस मशीन के एक पहिये से एक समय में अनेक तकलियाँ घुमाई जा सकती थीं। अतः बेरोजगारी की आशंका से मजदूर स्पिनिंग जेनी के इस्तेमाल का विरोध कर रहे थे।

--- पाठ्यपुस्तक के प्रश्न ---

संक्षेप में लिखें-

प्रश्न 1. निम्नलिखित की व्याख्या करें-

(क) ब्रिटेन की महिला कामगारों ने स्पिनिंग जेनी मशीनों पर हमले किए।

(ख) सत्रहवीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों में किसानों और कारीगरों से काम करवाने लगे।

(ग) सूरत बन्दरगाह अठारहवीं सदी के अन्त तक हाशिये पर पहुँच गया था।

(घ) ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत में बुनकरों पर निगरानी रखने के लिए गुमाश्तों को नियुक्त किया था।

उत्तर—

(क) ब्रिटेन की महिला कामगारों द्वारा स्पिनिंग जेनी मशीनों पर हमला करना- 1764 ई. में जेम्स हरग्रीव्ज ने स्पिनिंग जेनी नामक एक मशीन का आविष्कार किया था। इस मशीन ने कताई की प्रक्रिया तेज कर दी और मजदूरों की माँग घटा दी। इस मशीन द्वारा एक मजदूर एक पहिये की सहायता से बहुत सारी तकलियों को एक साथ घुमा देता था। इससे एक साथ कई धागे बनने लगते थे। जब ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी मशीन का प्रयोग शुरू किया गया तो ब्रिटेन में हाथ से ऊन कातने वाली महिलाओं को बेरोजगार होने की चिन्ता सताने लगी। अतः इन महिला कामगारों ने स्पिनिंग जेनी मशीनों पर हमला करना शुरू कर दिया। स्पिनिंग जेनी के प्रचलन पर यह टकराव दीर्घ काल तक चलता रहा।

(ख) सत्रहवीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों के सौदागरों द्वारा गाँवों में किसानों और कारीगरों से काम करवाना- सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों में पहुँचने लगे। वे गाँवों के किसानों और कारीगरों को पैसा देते थे तथा उनसे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार के लिए उत्पादन करवाते थे। उस समय विश्व व्यापार के विस्तार तथा विश्व के विभिन्न भागों में उपनिवेशों की स्थापना के कारण वस्तुओं की माँग बढ़ने लगी थी। इस माँग की पूर्ति के लिए केवल शहरों में रहते हुए उत्पादन बढ़ाना सम्भव नहीं था। इसका कारण यह था कि शहरों में शहरी दस्तकार तथा व्यापारिक गिल्ड्स बहुत शक्तिशाली थे। वे व्यवसाय में नए लोगों को आने से रोकते थे। शासकों ने भी

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 91

विभिन्न गिल्ड्स को खास उत्पादों के उत्पादन और व्यापार का एकाधिकार दिया हुआ था। परिणामस्वरूप नये व्यापारी शहरों में व्यवसाय नहीं कर सकते थे। अतः यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों की ओर जाने लगे और वहाँ किसानों तथा कारीगरों से काम करवाने लगे।

(ग) सूरत बन्दरगाह का अठारहवीं सदी के अन्त तक हाशिये पर पहुँचना-सूरत बन्दरगाह गुजरात के तट पर स्थित था। इस बन्दरगाह के द्वारा भारत खाड़ी तथा लाल सागर के बन्दरगाहों से जुड़ा हुआ था। यह निर्यात व्यापार भारतीय सौदागरों के नियन्त्रण में था। 1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों के नियन्त्रण वाला यह नेटवर्क टूटने लगा था और भारत में यूरोपीय कम्पनियों की शक्ति बढ़ती जा रही थी। पहले उन्होंने स्थानीय दरबारों से कई तरह की रियायतें हासिल कीं और उसके बाद उन्होंने व्यापार पर इजोरदारी अधिकार प्राप्त कर लिए। परिणामस्वरूप सूरत बन्दरगाह महत्त्वहीन हो गया। इससे होने वाले निर्यात में अत्यधिक कमी आ गई। पहले जिस कर्ज से व्यापार चलता था, वह समाप्त होने लगा। धीरे-धीरे स्थानीय बैंकर दिवालिया हो गए। सत्रहवीं सदी के अन्तिम वर्षों में सूरत बन्दरगाह से होने वाले व्यापार का कुल मूल्य 1.6 करोड़ रुपये था। परन्तु 1740 के दशक तक यह मूल्य गिरकर केवल 30 लाख रुपये रह गया। इस प्रकार सूरत बन्दरगाह अठारहवीं सदी के अन्त तक हाशिये पर पहुँच गया था अर्थात् पतनोनुख हो गया था।

(घ) ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारत में बुनकरों पर निगरानी रखने के लिए गुमाश्तों को नियुक्त करना-1760 और 1770 के दशकों में बंगाल और कर्नाटक में राजनीतिक सत्ता स्थापित होने से पहले भारत के बुनकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ-साथ फ्रांसीसी, डच और पुर्तगाली कम्पनियों के लिए भी कपड़ा बुनते थे। बुनकर और आपूर्ति सौदागर खूब मोल-भाव करते थे और अपना माल सबसे ऊँची बोली लगाने वाले खरीदार को ही बेचते थे। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भारत में राजनीतिक सत्ता स्थापित हो जाने के बाद यह कपड़ा उत्पादन संघ के व्यापार पर अपना एकाधिकार करना चाहती थी। फलस्वरूप कम्पनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त कर दिए। ये कर्मचारी 'गुमाश्ता' कहलाते थे, जो बुनकरों के साथ कठोर तथा अपमानजनक व्यवहार करते थे।

प्रश्न 2. प्रत्येक वक्तव्य के आगे 'सही' या 'गलत' लिखें।

(क) उन्नीसवीं सदी के आखिर में यूरोप की कुल श्रम-शक्ति का 80 प्रतिशत तकनीकी रूप से विकसित औद्योगिक क्षेत्र में काम कर रहा था।

(ख) अठारहवीं सदी तक महीन कपड़े के अन्तर्राष्ट्रीय बाजार पर भारत का दबदबा था।

(ग) अमेरिकी गृहयुद्ध के फलस्वरूप भारत के कपास निर्यात में कमी आई।

(घ) फ्लाई शटल के आने से हथकरघा कामगारों की उत्पादकता में सुधार हुआ।

उत्तर— (क) गलत, (ख) सही, (ग) गलत, (घ) सही।

प्रश्न 3. पूर्व-औद्योगीकरण का मतलब बताएँ।

उत्तर— पूर्व अथवा आदि-औद्योगीकरण-इंग्लैंड तथा यूरोप में फैक्ट्रियों की स्थापना से पहले ही अन्तर्राष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होने लगा था। यह उत्पादन फैक्ट्रियों में नहीं होता था। अनेक इतिहासकारों ने औद्योगीकरण के इस चरण को 'पूर्व-औद्योगीकरण' की संज्ञा दी है। पूर्व-औद्योगीकरण के काल में औद्योगिक बाजार के लिए उत्पाद कारखानों के स्थान पर घरों में हाथों से बनाए जाते थे।

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चर्चा करें-

प्रश्न 1. उन्नीसवीं सदी के यूरोप में कुछ उद्योगपति मशीनों की बजाय हाथ से काम करने वाले श्रमिकों को प्राथमिकता क्यों देते थे?

उत्तर— उन्नीसवीं सदी के यूरोप में कुछ उद्योगपति मशीनों के बजाय हाथ से काम करने वाले श्रमिकों को प्राथमिकता देते थे। इसके लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे-

(1) यूरोप में मानव श्रम की कमी न होना-उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप में मानव श्रम की कोई कमी नहीं थी। निर्धन किसान और बेरोजगार लोग रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में शहरों को जाते थे। श्रमिकों की अधिकता के कारण उन्हें बहुत कम वेतन दिया जाता था। इसलिए उद्योगपतियों को श्रमिकों की कमी या वेतन के मद में भारी लागत जैसी कोई कठिनाई नहीं थी। उन्हें ऐसी मशीनों में कोई दिलचस्पी नहीं थी जिनके कारण मजदूरों से छुटकारा मिल जाए और जिन पर बहुत ज्यादा खर्चा आने वाला हो।

(2) मौसमी आधार पर श्रमिकों की माँग का घटना-बढ़ना-अनेक उद्योगों में श्रमिकों की माँग मौसमी आधार

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पर घटती-बढ़ती रहती थी। गैस घरों तथा शराबखानों, बुक बाइंडरों, प्रिन्टरों, बंदरगाहों आदि में सर्दियों में काम की अधिकता रहती थी। सर्दियों में उन्हें अधिक मजदूरों की आवश्यकता होती थी। जिन उद्योगों में मौसम के साथ उत्पादन घटता-बढ़ता रहता था, वहाँ उद्योगपति मशीनों की बजाय मजदूरों को ही काम पर रखना लाभदायक समझते थे।

(3) बहुत से उत्पादों का केवल हाथ के द्वारा ही तैयार किया जाना- बहुत सारे उत्पाद ऐसे थे जो केवल हाथ से ही तैयार किए जा सकते थे। मशीनों से एक जैसे तय किस्म के उत्पाद ही बड़ी संख्या में बनाए जा सकते थे। परन्तु बाजार में प्राय: बारीक डिजाइन और विशेष आकारों वाली वस्तुओं की काफी माँग थी। इन्हें बनाने के लिए यान्त्रिक प्रौद्योगिकी की नहीं, बल्कि मानवीय निपुणता की आवश्यकता थी।

(4) हाथ से बनी वस्तुओं को अधिक पसन्द करना- विक्टोरियाकालीन ब्रिटेन में उच्च वर्ग के लोग अर्थात् कुलीन और पूँजीपति हाथों से बनी वस्तुओं को अधिक पसन्द करते थे। हाथ से बनी चीजों को परिष्कार तथा सुरुचि का प्रतीक माना जाता था। उनकी फिनिश अच्छी होती थी। उन्हें एक-एक करके बनाया जाता था तथा उनका डिजाइन अच्छा होता था।

प्रश्न 2. ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीय बुनकरों से सूती और रेशमी कपड़े की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए क्या किया?

उत्तर— ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारतीय बुनकरों से कपड़े की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करवाने हेतु प्रबन्धन और नियन्त्रण की एक नयी व्यवस्था लागू कर दी। यह काम कई चरणों में किया गया। यथा-

(1) गुमाश्तों की नियुक्ति- ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कपड़ा व्यापार में सक्रिय व्यापारियों और दलालों को खत्म करने, बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त कर दिए, जिन्हें 'गुमाश्ता' कहा जाता था।

(2) बुनकरों पर पाबन्दियाँ- कम्पनी को माल बेचने वाले बुनकरों को अन्य खरीददारों के साथ कारोबार करने पर पाबन्दी लगा दी गई। इसके लिए उन्हें पेशगी रकम दी जाती थी। काम का आर्डर मिलने पर बुनकरों को कच्चा माल खरीदने के लिए ऋण दे दिया जाता था। ऋण लेने वाले बुनकरों को अपना बनाया हुआ कपड़ा गुमाश्ता को ही देना पड़ता था। वे उसे किसी अन्य व्यापारी को नहीं बेच सकते थे।

(3) बुनकरों का शोषण- गुमाश्ते बुनकरों के साथ कठोर एवं अपमानजनक व्यवहार करते थे। बुनकरों का शोषण करना उनका प्रमुख उद्देश्य था। गुमाश्ते सिपाहियों व चपरासियों को लेकर आते थे तथा माल समय पर तैयार न होने की स्थिति में बुनकरों को सजा देते थे। सजा के तौर पर उन्हें प्राय: पीटा जाता था तथा उन पर कोड़े बरसाए जाते थे। बुनकरों की दशा बड़ी दयनीय हो गई। अब वे न तो दाम पर मोल-भाव कर सकते थे और न ही किसी और को माल बेच सकते थे। उन्हें कम्पनी से जो कीमत मिलती थी, वह बहुत कम थी। परन्तु वे ऋण के कारण कम्पनी के लिए काम करने के लिए बाध्य थे।

प्रश्न 3. कल्पना कीजिए कि आपको ब्रिटेन तथा कपास के इतिहास के बारे में विश्वकोश (Encyclopaedia) के लिए लेख लिखने को कहा गया है। इस अध्याय में दी गई जानकारियों के आधार पर अपना लेख लिखिए।

उत्तर— ब्रिटेन तथा कपास का इतिहास

(1) ब्रिटेन में औद्योगिक क्रान्ति का सूत्रपात- ब्रिटेन में ही सर्वप्रथम औद्योगिक क्रान्ति का सूत्रपात हुआ। वहाँ सर्वप्रथम 1730 के दशक में कारखाने खुले। कपास नए युग का प्रथम प्रतीक थी। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में कपास के उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई। 1760 में ब्रिटेन अपने कपास उद्योग की आवश्यकता को पूरा करने के लिए 25 लाख पौंड कच्चे कपास का आयात करता था। 1787 में यह आयात बढ़कर 220 लाख पौंड तक पहुँच गया।

(2) कपास के उत्पादन में वृद्धि- अठारहवीं शताब्दी में कई ऐसे आविष्कार हुए जिन्होंने उत्पादन प्रक्रिया, जैसे-कार्डिंग, ऐंठना, कताई, लपेटने आदि के प्रत्येक चरण की कुशलता बढ़ा दी। प्रति मजदूर उत्पादन बढ़ गया और पहले से सुदृढ़ धागों व रेशों का उत्पादन होने लगा। रिचर्ड आर्कराइट ने सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा प्रस्तुत की। अब लोग महँगी नयी मशीन खरीद कर कारखाने में लगा सकते थे। कारखाने में सारी प्रक्रियाएँ एक छत के नीचे और एक मालिक के हाथों में आ गई थीं। इसके चलते उत्पादन प्रक्रिया पर निगरानी, गुणवत्ता का ध्यान रखना और मजदूरों पर नजर रखना सम्भव हो गया था। जब तक उत्पादन गाँवों में हो रहा था, तब तक ये सारे काम सम्भव नहीं थे।

(3) कपास उद्योग का विकास- सूती वस्त्र उद्योग तथा कपास उद्योग ब्रिटेन के सबसे अधिक विकसित उद्योग थे। तीव्र गति से उन्नति करता हुआ कपास उद्योग 1840 के दशक तक औद्योगीकरण के पहले चरण में सबसे

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बड़ा उद्योग बन चुका था। लंकाशायर में एक कॉटन मिल की स्थापना हुई तथा 1764 में जेम्स हरग्रीव्ज ने कताई की प्रक्रिया को तेज करने वाली एक मशीन 'स्पिनिंग जैनी' बनाई।

प्रश्न 4. पहले विश्व युद्ध के समय भारत का औद्योगिक उत्पादन क्यों बढ़ा?

