📖 1. समाधान: पाठगत एवं पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नोत्तर
राजस्थान बोर्ड कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान (इतिहास) — सभी पाठगत प्रश्नों एवं पाठ्यपुस्तक अभ्यास के संपूर्ण सटीक उत्तर।
पाठगत प्रश्न
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प्रश्न 1. कल्पना कीजिए आप मार्कोपोलो हैं। चीन में आपने प्रिंट का कैसा संसार देखा, यह बताते हुए एक चिट्ठी लिखिए।
उत्तर— चीन में प्रिंट के संसार को देखकर मैं मार्कोपोलो, निम्नलिखित प्रकार से चिट्ठी लिखूंगा-
विश्व में मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन में विकसित हुई। यह छपाई हाथ से होती थी। लगभग 594 ई. से चीन में स्याही लगे काठ के ब्लाक या तख्ती पर कागज को रगड़कर पुस्तकें छापी जाने लगी थीं। इस तकनीक के अन्तर्गत पतले, छिद्रित कागज के दोनों ओर छपाई सम्भव नहीं थी। इसलिए पारम्परिक चीनी पुस्तक 'एकार्डियन' शैली में, किनारों को मोड़ने के बाद सिलकर बनाई जाती थी। इन पुस्तकों पर सुलेखन कार्य भी किया जाता था।
चर्चा करें-पृष्ठ 113
प्रश्न 2. छपाई से विरोधी विचारों के प्रसार को किस तरह बल मिलता था? संक्षेप में लिखें।
उत्तर— छापेखाने के आविष्कार से विचारों के व्यापक प्रचार-प्रसार और वाद-विवाद को प्रोत्साहन मिला। छापे हुए लोकप्रिय साहित्य के बल पर कम शिक्षित लोग तथा आम जनता धर्म तथा अन्य विषयों की अलग-अलग व्याख्या से परिचित होने लगी। स्थापित सत्ता के विचारों से असहमत होने वाले लोग भी अब अपने विचारों को छापकर उन्हें फैला सकते थे। इस तरह विरोधी विचारों के प्रसार को बल मिलता था।
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प्रश्न 3. कुछ इतिहासकार ऐसा क्यों मानते हैं कि मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए जमीन तैयार की?
उत्तर— [नोट-इसके उत्तर के लिए अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नों में निबन्धात्मक प्रश्न संख्या 5 का उत्तर देखें।]
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प्रश्न 4. चित्र 13 ( पाठ्यपुस्तक में ) को देखें। ऐसे विज्ञापनों का लोगों के मन पर क्या असर पड़ता होगा? क्या आपको लगता है कि छपी हुई चीज को देखकर हर व्यक्ति की एक जैसी प्रतिक्रिया होती है?
उत्तर— पाठ्यपुस्तक के चित्र 13 में इंग्लैंड के एक रेलवे स्टेशन पर लगे विज्ञापन और सूचनाएं दर्शाए गए हैं। ऐसे विज्ञापनों का लोगों के मन पर बहुत असर पड़ता होगा। लोग इसमें प्रदर्शित वस्तुओं को खरीदने हेतु प्रेरित होते होंगे।
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नहीं, हमें नहीं लगता कि छपी हुई चीज को देखकर हर व्यक्ति की एक जैसी प्रतिक्रिया होती है। कुछ लोग इन चीजों को स्वीकारते हैं तो कुछ लोग इन चीजों को नकारते हैं। लोग चीजों को अपने-अपने तरीके से व्याख्या भी करते हैं।
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पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
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संक्षेप में लिखें-
प्रश्न 1. निम्नलिखित के कारण दें-
(क) वुड ब्लॉक प्रिंट या तख्ती की छपाई यूरोप में 1295 के बाद आई।
(ख) मार्टिन लूथर मुद्रण के पक्ष में था और उसने इसकी खुलेआम प्रशंसा की।
(ग) रोमन कैथोलिक चर्च ने सोलहवीं सदी के मध्य से प्रतिबन्धित किताबों की सूची रखनी शुरू कर दी।
(घ) महात्मा गाँधी ने कहा कि स्वराज की लड़ाई दरअसल अभिव्यक्ति, प्रेस और सामूहिकता के लिए लड़ाई है।
उत्तर—
(क) वुड ब्लॉक प्रिंट या तख्ती की छपाई यूरोप में 1295 के बाद आई-वुड ब्लॉक प्रिंट या काठ की तख्ती वाली छपाई की तकनीक चीन में विद्यमान थी। मार्कोपोलो नामक एक महान खोजी यात्री चीन में काफी समय तक रहा। 1295 ई. में वह वापस इटली लौटा। वह अपने साथ तख्ती की छपाई की तकनीक लाया। अतः 1295 के बाद यूरोप में भी वुड ब्लॉक प्रिंट की तकनीक अपनाई जाने लगी।
(ख) मार्टिन लूथर मुद्रण के पक्ष में था और उसने इसकी खुलेआम प्रशंसा की-मार्टिन लूथर मुद्रण के पक्ष में था। उसने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी 95 स्थापनाएँ लिखीं। इसकी एक छपी हुई प्रति विटेनबर्ग के गिरजाघर के दरवाजे पर टांगी गई। इसमें मार्टिन लूथर ने चर्च को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी थी। जल्दी ही लूथर के लेख बड़ी संख्या में छापे गए। बहुत सारे लोगों ने इन लेखों को पढ़ा। इसके परिणामस्वरूप कैथोलिक चर्च का विभाजन हो गया और प्रोटेस्टेंट धर्म सुधार आन्दोलन का सूत्रपात हुआ। मार्टिन लूथर द्वारा किए गए न्यू टेस्टामेंट के अनुवाद की 5000 प्रतियाँ कुछ ही सप्ताहों में बिक गईं और तीन महीने के अन्दर ही उसका दूसरा संस्करण निकालना पड़ा।
मुद्रण के प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हुए मार्टिन लूथर ने कहा था, "मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा उपहार है।"
(ग) रोमन कैथोलिक चर्च ने सोलहवीं सदी के मध्य से प्रतिबन्धित किताबों की सूची रखनी शुरू कर दी-छपे हुए लोकप्रिय साहित्य के बल पर कम शिक्षित लोग धर्म की अलग-अलग व्याख्याओं से परिचित हुए। 16वीं सदी की इटली के एक किसान मेनोकियो ने अपने क्षेत्र में उपलब्ध पुस्तकों का अध्ययन किया और उन पुस्तकों के आधार पर उसने बाइबिल के नये अर्थ लगाने शुरू कर दिए। उसने ईश्वर और सृष्टि के बारे में ऐसे विचार व्यक्त किये जिनसे रोमन कैथोलिक चर्च क्रुद्ध हो गया। अतः ऐसे धर्म-विरोधी विचारों को दबाने के लिए रोमन चर्च ने इन्क्वीजीशन नामक धर्म अदालत की स्थापना की। इन्क्वीजीशन ने अनेक धर्म-विरोधियों को कठोर दण्ड दिये। मेनोकियो को भी मृत्यु-दण्ड दिया गया। धर्म पर ऐसे पाठ और उस पर उठाए जा रहे सवालों से परेशान रोमन चर्च ने प्रकाशकों तथा पुस्तक विक्रेताओं पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध लगा दिए और 1558 ई. से प्रतिबन्धित पुस्तकों की सूची आरम्भ कर दी।
(घ) महात्मा गाँधी ने कहा कि स्वराज की लड़ाई दरअसल अभिव्यक्ति, प्रेस और सामूहिकता के लिए लड़ाई है-1922 में गाँधीजी ने कहा था कि वाणी की स्वतन्त्रता, प्रेस की स्वतन्त्रता, सामूहिकता की स्वतन्त्रता स्वराज के लिए अनिवार्य तत्व हैं। उनका कहना था कि स्वराज की लड़ाई दरअसल अभिव्यक्ति, प्रेस और सामूहिकता की स्वतन्त्रता के लिए लड़ाई है। भारत सरकार अब जनमत को व्यक्त करने और बचाने के इन तीन शक्तिशाली उपकरणों को दबाने का प्रयास कर रही है। स्वराज की लड़ाई सबसे पहले तो इन संकटग्रस्त स्वतन्त्रताओं की लड़ाई है।
प्रश्न 2. छोटी टिप्पणी में इनके बारे में बताएँ-
(क) गुटेन्बर्ग प्रेस
(ख) छपी किताब को लेकर ईरैस्मस के विचार
(ग) वर्नाक्युलर या देशी प्रेस एक्ट।
उत्तर—
(क) गुटेन्बर्ग प्रेस-योहान गुटेन्बर्ग ने 1448 में एक प्रिंटिंग मशीन का मॉडल बनाया जिसे बाद में गुटेन्बर्ग प्रेस कहा गया। इसमें गुटेन्बर्ग ने मुद्रण के क्षेत्र में नए आविष्कार किए। इस प्रेस में स्क्रू से लगा एक हैंडल
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होता था। हैंडल की मदद से स्क्रू घुमाकर प्लाटेन को गीले कागज़ पर दबा दिया जाता था। गुटेन्बर्ग ने रोमन वर्णमाला के तमाम 26 अक्षरों के लिए टाइप बनाए। इसमें यह प्रयास किया गया कि इन्हें इधर-उधर 'मूव' कराकर या घुमाकर शब्द बनाए जा सकें। यही कारण है कि इसे 'मूवेबल टाइप प्रिंटिंग मशीन' के नाम से जाना गया और अगले 300 सालों तक यही छपाई की बुनियादी तकनीक रही।
(ख) छपी किताब को लेकर इरास्मस के विचार—इरास्मस एक प्रसिद्ध कैथोलिक धर्मसुधारक था। वह लातिन का प्रसिद्ध विद्वान था। उसने कैथोलिक धर्म में व्याप्त कुरीतियों, भ्रष्टाचार तथा निरंकुशवादी प्रवृत्तियों की कटु आलोचना की और प्रोटेस्टेंट धर्म सुधार आन्दोलन के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
छपी किताबों को लेकर इरास्मस बहुत आशंकित था। उसने 1508 में एडेजेज में प्रिंट के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा था कि पुस्तकें भिनभिनाती मक्खियों की भाँति हैं, जो दुनिया के हर कोने में पहुँच जाती हैं। यद्यपि कुछ पुस्तकें जानने योग्य कोई एकाध बात ही बताती हैं, परन्तु उनका अधिकांश हिस्सा तो विद्वता के लिए हानिकारक ही है। इरास्मस के अनुसार छपी पुस्तकें बेकार ढेर हैं क्योंकि अच्छी चीजों की अति भी हानिकारक ही है। अतः इन पुस्तकों से दूर ही रहना चाहिए। मुद्रक लोग बकवास, मूर्खतापूर्ण, सनसनीखेज, धर्म-विरोधी, अज्ञानतापूर्ण और षड्यन्त्रकारी पुस्तकें छापते हैं। इन पुस्तकों की संख्या इतनी अधिक है कि मूल्यवान और उपयोगी साहित्य का मूल्य नहीं रह गया है।
(ग) वर्नाक्यूलर या देशी प्रेस एक्ट—आयरिश प्रेस कानून की तर्ज पर 1878 ई. में लॉर्ड लिटन ने वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट लागू किया। इससे सरकार को देशी भाषाओं के समाचार-पत्रों में छपी रपट तथा सम्पादकीय को सेंसर करने का व्यापक अधिकार मिल गया।
अब से सरकार ने विभिन्न प्रदेशों से छपने वाले भाषाई अखबारों पर नियमित नजर रखनी शुरू कर दी। सेंसर के तहत यदि किसी रिपोर्ट को सरकार-विरोधी माना जाता था, तो पहले उस समाचार-पत्र को चेतावनी दी जाती थी। यदि उस चेतावनी पर उचित ध्यान नहीं दिया जाता था, तो उस समाचार-पत्र को जब्त किया जा सकता था और छपाई की मशीनों को छीना जा सकता था।
प्रश्न 3. उन्नीसवीं सदी में भारत में मुद्रण-संस्कृति के प्रसार का इनके लिए क्या मतलब था-
(क) महिलाएँ (ख) गरीब जनता (ग) सुधारक।
उत्तर—(क) उन्नीसवीं सदी में भारत में मुद्रण-संस्कृति के प्रसार का महिलाओं के लिए अभिप्राय-
(i) उन्नीसवीं सदी में छपी हुई पुस्तकों में महिलाओं के जीवन तथा उनकी भावनाओं को स्पष्टता तथा गहनता से व्यक्त किया जाने लगा।
(ii) मध्यवर्गीय परिवारों में महिलाओं का पढ़ना भी पहले से बहुत ज्यादा हो गया। वे घरों में पढ़ायी जाने लगीं। उन्नीसवीं सदी के मध्य में छोटे-बड़े शहरों में स्कूल खुलने लगे, तो उदारवादी माता-पिता पुत्रियों को स्कूलों में भेजने लगे।
(iii) कई स्त्रियाँ पत्रिकाओं के रूप में काम करने लगीं। पत्रिकाओं ने नारी-शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया।
(iv) हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों सम्प्रदायों की महिलाओं में जागरूकता आई।
(v) अनेक महिलाओं ने महिलाओं की दयनीय स्थिति पर लिखा तथा महिलाओं की शिक्षा, विधवा जीवन, विधवा-विवाह जैसे विषयों पर लेख लिखे गए। महिलाओं के द्वारा लिखी जा रही आपबीती के प्रति महिलाओं में कौतूहल था। उर्दू, तमिल, बंगाली और मराठी प्रिंट संस्कृति पहले विकसित हो गई थी, पर गम्भीर हिन्दी छपाई की शुरुआत 1870 के दशक से शुरू हुई और जल्दी ही इसका एक बड़ा हिस्सा नारी-शिक्षण को समर्पित हुआ।
(ख) मुद्रण संस्कृति के प्रसार का गरीब जनता के लिए अभिप्राय— गरीब जनता की पहुँच से किताबें बहुत दूर थीं, क्योंकि उनका मूल्य अत्यधिक होता था। किन्तु मुद्रण संस्कृति के प्रसार के कारण बड़े पैमाने पर पुस्तकें छपने लगीं। उन्नीसवीं शताब्दी में शहरों में पुस्तकें इतनी सस्ती हो गई थीं कि चौक-चौराहों पर बिकने लगी थीं। इसके परिणामस्वरूप गरीब लोग भी इन्हें सरलता से खरीद सकते थे। बीसवीं सदी के आरम्भ से शहरों और कस्बों में सार्वजनिक पुस्तकालय खुलने लगे थे जहाँ गरीब लोग भी जाकर पुस्तकें पढ़ सकते थे।
(ग) मुद्रण संस्कृति के प्रसार का सुधारकों के लिए अभिप्राय— समाज-सुधारकों ने छपी हुई पुस्तकों के माध्यम से समाज में फैली हुई कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। उन्होंने जाति प्रथा, ऊँच-नीच, छुआछूत आदि का प्रबल विरोध किया और शिक्षा, सामाजिक समानता, शिक्षा के प्रसार, धार्मिक सहिष्णुता का समर्थन किया। समाज-सुधारकों ने अपनी पुस्तकों, पत्रिकाओं आदि के द्वारा मजदूरों को शिक्षित किये जाने तथा उन्हें मिल-मालिकों के द्वारा
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किये जाने वाले शोषण से बचाने पर बल दिया। उनकी मूल कोशिश यह थी कि मजदूरों के बीच नशाखोरी कम हो, साक्षरता आए और उन तक राष्ट्रवाद का संदेश भी यथासम्भव पहुँचे।
चर्चा करें-
प्रश्न 1. अठारहवीं सदी के यूरोप में कुछ लोगों को क्यों ऐसा लगता था कि मुद्रण संस्कृति से निरंकुशवाद का अन्त, और ज्ञानोदय होगा?
