RBSE Class 12 Hindi पीयूष प्रवाह Chapter 6 राजस्थान के गौरव पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi पीयूष प्रवाह Chapter 6 राजस्थान के गौरव वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
‘सम्पसभा’ की स्थापना किसने की?
(क) महाराजा सूरजमल ने
(ख) संत जम्भेश्वर ने
(ग) पूज्य गोविन्द गुरु ने
(घ) बाबा रामदेव ने।
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 2.
बाबा रामदेव की समाधि पर मेला लगता है
(क) भादवा सुदी दशमी
(ख) भादवा वदी पंचमी
(ग) भादवा वदी दशमी
(घ) भादवी सुदी पंचमी।
उत्तर:
(क)

RBSE Class 12 Hindi पीयूष प्रवाह Chapter 6 राजस्थान के गौरव अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
देवनारायण को किसका अवतार माना जाता है?
उत्तर:
सारा गुर्जर समाज देव नारायण जी को श्री विष्णु का अवतार मानता है।

प्रश्न 2.
‘सर सांटे सँख रहे तो भी सस्ता जाण’-पंक्ति का अर्थ बताइये।
उत्तर:
सर कट जाय पर वृक्ष (रूख) न कटे। सर के कटने पर यदि वृक्ष (रूख)की रक्षा होती है, तो भी वह सस्ता ही है।

प्रश्न 3.
सूरजमल कहाँ के राजा थे? उत्तर-महाराजा सूरजमल भरतपुर राज्य के राजा थे। प्रश्न 4. संत जम्भेश्वर को दिव्य ज्ञान कहाँ प्राप्त हुआ?
उत्तर:
समराथल धोरा गाँव में सन्त जम्भेश्वर को दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई।

RBSE Class 12 Hindi पीयूष प्रवाह Chapter 6 राजस्थान के गौरव लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘जम्मा-जागरण’ आन्दोलन के उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बाबा रामदेव ने दलितों के उद्धार के लिए जम्मा जागरण’ आन्दोलन चलाया। उन्होंने दलितों से सम्पर्क बढ़ाया। ‘जम्मा-जागरण’ आन्दोलन के माध्यम से उन्हें जागृत कर अच्छाइयों की ओर प्रवृत्त किया। ‘जम्मा-जागरण’ का यह पुनीत कार्य मेघवाल जाति के द्वारा ही किया जाता था। बाबा रामदेव इस आन्दोलन के द्वारा उनमें चेतना भरना चाहते थे। इसी कारण यह आन्दोलन चलाया गया था।

प्रश्न 2.
जलियाँवाला बाग हत्याकांड की तुलना राजस्थान की किस घटना से की जाती है? संक्षेप में घटना का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
लगभग एक शताब्दी पूर्व मानगढ़ पहाड़ के सघन वनांचल में वनवासी बन्धुओं ने एक व्यापक स्वाधीनता आन्दोलन का संचालन किया था। इस प्रभावी अभियान से अंग्रेज सरकार भी घबरा उठी। इस आन्दोलन को कुचलने के लिए 17 नवम्बर, 1913 को राष्ट्रभक्तों के विशाल सम्मेलन पर अंग्रेजों ने लाखों वनबन्धुओं पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलाईं और 1,500 वनवासियों को मौत के घाट उतार दिया। इस हत्याकाण्ड की तुलना जलियाँवाला बाग के हत्याकाण्ड से की गई है।

प्रश्न 3.
सूरजमल की राष्ट्रीय भावना से संबंधित किन्हीं दो घटनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
महाराजा सूरजमल ने यवनों की सत्ता को हमेशा के लिए समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने नारनौल के पास रात में सलावत खाँ की छावनी पर सिंह झपट्टा मारकर उसे आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया। उसने सन्धि की, जिसमें सूरजमल ने राष्ट्र भावना की परिचायक कई शर्ते रखीं, जिनमें दो प्रमुख हैं –

  1. मुगल सेना पीपल के वृक्ष नहीं काटेगी।
  2. मन्दिरों का अपमान नहीं किया जायेगा, न ही किसी देवालय को क्षति पहुँचाई जायेगी।

आगरा में मुगल सत्ता समाप्त की और उनके निशान मिटाने के लिए सारे दुर्ग को दूध और यमुना के जल से धुलवाया। यह उनकी राष्ट्रीय भावना से सम्बन्धित घटनाएँ हैं।

प्रश्न 4.
‘खेजड़ली’ गाँव की इमरती देवी का बलिदान किस कारण हुआ? लिखिए।
उत्तर:
जोधपुर महाराजा ने सैनिकों को राज-कार्य हेतु वृक्ष काटकर लाने को कहा। सैनिकों ने ‘खेजड़ली’ गाँव को चुना, क्योंकि वहाँ खेजड़ी के पेड़ अधिक थे। सैनिक गाँव में आ धमके। इमरती देवी को पता लगा कि सैनिक खेजड़ी के वृक्ष को काटने आये हैं, तो सैनिकों को उन्होंने बहुत समझाया, पर सैनिक नहीं माने। तब तक गाँव के आदमी भी आ गये। सैनिक राजमद में थे। पेड़ काटने लगे। इमरती देवी ने उन्हें ललकारा और कहा कि हमारे जीते-जी तुम पेड़ नहीं काट सकते। उसने गाँव के लोगों को भी प्रेरणा दी। सभी स्त्री-पुरुष एक-एक पेड़ के आगे खड़े हो गये। इमरती देवी उसकी तीनों पुत्रियों और पति ने खेजड़ी के पेड़ों के लिए बलिदान दिया और जीते जी पेड़ नहीं करने दिये। फिर तो गाँव वाले भी पीछे नहीं रहे और उन्होंने भी बलिदान दिया।

RBSE Class 12 Hindi पीयूष प्रवाह Chapter 6 राजस्थान के गौरव निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानगढ़ का विशाल पहाड़ किस दिव्य-बलिदान का साक्षी है? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
राजस्थान के धुर दक्षिण में गुजरात और मध्य प्रदेश की सीमा पर दिव्य बलिदान को साक्षी “मानगढ़ को विशाल पहाड़” खड़ा है। लगभग एक शताब्दी पूर्व इस सघन वनांचल में वनवासी बन्धुओं ने व्यापक स्वाधीनता आन्दोलन का संचालन किया था। इस व्यापक अभियान के कारण अंग्रेज सरकार घबरा गई। आन्दोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने 17 नवम्बर, 1913 को राष्ट्रभक्तों के विशाल सम्मेलन में वनबन्धुओं पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ बरसाईं और 1,500 वनवासियों को मौत के घाट उतार दिया। यह हत्याकांड जलियाँवाला बाग के हत्याकांड से भी भयंकर था। मानगढ़ का पहाड़ उसी बलिदान का साक्षी है। यह बलिदान आज भी वनवासियों के गीतों और कथाओं से रचा-बसा है। इस पहाड़ पर चढ़ते हुए आज भी रोमांच हो जाता है। इस आन्दोलन का नेतृत्व पूज्य गोविन्द गुरु ने किया था। लाखों वनवासी सामन्ती और अंग्रेजी सरकार के अत्याचार सह रहे थे। गोविन्द गुरु ने बच्चों की शिक्षा, मेहनत करना, मद्य-मांस सेवन नहीं करना, आपसी विवाद न करना, बेगार नहीं करना, विदेशी का बहिष्कार तथा स्वधर्म में दृढ़ विश्वास आदि के भाव स्थापित किये। उन्हीं वनवासी लोगों की स्मृति में आज भी मार्ग शीर्ष पूर्णिमा पर इस पहाड़ पर मेला लगता है जिसमें हजारों लोग आते हैं। मानगढ़ का विशाल पहाड़ उसी दिव्य बलिदान की याद दिलाता है।