उत्तर— प्रथम विश्व युद्ध के समय भारत के औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं-

(1) भारत में मैनचेस्टर के माल का आयात कम होना- प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन के कारखाने सेना की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए युद्ध सामग्री का उत्पादन कर रहे थे। इसलिए भारत में मैनचेस्टर के माल का आयात कम हो गया। परिणामस्वरूप भारतीय बाजारों को अकस्मात एक विशाल देशी बाजार उपलब्ध हो गया।

(2) भारतीय कारखानों द्वारा सैनिकों के लिए सामान का उत्पादन करना- प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय कारखानों में भी सेना के लिए जूट की बोरियों तथा सैनिकों के लिए वर्दी के कपड़े, टेंट, चमड़े के जूते, घोड़े व खच्चरों की जीन तथा अन्य बहुत-सी वस्तुओं का उत्पादन होने लगा। इसके लिए भारत में नए कारखाने स्थापित किये गये। पुराने कारखाने कई पारियों में चलने लगे। मजदूरों को बड़ी संख्या में कारखानों में भर्ती किया गया। इस प्रकार युद्ध के दौरान औद्योगिक उत्पादन तेजी से बढ़ा।

(3) युद्ध से ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का चरमरा जाना- युद्ध के बाद भारतीय बाजार में मैनचेस्टर की पहले वाली हैसियत हासिल न हो पायी। आधुनिकीकरण न कर पाने और अमेरिका, जर्मनी व जापान के मुकाबले कमजोर पड़ जाने के कारण ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी। कपास का उत्पादन कम रह गया था और ब्रिटेन से होने वाले सूती कपड़े के निर्यात में जबरदस्त गिरावट आई। भारत जैसे उपनिवेशों में विदेशी उत्पादों को हटाकर स्थानीय उद्योगपतियों ने घरेलू बाजारों पर कब्जा कर लिया और धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत बना ली।

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भाग 2 — रिवीजन नोट्स (Notes & Summary)

📝 2. नोट्स: पाठ-सार, मुख्य बिंदु एवं शब्दावली

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं, भौगोलिक परिभाषाएं, राजनीतिक सिद्धांत एवं संपूर्ण अध्याय का सारगर्भित सारांश।

[पाठ-सार]

कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान पाठ 4 औद्योगिकीकरण का युग चित्र 1

1. औद्योगिक क्रान्ति से पहले-औद्योगीकरण को प्रायः कारखानों के विकास के साथ ही जोड़कर देखा जाता है। परन्तु इंग्लैण्ड और यूरोप में फैक्ट्रियों की स्थापना से पहले भी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होने लगा था। अनेक इतिहासकार औद्योगीकरण के इस चरण को 'आदि-औद्योगीकरण' की संज्ञा देते हैं। 17वीं और 18वीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों की तरफ रुख करने लगे थे। वे किसानों और कारीगरों को पैसा देते थे और उनसे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार के लिए उत्पादन करवाते थे। इस प्रकार आदि-औद्योगीकरण व्यवस्था व्यावसायिक आदान-प्रदान के नेटवर्क का हिस्सा थी। इस पर सौदागरों का नियन्त्रण था और चीजों का उत्पादन कारखानों के बजाय घरों में मजदूरों द्वारा किया जाता था।

1.1 कारखानों का उदय-इंग्लैण्ड में सबसे पहले 1730 के दशक में कारखाने खुले। कपास (कॉटन) नये युग का पहला प्रतीक था। कारखानों की संख्या में तेजी से वृद्धि 18वीं सदी के अन्त में ही हुई। 18वीं सदी में कई आविष्कार हुए, जैसे-कार्डिंग, ऐंठना, कताई व लपेटना। इन्होंने उत्पादन प्रक्रिया की कुशलता बढ़ा दी।

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1.2 औद्योगिक परिवर्तन की गति-1840 के दशक तक सूती वस्त्र उद्योग और कपास उद्योग ब्रिटेन के सबसे फलते-फूलते उद्योग थे। इसके बाद लोहा और स्टील उद्योग आगे निकल गए। परम्परागत उद्योग अभी हाशिये पर नहीं आए थे क्योंकि-(i) कपड़ा उद्योग के उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा घरेलू इकाइयों में होता था। (ii) परम्परागत उद्योगों की गति भाप के उद्योगों से तय नहीं हो रही थी। अतः ये पूरी तरह ठहराव की स्थिति में भी नहीं थे। तीसरे, प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों की गति भी धीमी थी।

2. हाथ का श्रम-विक्टोरियाकालीन ब्रिटेन में मानव श्रम की कोई कमी नहीं थी। गरीब किसान और बेकार लोग काम-काज की तलाश में बड़ी संख्या में शहरों को जाते थे। अनेक उद्योगों में श्रमिकों की माँग मौसमी आधार पर घटती-बढ़ती रहती थी। जिन उद्योगों में मौसम के साथ उत्पादन घटता-बढ़ता रहता था, वहाँ उद्योगपति मशीनों की बजाय मजदूरों को ही काम पर रखना पसंद करते थे। बहुत सारे उत्पाद केवल हाथ से ही तैयार किए जा सकते थे। प्रायः बारीक डिजाइन और विशेष आकारों वाली वस्तुओं की बड़ी माँग थी। इन्हें बनाने के लिए मानवीय निपुणता की आवश्यकता थी। अमेरिका जैसे देशों में जहाँ मजदूरों की कमी थी वहाँ उद्योगपति मशीनों का इस्तेमाल करना ज्यादा पसंद करते थे, लेकिन ब्रिटेन में मजदूरों की कोई कमी नहीं थी।

2.1 मजदूरों की जिन्दगी-रोजगार चाहने वाले बहुत सारे लोगों को सप्ताहों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। वे पुलों के नीचे या रैन-बसेरों में रातें काटते थे। अनेक उद्योगों में मौसमी काम के कारण कामगारों को बीच-बीच में बहुत समय तक खाली बैठना पड़ता था। 19वीं सदी के प्रारम्भ में मजदूरों के वेतन में कुछ सुधार आया, लेकिन इससे मजदूरों की हालत में बेहतरी का पता नहीं चलता। बेरोजगारी की आशंका के कारण मजदूर नयी प्रौद्योगिकी से चिढ़ते थे।

3. उपनिवेश में औद्योगीकरण-उपनिवेश भारत में कपड़ा उद्योग में औद्योगीकरण निम्न प्रकार से हुआ-

3.1 भारतीय कपड़े का युग-मशीन उद्योगों के युग से पहले अन्तर्राष्ट्रीय कपड़ा बाजार में भारत के रेशमी और सूती उत्पादों का बोलबाला था। सूरत, हुगली आदि बन्दरगाहों से भारतीय वस्त्रों का निर्यात किया जाता था। परन्तु अंग्रेजी कम्पनियों ने धीरे-धीरे व्यापार पर नियन्त्रण कर लिया। फलस्वरूप सूरत और हुगली बन्दरगाहों का महत्त्व घट गया।

3.2 बुनकरों का क्या हुआ?-ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कपड़ा व्यापार में सक्रिय व्यापारियों तथा दलालों को समाप्त करने तथा बुनकरों पर अधिक प्रत्यक्ष नियन्त्रण स्थापित करने का भरसक प्रयास किया। कम्पनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने के लिए गुमाश्ता नामक वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त कर दिए। परन्तु, शीघ्र ही गाँवों में बुनकरों तथा गुमाश्तों के बीच टकराव शुरू हो गया। गुमाश्ते बुनकरों के साथ अपमानजनक एवं कठोर व्यवहार करते थे और उन्हें कोड़ों से पीटा जाता था। परिणामस्वरूप अनेक बुनकर गाँव छोड़ कर चले गए। बहुत सारे बुनकरों ने करघे बंद कर दिए और खेतों में मजदूरी करने लगे।

3.3 भारत में मैनचेस्टर का आना-उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के कपड़ा निर्यात में गिरावट आने लगी। इसका कारण यह था कि ब्रिटिश उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह आयातित कपड़े पर आयात शुल्क वसूल करे जिससे मैनचेस्टर में बने कपड़े बाहरी प्रतिस्पर्धा के बिना इंग्लैंड में आसानी से बिक सकें। दूसरी तरफ उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर दबाव डाला कि वह ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाजार में बेचे। ब्रिटेन के वस्त्र उत्पादों के निर्यात में भी बहुत वृद्धि हुई।

इस प्रकार भारत में कपड़ा बुनकरों के सामने कई समस्याएँ थीं-

(i) उनका निर्यात बाजार ढह रहा था और (ii) स्थानीय बाजार सिकुड़ने लगा था। (iii) 1860 के दशक में बुनकरों को एक नई समस्या का सामना करना पड़ा। उन्हें अच्छी कपास नहीं मिल पा रही थी। (iv) 19वीं सदी के अन्त में बुनकरों को भारतीय कारखानों से उत्पादित माल से भी प्रतियोगिता करनी पड़ी। अतः बुनकर उद्योग ढह गया।

4. भारत में कारखानों का आना-मुम्बई में प्रथम कपड़ा मिल 1854 में लगी और दो वर्ष बाद उसमें उत्पादन होने लगा। 1862 तक मुम्बई में ऐसी चार मिलें काम कर रही थीं। बंगाल में पहली जूट मिल 1855 में और दूसरी जूट मिल 1862 में स्थापित हुई। 1860 के दशक में एल्गिन मिल कानपुर में खुली तथा 1874 में मद्रास में भी पहली कताई और बुनाई मिल खुली।

4.1. प्रारम्भिक उद्यमी-अनेक व्यवसायियों ने व्यापार से पैसा कमाने के बाद भारत में औद्योगिक उद्यम स्थापित किये। इसमें द्वारकानाथ टैगोर, दिनशॉ पेटिट, जमशेदजी नुसरवानजी टाटा, सेठ हुकुमचंद, बिड़ला आदि प्रमुख थे।

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 89

4.2 मजदूर कहाँ से आए? - फैक्ट्रियों में काम करने को अधिकतर मजदूर आसपास के जिलों से आते थे। जिन किसानों-कारीगरों को गांव में काम नहीं मिलता था वे औद्योगिक केन्द्रों की तरफ जाने लगते थे। नये कामों की खबर फैलने पर दूर-दूर से भी लोग औद्योगिक इलाकों में आने लगे थे। समय के साथ फैक्ट्री मजदूरों की संख्या बढ़ने लगी। लेकिन श्रमशक्ति में उनका अनुपात बहुत छोटा था।

5. औद्योगिक विकास का अनूठापन - 1900 से 1912 के बीच भारत में सूती कपड़े का उत्पादन दोगुना हो गया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय कारखानों में सेना के लिए जूट की बोरियाँ, सैनिकों के लिए वर्दी के कपड़े आदि सामान बनने लगे। इसके लिए नए कारखाने लगाए गए। युद्ध के दौरान उत्पादन बढ़ गया। युद्ध के बाद ब्रिटेन से होने वाले सूती कपड़े के निर्यात में जबरदस्त गिरावट आई। उपनिवेशों में विदेशी उत्पादों को हटाकर स्थानीय उद्योगपतियों ने घरेलू बाजारों पर कब्जा कर लिया और धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत बना ली।

5.1 लघु उद्योगों की बहुलता - बीसवीं सदी में कुछ लघु उद्योगों में पर्याप्त वृद्धि हुई जैसे हथकरघा क्षेत्र में। बीसवीं सदी में हथकरघों पर बने कपड़े के उत्पादन में बहुत सुधार हुआ। 1900 से 1940 के बीच यह तीन गुना हो चुका था। अनेक बुनकर 'फ्लाइंग शटल' वाले करघों का प्रयोग करते थे। इससे कामगारों की उत्पादन क्षमता बढ़ गई और उत्पादन तेज हो गया।

6. वस्तुओं के लिए बाजार - उद्योगपतियों ने नए उपभोक्ता पैदा करने तथा अपने औद्योगिक उत्पादों की बिक्री के लिए विज्ञापनों का सहारा लिया। औद्योगीकरण की शुरुआत से ही विज्ञापनों ने विभिन्न उत्पादों के बाजार को फैलाने में और एक नई उपभोक्ता संस्कृति रचने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस हेतु मैनचेस्टर के उद्योगपतियों ने 'लेबल' का प्रयोग किया। 19वीं सदी के अन्त में कैलेंडरों का उपयोग किया गया। भारतीय निर्माताओं ने विज्ञापनों में राष्ट्रवादी संदेश दिए।

महत्त्वपूर्ण तिथियाँ एवं घटनाएँ

क्र. सं.