उत्तर— मुद्रण संस्कृति से निरंकुशवाद का अन्त और ज्ञानोदय होना- अठारहवीं सदी के मध्य तक यूरोप के लोगों में यह आम विश्वास बन चुका था कि किताबों के जरिये प्रगति और ज्ञानोदय होता है। इससे कुछ लोगों को निम्न कारणों से ऐसा लगता था कि मुद्रण संस्कृति से निरंकुशवाद का अन्त और ज्ञानोदय होगा-
(1) निरंकुशवाद और आतंकपूर्ण शासन से मुक्ति दिलाना- कई सारे लोगों का विश्वास था कि पुस्तकें दुनिया बदल सकती हैं। वे निरंकुशवाद तथा आतंकपूर्ण शासन से समाज को मुक्ति दिला सकती हैं और ऐसे समाज का निर्माण कर सकती हैं जिसमें विवेक और बुद्धि का राज होगा। 18वीं सदी में फ्रांस के प्रसिद्ध उपन्यासकार लुई सेबेस्तिएँ मर्सिए ने कहा था कि "छापाखाना प्रगति का सबसे शक्तिशाली उपकरण है। इससे बन रही जनमत की आँधी में निरंकुशवाद उड़ जायेगा।"
(2) ज्ञान का प्रसार- मर्सिए के उपन्यासों में नायक अक्सर किताबें पढ़ने से बदल जाते हैं। वे किताबें घोटते हैं, किताबों की दुनिया में जीते हैं और इसी क्रम में ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं।
(3) मुद्रण संस्कृति में अगाध विश्वास- ज्ञानोदय को लाने तथा निरंकुशवाद के आधार को नष्ट करने में छापेखाने की भूमिका के महत्व को स्वीकार करते हुए मर्सिए ने घोषित किया, "हे निरंकुशवादी शासको, अब तुम्हारे काँपने का समय आ गया है। आभासी लेखक की कलम के जोर के आगे तुम हिल उठोगे।"
प्रश्न 2. कुछ लोग किताबों की सुलभता को लेकर चिन्तित क्यों थे? यूरोप और भारत से एक-एक उदाहरण लेकर समझाएँ।
उत्तर— कुछ लोग पुस्तकों की सुलभता को लेकर चिन्तित थे क्योंकि-
(i) कई लोगों को छपी किताब के व्यापक प्रसार और छपे शब्द की सुगमता को लेकर यह आशंका थी कि न जाने इसका आम लोगों के दिमाग पर क्या असर हो। भय था कि अगर छपे हुए और पढ़े जा रहे पर कोई नियन्त्रण न होगा तो लोगों में बागी और अधार्मिक विचार पनपने लगेंगे।
(ii) धर्मगुरुओं में यह भ्रम था कि इससे लोग अधार्मिक प्रवृत्ति के हो जायेंगे; धर्म के प्रति उनका लगाव कम हो जायेगा और वे अनुशासनहीन हो जायेंगे।
(iii) कुछ का यह मानना था कि इससे महिलाएँ अपना स्वाभाविक काम छोड़कर पढ़ी हुई बातों का अनुसरण करने लगेंगी, जिससे सामाजिक अव्यवस्था फैल जाएगी।
यूरोप से उदाहरण- छपी हुई पुस्तकों के आधार पर कुछ लोग बाइबिल के नये अर्थ लगाने लगे तथा कैथोलिक चर्च की कटु आलोचना करने लगे। इससे कैथोलिक चर्च बड़ा क्रुद्ध हुआ और उसने धर्म-विरोधी विचारों का दमन करने के लिए 'इन्क्वीजीशन' (धर्म अदालत) की स्थापना की। इन्क्वीजीशन ने धर्म-विरोधी विचार प्रकट करने वाले इटली के निवासी मेनोकियो को मृत्यु-दण्ड दिया। कैथोलिक चर्च ने प्रकाशकों तथा पुस्तक-विक्रेताओं पर अनेक प्रतिबन्ध लगाये तथा 1558 ई. से प्रतिबन्धित पुस्तकों की सूची रखने लगा।
भारत से उदाहरण- ब्रिटिश सरकार मुद्रण संस्कृति के प्रसार से चिन्तित थी। पुस्तकों, समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं में छपने वाली सामग्री से चिन्तित होकर ब्रिटिश सरकार ने भारतीय प्रेस पर कठोर नियन्त्रण लगाने का निश्चय कर लिया। अतः 1878 में भारत सरकार ने वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पारित किया। इसके द्वारा सरकार ने भारतीय भाषाओं में छपने वाले समाचार-पत्रों पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिए।
प्रश्न 3. उन्नीसवीं सदी में भारत में गरीब जनता पर मुद्रण संस्कृति का क्या असर हुआ? (प्रश्न बैंक)
अथवा
प्रिन्ट एवं गरीब जनता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर— उन्नीसवीं सदी में भारत में गरीब जनता पर हुए मुद्रण संस्कृति का निम्नलिखित असर हुआ-
(1) गरीबों के लिए पुस्तकें उपलब्ध होना- 19वीं सदी के मद्रासी शहरों में काफी सस्ती किताबें चौक-चौराहों पर बेची जा रही थीं, जिसके चलते गरीब लोग भी बाजार से उन्हें खरीदने की स्थिति में आ गए थे।
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( 2 ) सार्वजनिक पुस्तकालय-मुद्रण संस्कृति के प्रभावस्वरूप शहरों तथा कस्बों में सार्वजनिक पुस्तकालय भी खुले जिससे किताबों की पहुँच बढ़ी।
( 3 ) मजदूरों के शोषण का विरोध-उद्योगपति मिल-मजदूरों का शोषण करते थे। कारखानों में मजदूरों से बहुत अधिक काम लिया जाता था परन्तु उन्हें वेतन बहुत कम दिया जाता था। लेकिन 1938 में कानपुर के एक मजदूर काशी बाबा ने 'छोटे और बड़े सवाल' लिख और छापकर मजदूरों के शोषण पर प्रकाश डाला।
( 4 ) सामाजिक सुधारों को प्रोत्साहन-बंगलौर के सूती मिल-मजदूरों ने स्वयं को शिक्षित करने के विचार से पुस्तकालय स्थापित किये। इसकी प्रेरणा उन्हें मुम्बई के मिल-मजदूरों से प्राप्त हुई थी। समाज सुधारकों ने इन प्रयासों को संरक्षण दिया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि मजदूरों की नशाखोरी की प्रवृत्ति कम हो, उनमें साक्षरता तथा राष्ट्रवाद का प्रसार हो।
( 5 ) जाति-भेद विरोधी विचारों का प्रसार-उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में जातिभेद के बारे में विभिन्न प्रकार की पुस्तिकाओं और निबन्धों में लिखा जाने लगा। स्थानीय विरोध आन्दोलनों और सम्प्रदायों ने भी प्राचीन धर्म-ग्रन्थों की आलोचना करते हुए, नये और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना हेतु लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाएँ और गुटके छापे।
प्रश्न 4. मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में क्या मदद की?