प्रश्न 2.
समाज में धर्म स्थापना व प्रकृति के सहजीवन के उद्देश्य से संत जम्भेश्वर के योगदान का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रकृति प्रदत्त सामाजिक जीवन हमारे देश की मूल आत्मा है। सन्त जम्भेश्वर जी उसी आत्मा के तत्वान्वेषी और सशक्त उद्बोधक थे। समराथल धोरा में उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। 1485 में उन्होंने कार्तिक अष्टमी को प्रथम उपदेश दिया। समाज में धर्म की स्थापना तथा प्रकृति से सहजीवन के उद्देश्य को ध्यान में रखकर उन्होंने जीवन हेतु उनतीस नियम बनाए। इन्हें मानने वाले बिश्नोई कहलाये। ये सभी नियम सदाचार, जीवन की नियमितता तथा प्रकृति संरक्षण पर आधारित हैं। इन्होंने कट्टरता पर भी निरन्तर प्रहार किया। आपने सुल्तान सिकन्दर लोदी को भी गौ हत्या न करने के लिए राजी कर लिया था। कई विधर्मी उनके शिष्य बने। जम्भेश्वर जी के बाद उनके अनुयायियों ने प्रकृति की रक्षा हेतु बलिदान किया, जो प्रेरक और अद्वितीय है।

खेजड़ली गाँव इस बलिदान के लिए प्रसिद्ध है। खेजड़ली गाँव में जब जोधपुर महाराजा के सैनिकों ने खेजड़ी के वृक्ष काटने का प्रयास किया, तो इमरती देवी ने इसका विरोध किया। सैनिकों को चुनौती दी। इमरती देवी की पुत्रियाँ और पति तथा गाँव के लोग पेड़ों के सामने खड़े हो गये। सब ने अपना बलिदान दिया। यह जम्भेश्वर जी की प्रेरणा का ही परिणाम था। आज भी बिश्नोइयों के गाँव में पेड़ नहीं काटे जाते, हिरण नहीं मारे जाते । जम्भेश्वर जी की प्रकृति प्रेम की प्रेरणा ने सभी को प्रभावित किया था। आज भी उनकी स्मृति में मेला लगता है। आने वाले व्यक्ति प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेते हैं।

RBSE Class 12 Hindi पीयूष प्रवाह Chapter 6 राजस्थान के गौरव अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi पीयूष प्रवाह Chapter 6 राजस्थान के गौरव वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. हमारे देश में मोक्ष का अधिकारी माना है –

(क) त्यागी और तपस्वी को
(ख) योगी और भक्त को
(ग) सन्त और साधु को
(घ) योगी और योद्धा को।

2. इस देश के वीरों और सिद्धों ने प्रतिकार किया था –

(क) अधर्म का
(ख) अन्याय का
(ग) असत्य का
(घ) अशिक्षा का।

3. देव नारायण थे –

(क) बगड़ावत सिद्ध वंशीय गुर्जर
(ख) बगड़ावते शाक्य वंशीय गुर्जर
(ग) बगड़ावत नागवंशीय गुर्जर
(घ) बगड़ावत शैव वंशीय गुर्जर।

4. गुर्जर समाज देव नारायण जी को मानता है –

(क) विष्णु का अवतार
(ख) शिव का अवतार
(ग) शंकर का अवतार
(घ) राम का अवतार।

5. देव नारायण जी का जन्म माना जाता है –

(क) माघ कृष्ण सप्तमी को
(ख) माघ शुक्ल पंचमी को
(ग) माघ शुक्ल सप्तमी को
(घ) माघ कृष्ण पंचमी को।

6. सिद्ध वट के योग्य गुरुओं ने देव नारायण को सिखाया –

(क) योग विद्या
(ख) तंत्र विद्या
(ग) शस्त्र विद्या
(घ) शास्त्र विद्या।

7. आज भी देव नारायण जी की पूजा होती है –

(क) आम की पत्तियों से
(ख) पीपल की पत्तियों से
(ग) बड़ की पत्तियों से
(घ) नीम की पत्तियों से।

8. बाबा रामदेव की जन्म तिथि है –

(क) भाद्रपद शुक्ल द्वितीया
(ख) भाद्रपद शुक्ल तृतीया
(ग) भाद्रपद कृष्ण द्वितीया
(घ) भाद्रपद कृष्ण तृतीया।

9. ‘पूत रा पग पालणे दीखे’ यह लोकोक्ति किसके लिए प्रयुक्त हुई है?

(क) संत जम्भेश्वर
(ख) देव नारायण
(ग) महाराजा सूरजमल
(घ) बाबा रामदेव।

10. बाबा रामदेव ने परिस्थितियों को पहचान कर अपना जीवन खपाया

(क) लोक कल्याण में
(ख) धार्मिक भावना में
(ग) शास्त्र अध्ययन में
(घ) तंत्र विद्या में।

11. ‘जम्मा-जागरण’ आन्दोलन चलाया –

(क) पूज्य गोविन्द गुरु ने
(ख) देव नारायण ने
(ग) बाबा रामदेव ने
(घ) संत जम्भेश्वर ने।

12. जम्भेश्वर जी का जन्म हुआ था –

(क) रामनवमी को
(ख) विजयादशमी को
(ग) कृष्ण जन्माष्टमी को
(घ) दीपावली को।

13. सन्त जम्भेश्वर ने 1485 में अपना उपदेश किस तिथि को दिया?

(क) कार्तिक अष्टमी
(ख) कार्तिक नवमी
(ग) कार्तिक पंचमी
(घ) कार्तिक सप्तमी।

14. समाज को एक नई संजीवनी मिली –

(क) बाबा रामदेव से
(ख) गोविन्द गुरु से
(ग) सन्त जम्भेश्वर से
(घ) देव नारायण से

15. विराट स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्व किया था –

(क) महाराजा सूरजमल ने
(ख) पूज्य गोविन्द गुरु ने
(ग) सन्त जम्भेश्वर ने
(घ) बाबा रामदेव ने।

16. 1880 में गोविन्द गुरु तीन महीने जिसके साथ रहे, वे थे –

(क) विवेकानन्द
(ख) रामकृष्ण परमहंस
(ग) शंकराचार्य
(घ) दयानन्द सरस्वती।

17. मानगढ़ के विशाल पहाड़ पर प्रतिवर्ष मेला लगता है –

(क) मार्गशीर्ष अमावस्या पर
(ख) मार्गशीर्ष प्रतिपदा पर
(ग) मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर
(घ) मार्गशीर्ष पंचमी पर।

18. युवावस्था तक आते-आते सूरजमल निष्णात हो गये –

(क) रणनीति में
(ख) कूटनीति में
(ग) न्याय नीति में
(घ) व्यवहार नीति में।

19. बदनसिंह की मृत्यु के बाद सूरजमल को भरतपुर का राजा बनाया गया

(क) 17 जून, 1756 को
(ख) 9 जून, 1758 को
(ग) 26 जून, 1756 को
(घ) 9 जून, 1756 को।

20. तुर्को को उन्हीं के हथियार से मात देने वाला एक वीर पुरुष भारत की धरती पर अवतरित हुआ था। वह वीर पुरुष कौन था?