तिथि

घटनाएँ

1.

1730 ई.

इंग्लैंड में सबसे पहले 1730 के दशक में कारखाने खुले।

2.

1764 ई.

जेम्स हरग्रीव्ज द्वारा स्पिनिंग जेनी नामक कताई की मशीन का निर्माण किया गया।

3.

1840 ई.

1840 के दशक तक कपास उद्योग इंग्लैंड में औद्योगीकरण के पहले चरण में सबसे बड़ा उद्योग बन चुका था।

4.

1854 ई.

बम्बई में पहली कपड़ा मिल लगी।

5.

1855 ई.

बंगाल में जूट की पहली मिल खुली।

6.

1860 ई.

उत्तरी भारत में एल्गिन मिल 1860 ई. के दशक में खुली।

7.

1874 ई.

मद्रास में पहली कताई व बुनाई मिल खुली।

8.

1912 ई.

जे.एन. टाटा ने जमशेदपुर में भारत का पहला लौह एवं इस्पात संयंत्र स्थापित किया।

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भाग 3 — परीक्षा उपयोगी प्रश्न (Important Questions)

3. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), रिक्त स्थान, अतिलघूत्तरात्मक, लघूत्तरात्मक एवं निबंधात्मक परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

● बहुविकल्पीय प्रश्न-

1. निम्न में से किसे एक नये युग का पहला प्रतीक कहा गया? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)

(अ) ऊन (ब) कपास (स) रेशम (द) जूट

2. आदि औद्योगिक व्यवस्था में व्यावसायिक आदान-प्रदान के नेटवर्क पर नियंत्रण था-

(अ) सौदागरों का (ब) मजदूरों का (स) किसानों का (द) बुनकरों का

3. 19वीं सदी में ब्रिटेन में बेरोजगारी की आशंका के कारण मजदूर किससे चिढ़ते थे?

(अ) नए रेलवे स्टेशन से (ब) रेलवे लाइनों के विस्तार से

(स) नई प्रौद्योगिकी से (द) नए मजदूरों से

4. स्पिनिंग जैनी का आविष्कार किसने किया? (प्रश्न बैंक)

(अ) स्टीफेन्सन (ब) जेम्स हरग्रीव्ज (स) जान के (द) आर्कराइट

5. कम्पनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने के लिए जो वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त किये, वे कहलाते थे-

(अ) एजेन्ट (ब) राजस्व अधिकारी (स) आमिल (द) गुमाश्ते

6. बम्बई में पहली कपड़ा मिल किस वर्ष लगी थी? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)

अथवा

मुम्बई में पहली कपड़ा मिल स्थापित हुई- (प्रश्न बैंक; माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)

(अ) 1804 में (ब) 1816 में (स) 1854 में (द) 1855 में

7. बंगाल में देश की पहली जूट मिल किस वर्ष प्रारम्भ हुई? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)

अथवा

बंगाल में पहली जूट मिल स्थापित हुई- (प्रश्न बैंक)

(अ) 1855 (ब) 1860 (स) 1862 (द) 1872

8. 1830-40 के दशकों में किस भारतीय उद्यमी ने 6 संयुक्त उद्यम कम्पनियाँ स्थापित की थीं?

(अ) द्वारकानाथ टैगोर (ब) रवीन्द्रनाथ टैगोर (स) अवनीन्द्रनाथ टैगोर (द) जी.डी. बिड़ला

9. भूमध्य सागर के पूर्व में स्थित इलाके अर्थात् एशिया के लिए आमतौर पर किस शब्द का प्रयोग किया जाता है?

(अ) प्राच्य (ब) नई दुनिया (स) अमेरिका (द) आदि

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10. 'दो जादूगर' चित्र में अलादीन किसका प्रतीक है?

(अ) दक्षिण और रूढ़िवादिता का (ब) उत्तर और तर्कवाद का

(स) पश्चिम और आधुनिकता का (द) पूरब और अतीत का

11. विक्टोरिया काल में ब्रिटेन में उच्च वर्ग के लोग किस प्रकार की वस्तुओं को प्राथमिकता देते थे?

(अ) मशीन निर्मित (ब) हस्तनिर्मित (स) स्वदेशी (द) आयातित

12. 1917 में कलकत्ता में देश की पहली जूट मिल लगाने वाले व्यवसायी थे-

(अ) दिनशॉ पेटिट (ब) जमशेदजी टाटा (स) सेठ हुकुमचंद (द) द्वारकानाथ टैगोर

13. भारत का पहला लौह एवं इस्पात संयंत्र कहाँ स्थापित हुआ? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)

(अ) बम्बई में (ब) जमशेदपुर में (स) अहमदाबाद में (द) बोकारो में

14. इंग्लैंड में सबसे पहले किस दशक में कारखाने खुले?

(अ) 1710 के दशक में (ब) 1720 के दशक में (स) 1730 के दशक में (द) 1740 के दशक में

15. मशीन उद्योगों के युग से पहले अन्तर्राष्ट्रीय कपड़ा बाजार में किस देश के रेशमी व सूती उत्पादों का बोलबाला था?

(अ) ब्रिटेन (ब) फ्रांस (स) अमेरिका (द) भारत

16. 1840 के दशक तक ब्रिटेन के सबसे फलते-फूलते उद्योग थे-

(अ) सूती उद्योग और कपास उद्योग (ब) लौह-इस्पात उद्योग

(स) खाद्य प्रसंस्करण उद्योग (द) फर्नीचर और औजारों के उत्पादन का उद्योग

17. विक्टोरियाकालीन ब्रिटेन में कुलीन और पूँजीपति वर्ग हाथों से बनी चीजों को तरजीह देते थे, क्योंकि-

(अ) उनकी फिनिशिंग अच्छी होती थी (ब) उनका डिजाइन अच्छा होता था

(स) वे परिष्कार और सुरुचि की प्रतीक मानी जाती थीं (द) उपर्युक्त सभी

18. 19वीं सदी में जिस देश में कामगारों की कमी थी, वह था-

(अ) अमेरिका (ब) ब्रिटेन (स) भारत (द) चीन

19. जिस बंदरगाह के जरिए 18वीं सदी में भारत खाड़ी और लाल सागर के बंदरगाहों से जुड़ा था, वह था-

(अ) हुगली बन्दरगाह (ब) सूरत बन्दरगाह

(स) मछलीपट्टनम बन्दरगाह (द) उपर्युक्त में से कोई नहीं

20. उद्योगपति नए मजदूरों की भर्ती के लिए प्रायः रखते हैं-

(अ) फाइनेंसर (ब) यूनियन

(स) जॉबॅर (द) प्रबंधकीय एजेंसियाँ

21. भारत के निर्यात व्यापार का भारतीय सौदागरों के नियंत्रण वाला नेटवर्क टूटने लगा था-

(अ) 1850 के दशक तक (ब) 1750 के दशक तक

(स) 1650 के दशक तक (द) 1950 के दशक तक

22. 1811-12 में भारत के कुल निर्यात में सूती माल का हिस्सा 33 प्रतिशत था जो 1850-51 में घटकर रह गया था-

(अ) 30 प्रतिशत (ब) 20 प्रतिशत (स) 13 प्रतिशत (द) 3 प्रतिशत

23. 1860 के दशक में भारतीय बुनकरों के सामने जो नयी समस्या खड़ी हो गई थी, वह थी-

(अ) निर्यात बाजार का ढहना (ब) स्थानीय बाजार का सिकुड़ना

(स) अच्छी कपास का न मिलना (द) भारतीय कारखानों में उत्पादन होना

24. जे.एन. टाटा ने जमशेदपुर में भारत का प्रथम लौह एवं इस्पात संयंत्र स्थापित किया-

(अ) 1854 में (ब) 1917 में (स) 1855 में (द) 1912 में

अथवा

भारत का प्रथम लौह व इस्पात संयंत्र स्थापित किया गया- (प्रश्न बैंक)

(अ) कानपुर-दिनशा पेटिट (ब) हुगली-द्वारकानाथ टैगोर

(स) रांची-हुकुमचन्द (द) जमशेदपुर-जे.एन. टाटा

25. उत्तरी भारत में एल्गिन मिल कानपुर में खुली-

(अ) 1820 के दशक में (ब) 1840 के दशक में

(स) 1860 के दशक में (द) 1810 के दशक में

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 95

26. भाप के इंजन से सम्बन्धित है- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)

(अ) जेम्स वॉट (ब) जेम्स हरग्रीव्ज

(स) माइकल वुल्फ (द) अरस्तु

27. औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम किस देश में प्रारंभ हुई? (प्रश्न बैंक)

(अ) जर्मनी (ब) जापान (स) अमेरिका (द) इंग्लैण्ड

28. जेम्सवॉट द्वारा बनाये गये भाप के इंजन का उत्पादन किसके द्वारा किया गया?

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)

(अ) न्यूकॉमेन (ब) माइकल वुल्फ (स) मैथ्यू बोल्टन (द) विल थार्न

उत्तरमाला

1. (ब) 2. (अ) 3. (स) 4. (ब) 5. (द) 6. (स) 7. (अ)

8. (अ) 9. (अ) 10. (द) 11. (ब) 12. (स) 13. (ब) 14. (स)

15. (द) 16. (अ) 17. (द) 18. (अ) 19. (ब) 20. (स) 21. (ब)

22. (द) 23. (स) 24. (द) 25. (स) 26. (अ) 27. (द) 28. (स)।

● रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-

1. ऐसा व्यक्ति जो रेशों के हिसाब से ऊन को 'स्टेपल' करता है या छाँटता है, ....... कहलाता है।

2. ....... नये युग का पहला प्रतीक थी। (प्रश्न बैंक)

3. विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में ....... की कोई कमी नहीं थी।

4. उद्योगपति नये मजदूरों की भर्ती के लिए प्राय: एक ....... रखते थे।

5. बच्चों की चीजों का प्रचार करने के लिए ........ की छवि का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता था। (प्रश्न बैंक)

6. 19वीं सदी के अन्त में निर्माता अपने उत्पादों को बेचने के लिए ........ छपवाने लगे थे।

7. जब भारतीय निर्माताओं ने विज्ञापन बनाए तो उनमें ........ सन्देश साफ दिखाई देता था।

8. स्वदेशी आन्दोलन को गति मिलने से राष्ट्रवादियों ने लोगों को ........ कपड़े के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया।

9. भारतीय निर्माताओं द्वारा बनाए गए विज्ञापन ............. के राष्ट्रवादी सन्देश के वाहक बन गए थे। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2022-23)

10. मशीन उद्योग के युग से पहले अन्तर्राष्ट्रीय कपड़ा बाजार में भारत के रेशमी और ............... उत्पादों का ही दबदबा रहता था। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)

उत्तरमाला

1. स्टेपलर 2. कपास (कॉटन) 3. मानव श्रम 4. जॉबर्स 5. बाल कृष्ण

6. कैलेंडर 7. राष्ट्रवादी 8. विदेशी 9. स्वदेशी 10. सूती।

● अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. भारत का प्रथम लौह व इस्पात संयंत्र कहाँ स्थापित किया गया था? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— जमशेदपुर में।

प्रश्न 2. भाप के इंजन का आविष्कार किसने किया? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— न्यूकॉमेन ने।

प्रश्न 3. इंग्लैण्ड में सबसे पहले कारखाने कब खुले?

उत्तर— 1730 के दशक में।

प्रश्न 4. किसने अपने भाप के इंजन को पेटेन्ट कराया और कब?