(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)
अथवा
मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में क्या योगदान दिया? (प्रश्न बैंक)
अथवा
मुद्रण संस्कृति ने 19वीं शताब्दी में भारत में राष्ट्रवाद के विकास में किस प्रकार सहायता की? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर— भारत में राष्ट्रवाद के विकास में मुद्रण संस्कृति का योगदान-भारत में राष्ट्रवाद के विकास में मुद्रण संस्कृति ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। यथा-
(1) भारतीय समाचार-पत्रों ने राष्ट्रवाद के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ब्रिटिश सरकार की दमन की नीति के बावजूद राष्ट्रवादी अखबार देश के हर कोने में बढ़ते-फैलते गए। उन्होंने औपनिवेशिक कुशासन की रिपोर्टिंग और राष्ट्रवादी ताकतों की हौसला-अफजाई जारी रखी। राष्ट्रवादी आलोचना को खामोश करने की तमाम कोशिशों का उग्र विरोध हुआ।
(2) मुद्रण संस्कृति ने भारत में पाठक वर्ग का विस्तार किया। धार्मिक पुस्तकों ने व्यापक जन-समुदाय तक पहुँच कर जहाँ विभिन्न धर्मों के बीच और उनके अन्दर वाद-विवाद और संवाद की नयी स्थिति पैदा की, वहीं इसने समुदायों के अन्दर से और विभिन्न हिस्सों को पूरे भारत से जोड़ने का भी काम किया।
(3) मुद्रण संस्कृति के माध्यम से शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ जिससे लोगों में राष्ट्रीयता की भावना ने सकारात्मक रूप ले लिया।
(4) मुद्रण संस्कृति के विकास से राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार-प्रसार हुआ।
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📝 2. नोट्स: पाठ-सार, मुख्य बिंदु एवं शब्दावली
महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं, भौगोलिक परिभाषाएं, राजनीतिक सिद्धांत एवं संपूर्ण अध्याय का सारगर्भित सारांश।
पाठ-सार
1. शुरुआती छपी किताबें- मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई। लगभग 594 ई. से स्याही लगे काठ के ब्लॉक या तख्ती पर कागज पर रगड़कर किताबें छापी जाती थीं। पारम्परिक चीनी किताब 'एकार्डियन शैली' में किनारों को मोड़ने के बाद सिल कर बनाई जाती थी। चीनी राजतन्त्र मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक था। सिविल सेवा परीक्षाओं के लिए चीनी राजतन्त्र बड़ी तादाद में किताबें छपवाता था। 17वीं सदी तक आते-आते चीन में शहरी संस्कृति के फलने-फूलने से छपाई के इस्तेमाल में भी विविधता आयी। अब मुद्रित सामग्री के उपभोक्ता विद्वान और अधिकारियों के साथ-साथ व्यापारी भी करने लगे। पढ़ना एक शगल भी बन गया। पढ़ने की एक नयी संस्कृति एक नयी तकनीक के साथ आयी।
19वीं सदी के अन्त में पश्चिमी मुद्रण तकनीक और मशीनी प्रेस का आयात भी हुआ और शंघाई प्रिंट संस्कृति का नया केन्द्र बन गया। हाथ की छपाई की जगह अब धीरे-धीरे मशीनी या यांत्रिक छपाई ने ले ली।
1.1 जापान में मुद्रण- जापान में सर्वप्रथम चीनी बौद्ध प्रचारक 768-770 ई. के आसपास छपाई की तकनीक लाये थे। 868 ई. में 'डायमंड सूत्र' नामक पुस्तक छपी। यह जापान की छपने वाली सबसे प्राचीन पुस्तक है। 13वीं शताब्दी के मध्य में त्रिपिटका कोरियाना वुडब्लॉक्स मुद्रण के रूप में बौद्ध ग्रन्थों का कोरियाई संग्रह है। 18वीं सदी के अन्त में एदो (तोक्यो) में हाथ से मुद्रित तरह की सामग्री पर लिखी किताबों से पुस्तकालय एवं दुकानें अटी पड़ी थीं।
2. यूरोप में मुद्रण का आना- 1295 ई. में इटली का साहसी खोजी यात्री मार्कोपोलो चीन से वुड ब्लॉक (काठ की तख्ती) वाली छपाई की तकनीक लेकर इटली लौटा तो इटली में भी तख्ती की छपाई से पुस्तकें निकलने लगीं और जल्दी ही यह तकनीक शेष यूरोप में फैल गई। जर्मनी के निवासी योहान गुटेनबर्ग ने आधुनिक छापेखाने का आविष्कार किया।
2.1 गुटेनबर्ग और प्रिंटिंग प्रेस- 1448 तक गुटेनबर्ग ने अपना यह यन्त्र पूरा कर लिया था। उसने बाइबिल नामक पहली पुस्तक छापी। लगभग सौ साल के दरम्यान (1450-1550 ई.) के मध्य यूरोप के अधिकांश देशों में छापेखाने बन गये थे। जर्मनी के प्रिंटर या मुद्रक दूसरे देश जाकर नए छापेखाने खुलवाते थे।
3. मुद्रण क्रान्ति और उसका असर- प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार के बाद बड़ी संख्या में पुस्तकें छपने लगीं। पुस्तक उत्पादन के नए तरीकों ने लोगों का जीवन बदल दिया। इसके फलस्वरूप सूचना और ज्ञान में संस्था और सत्ता से उनका सम्बन्ध ही बदल गया। इससे लोक चेतना बदल गई।
3.1 नया पाठक वर्ग- छापेखाने के आने से नया पाठक वर्ग पैदा हुआ। छपाई से किताबों की कीमतें गिरीं। बाजार किताबों से पट गया और पाठक वर्ग भी बड़ा हो गया। किताबों की पहुँच आसान होने से पढ़ने की एक नयी संस्कृति विकसित हुई और पाठक जनता अस्तित्व में आई। इसके साथ ही छपी सामग्री मौखिक अंदाज में प्रसारित हुई।
3.2 धार्मिक विवाद और प्रिंट का डर- हर कोई मुद्रित किताब को लेकर खुश नहीं था। जिन्होंने इसका स्वागत भी किया, उसके मन में यह डर था कि आम लोगों के जेहन पर इसका क्या असर होगा, लोगों में अधार्मिक विचार पनपने लगेंगे। यदि ऐसा हुआ तो 'मूल्यवान' साहित्य की सत्ता नष्ट हो जाएगी। धर्म प्रचारक मार्टिन लूथर ने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना लिखी। इसके नतीजे में चर्च का विभाजन हो गया और प्रोटेस्टेंट धर्म सुधार की शुरुआत हुई।
3.3 मुद्रण और प्रतिरोध- धर्म पर मुद्रित किताबों के आधार पर बाइबिल के नये अर्थ लगाए जाने लगे। धर्म के ऐसे पाठ पर रोमन चर्च ने प्रकाशकों व पुस्तक विक्रेताओं पर कई तरह की पाबंदियाँ लगा दीं।
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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 109
4. पढ़ने का जुनून-सत्रहवीं तथा अठारहवीं सदी के दौरान यूरोप के अधिकांश देशों में साक्षरता में वृद्धि हुई। यूरोपीय देशों में साक्षरता तथा स्कूलों के प्रसार के साथ लोगों में पढ़ने का जुनून पैदा हो गया। नये पाठकों की रुचि का ध्यान रखते हुए विभिन्न प्रकार का साहित्य छपने लगा। अनेक पुस्तकें पंचांग, लोकगाथाओं और लोकगीतों की हुआ करती थीं। चैपबुक (गुटका) का भी प्रचलन था। अठारहवीं सदी के आरम्भ से पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ।
4.1 दुनिया के जालिमों अब हिलोगे तुम-18वीं सदी के मध्य तक यह विश्वास बन चुका था कि किताबें दुनिया बदल सकती हैं। वे निरंकुशवाद और आतंकी राजसत्ता से मुक्ति दिलायेंगी। फ्रांस के एक उपन्यासकार मार्सिये ने इसका समर्थन किया।
4.2 मुद्रण संस्कृति और फ्रांसीसी क्रांति-कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रांति के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
5. उन्नीसवीं सदी-19वीं सदी में यूरोप ने जन-साक्षरता की दिशा में लम्बी छलाँगें लगाईं जिसके बूते महिलाओं और बच्चों के रूप में नया पाठक वर्ग तैयार हुआ।
5.1 बच्चे, महिलाएँ और मजदूर-19वीं सदी के अन्त में प्राथमिक शिक्षा के अनिवार्य होने से पाठ्यपुस्तकों का उत्पादन महत्त्वपूर्ण हो गया। 1857 में बाल पुस्तकें छापने के लिए एक मुद्रणालय स्थापित किया गया। जर्मनी के ग्रिम बंधुओं ने 1812 में लोककथाओं का एक संकलन छापा। महिला पाठिका और लेखिका की भूमिका भी ज्यादा अहम् हो गई।
5.2 नए तकनीकी परिष्कार-19वीं सदी के अन्त तक आफसेट प्रेस आ गया था, जिससे एक साथ 6 रंग की छपाई संभव थी। बीसवीं सदी के शुरू से ही, बिजली से चलने वाले प्रेस के बल पर छपाई का काम बड़ी तेजी से होने लगा था। मुद्रकों तथा प्रकाशकों ने अपने उत्पाद बेचने के नए गुर अपनाए।
6. भारत का मुद्रण संसार-भारत में छपाई कब शुरू हुई और इससे पहले यहाँ सूचना और विचार कैसे लिखे जाते थे। यथा-
6.1 मुद्रण युग से पहले की पाण्डुलिपियाँ-भारत में संस्कृत, अरबी, फारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में हस्तलिखित पाण्डुलिपियों की पुरानी परम्परा थी। पाण्डुलिपियाँ ताड़ के पत्तों या हाथ से बने कागज पर नकल कर बनाई जाती थीं। ये पाण्डुलिपियाँ नाजुक तथा काफी महंगी होती थीं।
6.2 छपाई भारत आई-भारत में प्रिंटिंग प्रेस सर्वप्रथम सोलहवीं सदी में गोवा में पुर्तगाली धर्म प्रचारकों के साथ आया। 1674 ई. तक कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 पुस्तकें छप चुकी थीं। कैथोलिक पादरियों ने 1579 में पहली तमिल पुस्तक छापी। 1713 में पहली मलयालम पुस्तक छापी गई।
7. धार्मिक सुधार और सार्वजनिक वाद-विवाद-19वीं शताब्दी में समाज तथा धर्म सुधारकों और हिन्दू रूढ़िवादियों के बीच सामाजिक कुरीतियों को लेकर तीव्र वाद-विवाद हो रहा था। राजा राममोहन राय ने 1821 से 'संवाद कौमुदी' नामक समाचार-पत्र प्रकाशित किया और इसके माध्यम से सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। दूसरी ओर रूढ़िवादियों ने राजा राममोहन राय के विचारों का खण्डन करने के लिए 'समाचार चन्द्रिका' नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन किया। दो फारसी अखबार-'जाम-ए-जहाँनामा' तथा 'शम्सुल अखबार' भी 1822* में प्रकाशित हुए। तुलसीदास की सोलहवीं सदी की पुस्तक 'रामचरितमानस' का प्रथम मुद्रित संस्करण 1810 में कोलकाता में प्रकाशित हुआ।
8. प्रकाशन के नये रूप-उपन्यास, गीत, कहानियाँ, सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं पर लेख आदि पाठकों की दुनिया का हिस्सा बन गये। अब छवियों की कई नकलें या प्रतियाँ बड़ी सरलता से बनाई जा सकती थीं। चित्रकार राजा रवि वर्मा ने अनेक चित्र बनाए। 1870 के दशक तक पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर टिप्पणी करते हुए कैरिकेचर और कार्टून छपने लगे थे।
9. प्रिंट और प्रतिबन्ध-कोलकाता सर्वोच्च न्यायालय ने 1820 के दशक तक प्रेस की आजादी को नियंत्रित करने वाले कुछ कानून पास किए। 1878 में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट लागू कर भारतीय समाचार-पत्रों पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिए गए। लेकिन दमन की नीति के बावजूद राष्ट्रवादी अखबार देश के हर कोने में बढ़ते-फैलते गए।
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- NCERT की हिन्दी माध्यम की पाठ्यपुस्तक में 1882 जबकि अंग्रेजी माध्यम की पाठ्यपुस्तक में 1822 दिया गया है।
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क्र. सं. | तिथि | घटनाएँ |
1. | सन् 594 ई. | चीन में स्याही लगे काठ के ब्लॉक या तख्ती पर कागज को रगड़कर किताबें छापना प्रारम्भ हुआ। |
2. | सन् 768-770 ई. | चीनी बौद्ध प्रचारक छपाई की तकनीक लेकर जापान गए। |
3. | सन् 868 ई. | जापान की सबसे पुरानी पुस्तक 'डायमण्ड सूत्र' का प्रकाशन। |
4. | सन् 1448 ई. | स्ट्रॉसबर्ग के योहान गुटेन्बर्ग ने जैतून प्रेस का आविष्कार कर सर्वप्रथम बाइबिल पुस्तक छापी। |
5. | सन् 1579 ई. | कैथोलिक पुजारियों ने प्रथम तमिल पुस्तक का प्रकाशन किया। |
6. | सन् 1713 ई. | कैथोलिक पुजारियों ने प्रथम मलयालम पुस्तक का प्रकाशन किया। |
7. | सन् 1753 ई. | कितागावा उतामारो ने एदो में उकियो नामक एक नई चित्र शैली को जन्म दिया। |
8. | सन् 1810 ई. | तुलसीदास कृत 'रामचरित मानस' का पहला मुद्रित संस्करण कलकत्ता से प्रकाशित। |
9. | सन् 1821 ई. | राजा राममोहन राय द्वारा संवाद कौमुदी नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन। |
10. | सन् 1878 ई. | भारत में आयरिश प्रेस कानून की तर्ज पर वर्नाक्यूलर एक्ट लागू किया। |
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⭐ 3. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), रिक्त स्थान, अतिलघूत्तरात्मक, लघूत्तरात्मक एवं निबंधात्मक परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
● बहुविकल्पीय प्रश्न-
1. मुद्रण की सबसे पहली तकनीक किस देश में प्रारंभ हुई? (प्रश्न बैंक)
(अ) भारत (ब) जर्मनी (स) चीन (द) जापान
2. जापान की सबसे पुरानी पुस्तक 'डायमंड सूत्र' कब छपी- (प्रश्न बैंक)
(अ) 1018 (ब) 908 (स) 968 (द) 868
3. चीन से इटली में वुड ब्लॉक वाली छपाई की तकनीक लेकर आया था-
(अ) मार्टिन लूथर (ब) कोलम्बस (स) मार्कोपोलो (द) वास्कोडिगामा
4. आधुनिक छापेखाने का आविष्कार किसने किया था? (प्रश्न बैंक)
(अ) मार्कोपोलो (ब) योहान गुटेनबर्ग (स) दिदरो (द) इ्रैस्मस
5. किसके छपे हुए लेखों के कारण यूरोप में धर्म सुधार आन्दोलन शुरू हुआ?
(अ) काल्विन (ब) मार्टिन लूथर (स) इ्रैस्मस (द) ज्विंग्ली
--- [ पृष्ठ संख्या: 122 ] ---
सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 115
6. 1448 ई. में गुटेन्बर्ग ने कौनसी पहली पुस्तक छापी थी?
(अ) बाइबिल (ब) कुरान (स) डायमंड सूत्र (द) त्रिपीटका कोरियाना
7. 1821 से 'संवाद कौमुदी' का प्रकाशन किसने शुरू किया?
(अ) विवेकानन्द (ब) राजा राममोहन राय (स) ज्योतिबा फुले (द) दादाभाई नौरोजी
8. जाम-ए-जहांनामा और शम्सुल अखबार नामक फारसी अखबार कब प्रकाशित हुए?
(अ) 1780 (ब) 1801 (स) 1846 (द) 1822
9. तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' का पहला मुद्रित संस्करण कहाँ से प्रकाशित हुआ? (प्रश्न बैंक)
(अ) बनारस (ब) इलाहाबाद (स) हरिद्वार (द) कलकत्ता
10. 'गुलामगिरी' पुस्तक के लेखक कौन हैं? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)
(अ) बी.आर. अम्बेडकर (ब) महात्मा गाँधी (स) ज्योतिबा फुले (द) गोपाल कृष्ण गोखले
11. मुद्रण संस्कृति ने किस क्रान्ति को जन्म दिया?