(क) महाराणा प्रताप
(ख) शिवाजी
(ग) अशोक
(घ) सूरजमल।

उत्तर:

  1. (घ)
  2. (ख)
  3. (ग)
  4. (क)
  5. (ग)
  6. (ख)
  7. (घ)
  8. (क)
  9. (घ)
  10. (क)
  11. (ग)
  12. (ग)
  13. (क)
  14. (ग)
  15. (ख)
  16. (घ)
  17. (ग)
  18. (ख)
  19. (घ)
  20. (घ)

RBSE Class 12 Hindi पीयूष प्रवाह Chapter 6 राजस्थान के गौरव अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राजस्थान की धरती वीर प्रसूती भूमि है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस धरती ने रणबाँकुरों को पैदा किया है। एक से बढ़कर एक साहसी और तेजस्वी योद्धाओं ने इस धरती पर जन्म लिया है, जिन्होंने रणभूमि में अपने रौद्र रूप से शत्रुओं को भयभीत किया है। ऐसे वीरों को जन्म देने वाली यह भूमि वीर प्रसूता है।

प्रश्न 2.
‘यहाँ पर ऐसे वीर जन्मते हैं।’ कैसे वीर जन्म लेते हैं?
उत्तर:
यह वीरों की रणबाँकुरी भूमि है। यहाँ ऐसे वीर पैदा हुए हैं, जो सिर कट जाने पर भी लड़ते रहते हैं, जो जुझारू हैं।

प्रश्न 3.
वीरों और सिद्धों की समाधियों पर आये जातरुओं को रोकने के लिए क्या प्रयत्न किया जाता है?
उत्तर:
निवासी जातरुओं को रुकने का आग्रह करते हैं। कोई हाथ जोड़कर विनती करता है, कोई सड़क पर लेटकरे यह कहता | सुनाई पड़ता है कि आपको जाना है तो हमें रौंदकर ही जा सकते हैं, अन्यथा हमें सेवा का लाभ तो देना ही होगा।

प्रश्न 4.
चौहान राजा ने बगड़ावतों को कहाँ की जागीर दी थी?
उत्तर:
चौहान राजा ने बगड़ावतों को ‘गोठा’ की जागीर दी थी।

प्रश्न 5.
देव नारायण किस कुल में जन्मे थे और उनको किस रूप में देखा जाता है?
उत्तर:
देव नारायण बगड़ावत के कुल के थे। बगड़ावत नागवंशीय गुर्जर थे। सारा गुर्जर समाज उन्हें विष्णु का अवतार मानता है।

प्रश्न 6.
सिद्ध-वट में देव नारायण को कैसी शिक्षा मिली?
उत्तर:
सिद्ध-वट के योग्य गुरुओं ने उन्हें आयुर्वेद के साथ तंत्र-विद्या भी सिखायी। वे शीघ्र ही कुशल योद्धा के साथ-साथ आयुर्वेद और तंत्र शास्त्र के भी पंडित हो गये।

प्रश्न 7.
देव नारायण की महत्त्वपूर्ण देन क्या है?
उत्तर:
देव नारायण ने औषधि के रूप में गोबर और नीम का महत्त्व स्पष्ट किया। तुलसी की भाँति नीम व गोबर को प्रतिदिन के व्यवहार में लाने का सफल प्रयास किया। इस कारण आज भी इनकी पूजा नीम की पत्तियों से होती है।

प्रश्न 8.
‘पूत रा पग पालणे दीखे’ यह कहावत किसके लिए कही गई है और क्यों?
उत्तर:
यह कहावत बाबा रामदेव के लिए कही गई है, क्योंकि उन्होंने उफनते दूध को नीचे रख चमत्कार दिखाया था।

प्रश्न 9.
बाबा रामदेव ने कहाँ और क्या शिक्षा प्राप्त की?
उत्तर:
बाबा रामदेव ने कुछ बड़े होने पर गुरु बालकनाथ से शिक्षा लेना प्रारम्भ किया। उन्होंने इतिहास, धर्म, दर्शन के साथ-साथ शस्त्र और शास्त्रों की शिक्षा भी प्राप्त की।

प्रश्न 10.
बाबा रामदेव का जम्मा-जागरण’ आन्दोलन चलाने का कारण क्या था?
उत्तर:
रामदेव ने दलितों से सम्पर्क बढ़ाया और जम्मा-जागरण’ आन्दोलन के माध्यम से उन्हें जागृत कर अच्छाइयों की ओर प्रवृत्त किया।

प्रश्न 11.
चिकित्सा के क्षेत्र में रामदेव ने क्या चमत्कार किया?
उत्तर:
रामदेव सिद्ध योगी थे और वैद्यकीय चिकित्सा में पारंगत थे। विकलांगता जैसी बीमारियों में उन्होंने लोगों की चमत्कारिक सहायता की। कुष्ठ रोग, हैजा आदि में उनकी चिकित्सा रामबाण थी।

प्रश्न 12.
रामदेव ने प्रमुख परचे देकर लोगों को चमत्कृत कर दिया। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लखी बनजारे की मिश्री को नमक बनाना, पाँच पीरों के कटोरे मक्का से पलभर में लाकर उनके सामने रखना, नेतलदे की पंगुता को दूर करना, सारथिये को तथा अपनी बहन सुगना के पुत्र को जीवित करना उनके प्रमुख परचे हैं।

प्रश्न 13.
माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् सन्त जम्भेश्वर ने क्या किया? उत्तर–माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् जम्भेश्वर ने सारी सम्पत्ति दान कर दी और सामाजिक उत्थान में लग गये।

प्रश्न 14.
सन्त जम्भेश्वर को दिव्य ज्ञान की प्राप्ति किस स्थान पर हुई?
उत्तर:
जम्भेश्वर जी बीकानेर जिले की नोखा तहसील-समराथल धोरा आए और यह अपना मुकाम बनाया। इसी स्थान पर उन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ।

प्रश्न 15.
इमरती देवी के बलिदान का कारण लिखिए।
उत्तर:
जोधपुर महाराज के सैनिक खेजड़ली गाँव में खेजड़ी के पेड़ काटने आये थे, जिसका इमरती देवी ने विरोध किया। जब सैनिक नहीं माने, तो वह उनकी पुत्रियाँ और पति एक-एक पेड़ के पास खड़े हो गये और अपना बलिदान कर दिया।

प्रश्न 16.
वनवासियों के हत्याकाण्ड की तुलना किस घटना से की गई है?
उत्तर:
वनवासियों के हत्याकाण्ड को जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड से भी वीभत्स बताया गया है।

प्रश्न 17.
गोविन्द गुरु ने पीड़ित समाज को सुधारने का बीड़ा उठाया। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लाखों वनवासी बन्धु अशिक्षा, बेकारी, भूख, अकाल, बीमारियों, व्यसनों तथा अंधविश्वासों के साथ-साथ सामंती और अंग्रेजी सरकार के अत्याचारों को सही रहे थे। ऐसे समाज को सुधारने का बीड़ा गोविन्द गुरु ने उठाया।

प्रश्न 18.
‘सम्पसभा’ का वार्षिक मेला कब लगता है और क्यों लगता है?
उत्तर:
‘सम्पसभा’ का वार्षिक मेला मानगढ़ के विशाल पहाड़ पर लगता है। यह मेला स्वाधीनता आन्दोलन का संचालन करने वाले बलिदानियों की स्मृति में लगता है। यह मेला मार्ग शीर्ष पूर्णिमा को लगता है। लोग आते हैं और यहाँ की माटी को मस्तक से लगाते

प्रश्न 19.
राजा बदनसिंह ने सूरजमल को ही युवराज क्यों बनाया?
उत्तर:
सूरजमल बदनसिंह के सबसे बड़े पुत्र थे, तेजस्वी थे। उनका शरीर सुदृढ़ था। वे साहसी योद्धा थे। कूटनीति में निष्णात थे। इन गुणों के कारण राजा बदनसिंह ने उन्हें युवराज बनाया।