उत्तर— 1781* में जेम्स वाट ने अपने भाप के इंजन को पेटेन्ट कराया।

प्रश्न 5. ब्रिटेन में उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में केवल हाथ से तैयार किये जाने वाले दो उत्पादों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर— (1) हथौड़े (2) कुल्हाड़ियाँ।

  • NCERT की हिन्दी माध्यम की पाठ्यपुस्तक में 1871 जबकि अंग्रेजी माध्यम की पाठ्यपुस्तक में 1781 दिया गया है।

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प्रश्न 6. भारत के किन दो बन्दरगाहों से विदेशों के साथ व्यापार चलता था?

उत्तर— (1) सूरत (2) हुगली।

प्रश्न 7. औपनिवेशिक काल में किन दो बन्दरगाहों का महत्व बढ़ गया था और किनका महत्व कम हो गया था?

उत्तर— औपनिवेशिक काल में मुम्बई व कोलकाता बन्दरगाहों का महत्व बढ़ गया था तथा सूरत और हुगली का महत्व कम हो गया था।

प्रश्न 8. 1850 के दशक तक देश के अधिकांश बुनकर क्षेत्रों में गिरावट और बेकारी क्यों व्याप्त थी?

उत्तर— देश के बाजारों में मैनचेस्टर के आयातित माल की भरमार होने से।

प्रश्न 9. 1860 के दशक में किस देश के गृह युद्ध के कारण भारत के कच्चे कपास के निर्यात में वृद्धि हुई? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)

उत्तर— 1860 के दशक में अमेरिका के गृह युद्ध के कारण भारत के कच्चे कपास के निर्यात में वृद्धि हुई।

प्रश्न 10. भारत के किन्हीं चार प्रारम्भिक उद्योगपतियों के नाम लिखिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— (1) जमशेदजी जीजीभोये (2) द्वारकानाथ टैगोर (3) दिनशॉ पेटिट (4) जमशेदजी नुसरवानजी टाटा।

प्रश्न 11. गिल्ड्स से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— गिल्ड्स उत्पादकों के संगठन होते थे, जो कारीगरों को प्रशिक्षण देते, उत्पादकों पर नियन्त्रण रखते तथा प्रतिस्पर्धा और मूल्य तय करते थे।

प्रश्न 12. आदि-औद्योगीकरण का अर्थ स्पष्ट करें।

अथवा

आदि औद्योगीकरण से आप क्या समझते हैं? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)

उत्तर— फैक्ट्रियों की स्थापना से पहले की औद्योगिक अवस्था को आदि-औद्योगीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 13. आदि-औद्योगिक व्यवस्था से किसानों को क्या लाभ हुआ?

उत्तर— (1) आदि-औद्योगिक व्यवस्था से किसानों की आय में वृद्धि हुई। (2) इससे उन्हें सम्पूर्ण परिवार के श्रम संसाधनों को प्रयुक्त करने का अवसर मिल गया।

प्रश्न 14. 'स्टेपलर' से क्या अभिप्राय है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— 'स्टेपलर' उस व्यक्ति को कहते थे जो रेशों के हिसाब से ऊन को स्टेपल करता है या छाँटता है।

प्रश्न 15. फुलर से क्या अभिप्राय है?

उत्तर— जो व्यक्ति 'फुल' करता है अर्थात् चुन्नटों के सहारे कपड़े को समेटता है वह 'फुलर' कहलाता है।

प्रश्न 16. आदि-औद्योगिक व्यवस्था की दो विशेषताएँ बताइए।

उत्तर— (1) इस व्यवस्था पर सौदागरों का नियन्त्रण था। (2) वस्तुओं का उत्पादन कारखानों की बजाय घरों में होता था।

प्रश्न 17. 'कार्डिंग' से क्या अभिप्राय है?

उत्तर— कार्डिंग वह उत्पादन प्रक्रिया थी जिसमें कपास या ऊन आदि रेशों को कताई के लिए तैयार किया जाता था।

प्रश्न 18. गुमाश्ता कौन थे? (प्रश्न बैंक)

अथवा

ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने गुमाश्ता की नियुक्ति क्यों की?

उत्तर— ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीय बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने तथा कपड़ों की गुणवत्ता जाँचने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त कर दिए, जिन्हें 'गुमाश्ता' कहा जाता था।

प्रश्न 19. भारतीय बाजार में मैनचेस्टर के आयातित मालों की भरमार से भारतीय बुनकरों पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर— भारतीय बाजार में मैनचेस्टर के आयातित मालों की भरमार से भारत के अधिकतर बुनकर क्षेत्रों में गिरावट आ गई और बेरोजगारी फैल गई।

प्रश्न 20. 1772 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी हेनरी पतलो ने भारतीय कपड़ों के संदर्भ में क्या कहा था?

उत्तर— हेनरी पतलो ने कहा था कि भारतीय कपड़ों की माँग कभी कम नहीं हो सकती क्योंकि संसार के किसी और देश में इतना अच्छा माल नहीं बनता।

प्रश्न 21. भारत में पहली कपड़ा मिल कब और कहाँ स्थापित हुई? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— बम्बई में पहली कपड़ा मिल 1854 में स्थापित हुई।

प्रश्न 22. भारत में पहली और दूसरी जूट मिल कब और कहाँ स्थापित हुई?

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X | 97

उत्तर—बंगाल में 1855 में पहली जूट मिल तथा 1862 में दूसरी जूट मिल स्थापित हुई।

प्रश्न 23. 'जॉबर' कौन होते थे? उनके कार्यों को स्पष्ट कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— उद्यमी मिलों में नये मजदूरों की भर्ती के लिए एक विश्वस्त कर्मचारी रखते थे, जो 'जॉबर' कहलाता था। यह अपने गाँव से लोगों को उद्योगों में कार्य हेतु लाता था।

प्रश्न 24. 'फ्लाई शटल' क्या है? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)

उत्तर— फ्लाई शटल रस्सियों और पुलियों के द्वारा चलने वाला एक यान्त्रिक औजार है जिसका बुनाई के लिए प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 25. फ्लाई शटल से क्या लाभ हुए?

उत्तर— फ्लाई शटल से कामगारों की उत्पादन क्षमता बढ़ी, उत्पादन तेज हुआ तथा श्रम की माँग में कमी आई।

प्रश्न 26. बुनकरों ने कपड़ों का उत्पादन बढ़ाने के लिए क्या उपाय किया?

उत्तर— बुनकरों ने कपड़ों का उत्पादन बढ़ाने के लिए फ्लाई शटल वाले करघों का प्रयोग करना शुरू किया।

प्रश्न 27. भारत के किन प्रदेशों में अधिकतर फ्लाई शटल वाले करघों का प्रयोग किया जाता था?

उत्तर— त्रावनकोर, मद्रास, मैसूर, कोचीन, बंगाल आदि प्रदेशों में फ्लाई शटल वाले करघों का अधिक प्रयोग किया जाता था।

प्रश्न 28. उद्यमी अपने माल की अधिकाधिक बिक्री करने तथा नए उपभोक्ताओं को आकृष्ट करने के लिए किन लेबल लगे विज्ञापनों का प्रयोग करते थे?

उत्तर— उद्यमी भारतीय देवी-देवताओं के चित्र, महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों, सम्राटों तथा नवाबों के लेबल लगे विज्ञापनों का प्रयोग करते थे।

प्रश्न 29. ब्रिटेन में सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा किसने प्रस्तुत की थी?

उत्तर— ब्रिटेन में सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा रिचर्ड आर्कराइट ने प्रस्तुत की थी।

प्रश्न 30. भारत में कपड़ा बुनकरों को एक साथ किन दो समस्याओं का सामना करना पड़ा?

उत्तर— (1) भारत में कपड़ा बुनकरों का निर्यात बाजार ढह रहा था। (2) स्थानीय बाजार सिकुड़ने लगा था।

प्रश्न 31. अमेरिकी गृह-युद्ध का भारतीय बुनकरों पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर— अमेरिकी गृह-युद्ध के फलस्वरूप अमेरिका से कपास की आमद बंद हो गई। कच्चे कपास की अत्यधिक कीमत के कारण बुनकरों को कच्चे माल के लाले पड़ गए।

प्रश्न 32. बम्बई के उन दो उद्योगपतियों के नाम लिखिए, जिन्होंने 19वीं सदी में विशाल औद्योगिक साम्राज्य स्थापित किया।

उत्तर— (i) दिनशॉ पेटिट (ii) जमशेदजी नुसरवानजी टाटा।

● लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 'नयी सदी के उदय' और 'दो जादूगर' तस्वीरें क्या बतलाती हैं?

उत्तर— ये तस्वीरें आधुनिक विश्व की विजयगाथा कहती हैं। इस गाथा में आधुनिक विश्व द्रुत तकनीकी बदलावों व आविष्कारों, मशीनों व कारखानों, रेलवे और वाष्पपोतों की दुनिया के रूप में दर्शाया गया है। इसमें औद्योगीकरण का इतिहास विकास की कहानी के रूप में सामने आता है और आधुनिक युग तकनीक प्रगति के भव्य युग के रूप में उभरता है।

प्रश्न 2. 17वीं व 18वीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों में सौदागर माँग होते हुए भी उत्पादन नहीं बढ़ा सकते थे। क्यों?

अथवा

औद्योगिक क्रान्ति से पूर्व यूरोप के नये व्यापारियों को नगरों में औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित करने में आई किन्हीं तीन प्रमुख समस्याओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर— 17वीं व 18वीं सदी में यूरोपीय शहरों में सौदागर माँग होते हुए भी उत्पादन नहीं बढ़ा सकते थे एवं नये व्यापारी आसानी से औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित नहीं कर सकते थे। क्योंकि उन्हें निम्न समस्यायें आईं-

(i) शहरों में शहरी दस्तकारी और व्यापारिक गिल्ड्स काफी शक्तिशाली थे।

(ii) वे व्यवसाय में नए लोगों को आने से रोकते थे।

(iii) शासकों ने भी विभिन्न गिल्ड्स को खास उत्पादों के उत्पादन और व्यापार का एकाधिकार दिया हुआ था।

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प्रश्न 3. गाँवों में गरीब किसान और दस्तकार यूरोप के शहरी सौदागरों के लिए काम करने के लिए क्यों तैयार हो गए?

उत्तर— सत्रहवीं तथा अठारहवीं शताब्दी में गाँवों में खुले खेतों के समाप्त होने तथा कॉमन्स की बाड़ाबन्दी से छोटे और गरीब किसानों को आय के नवीन स्रोत ढूँढने पड़ रहे थे। इसलिए जब शहरी सौदागरों ने उन्हें माल का उत्पादन करने के लिए पेशगी राशि दी, तो किसान उनके लिए तुरन्त काम करने के लिए तैयार हो गए। सौदागरों के लिए काम करते हुए वे गाँवों में ही रहते हुए अपने छोटे-छोटे खेतों को भी संभाल सकते थे।

प्रश्न 4. गिल्ड्स से आप क्या समझते हैं? इनके क्या कार्य थे?

उत्तर— यूरोपीय शहरों में विभिन्न व्यापारियों, उत्पादकों, दस्तकारों द्वारा अपने हितों की रक्षा के लिए बनाये गये संगठन गिल्ड्स कहलाते थे। गिल्ड्स से जुड़े उत्पादक कारीगरों को प्रशिक्षण देते थे, उत्पादकों पर नियन्त्रण रखते थे, प्रतिस्पर्धा तथा मूल्य तय करते थे तथा व्यवसाय में नए लोगों को आने से रोकते थे।

प्रश्न 5. "आदि-औद्योगिक व्यवस्था से शहरों और गाँवों के बीच एक घनिष्ठ सम्बन्ध विकसित हुआ।" व्याख्या कीजिए।

उत्तर— आदि-औद्योगिक व्यवस्था से शहरों और गाँवों के बीच एक घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हुआ। यद्यपि सौदागर शहरों में रहते थे, परन्तु उनके लिए ऊन खरीदने, सूत कातने, बुनकर, फुलर्स तथा रंगसाजी का काम अधिकतर गाँवों में चलता था। लन्दन में तो कपड़ों की फिनिशिंग होती थी।

प्रश्न 6. बाजार में श्रम की बहुतायत से मजदूरों की जिन्दगी किस प्रकार प्रभावित हुई?

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)

अथवा

बाजार में श्रम की प्रचुरता से मजदूरों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़े? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— बाजार में श्रम की प्रचुरता से मजदूरों का जीवन बहुत प्रभावित हुआ। काम पाने के लिए गाँवों से बड़ी संख्या में मजदूर शहरों में आने लगे। रोजगार चाहने वाले बहुत से लोगों को कई सप्ताहों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। वे पुलों के नीचे निजी तथा विधि विभाग द्वारा संचालित रैनबसेरों में रहते थे।

प्रश्न 7. उद्योगों में मौसमी आधार पर काम करने वाले कामगारों की स्थिति पर प्रकाश डालिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— अनेक उद्योगों में कामगार मौसमी आधार पर काम करते थे, इसलिए उन्हें बीच-बीच में काफी समय तक खाली बैठना पड़ता था। कुछ लोग सर्दियों के बाद गाँवों में चले जाते थे, जहाँ इस समय काम निकलने लगता था। परन्तु अधिकतर मजदूर शहर में रहते हुए ही कोई छोटा-मोटा काम ढूँढने का प्रयास करते थे, जो आसान काम नहीं था।

प्रश्न 8. 19वीं सदी के मध्य में, ब्रिटेन के अभिजात वर्ग के लोगों ने हाथों से बनी चीजों को प्राथमिकता क्यों दी? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर— विक्टोरियाकालीन ब्रिटेन में उच्च वर्ग के लोग (कुलीन और पूँजीपति वर्ग) हाथों से बनी चीजों को प्राथमिकता देते थे क्योंकि-

(1) हाथ की बनी चीजों को परिष्कार और सुरुचि का प्रतीक माना जाता था।

(2) उनकी फिनिश अच्छी होती थी।

(3) उनको एक-एक करके बनाया जाता था और उनका डिजाइन अच्छा होता था।

प्रश्न 9. गाँव में गुमाश्ता और बुनकरों के मध्य संघर्ष क्यों हुए?