(अ) फ्रांसीसी क्रांति (ब) इंग्लैंड की रक्तहीन क्रांति
(स) रूस की सर्वहारा क्रांति (द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
12. 15वीं सदी की शुरुआत तक यूरोप में बड़े पैमाने पर धार्मिक चित्र छापे जा रहे थे-
(अ) हस्तलिखित पाण्डुलिपियों के (ब) तख्थी की छपाई से
(स) प्रिंटिंग प्रेस से (द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
13. 15वीं व 16वीं सदी में कौनसे देश के प्रिंटर या मुद्रक दूसरे देश में जाकर छापेखाने खुलवाया करते थे?
(अ) फ्रांस के (ब) इंग्लैंड के (स) जर्मनी के (द) इटली के
14. पारम्परिक चीनी किताब किस शैली में बनाई जाती थी?
(अ) कोरियन शैली (ब) शंघाई प्रिंट शैली
(स) एकॉर्डियन शैली (द) वुडब्लॉक्स शैली
15. 'छापाखाना प्रगति का सबसे ताकतवर औजार है और इससे बन रही जनमत की आंधी में निरंकुशवाद उड़ जाएगा।' यह कथन है-
(अ) मार्टिन लूथर का (ब) कैथोलिक धर्म सुधारक इरेस्मस का
(स) इटली के किसान मेनोकियो का (द) लुई सेबेस्टिएँ मर्सिए का
16. 19वीं सदी के इंग्लैंड में किराए पर किताब देने वाले पुस्तकालयों का उपयोग जिन लोगों को शिक्षित करने के लिए किया गया, वे थे-
(अ) सफेद-कॉलर मजदूर (ब) दस्तकार (स) निम्नवर्गीय लोग (द) उपर्युक्त सभी
17. संस्कृत, अरबी, फारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में पुरानी और समृद्ध परंपरा थी-
(अ) हस्तलिखित पांडुलिपियों की (ब) प्रिंटिंग प्रेस की
(स) ऑफसेट प्रेस की (द) तख्थी की छपाई की
18. भारत में सर्वप्रथम प्रिंटिंग प्रेस कहाँ स्थापित की गई? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)
(अ) महाराष्ट्र (ब) बंगाल (स) बिहार (द) गोवा
19. कैथोलिक पुजारियों ने 1579 में कोचीन में किस भाषा में पहली किताब छापी?
(अ) हिन्दी में (ब) तमिल में (स) मलयालम में (द) कन्नड़ में
20. गंभीर हिन्दी में छपाई की शुरुआत किस दशक में हुई- (प्रश्न बैंक)
(अ) 1920 (ब) 1870 (स) 1850 (द) 1860
21. 'बंगाल गजट' पत्रिका का सम्पादन किसने किया? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)
अथवा
1780 में बंगाल गजट नामक एक साप्ताहिक पत्रिका का सम्पादन किसने शुरू किया? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)
(अ) वारेन हेस्टिंग्स (ब) जेम्स आगस्टस हिक्की
(स) राजा राममोहन राय (द) गंगाधर भट्टाचार्य
22. 'केसरी' का प्रकाशन किसने किया-
--- [ पृष्ठ संख्या: 123 ] ---
(अ) महात्मा गाँधी (ब) बाल गंगाधर तिलक
(स) सैंडर्स (द) लाजपत राय
23. 'आमार जीवन' नामक आत्मकथा किसने लिखी? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)
(अ) रशसुन्दरी देवी (ब) कैलाश बासिनी देवी
(स) रमाबाई (द) ताराबाई शिंदे
24. बंगाल गजट प्रकाशित किया गया-
(अ) जेम्स आगस्टस हिक्की ने (ब) गंगाधर भट्टाचार्य ने
(स) राजा राममोहन राय ने (द) वारेन हेस्टिंग्स ने
25. 1780 में प्रकाशित बंगाल गजट थी- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)
(अ) दैनिक (ब) साप्ताहिक (स) मासिक (द) वार्षिक
26. 'रामचरितमानस' पुस्तक किसने लिखी? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)
(अ) वाल्मीकि (ब) सूरदास (स) कबीर (द) तुलसीदास
27. शब्द 'वेलम' का अर्थ क्या है? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)
(अ) ताम्र पत्र (ब) चर्म पत्र (स) ताड़ पत्र (द) कागज
उत्तरमाला
1. (स) 2. (द) 3. (स) 4. (ब) 5. (ब) 6. (अ) 7. (ब)
8. (द) 9. (द) 10. (स) 11. (अ) 12. (ब) 13. (स) 14. (स)
15. (द) 16. (द) 17. (अ) 18. (द) 19. (ब) 20. (ब) 21. (ब)
22. (ब) 23. (अ) 24. (ब) 25. (ब) 26. (द) 27. (ब)।
● रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-
1. चर्म-पत्र या जानवरों के चमड़े से बनी लेखन की सतह ......... कहलाती है।
2. धर्म सुधारक ......... जिसने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी पिच्चानवें स्थापनाएं लिखीं। (प्रश्न बैंक)
3. रोमन चर्च ......... ई. से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखने लगे।
4. भारत में प्रिंटिंग प्रेस सर्वप्रथम ......... में पुर्तगाली धर्म प्रचारकों के साथ आई। (प्रश्न बैंक)
5. ............ बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली संपूर्ण आत्मकहानी थी।
6. 1870 के दशक तक भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर टिप्पणी करते हुए कैरिकेचर और ............ छपने लगे थे।
7. यूरोप में विकसित ............ नामक साहित्यिक विधा जिन्दगी के तजुर्बों और रिश्तों को देखने की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम थी।
8. भारत में संस्कृत, अरबी, फारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में हस्तलिखित ............ की पुरानी और समृद्ध परम्परा थी।
9. सुन्दर लेखन की कला ............ कहलाती है। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)
10. गुटेनबर्ग ने ................ आविष्कार किया था।
उत्तरमाला
1. वेलम 2. मार्टिन लूथर 3. 1558 4. गोवा 5. आमार जीवन 6. कार्टून
7. उपन्यास 8. पांडुलिपियों 9. कैलिग्राफी 10. जैतून प्रेस।
● अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. कैलिग्राफी क्या है?
अथवा
सुलेखन किसे कहते हैं? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)
उत्तर— हाथ से सुन्दर व सुडौल अक्षरों में लिखने की कला को कैलिग्राफी कहते हैं।
प्रश्न 2. इटली का कौनसा यात्री चीन की यात्रा करने के बाद वहाँ से वुड ब्लॉक (काठ की तख्ती) वाली छपाई का ज्ञान लेकर चीन लौटा और कब?
उत्तर— (1) मार्कोपोलो (2) 1295 ई. में।
--- [ पृष्ठ संख्या: 124 ] ---
सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X 117
प्रश्न 3. आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किसने किया?
उत्तर— योहान गुटेन्बर्ग ने।
प्रश्न 4. अपनी पुस्तकों और लेखों के प्रकाशन के कारण किस धर्म सुधारक ने प्रोटेस्टेन्ट धर्मसुधार आन्दोलन की शुरुआत की?
उत्तर— मार्टिन लूथर।
प्रश्न 5. "छापाखाना प्रगति का सबसे शक्तिशाली औजार है, इससे बन रहे जनमत की आँधी में निरंकुशवाद उड़ जाएगा।" यह कथन किसका था?
उत्तर— लुई सेबेस्तिएँ मर्सिए।
प्रश्न 6. योहान गुटेन्बर्ग ने किस यंत्र का आविष्कार किया था? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)
उत्तर— योहान गुटेन्बर्ग ने जैतून प्रेस (मूवेबिल टाइप प्रिंटिंग मशीन) का आविष्कार किया था।
प्रश्न 7. फ्रांस के उन दो विचारकों और लेखकों के नाम लिखिए जिनके लेखों ने फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं?
उत्तर— (1) वाल्तेयर (2) रूसो।
प्रश्न 8. भारत में सबसे पहले प्रिंटिंग प्रेस कहाँ और कब स्थापित हुई? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— (1) गोवा में (2) सोलहवीं सदी में।
प्रश्न 9. 'बंगाल गजट' नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन किसने किया और कब किया? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— (1) जेम्स ऑगस्टस हिक्की (2) 1780 में।
प्रश्न 10. मुद्रण क्रान्ति क्या थी?
उत्तर— छापेखाने के आविष्कार से पुस्तकों का बड़े पैमाने पर उत्पादन एवं प्रसार होने लगा। इसे मुद्रण क्रान्ति कहा गया।
प्रश्न 11. भारत का पहला हिन्दुस्तानी अखबार कौनसा था? इसका प्रकाशन किसने किया?
उत्तर— भारत का पहला हिन्दुस्तानी अखबार 'बंगाल गजट' था। इसका प्रकाशन गंगाधर भट्टाचार्य ने किया।
प्रश्न 12. मुद्रण की सबसे पहली तकनीक किन देशों में विकसित हुई?
उत्तर— मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई।
प्रश्न 13. जापान की सबसे पुरानी पुस्तक कौनसी थी और वह कब छपी थी? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— (1) जापान की सबसे पुरानी पुस्तक 'डायमंड सूत्र' है। (2) यह पुस्तक 868 ई. में छपी थी।
प्रश्न 14. कितागावा उतामारो कौन था? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— कितागावा उतामारो जापान का एक प्रसिद्ध चित्रकार था। उसने उकियो नामक चित्रकला शैली के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रश्न 15. मार्कोपोलो कौन था?
उत्तर— मार्कोपोलो इटली का एक महान खोजी यात्री था। वह चीन से इटली में वुड ब्लॉक वाली छपाई की तकनीक लेकर आया था।
प्रश्न 16. मार्टिन लूथर कौन था?
उत्तर— मार्टिन लूथर जर्मनी का धर्मसुधारक था। वह पोप तथा कैथोलिक चर्च का कट्टर विरोधी था।
प्रश्न 17. प्रोटेस्टेन्ट धर्म सुधार से क्या अभिप्राय है?
उत्तर— सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में रोमन कैथोलिक चर्च की बुराइयों को दूर करने के लिए एक आन्दोलन शुरू हुआ जिसे प्रोटेस्टेन्ट धर्म सुधार कहते हैं।
प्रश्न 18. पश्चिमी यूरोप के दो देशों के नाम बताइए जहाँ उपन्यास ने पहले जड़ें जमाईं।
उत्तर— (i) इंग्लैंड (ii) फ्रांस।
प्रश्न 19. उस देश का नाम लिखिए जो लम्बे समय तक मुद्रण सामग्री का प्रमुख उत्पादक रहा।
उत्तर— चीन।
प्रश्न 20. 'त्रिपीटका कोरियाना' से आप क्या समझते हैं?
उत्तर— 13वीं शताब्दी के मध्य में 'त्रिपीटका कोरियाना' वुडब्लॉक्स मुद्रण के रूप में बौद्ध ग्रंथों का कोरियाई संग्रह है।
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प्रश्न 21. उन्नीसवीं सदी की दो/तीन यूरोपियन महिला उपन्यास-लेखिकाओं के नाम लिखिए।
अथवा
किन्हीं दो-तीन लेखिकाओं के नाम बताओ जिनके लेखों से नारी की परिभाषा उभरी।
उत्तर— (1) जेन आस्टिन (2) ब्रान्ट बहनें (3) जार्ज इलियट।
प्रश्न 22. भारत में पहली तमिल पुस्तक तथा पहली मलयालम पुस्तक किसके द्वारा छापी गई और कब?
उत्तर— कैथोलिक पादरियों ने 1579 में पहली तमिल पुस्तक तथा 1713 में पहली मलयालम पुस्तक छापी।
प्रश्न 23. इंग्लैंड में सस्ती किताबों को किस नाम से जाना जाता था? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— इंग्लैंड में सस्ती किताबों को पेनी चैप बुक्स के नाम से जाना जाता था।
प्रश्न 24. 'संवाद कौमुदी' नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन किसके द्वारा किया गया और कब किया गया?
उत्तर— राजा राममोहन राय ने 1821 से 'संवाद कौमुदी' नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन किया।
प्रश्न 25. उलमा कौन थे? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— उलमा इस्लामी कानून और शरियत के विद्वान् थे।
प्रश्न 26. 'फतवा' से आप क्या समझते हैं?
उत्तर— अनिश्चय अथवा असमंजस की स्थिति में मुफ्ती के द्वारा की जाने वाली वैधानिक घोषणा को इस्लाम में 'फतवा' कहा जाता है।
प्रश्न 27. राजा रवि वर्मा कौन थे?
उत्तर— राजा रवि वर्मा एक प्रसिद्ध चित्रकार थे। उन्होंने आम खपत के लिए चित्र बनाए।
प्रश्न 28. महाराष्ट्र की ऐसी दो महिलाओं के नाम लिखिए जिन्होंने 1880 के दशक में उच्च जाति की नारियों की दयनीय दशा के बारे में लिखा। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)
उत्तर— (1) ताराबाई शिंदे (2) पंडिता रमाबाई।
प्रश्न 29. निम्न-जातीय आन्दोलनों के मराठी प्रणेता कौन थे?