प्रश्न 20.
सूरजमल में राष्ट्र भावना प्रबल थी। उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सलावत खाँ के आत्म-समर्पण करने पर सन्धि करते समय उन्होंने दो शर्ते रखीं –

(अ) मुगल सेना पीपल के वृक्ष नहीं काटेगी।
(ब) मन्दिरों का अपमान नहीं किया जायेगा और किसी देवालय को क्षति नहीं पहुँचाई जायेगी।

इससे स्पष्ट होता है कि उनमें राष्ट्रीय भावना प्रबल थी।

प्रश्न 21.
सूरजमल की शिवाजी से तुलना क्यों की जाती है?
उत्तर:
जिस प्रकार शिवाजी ने मुगलों को धूल चटा दी थी। उसी प्रकार, सूरजमल ने तुर्को को उन्हीं के हथियार से मात दे दी।

RBSE Class 12 Hindi पीयूष प्रवाह Chapter 6 राजस्थान के गौरव लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘वीर प्रसूती भूमि ने ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों को जन्म दिया है। उन श्रेष्ठ पुरुषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि ने ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों को जन्म दिया है, जो शस्त्र-शास्त्र दोनों में निष्णात थे। तलवार के धनी थे, तो पहुँचे हुए सिद्ध भी थे। अपनी सिद्धियों और शूरता का उपयोग उन्होंने अन्याय का प्रतिकार करने, लोक जागरण में तथा समाज में समता निर्माण करने में किया। शताब्दियों बाद भी आज लोग उनके नाम का स्मरण करते हैं। उनकी समाधियों पर मेले लगते हैं। दूर-दूर के यात्री पैदल चलकर वहाँ पहुँचते हैं।

प्रश्न 2.
समाधियों पर आये जातरुओं की सेवा किस प्रकार होती है?
उत्तर:
सभी जातरुओं की सेवा में भण्डारों का आयोजन कर सामान्य जन भी पलक पाँवड़े बिछाये तैयार रहते हैं। उनके थके-माँदे लहूलुहान पैरों को गर्म पानी से धोना, उनकी मालिश करना, उनके लिए गरम-गरम चाय, अल्पाहार व भोजन की नि:शुल्क व्यवस्था करने में बड़े धनिक और सामान्य जन अपने को धन्य मानते हैं। ऐसी मानसिकता वाले सेवा करने वालों को जब लगता है कि सेवा का अवसर दिये बिना ही जातरू (तीर्थयात्री) आगे बढ़ना चाहते हैं, तो रुकने का आग्रह करते हैं। हाथ जोड़ कर विनती करते हैं, सड़क पर लेट जाते हैं। इस प्रकार वे सेवाभावी सेवा करते हैं।

प्रश्न 3.
‘देव नारायण का यश चारों ओर फैलने लगा।’ उनका यश फैलने का क्या कारण था?
उत्तर:
देव नारायण सिद्ध वट में योग्य गुरुओं से शिक्षा ग्रहण कर कुशल योद्धा के साथ-साथ आयुर्वेद और तंत्र शास्त्र के भी पंडित हो गये। धार में स्थित महाकाली की आराधना के समय राजा जयसिंह की बीमार पुत्री पीपलदे को अपने आयुर्वेद के ज्ञान से भला-चंगा कर दिया। वहीं पीपलदे से उनका विवाह हो गया। अपने आयुर्वेद के ज्ञान तथा सिद्धियों से लोगों के कष्टों को दूर करने लगे। अब वे लोगों के कष्ट हरने वाले साक्षात् भगवान हो गये। पीपलदे की कुरूपता दूर करना, सारंग सेठ को पुनर्जीवित करना, सूखी नदी में पानी निकालना आदि उनके चमत्कारी कार्य थे, जिससे उनका यश चारों ओर फैलने लगा।

प्रश्न 4.
गोठा पहुँचकर देव नारायण ने क्या किया? उनका महत्त्वपूर्ण कार्य क्या था?
उत्तर:
गोटा में सभी देवनारायण जी से आकर मिले। गोठा में अमन-चैन कायम कर जनता को ढाँढ़स बंधाया। पूरे राज्य और पड़ोस के राज्य में राणा के अत्याचार चल रहे थे। उनके कुशासन को समाप्त करने के लिए राज्य क्रान्ति कर सुशासन स्थापित किया। देवनारायण जी की एक महत्त्वपूर्ण देन यह है कि उन्होंने औषधि के रूप में गोबर और नीम का महत्त्व स्पष्ट किया। तुलसी की भाँति नीम व गोबर को प्रतिदिन के व्यवहार में लाने का सफल प्रयास किया। इसी कारण आज भी उनकी पूजा नीम की पत्तियों से होती है।

प्रश्न 5.
बाबा रामदेव की दलितों के प्रति विशेष सहानुभूति थी। पठित अंश के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बाबा रामदेव ने परिस्थिति को पहचान कर लोक-कल्याण में अपना जीवन लगाने का संकल्प किया। वे राजपूत थे फिर भी उन्होंने दलितों से सम्पर्क बढ़ाया। ‘जम्मा-जागरण’ आन्दोलन के माध्यम से दलितों को जागृत कर अच्छाइयों की ओर प्रवृत्त किया। ‘जम्मा-जागरण’ का यह पुनीत कार्य मेघवाल जाति के द्वारा ही किया जाता था, शेष समाज उनकी वाणी का श्रवण करता था। समाज के पिछड़े बन्धुओं के प्रति उनका अन्त:करण करुणा व परोपकार से ओत-प्रोत था। उन्होंने मेघवाल जाति की कन्या डालीबाई को अपनी धर्म बहन बनाया तथा बस्ती में हैजा फैल जाने पर अपनी पत्नी को अकेली छोड़कर उसकी सेवा-चिकित्सा हेतु दौड़ पड़े। इससे स्पष्ट है कि उनकी दलितों के प्रति विशेष सहानुभूति थी।

प्रश्न 6.
रामदेव सिद्ध योगी भी थे और वैद्यकीय चिकित्सक भी। इस कथन की सार्थकता प्रमाणित कीजिए।
उत्तर:
बाबा रामदेव स्वयं सिद्ध योगी तो थे ही वैद्यकीय चिकित्सा में भी पारंगत थे। विकलांगता जैसी बीमारियों में उन्होंने लोगों की चमत्कारिक सहायता की। कुष्ठ रोग, हैजा आदि में उनकी चिकित्सा रामबाण थी। इस कारण, वे पीड़ितों को रोग मुक्त कर चमत्कार दिखा सके। लखी बनजारे की मिश्री को नमक बनाना, पाँच पीरों के कटोरे मक्का से पलभर में लाकर उनके सामने रखना, नेतलदे की पंगुता को दूर करना, सारथियों को तथा अपनी बहन सुगवा के पुत्र को जीवित करना उनके प्रमुख चमत्कार थे।

प्रश्न 7.
सन्त जम्भेश्वर जी के कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सन्त जम्भेश्वर जी प्रकृति के पुजारी थे। समराथल धोरा में उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। 1485 की कार्तिक अष्टमी को उन्होंने प्रथम उपदेश दिया। समाज में धर्म स्थापना व प्रकृति से सहजीवन के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए जम्भेश्वर जी ने जीवन हेतु उनतीस नियम बनाये। इन्हें मानने वाले बिश्नोई कहलाये। ये सभी नियम सदाचार, जीवन की नियमितता तथा प्रकृति संरक्षण पर ही आधारित हैं। आपने कट्टरता पर भी निरन्तर प्रहार किये। दुष्टों का निग्रह अपने चमत्कारी व्यक्तित्व से किया। आपने सुल्तान सिकन्दर लोदी को भी गौ हत्या न करने के लिए राजी कर लिया था। समाज को भी आपके नेतृत्व से नई संजीवनी मिली। उनके नियम सरल व सुखी जीवन के लिए थे। इस कारण लोग बड़ी संख्या में उनके अनुयायी बन गये।

