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सामाजिक विज्ञान (Social Science)हिंदी माध्यम2026-27

RBSE Class 10 SST Chapter 6 Solutions in Hindi — [भूगोल] संसाधन एवं विकास | पासबुक हल, नोट्स

📅 अंतिम अपडेट: 2026-09-10📖 RBSE/NCERT Solutions
भाग 1 — समाधान (भूगोल पाठ 1)

📖 1. समाधान: पाठगत एवं पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नोत्तर

राजस्थान बोर्ड कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान (भूगोल) — सभी पाठगत प्रश्नों एवं पाठ्यपुस्तक अभ्यास के संपूर्ण सटीक उत्तर।

पाठगत प्रश्न

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पृष्ठ 1

प्रश्न 1. क्या आप उन वस्तुओं का नाम बता सकते हैं जो गाँवों और शहरों में हमारे जीवन को आराम पहुँचाती हैं? ऐसी वस्तुओं की एक सूची तैयार करें और इनको बनाने में प्रयोग होने वाले पदार्थों का नाम बताएँ।

उत्तर— हमारे जीवन को आराम पहुँचाने वाली ऐसी अनेक वस्तुएँ हैं जो गाँवों और शहरों में उपलब्ध हैं। ऐसी वस्तुओं की सूची बहुत लम्बी है। कुछ प्रमुख वस्तुओं की सूची निम्न प्रकार है-

वस्तु

बनाने में प्रयोग होने वाले पदार्थ

गाँव

कुर्सी, पलंग, घर, कृषि एवं घरेलू उपकरण, साइकिल, मोटर-साइकिल, गैस स्टोव, पंखा, कूलर, कपड़े, बर्तन आदि।

लकड़ी, लोहा, ईंट-पत्थर, बांस, प्लास्टिक, इस्पात, सीमेंट, रबड़, स्टील, तांबा, कांच, कपास, ऊन आदि।

शहर

मकान, कुर्सी-टेबल, सोफा, पलंग, वाशिंग मशीन, फ्रिज, ए सी, पंखा, कूलर, कार, मोटर, मोटर-साइकिल, गैस स्टोव, अन्य घरेलू उपकरण, कपड़े, बर्तन आदि।

ईंट, पत्थर, लोहा, सीमेंट, लकड़ी, कपड़ा, फोम, स्पंज, प्लास्टिक, कांच, स्टील, तांबा, कपास, ऊन आदि।

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पृष्ठ 3

प्रश्न 2. क्या आप संसाधन सम्पन्न परन्तु आर्थिक रूप से पिछड़े और संसाधन विहीन परन्तु आर्थिक रूप से विकसित प्रदेशों का नाम बता सकते हैं? ऐसी परिस्थिति होने के कारण बताएँ।

उत्तर— भारत में झारखण्ड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश तथा राजस्थान संसाधन सम्पन्न किन्तु आर्थिक रूप से पिछड़े राज्य हैं जबकि पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र संसाधन विहीन किन्तु आर्थिक रूप से विकसित राज्य हैं।

इसका प्रमुख कारण पिछड़े राज्यों में उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास, आधारभूत संरचना और संस्थागत परिवर्तन की कमी है जबकि विकसित राज्यों में प्रौद्योगिकी विकास, आधारभूत संरचना तथा संस्थागत परिवर्तन की बहुलता है।

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पाठ्यपुस्तक के प्रश्न

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1. बहुवैकल्पिक प्रश्न-

(i) पंजाब में भूमि निम्नीकरण का निम्नलिखित में से मुख्य कारण क्या है? (प्रश्न बैंक)

(क) गहन खेती (ख) अधिक सिंचाई (ग) वनोन्मूलन (घ) अति पशुचारण

(ii) निम्नलिखित में से किस प्रान्त में सीढ़ीदार (सोपानी) खेती की जाती है? (प्रश्न बैंक)

(क) पंजाब (ख) उत्तरप्रदेश के मैदान

(ग) हरियाणा (घ) उत्तराखण्ड

(iii) इनमें से किस राज्य में काली मृदा मुख्य रूप से पायी जाती है? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25; प्रश्न बैंक)

(क) जम्मू और कश्मीर (ख) राजस्थान (ग) महाराष्ट्र (घ) झारखण्ड

उत्तर-(i) (ख) (ii) (घ) (iii) (ग)

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।

प्रश्न (i) तीन राज्यों के नाम बताएँ जहाँ काली मृदा पाई जाती है। इस पर मुख्य रूप से कौनसी फसल उगाई जाती है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— (1) महाराष्ट्र, (2) मध्यप्रदेश और (3) छत्तीसगढ़ राज्यों में काली मृदा पाई जाती है। इस पर मुख्य रूप से कपास की फसल उगाई जाती है।

प्रश्न (ii) पूर्वी तट के नदी डेल्टाओं पर किस प्रकार की मृदा पाई जाती है? इस प्रकार की मृदा की तीन मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— पूर्वी तट के नदी डेल्टाओं पर जलोढ़ मृदा पाई जाती है।

विशेषताएँ—(1) ये फॉस्फोरस, पोटाश व चूनायुक्त होती हैं।

--- [ पृष्ठ संख्या: 138 ] ---

सामाजिक विज्ञान (भूगोल) कक्षा X 131

(2) इसमें रेत, सिल्ट और मृत्तिका के विभिन्न अनुपात पाए जाते हैं।

(3) यह अत्यधिक उपजाऊ होती है।

प्रश्न (iii) पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन की रोकथाम के लिए क्या कदम उठाने चाहिए?

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)

उत्तर— पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन की रोकथाम के लिए निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए-

(1) पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेत बनाकर कृषि की जानी चाहिए।

(2) पहाड़ी ढालों पर सघन वृक्षारोपण किया जाना चाहिए।

(3) ढाल वाली भूमि पर समोच्च जुताई की जानी चाहिए।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 120 शब्दों में दीजिए।

प्रश्न (i) भारत में भूमि उपयोग प्रारूप का वर्णन करें। वर्ष 1960-61 से वन के अन्तर्गत क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण वृद्धि नहीं हुई, इसका क्या कारण है?

उत्तर— भारत में भू-उपयोग प्रारूप-भू-उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्त्वों में भौतिक कारक यथा भू-आकृति, जलवायु और मृदा के प्रकार तथा मानवीय कारक, जैसे-जनसंख्या घनत्व, प्रौद्योगिक क्षमता, संस्कृति और परम्पराएँ आदि शामिल हैं। भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से 93 प्रतिशत भाग के ही भू-उपयोग के आंकड़े उपलब्ध हैं। क्योंकि पूर्वोत्तर प्रान्तों में असम को छोड़कर अन्य प्रान्तों के सूचित क्षेत्र के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तान और चीन अधिकृत क्षेत्रों के भूमि उपयोग का सर्वेक्षण भी नहीं हुआ है। वर्ष 2014-15 के आँकड़ों के अनुसार भारत में भूमि उपयोग प्रारूप के प्रमुख तथ्य इस प्रकार हैं, यथा-

(1) भारत में भूमि उपयोग सन्तुलित नहीं है-

(i) भूमि का सर्वाधिक 45.5 प्रतिशत उपयोग शुद्ध बोये गये क्षेत्र के अन्तर्गत एवं सबसे कम उपयोग 1% विविध वृक्षों, वृक्ष फसलों एवं उपवनों के अन्तर्गत है।

(ii) यहाँ वनों के अन्तर्गत 23.3% क्षेत्र है।

(iii) स्थायी चरागाह के अन्तर्गत भी भूमि कम (3.3 प्रतिशत) है।

(2) हमारे देश में भूमि उपयोग का प्रारूप राष्ट्रीय, राज्य एवं स्थानीय स्तर पर भी संतुलित नहीं है।

1960-61 से वन के अन्तर्गत क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण वृद्धि नहीं होने के कारण-1960-61 की तुलना में 2014-15 में वन क्षेत्र में केवल 5.19 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भारत में वनों के अधीन भूमि में अधिक वृद्धि न हो पाने का मुख्य कारण देश की जनसंख्या में वृद्धि होना है। वनों की आर्थिक लाभ के लिए कटाई जारी रही है। विभिन्न उद्योगों के विकास, कृषि कार्य एवं आवास के लिए वनों को काटा जाता रहा है। यही कारण है कि वर्ष 1960-61 से वन क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण वृद्धि नहीं हुई है।

प्रश्न (ii) प्रौद्योगिक और आर्थिक विकास के कारण संसाधनों का अधिक उपभोग कैसे हुआ है?

(प्रश्न बैंक)

उत्तर— प्रौद्योगिक और आर्थिक विकास के कारण संसाधनों का अधिक उपभोग निम्नलिखित प्रकार से हुआ है, यथा-

(1) प्रौद्योगिक विकास हमें आधुनिक औजार एवं मशीनें प्रदान करता है जिससे उत्पादन में वृद्धि होती है। फलस्वरूप संसाधनों का अधिक उपभोग होता है।

(2) प्रौद्योगिक विकास में आर्थिक विकास भी होता है और लोगों की आवश्यकताएँ बढ़ती हैं। इसके फलस्वरूप पुनः संसाधनों का उपभोग बढ़ जाता है।

(3) आर्थिक विकास आधुनिकतम प्रौद्योगिकी के विकास हेतु अनुकूल वातावरण प्रदान करता है। इस नवीनतम प्रौद्योगिकी से नये संसाधनों का दोहन प्रारम्भ हो जाता है।

उदाहरण के लिए आज राजस्थान में उचित प्रौद्योगिकी के विकास से विभिन्न खनिज एवं शक्ति संसाधनों का पर्याप्त दोहन किया जा रहा है जिससे विकास तीव्र गति से हो रहा है। अतः स्पष्ट है कि प्रौद्योगिकी आर्थिक विकास को गति प्रदान करती है और आर्थिक विकास से संसाधनों का अधिक उपभोग होता है।

परियोजना/क्रियाकलाप

प्रश्न 1. अपने आस-पास के क्षेत्रों में संसाधनों के उपभोग और संरक्षण को दर्शाते हुए एक परियोजना तैयार करें।

--- [ पृष्ठ संख्या: 139 ] ---

उत्तर—[स्वयं करने के लिए]।

प्रश्न 2. आपके विद्यालय में उपयोग किए जा रहे संसाधनों के संरक्षण विषय पर अपनी कक्षा में एक चर्चा आयोजित करें।

उत्तर—[कक्षा में चर्चा आयोजित करें]।

प्रश्न 3. वर्ग पहेली को सुलझाएँ; उर्ध्वाधर और क्षैतिज छिपे उत्तरों को ढूँढें।

(i) भूमि, जल, वनस्पति और खनिजों के रूप में प्राकृतिक सम्पदा

(ii) अनवीकरण योग्य संसाधन का एक प्रकार

(iii) उच्च नमी रखाव क्षमता वाली मृदा

(iv) मानसून जलवायु में अत्यधिक निक्षालित मृदाएँ

(v) मृदा अपरदन की रोकथाम के लिए बृहत् स्तर पर पेड़ लगाना

(vi) भारत के विशाल मैदान इन मृदाओं से बने हैं।

[नोट : पहेली के उत्तर अंग्रेजी के शब्दों में हैं।]

उत्तर—

[वर्ग पहेली (Word Puzzle)]

कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान पाठ 6 संसाधन एवं विकास चित्र 1

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(i) RESOURCE (ii) MINERALS (iii) BLACK