उत्तर— निम्नजातीय आन्दोलनों के मराठी प्रणेता ज्योतिबा फुले थे।
प्रश्न 30. 'गुलामगिरी' (1871) नामक पुस्तक किसने लिखी? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)
उत्तर— 'गुलामगिरी' नामक पुस्तक के रचयिता ज्योतिबा फुले थे।
प्रश्न 31. सन् 1871 ई. में ज्योतिबा फुले ने 'गुलामगिरी' पुस्तक क्यों लिखी थी?
उत्तर— जाति प्रथा के अत्याचारों को सार्वजनिक करने के लिए ज्योतिबा फुले ने 1871 में 'गुलामगिरी' पुस्तक लिखी थी।
प्रश्न 32. पेरियर के नाम से कौन जाने जाते हैं?
उत्तर— मद्रास के प्रसिद्ध लेखक ई.वी. रामास्वामी नायकर 'पेरियर' के नाम से जाने जाते हैं।
प्रश्न 33. बीसवीं सदी के दो प्रसिद्ध लेखकों के नाम लिखिए जिन्होंने जातिप्रथा तथा ऊँच-नीच के भेदभाव के विरुद्ध लेख लिखे।
उत्तर— (1) महाराष्ट्र में डॉ. भीमराव अम्बेडकर (2) मद्रास में रामास्वामी नायकर।
प्रश्न 34. 'वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट' से आप क्या समझते हैं? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)
अथवा
वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट क्या था? यह कब लागू किया गया? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— 1878 में लार्ड लिटन ने वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट लागू किया। इससे सरकार को भारतीय भाषाओं में छपने वाले समाचारपत्रों को सेंसर करने का अधिकार मिल गया।
प्रश्न 35. 'मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफा।' उपर्युक्त कथन किसका है? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)
उत्तर— मार्टिन लूथर का।
प्रश्न 36. जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 1780 में किस साप्ताहिक पत्रिका का सम्पादन शुरू किया? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)
उत्तर— बंगाल गजट नामक साप्ताहिक पत्रिका का।
प्रश्न 37. प्लाटेन के बारे में आप क्या जानते हैं?
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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X | 119
उत्तर—लेटरप्रेस छपाई में प्लाटेन एक बोर्ड होता है जिसे कागज के पीछे दबाकर टाइप की छाप ली जाती थी। पहले यह बोर्ड काठ का होता था, बाद में इस्पात का बनने लगा।
प्रश्न 38. कम्पोजिटर किसे कहते हैं? (प्रश्न बैंक)
उत्तर—छपाई के लिए इबारत कम्पोज करने वाले व्यक्ति को कम्पोजिटर कहते हैं।
प्रश्न 39. गैली से क्या आशय है?
अथवा
'गैली' शब्द से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)
उत्तर—एक धातुई फ्रेम, जिसमें टाइप बिछाकर इबारत बनाई जाती थी, गैली कहलाती थी।
प्रश्न 40. इन्क्वीजीशन क्या है?
उत्तर—विधर्मियों की शिनाख्त करने और उन्हें सजा देने वाली रोमन कैथोलिक संस्था 'इन्क्वीजीशन' है। इसे धर्म-अदालत भी कहते हैं।
प्रश्न 41. निरंकुशवाद से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)
उत्तर—राजकाज की ऐसी व्यवस्था, जिसमें किसी एक व्यक्ति को संपूर्ण शक्ति प्राप्त हो, और उस पर न कानूनी पाबंदी लगी हो, न ही संवैधानिक, निरंकुशवाद कहलाती है।
प्रश्न 42. गीत गोविंद के रचयिता का नाम बताइये।
उत्तर—जयदेव।
प्रश्न 43. रसुन्दरी देवी ने 'आमार जीवन' नामक अपनी आत्मकथा किस भाषा में लिखी? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)
उत्तर—बंगाली में।
प्रश्न 44. सम्प्रदाय से आप क्या समझते हैं?
उत्तर—किसी धर्म के एक उप-समूह को सम्प्रदाय कहते हैं।
प्रश्न 45. पंचांग किसे कहते हैं?
उत्तर—चाँद तथा सूरज की गति, ज्वार-भाटा का समय तथा लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ी कई अहम् जानकारियाँ देने वाले वार्षिक प्रकाशन को पंचांग कहा जाता है।
● लघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. हस्तलिखित पांडुलिपियों में क्या कमियाँ थीं? (प्रश्न बैंक)
अथवा
यूरोप में 14वीं सदी के दौरान पांडुलिपियाँ, किताबों की बढ़ती माँग को पूरा क्यों नहीं कर सकीं?
उत्तर—(1) हस्तलिखित पांडुलिपियों की नकल उतारना बहुत खर्चीला, श्रम-साध्य तथा समय-साध्य काम था।
(2) पांडुलिपियाँ प्रायः नाजुक होती थीं, उनके लाने-ले जाने, रखरखाव में बहुत कठिनाइयाँ थीं।
(3) उक्त कमियों के कारण ये बढ़ती हुई पुस्तकों की माँग को पूरा नहीं कर सकीं।
प्रश्न 2. कितागावा उतामारो पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर—कितागावा उतामारो जापान का एक प्रसिद्ध चित्रकार था। उसका जन्म 1753 ई. में एदो में हुआ था। उतामारो ने उकियो (तैरती दुनिया के चित्र) नामक एक नवीन चित्रकला शैली के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन चित्रों में आम शहरी जीवन का चित्रण किया गया था। इनकी छपी प्रतियाँ यूरोप और अमेरिका पहुँचीं।
प्रश्न 3. मुद्रण क्रान्ति से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)
उत्तर—छापेखाने के आविष्कार के कारण बड़े पैमाने पर पुस्तकें छपने लगीं। छपाई से पुस्तकों की कीमतें गिरीं। बाजारों में पुस्तकों की उपलब्धता बढ़ गई तथा पाठक वर्ग भी बढ़ गया। यही मुद्रण क्रान्ति कहलाती है। इससे लोक चेतना बदल गई तथा चीजों को देखने का दृष्टिकोण भी बदल गया।
प्रश्न 4. रोमन कैथोलिक चर्च ने प्रकाशकों और पुस्तकों पर पाबन्दियाँ क्यों लगाईं?
उत्तर—छपे हुए लोकप्रिय साहित्य के बल पर कम शिक्षित लोग धर्म की अलग-अलग व्याख्याओं से परिचित हुए। आम जनता इनके आधार पर बाइबिल के नए अर्थ लगाने प्रारम्भ कर दिए। इससे रोमन कैथोलिक चर्च ने धर्म विरोधी विचारों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए प्रकाशकों और पुस्तकों पर कई तरह की पाबन्दियाँ लगाईं।
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प्रश्न 5. मुद्रण संस्कृति ने किस प्रकार फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं?
अथवा
मुद्रण संस्कृति ने किस प्रकार फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए योगदान दिया? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— (i) मुद्रण संस्कृति के कारण ज्ञानोदय के चिंतकों के विचारों का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार हुआ।
(ii) इसने वाद-विवाद की नई संस्कृति को जन्म दिया।
(iii) इसने राजशाही तथा धर्मांधता की भरपूर आलोचना की। सामाजिक व्यवस्था को लेकर तमाम सवाल खड़े किए गए।
प्रश्न 6. मुद्रित पुस्तकों के बारे में लोगों के क्या डर थे? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— मुद्रित पुस्तकों के बारे में लोगों को निम्न डर थे-
(1) उन्हें यह आशंका थी कि छुपी हुई पुस्तकों का आम लोगों के मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।
(2) उन्हें यह भय था कि इनसे लोगों में बागी और अधार्मिक विचार विकसित होने लगेंगे।
प्रश्न 7. उन्नीसवीं सदी में छापेखाने की तकनीक में हुए तीन सुधारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर— (1) अठारहवीं सदी के अन्त तक प्रेस धातु से बनने लगे थे।
(2) उन्नीसवीं सदी के मध्य तक न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम. हो ने शक्ति-चालित बेलनाकार प्रेस को उपयोगी बना लिया था।
(3) उन्नीसवीं सदी के अन्त तक ऑफसेट प्रेस आ गया था, जिससे एक साथ 6 रंग की छपाई की जा सकती थी।
प्रश्न 8. जातिभेद के विरुद्ध निम्न जातीय आन्दोलनों के प्रणेता ज्योतिबा फुले के योगदान की व्याख्या कीजिए। (प्रश्न बैंक)
उत्तर— (i) ज्योतिबा फुले ने अपनी पुस्तक 'गुलामगिरी' में जाति प्रथा के अत्याचारों पर लिखा।
(ii) उन्होंने जाति प्रथा के विरुद्ध काफी लेख लिखे और उनके लेख पूरे भारत में पढ़े गये। उन्होंने नये और न्यायपूर्ण समाज की वकालत की।
प्रश्न 9. लक्ष्मीनाथ बेजबरुबा के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर— लक्ष्मीनाथ बेजबरुबा आधुनिक असमिया साहित्य के एक वरिष्ठ रचनाकार थे। उनका जन्म 1868 में तथा मृत्यु 1938 में हुई। बूढ़ी आइर साधु (दादी की कहानियाँ) उनकी उल्लेखनीय किताबों में से है। उन्होंने असम का लोकप्रिय गीत 'ओ मोर अपुनर देश' (ओ मेरी प्यारी भूमि) भी लिखा।
प्रश्न 10. मुद्रण ने हिन्दू धर्म-सुधारकों और रूढ़िवादियों को किस प्रकार प्रभावित किया?
उत्तर— उन्नीसवीं सदी में समाज और धर्म-सुधारकों तथा हिन्दू रूढ़िवादियों के बीच सतीप्रथा, एकेश्वरवाद, ब्राह्मण पुजारी वर्ग और मूर्तिपूजा को लेकर तीव्र वाद-विवाद हो रहा था। बंगाल में इस प्रकार के वाद-विवाद के कारण अनेक पुस्तिकाओं और समाचार-पत्रों का प्रकाशन हुआ। इनमें लोग विभिन्न प्रकार के तर्क प्रस्तुत करने लगे।
प्रश्न 11. चीनी राजतंत्र मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक क्यों था? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— चीन में विशाल नौकरशाही प्रणाली थी जो सिविल सेवा परीक्षाओं के माध्यम से अपने कर्मियों की भर्ती करती थी। इस परीक्षा के लिए चीनी राजतंत्र बड़ी मात्रा में किताबें छपवाने का कार्य करता था। 16वीं शताब्दी से परीक्षा हेतु उम्मीदवारों की संख्या में वृद्धि होने के कारण छपी किताबों की मात्रा भी बढ़ी। इस प्रकार बहुत लम्बे समय तक चीनी राजतंत्र मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक बना रहा।
प्रश्न 12. छापेखाने के आविष्कार ने पढ़ने की संस्कृति को कैसे प्रभावित किया? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— छापेखाने के आविष्कार ने पढ़ने की संस्कृति को व्यापक तौर पर प्रभावित किया। छापेखाने के आविष्कार से समाज में बदलाव आया। किताबों की संख्या बढ़ी और ज्ञान का प्रसार तेज हुआ। वैज्ञानिक, साहित्यिक और धार्मिक विचारों का व्यापक प्रसार हुआ। शिक्षा का स्तर ऊँचा हुआ और भारी संख्या में लोग पढ़ने-लिखने लगे। समाज में साक्षरता की दर में वृद्धि हुई। समाज में सुधार हुआ और विचारशीलता बढ़ी। इससे मनुष्य के बौद्धिक विकास को प्रोत्साहन मिला।
प्रश्न 13. इन्क्वीजीशन (धर्म-अदालत) से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— इन्क्वीजीशन (धर्म-अदालत)- यह विधर्मियों की शिनाख्त करने और सजा देने वाली रोमन कैथोलिक संस्था थी जिसे कैथोलिक चर्च ने स्थापित किया था। इसका मुख्य कार्य विधर्मियों को पकड़ना और उन्हें दंडित करना था। यह धार्मिक अदालत मध्यकालीन यूरोप में विशेष तौर पर सक्रिय थी। इस अदालत में चर्च के
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न्यायाधीश मामलों की शुरुआत, जाँच और सुनवाई करते थे। इस अदालत के माध्यम से विधर्म, धर्मत्याग, ईशनिंदा, जादू-टोना इत्यादि से निपटने की कोशिश की जाती थी।
प्रश्न 14. चैपबुक शब्द का इस्तेमाल किनके लिए होता है? ये कब लोकप्रिय हुए थे?