प्रश्न 8.
“प्रकृति की रक्षा हेतु दिया गया यह बलिदान अत्यन्त प्रेरक एवं अद्वितीय है।” यहाँ किस बलिदान का उल्लेख है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जोधपुर महाराज के कहने पर सैनिक खेजड़ी के वृक्ष काटने के लिए खेजड़ली गाँव आये। इमरती देवी ने उनका विरोध किया और चुनौती दी। जब सैनिक नहीं माने, तो स्वयं इमरती देवी, उसकी पुत्रियाँ और पति एक-एक वृक्ष के सामने खड़े हो गये और अपना बलिदान दिया। यह देखकर गाँव के लोगों को प्रेरणा मिली और वे भी आ गये। वे भी वृक्ष के रक्षार्थ कटते रहे। इस प्रकार, उस दिन लगभग 363 लोगों का बलिदान खेजड़ली गाँव में हुआ। ये सभी बलिदानी जम्भेश्वर जी के शिष्य थे। वास्तव में प्रकृति की रक्षा हेतु यह बलिदान प्रेरणादायक और अद्वितीय है।

प्रश्न 9.
‘मानगढ़ का विशाल पहाड़ एक दिव्य बलिदान का साक्षी है।’ उस बलिदान की भयंकरता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
लगभग एक शताब्दी पूर्व मानगढ़ पहाड़ के सघन वनांचल में वनवासी बन्धुओं ने एक व्यापक स्वाधीनता आन्दोलन का संचालन किया। यह अभियान इतना प्रभावी था कि अंग्रेज सरकार घबरा गई। इसे कुचलने का प्रयास किया गया। स्थानीय सामन्त-जागीरदार तो पहले से ही नाराज थे, ऊपर से उनके शत्रुओं ने भी कान भरने शुरू किये, जिसका परिणाम हुआ मानगढ़ हत्याकाण्ड। 17 नवम्बर, 1913 ई. को आयोजित राष्ट्रभक्तों के विशाल सम्मेलन में कर्नल शटल के एक आदेश पर लाखों वनबन्धुओं पर अन्धाधुन्ध गोलीबारी की, जिसके कारण 1,500 वनवासी मौत के घाट उतर गये। यह हत्याकाण्ड जलियाँवाला बाग से भी भयंकर था। यह बलिदान आज भी वनवासियों के गीतों और कथाओं से रचा-बसा है। इस पहाड़ पर चढ़ते समय आज भी रोमांच उत्पन्न हो जाता है।

प्रश्न 10.
पीड़ित समाज को सुधारने का बीड़ा उठाया गोविन्द ने।’ गोविन्द ने क्या सुधार किये?
उत्तर:
पूज्य गोविन्द गुरु के जीवन में दुनिया को देखकर एक निर्णायक मोड़ आया। उन्होंने समाज सुधारने का संकल्प किया। लाखों वनवासी बन्धु अशिक्षा, बेकारी, भूख, अकाल, बीमारियों, व्यसनों तथा अन्धविश्वासों के साथ-साथ सामन्ती और अंग्रेजी सरकार के अत्याचारों को सह रहे थे। उन्होंने ‘सम्पसभा’ नामक सामाजिक संगठन की स्थापना की। गोविन्द गुरु ने स्वच्छता, भजन-सत्संग, बच्चों की शिक्षा, मेहनत करना, चोरी न करना, मद्य-माँस सेवन नहीं करना, आपसी विवाद न करना, बेगार नहीं करना और विदेशी का बहिष्कार तथा स्वधर्म में दृढ़ रहने आदि के भाव स्थापित किए।

प्रश्न 11.
महाराजा सूरजमल की वीरता का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महाराजा सूरजमल तलवार के धनी थे, कुशल योद्धा थे। यवनों की सत्ता को सर्वदा के लिए समाप्त करने में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन् 1731 में सूरजमल ने मेवात के दावर जंग को धूल चटा दी। नवम्बर 1745 में उन्होंने अलीगढ़ के नवाब और मुगल बादशाह से युद्ध किया। दोनों सूरजमल की सहायता पाने के लिए उत्सुक थे। सन् 1750 में दिल्ली के बादशाह के मीर बख्शी सलावत खाँ ने सूरजमल पर आक्रमण कर दिया। नारनौल के पास रात के अन्धेरे में सलावत खाँ की छावनी पर सिंह झपट्टा मारकर सूरजमल ने उसे आत्मसमर्पण करने को मजबूर कर दिया। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि सूरजमल कुशल योद्धा थे और युद्ध प्रवीण थे।

प्रश्न.12.
दिल्ली से मुगलों को हटाने के लिए सूरजमल ने क्या किया?
उत्तर:
सूरजमल तुर्की के कट्टर विरोधी थे। दिल्ली से मुगलों को पूरी तरह हटाने का जिम्मा जब सूरजमल पर आया तो पहले उन्होंने आगरा से मुगले सत्ता समाप्त कर किले पर अधिकार कर लिया। कुछ ही समय में उन्होंने दक्षिण में चम्बल के क्षेत्र पर विजय पताका फहराई । पूर्व दिशा में हरियाणा का पूरा क्षेत्र भी उनके अधिकार में आ चुका था। उन्होंने अलीगढ़, हापुड़ तथा गढ़ मुक्तेश्वर तक अपने प्रभाव का विस्तार कर लिया था। आगरा से मुगल आक्रमणकारियों के सभी निशान मिटा दिये। पेशवा के असामयिक निधन के बाद सूरजमल ने दिल्ली को मुगलों से पूरी तरह मुक्त करने का निश्चय किया। उन्होंने तीन तरफ से दिल्ली को घेर कर गोलीबारी शुरू कर दी। रुहेले भरतपुर के वीरों की मार से पीछे हटते जा रहे थे। हिण्डन नदी के नाले को पार करते समय छिपे रुहेलों ने आक्रमण कर दिया जिससे सूरजमल को प्राणघातक चोट लगी। इसी करण उनका निधन हो गया।

RBSE Class 12 Hindi पीयूष प्रवाह Chapter 6 राजस्थान के गौरव निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न. 1.
खेजड़ली गाँव की घटना का वर्णन अपने शब्दों में दीजिए।
उत्तर:
प्रकृति की रक्षा हेतु खेजड़ली गाँव के निवासियों का बलिदान अत्यन्त प्रेरक और अद्वितीय है। सन् 1730 में जोधपुर के महाराजा ने अपने सैनिकों को राजकार्य हेतु वृक्ष काट कर लाने के लिए कहा। खेजड़ली गाँव में खेजड़ी के वृक्षों की अधिकता थी, इसलिए सैनिकों ने इसी गाँव में जाकर वृक्ष काटने का निर्णय लिया। सैनिक गाँव में जा पहुँचे। इमरती देवी को जब सैनिकों की मंशा का पता लगा तो वह खेत पर पहुँची और सैनिकों को खेजड़ी के वृक्ष न काटने के लिए समझाने लगीं। गाँव के लोग भी आ गये। सैनिक राज-मद में थे इसलिए नहीं माने और वृक्ष काटने लगे। इमरती देवी ने उन्हें ललकारा और कहा हमारे जीते जी तुम पेड़ नहीं काट सकते और गाँव के लोगों को प्रेरणा दी-‘सर साँटे हँख रहे तो भी सस्तो जाण ।” गाँव के स्त्री-पुरुष एक-एक वृक्ष के सामने खड़े हो गये। इमरती देवी उनकी तीनों पुत्रियों और पति ने खेजड़ी वृक्ष की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया। फिर गाँव वाले भी पीछे नहीं रहे। एक के बाद एक वृक्ष के रक्षार्थ कटने लगे। उस दिन खेजड़ली गाँव में लगभग 383 लोगों का बलिदान हुआ। ये सभी बलिदानी जम्भेश्वर के अनुयायी थे। आज भी उनकी स्मृति में मेला लगता है। बिश्नोइयों के गाँव में आज भी वृक्ष नहीं कटते, हिरण नहीं मारे जाते । मेले में जो लोग आते हैं वे उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं और प्रकृति तथा पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेते हैं।