(iv) LATERITE (v) AFFORESTATION (vi) ALLUVIAL

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भाग 2 — रिवीजन नोट्स (Notes & Summary)

📝 2. नोट्स: पाठ-सार, मुख्य बिंदु एवं शब्दावली

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं, भौगोलिक परिभाषाएं, राजनीतिक सिद्धांत एवं संपूर्ण अध्याय का सारगर्भित सारांश।

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पाठ-सार

(1) संसाधन-पर्यावरण में उपलब्ध वह प्रत्येक वस्तु जो कि मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है और जिसको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है एवं जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है, संसाधन कहलाती है।

(2) प्रकृति, प्रौद्योगिकी और संस्थाओं के मध्य अन्तर्सम्बन्ध-मानव प्रौद्योगिकी द्वारा प्रकृति के साथ क्रिया करते हैं और अपने आर्थिक विकास की गति को तेज करने के लिए संस्थाओं का निर्माण करते हैं।

संसाधन मानव-क्रियाओं का परिणाम है। वे पर्यावरण में पाए जाने वाले पदार्थों को संसाधनों में परिवर्तित करते हैं तथा उन्हें प्रयोग करते हैं।

(3) संसाधनों का वर्गीकरण-

(क) उत्पत्ति के आधार पर-जैव और अजैव

(ख) समाप्यता के आधार पर-नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य

(ग) स्वामित्व के आधार पर-व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय

(घ) विकास के आधार पर-संभावी, विकसित भंडार और संचित कोष।

(4) संसाधनों का विकास-संसाधन मनुष्य के जीवनयापन के लिए आवश्यक हैं। वे जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए भी महत्त्वपूर्ण हैं। फलतः मानव ने इनका अंधाधुंध उपयोग किया है जिससे निम्न समस्याएँ पैदा हुई हैं-

(i) संसाधनों का ह्रास, (ii) समाज का दो हिस्सों में बँटवारा-संसाधन सम्पन्न और संसाधन हीन, (iii) भूमण्डलीय तापन, ओजोन परत अवक्षय, पर्यावरण प्रदूषण और भूमि निम्नीकरण जैसी संकटपूर्ण वैश्विक परिस्थितिकी।

अतः हर तरह के जीवन का अस्तित्व बनाए रखने के लिए संसाधनों के उपयोग की योजना बनाना आवश्यक है।

(5) सतत पोषणीय विकास-सतत पोषणीय आर्थिक विकास का अर्थ है कि विकास पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए हो और वर्तमान विकास की प्रक्रिया भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता की अवहेलना न करे।

(6) संसाधन नियोजन-संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए उनका नियोजन किया जाना चाहिए। इसके निम्नलिखित सोपान हैं-

(i) देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान करके उनकी तालिका बनाना।

(ii) संसाधन विकास योजनाएँ लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत नियोजन ढाँचा तैयार करना।

(iii) संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजना में समन्वय स्थापित करना।

(7) संसाधनों का संरक्षण-संसाधनों के विवेकहीन उपभोग और अति उपयोग के कारण उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याओं से बचाव के लिए विभिन्न स्तरों पर संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है।

(8) भूमि संसाधन-मनुष्य की समस्त प्रारम्भिक आवश्यकताओं का आधार भूमि संसाधन है। भूमि जिस पर हम रहते हैं तथा इसी पर अनेकों आर्थिक क्रियाकलाप करते हैं और विभिन्न रूपों में इसका उपयोग करते हैं। अतः भूमि एक अति महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक तथा एक सीमित संसाधन है। भारत में भूमि पर विभिन्न प्रकार की भू-आकृतियाँ, जैसे-पर्वत, पठार, मैदान और द्वीप-पाए जाते हैं।

--- [ पृष्ठ संख्या: 136 ] ---

सामाजिक विज्ञान (भूगोल) कक्षा X 129

(9) भू-उपयोग-भू-संसाधनों का उपयोग निम्नलिखित उद्देश्यों से किया जाता है-(i) वन (ii) बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि (iii) परती भूमि के अन्तर्गत अन्य कृषि अयोग्य भूमि (iv) परती भूमि (v) शुद्ध बोया गया क्षेत्र।

(10) भारत में भूमि उपयोग प्रारूप-भू-उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्वों में भौतिक कारक यथा भू-आकृति, जलवायु और मृदा के प्रकार तथा मानवीय कारक यथा जनसंख्या घनत्व, प्रौद्योगिक क्षमता, संस्कृति और परम्पराएँ आदि शामिल हैं।

(11) भूमि निम्नीकरण और संरक्षण के उपाय-मानवीय कार्यकलापों के कारण भूमि की गुणवत्ता का कम हो जाना भूमि निम्नीकरण कहा जाता है। कुछ मानव क्रियाओं जैसे वनोन्मूलन, अति पशुचारण, अति सिंचन तथा खनन ने भूमि के निम्नीकरण में मुख्य भूमिका निभाई है। औद्योगिक प्रदूषित जल भी भूमि और जल प्रदूषण का एक मुख्य स्रोत है।

भूमि निम्नीकरण की समस्याओं को सुलझाने के कई तरीके हैं, जैसे-वनारोपण, चरागाहों का उचित प्रबंधन, बंजर भूमि के उचित प्रबंधन, खनन नियंत्रण और औद्योगिक जल का परिष्करण आदि।

(12) मृदा संसाधन-मिट्टी अथवा मृदा सबसे महत्वपूर्ण नवीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधन है। मृदा बनने की प्रक्रिया को निर्धारित करने वाले प्रमुख हैं-उच्चावच, जनक शैल, जलवायु, वनस्पति, अन्य जैव पदार्थ तथा समय। प्रकृति की अनेक प्रक्रियाएँ भी मृदा बनने की प्रक्रिया में योग देती हैं, जैसे-तापमान परिवर्तन, बहते जल की क्रिया, पवन, हिमनदी और अपघटन प्रक्रियाएँ।

(13) मृदाओं का वर्गीकरण-भारत में उच्चावच, भू-आकृतियाँ, जलवायु व वनस्पति की विविधता के कारण अनेक प्रकार की मृदाओं का विकास हुआ है। यथा-

(i) जलोढ़ मृदा-यह मृदा हिमालय की तीन महत्वपूर्ण नदी तंत्रों यथा सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए निक्षेपों से बनी है। सम्पूर्ण उत्तरी मैदान तथा पूर्वी तटीय मैदान जलोढ़ मृदा से बना है। जलोढ़ मृदा में रेत, सिल्ट और मृतिका के विभिन्न अनुपात पाए जाते हैं। आयु के आधार पर जलोढ़ मृदाएँ दो प्रकार की होती हैं- (1) बांगर और (2) खादर। जलोढ़ मृदाएँ बहुत उपजाऊ होती हैं। ये पोटाश, फास्फोरस और चूनायुक्त होती हैं। इसलिए जलोढ़ मृदा वाले क्षेत्रों में गहन कृषि होती है।

(ii) काली मृदा-इन मृदाओं का रंग काला होता है तथा इनको रेगुर मृदाएँ भी कहा जाता है। काली मृदा कपास की खेती के लिए उचित समझी जाती है। ये मृदाएँ महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार पर पाई जाती हैं। इसकी नमी धारण करने की क्षमता बहुत होती है।

(iii) लाल और पीली मृदा-दक्कन के पठार के पूर्वी और दक्षिणी भाग में रवेदार आग्नेय चट्टानों पर कम वर्षा वाले भागों में लाल मृदा विकसित हुई है। ये मृदाएँ ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा के मैदान के दक्षिणी छोर पर तथा पश्चिमी घाट में पहाड़ी पद पर पाई जाती हैं।

(iv) लेटराइट मृदा-लेटराइट मृदा उच्च तापमान और अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती है। यह अधिकतर गहरी तथा अम्लीय होती है। यह अधिकतर दक्षिणी राज्यों, महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट क्षेत्रों, ओडिशा, पश्चिमी बंगाल के कुछ भागों तथा उत्तर-पूर्वी प्रदेशों में पाई जाती है।

(v) मरुस्थली मृदा-मरुस्थली मृदाओं का रंग लाल और भूरा होता है। ये मृदाएँ आमतौर पर रेतीली और लवणीय होती हैं। इसमें ह्यूमस और नमी की मात्रा कम होती है। सही तरीके से सिंचित करके इसे कृषि योग्य बनाया जा सकता है।

(vi) वन मृदा-इस प्रकार की मृदाएँ आमतौर पर पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं जहाँ पर्याप्त वर्षा व वन उपलब्ध हैं।

(14) मृदा अपरदन और संरक्षण-मृदा के कटाव व बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहा जाता है। मृदा अपरदन मृदा की सबसे महत्वपूर्ण समस्या है। इससे मृदा की उर्वर-शक्ति का निरन्तर ह्रास होता है। मृदा अपरदन के कारक हैं-वनोन्मूलन, अति पशुचारण, निर्माण और खनन जैसी मानवीय क्रियाएँ तथा पवन, हिमनदी और जल जैसे प्राकृतिक तत्त्व।

मृदा के संरक्षण हेतु कई उपाय किये जा सकते हैं। इनमें समोच्च रेखीय जुताई, पट्टी कृषि, सीढ़ीदार कृषि तथा रक्षक मेखला आदि प्रमुख हैं।

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भाग 3 — परीक्षा उपयोगी प्रश्न (Important Questions)

3. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), रिक्त स्थान, अतिलघूत्तरात्मक, लघूत्तरात्मक एवं निबंधात्मक परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

● बहुविकल्पीय प्रश्न—

1. गुजरात व राजस्थान में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण है-

(अ) अति पशुचारण (ब) वनोन्मूलन (स) अत्यधिक सिंचाई (द) खनन

उत्तर—(अ) अति पशुचारण

2. निम्न में से किस राज्य में लाल और पीली मृदा पाई जाती है-

(अ) राजस्थान (ब) गुजरात (स) मध्यप्रदेश (द) उड़ीसा

उत्तर—(स) मध्यप्रदेश

3. भारत का सम्पूर्ण उत्तरी मैदान जिस प्रकार की मृदा से बना है, वह है-

(अ) काली मृदा (ब) लाल और पीली मृदा

(स) जलोढ़ मृदा (द) लेटराइट मृदा

उत्तर—(स) जलोढ़ मृदा

4. संसाधनों के अंधाधुंध शोषण का परिणाम है-

(अ) भूमंडलीय तापन (ब) भूमि निम्नीकरण

(स) ओजोन परत अवक्षय (द) उपर्युक्त सभी

उत्तर—(द) उपर्युक्त सभी

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सामाजिक विज्ञान (भूगोल) कक्षा X 133

5. रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन कब हुआ?

(अ) जून, 1986 में (ब) जून, 1992 में (स) मई, 1996 में (द) जनवरी, 2002 में

6. 'स्माल इज ब्यूटीफुल' पुस्तक के रचयिता हैं-

(अ) शुमेसर (ब) ब्रुन्डटलैंड (स) मोरारजी देसाई (द) महात्मा गाँधी

7. झारखण्ड में भूमि निम्नीकरण का प्रमुख कारण क्या है?

(अ) अति पशुचारण (ब) खनन (स) अधिक सिंचाई (द) गहन खेती

8. अधिकतर गहरी तथा अम्लीय (pH < 6.0) किस मृदा का गुण है?