उत्तर— चैपबुक-पॉकेट बुक के आकार की किताबों के लिए 'चैपबुक' शब्द का उपयोग किया जाता है। आमतौर पर फेरी वाले इन्हें बेचते थे। गरीब तबकों के बीच ये सस्ते होने के कारण लोकप्रिय थे। ये 16वीं सदी की मुद्रण क्रान्ति के समय से लोकप्रिय हुए थे।
प्रश्न 15. त्रिपिटका कोरियाना के बारे में आप क्या जानते हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर— त्रिपिटका कोरियाना-त्रिपिटका कोरियाना के मुद्रण लकड़ी के ब्लॉक 13वीं शताब्दी के मध्य से सम्बन्धित हैं, जो बौद्ध धर्मग्रंथों का एक कोरियाई संग्रह है। इन्हें लगभग 80,000 लकड़ी के ब्लॉकों पर उकेरा गया था। इन्हें 2007 में यूनेस्को मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर में अंकित किया गया था।
● दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-
प्रश्न 1. "सत्रहवीं सदी तक आते-आते चीन में शहरी संस्कृति के फलने-फूलने से छपाई के प्रयोग में विविधता आई।" स्पष्ट कीजिए।
उत्तर— सत्रहवीं सदी तक आते-आते चीन में शहरी संस्कृति के फलने-फूलने से छपाई के प्रयोग में निम्न विविधता आई-
(1) विद्वान और अधिकारी वर्ग के साथ-साथ अब व्यापारी भी अपने दैनिक कारोबार की जानकारी लेने के लिए मुद्रित सामग्री का प्रयोग करने लगे।
(2) अब पढ़ना एक शौक भी बन गया। नए पाठक-वर्ग को काल्पनिक किस्से, कविताएँ, आत्मकथाएँ, शास्त्रीय साहित्यिक रचनाओं के संकलन और रूमानी नाटक पसंद थे।
(3) धनिक वर्ग की महिलाओं ने पढ़ना शुरू कर दिया। कुछ महिलाओं ने अपने द्वारा रचित काव्य और नाटक भी छापे।
प्रश्न 2. भारत में मुद्रण युग से पहले की पांडुलिपियों पर टिप्पणी लिखिए। (प्रश्न बैंक)
उत्तर— भारत में मुद्रण युग से पहले की पांडुलिपियाँ-भारत में संस्कृत, अरबी, फारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में हस्तलिखित पांडुलिपियों की एक समृद्ध परम्परा थी। पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्तों या हाथ से बने कागज पर नकल कर बनाई जाती थीं। कभी-कभी तो पत्तों पर बेहतरीन तस्वीरें भी बनाई जाती थीं। इन्हें तख्तियों की जिल्द में या सिलकर बाँध दिया जाता था। 19वीं सदी के अन्त तक, छपाई आने के बाद भी, पांडुलिपियाँ छापी जाती रहीं। लेकिन ये पांडुलिपियाँ नाजुक होती थीं; काफी महँगी होती थीं। इन्हें सावधानी से पकड़ना पड़ता था तथा इन्हें पढ़ना भी आसान नहीं था। इसलिए इनका व्यापक दैनिक इस्तेमाल नहीं होता था।
प्रश्न 3. 19वीं सदी के मध्य तक भारतीय परिवारों ने नारी शिक्षा को बढ़ावा नहीं दिया। इन परिवारों की शंकाएँ क्या थीं? उन परिवारों पर भी प्रकाश डालिए जिन्होंने नारी शिक्षा को बढ़ावा दिया।
उत्तर— (अ) 19वीं सदी के मध्य तक भारतीय रूढ़िवादी परिवारों ने नारी शिक्षा को बढ़ावा नहीं दिया। रूढ़िवादी परिवारों की शंकाएँ ये थीं-
(i) परम्परागत हिन्दू मानते थे कि पढ़ी-लिखी कन्यायें विधवा हो जाती हैं।
(ii) दकियानूसी मुसलमानों को लगता था कि पढ़ने से औरतें बिगड़ जायेंगी।
(ब) लेकिन उदारवादी परिवारों ने नारी शिक्षा को बढ़ावा दिया। ये परिवार अपने यहाँ औरतों को घर पर पढ़ाने लगे और 19वीं सदी के मध्य में जब स्कूल बने तो उन्हें स्कूल भेजने लगे। कई पत्रिकाओं ने लेखिकाओं को जगह दी और उन्होंने नारी शिक्षा के प्रसार पर बल दिया। उनमें पाठ्यक्रम भी छपता था और पाठ्य सामग्री भी, जिसका इस्तेमाल घर बैठे स्कूली शिक्षा के लिए किया जा सकता था।
प्रश्न 4. 19वीं शताब्दी के भारत में मुद्रण संस्कृति का महिलाओं के जीवन पर प्रभाव बताइए।
उत्तर— 19वीं सदी में भारत में मुद्रण संस्कृति ने महिलाओं के जीवन को निम्न प्रकार से प्रभावित किया-
(i) महिलाओं की जिंदगी और उनकी भावनाओं पर गंभीरता से पुस्तकें लिखी गईं।
(ii) मध्यम वर्ग की महिलाएँ पहले की तुलना में पढ़ने में अधिक रुचि लेने लगीं।
(iii) उदारवादी माता-पिता अपने यहाँ महिलाओं को घर पर पढ़ाने लगे और 19वीं सदी के मध्य में जब बड़े-छोटे शहरों में स्कूल बने तो उन्हें पढ़ने के लिए विद्यालयों में भेजने लगे।
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(iv) महिला लेखिकाओं ने महिलाओं की समस्याओं पर चर्चा की तथा उनके विभिन्न मुद्दे केन्द्र में आए।
(v) कई पत्रिकाओं ने लेखिकाओं को जगह दी और उन्होंने नारी-शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया।
प्रश्न 5. रशसुन्दरी देबी कौन थीं? संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर— रशसुन्दरी देबी पूर्वी बंगाल की निवासी एक महिला थीं जिसका विवाह 19वीं सदी के प्रारम्भ में एक कट्टर रूढ़िवादी परिवार में हुआ था। उन्होंने रसोई में छिप-छिपकर पढ़ना सीखा। बाद में चलकर उन्होंने 'आमार जीवन' नामक आत्मकथा लिखी जो 1876 में प्रकाशित हुई। यह बंगाली भाषा में प्रकाशित पहली सम्पूर्ण आत्म-कहानी थी।
प्रश्न 6. उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप में मुद्रण तकनीक में हुए विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर— (1) अठारहवीं शताब्दी के अन्त तक प्रेस धातु से बनने लगे थे।
(2) उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम. हो ने शक्ति-चालित बेलनाकार प्रेस का आविष्कार किया जिससे प्रति घण्टे 8000 प्रतियाँ छप सकती थीं।
(3) उन्नीसवीं सदी के अन्त तक आफसेट प्रेस का प्रचलन हो गया था, जिससे एक साथ छह रंग की छपाई की जा सकती थी।
(4) इसके बाद बिजली चालित प्रेस का भी आविष्कार हुआ। इसकी सहायता से छपाई का काम बड़ी तेजी से होने लगा।
(5) इसके अतिरिक्त कागज डालने की विधि में सुधार हुआ, प्लेट की गुणवत्ता अच्छी हुई तथा स्वचालित पेपर-रील और रंगों के लिए फोटो-विद्युतीय नियंत्रण भी काम में आने लगे।
प्रश्न 7. छापेखाने ने यूरोप में धर्मसुधार आन्दोलन को किस प्रकार प्रोत्साहित किया?
उत्तर— जर्मनी के धर्मसुधारक मार्टिन लूथर ने रोम कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपने 95 लेख लिखे। इसकी एक छपी प्रति विटेनबर्ग के गिरजाघर के दरवाजे पर टांगी गई। इसमें मार्टिन लूथर ने चर्च को शास्त्रार्थ करने की चुनौती दी थी। मार्टिन लूथर के लेख बड़ी संख्या में छापे गए और लोगों द्वारा पढ़े जाने लगे। इसके फलस्वरूप चर्च में विभाजन हो गया और प्रोटेस्टेन्ट धर्मसुधार की शुरुआत हुई। कुछ ही समय में न्यू टेस्टामेंट के लूथर के अनुवाद की 5000 प्रतियाँ बिक गईं और तीन महीने के अन्दर दूसरा संस्करण निकालना पड़ा। मार्टिन लूथर ने कहा, "मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा उपहार।" कुछ इतिहासकारों के अनुसार छपाई ने नया बौद्धिक वातावरण बनाया और इससे धर्म सुधार आन्दोलन के नये-नये विचारों के प्रसार में सहायता मिली।
प्रश्न 8. 'जिकजी' पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर— जिकजी- यह कोरिया की मूवेबल मेटल टाइप के साथ मुद्रित की गई दुनिया की सबसे पुरानी मौजूदा पुस्तकों में से है। इसमें जैन, बौद्ध धर्म की मुख्य विशेषताएँ हैं। इस पुस्तक में भारत, चीन और कोरिया के लगभग 150 बौद्ध भिक्षुओं का उल्लेख किया गया है। इसे 14वीं शताब्दी के अन्त में मुद्रित किया गया था। इस पुस्तक का पहला खण्ड उपलब्ध नहीं है तथा दूसरा खण्ड फ्रांस की नेशनल लाइब्रेरी में उपलब्ध है। इस कार्य ने मुद्रण संस्कृति में एक महत्त्वपूर्ण तकनीकी बदलाव को चिह्नित किया। यही कारण है कि इसे 2001 में यूनेस्को मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर में अंकित किया गया था।
प्रश्न 9. जापान में मुद्रण के विकास को संक्षेप में समझाइए। (प्रश्न बैंक)
उत्तर— जापान में मुद्रण का विकास
जापान में मुद्रण तकनीक की शुरुआत चीन से आए बौद्ध मिशनरियों ने 768-770 ई. के आसपास की। 868 ई. में छपी 'डायमण्ड सूत्र' सबसे पुरानी जापानी पुस्तक थी। इसमें पाठ के साथ काठ पर खुदे चित्र भी थे। चित्रों को कपड़े, ताश के पत्तों और कागजी पैसों पर छापा जाता था। मध्ययुगीन जापान में कवि और गद्य लेखक नियमित रूप से अपनी कृतियाँ प्रकाशित करते थे। दृश्य सामग्री की छपाई ने दिलचस्प प्रकाशन प्रथाओं को जन्म दिया। उदाहरण के लिए, 18वीं शताब्दी के अन्त में एडो (आधुनिक टोक्यो) में चित्रों के सचित्र संग्रह में एक सुन्दर शहरी संस्कृति को दर्शाया गया था, जिसमें कलाकार, चायघर की सभाएँ आदि शामिल थीं। पुस्तकालय और किताबों की दुकानें विभिन्न प्रकार की हस्त-मुद्रित सामग्री से भरी हुई थीं।
● निबन्धात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. 19वीं सदी के अन्त में मुद्रण संस्कृति ने महिलाओं को किस प्रकार प्रभावित किया? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— 19वीं सदी के अन्त में मुद्रण संस्कृति ने महिलाओं को अग्र प्रकार प्रभावित किया-
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(1) 19वीं सदी में मुद्रण संस्कृति के प्रादुर्भाव से महिलाएँ पाठिका तथा लेखिका की भूमिका में ज्यादा अहम हो गई थीं।
(2) मशहूर उपन्यासकारों में लेखिकाएँ अग्रणी थीं। उनके लेखन से नई नारी की परिभाषा उभरी-जिसका व्यक्तित्व सुदृढ़ था, जिसमें गहरी सूझ-बूझ थी, जिसका अपना दिमाग था तथा अपनी इच्छाशक्ति थी।
(3) उन्नीसवीं सदी में छपी हुई पुस्तकों में महिलाओं के जीवन तथा उनकी भावनाओं को स्पष्टता तथा गहनता से व्यक्त किया जाने लगा।
(4) मध्यवर्गीय परिवारों में महिलाएँ पढ़ने में पहले की अपेक्षा अधिक रुचि लेने लगीं। उदारवादी पिता और पति अपने यहाँ औरतों को घर पर पढ़ाने लगे और उन्नीसवीं सदी के मध्य में छोटे-बड़े शहरों में स्कूल खुलने लगे, तो उदारवादी माता-पिता पुत्रियों को स्कूलों में भेजने लगे।
(5) कई स्त्रियाँ पत्रिकाओं में लेखिकाओं के रूप में काम करने लगीं। पत्रिकाओं ने नारी-शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। उनमें पाठ्यक्रम भी छपता था और जरूरत के अनुसार पाठ्य-सामग्री भी, जिसका इस्तेमाल घर बैठे स्कूली शिक्षा के लिए किया जा सकता था।
(6) हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों सम्प्रदायों की महिलाओं में जागरूकता आई। रूढ़िवादी परिवारों में स्त्री शिक्षा पर लगे प्रतिबन्धों को बाकी औरतों ने अस्वीकार कर गुपचुप ढंग से छिपकर पढ़ना सीखा और आगे चलकर अपनी आत्मकथा लिखी।
(7) अनेक महिलाओं ने महिलाओं की दयनीय स्थिति पर लिखा तथा महिलाओं की शिक्षा, विधवा जीवन, विधवा-विवाह जैसे विषयों पर लेख लिखे गए।
प्रश्न 2. "छापेखाने के आगमन से पढ़ने की एक नई संस्कृति विकसित हुई।" विवेचना कीजिए।
उत्तर— छापेखाने के आगमन से पढ़ने की नई संस्कृति का विकास-छापेखाने के आगमन से एक नये पाठक वर्ग का उदय हुआ। छापेखाने के आविष्कार के कारण बड़े पैमाने पर पुस्तकों का छापना सम्भव हो गया। अतः अब पाठकों की संख्या में भी वृद्धि हुई।
मौखिक संस्कृति से मुद्रित संस्कृति की ओर-पुस्तकों के आसानी से उपलब्ध होने से पढ़ने की एक नई संस्कृति विकसित हुई। अब तक सामान्य लोग मौखिक संसार में जीते थे। वे धार्मिक पुस्तकों का वाचन सुनते थे। 'गाथा-गीत' उन्हें पढ़कर सुनाए जाते थे और किस्से भी उनके लिए बोलकर पढ़े जाते थे। इस प्रकार ज्ञान का मौखिक लेन-देन ही होता था। अब पुस्तकें समाज के अधिकाधिक लोगों तक पहुँच सकती थीं। पहले की जनता श्रोता थी, परन्तु अब पाठक-जनता अस्तित्व में आ गई थी।