उत्तर— कम्पनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी तैनात कर दिए, जिन्हें गुमाश्ता कहा जाता था। वे बुनकरों के साथ दम्भपूर्ण व्यवहार करते, सिपाहियों और चपरासियों को लेकर आते और माल तैयार न होने पर बुनकरों को अक्सर पीटा जाता था। गुमाश्ताओं के इस व्यवहार के कारण बुनकरों की उनसे झड़पें होती रहती थीं।

प्रश्न 10. पश्चिम नजरिये से 'प्राच्य' का क्या आशय है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— पश्चिम नजरिये से 'प्राच्य' का आशय है- भूमध्य सागर के पूर्व में स्थित देश। आमतौर पर प्राच्य शब्द एशिया के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पश्चिमी नजरिये में प्राच्य इलाके पूर्व-आधुनिक, पारम्परिक और रहस्यमय थे।

प्रश्न 11. भारतीय उद्योगों के सन्दर्भ में 'जॉबर' की क्या भूमिका थी? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— भारतीय उद्योगपति नए मजदूरों की भर्ती के लिए 'जॉबर' रखते थे। जॉबर एक विश्वस्त कर्मचारी होता था तथा कम्पनी का पुराना कर्मचारी होता था।

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प्रश्न 12. स्पिनिंग जेनी से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— 1764 में जेम्स हरग्रीव्ज द्वारा तैयार की गई इस मशीन ने कताई की प्रक्रिया को तेज कर दिया और मजदूरों की मांग घटा दी। इस मशीन के एक ही पहिए को घुमाकर एक मजदूर कई तकलियों को चला सकता था और एक ही समय में कई धागे कात सकता था।

प्रश्न 13. जमशेदजी जीजीभोये के बारे में आप क्या जानते हैं?

उत्तर— जमशेदजी जीजीभोये— जमशेदजी जीजीभोये एक पारसी बुनकर के बेटे थे। अपने समय के बहुत सारे लोगों की तरह उन्होंने भी चीन के साथ व्यापार और जहाजरानी का काम किया था। उनके पास जहाजों का एक विशाल बेड़ा था। अंग्रेज और अमेरिकी जहाज कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा के कारण 1850 के दशक तक उन्हें सारे जहाज बेचने पड़े।

प्रश्न 14. 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत में 'जॉबर्स' की भूमिका का वर्णन कीजिए।

अथवा

जॉबर कौन होते थे? उनके कार्यों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर— जॉबर्स— उद्योगपति नए मजदूरों की भर्ती के लिए प्रायः एक व्यक्ति रखते थे, जो जॉबर्स कहलाता था। जॉबर्स कोई पुराना और विश्वस्त कर्मचारी होता था।

जॉबर के कार्य— वह अपने गाँव से लोगों को लाता था, उन्हें काम का भरोसा देता था, उन्हें शहर में जमने के लिए मदद देता था और मुसीबत में पैसे से मदद करता था। बाद में जॉबर्स मदद के बदले पैसे व तोहफों की मांग करने लगे और मजदूरों की जिंदगी को नियंत्रित करने लगे।

प्रश्न 15. उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में भारत की प्रारम्भिक सूती मिलों में मोटे सूती धागे का उत्पादन क्यों किया जाता था?

उत्तर— उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में जब भारतीय व्यवसायी उद्योग स्थापित करने लगे, उस समय भारत आने वाले ब्रिटिश मालों में धागा बहुत अच्छा नहीं था। इसलिए भारत की प्रारम्भिक सूती मिलों में कपड़े की बजाय मोटे सूती धागे ही बनाए जाते थे। इस धागे का भारत के हथकरघा बुनकर प्रयोग करते थे अथवा उन्हें चीन को निर्यात कर दिया जाता था।

प्रश्न 16. मिलों के साथ प्रतिस्पर्धा का मुकाबला कर पाने के मामले में महीन वस्त्र बुनने वाले बुनकर अन्य लोगों से अच्छी स्थिति में क्यों थे?

उत्तर— अच्छे किस्म के कपड़े की मांग केवल उच्च वर्ग के लोगों में ही थी। उसमें उतार-चढ़ाव भी कम आते थे। फसलें खराब होने अथवा अकालों से बनारसी अथवा बालूचरी साड़ियों की बिक्री पर प्रभाव नहीं पड़ता था। इसके अतिरिक्त कारखाने विशेष प्रकार की बुनाई की नकल नहीं कर सकते थे।

प्रश्न 17. नये उपभोक्ता पैदा करने में विज्ञापनों की भूमिका की विवेचना कीजिए।

अथवा

वस्तुओं के लिए बाजार में विज्ञापन के महत्त्व को समझाइए।

उत्तर— नये उपभोक्ता पैदा करने में विज्ञापनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। विज्ञापन विभिन्न उत्पादों को आवश्यक और वांछनीय बना देते हैं। वे लोगों की सोच बदल देते हैं तथा नई आवश्यकताएँ उत्पन्न कर देते हैं। औद्योगीकरण की शुरुआत से ही विज्ञापनों ने विभिन्न उत्पादों के बाजार के विस्तार में और एक नयी उपभोक्ता संस्कृति का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

प्रश्न 18. लेबलों ने मैनचेस्टर के कपड़ों के लिए भारत में बाजार तैयार करने में क्या सहायता पहुँचाई?

उत्तर— लेबल से खरीदारों को कम्पनी का नाम व उत्पादन का स्थान ज्ञात हो जाता था। लेबल चीजों की गुणवत्ता का प्रतीक भी था। जब किसी लेबल पर मोटे अक्षरों में 'मेड इन मैनचेस्टर' लिखा दिखाई देता तो खरीदारों को कपड़ा खरीदने में किसी प्रकार का डर नहीं रहता था।

प्रश्न 19. फ्लाइंग शटल पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— फ्लाइंग शटल (फ्लाइ शटल) रस्सियों और पुलियों के द्वारा चलने वाला एक यांत्रिक औजार है जिसका बुनाई के लिए प्रयोग किया जाता है। यह क्षैतिज धागे को लम्बवत् धागे में पिरो देती है। इससे बुनकरों को बड़े करघे चलाना और चौड़े अरज के कपड़ा बनाने में सहायता मिली।

प्रश्न 20. औद्योगीकरण किसे कहते हैं? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)

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उत्तर—औद्योगीकरण जिसका अर्थ है-अर्थव्यवस्था में सुधार हेतु उद्योगों की स्थापना एवं उनका विकास। औद्योगीकरण एक सामाजिक तथा आर्थिक प्रक्रिया है, जिसमें उद्योग-धन्धों की बहुलता होती है।

● दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. 'नयी सदी के उदय' (डॉन ऑफ द सेंचुरी) में क्या बतलाया गया है? वर्णन कीजिये।

उत्तर— ई.टी. पॉल म्यूजिक कंपनी ने सन् 1900 में संगीत की एक किताब प्रकाशित की थी जिसकी जिल्द पर दी गई तस्वीर में 'नयी सदी के उदय' (डॉन ऑफ द सेंचुरी) का ऐलान किया था।

तस्वीर के मध्य में एक देवी जैसी तस्वीर है। यह देवी हाथ में नयी शताब्दी की ध्वजा लिए प्रगति का फरिश्ता दिखाई देती है। उसका एक पाँव पंखों वाले पहिये पर टिका हुआ है। यह पहिया समय का प्रतीक है। उसकी उड़ान भविष्य की ओर है। उसके पीछे उन्नति के चिह्न तैर रहे हैं: रेलवे, कैमरा, मशीनें, प्रिंटिंग प्रेस और कारखाना।

अर्थात् यह चित्र भविष्य की उन्नति को बतला रहा है।

प्रश्न 2. 'दो जादूगर' चित्र द्वारा क्या दर्शाया गया है?

उत्तर— यह तस्वीर एक व्यापारिक पत्रिका के पन्नों पर सौ साल से भी पहले छपी थी।

इस तस्वीर में दो जादूगर दिखाए गए हैं। ऊपर वाले हिस्से में प्राच्य (Orient) इलाके का अलादीन है जिसने अपने जादुई चिराग को रगड़ कर एक भव्य महल का निर्माण कर दिया है। नीचे एक आधुनिक मैकेनिक है जो अपने आधुनिक औजारों से एक नया जादू रच रहा है। वह पुल, पानी के जहाज, मीनार और गगनचुंबी इमारतें बनाता है।

यहां अलादीन पूरब और अतीत का प्रतीक है तथा मैकेनिक पश्चिम और आधुनिकता का प्रतीक है।

प्रश्न 3. "17वीं और 18वीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों में किसानों और कारीगरों से काम करवाने लगे थे।" इस कथन की व्याख्या कीजिये।

उत्तर— (i) 17वीं और 18वीं शताब्दी में यूरोपीय शहरों के सौदागर गाँवों की तरफ रुख करने लगे थे क्योंकि शहरों में शहरी दस्तकारी और व्यापारिक गिल्ड्स काफी ताकतवर थे। इनके कारण नए व्यापारी शहरों में कारोबार नहीं कर सकते थे।

(ii) इस समय गाँवों में छोटे और गरीब किसान खुले खेत खत्म होने व कामन्स की बाड़ाबन्दी के कारण अपनी आय के नए स्रोत ढूँढ रहे थे।

(iii) जब गाँवों में सौदागर आए और उन्होंने माल पैदा करने के लिए पेशगी रकम दी तो किसान फौरन तैयार हो गए। वे गाँव में ही रहते हुए अपने छोटे-छोटे खेतों को सम्भालते हुए सौदागरों के लिए काम कर सकते थे।

(iv) अब उन्हें पूरे परिवार के श्रम संसाधनों के इस्तेमाल का मौका भी मिल गया।

(v) इस व्यवस्था से शहरों व गाँवों के मध्य एक घनिष्ठ सम्बन्ध विकसित हुआ।

प्रश्न 4. औद्योगीकरण के प्रारम्भिक दौर में क्या परिवर्तन आए? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— औद्योगीकरण के प्रारम्भिक चरण में सूती तथा कपास उद्योग ब्रिटेन के सबसे तेज गति से फैलने वाला उद्योग था। 1840 के दशक के बाद लोहा तथा स्टील उद्योग आगे निकल गए। नए उद्योग परम्परागत उद्योगों के लिए खतरा बन गये थे। तकनीकी में हो रहे लगातार आविष्कारों के कारण खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण, पॉटरी, काँच के काम, चर्मशोधन, फर्नीचर और औजारों के उत्पादन जैसे बहुत सारे क्षेत्र अस्तित्व में आए।

प्रश्न 5. आदि-औद्योगीकरण क्या है? भारतीय बुनकरों पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने किस प्रकार नियंत्रण स्थापित किया?