(अ) काली मृदा (ब) जलोढ़ मृदा (स) मरुस्थली मृदा (द) लेटराइट मृदा

9. उत्पत्ति के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण किया जा सकता है-

(अ) जैव और अजैव (ब) नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य

(स) व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय (द) संभावी, विकसित भंडार और संचित कोष

10. संसाधनों को नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य में वर्गीकृत जिस आधार पर किया जाता है, वह है-

(अ) उत्पत्ति के आधार पर (ब) समाप्यता के आधार पर

(स) स्वामित्व के आधार पर (द) विकास के स्तर के आधार पर

11. भारत में लगभग 43 प्रतिशत भू-क्षेत्र पर हैं-

(अ) पठार (ब) मैदान (स) पर्वत (द) उपर्युक्त में कोई नहीं

12. भारत के क्षेत्रफल का कितने प्रतिशत भाग पठारी क्षेत्र के अन्तर्गत आता है?

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)

(अ) 43 प्रतिशत (ब) 27 प्रतिशत (स) 30 प्रतिशत (द) 9 प्रतिशत

13. भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल है-

(अ) 32.8 लाख वर्ग किमी. (ब) 30 लाख वर्ग किमी.

(स) 22.8 लाख वर्ग किमी. (द) 42.8 लाख वर्ग किमी.

14. भारत के कुल सूचित क्षेत्र के कितने प्रतिशत हिस्से पर ही खेती हो सकती है-

(अ) 80 प्रतिशत (ब) 54 प्रतिशत (स) 32.8 प्रतिशत (द) 33 प्रतिशत

15. भारत में राष्ट्रीय वन नीति (1952) द्वारा निर्धारित वनों के अन्तर्गत कितने प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र वांछित किये गये हैं? (प्रश्न बैंक)

(अ) 94% (ब) 54% (स) 33% (द) 20%

16. बंजर भूमि के अन्तर्गत जो नहीं आती है, वह है-

(अ) पहाड़ी चट्टानें (ब) बस्तियाँ (स) सूखी भूमि (द) मरुस्थलीय भूमि

17. गैर-कृषि प्रयोजनों में लगाई गई भूमि में नहीं आती है-

(अ) बस्तियाँ (ब) सड़कें (स) उद्योग (द) पहाड़ी चट्टानें

18. इनमें से किस राज्य में मरुस्थली मृदा मुख्य रूप से पाई जाती है?

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22)

(अ) राजस्थान (ब) जम्मू और कश्मीर (स) महाराष्ट्र (द) झारखण्ड

19. शीत मरुस्थल प्रदेश है-

(अ) छत्तीसगढ़ (ब) राजस्थान (स) लद्दाख (द) मध्यप्रदेश

20. भारत का सम्पूर्ण उत्तरी मैदान जिस मृदा से बना है, वह है-

(अ) काली मृदा (ब) जलोढ़ मृदा (स) लाल और पीली मृदा (द) मरुस्थली मृदा

21. कपास की खेती के लिए उपयुक्त मृदा है-

(अ) जलोढ़ मृदा (ब) मरुस्थली मृदा (स) लाल व पीली मृदा (द) काली मृदा

22. काजू की फसल के लिए उपयुक्त है-

(अ) लाल लेटराइट मृदा (ब) जलोढ़ मृदा (स) काली मृदा (द) मरुस्थली मृदा

23. मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को कहा जाता है-

(अ) मृदा संरक्षण (ब) मृदा अपरदन (स) समोच्च जुताई (द) उत्खात

--- [ पृष्ठ संख्या: 141 ] ---

24. चादर अपरदन के लिए निम्न में से कौनसा कारक उत्तरदायी है?

(अ) जल (ब) वायु (स) हिमनदी (द) खनन

25. लाल-पीली मृदा पाई जाती है-

(अ) दक्कन के पठारी क्षेत्र में (ब) मालवा प्रदेश में

(स) ब्रह्मपुत्र घाटी में (द) उत्तरी मैदान में

26. कृषि वर्ष में एक से अधिक बार बोया गया क्षेत्र- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)

(अ) सकल कृषित क्षेत्र (ब) शुद्ध बोया क्षेत्र (स) परती भूमि (द) चरागाह

27. नवीकरण योग्य संसाधन है- (प्रश्न बैंक)

(अ) पवन ऊर्जा (ब) जल (स) वन (द) उपर्युक्त सभी

उत्तरमाला

1. (अ) 2. (द) 3. (स) 4. (द) 5. (ब) 6. (अ) 7. (ब)

8. (द) 9. (अ) 10. (ब) 11. (ब) 12. (ब) 13. (अ) 14. (ब)

15. (स) 16. (ब) 17. (द) 18. (अ) 19. (स) 20. (ब) 21. (द)

22. (अ) 23. (ब) 24. (अ) 25. (अ) 26. (अ) 27. (द)।

● रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-

1. संसाधन ......... क्रियाओं का परिणाम है।

2. संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए .......... एक सर्वमान्य रणनीति है। (प्रश्न बैंक)

3. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित तरीके से संसाधन संरक्षण की वकालत 1968 में .......... ने की।

4. .......... में पहाड़ी चट्टानें, सूखी और मरुस्थलीय भूमि शामिल हैं।

5. काली मृदाओं को ........... मृदाएँ भी कहा जाता है। (प्रश्न बैंक)

6. मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा ............... कहा जाता है।

7. चंबल बेसिन में उत्खात भूमि को ............. भूमि कहा जाता है।

8. काली मृदा .......... की खेती के लिए उचित समझी जाती है।

9. फसलों के बीच वृक्षों की कतारें लगाना ............. कहलाता है।

10. बहता जल मृतिकायुक्त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाएँ बनाता है, जिन्हें ............... कहते हैं।

11. कच्चा तेल गैर ................. संसाधन है। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)

12. जून 1992 में ब्राजील के ................. शहर में प्रथम अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन हुआ था। (प्रश्न बैंक)

उत्तरमाला

1. मानवीय 2. नियोजन 3. क्लब ऑफ रोम 4. बंजर भूमि 5. रेगुर 6. अपरदन 7. खण्ड 8. कपास 9. रक्षक मेखला 10. अवनलिकाएँ 11. नवीकरणीय 12. रियो डी जेनेरियो।

● अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. विश्व पर्यावरण दिवस कब मनाया जाता है?

उत्तर- 5 जून को।

प्रश्न 2. बांगर और खादर में दो अन्तर बताइए।

उत्तर- (i) प्राचीन जलोढ़ को बांगर और नवीन जलोढ़ को खादर कहा जाता है।

(ii) बांगर की अपेक्षा खादर अधिक उपजाऊ होता है।

प्रश्न 3. 'एजेन्डा-21' क्या है?

उत्तर- यह संयुक्त राष्ट्र की एक घोषणा है जिसका उद्देश्य भूमण्डलीय सतत् पोषणीय विकास हासिल करना है।

प्रश्न 4. संसाधनों का संरक्षण हमारे लिए क्यों आवश्यक है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर- संसाधनों का संरक्षण निम्न कारणों से आवश्यक है-(i) वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करना और (ii) भावी पीढ़ियों के लिए बचाकर रखना।

प्रश्न 5. संसाधन विकास का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

--- [ पृष्ठ संख्या: 142 ] ---

सामाजिक विज्ञान (भूगोल) कक्षा X 135

उत्तर—संसाधन विकास से तात्पर्य उस प्रयत्न से है जिसके अंतर्गत संसाधन का मानवीय संतुष्टि में उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 6. समाप्यता के आधार पर संसाधन का वर्गीकरण कीजिए।

उत्तर— (i) नवीकरण योग्य संसाधन (ii) अनवीकरण योग्य संसाधन।

प्रश्न 7. प्रथम अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन किस देश में आयोजित किया गया? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— ब्राजील (रियो-डि-जेनेरो) में।

प्रश्न 8. भू-उपयोग को निर्धारित करने वाले भौतिक तत्त्वों के नाम बताइये।

उत्तर— भू-आकृति, जलवायु और मृदा के प्रकार।

प्रश्न 9. भारत में राष्ट्रीय वन नीति (1952) के अनुसार वनों के अंतर्गत कितने प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र वांछित है?

उत्तर— 33 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र।

प्रश्न 10. बंजर भूमि में कौन-कौनसे स्थलीय भाग शामिल हैं?

उत्तर— पहाड़ी चट्टानें, सूखी और मरुस्थलीय भूमि।

प्रश्न 11. वर्तमान में भारत की कितने हैक्टेयर भूमि निम्नीकृत है?

उत्तर— लगभग 13 करोड़ हैक्टेयर भूमि।

प्रश्न 12. कपास की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाने वाली मृदा का नाम बताइये। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— काली मृदा।

प्रश्न 13. संसाधन से क्या अभिप्राय है? स्पष्ट कीजिये।

उत्तर— पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो कि मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है, संसाधन कहलाती है।

प्रश्न 14. सतत पोषणीय विकास का क्या आशय है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— सतत पोषणीय विकास से आशय है कि विकास पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए हो और वर्तमान विकास की प्रक्रिया भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता की अवहेलना न करे।

प्रश्न 15. भारत के उन राज्यों के नाम बताइये जिनमें खनिजों और कोयले के प्रचुर भंडार उपलब्ध हैं।

उत्तर— झारखण्ड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़।

प्रश्न 16. भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल कितना है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर है।

प्रश्न 17. भारत के उन राज्यों के नाम बताइये जिनमें 10 प्रतिशत से भी कम क्षेत्र पर फसलें उगाई जाती हैं।

उत्तर— भारत में अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर तथा अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में 10 प्रतिशत से भी कम क्षेत्र पर फसलें उगाई जाती हैं।

प्रश्न 18. भू-संसाधनों का निम्नीकरण किस कारण हो रहा है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— लंबे समय तक लगातार भूमि संरक्षण और प्रबंधन की अवहेलना करने एवं लगातार भू-उपयोग के कारण भू-संसाधनों का निम्नीकरण हो रहा है।

प्रश्न 19. मृदा अपरदन के दो कारण लिखिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— (i) नदियों में बाढ़ आना (ii) वनोन्मूलन।

प्रश्न 20. मृदा अपरदन को नियंत्रित करने वाली किन्हीं दो विधियों के नाम लिखिए।

उत्तर— (i) ढाल वाली भूमि पर समोच्च जुताई (ii) वृक्षारोपण।

प्रश्न 21. मृदा किस प्रकार के पदार्थों से बनती है?

उत्तर— मृदा जैव और अजैव दोनों प्रकार के पदार्थों से बनती है।

प्रश्न 22. मृदा निर्माण की प्रक्रिया में मुख्य कारकों के नाम बताइये।

उत्तर— मृदा निर्माण की प्रक्रिया में उच्चावच, जनक शैल, जलवायु, वनस्पति, अन्य जैव पदार्थ और समय मुख्य कारक हैं।

प्रश्न 23. आयु के आधार पर जलोढ़ मृदाएँ कितने प्रकार की होती हैं? उनके नाम लिखिए।

उत्तर— आयु के आधार पर जलोढ़ मृदाएँ दो प्रकार की होती हैं-(1) बांगर और (2) खादर।

प्रश्न 24. जलोढ़ मृदा वाले क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व अधिक क्यों पाया जाता है?