प्रश्न 2.
बाबा रामदेव का परिचय देते हुए उनके कृतित्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
पोकरण नगर के समीप आज से लगभग 653 वर्ष पूर्व विक्रम संवत 1409 में भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को रूणीचा के हँवर वंशीय ठाकुर अजमल जी और माता मैणादे के घर बाबा रामदेव का जन्म हुआ। शैशवावस्था में ही कहावत-‘पूत रा पग पालणे दीखे चरितार्थ हो गई, जब उन्होंने उफनते दूध को नीचे रख माँ को चमत्कार दिखाया। बड़े होने पर गुरु बालकनाथ से शिक्षा ग्रहण की। इतिहास, धर्म, दर्शन के साथ शस्त्र-शास्त्र की शिक्षा प्राप्त की। भैरव तांत्रिक को मारकर सम्पूर्ण क्षेत्र को उसके आतंक से मुक्त कराया। रामदेव ने परिस्थिति के अनुसार अपने जीवन में परिवर्तन किया और लोक कल्याण में ही अपना जीवन खपाने का संकल्प लिया। उन्होंने दलितों से सम्पर्क बढ़ाया। ‘जम्मा-जागरण’ आन्दोलन के माध्यम से उन्हें जागृत कर अच्छाइयों की ओर प्रवृत्त किया। पिछड़े वर्ग के प्रति रामदेव जी को अन्त:करण करुणा और परोपकार से ओत-प्रोत था। मेघवाल जाति की कन्या डालीबाई को अपनी धर्म बहन बनाया। बस्ती में हैजा फैल जाने पर वे उसकी सेवा-चिकित्सा हेतु दौड़ पड़े।

रामदेव जी सिद्ध योगी और विद्या में पारंगत थे। विकलांगता जैसी बीमारियों में लोगों की चमत्कारिक सहायता की। कुष्ठ रोग, हैजा आदि में भी उनकी औषधि ने रामबाण का काम किया। लखी बनजारे की मिश्री को नमक बनाया, पाँच पीरों के कटोरे मक्का से पल भर में लाकर उनके सामने रख दिए, नेतलदे की पंगुता दूर करना, सारथिये को तथा अपनी बहन सुगना के पुत्र को जीवित करके उन्होंने अपने चमत्कार दिखाए। वास्तव में वे दलितों के मसीहा थे।

प्रश्न 3.
देव नारायण क्रान्तिकारी थे और आयुर्वेद तथा तंत्र शास्त्र के पंडित भी। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
देव नारायण बगड़ावत कुल के थे बगड़ावत नागवंशीय गुर्जर थे। सारा गुर्जर समाज उन्हें विष्णु का अवतार मानता है। आपने राज्य क्रान्ति कर अपने समय के अत्याचारी शासन का अन्त किया। वे आयुर्वेद और तंत्र शास्त्र में भी पारंगत थे। धार में स्थित महाकाली की आराधना के समय राजा जयसिंह की बीमार पुत्री पीपलदे को अपने आयुर्वेद के ज्ञान से रोग मुक्त कर दिया और फिर उसी से उनका विवाह हो गया।

वे अपने आयुर्वेद के ज्ञान तथा सिद्धियों से लोगों के कष्टों को दूर करने लगे जिससे उन्हें ख्याति मिली। उनकी महत्त्वपूर्ण देन यह भी है कि उन्होंने औषधि के रूप में गोबर और नीम का महत्त्व स्पष्ट किया । तुलसी की आँति नीम व गोबर को प्रतिदिन के व्यवहार में लाने का सफल प्रयास आपने किया। इसी कारण आज भी उनकी पूजा नीम की पत्तियों से होती है। नेतलदे की कुरूपता दूर करना, सारंग सेठ को पुनर्जीवित करना, सूखी नदी में पानी निकालना आदि उनके चमत्कारिक कार्य थे।

प्रश्न 4.
महाराज सूरजमल के जीवन पर प्रकाश डालते हुए उनकी वीरता का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यवनों की सत्ता को देश से समाप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महाराजा सूरजमल राव राजा बदनसिंह और रानी देवकी के ज्येष्ठ पुत्र थे। आपका जन्म ननिहाल में माघ शुक्ल पक्ष दशमी, 13 फरवरी, सन् 1707 में हुआ था। ये जन्म से ही तेजस्वी थे। युवावस्था तक आते-आते वे सुदृढ़ शरीर वाले साहसी योद्धा हो गये। वे कूटनीति में भी निष्णात थे। 19 जून 1756 को वे भरतपुर के राजा बने । सन् 1731 में उन्होंने मेवात के दावर जंग को परास्त किया। नवम्बर 1745 में उन्होंने अलीगढ़ के नवाब और मुगल बादशाह से युद्ध किया। दोनों पक्ष सूरजमल की सहायता पाने के लिए इच्छुक थे। सन् 1750 में दिल्ली के बादशाह के मीर बख्शी सलावत खाँ ने सूरजमल पर आक्रमण कर दिया। नारनौल के पास अंधेरे में सलावत खाँ की छावनी पर सिंह झपट्टा मारकर उसे आत्मसमर्पण के लिए सूरजमल ने मजबूर कर दिया। दिल्ली से मुगलों को पूरी तरह हटाने की जिम्मेदारी जब महाराजा सूरजमल पर आई तो पहले उन्होंने आगरा से मुगल सत्ता समाप्त कर किले पर अधिकार कर लिया। कुछ ही समय में उन्होंने दक्षिण में चम्बल तक के क्षेत्र पर विजय प्राप्त की। पूर्व में हरियाणा का पूरा क्षेत्र भी उनके अधिकार में आ गया। अलीगढ़, हापुड़, गढ़ मुक्तेश्वर तक उनके प्रभाव का विस्तार हो गया। आगरा से मुगल आक्रमणकारियों के सभी निशान मिटाये। पेशवा के निधन के बाद महाराजा सूरजमल ने दिल्ली को मुगलों से पूरी तरह मुक्त करने का निश्चय किया। उन्होंने तीन तरफ से दिल्ली को घेरकर गोलाबारी शुरू कर दी। रुहेले भरतपुर के वीरों की मार से पीछे हटते चले गयें। वे हिण्डन नदी के नाले को पार करने लगे तभी छिपे रुहेले बंदूकधारियों ने उन पर आक्रमण कर दिया। महाराजा सूरजमल को आत्मघाती चोट लगी। कालान्तर में इसी चोट के कारण उनका निधन हो गया।