उत्तर— आदि-औद्योगीकरण का अर्थ— इंग्लैण्ड और यूरोप में फैक्ट्रियों की स्थापना से पहले के औद्योगिक उत्पादन को 'आदि-औद्योगीकरण' कहा जाता है। आदि-औद्योगीकरण काल में औद्योगिक बाजार के लिए उत्पादन कारखानों की बजाय घरों पर हाथों से निर्मित किये जाते थे।

भारतीय बुनकरों पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का नियंत्रण— (i) कम्पनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और कपड़ों की गुणवत्ता जाँचने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी तैनात कर दिए जिन्हें गुमाश्ता कहा जाता था।

(ii) कम्पनी को माल बेचने वाले बुनकरों को अन्य खरीदारों के साथ कारोबार करने पर पाबंदी लगा दी।

(iii) जिन बुनकरों द्वारा कम्पनी से कर्ज लिया जाता था, उन्हें अपना बनाया हुआ कपड़ा गुमाश्ता को ही देना पड़ता था। उसे वे किसी और व्यापारी को नहीं बेच सकते थे।

प्रश्न 6. अठारहवीं सदी के आविष्कारों से उत्पादन प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ा? वर्णन कीजिये।

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 101

अथवा

"अठारहवीं शताब्दी में हुए आविष्कारों ने उत्पादन प्रक्रिया के हर चरण की कुशलता बढ़ा दी।" विवेचना कीजिए।

उत्तर—अठारहवीं शताब्दी में हुए आविष्कारों ने उत्पादन प्रक्रिया के हर चरण कार्डिंग, ऐंठना व कताई और लपेटना की कुशलता बढ़ा दी। इसकी पुष्टि निम्नलिखित तथ्यों से होती है-

(1) इन आविष्कारों से प्रत्येक मजदूर अधिक उत्पादन करने लगा। अब पहले की अपेक्षा अधिक मजबूत धागों व रेशों का उत्पादन होने लगा। स्पिनिंग जेनी के आविष्कार से एकसाथ सूत के आठ धागे काते जा सकते थे।

(2) रिचर्ड आर्कराइट ने सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा सामने रखी।

(3) अब नई मशीनों द्वारा कारखानों में उत्पादन की समस्त प्रक्रियाएँ एक ही छत के नीचे और एक ही स्वामी के हाथों में आ गईं, फलस्वरूप उत्पादन प्रक्रिया, गुणवत्ता तथा मजदूरों पर निगरानी रखना सम्भव हो गया।

प्रश्न 7. बुनकरों और गुमाश्तों के बीच टकराव की स्थिति का क्या प्रभाव पड़ा? (प्रश्न बैंक)

उत्तर—गुमाश्ते बुनकरों के साथ कठोर और अपमानजनक व्यवहार करते थे। माल समय पर तैयार न होने पर उन्हें कठोर दण्ड दिया जाता था। बुनकरों की पिटाई की जाती थी और उन्हें कोड़े लगाए जाते थे।

गुमाश्तों के व्यवहार से बुनकरों में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हुआ। कर्नाटक और बंगाल में अनेक स्थानों पर बुनकर गाँव छोड़कर भाग गए। वे अपने सम्बन्धियों के यहाँ जाकर किसी और गाँव में अपना करघा लगा लेते थे। अनेक स्थानों पर उन्होंने कम्पनी और उसके अधिकारियों का विरोध किया और गाँव के व्यापारियों के साथ मिलकर विद्रोह कर दिया। कुछ समय बाद अनेक बुनकरों ने कर्जा लौटाने से इनकार कर दिया। उन्होंने करघे बन्द कर दिए और खेतों में मजदूरी करने लगे।

प्रश्न 8. "उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय सूती वस्त्र उद्योग का पतन होने लगा।" व्याख्या कीजिए।

अथवा

"उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में भारतीय कपड़े के निर्यात में गिरावट आने लगी।" विवेचना कीजिए।

उत्तर—उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में भारतीय सूती वस्त्र उद्योग का पतन होने लगा। इसके लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं-

(1) इंग्लैंड में कपास उद्योग के विकास के लिए उद्योगपतियों के दबाव में सरकार ने भारतीय कपड़े पर आयात शुल्क लगा दिया ताकि मैनचेस्टर में बने कपड़े बाहरी प्रतिस्पर्धा के बिना इंग्लैंड में सरलता से बिक सकें।

(2) इंग्लैंड के उद्योगपतियों ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर भी दबाव डाला कि वह ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाजारों में भी बेचे। 1850 तक आते-आते सूती कपड़े का आयात भारत में 31 प्रतिशत हो चुका था जो 1870 तक बढ़कर 50 प्रतिशत से ऊपर चला गया।

इस प्रकार भारत में कपड़ा बुनकरों के सामने एक साथ दो समस्याएँ आईं-(i) उनका निर्यात बाजार ढह रहा था और (ii) स्थानीय बाजार सिकुड़ने लगा था।

(3) कम लागत पर मशीनों से बनने वाला आयातित कपास उत्पाद इतने सस्ते थे कि बुनकर उनका मुकाबला नहीं कर सकते थे।

(4) भारतीय बुनकरों को अच्छी किस्म के कपास की प्राप्ति भी नहीं हो पा रही थी।

प्रश्न 9. ब्रिटिश औद्योगीकरण के कारण भारतीय बुनकरों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ा?

अथवा

उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय बुनकरों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ा?

उत्तर—उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय बुनकरों को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ा-

(1) बुनकरों का निर्यात बाजार नष्ट हो रहा था और स्थानीय बाजार सिकुड़ रहा था। स्थानीय बाजार में मैनचेस्टर के आयातित मालों की भरमार थी। कम लागत पर मशीनों से बनने वाले आयात किए गए कपास उत्पाद इतने सस्ते थे कि बुनकर उनका मुकाबला नहीं कर सकते थे। 1850 के दशक तक देश के अधिकांश बुनकर प्रदेशों में गरीबी व बेरोजगारी फैल गई थी।

(2) 1860 के दशक में अमेरिका में गृहयुद्ध आरम्भ होने पर भारतीय बुनकरों के लिए कच्चा माल मिलना अत्यन्त कठिन हो गया। उन्हें मनमानी कीमत पर कच्ची कपास खरीदनी पड़ती थी। इस स्थिति में बुनकरों के लिए जीवन-निर्वाह करना कठिन हो गया।

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(3) उन्नीसवीं सदी के अन्त में भारतीय कारखानों में उत्पादन होने लगा और बाजार मशीनों की बनी चीजों से भर गए थे। इससे बुनकर उद्योग पतनोनमुख हो गया।

प्रश्न 10. बीसवीं सदी के प्रथम दशक तक भारत में औद्योगिकीकरण की व्यवस्था में आए परिवर्तनों का वर्णन कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— 20वीं सदी के पहले दशक तक भारत में औद्योगिकीकरण की व्यवस्था में कई बदलाव आए। यथा-

(1) स्वदेशी आन्दोलन के प्रसार से भारत के राष्ट्रवादियों ने लोगों को विदेशी कपड़े के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया।

(2) औद्योगिक समूह अपने सामूहिक हितों की रक्षा के लिए संगठित हो गए और उन्होंने आयात शुल्क बढ़ाने तथा अन्य रियायतें देने के लिए भारत सरकार पर दबाव डाला।

(3) 1906 के पश्चात् चीन भेजे जाने वाले भारतीय धागे के निर्यात में भी कमी आने लगी थी। चीनी बाजार चीन और जापान की मिलों के उत्पाद से भर गए थे। परिणामस्वरूप भारत के उद्योगपति धागे की बजाय कपड़ा बनाने लगे। सन् 1900 से 1912 की अवधि में भारत में सूती कपड़े का उत्पादन दोगुना हो गया था।

प्रश्न 11. बाजार में श्रम की बहुतायत से मजदूरों की जिन्दगी किस प्रकार प्रभावित हुई? लिखिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)

अथवा

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में मजदूरों के लिए रोजगार के साधनों की उपलब्धता की स्थिति पर प्रकाश डालिए।

उत्तर— (1) नौकरियों के समाचार गाँवों में पहुँचते ही मजदूर बड़ी संख्या में शहरों की ओर चले जाते थे।

(2) शहरों में नौकरी मिलने की सम्भावना मित्रों, रिश्तेदारों से जान-पहचान पर निर्भर करती थी। किसी कारखाने में यदि मजदूरों का कोई रिश्तेदार या मित्र लगा हुआ होता था, तो उन्हें नौकरी मिलने की अधिक सम्भावना होती थी।

(3) रोजगार चाहने वाले लोगों को हफ्तों प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। वे पुलों के नीचे या रैन-बसेरों में रात काटते थे। कुछ बेरोजगार शहर में बने निजी रैन-बसेरों में रहते थे।

(4) अनेक उद्योगों में मौसमी काम के कारण कामगारों को बीच-बीच में बहुत समय तक खाली बैठना पड़ता था। काम का सीजन गुजर जाने के बाद गरीब पुनः सड़क पर आ जाते थे और कुछ लोग सर्दी में अपने गाँवों में चले जाते थे। परन्तु अधिकतर मजदूर शहरों में ही छोटा-मोटा काम ढूंढने का प्रयास करते थे।

प्रश्न 12. "1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों के नियंत्रण वाला नेटवर्क टूटने लगा था।" व्याख्या कीजिए।

उत्तर— 1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों के नियंत्रण के नेटवर्क के टूटने के निम्नलिखित कारण थे-

(1) स्थानीय दरबारों से अनेक रियायतें प्राप्त करने तथा व्यापार पर इजारेदारी अधिकार प्राप्त करने से यूरोपीय कंपनियों की शक्ति बढ़ती जा रही थी।

(2) इस कारण सूरत व हुगली दोनों पुराने बन्दरगाह कमजोर पड़ गए थे। इन बन्दरगाहों से होने वाले निर्यात में बहुत कमी आई। पहले जिस कर्जे से व्यापार चलता था, वह खत्म होने लगा। धीरे-धीरे स्थानीय बैंकर दिवालिया हो गए। 17वीं सदी के अन्त तक सूरत बन्दरगाह से होने वाले व्यापार का कुल मूल्य 1.6 करोड़ रुपये था, जो 1740 के दशक तक गिर कर केवल 30 लाख रुपये रह गया।

(3) अब मुम्बई व कोलकाता बन्दरगाहों की स्थिति सुदृढ़ हो गई। नये बन्दरगाहों के द्वारा होने वाला व्यापार यूरोपीय कंपनियों के नियंत्रण में था और यूरोपीय जहाजों के द्वारा होता था।

(4) अनेक पुराने व्यापारिक घराने नष्ट हो चुके थे। शेष बचे घरानों के पास भी यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के नियंत्रण वाले नेटवर्क में काम करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था।

प्रश्न 13. प्रथम विश्व युद्ध व उसके बाद भारत में औद्योगिक विकास को कैसे बढ़ावा मिला?

उत्तर— प्रथम विश्वयुद्ध ने भारत के औद्योगिक विकास को बहुत बढ़ावा दिया। ब्रिटिश कारखाने सेना की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए युद्ध सम्बन्धी उत्पादन में व्यस्त थे। इसलिए भारत में मैनचेस्टर के माल का आयात कम हो गया। परिणामस्वरूप भारतीय बाजारों को एक विशाल देशी बाजार मिल गया। युद्ध लम्बा खिंच जाने से भारतीय कारखानों में भी सेना के लिए जूट की बोरियाँ, सैनिकों के लिए वर्दी के कपड़े, टेंट तथा चमड़े के जूते, घोड़ों

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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 103

व खच्चरों की जीन तथा अनेक प्रकार के सामान बनने लगे। इनके निर्माण के लिए अनेक नये कारखाने लगाए गए तथा पुराने कारखाने कई पारियों में चलने लगे। कारखानों में मजदूरों को बड़ी संख्या में काम पर रखा गया और प्रत्येक को पहले से भी अधिक समय तक काम करना पड़ता था। अतः युद्ध के दौरान औद्योगिक उत्पादन तेजी से बढ़ा। युद्ध के बाद ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी। इससे ब्रिटेन से होने वाले सूती कपड़े के निर्यात में जबरदस्त गिरावट आई और भारत में विदेशी उत्पादों को हटाकर स्थानीय उद्योगपतियों ने घरेलू बाजारों पर कब्जा कर अपनी स्थिति मजबूत बना ली।

प्रश्न 14. ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को कैसे बर्बाद किया? समझाइए।

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)

उत्तर— ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को निम्न प्रकार बर्बाद किया-

(i) इंग्लैंड के उद्योगपतियों के दबाव में वहाँ की सरकार ने भारतीय कपड़े पर आयात शुल्क लगा दिया ताकि मैनचेस्टर में बने कपड़े बाहरी प्रतिस्पर्धा के बिना इंग्लैंड में सरलता से बिक सकें। दूसरी तरफ उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर भी दबाव डाला कि वह ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाजार में बेचे। इसके परिणामस्वरूप 1850 तक आते-आते ब्रिटिश सूती कपड़े का आयात भारत में 31 प्रतिशत हो गया जो 1870 तक बढ़कर 50 प्रतिशत से ऊपर चला गया।

(ii) ईस्ट इण्डिया कम्पनी की इस नीति से भारतीय सूती वस्त्रों का निर्यात ढह रहा था और स्थानीय बाजार भी सिकुड़ने लग गया।

(iii) कम लागत से मशीनों से बनने वाले आयातित कपड़े इतने सस्ते थे कि भारतीय बुनकर उनका मुकाबला नहीं कर सके।

(iv) भारतीय बुनकरों को अब अच्छी किस्म की कपास की प्राप्ति भी नहीं हो पा रही थी।

प्रश्न 15. औद्योगिक क्रांति के अन्तर्गत हुए आविष्कारों पर एक लेख लिखिए।

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)

उत्तर— औद्योगिक क्रांति के अन्तर्गत हुए आविष्कार- 18वीं और 19वीं शताब्दी में इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्रांति के अन्तर्गत निम्न प्रमुख आविष्कार हुए-

(1) स्टेपलर, फुलर्ज एवं कार्डिंग- 18वीं सदी में हुए इन आविष्कारों ने सूती वस्त्र उद्योग की उत्पादन प्रक्रिया (कार्डिंग, ऐंठना व कताई और लपेटने) के हर चरण की कुशलता बढ़ा दी।

(2) सूती मिल की रूपरेखा- रिचर्ड आर्कराइट ने सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा सामने रखी। कारखाने में सारी प्रक्रियायें एक छत के नीचे और एक मालिक के हाथ में आ गई थीं।