उत्तर— जलोढ़ मृदा वाले क्षेत्रों में गहन कृषि के कारण यहाँ जनसंख्या घनत्व अधिक पाया जाता है।

--- [ पृष्ठ संख्या: 143 ] ---

प्रश्न 25. काली मृदा की दो विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर— (1) काली मृदा बहुत महीन कणों अर्थात् मृत्तिका से बनी होती है।

(2) इसकी नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है।

प्रश्न 26. लेटराइट मृदा किन क्षेत्रों में पाई जाती है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— लेटराइट मृदा उच्च तापमान और अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाई जाती है।

प्रश्न 27. नीचे दिए गए किसी मृदा के लक्षणों को पढ़िए और संबंधित मृदा का नाम लिखिए।

(क) अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती है।

(ख) अत्यधिक निक्षालन प्रक्रिया घटित होती है।

(ग) ह्यूमस की मात्रा कम पाई जाती है।

उत्तर— लेटराइट मृदा।

प्रश्न 28. लेटराइट मृदा में ह्यूमस की मात्रा कहाँ कम पाई जाती है?

उत्तर— विरल वनस्पति और अर्ध शुष्क पर्यावरण वाले क्षेत्रों में लेटराइट मृदा में ह्यूमस की मात्रा कम पाई जाती है।

प्रश्न 29. लेटराइट मृदा भारत के किन-किन क्षेत्रों में पाई जाती है?

उत्तर— भारत में लेटराइट मृदाएँ मुख्य रूप से कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश और उड़ीसा तथा असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती हैं।

प्रश्न 30. काजू की फसल उगाने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त मृदा कौनसी है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— लाल लेटराइट मृदा।

प्रश्न 31. भू-क्षरण के लिए उत्तरदायी कोई दो मानवीय कारण लिखिए।

उत्तर— (i) शहरीकरण (ii) औद्योगिकीकरण।

प्रश्न 32. समोच्च जुताई किसे कहा जाता है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— ढाल वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं के समानान्तर हल चलाने से ढाल के साथ जल बहाव की गति घटती है। इसे समोच्च जुताई कहा जाता है।

प्रश्न 33. सम्पूर्ण उत्तरी मैदान के अलावा भारत में जलोढ़ मृदाएँ और कहाँ पाई जाती हैं?

उत्तर— राजस्थान एवं गुजरात तथा पूर्वी तटीय मैदान में पाई जाती हैं।

प्रश्न 34. भूस्खलन के लिए उत्तरदायी प्राकृतिक एवं मानवजनित कारक कौनसे हैं?

उत्तर— (i) प्राकृतिक कारक-पवन।

(ii) मानवजनित कारक-वनोन्मूलन।

प्रश्न 35. 'स्माल इज ब्यूटीफुल' पुस्तक की जाँच कीजिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)

उत्तर— 'स्माल इज ब्यूटीफुल' पुस्तक के लेखक शुमेसर हैं और यह पुस्तक 1974 में प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तक मानव विकास और पर्यावरण संरक्षण के विषयों पर केन्द्रित है।

प्रश्न 36. नवीकरण योग्य संसाधन किसे कहते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— वह संसाधन जिन्हें हम भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रिया द्वारा नवीकृत या पुनः उत्पन्न कर सकते हैं, नवीकरण योग्य संसाधन कहते हैं।

प्रश्न 37. विकास के आधार पर संसाधन कितने प्रकार के होते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— विकास के आधार पर संसाधनों के तीन प्रकार हैं-सम्भावी, विकसित भण्डार तथा संचित कोष भण्डार।

प्रश्न 38. स्वामित्व के आधार पर संसाधन कितने प्रकार के होते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— स्वामित्व के आधार पर संसाधनों के चार प्रकार होते हैं-व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय।

प्रश्न 39. उत्पत्ति के आधार पर संसाधनों के प्रकार लिखिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— उत्पत्ति के आधार पर संसाधन दो प्रकार के होते हैं-जैव तथा अजैव संसाधन।

प्रश्न 40. लाल और पीली मृदा कौनसे क्षेत्र में पायी जाती है? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— लाल और पीली मृदा ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा मैदान के दक्षिणी छोर पर और पश्चिमी घाट में पहाड़ी पद पर पाई जाती है।

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सामाजिक विज्ञान (भूगोल) कक्षा X | 137

● लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. नवीकरणीय और अनवीकरणीय योग्य संसाधनों में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— नवीकरणीय संसाधन सतत उपयोग के बाद भी समाप्त नहीं होते जैसे-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि जबकि अनवीकरणीय संसाधनों के सतत उपयोग से इनके समाप्त होने का भय है, जैसे-कोयला, पेट्रोलियम आदि। नवीकरणीय संसाधनों के उपयोग से प्रदूषण नहीं होता जबकि अनवीकरणीय संसाधनों के उपयोग से वातावरण प्रदूषित होता है।

प्रश्न 2. संसाधन से क्या अभिप्राय है?

उत्तर— हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है और जिसको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है, एक संसाधन है।

प्रश्न 3. जैव और अजैव संसाधन क्या होते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— वे संसाधन जिनको जीवमण्डल से प्राप्त किया जा सकता है तथा जिनमें जीवन होता है, जैव संसाधन कहलाते हैं, जैसे-जीव-जन्तु, पेड़-पौधे आदि; जबकि वे संसाधन जो निर्जीव वस्तु से प्राप्त किये जाते हैं, अजैव संसाधन कहलाते हैं, जैसे-धातुएँ, चट्टान आदि।

प्रश्न 4. संसाधनों का वर्गीकरण कीजिये।

उत्तर— संसाधनों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है-

(1) उत्पत्ति के आधार पर- (i) जैव और (ii) अजैव।

(2) समाप्यता के आधार पर- (i) नवीकरण योग्य और (ii) अनवीकरण योग्य।

(3) स्वामित्व के आधार पर- (i) व्यक्तिगत (ii) सामुदायिक (iii) राष्ट्रीय और (iv) अंतर्राष्ट्रीय।

(4) विकास के स्तर के आधार पर- (i) संभावी (ii) विकसित भंडार और (iii) संचित कोष।

प्रश्न 5. प्रकृति, प्रौद्योगिकी एवं संस्थाओं के परस्पर अन्तर्सम्बन्ध को समझाइए।

उत्तर— हमारे पर्यावरण में उपलब्ध वस्तुओं की रूपान्तरण-प्रक्रिया प्रकृति, प्रौद्योगिकी तथा संस्थाओं के परस्पर अन्तर्सम्बन्ध में निहित है। इनके केन्द्र में मानव है। मानव प्रौद्योगिकी द्वारा प्रकृति के साथ क्रिया करते हैं और अपने आर्थिक विकास की गति को तेज करने के लिए संस्थाओं का निर्माण करते हैं।

इसे चित्र द्वारा जाना जा सकता है।

[प्रकृति, प्रौद्योगिकी एवं संस्थाओं के परस्पर अन्तर्सम्बन्ध का त्रिकोण]

कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान पाठ 6 संसाधन एवं विकास चित्र 2

प्रश्न 6. मानव द्वारा संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग से उत्पन्न दो समस्याओं को स्पष्ट कीजिए।

अथवा

संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग से उत्पन्न हुई समस्याएँ बताइये।

उत्तर— मानव द्वारा संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग से निम्न समस्यायें पैदा हुई हैं-

(1) संसाधन समाज के कुछ ही लोगों के हाथ में आ गए हैं जिससे समाज दो हिस्सों अमीर और गरीब में विभाजित हो गया है।

(2) संसाधनों के अंधाधुंध शोषण से वैश्विक पारिस्थितिकी संकट उत्पन्न हो गया है; जैसे-भूमंडलीय तापन, ओजोन परत अवक्षय, पर्यावरण प्रदूषण तथा भूमि निम्नीकरण आदि।

(3) कुछ व्यक्तियों के लालचवश संसाधनों का ह्रास हुआ है।

प्रश्न 7. संसाधन नियोजन का क्या अर्थ है? संसाधन नियोजन के किसी एक सोपान का उल्लेख कीजिए।

अथवा

संसाधन नियोजन से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— संसाधन नियोजन का अर्थ- संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए अपनाई गई सर्वमान्य रणनीति संसाधन नियोजन कहलाती है।

संसाधन नियोजन का सोपान (कोई एक)- संसाधन विकास योजनाएँ लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत नियोजन ढाँचा तैयार करना।

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प्रश्न 8. संसाधन नियोजन क्यों आवश्यक है? बताइए।

उत्तर— (i) संसाधनों की बर्बादी को रोकने,

(ii) पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त रखने,

(iii) सीमित संसाधनों का सभी को उपलब्ध कराये जाने तथा

(iv) संसाधनों को भावी पीढ़ियों के लिए बनाये रखने आदि के लिए संसाधनों का नियोजन आवश्यक है।

प्रश्न 9. संसाधन के संरक्षण का क्या अभिप्राय है? संसाधनों के संरक्षण के दो कारण समझाइए।

उत्तर— संसाधन संरक्षण-मानव द्वारा संसाधनों के प्रबन्धन को संसाधन संरक्षण कहते हैं।

संसाधनों के संरक्षण के कारण-(i) वर्तमान पीढ़ी को उनका सतत लाभ प्रदान करना।

(ii) इसमें भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं की पूर्ति का भाव भी निहित है।

प्रश्न 10. एजेंडा 21 से क्या अभिप्राय है? स्पष्ट कीजिए।

अथवा

'एजेंडा-21' से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— एजेंडा 21 एक घोषणा है जिसे सन् 1992 में ब्राजील के शहर रियो-डी-जेनेरो में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन के तत्वावधान में राष्ट्राध्यक्षों द्वारा स्वीकृत किया गया था; इसका उद्देश्य भूमंडलीय सतत पोषणीय विकास हासिल करना है।

प्रश्न 11. एजेंडा-21 के मुख्य उद्देश्य क्या हैं? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2021-22)

उत्तर— एजेंडा-21 के मुख्य उद्देश्य ये हैं-

(i) भूमंडलीय सतत पोषणीय विकास हासिल करना।

(ii) समान हितों, पारस्परिक आवश्यकताओं एवं सम्मिलित जिम्मेदारियों के अनुसार विश्व सहयोग के द्वारा पर्यावरणीय क्षति, गरीबी और रोगों से निपटना।

(iii) प्रत्येक स्थानीय निकाय अपना स्थानीय एजेंडा तैयार करें।

प्रश्न 12. विकास में संसाधन, प्रौद्योगिकी एवं मानव की भूमिका बताइये।

उत्तर— किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता एक आवश्यक शर्त है। लेकिन संसाधन किसी प्रदेश के विकास में तभी योगदान दे सकते हैं, जब वहां उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास और संस्थागत परिवर्तन किये जाएँ। अतः विकास में संसाधनों की उपलब्धता के साथ-साथ इसमें प्रौद्योगिकी और मानव संसाधन की गुणवत्ता का भी योगदान रहता है।

प्रश्न 13. भूमि का उपयोग सावधानी एवं योजनाबद्ध तरीके से क्यों किया जाना चाहिए?

उत्तर— भूमि एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीवन, मानव जीवन, आर्थिक क्रियाएँ, परिवहन तथा संचार व्यवस्थाएँ भूमि पर ही आधारित हैं। किन्तु भूमि एक सीमित संसाधन है इसलिए उपलब्ध भूमि का विभिन्न उद्देश्यों के लिए उपयोग सावधानी और योजनाबद्ध तरीके से किया जाना चाहिए।

प्रश्न 14. संसाधनों का समाज में न्यायसंगत बँटवारा क्यों आवश्यक है?