प्रश्न 5.
पूज्य गोविन्द गुरु ने किस आन्दोलन का नेतृत्व किया? उनका परिचय देते हुए उनके कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
पूज्य गोविन्द गुरु का डूंगरपुर जिले के बसियाँ गाँव में 20 दिसम्बर, 1858 ई. में एक बनजारा परिवार में जन्म हुआ था। उन्हें बचपन में गाँव के शिव मन्दिर के पुजारी से संस्कार मिले। परिवार की घुमन्तू जीवन शैली ने दुनिया देखने का अवसर दिया इससे जीवन में निर्णायक मोड़ आया।1880 में स्वामी दयानन्द सरस्वती के साथ तीन महीने रहने से जीवन में परिवर्तन आया। पूज्य गोविन्द गुरु ने विराट स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्व किया। आपके नेतृत्व में मानगढ़ के विशाल पहाड़ के सघन वनांचल में वनवासी बन्धुओं ने एक व्यापक स्वाधीनता आन्दोलन का संचालन किया। यह अभियान इतना प्रभावी था कि इससे अंग्रेज सरकार भी घबरा उठी। इसे कुचलने के लिए 17 नवम्बर 1913 ई. को आयोजित राष्ट्रभक्तों के विराट सम्मेलन में अंग्रेजों ने लाखों वन बन्धुओं पर अंधाधुन्ध गोलीबारी करके 1500 वनवासियों को मौत के घाट उतार दिया। यह हत्याकाण्ड जलियाँवाला बाग से भी भीषण था लाखों वनवासी बन्धु अशिक्षा, भूख, अकाल, बीमारियों, व्यसनों तथा अंधविश्वासों के साथ-साथ सामन्ती और अंग्रेजी सरकार के अत्याचारों को सह रहे थे। ऐसे पीड़ित समाज को सुधारने का बीड़ा गोविन्द गुरु ने उठाया। ‘सम्पसभा’ नामक सामाजिक संगठन की स्थापना से गाँव में हवन कुंडों की स्थापना का कार्य प्रारम्भ हुआ। पूज्य गोविन्द गुरु ने स्वच्छता, भजन-सत्संग, बच्चों की शिक्षा, मेहनत करना, चोरी न करना, मद्य-मांस सेवन न करना, आपसी विवाद न करना, बेगार ने करना और विदेशी का बहिष्कार तथा स्वधर्म में दृढ़ रहने आदि के भाव स्थापित किए। समाज सुधार का कार्य किया जिससे लाखों लोग उनके अनुयायी बन गये।

राजस्थ (जीवन चरित्र) पाठ-परिचय

राजस्थान रणबांकुरों की भूमि है, जहाँ साहसी और तेजस्वी योद्धा पैदा हुए हैं। इन रणबांकुरों से शत्रु भी भय खाते थे। यहाँ ऐसे वीर पैदा हुए हैं, जो सिर कटने पर भी लड़ते रहे हैं। यहाँ वीरों के साथ त्यागी-तपस्वी और भक्त भी जन्मे हैं। इस वीर प्रसूता भूमि पर शास्त्र और शस्त्र दोनों में निष्णात महापुरुष पैदा हुए हैं। ये तलवार के धनी और सिद्ध थे। इन सिद्धों और वीरों ने अपनी सिद्धियों और शूरता का उपयोग अन्याय के विरुद्ध, लोक जागरण तथा समाज समता के लिए किया। इसलिए उन्हें आज भी याद किया जाता है। उनकी समाधियों पर मेले लगते हैं।

इन समाधियों पर आने वाले व्यक्तियों का सामान्य जन स्वागत करते हैं, सेवा करते हैं। वे सेवा करने को अपना सौभाग्य समझते हैं। यदि आगन्तुक अपनी सेवा नहीं कराना चाहते, तो वे उनको रोकने सप्रेम कोशिश करते हैं। वे उनको रोकने के अनेक प्रयत्न करते हैं। यात्रियों की सेवा करने के ऐसे दृश्य हर वर्ष देखने को मिलते हैं। हमें ऐसे नर पुंगवों के कर्तव्य का अनुकरण करें, समाज में समरसता का संचार करें और लोक सेवा में अपना जीवन लगायें।

राजस्थ (जीवन चरित्र) पाठ सारांश

देव नारायण जी देव नारायण जी बगड़ावत कुल के थे और बगड़ावत नागवंशीय गुर्जर थे। सारा गुर्जर समाज देव नारायण जी को विष्णु का अवतार मानता है। आपने राज्य क्रान्ति की और अत्याचारी शासन का अन्त किया। इनके जन्म-समय में मतभेद है। फिर भी 4142 वि. सं. 1097 की माघ शुक्ल सप्तमी को इनका जन्म हुआ ऐसा माना जाता है। चौहान राजा ने बगड़ावतों को गोठा की जागीर दी। यह भीलवाड़ा जिले के आसीन्द से अजमेर जिले के मसूदा तक खारी नदी के आस-पास का क्षेत्र माना जाता है। इनका देवास में लालन-पालन हुआ, क्योंकि राणा दुर्जनसाल के अत्याचार के कारण माता सोढ़ी उन्हें वहाँ ले गई थीं। बचपन में घुड़सवारी और शस्त्र संचालन सीखा और क्षिप्रा के किनारे सिद्ध-वट में साधना करने लगे। गुरुओं ने उन्हें आयुर्वेद के साथ तंत्र-विद्या भी सिखाई। इससे वे कुशल योद्धा और तंत्र शास्त्र के पंडित हो गये।

बगड़ावतों का अनन्य मित्र छोटू भाट उन्हें गोठा ले गया। देव नारायण जी, छोटू भाट, माता सोढ़ी अंगरक्षकों के साथ देवास से चल दिये। धार में महाकाली की आराधना के समय राजा जयसिंह की बीमार पुत्री पीपलदे को देव नारायण जी ने भला-चंगा कर दिया। वहीं उससे उनका विवाह हो गया। आयुर्वेद के ज्ञान से लोगों का भला किया। गोठा में अमन-चैन कायम किया और लोगों को ढाँढस बँधाया। पड़ोसी राज्य के राणा के अत्याचार चल रहे थे, लेकिन क्रान्ति कर सुशासन स्थापित किया। इन्होंने गोबर और नीम का महत्व स्थापित किया।

बाबा रामदेव:

बाबा रामदेव का जन्म पोकरण के समीप लंगभग 653 वर्ष पूर्व विक्रम संवत् 1409 में भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को रूणीचा के तँवर वंशीय ठाकुर अजमल जी व माता मैणादे के घर हुआ। पूत के पाँव पालने में ही दिखाई देते हैं, यह उक्ति उनके प्रति चरितार्थ होती है। आपने अपनी माँ को चमत्कार दिखाया। कुछ बड़े होने पर गुरु बालकनाथ से शिक्षा लेना आरम्भ किया। इतिहास, धर्म, दर्शन के साथ शस्त्र और शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण की। किशोरावस्था में साथलमेर में भैरव तांत्रिक को मारकर सम्पूर्ण क्षेत्र को उसके आतंक से मुक्त किया।

अपने जीवन को लोक-कल्याण में खपाने का निश्चय किया। राजपूत होकर भी दलितों से सम्पर्क बढ़ाया तथा ‘जम्मा-जागरण’ आन्दोलन के माध्यम से दलितों को जागृत कर अच्छाइयों की ओर प्रवृत्त किया। जम्मा-जागरण’ का यह पुनीत कार्य मेघवाल जाति के

द्वारा ही किया जाता था। पिछड़े वर्ग के प्रति उनका अन्त:करण करुणा और परोपकार से ओत-प्रोत था। मेघवाल जाति की कन्या डाला बाई को अपनी धर्म बहिन बनाया और बस्ती में हैजा फैलने पर उनकी सेवा-चिकित्सा के लिए दौड़ पड़े।

रामदेव सिद्ध योगी थे और वैद्यकीय चिकित्सा में पारंगत थे। विकलांगता, कुष्ठ रोग और हैजे में उनकी चिकित्सा रामबाण थी। 33 वर्ष की आयु में उनकी जीवन लीला सिमट गई। उनकी समाधि पर प्रतिवर्ष विशाल मेला लगता है।