(3) स्पिनिंग जेनी- जेम्स हरग्रीव्ज द्वारा 1764 में बनाई गई इस मशीन ने कताई की प्रक्रिया तेज कर दी और मजदूरों की माँग घटा दी। एक ही पहिया घुमाने वाला एक मजदूर बहुत सारी तकलियों को घुमा देता था और एक साथ कई धागे बनने लगते थे।

(4) फ्लाइंग शटल- यह रस्सियों और पुलियों के जरिए चलने वाला एक यांत्रिक औजार है जिसे बुनाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है। फ्लाइंग शटल के आविष्कार से बुनकरों को बड़े करघे चलाने और चौड़े अरज का कपड़ा बनाने में मदद मिली।

● निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. भारतीय और ब्रिटिश निर्माताओं ने नये उपभोक्ता पैदा करने के लिए किन तरीकों को अपनाया? लिखिए।

उत्तर— भारतीय और ब्रिटिश निर्माताओं ने नये उपभोक्ता पैदा करने के लिए निम्नलिखित तरीकों को अपनाया-

1. विज्ञापन- बाजार के फैलाव व नये उपभोक्ताओं को अपने माल से जोड़ने के लिए उत्पादक समाचार पत्र-पत्रिकाओं, होर्डिंग्स आदि के माध्यम से विज्ञापन देते थे। इन विज्ञापनों ने उत्पादों को अतिआवश्यक और वांछनीय बना दिया था।

2. लेबल लगाना- जब मैनचेस्टर के उद्योगपतियों ने भारत में कपड़ा बेचना शुरू किया तो वे कपड़े के बण्डलों पर लेबल लगाते थे। लेबल लगाने का लाभ यह होता था कि खरीदारों को कम्पनी के नाम व उत्पादन की जगह का पता चल जाता था। लेबल ही चीजों की गुणवत्ता का प्रतीक भी था। जब किसी लेबल पर मोटे अक्षरों में 'मेड इन मैनचेस्टर' लिखा दिखाई देता तो खरीदारों को कपड़ा खरीदने में कोई डर नहीं रहता था।

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इन लेबलों पर भारतीय देवी-देवताओं की तस्वीरें प्रायः होती थीं। इन तस्वीरों के माध्यम से निर्माता यह दिखाने की कोशिश करते थे कि ईश्वर भी चाहता है कि लोग उसे खरीदें। इसके अतिरिक्त इन तस्वीरों का एक लाभ यह होता था कि विदेशों में बनी चीजें भी भारतीयों को जानी-पहचानी-सी लगती थीं।

3. कैलेंडर-निर्माता अपने उत्पादों को बेचने के लिए कैलेंडर अपनाने लगे थे, इससे उत्पाद निरक्षरों को भी प्रभावित करते थे। चाय की दुकानों, दफ्तरों व मध्यमवर्गीय घरों में ये कैलेंडर लटके रहते थे, जिन्हें लोग हर रोज, पूरे साल देखते थे। इन कैलेंडरों में भी नये उत्पादों को बेचने के लिए देवी-देवताओं के चित्र प्रस्तुत किए जाते थे।

4. महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के चित्र-देवी-देवताओं के चित्रों के साथ-साथ महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों, सम्राटों, नवाबों के चित्र विज्ञापनों में प्रयोग किए जाते थे, जो गुणवत्ता के प्रमाण होते थे।

प्रश्न 2. इंग्लैंड में कारखानों का उदय कब हुआ? इससे उत्पादन प्रक्रिया में क्या परिवर्तन हुए?

(प्रश्न बैंक)

उत्तर-इंग्लैंड में कारखानों का उदय-इंग्लैंड में सर्वप्रथम 1730 के दशक में कारखाने खुले। परन्तु उनकी संख्या में तीव्र गति से वृद्धि अठारहवीं सदी के अन्त में ही हुई।

उत्पादन-प्रक्रिया में परिवर्तन-इस वृद्धि से उत्पादन-प्रक्रिया में निम्नलिखित परिवर्तन हुए-

(1) नवीन आविष्कार-अठारहवीं सदी में अनेक ऐसे आविष्कार हुए जिन्होंने उत्पादन प्रक्रिया (कार्डिंग, ऐंठना व कताई, लपेटने) के प्रत्येक चरण की कुशलता बढ़ा दी। प्रति मजदूर उत्पादन बढ़ गया और पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ धागों एवं रेशों का उत्पादन होने लगा। इसके बाद रिचर्ड आर्कराइट ने सूती कपड़ा मिल की रूपरेखा प्रस्तुत की।

(2) महंगी नई मशीनों को कारखानों में लगाना-अभी तक उत्पादन पूरे देहात में फैला हुआ था। यह काम लोग अपने-अपने घर पर ही करते थे। लेकिन अब महंगी नई मशीनें खरीद कर उन्हें कारखानों में लगाया जा सकता था।

(3) उत्पादन प्रक्रिया पर निगरानी-अब कारखाने में समस्त प्रक्रियाएँ एक छत के नीचे और एक मालिक के हाथों में आ गई थीं। इसके फलस्वरूप उत्पादन-प्रक्रिया पर निगरानी रखना, गुणवत्ता का ध्यान रखना और मजदूरों के काम पर नजर रखना सम्भव हो गया था। जब तक उत्पादन गाँवों में हो रहा था, तब तक ये बातें सम्भव नहीं थीं।

(4) विशाल कारखानों की स्थापना-उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में कारखाने इंग्लैंड के अभिन्न अंग बन गए थे। ये नए कारखाने बहुत विशाल थे तथा नयी प्रौद्योगिकी की ताकत इतनी जादुई दिखाई देती थी कि लोगों का ध्यान कारखानों पर टिका रह जाता था।

प्रश्न 3. औद्योगीकरण की प्रक्रिया कितनी तेज थी? क्या औद्योगीकरण का अर्थ केवल फैक्ट्री उद्योगों के विकास तक ही सीमित होता है?

अथवा

"अब इतिहासकार इस बात को मानने लगे हैं कि उन्नीसवीं सदी के मध्य का औसत मजदूर मशीनों पर काम करने वाला नहीं, बल्कि परम्परागत कारीगर और मजदूर ही होता था।" व्याख्या कीजिए।

उत्तर-औद्योगीकरण की प्रक्रिया-उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में औद्योगीकरण की गति धीमी थी। इसलिए इतिहासकारों का मानना है कि उन्नीसवीं सदी के मध्य का औसत मजदूर मशीनों पर काम करने वाला नहीं, बल्कि परम्परागत कारीगर और मजदूर ही था। साथ ही औद्योगीकरण का अर्थ केवल फैक्ट्री उद्योगों के विकास तक ही सीमित नहीं होता है। इस तथ्य की पुष्टि निम्नलिखित उदाहरणों से होती है-

(1) सूती उद्योग, कपास उद्योग का विकास-सूती उद्योग और कपास उद्योग ब्रिटेन के सबसे अधिक विकसित उद्योग थे। कपास उद्योग का तीव्र गति से विकास हो रहा था और यह उद्योग 1840 के दशक तक औद्योगीकरण के पहले चरण में सबसे बड़ा उद्योग बन चुका था। इसके बाद उपनिवेशों में रेलवे का विस्तार होने के कारण लौहा और स्टील की माँग तेजी से बढ़ी और 1860 के दशक में यह उद्योग कपास उद्योग से आगे निकल गया।

(2) परम्परागत उद्योगों का महत्त्व-नये उद्योग परम्परागत उद्योगों को इतनी सरलता से पीछे नहीं धकेल सकते थे। अब भी परम्परागत उद्योगों का महत्त्व बना हुआ था। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में भी तकनीकी रूप से विकसित औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों की संख्या कुल मजदूरों में 20 प्रतिशत से अधिक नहीं थी। यद्यपि वस्त्र उद्योग एक गतिशील उद्योग था, परन्तु उसका अधिकतर उत्पादन कारखानों में न होकर घरेलू इकाइयों में होता था।

(3) परम्परागत उद्योगों की उन्नति-परम्परागत उद्योग पूरी तरह गतिहीन नहीं थे। खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण, पॉटरी, कांच उद्योग, चर्म शोधन, फर्नीचर और औजारों के उत्पाद जैसे अनेक गैर-मशीनी क्षेत्रों में उन्नति हो रही थी।

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(4) प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों की धीमी गति-प्रौद्योगिकीय परिवर्तन की गति धीमी थी। इसका कारण यह था कि नई तकनीक महंगी थी। सौदागर एवं व्यापारी बड़ी सावधानीपूर्वक उसका प्रयोग करने के पक्ष में थे। मशीनें अक्सर खराब हो जाती थीं और उनकी मरम्मत पर काफी खर्च आता था। वे उतनी अच्छी भी नहीं थीं जितना उनके आविष्कारकों और निर्माताओं ने दावा किया था।

प्रश्न 4. औद्योगीकरण से भारतीय सूती वस्त्र उद्योग में क्या बदलाव आए? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— औद्योगीकरण से पूर्व विदेशों में भारतीय सूती वस्त्र अपनी गुणवत्ता के कारण बहुत प्रचलित थे क्योंकि दुनिया के किसी भी देश में इतना अच्छा माल नहीं बनता था। परन्तु औद्योगीकरण के बाद के समय में (उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में) भारतीय कपड़े के निर्यात में गिरावट आने लगी जो लम्बे समय तक जारी रही। 1811-12 में सूती माल का हिस्सा कुल निर्यात में 33 प्रतिशत था। 1850-51 में यह मात्र 3 प्रतिशत रह गया था। औद्योगीकरण के बाद इंग्लैण्ड में कपास उद्योग विकसित होने पर वहां के उद्योगपति अन्य देशों के आयात से खुश नहीं थे फलस्वरूप उन्होंने सरकार पर अन्य देशों के आयात पर रोक लगाने का दबाव डाला तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाजार में बेचने का दबाव डाला। इस प्रकार हम देखते हैं कि 19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटेन के वस्त्र उत्पादों के निर्यात में नाटकीय वृद्धि हुई। 18वीं सदी के आखिर में भारत में उत्पादों का नहीं के बराबर निर्यात होता था। 1850 तक सूती वस्त्र का आयात भारतीय आयात में 31 प्रतिशत था जो 1870 तक 50 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गया। अतः निष्कर्षस्वरूप हम यह कह सकते हैं कि औद्योगीकरण से भारतीय सूती वस्त्र उद्योगों में गिरावट आई।

प्रश्न 5. औद्योगीकरण के दौरान परम्परागत उद्योगों व औद्योगीकरण की प्रक्रिया पर टिप्पणी लिखिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— औद्योगीकरण के दौरान परम्परागत उद्योग-औद्योगीकरण के कारण कपास उद्योग तथा लोहा और स्टील उद्योग तेज गति से बढ़े। हालाँकि नए उद्योग परम्परागत उद्योगों को आसानी से हाशिए पर नहीं ढकेल पाए। 19वीं सदी के आखिर में भी तकनीक रूप से विकसित औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की संख्या कुल मजदूरों में बीस प्रतिशत से ज्यादा नहीं थी। कपड़ा उद्योग एक गतिशील उद्योग था परन्तु इसके उत्पादन का बड़ा हिस्सा कारखानों के बदले घरेलू इकाइयों में होता था। परम्परागत उद्योगों में परिवर्तन की गति भाप से चलने वाले सूती और धातु उद्योगों से तय नहीं हो रही थी लेकिन ये परम्परागत उद्योग पूरी तरह से ठहरे नहीं थे।

औद्योगीकरण की प्रक्रिया-औद्योगीकरण के दौरान सूती उद्योग और कपास उद्योग ब्रिटेन में सबसे तेज गति से बढ़े। 1840 के दशक तक कपास उद्योग ब्रिटेन में सबसे बड़ा उद्योग बन चुका था। बाद के वर्षों में लोहा और स्टील उद्योग आगे निकल गए। 1873 तक ब्रिटेन के लोहा और स्टील निर्यात का मूल्य इंग्लैण्ड के निर्यात मूल्य का दोगुना हो गया था। औद्योगीकरण की प्रक्रिया के कारण कई गैर मशीनी क्षेत्रों जैसे-खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण, पॉटरी, चर्मशोधन, काँच के काम, फर्नीचर तथा औजारों के उत्पादन अस्तित्व में आए।

प्रश्न 6. औद्योगीकरण से भारतीय अर्थव्यवस्था में आये परिवर्तन लिखिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— औद्योगीकरण से भारतीय अर्थव्यवस्था में सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों परिवर्तन आए।

औद्योगीकरण का नकारात्मक परिवर्तन-औद्योगीकरण का सबसे बड़ा प्रभाव भारतीय सूती तथा वस्त्र उद्योग पर पड़ा। ब्रिटेन में कपास का उत्पादन बढ़ने से वहां भारतीय कपास का आयात कम हो गया। भारतीय बाजार में ब्रिटेन द्वारा निर्यात कपड़ों की भरमार हो गई; फलतः भारतीय कपड़ों की बिक्री कम हो गई। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव बुनकरों पर भी पड़ा। उनकी आय का स्रोत बन्द होने के कगार पर आ गया।

औद्योगीकरण का सकारात्मक परिवर्तन-जिस प्रकार भारतीय सूती तथा वस्त्र उद्योग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा उसी प्रकार सकारात्मक प्रभाव भी पड़ा। औद्योगीकरण के फलस्वरूप भारत में फैक्ट्रियों का आगमन हुआ। भारत में बम्बई में पहली कपड़ा मिल 1854 में लगी तथा 1862 तक इनकी संख्या चार हो गई। बंगाल में 1855 में पहली तथा 1862 में दूसरी जूट मिल की स्थापना की गई। 1860 के दशक में कानपुर में तथा 1861 में अहमदाबाद में पहली कपड़ा मिल शुरू की गई। मद्रास में 1874 में पहली कताई तथा बुनाई मिल शुरू की गई। देश के विभिन्न भागों में विभिन्न प्रकार के उद्योगों की स्थापना की जा रही थी।

प्रश्न 7. मशीन उद्योगों के युग से पहले अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाजार में भारतीय वस्त्र उत्पादों की क्या स्थिति थी?