उत्तर— मानव जीवन की गुणवत्ता और विश्व शान्ति बनाए रखने के लिए संसाधनों का समाज में न्यायसंगत बँटवारा आवश्यक है। यदि कुछ ही व्यक्तियों तथा देशों द्वारा संसाधनों का वर्तमान दोहन जारी रहता है, तो हमारी पृथ्वी का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

प्रश्न 15. गाँधीजी के अनुसार संसाधन ह्रास के लिए कौन उत्तरदायी है? संसाधन संरक्षण के लिए वे क्या चाहते थे?

उत्तर— गाँधीजी के अनुसार विश्व स्तर पर संसाधन ह्रास के लिए लालची और स्वार्थी व्यक्ति तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी की शोषणात्मक प्रवृत्ति जिम्मेदार है। वे अत्यधिक उत्पादन के विरुद्ध थे और इसके स्थान पर अधिक बड़े जनसमुदाय द्वारा उत्पादन के पक्षधर थे।

प्रश्न 16. कल्पना करें कि तेल संसाधन खत्म होने पर इनका हमारी जीवन शैली पर क्या प्रभाव होगा? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)

उत्तर— तेल संसाधन खत्म होने पर हमारी जीवन शैली अत्यधिक प्रभावित होगी क्योंकि यह ऊर्जा का एक प्रमुख साधन है। इसके अभाव में हमारा यातायात या आवागमन अत्यधिक प्रभावित होगा। इसके अतिरिक्त तेल शोधन शालाएँ संश्लेषित वस्त्र, उर्वरक तथा असंख्य रसायन उद्योगों में एक नोडीय बिन्दु की भूमिका अदा करती हैं।

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सामाजिक विज्ञान (भूगोल) कक्षा X 139

प्रश्न 17. भू-उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्त्वों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

उत्तर— भू-उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्त्व- भू-उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्त्वों में भौतिक कारक, जैसे भू-आकृति, जलवायु और मृदा के प्रकार तथा मानवीय कारक, जैसे जनसंख्या घनत्व, प्रौद्योगिक क्षमता, संस्कृति और परम्पराएँ आदि शामिल हैं।

प्रश्न 18. भूमि निम्नीकरण संरक्षण के दो उपाय बताइए।

अथवा

भूमि निम्नीकरण के संरक्षण के चार उपाय बताइए।

उत्तर— भूमि निम्नीकरण के संरक्षण के चार उपाय निम्नलिखित हैं-

(1) वनारोपण और चरागाहों का उचित प्रबन्धन

(2) पशुचारण नियंत्रण

(3) रेतीले टीलों पर काँटेदार झाड़ियाँ लगाना

(4) खनन नियंत्रण करना।

प्रश्न 19. मरुस्थलीय मृदा की कोई दो विशेषताएँ लिखिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— (1) मरुस्थली मृदाओं का रंग लाल और भूरा होता है।

(2) ये मृदाएँ आमतौर पर रेतीली और लवणीय होती हैं। कुछ क्षेत्रों में नमक की मात्रा इतनी अधिक होती है कि झीलों से जल वाष्पीकृत करके खाने का नमक भी बनाया जाता है।

प्रश्न 20. मृदा संरक्षण के दो उपाय सुझाइए।

उत्तर— (1) ढाल वाली भूमि पर जुताई समोच्च रेखाओं के समानान्तर करने से ढाल के साथ जल बहाव कम होता है। इससे मृदा संरक्षण किया जा सकता है।

(2) पेड़ों को कतारों में लगाकर रक्षक मेखला बनाकर पवनों की गति कम करके भी मृदा संरक्षण किया जा सकता है।

प्रश्न 21. काली मृदा की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर— (1) काली मृदा काले रंग की होती है। यह बहुत महीन कणों से बनी होती है तथा इसकी नमी धारण करने की क्षमता बहुत अधिक होती है।

(2) ये मृदाएँ कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश तथा चूने जैसे पौष्टिक तत्वों से परिपूर्ण होती हैं।

प्रश्न 22. उत्खात भूमि किसे कहते हैं?

उत्तर— बहता जल मृत्तिका युक्त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाएँ बनाता है, जिन्हें अवनलिकाएँ कहते हैं। ऐसी भूमि जोतने योग्य नहीं रहती और इसे उत्खात भूमि कहते हैं। चंबल बेसिन में ऐसी भूमि को खड्ड भूमि कहा जाता है।

प्रश्न 23. चादर अपरदन से क्या आशय है?

उत्तर— कई बार जल विस्तृत क्षेत्र को ढके हुए ढाल के साथ नीचे की ओर बहता है। ऐसी स्थिति में इस क्षेत्र की ऊपरी मृदा घुलकर जल के साथ बह जाती है। इसे चादर अपरदन कहा जाता है।

प्रश्न 24. मृदा निर्माण की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)

उत्तर— मृदा बनने की प्रक्रिया को निर्धारित करने वाले प्रमुख तत्व हैं- उच्चावच, जनक शैल, जलवायु, वनस्पति, अन्य जैव पदार्थ तथा समय। प्रकृति की अनेक प्रक्रियाएँ भी मृदा बनने की प्रक्रिया में योगदान देती हैं, जैसे- तापमान परिवर्तन, बहते जल की क्रिया, पवन, हिमनदी और अपघटन प्रक्रियाएँ।

प्रश्न 25. भू-संसाधनों से आप क्या समझते हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— मानव जाति समेत कई प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीवन, आर्थिक क्रियाएँ, परिवहन तथा संचार व्यवस्थाएँ भू-संसाधन के कारण ही सम्भव हैं। भू-संसाधन का उपयोग विभिन्न रूपों में होता है। भारत में भू-संसाधन विभिन्न आकृतियों जैसे- मैदान, पर्वत, पठार और द्वीप में उपलब्ध हैं। भारत में लगभग 43 प्रतिशत भूमि मैदान के रूप में उपलब्ध है जो कृषि तथा उद्योग के काम आती है।

प्रश्न 26. भूमि निम्नीकरण का आशय स्पष्ट कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— मानवीय क्रियाकलापों के कारण भूमि की गुणवत्ता का कम हो जाना भूमि निम्नीकरण कहलाता है। कुछ मानव क्रियाओं जैसे वनोन्मूलन, अति पशुचारण, अति सिंचन तथा खनन ने भूमि निम्नीकरण में मुख्य भूमिका निभाई है। औद्योगिक प्रदूषित जल भी भूमि और जल प्रदूषण का मुख्य स्रोत है।

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प्रश्न 27. जलोढ़ मृदा का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— जलोढ़ मृदा हिमालय की तीन महत्त्वपूर्ण नदी तंत्रों यथा-सिंधु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए निक्षेपों से बनी है। सम्पूर्ण उत्तरी मैदान तथा पूर्वी तटीय मैदान जलोढ़ मृदा से बना है। जलोढ़ मृदा में रेत, सिल्ट और मृत्तिका के विभिन्न अनुपात पाए जाते हैं। आयु के आधार पर जलोढ़ मृदाएँ दो प्रकार की होती हैं-(1) बांगर और (2) खादर। जलोढ़ मृदाएँ बहुत उपजाऊ होती हैं। ये पोटाश, फास्फोरस और चूनायुक्त होती हैं। इसलिए जलोढ़ मृदा वाले क्षेत्रों में गहन कृषि होती है।

प्रश्न 28. पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन को रोकने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन रोकने के लिए निम्न कदम उठाने चाहिए-

(i) पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन रोकने के लिए वृक्षारोपण सबसे सार्थक उपाय है।

(ii) पेड़ों को कतारों में लगाकर रक्षक मेखला बनाना भी पवनों की गति को कम करता है।

प्रश्न 29. शुद्ध बोये गये क्षेत्र तथा सकल बोये गये क्षेत्र में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— शुद्ध बोया गया क्षेत्र भूमि का वह क्षेत्र है जिस पर फसलें उगाई व काटी जाती हैं जबकि एक कृषि वर्ष में एक बार से अधिक बोये गये क्षेत्र को शुद्ध बोये गये क्षेत्र में जोड़ दिया जाए तो वह सकल कृषि क्षेत्र कहलाता है।

प्रश्न 30. संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता क्यों है? गांधी जी के विचार स्पष्ट कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता निम्न कारणों से है-

(i) संसाधन किसी भी विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

(ii) संसाधनों का विवेकहीन उपभोग तथा अतिउपयोग कई प्रकार के सामाजिक-आर्थिक तथा पर्यावरणीय समस्याओं का कारण बन सकता है। अतः इन समस्याओं से बचाव के लिए संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है।

संसाधन संरक्षण की आवश्यकता हेतु गांधीजी भी चिंतित थे। संसाधन के संरक्षण को आवश्यक बताते हुए उन्होंने यह कहा था कि हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति हेतु भरपूर संसाधन हैं परन्तु लालच की संतुष्टि के लिए नहीं हैं।

प्रश्न 31. भारत का भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किमी. है परन्तु इसके 93% भाग के ही भू-उपयोग के आँकड़े उपलब्ध हैं। क्यों?

उत्तर— क्योंकि पूर्वोत्तर प्रान्तों में असम को छोड़कर अन्य प्रांतों के सूचित क्षेत्र के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तान और चीन अधिकृत क्षेत्रों के भूमि उपयोग का सर्वेक्षण भी नहीं हुआ है।

प्रश्न 32. जलोढ़ मिट्टी की रासायनिक विशेषताओं और घटकों की पहचान कीजिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)

उत्तर— रासायनिक विशेषताएँ-(i) जलोढ़ मिट्टी में उच्च उर्वरता होती है जो इसे कृषि के लिए उपयुक्त बनाती है।

(ii) जलोढ़ मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा अधिक होती है, जो इसे उपजाऊ बनाती है।

घटक-(i) जलोढ़ मिट्टी में रेत की मात्रा अधिक होती है, जो इसे रेतीली बनाती है।

(ii) जलोढ़ मिट्टी में सिल्ट की मात्रा भी अधिक होती है जो इसे चिकनी और मुलायम बनाती है।

● दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1. "संसाधन किसी भी विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।" कोई तीन तर्क बताइए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)

उत्तर— संसाधन मानवीय क्रियाओं का परिणाम है। मानव स्वयं संसाधनों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। वे पर्यावरण में पाए जाने वाले पदार्थों को संसाधनों में परिवर्तित करते हैं तथा उन्हें प्रयोग करते हैं, जिससे विकास सम्भव होता है। अतः संसाधन किसी भी विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि-

(i) संसाधन मनुष्य के जीवन-यापन के लिए अति आवश्यक है।

(ii) संसाधन जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए भी महत्त्वपूर्ण है।

(iii) मानव जीवन की गुणवत्ता और विश्व शान्ति बनाए रखने के लिए संसाधनों का समाज में न्यायसंगत बंटवारा आवश्यक है।

--- [ पृष्ठ संख्या: 148 ] ---

सामाजिक विज्ञान (भूगोल) कक्षा X 141

प्रश्न 2. यदि आपको संसाधन नियोजन करना है तो आप कौन-कौन से सोपानों का प्रयोग करेंगे?