मुद्रित संस्कृति-पुस्तकें केवल साक्षर ही पढ़ सकते थे और यूरोप के अधिकांश देशों में बीसवीं सदी तक साक्षरता की दर सीमित थी। अतः प्रकाशकों के सम्मुख यह समस्या थी कि लोगों में छपी पुस्तकों के प्रति रुचि कैसे जगाएँ? अतः मुद्रकों ने लोकगीत और लोककथाएँ छापनी शुरू कर दीं। ऐसी पुस्तकें चित्रों से सुसज्जित होती थीं। फिर इन्हें सामूहिक ग्रामीण सभाओं में या शहरी शराबघरों में गाया-सुनाया जाता था।
इस प्रकार मौखिक संस्कृति मुद्रित संस्कृति में प्रविष्ट हुई और छपी सामग्री मौखिक रूप में प्रसारित हुई। मौखिक और मुद्रित संस्कृतियों के बीच की विभाजक रेखा क्षीण पड़ गई।
प्रश्न 3. गरीब पाठकों को पुस्तकें उपलब्ध कराने के लिए क्या-क्या प्रयास किये गये? संक्षेप में व्याख्या कीजिए। (प्रश्न बैंक)
उत्तर— गरीब पाठकों को पुस्तकें उपलब्ध कराने के लिए निम्नलिखित प्रयास किये गये-
(i) 19वीं सदी के मद्रासी शहरों में गरीब लोगों को खरीदने हेतु काफी सस्ती किताबें चौक-चौराहों पर बेची जा रही थीं; जिसके चलते गरीब लोग बाजार से उन्हें खरीदने की स्थिति में आ गये थे।
(ii) बीसवीं सदी के आरम्भ से सार्वजनिक पुस्तकालय खुलने लगे जिससे किताबों की पहुँच बढ़ी। ये पुस्तकालय अक्सर शहरों और कस्बों में होते थे। गरीब लोग यहाँ पुस्तकें पढ़ सकते थे।
(iii) जातीय और वर्गीय शोषण का रिश्ता समझने की दृष्टि से कानपुर के एक मजदूर काशी बाबा ने 1938 में एक लेख लिखा और उसे प्रकाशित करवाया। इसी प्रकार एक और मजदूर का लेखन 'सच्ची कविताएँ' नामक एक संग्रह में छापा गया। इससे गरीबों में पुस्तकें पढ़ने की ललक बढ़ी।
(iv) बंगलौर की सूती मिल-मजदूरों ने खुद को शिक्षित करने के ख्याल से पुस्तकालय बनाया, जिसकी प्रेरणा उन्हें बम्बई के मिल-मजदूरों से मिली थी।
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(v) समाज सुधारकों ने भी मजदूरों के प्रयासों को संरक्षण दिया।
(vi) ज्योतिबा फुले ने अपनी पुस्तक 'गुलामगिरी' (1871) में जाति प्रथा के अत्याचारों के बारे में लिखा। इसी प्रकार भीमराव अम्बेडकर और ई.वी. स्वामी नायकर ने जाति-भेद पर जोरदार कलम चलाई। उनके लेख पूरे भारत में पढ़े गये।
(vii) स्थानीय विरोध आन्दोलनों और सम्प्रदायों ने भी प्राचीन धर्मग्रन्थों की आलोचना करते हुए, नए और न्यायपूर्ण समाज का सपना बुनने की मुहिम में लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाएँ और गुटके छापे।
प्रश्न 4. "यूरोपीय देशों में साक्षरता और स्कूलों के प्रसार के साथ लोगों में पढ़ने का जुनून पैदा हो गया।" विवेचना कीजिए।
उत्तर— यूरोपीय लोगों में पढ़ने का जुनून-यूरोपीय लोगों में पढ़ने का जुनून पैदा होने के निम्न कारण थे-
(1) साक्षरता और स्कूलों का प्रसार-सत्रहवीं तथा अठारहवीं सदी में यूरोप के अधिकांश देशों में साक्षरता बढ़ती रही। अलग-अलग सम्प्रदाय के चर्चों ने गाँवों में स्कूल स्थापित किए और किसानों व कारीगरों को शिक्षित करने लगे। यूरोपीय देशों में साक्षरता तथा स्कूलों के प्रसार से लोगों में पढ़ने का जुनून उत्पन्न हो गया। अतः लोगों को पुस्तक उपलब्ध कराने के लिए मुद्रक अधिकाधिक संख्या में पुस्तक छापने लगे।
(2) विभिन्न प्रकार के साहित्य का प्रकाशन-नये पाठकों की रुचि का ध्यान रखते हुए विभिन्न प्रकार का साहित्य छपने लगा। पुस्तक-विक्रेताओं ने गांव-गांव जाकर छोटी-छोटी पुस्तकें बेचने वाले फेरी वालों को नियुक्त किया। ये पुस्तकें मुख्यतः पंचांग, लोक-गाथाओं और लोकगीतों की हुआ करती थीं।
(3) मनोरंजन-प्रधान पुस्तकों की छपाई-कुछ समय बाद मनोरंजन-प्रधान पुस्तकें भी छापी जाने लगीं। इंग्लैंड में ये पेनी चैपबुक्स के नाम से तथा फ्रांस में बिब्लियोथीक ब्लू के नाम से प्रचलित थीं। ये पुस्तकें काफी सस्ती थीं तथा गरीब लोग भी इन्हें खरीदकर पढ़ सकते थे।
(4) प्रेम कहानियाँ तथा गाथाएँ-मनोरंजन-प्रधान पुस्तकों के अतिरिक्त चार-पाँच पृष्ठों की प्रेम-कहानियाँ भी छापी जाती थीं। कुछ अतीत की गाथाएँ होती थीं, जिन्हें 'इतिहास' कहते थे।
(5) पत्रिकाओं का प्रकाशन-अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ से पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ। इनमें समकालीन घटनाओं का वर्णन होता था तथा ये मनोरंजन की सामग्री भी प्रस्तुत करती थीं। समाचार-पत्रों तथा पत्रिकाओं में युद्ध और व्यापार से सम्बन्धित जानकारी के अतिरिक्त दूर देशों के समाचार होते थे।
(6) विज्ञान तथा दर्शन सम्बन्धी पुस्तकों का प्रकाशन-विज्ञान तथा दर्शन सम्बन्धी पुस्तकों का प्रकाशन भी होने लगा। इन सबके प्रभावस्वरूप लोगों में पढ़ने का जुनून पैदा हो गया।
प्रश्न 5. "मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रान्ति की पृष्ठभूमि तैयार की।" इस कथन के पक्ष में कोई तीन बिन्दु लिखिए।
अथवा
कुछ इतिहासकार ऐसा क्यों मानते हैं कि मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए जमीन तैयार की? वर्णन कीजिए।
उत्तर— मुद्रण संस्कृति द्वारा फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए जमीन तैयार करना-कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं-
(1) चिन्तकों के विचारों का प्रसार-मुद्रण संस्कृति के कारण फ्रांसीसी जनता में ज्ञानोदय के चिन्तकों के विचारों का प्रसार हुआ। उन्होंने अपनी रचनाओं में परम्पराओं, अन्धविश्वासों तथा निरंकुशवाद की कटु आलोचना की। उन्होंने रूढ़िवादी रीति-रिवाजों के अनुकरण की बजाय विवेकपूर्ण शासन पर तथा हर बात को तर्क और विवेक की कसौटी पर कसने पर बल दिया। उन्होंने चर्च की धार्मिक सत्ता और राज्य की निरंकुश सत्ता पर प्रहार किया और परम्परा पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को कमजोर कर दिया। वाल्तेयर और रूसो के लेखनों से प्रभावित होकर पाठक एक नवीन, आलोचनात्मक और तार्किक दृष्टिकोण से संसार को देखने लगे थे। अब पाठक लोग हर बात पर प्रश्न उठाने लगे।
(2) वाद-विवाद-संवाद की नवीन संस्कृति का प्रसार-छपाई ने वाद-विवाद-संवाद की नयी संस्कृति को जन्म दिया। अब समस्त प्राचीन मूल्यों, सभ्यताओं और नियमों पर आम-जनता के बीच वाद-विवाद होने लगे और उनका पुनर्मूल्यांकन किया जाने लगा। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक क्रान्ति के विचारों का सूत्रपात हुआ।
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(3) राजशाही और उसकी नैतिकता पर व्यंग्य करने वाले साहित्य का प्रकाशन- 1780 के दशक तक राजशाही और उसकी नैतिकता का उपहास करने वाले विपुल साहित्य का प्रकाशन हो चुका था। इस साहित्य ने सामाजिक व्यवस्था की त्रुटियों और बुराइयों पर प्रश्न उठाए। कार्टूनों और कैरिकेचरों (व्यंग्य चित्रों) में यह भाव उभरता था कि जनता तो मुश्किल में फँसी है जबकि राजशाही भोग-विलास में डूबी हुई है। ऐसे साहित्य ने लोगों को राजतन्त्र के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए उत्तेजित किया।
प्रश्न 6. भारत में 19वीं शताब्दी के मुद्रण ने न केवल विभिन्न समुदायों के विरोधाभासी विचारों के प्रकाशन को प्रेरित किया, अपितु उन्हें आपस में जोड़ा भी। इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर— भारत में 19वीं सदी में मुद्रण ने न केवल विभिन्न समुदायों के विरोधाभासी विचारों के प्रकाशन को प्रेरित किया, अपितु उन्हें आपस में जोड़ा भी। यथा-
(i) 19वीं सदी के अन्त में जाति भेद के बारे में विभिन्न पुस्तिकाएँ और निबंध प्रकाशित हुए। ज्योतिबा फुले ने अपनी पुस्तक 'गुलामगिरी-1871' में जाति प्रथा के अत्याचारों का वर्णन किया।
(ii) स्थानीय जाति-विरोधी और रूढ़िवादी-विरोधी आंदोलनों और सम्प्रदायों ने धर्मग्रन्थों की आलोचना करते हुए, नये और न्यायपूर्ण समाज का सपना बुनने की मुहिम में लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाएँ और गुटके छापे।
(iii) समाज और धर्म-सुधारकों तथा हिन्दू रूढ़िवादियों के बीच विधवा-दाह, एकेश्वरवाद, ब्राह्मण पुजारी वर्ग और मूर्ति-पूजा जैसे मुद्दों को लेकर तेज बहस जारी हुई। बंगाल में जैसे-जैसे बहस चली, लगातार बढ़ती तादाद में पुस्तिकाओं और अखबारों के माध्यम से तरह-तरह के तर्क समाज के बीच आने लगे। ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने की दृष्टि से इन्हें आम बोलचाल की भाषा में छापा गया।
(iv) पूरी 19वीं सदी के दौरान कई इस्लामी सम्प्रदाय और सेमिनरी पैदा हुए, धर्म को लेकर सबकी अपनी-अपनी व्याख्याएँ थीं, हर कोई अपना सम्प्रदाय बढ़ाना चाहता था और दूसरों के असर को काटना चाहता था।
(v) हिन्दुओं के बीच भी छपाई से खास तौर पर स्थानीय भाषाओं में धार्मिक पढ़ाई को काफी बल मिला। अनेक भारतीय भाषाओं में अनगिनत धार्मिक किताबें छपीं।
अभिप्राय यह है कि धार्मिक पुस्तकें बड़ी मात्रा में व्यापक जन-समुदाय तक पहुँच रही थीं जिसके चलते विभिन्न धर्मों के बीच और उनके अन्दर वाद-विवाद-संवाद की नयी स्थिति बन गई थी। लेकिन मुद्रण ने समुदाय के बीच सिर्फ मत-मतांतर ही पैदा नहीं किए, बल्कि इसने समुदायों को अन्दर से, और विभिन्न हिस्सों को पूरे भारत से जोड़ने का काम भी किया।
प्रश्न 7. "उन्नीसवीं सदी में साक्षरता के प्रसार से यूरोप में बच्चों, महिलाओं और मजदूरों के रूप में बड़ी मात्रा में नया पाठक वर्ग तैयार हुआ।" विवेचना कीजिए।
अथवा
19वीं सदी में यूरोप में किस तरह के नये पाठक वर्ग का निर्माण हुआ? (प्रश्न बैंक)
उत्तर— उन्नीसवीं सदी में यूरोप में साक्षरता के प्रसार से बच्चों, महिलाओं और मजदूरों के रूप में बड़ी मात्रा में नये पाठक-वर्ग का उदय हुआ।
(1) बच्चों के रूप में नये पाठक-वर्ग का उदय- उन्नीसवीं सदी के अन्त में प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य होने के परिणामस्वरूप बच्चों के रूप में नये पाठक-वर्ग का उदय हुआ। मुद्रकों के लिए पाठ्य-पुस्तकों का उत्पादन महत्वपूर्ण हो गया। फ्रांस में 1857 में एक प्रेस या मुद्रणालय स्थापित किया गया, जिसमें पुरानी और नई, दोनों प्रकार की परी-कथाओं और लोक-कथाओं का प्रकाशन किया गया। जर्मनी के ग्रिम बन्धुओं ने वर्षों के परिश्रम से किसानों से लोक-कथाएं इकट्ठी कीं और उन्हें 1812 के एक संकलन में छापा गया।
(2) महिलाओं के रूप में नये पाठक-वर्ग का उदय- साक्षरता के प्रसार से महिलाओं के रूप में भी नये पाठक-वर्ग का उदय हुआ। पेनी मैगजीन्स या एक-पेंसिया पत्रिकाएँ विशेष रूप से महिलाओं के लिए होती थीं। ये महिलाओं को सही चाल-चलन और गृहस्थी सिखाने वाली निर्देशिकाओं के समान थीं। उन्नीसवीं सदी में जब उपन्यास-साहित्य का प्रकाशन होने लगा, तो महिलाएँ उनकी महत्वपूर्ण पाठिकाएँ मानी गईं। प्रसिद्ध उपन्यासकारों में लेखिकाएँ अग्रणी थीं।
(3) मजदूरों के रूप में नये पाठक-वर्ग का उदय- सत्रहवीं सदी से ही किराए पर पुस्तकें देने वाले पुस्तकालय स्थापित हो गए थे। उन्नीसवीं शताब्दी में इंग्लैंड में ऐसे पुस्तकालयों का उपयोग सफेद-कॉलर मजदूरों, दस्तकारों एवं निम्नवर्गीय लोगों को शिक्षित करने के लिए किया गया।
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प्रश्न 8. मुद्रण युग से पहले भारत में सूचना और विचार कैसे लिखे जाते थे? भारत में प्रिंटिंग प्रेस का चलन किस प्रकार प्रारम्भ हुआ?