उत्तर— मशीन उद्योगों के युग से पहले भारतीय वस्त्र उत्पादों की स्थिति-मशीन उद्योगों के युग से पहले भारत के वस्त्र उत्पादों की स्थिति का विवेचन अग्रलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है-

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(1) अन्तर्राष्ट्रीय कपड़ा बाजार में भारतीय वस्त्र उत्पादों का दबदबा-मशीन उद्योगों के युग से पहले अन्तर्राष्ट्रीय कपड़ा बाजार में भारत के रेशमी एवं सूती कपड़ों का ही दबदबा था क्योंकि भारत में पैदा होने वाला कपास बारीक किस्म का था।

(2) भारतीय कपड़े का निर्यात-आर्मेनियन तथा फारसी व्यापारी पंजाब से अफगानिस्तान, पूर्वी फारस और मध्य एशिया के मार्गों से यहाँ का सामान ले जाते थे। यहाँ का बना महीन कपड़ा ऊँटों की पीठ पर लाद कर पश्चिमोत्तर सीमा से पहाड़ी दरों और रेगिस्तानों के पार ले जाया जाता था। प्रमुख पूर्व औपनिवेशिक बन्दरगाहों सूरत तथा हुगली से समुद्री व्यापार होता था जो काफी विकसित था।

(3) भारतीय व्यापारियों तथा बैंकों की भूमिका-निर्यात व्यापार के इस जाल में अनेक भारतीय व्यापारी तथा बैंकर सक्रिय थे। वे उत्पादन में पैसा लगाते थे, सामान को लेकर जाते थे तथा उसे निर्यातकों को पहुँचाते थे। माल भेजने वाले आपूर्ति सौदागरों के द्वारा बन्दरगाह, नगर, देश के भीतरी प्रदेशों से जुड़े हुए थे। ये सौदागर बुनकरों को पेशगी देते थे, उनसे तैयार कपड़ा खरीदते थे तथा उसे बन्दरगाहों तक पहुँचाते थे। बन्दरगाहों पर जहाजों के मालिक और निर्यात-व्यापारियों के दलाल कीमत पर मोल-भाव करते थे तथा आपूर्ति सौदागरों से माल खरीद लेते थे।

प्रश्न 8. यूरोपीय प्रबन्धकीय एजेन्सियों द्वारा भारतीय उद्योगों पर किस प्रकार नियन्त्रण स्थापित किया गया?

उत्तर-यूरोपीय प्रबन्धकीय एजेन्सियों द्वारा भारतीय उद्योगों पर नियन्त्रण स्थापित करना-भारतीय व्यापार पर औपनिवेशिक देशों के नियन्त्रण स्थापित होने के बाद भारतीय व्यवसायियों के लिए व्यापार का क्षेत्र सीमित होता गया। भारतीय व्यवसायियों के लिए अपना तैयार माल यूरोप में बेचना निषिद्ध कर दिया गया। अब वे मुख्य रूप से कच्चे माल और अनाज, कच्ची कपास, अफीम, गेहूं और नील का ही निर्यात कर सकते थे क्योंकि अंग्रेजों को इन वस्तुओं की आवश्यकता थी। धीरे-धीरे जहाजरानी व्यवसाय का द्वार भी उनके लिए बन्द कर दिया था।

प्रथम विश्व युद्ध तक यूरोपीय प्रबन्धकीय एजेन्सियों का भारतीय उद्योगों के विशाल क्षेत्र पर नियन्त्रण स्थापित था। इनमें हीगलर्स एंड कम्पनी, एन्ड्रयू यूल और जार्डिन स्किनर एंड कम्पनी सबसे बड़ी कम्पनियाँ थीं। ये एजेन्सियाँ पूँजी की व्यवस्था करती थीं, संयुक्त उद्यम कम्पनियाँ स्थापित करती थीं तथा उनका प्रबन्धन सम्भालती थीं। अधिकांश मामलों में भारतीय वित्तपोषक पूँजी उपलब्ध कराते थे, जबकि निवेश और व्यवसाय से सम्बन्धित निर्णय यूरोपीय एजेन्सियाँ लेती थीं। यूरोपीय व्यापारियों-उद्योगपतियों के अपने वाणिज्यिक परिसंघ थे, जिनमें भारतीय व्यवसायियों को सम्मिलित नहीं किया जाता था।

प्रश्न 9. "प्रथम विश्व युद्ध के बाद भी भारत में लघु उद्योगों की बहुलता थी।" व्याख्या कीजिए।

अथवा

प्रथम विश्व युद्ध के बाद भी भारत में लघु उद्योगों की बहुलता के क्या कारण थे?

उत्तर-प्रथम विश्व युद्ध के बाद भी भारत में लघु उद्योगों की बहुलता-यद्यपि प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् फैक्टरी उद्योगों में निरन्तर वृद्धि हुई। अधिकांश उद्योग बंगाल और मुम्बई में स्थित थे। शेष सम्पूर्ण भारत में छोटे स्तर के उद्योग ही थे। पंजीकृत फैक्ट्रियों में कुल औद्योगिक श्रम-शक्ति का एक बहुत छोटा भाग ही काम करता था। यह संख्या 1911 में 5 प्रतिशत तथा 1931 में 10 प्रतिशत थी। शेष मजदूर गली-मोहल्लों में स्थित छोटी-छोटी वर्कशाप तथा घरेलू इकाइयों में काम करते थे।

लघु उद्योगों की बहुलता के कारण-लघु उद्योगों की बहुलता के निम्नलिखित कारण थे-

(1) तकनीकी परिवर्तन-लघु उद्योगों की बहुलता के पीछे आंशिक रूप से तकनीकी परिवर्तनों का हाथ था। यदि लागत में बहुत अधिक वृद्धि न हो और उत्पादन बढ़ सकता हो, तो हाथ से काम करने वालों को नई तकनीक अपनाने में कोई संकोच नहीं होता। इसलिए, बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक बुनकर 'फ्लाई शटल' वाले करघों का प्रयोग करते थे। इससे कामगारों की क्षमता बढ़ी, उत्पादन में वृद्धि हुई और श्रम की माँग में कमी आई। 1941 तक भारत में 35 प्रतिशत से अधिक हथकरघों में फ्लाई शटल लगे होते थे। त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचीन, बंगाल आदि प्रदेशों में तो 70-80 प्रतिशत करघे फ्लाई शटल वाले थे।

(2) छोटे-छोटे सुधार-इसके अतिरिक्त भी अनेक छोटे-छोटे सुधार किए गए जिनसे बुनकरों को अपनी उत्पादकता बढ़ाने तथा मिलों से मुकाबला करने में सहायता मिली। मिलों के साथ प्रतिस्पर्धा का मुकाबला कर पाने के मामले में वे बुनकर औरों से बेहतर स्थिति में थे जो महीन किस्म के कपड़े बुनते थे। बेहतर (महीन) किस्म के कपड़े

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की माँग खाते-पीते तबके में ज्यादा थी। उसमें उतार-चढ़ाव कम आते थे। मिल विशेष प्रकार की बुनाई की नकल नहीं कर सकते थे।

प्रश्न 10. प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में लघु उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा? विस्तार से वर्णन कीजिए।

(प्रश्न बैंक)

उत्तर— प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में लघु उद्योगों पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। इस युद्ध ने भारतीय अर्थव्यवस्था में नए अवसर उत्पन्न किए और लघु उद्योगों के विकास को बढ़ावा दिया। यथा-

(i) ब्रिटिश वस्तुओं की आपूर्ति में गिरावट— ब्रिटिश कारखाने युद्ध की जरूरतों को पूरा करने में व्यस्त थे, जिससे भारत में मैनचेस्टर के माल का आयात कम हो गया। इसने भारत में कपास जैसे घरेलू विनिर्माण क्षेत्रों को फायदा पहुँचाया तथा भारतीयों को रातों-रात एक बहुत बड़ा स्थानीय बाजार मिल गया।

(ii) नए उद्योगों का उदय— युद्ध के कारण औद्योगिक वस्तुओं की माँग बढ़ी, जिसके कारण भारत में कई नए उद्योगों की स्थापना हुई। इन उद्योगों ने भारतीय अर्थव्यवस्था में नए आयाम जोड़े और रोजगार के अवसर प्रदान किए। बहुत सारे नए मजदूरों को काम पर रखा गया।

(iii) कपास उद्योग का विकास— कपास उद्योग भारत में सबसे महत्वपूर्ण उद्योगों में से एक बन गया। इस उद्योग ने भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया और रोजगार के अवसर प्रदान किए। कपास मिलों की स्थापना ने भारतीय कपास उद्योग को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया।

(iv) स्वदेशी आंदोलनों का प्रभाव— स्वदेशी आंदोलनों ने भारतीय उद्योगों को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन आंदोलनों ने भारतीयों को विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने और स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया। इससे भारतीय उद्योगों को बढ़ावा मिला और रोजगार के अवसर पैदा हुए।

इस प्रकार, प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में लघु उद्योगों पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। ब्रिटिश वस्तुओं की आपूर्ति में गिरावट, नए उद्योगों का उदय, कपास उद्योग का विकास और स्वदेशी आंदोलनों का प्रभाव आदि ने भारतीय अर्थव्यवस्था में नए आयाम जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 11. औद्योगीकरण से आप क्या समझते हैं? विस्तार से व्याख्या कीजिए।

(प्रश्न बैंक)

उत्तर— औद्योगीकरण— औद्योगीकरण का अर्थ है समाज को कृषि अर्थव्यवस्था से औद्योगिक अर्थव्यवस्था में बदलना। यह एक सामाजिक एवं आर्थिक प्रक्रिया है। मनुष्य आखेट, पशुपालन व मछली पकड़ने से लेकर धीरे-धीरे औद्योगिक युग तक पहुँच गया है। अतः औद्योगीकरण उद्योगों के विकास की एक प्रक्रिया है, जिसमें बड़े पैमाने पर उद्योग लगाए जाते हैं तथा हाथ से किया जाने वाला कार्य एवं उत्पादन मशीनों से किया जाने लगता है।

औद्योगीकरण में मुख्यतः निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं-

(i) औद्योगीकरण उत्पादन की एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसका विकास धीरे-धीरे होता है।

(ii) औद्योगीकरण के कारण देश में नए-नए उद्योगों की स्थापना की जाती है।

(iii) औद्योगीकरण मानवीय शक्ति की अपेक्षा मशीनी शक्ति पर बल देता है।

(iv) औद्योगीकरण के अन्तर्गत मशीनों का संचालन कोयला, खनिज तेल और विद्युत शक्ति द्वारा किया जाता है।

(v) औद्योगीकरण के अन्तर्गत श्रम-विभाजन एवं विशिष्टीकरण किया जाता है।

(vi) औद्योगीकरण तीव्र गति से सस्ते एवं बृहद् पैमाने पर उत्पादन को बदल देता है।

(vii) औद्योगीकरण नवीनतम वैज्ञानिक विधियों एवं उत्पादन की नवीनतम तकनीक के प्रयोग पर बल देता है।

(viii) औद्योगीकरण प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम एवं योजनाबद्ध दोहन पर बल देता है।

(ix) औद्योगीकरण के कारण प्रति व्यक्ति आय और राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है, जो कि देश के आर्थिक विकास को स्पष्ट करता है।

(x) औद्योगीकरण देश के सामाजिक और आर्थिक ढाँचे में विकास करता है।

(xi) औद्योगीकरण के कारण वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित होता है और प्राचीन मान्यतायें समाप्त हो जाती हैं।

(xii) औद्योगीकरण का क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय बाजार होता है, अतएव इससे अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध भी विकसित होते हैं।

निष्कर्षतः कह सकते हैं कि औद्योगीकरण के कारण व्यापार एवं उद्योगों में भारी वृद्धि होती है, जिससे देश का समूचा विनिर्माण, उद्योग क्षेत्र तथा अर्थव्यवस्था का परिवेश परिवर्तित हो जाता है।

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