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2023)

अथवा

संसाधन नियोजन के विभिन्न सोपानों को स्पष्ट कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें निम्नलिखित सोपान हैं-

(1) देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान करके उनकी तालिका बनाना। इस कार्य में क्षेत्रीय सर्वेक्षण, मानचित्र बनाना और संसाधनों का गुणात्मक एवं मात्रात्मक अनुमान लगाना व मापन करना है।

(2) संसाधन विकास योजनाएँ लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत नियोजन ढाँचा तैयार करना।

(3) संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजना में समन्वय स्थापित करना।

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरान्त भारत में संसाधन नियोजन के उद्देश्य की पूर्ति के प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही प्रयास किए गये।

प्रश्न 3. भारत में कौनसी मृदा सर्वाधिक विस्तृत रूप से फैली है? ऐसी मृदा की कोई चार विशेषताएँ लिखिए।

अथवा

जलोढ़ मृदा की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिये।

उत्तर— भारत में अधिकांश भू-भाग पर जलोढ़ मृदा विस्तृत रूप से फैली हुई है।

जलोढ़ मृदा की प्रमुख विशेषताएँ—जलोढ़ मृदा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) जलोढ़ मृदा विस्तृत रूप से सम्पूर्ण उत्तरी भारत के मैदान में फैली हुई है।

(2) जलोढ़ मृदाएँ हिमालय के तीन महत्त्वपूर्ण नदी तंत्रों यथा सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गये निक्षेपों से निर्मित हुई हैं।

(3) जलोढ़ मृदा में रेत, सिल्ट और मृत्तिका के विभिन्न अनुपात पाये जाते हैं।

(4) आयु के आधार पर जलोढ़ मृदाएँ दो प्रकार की होती हैं-(i) पुराना जलोढ़ (बांगर) तथा (ii) नया जलोढ़ (खादर)।

(5) जलोढ़ मृदाएँ बहुत उपजाऊ होती हैं। अधिकांशतः ये मृदाएँ पोटाश, फॉस्फोरस और चूनायुक्त होती हैं।

(6) अधिक उपजाऊ होने के कारण जलोढ़ मृदा वाले क्षेत्रों में गहन कृषि की जाती है और यहाँ जनसंख्या का घनत्व भी अधिक पाया जाता है।

(7) सूखे क्षेत्रों की जलोढ़ मृदाएँ अधिक क्षारीय होती हैं। सही उपचार और सिंचाई द्वारा इनकी पैदावार बढ़ाई जा सकती है।

प्रश्न 4. बांगर व खादर में अन्तर स्पष्ट कीजिए।

अथवा

पुराने जलोढ़ एवं नवीन जलोढ़ में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— पुराने जलोढ़ (बांगर) एवं नवीन जलोढ़ (खादर) में निम्नलिखित अन्तर हैं-

(1) पुराने जलोढ़ को बांगर कहते हैं जबकि नवीन जलोढ़ को खादर कहते हैं।

(2) बांगर अपेक्षाकृत कम उपजाऊ होता है जबकि खादर अधिक उपजाऊ होता है।

(3) गठन में बांगर की मृदा में 'कंकर' ग्रन्थियों की मात्रा अधिक होती है अर्थात् यह मृदा मोटे कण वाली होती है और खादर की मृदा बांगर मृदा की तुलना में बारीक कण वाली होती है।

प्रश्न 5. भारत की मुख्य भू-आकृतियों का उल्लेख कीजिये।

उत्तर— मुख्य भू-आकृतियाँ—भारत में भूमि पर मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रकार की भू-आकृतियाँ पाई जाती हैं-

(1) मैदान— भारत में लगभग 43 प्रतिशत भू-क्षेत्र मैदान है जो कि कृषि और उद्योग के विकास के लिए सुविधाजनक है।

(2) पर्वत— भारत में पर्वत कुल भू-क्षेत्र के 30 प्रतिशत भाग पर विस्तृत हैं। पर्वत कुछ बारहमासी अर्थात् वर्षपर्यन्त प्रवाहित होने वाली नदियों के प्रवाह को सुनिश्चित करते हैं। ये पर्यटन विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं तथा पारिस्थितिकी की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होते हैं।

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( 3 ) पठार-भारत में कुल भू-क्षेत्र का लगभग 27 प्रतिशत भाग पठारी क्षेत्र है। इस क्षेत्र में खनिजों, जीवाश्म ईंधन और वनों का अपार भण्डार संचित है।

प्रश्न 6. भारत में भूमि निम्नीकरण के लिए कौन-कौनसे कारक प्रमुख रूप से उत्तरदायी हैं?

उत्तर— भारत में भूमि निम्नीकरण के लिए निम्नलिखित कारक प्रमुख रूप से उत्तरदायी हैं-

( 1 ) खनन-खनन के बाद खदानों वाले स्थानों को गहरी खाइयों और मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है। खनन के कारण झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उड़ीसा जैसे राज्यों में वनोन्मूलन भूमि निम्नीकरण का कारण बना है।

( 2 ) अति पशुचारण-गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में अति पशुचारण भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण है।

( 3 ) अति सिंचन-पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अधिक सिंचाई भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है। इससे उत्पन्न जलाक्रांतता से मृदा में लवणीयता और क्षारीयता बढ़ जाती है।

प्रश्न 7. भारत में संसाधनों की उपलब्धता में बहुत विविधता है, समझाइए।

उत्तर— भारत में संसाधनों की उपलब्धता में बहुत अधिक विविधता पाई जाती है। यहाँ ऐसे प्रदेश भी हैं जहाँ एक तरह के संसाधनों की प्रचुरता है, परन्तु दूसरे तरह के संसाधनों की कमी है। कुछ ऐसे प्रदेश भी हैं, जो संसाधनों की दृष्टि से आत्मनिर्भर हैं और कुछ ऐसे प्रदेश भी हैं, जहाँ महत्त्वपूर्ण संसाधनों की अत्यधिक कमी है। उदाहरण के लिए, झारखण्ड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में खनिजों और कोयले के प्रचुर भंडार हैं। अरुणाचल प्रदेश में जल संसाधन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, परन्तु मूल विकास की कमी है। राजस्थान में पवन और सौर ऊर्जा संसाधनों की बहुतायत है, लेकिन जल संसाधनों की कमी है। लद्दाख का शीत मरुस्थल सांस्कृतिक विरासत का धनी है परन्तु यहाँ जल, आधारभूत अवसंरचना तथा कुछ महत्त्वपूर्ण खनिजों की कमी है।

इस प्रकार भारत में संसाधनों की उपलब्धता में क्षेत्रवार बहुत विविधता पाई जाती है।

प्रश्न 8. संसाधनों के संरक्षण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए प्रयासों की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।

अथवा

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संसाधन संरक्षण के लिए कौन-कौनसे प्रयास किये हैं? (प्रश्न बैंक)

उत्तर— संसाधन संरक्षण हेतु अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर निम्न प्रयास किये गये-

( 1 ) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित तरीके से संसाधन संरक्षण की वकालत 1968 में क्लब ऑफ रोम ने की।

( 2 ) 1974 में शुमेसर ने अपनी पुस्तक 'स्माल इज ब्यूटीफुल' में संसाधन संरक्षण पर गाँधीजी के दर्शन की एक बार फिर से पुनरावृत्ति की।

( 3 ) 1987 में ब्रुण्डटलैंड आयोग रिपोर्ट द्वारा वैश्विक स्तर पर संसाधन संरक्षण में मूलाधार योगदान किया गया। इस रिपोर्ट ने सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development) की संकल्पना प्रस्तुत की और संसाधन संरक्षण की वकालत की। यह रिपोर्ट बाद में हमारा साझा भविष्य (Our Common Future) शीर्षक से पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई।

( 4 ) पर्यावरण संरक्षण हेतु रियो डी जेनेरो, ब्राजील में 1992 में पृथ्वी सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में सतत पोषणीय विकास हेतु एजेंडा 21 को स्वीकृति प्रदान की गई।

प्रश्न 9. रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन, 1992 पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

अथवा

प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन की प्रमुख बातें लिखिए।

उत्तर— 1992 में आयोजित रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन की प्रमुख बातें निम्न प्रकार हैं-

( 1 ) प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन जून, 1992 में ब्राजील के शहर रियो डी जेनेरो में आयोजित किया गया।

( 2 ) इस सम्मेलन में विश्व के 100 से भी अधिक राष्ट्राध्यक्ष एकत्रित हुए।

( 3 ) सम्मेलन का आयोजन विश्व स्तर पर उभरते पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक विकास की समस्याओं का हल ढूँढने के लिए किया गया था।

( 4 ) इस सम्मेलन में एकत्रित नेताओं ने भूमंडलीय जलवायु परिवर्तन और जैविक विविधता पर एक घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए।

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सामाजिक विज्ञान (भूगोल) कक्षा X 143

(5) रियो सम्मेलन में भूमंडलीय वन सिद्धान्तों (Forest Principles) पर सहमति जताई गई और 21वीं शताब्दी में सतत पोषणीय विकास के लिए एजेंडा 21 को स्वीकृति प्रदान की गई।

प्रश्न 10. काली मृदा की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

अथवा

रेगर मृदा भारत के किन-किन क्षेत्रों में पाई जाती है? इसकी विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर— काली मृदा (रेगर मृदा) के क्षेत्र-काली मृदाएँ दक्कन पठार क्षेत्र के उत्तर-पश्चिमी भागों में पाई जाती हैं और लावा जनक शैलों से बनी हैं। ये मृदाएँ महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार पर पाई जाती हैं और दक्षिण-पूर्वी दिशा में गोदावरी और कृष्णा नदियों की घाटियों तक फैली हैं।

काली मृदा (रेगर मृदा) की विशेषताएँ—

(1) काली मृदा बहुत बारीक कणों अर्थात् मृत्तिका से बनी है।

(2) इसकी नमी धारण करने की क्षमता बहुत अधिक होती है।

(3) काली मृदाएँ कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश और चूने जैसे पौष्टिक तत्वों से परिपूर्ण होती हैं।

(4) इनमें फास्फोरस की मात्रा कम होती है।

(5) गर्म और शुष्क मौसम में इन मृदाओं में गहरी दरारें पड़ जाती हैं जिससे इनमें वायु का मिश्रण अच्छी तरह हो जाता है।

(6) गीली होने पर ये मृदाएँ चिपचिपी हो जाती हैं और इनको जोतना मुश्किल होता है।

(7) काली मृदाएँ लावा जनक शैलों से बनी होती हैं।

(8) इनका रंग काला होता है तथा इन्हें 'रेगर' मृदाएँ भी कहा जाता है।

(9) काली मृदाएँ कपास की खेती के लिए बहुत अच्छी होती हैं।

प्रश्न 11. मरुस्थली मृदा पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए।

उत्तर— मरुस्थली मृदा-भारत में मरुस्थली मृदा मुख्यतः पश्चिमी राजस्थान में पाई जाती है। मरुस्थली मृदा की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं-

(1) मरुस्थली मृदाओं का रंग लाल और भूरा होता है।

(2) ये मृदाएँ प्रायः रेतीली और लवणीय होती हैं। कुछ क्षेत्रों में नमक की मात्रा इतनी अधिक है कि झीलों से जल वाष्पीकृत करके खाने का नमक भी बनाया जाता है।

(3) इन मृदाओं में ह्यूमस और नमी की मात्रा कम होती है।

(4) इस प्रकार की मृदा की सतह के नीचे कैल्शियम की मात्रा बढ़ती चली जाती है और नीचे की परतों में चूने के कंकर की सतह पाई जाती है। इसके कारण मृदा में जल अंतःस्यंदन (infiltration) बाधित हो जाता है।