अथवा
मुद्रण-युग से पहले भारत में पांडुलिपियों की परम्परा का वर्णन कीजिए एवं उनकी त्रुटियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर— मुद्रण युग से पहले भारत की पांडुलिपियाँ-भारत में संस्कृत, अरबी, फारसी और अनेक क्षेत्रीय भाषाओं में हस्तलिखित पांडुलिपियों की पुरानी परम्परा थी। इस प्रकार भारत में सूचना और विचार हाथ से लिखे जाते थे। पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्तों या हाथ से बने कागज पर नकल कर बनाई जाती थीं। कभी-कभी पन्नों पर श्रेष्ठ चित्र भी बनाए जाते थे। फिर उन्हें लम्बे समय तक सुरक्षित रखने के लिए तख्तियों की जिल्द में या सिलकर बांध दिया जाता था। 19वीं शताब्दी के अन्त तक, छपाई के आने के बाद भी, पांडुलिपियाँ छापी जाती रहीं।
पांडुलिपियों की त्रुटियाँ- पांडुलिपियों की प्रमुख त्रुटियाँ निम्नलिखित थीं-
(1) पांडुलिपियाँ नाजुक होती थीं। इसके अतिरिक्त ये काफी महंगी भी होती थीं।
(2) पांडुलिपियों को सावधानी से पकड़ना होता था।
(3) लिपियों के अलग-अलग तरीके से लिखे जाने के परिणामस्वरूप उन्हें पढ़ना भी सरल नहीं था। इसलिए उनका व्यापक दैनिक प्रयोग नहीं होता था।
भारत में मुद्रण तकनीक का आगमन- भारत में प्रिंटिंग प्रेस सर्वप्रथम सोलहवीं सदी में गोवा में पुर्तगाली धर्म-प्रचारकों के साथ आया। 1674 ई. तक कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 पुस्तकें छप चुकी थीं। कैथोलिक पादरियों ने 1579 ई. में कोचीन में पहली तमिल पुस्तक छापी। 1713 ई. में उन्होंने पहली मलयालम पुस्तक छापी। उच्च प्रोटेस्टेंट धर्म प्रचारकों ने 32 तमिल पुस्तकें छापीं।
अंग्रेज-भाषी प्रेस- अंग्रेजी ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सत्रहवीं शताब्दी के अन्त तक छापेखाने का आयात शुरू कर दिया था। जेम्स अगस्तस हिक्की ने 1780 से बंगाल गजट नामक एक साप्ताहिक पत्रिका का सम्पादन करना शुरू किया। अठारहवीं सदी के अन्त तक अनेक पत्र-पत्रिकाएं छपने लगीं। कुछ भारतीय भी अपने समाचार-पत्र छापने लगे। गंगाधर भट्टाचार्य ने 'बंगाल गजट' का प्रकाशन शुरू किया।
प्रश्न 9. मुद्रण के परिणामस्वरूप भारत में किन साहित्यिक विधाओं का प्रकाशन होने लगा?
उत्तर— मुद्रण के परिणामस्वरूप भारत में नवीन साहित्यिक विधाओं का प्रकाशन
(1) उपन्यास, गीत, कहानियाँ, निबन्ध-छापेखाने के परिणामस्वरूप उपन्यास, कहानियाँ, गीत, सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लेख आदि विभिन्न साहित्यिक विधाओं का प्रकाशन होने लगा। अलग-अलग रुचियों के कारण ये सब विधाएँ पाठकों की दुनिया का हिस्सा बन गए। अपने अलग-अलग तेवरों में इन्होंने इन्सानी जिंदगी और अंतरंग भावनाओं और उन सामाजिक-राजनीतिक नियमों पर बल दिया जिनसे इनका स्वरूप तय होता था।
(2) एक नये प्रकार की दृश्य-संस्कृति का प्रादुर्भाव-उन्नीसवीं सदी के अन्त तक भारत में एक नये प्रकार की दृश्य-संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ। जब छापेखानों की संख्या बढ़ने लगी, तो छवियों की कई नकलें या प्रतियाँ बड़ी सरलता से बनाई जाने लगीं। प्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा ने सामान्य लोगों के लिए चित्र बनाए। काठ की तख्ती पर चित्र उकेरने वाले निर्धन चित्रकारों ने लैटरप्रेस छापेखानों के निकट अपनी दुकानें खोलीं और वे मुद्रकों से काम पाने लगे। बाजार में आसानी से उपलब्ध सस्ते चित्र तथा कैलेण्डर खरीदकर निर्धन लोग भी अपने घरों एवं कार्यालयों को सुसज्जित करते थे। इन छपे चित्रों ने धीरे-धीरे आधुनिकता और परम्परा, धर्म और राजनीति तथा समाज और संस्कृति को नवीन रूप प्रदान किया।
(3) कैरिकेचर तथा कार्टून-1870 के दशक तक पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न प्रकार के कैरिकेचर तथा कार्टून छपने लगे थे। कुछ कैरिकेचरों तथा कार्टूनों में शिक्षित भारतीयों के पश्चिमी वेशभूषा तथा पश्चिमी अभिरुचियों का मजाक उड़ाया जाता था। जबकि कुछ अन्य में सामाजिक परिवर्तन को लेकर एक डर देखा गया। साम्राज्यवादी व्यंग्य चित्रों में जहाँ राष्ट्रवादियों का मजाक उड़ाया जाता था, वहाँ राष्ट्रवादी व्यंग्य चित्रों में साम्राज्यवादी सत्ता पर निशाना साधा जाता था।
प्रश्न 10. अंग्रेजी सरकार द्वारा उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारतीय प्रेस पर लगाए गए प्रतिबन्धों का वर्णन कीजिए।
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सामाजिक विज्ञान (इतिहास) कक्षा X | 127
उत्तर—अंग्रेजी सरकार द्वारा उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारतीय प्रेस पर लगाए गए प्रतिबंधों का वर्णन निम्न प्रकार है-
(1) भारतीय प्रेस की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध—राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर अनेक भारतीय समाचार-पत्रों ने ब्रिटिश सरकार के अन्यायपूर्ण कार्यों का पर्दाफाश करना शुरू कर दिया। इससे ब्रिटिश सरकार बौखला गई और उसने भारतीय प्रेस का गला घोंटने वाले अनेक कानून बनाए। कोलकाता सर्वोच्च न्यायालय ने 1820 के दशक तक भारतीय प्रेस की स्वतन्त्रता को नियन्त्रित करने वाले कुछ कानून पास किए। लेकिन बाद में उदारवादी औपनिवेशिक अफसर टॉमस मैकाले ने इन कानूनों को हटाकर पहले की आजादियों को बहाल करते हुए नये कानून बनाए।
(2) वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट लागू करना—1878 में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पारित किया गया जिसके अनुसार भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों पर कड़े प्रतिबन्ध लगा दिए गए। अब सरकार को भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों में छपी हुई रिपोर्ट तथा सम्पादकीय को सेंसर करने का अधिकार प्राप्त हो गया। इससे भारत के राष्ट्रवादियों में तीव्र आक्रोश उत्पन्न हुआ।
(3) राष्ट्रवादी आलोचना को चुप करने का प्रयास—ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति के बावजूद भारतीय समाचार-पत्रों ने सरकार की अत्याचारपूर्ण नीति की आलोचना करना जारी रखा तो सरकार ने समाचार-पत्रों पर कठोर प्रतिबन्ध लगाए तथा दमनचक्र चलाया। पंजाब के क्रान्तिकारियों को 1907 में कालापानी भेजा गया, तो बालगंगाधर तिलक को 1908 में गिरफ्तार कर जेल में भेज दिया गया। इसके परिणामस्वरूप देशभर में विरोध प्रकट किया गया।
प्रश्न 11. मुद्रण क्रान्ति से आप क्या समझते हैं? इसके प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर—मुद्रण क्रान्ति से आशय—छापेखाने के आविष्कार के कारण बड़े पैमाने पर पुस्तकें छपने लगीं। छपाई से पुस्तकों की कीमतें गिरीं। बाजारों में पुस्तकों की उपलब्धता बढ़ गई तथा पाठक वर्ग भी बढ़ा। यही मुद्रण क्रान्ति कहलाती है।
मुद्रण क्रान्ति के प्रभाव
मुद्रण क्रान्ति के निम्नलिखित प्रमुख प्रभाव पड़े-
(1) लोगों के जीवन में परिवर्तन—मुद्रण क्रान्ति ने लोगों का जीवन परिवर्तित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप सूचना और ज्ञान से, संस्था और सत्ता से उनका सम्बन्ध ही बदल गया।
(2) लोक चेतना में परिवर्तन—मुद्रण क्रान्ति से लोक चेतना बदल गई तथा चीजों को देखने का लोगों का दृष्टिकोण भी बदल गया।
(3) नए पाठक वर्ग का उदय—छापेखाने के आने से एक नया पाठक वर्ग पैदा हुआ। किताबों की पहुँच आसान होने से पढ़ने की एक नई संस्कृति विकसित हुई। अब तक आम लोग मौखिक संसार में जीते थे। पहले जनता श्रोता थी लेकिन अब पाठक जनता अस्तित्व में आ गई थी। श्रोता और पाठक वर्ग एक-दूसरे में घुल-मिल गए।
(4) विचारों का व्यापक प्रचार-प्रसार—मुद्रण क्रान्ति के कारण ज्ञानोदय के चिन्तकों के विचारों का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार हुआ। इसने वाद-विवाद की एक नई संस्कृति को जन्म दिया जिसने राजशाही तथा धर्मांधता की आलोचना की। इसके परिणामस्वरूप चर्च में विभाजन हो गया और प्रोटेस्टेंट धर्म सुधार की शुरुआत हुई। वैज्ञानिक और दार्शनिकों के विज्ञान, तर्क और विवेकवाद के विचार लोकप्रिय साहित्य में स्थान पाने लगे।
(5) साक्षरता में वृद्धि एवं साहित्य की विविधता—मुद्रण क्रान्ति से 17वीं और 18वीं सदी में यूरोप में साक्षरता बढ़ी, गाँवों में स्कूलों की स्थापना हुई, लोगों में पढ़ने का जुनून पैदा हुआ। नए पाठकों की रुचि का ध्यान रखते हुए किस्म-किस्म का साहित्य छपने लगा।
(6) फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ—मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए भी अनुकूल परिस्थितियाँ रचीं।
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समकालीन भारत-2 ( भूगोल )