(5) इस मृदा को सही तरीके से सिंचित करके कृषि योग्य बनाया जा सकता है।

प्रश्न 12. भूमि निम्नीकरण की समस्या को नियंत्रित करने के उपाय समझाइए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— भूमि निम्नीकरण की समस्या को नियंत्रित करने के उपाय निम्नलिखित हैं-

(i) वनारोपण और चरागाहों का उचित प्रबंधन भूमि निम्नीकरण की समस्या को दूर करने में कुछ हद तक मदद कर सकते हैं।

(ii) पेड़ों की रक्षक मेखला, पशुचारण नियंत्रण और रेतीले टीलों को कांटेदार झाड़ियाँ लगाकर स्थिर बनाने की प्रक्रिया से भी भूमि कटाव की रोकथाम शुष्क क्षेत्रों में की जा सकती है।

(iii) बंजर भूमि के उचित प्रबंधन, खनन नियंत्रण और औद्योगिक जल को परिष्करण के पश्चात् विसर्जित करके जल और भूमि प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

प्रश्न 13. वन मृदा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

उत्तर— वन मृदा-वन मृदाएँ प्रायः ऐसे पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं जहाँ पर्याप्त वर्षा-वन उपलब्ध हैं। इन मृदाओं के गठन में पर्वतीय पर्यावरण के अनुसार बदलाव आता है। नदी घाटियों में जहाँ ये मृदाएँ दोमट और सिल्टदार होती हैं, वहाँ ऊपरी ढालों पर इनका गठन मोटे कणों का होता है। हिमालय के हिमाच्छादित क्षेत्रों में इन मृदाओं का अत्यधिक अपरदन होता है और ये अधिसिलिक (acidic) तथा ह्यूमस रहित होती हैं। नदी घाटियों के निचले क्षेत्रों, विशेषकर नदी सोपानों और जलोढ़ पंखों आदि में ये मृदाएँ अत्यन्त उपजाऊ होती हैं।

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प्रश्न 14. मृदा संसाधन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर— मृदा संसाधन-मृदा एक महत्त्वपूर्ण नवीकरणीय संसाधन है, जो पौधों की वृद्धि और विविध जीवन रूपों को बनाये रखने के लिए आधार के रूप में कार्य करती है। यह एक जीवित तंत्र है जो लाखों वर्षों में विकसित होती है। मृदा बनने की प्रक्रिया में उच्चावच, जनक शैल अथवा संस्तर शैल, जलवायु, वनस्पति और अन्य जैव पदार्थ और समय मुख्य कारक हैं। तापमान में उतार-चढ़ाव, जल प्रवाह, हवा और अपघटक जैसे प्राकृतिक तत्व भी मृदा निर्माण में योगदान देते हैं। मृदा जैव और अजैव दोनों प्रकार के पदार्थों से बनती है। मृदा में होने वाले रासायनिक और जैविक परिवर्तन भी महत्त्वपूर्ण हैं। मृदा बनने की प्रक्रिया को निर्धारित करने वाले तत्वों, उनके रंग, गहराई, गठन, आयु तथा रासायनिक और भौतिक गुणों के आधार पर भारत में कई प्रकार की मृदा पाई जाती है, जैसे-जलोढ़ मृदा, काली मृदा, लाल और पीली मृदा, लेटराइट मृदा, मरुस्थली मृदा तथा वन मृदा।

प्रश्न 15. समाप्यता के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— समाप्यता के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है-

(i) नवीकरण योग्य-नवीकरण संसाधन प्राकृतिक संसाधन होते हैं, जिनका बार-बार प्रयोग किया जा सकता है अथवा जिन्हें भौतिक, रासायनिक तथा यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा नवीकृत अथवा पुनः उत्पन्न किया जा सकता है। कुछ नवीकरण योग्य संसाधन हैं-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल, भूमि, मृदा आदि।

(ii) अनवीकरण योग्य-अनवीकरण योग्य संसाधन वे हैं, जिन्हें थोड़े समय में पुनः उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। इनके बनने में लाखों या करोड़ों वर्ष लग सकते हैं। इन्हें अनवीकरण योग्य इसलिए कहा जाता है क्योंकि एक बार प्रयोग करने पर ये काफी लम्बे समय या हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं। जीवाश्म ईंधन जैसे कि तेल, गैस तथा कोयला अनवीकरण योग्य संसाधन के उदाहरण हैं।

● निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. किसी क्षेत्र के विकास हेतु संसाधनों की उपलब्धता के साथ-साथ प्रौद्योगिकी विकास एवं संस्थागत परिवर्तन भी आवश्यक हैं। स्पष्ट कीजिये।

उत्तर— इसे निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता एक आवश्यक शर्त है परंतु प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में तदनुरूपी परिवर्तनों के अभाव में मात्र संसाधनों की उपलब्धता से ही विकास संभव नहीं है।

(2) देश में बहुत से क्षेत्र हैं जो संसाधन समृद्ध होते हुए भी आर्थिक रूप से पिछड़े प्रदेशों की गिनती में आते हैं। इसके विपरीत कुछ ऐसे प्रदेश भी हैं जो संसाधनों की कमी होते हुए भी आर्थिक रूप से विकसित हैं।

(3) उपनिवेश का इतिहास हमें बताता है कि उपनिवेशकारी देशों ने बेहतर प्रौद्योगिकी के सहारे उपनिवेशों के संसाधनों का शोषण किया तथा उन पर आधिपत्य स्थापित किया।

अतः संसाधन किसी प्रदेश के विकास में तभी योगदान दे सकते हैं, जब वहाँ उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास और संस्थागत परिवर्तन किए जाएँ। उपनिवेश के विभिन्न चरणों में भारत ने भी इन सबका अनुभव किया है। अतः भारत में विकास सामान्यतः तथा संसाधन विकास लोगों के मुख्यतः संसाधनों की उपलब्धता पर ही आधारित नहीं होता बल्कि इसमें प्रौद्योगिकी, मानव संसाधन की गुणवत्ता और ऐतिहासिक अनुभव का भी योगदान रहा है।

प्रश्न 2. संसाधनों के नियोजन से आप क्या समझते हैं? संसाधनों के संरक्षण करने के उपाय सुझाइए।

उत्तर— संसाधन नियोजन का अर्थ-संसाधन नियोजन एक ऐसी प्रक्रिया है जो संसाधनों के उपयोग, संरक्षण एवं संवर्द्धन हेतु अपनाई जाती है। अतः संसाधनों को लम्बे समय तक उपयोग करने, विनिष्टता से बचाने और प्रदूषण रहित रखने और उनके संवर्द्धन हेतु नीति एवं विधि निर्धारित करने की कला संसाधन नियोजन कहलाती है।

संसाधन संरक्षण के उपाय-किसी भी तरह के विकास में संसाधनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। परन्तु संसाधनों का अविवेकपूर्ण उपयोग तथा अति उपयोग के कारण कई सामाजिक-आर्थिक तथा पर्यावरणीय समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। इन समस्याओं से बचने के लिए विभिन्न स्तरों पर संसाधन का संरक्षण आवश्यक है। संसाधन संरक्षण के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं-

(1) जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण किया जाये, जिससे संसाधनों पर बढ़ता दबाव कम किया जा सके।

(2) संसाधन उपयोग की नवीन प्रौद्योगिकी का उपयोग हो किन्तु शोषणात्मक प्रवृत्ति न हो।

(3) अपशिष्टों में कमी तथा प्रदूषण पर नियंत्रण किया जाये।

(4) समन्वित पर्यावरण तंत्र प्रबंधन अपनाया जाये।

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सामाजिक विज्ञान (भूगोल) कक्षा X 145

(5) आम लोगों की संसाधन उपयोग की प्रवृत्ति में परिवर्तन किया जाये।

(6) शिक्षा का विकास, विस्तार एवं प्रचार किया जाये।

प्रश्न 3. संसाधन किसे कहते हैं? संसाधनों का वर्गीकरण चार्ट द्वारा स्पष्ट कीजिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— संसाधन—पर्यावरण में मौजूद वे वस्तुएँ जो हमारी जरूरतों को पूरा करती हैं, उन्हें संसाधन कहते हैं। ये वस्तुएँ प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों तरह की हो सकती हैं। संसाधन तकनीकी रूप से सुलभ, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और सामाजिक रूप से स्वीकार्य होने चाहिए।

संसाधनों का सावधानीपूर्वक इस्तेमाल करना और उन्हें नवीनीकरण के लिए समय देना, संसाधन संरक्षण कहलाता है। पर्यावरण या मानव अस्तित्व को नुकसान पहुँचाए बिना प्राकृतिक संसाधनों का प्रभावी एवं कुशलतापूर्वक विकास करना, संसाधन विकास कहलाता है। संसाधनों के कुछ उदाहरण हैं-वायु, जल, भूमि, वन, पशु-पक्षी एवं अन्य जैविक व भौतिक साधन।

[संसाधनों का वर्गीकरण]

कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान पाठ 6 संसाधन एवं विकास चित्र 3

चित्र-संसाधनों का वर्गीकरण

प्रश्न 4. भारत में पाई जाने वाली मृदाओं का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिये।

उत्तर— मृदाओं का वर्गीकरण

भारत में अनेक प्रकार के उच्चावच, भू-आकृतियाँ, जलवायु और वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप निम्नलिखित मृदाएँ पाई जाती हैं-

(1) जलोढ़ मृदा-यह देश की महत्वपूर्ण मृदा है जो कि विस्तृत रूप से फैली हुई है। सम्पूर्ण उत्तरी मैदान जलोढ़ मृदा से बना है। जलोढ़ मृदा में रेत, सिल्ट और मृत्तिका के विभिन्न अनुपात पाए जाते हैं। नदी घाटी के ऊपरी भाग में मोटे कण वाली मृदाएँ पाई जाती हैं। जलोढ़ मृदाएँ हिमालय के तीन महत्त्वपूर्ण नदी तंत्रों यथा-सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए जमावों से बनी हैं। एक संकरे गलियारे द्वारा ये मृदाएँ राजस्थान और गुजरात तक फैली हैं। पूर्वी तटीय मैदान, विशेषकर महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी नदियों के डेल्टे भी जलोढ़ मृदा से बने हैं। आयु के आधार पर जलोढ़ मृदाएँ दो प्रकार की होती हैं-(1) पुराना जलोढ़ (बांगर) और (2) नया जलोढ़ (खादर)। खादर मृदा में बांगर मृदा की तुलना में ज्यादा महीन कण पाए जाते हैं।

(2) काली मृदा-इन मृदाओं का काला रंग होता है तथा इनको 'रेगर' मृदाओं के नाम से भी जाना जाता है। काली मृदा कपास की खेती के लिए उत्तम होती है तथा इनको 'काली कपास मृदा' के नाम से भी जाना जाता है।

काली मृदाएँ महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार पर पाई जाती हैं तथा दक्षिणी-पूर्वी दिशा में गोदावरी और कृष्णा नदियों की घाटियों तक फैली हैं। ऐसा माना जाता है कि जलवायु लावा जनक शैलों ने काली मृदा के बनने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। काली मृदा बहुत महीन कणों से बनी है। इसकी नमी धारण करने की क्षमता बहुत होती है। ये मृदाएँ कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश और चूने जैसे पौष्टिक तत्त्वों से परिपूर्ण होती हैं।

(3) लाल और पीली मृदा-लाल मृदा दक्कन के पठार के पूर्वी और दक्षिणी भागों में रवेदार आग्नेय चट्टानों पर कम वर्षा वाले भागों में विकसित हुई है। लाल और पीली मृदाएँ उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा मैदान के दक्षिणी छोर पर और पश्चिमी घाट में पहाड़ी पद पर पाई जाती हैं।

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(4) लेटराइट-लेटराइट मृदा उच्च तापमान और अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती है। यह भारी वर्षा से अत्यधिक निक्षालन का परिणाम है। इस मृदा में ह्यूमस की मात्रा कम पाई जाती है। लेटराइट मृदा पर अधिक मात्रा में खाद और रासायनिक उर्वरक का प्रयोग करके ही खेती की जा सकती है।

लेटराइट मृदाएँ मुख्य रूप से कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, उड़ीसा तथा असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती हैं। यह मृदा अधिकतर गहरी तथा अम्लीय होती है। इसमें पोषक तत्त्वों की कमी होती है।

(5) मरुस्थली मृदा-मरुस्थली मृदाओं का रंग लाल और भूरा होता है। ये मृदाएँ आमतौर पर रेतीली और लवणीय होती हैं। कुछ क्षेत्रों में नमक की मात्रा इतनी अधिक होती है कि झीलों से जल वाष्पीकृत करके खाने का नमक भी बनाया जाता है। इस मृदा में ह्यूमस और नमी की मात्रा कम होती है।

(6) वन मृदा-इस प्रकार की मृदाएँ मुख्य रूप से उन पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं, जिन क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा-वन उपलब्ध हैं। ये अधिसिलिक तथा ह्यूमस रहित होती हैं। नदी घाटियों में ये दोमट और सिल्टदार तथा ऊपरी ढालों पर मोटे कणों से युक्त होती हैं।

प्रश्न 5. लेटराइट मृदा भारत के किन क्षेत्रों में पाई जाती है? इनकी प्रमुख विशेषताएँ बतलाइए।

उत्तर— लेटराइट मृदा के क्षेत्र-भारत में लेटराइट मृदा अधिकतर दक्षिणी राज्यों, महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट क्षेत्रों ओडिशा, पश्चिम बंगाल के कुछ भागों तथा उत्तर-पूर्वी प्रदेशों में पाई जाती है।

लेटराइट मृदा की विशेषताएँ

(1) लेटराइट मृदा का निर्माण उष्णकटिबंधीय तथा उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु क्षेत्रों में आर्द्र तथा शुष्क ऋतुओं के एक के बाद एक आने के कारण होता है।

(2) यह भारी वर्षा से अत्यधिक निक्षालन (leaching) का परिणाम है।

(3) लेटराइट मृदा अधिकतर गहरी तथा अम्लीय (pH < 6.0) होती है।

(4) इसमें सामान्यतः पौधों के पोषक तत्त्वों की कमी होती है।

(5) जहाँ इस मिट्टी में पर्णपाती और सदाबहार वन मिलते हैं, वहाँ इसमें ह्यूमस पर्याप्त रूप से पाया जाता है, लेकिन विरल वनस्पति और अर्ध शुष्क पर्यावरण में इसमें ह्यूमस की मात्रा कम पाई जाती है।

(6) स्थलरूपों पर उनकी स्थिति के अनुसार उनमें अपरदन तथा भूमि-निम्नीकरण की संभावना होती है।

(7) मृदा संरक्षण की उचित तकनीक अपना कर इन मृदाओं पर कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में चाय और कॉफी उगाई जाती हैं। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल की लाल लेटराइट मृदाएँ काजू की फसल के लिए अधिक उपयुक्त हैं।

प्रश्न 6. भारत में भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी कारक तथा इसे नियंत्रित करने के उपाय बताइये।

उत्तर— भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी कारक-कुछ मानव क्रियाओं जैसे-वनोन्मूलन, अतिपशुचारण, खनन आदि ने भूमि के निम्नीकरण में मुख्य भूमिका निभाई है। यथा-

(1) खनन-खनन के उपरान्त खदानों वाले स्थानों को गहरी खाइयों और मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है; खनन के कारण झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और उड़ीसा जैसे राज्यों में भूमि निम्नीकरण हुआ है।

(2) वनोन्मूलन-वनों को काटा जाता है। अनेक राज्यों में वनोन्मूलन भूमि निम्नीकरण का कारण बना है।

(3) अति पशुचारण-चरागाहों में पशुओं की निरन्तर चराई के कारण भूमि का ह्रास होता है। गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में अतिपशुचारण भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण है।

(4) अत्यधिक सिंचाई-भूमि की अत्यधिक सिंचाई से जल भराव होता है। अत्यधिक सिंचाई के कारण उत्पन्न जलाक्रान्तता के फलस्वरूप भूमि की लवणता अथवा क्षारीयता बढ़ जाती है जिससे भूमि कृषि के अयोग्य हो जाती है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में अधिक सिंचाई भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है।

(5) खनिज प्रक्रियाएँ-सीमेण्ट उद्योग में चूना पत्थर को पीसना तथा मृदा उद्योग में खड़िया मृदा और सेलखड़ी के प्रयोग से बहुत अधिक मात्रा में वायुमण्डल में धूल विसर्जित होती है। जब इसकी परत भूमि पर जम जाती है तो मृदा की जल सोखने की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है। इससे भूमि का निम्नीकरण हो रहा है।

(6) औद्योगिक अपशिष्ट-विगत कुछ वर्षों से देश के विभिन्न भागों में औद्योगिक जल निकास से बाहर आने वाला अपशिष्ट पदार्थ भूमि और जल प्रदूषण का मुख्य स्रोत है।

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सामाजिक विज्ञान (भूगोल) कक्षा X 147

भूमि निम्नीकरण को नियंत्रित करने के उपाय-

(i) वनारोपण और चरागाहों का उचित प्रबंधन किया जाए।

(ii) पेड़ों की रक्षक मेखला, पशुचारण नियंत्रण और रेतीले टीलों को काँटेदार झाड़ियाँ लगाकर स्थिर बनाने की प्रक्रिया से भी शुष्क क्षेत्रों में भूमि के कटाव को रोका जा सकता है।

(iii) बंजर भूमि का उचित प्रबंधन किया जाए।

(iv) औद्योगिक जल को परिष्करण के उपरान्त विसर्जित करके जल और भूमि प्रदूषण को कम किया जाये।

(v) खनन के क्रियाकलापों को नियंत्रित किया जाए।

प्रश्न 7. मृदा अपरदन किसे कहते हैं? इसके कारण व संरक्षण के उपाय लिखिए।

(माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2022)

अथवा

मृदा अपरदन क्या है? मृदा किस-किस तरह अपरदित होती है तथा इसे कैसे रोका जा सकता है?

अथवा

मृदा अपरदन के कारण एवं संरक्षण के उपाय लिखिए। (प्रश्न बैंक)

उत्तर— मृदा अपरदन का अर्थ- मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहा जाता है।

मृदा अपरदन के प्रकार— मृदा अपरदन के प्रकार निम्नलिखित हैं- मृदा अपरदन को मोटे रूप से दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

(अ) प्राकृतिक तत्त्वों द्वारा मृदा अपरदन (ब) मानवीय क्रियाओं द्वारा मृदा अपरदन।

(अ) प्राकृतिक तत्त्वों के अन्तर्गत जल अपरदन और वायु अपरदन प्रमुख हैं। यथा-

(क) जल अपरदन-जल द्वारा मृदा के अपरदन के दो प्रकार हैं-

(1) उत्खात भूमि-प्रवाहित जल मृत्तिकायुक्त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाएँ बनाता है जिनको अवनालिकाएँ कहते हैं। इस प्रकार की भूमि जुताई के अयोग्य हो जाती है जिसे उत्खात भूमि के नाम से जाना जाता है।

(2) चादर अपरदन-अनेक बार जल विस्तृत क्षेत्र को ढके हुए ढाल के साथ नीचे की तरफ प्रवाहित होता है, जिससे उस क्षेत्र की ऊपरी मृदा घुलकर जल के साथ बह जाती है, इसे चादर अपरदन कहते हैं।

(ख) पवन अपरदन-पवन द्वारा मैदान अथवा ढालू क्षेत्र से मृदा को उड़ा ले जाने की प्रक्रिया को पवन अपरदन कहा जाता है।

(ब) मानवीय क्रियाओं द्वारा मृदा अपरदन-निम्न प्रमुख मानवीय क्रियाएँ भी मृदा के अपरदन में सहायक होती हैं-

(1) कृषि के गलत तरीके अपनाना-कृषि के गलत तरीकों से भी मृदा अपरदन होता है।

(2) वनोन्मूलन, अतिपशुचारण, निर्माण और खनन इत्यादि से भी कई बार मृदा का संतुलन भंग हो जाता है और मृदा अपरदन होने लगता है।

मृदा संरक्षण— मृदा संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए-

(1) समोच्च जुताई-ढाल वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं के समानान्तर हल चलाने से ढाल के साथ जल बहाव की गति घटती जाती है।

(2) सीढ़ीदार कृषि-ढाल वाली भूमि पर सोपान बनाए जा सकते हैं। सोपान कृषि अपरदन को नियंत्रित करती है। पश्चिमी और मध्य हिमालय में सोपान अथवा सीढ़ीदार कृषि काफी विकसित है।

(3) पट्टी कृषि-बड़े खेतों को पट्टियों में विभाजित किया जाता है। फसलों के बीच में घास की पट्टियाँ उगाई जाती हैं। ये पवनों के द्वारा जनित बल को कमजोर करती हैं। इस तरीके को पट्टी कृषि कहते हैं।

(4) पेड़ों को कतारों में लगाना-पेड़ों को कतारों में लगा कर रक्षक मेखला बनाना भी पवनों की गति कम करता है। इन रक्षक पट्टियों का पश्चिमी भारत में रेत के टीलों के स्थायीकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

प्रश्न 8. भारत में भू-संसाधनों का उपयोग किन उद्देश्यों के लिए किया जाता है? समझाइये।

उत्तर— भारत में भू-संसाधनों का उपयोग निम्नलिखित उद्देश्यों से किया जाता है-

(1) वन।

(2) कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि-(i) बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि (ii) गैर-कृषि प्रयोजनों में लगाई गई भूमि-जैसे इमारतें, सड़क, उद्योग इत्यादि।

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(3) परती भूमि के अतिरिक्त अन्य कृषि अयोग्य भूमि-(i) स्थायी चरागाहें तथा अन्य गोचर भूमि (ii) विविध वृक्षों, वृक्ष फसलों तथा उपवनों के अधीन भूमि (जो शुद्ध बोए गए क्षेत्र में शामिल नहीं है) (iii) कृषि योग्य बंजर भूमि जहाँ पाँच से अधिक वर्षों से खेती न की गई हो।

(4) परती भूमि-(i) वर्तमान परती (जहाँ एक कृषि वर्ष या उससे कम समय से खेती न की गई हो) (ii) वर्तमान परती भूमि के अतिरिक्त अन्य परती भूमि या पुरातन परती (जहाँ 1 से 5 कृषि वर्ष से खेती न की गई हो)।

(5) शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्र-भूमि का वह क्षेत्र जिस पर फसलें उगाई तथा काटी जाती हैं, वह शुद्ध बोया गया क्षेत्र कहलाता है। एक कृषि वर्ष के एक बार से अधिक बोए गए क्षेत्र को शुद्ध (निवल) बोए गए क्षेत्र में जोड़ दिया जाए तो वह सकल कृषित क्षेत्र कहलाता है।