सन्त जम्भेश्वर हमारे देश की मूल आत्मा प्रकृति प्रधान है। सन्त जम्भेश्वर जी इसी आत्मा के तत्वान्वेषी और सशक्त उद्बोधक थे। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन आपका जन्म हुआ था। आप जाम्भोजी के नाम से प्रसिद्ध थे। नागौर जिले के पीपासर गाँव में आपका जन्म हुआ था। आप विनयशील थे। माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् आपने सारी सम्पत्ति दान कर दी और सामाजिक उत्थान में लग गये।

समरा थल धोरा में आपने अपना मुकाम बनाया और यहीं आपको दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ। धर्म स्थापना और प्रकृति से सहजीवन के उद्देश्य को ध्यान में रखकर आपने उनतीस नियम बनाये। इन्हें मानने वाले बिश्नोई कहलाये। आपने कट्टरता का विरोध किया। आपने सिकन्दर लोदी को गौ हत्या न करने के लिए राजी कर लिया। कई विधर्मी आपके शिष्य बन गये। विराट व्यक्तित्व के कारण आप लोकमन के देव बन गये। बीकानेर के लालसर गाँव में आपने समाधि ली।

जम्भेश्वर जी के बाद उनके अनुयायियों ने उनका अनुसरण कर बलिदान दिया। प्रकृति की रक्षा के लिए उनका दिया बलिदान अत्यन्त प्रेरक और अद्वितीय है। जोधपुर का खेजड़ली गाँव इस बलिदान के लिए प्रसिद्ध है। जोधपुर महाराजा ने अपने सैनिकों को वृक्ष काटने के लिए कहा। सैनिकों ने खेजड़ली गाँव को चुना और वे खेजड़ी वृक्ष काटने लगे। इमरती देवी ने विरोध किया। उसने और उसकी बेटियों ने इसके विरोध में अपना बलिदान दिया। फिर तो सारे गाँव के लोग तैयार हो गये। गाँव में 363 लोगों का बलिदान हुआ। आज भी उनकी स्मृति में मेला लगता है। हजारों लोग यहाँ आते हैं और प्रकृति तथा पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेते हैं। बिश्नोइयों के गाँव में वृक्ष आज भी नहीं काटे जाते और हिरण नहीं मारे जाते।

पूज्य गोविन्द गुरु राजस्थान के दक्षिण में गुजरात और मध्य प्रदेश की सीमा पर बलिदान का साक्षी मानगढ़ का विशाल पहाड़ है। लगभग एक शताब्दी पूर्व सघन वनांचल में वनवासी बन्धुओं ने एक स्वाधीनता आन्दोलन का संचालन किया था। इस अभियान से अंग्रेज सरकार भी काँप गई। 17 नवम्बर, 1913 ई. को आयोजित राष्ट्र भक्तों के विराट सम्मेलन में अंग्रेजों ने लाखों वन बन्धुओं पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलाईं, जिसमें 1,500 वनवासियों की मौत हो गई, जो जलियाँवाला बाग से भी भयंकर था। आज भी वह स्थल वनवासियों के गीतों तथा कथाओं में रचा-बसा है। ऐसे विराट स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले महापुरुष पूज्य गोविन्द गुरु थे।

डूंगरपुर जिले के बासिया गाँव में 20 दिसम्बर, 1858 ई.को एक बनजारा परिवार में आपका जन्म हुआ। गाँव के शिव मन्दिर के पुजारी से आपको संस्कार मिले। परिवार की घुमन्तू जीवन शैली से आपको दुनिया देखने का अवसर दिया। 1880 में स्वामी दयानन्द सरस्वती के साथ रहने से जीवन में नया मोड़ आया। लाखों वनवासी बन्धु अशिक्षा, बेकारी, भूख, अकाल, बीमारियों, व्यसनों तथा अन्धविश्वासों से घिरे थे और सामन्ती व्यवस्था तथा अंग्रेजी सरकार के अत्याचार सह रहे थे। आपने ऐसे परिवारों को सुधारने का बीड़ा उठाया। ‘सम्पसभा’ नामक सामाजिक संगठन की स्थापना के साथ गाँव में सघन कुण्डों की स्थापना का कार्य आरम्भ हुआ। आपने स्वच्छता, भजन-सत्संग, बच्चों की शिक्षा, मेहनत करना, चोरी न करना, मद्य-मांस सेवन न करना, आपसी विवाद न करना, बेगार न करना, विदेशी बहिष्कार और स्वधर्म पर दृढ़ रहने के निर्देश दिये। समाज-सुधार के कारण वे गोविन्द गुरु हो गये।

सन् 1903 में प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर ‘सम्पसभा’ का वार्षिक सम्मेलन मानगढ़ के विशाल पहाड़ पर होने लगा। स्थानीय सामन्त और जागीरदार उनसे पहले से ही नाराज थे, जिसका परिणाम हुआ सन् 1913 का मानगढ़ हत्याकाण्ड। कर्नल शटल ने भक्तों पर गोलियाँ चलवाईं परिणामस्वरूप 1,500 से अधिक की मौत हो गई। गुरु के पाँव में गोली लगी और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें पहले फाँसी की सजा सुनाई गई फिर काला पानी और अन्त में उनकी सजा आजीवन कारावास में बदल दी गई। विश्व युद्ध में अंग्रेजों की विजय के बाद श्रेष्ठ आचरण के कारण उन्हें सशर्त मुक्त कर दिया गया। 30 अक्टूबर, 1931 को कम्बोई में उन्होंने अन्तिम साँस ली। मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर हजारों लोग उस पहाड़ पर आते हैं।

महाराजा सूरजमल महाराजा सूरजमल ने यवनों की सत्ता समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 13 फरवरी सन् 1907 में ननिहाल कामर में आपका जन्म हुआ। आप राव राजा बदनसिंह और रानी देवकी के पुत्र थे। सूरजमल जन्म से ही तेजस्वी थे। युवावस्था में वे साहसी योद्धा हो गये। वे कूटनीति में भी निष्णात थे। बदनसिंह के बड़े पुत्र थे और गुणी थे। अतः इन्हें ही युवराज बनाया गया। सन् 1731 में मेवात के दावर जंग को पराजित किया। नवम्बर 1745 में उन्होंने अलीगढ़ के नवाब और मुगल बादशाह से युद्ध किया। सन् 1750 में दिल्ली के बादशाह के मीर बख्शी सलावत खाँ ने उन पर आक्रमण किया। सूरजमल ने नारनौल के पास रात में सिंह झपट्टा मार कर उसे आत्म-समर्पण के लिए मजबूर कर दिया।

इन्होंने सन्धि करने के लिए कई शर्ते रखीं, जिनमें दो मुख्य र्थी

  1. मुगल सेना पीपल के पेड़ नहीं काटेगी।
  2. मन्दिरों का अपमान न किया जाय और देवालयों को क्षति न पहुँचायी जाए।

9 जून, 1756 को सूरजमल भरतपुर के राजा बने। अहमद शाह अब्दाली ने सूरजमल को दबाने का प्रयत्न किया। सूरजमल ने अब्दाली को पत्र लिखा, जिसमें उसे चुनौती दी। शिवाजी की तरह तुर्कों को परास्त करने वाला दूसरा राजा सूरजमल हुआ, जिसने उन्हीं के हथियार से उन्हें मात दी। आगरा की मुगल सत्ता को मात दी और किले पर अधिकार किया। चम्बल के क्षेत्र पर अधिकार किया। हरियाणा, अलीगढ़, हापुड़, गढ़ मुक्तेश्वर तक अपना प्रभाव जमाया। आगरा को यवनों के दुष्प्रभाव से मुक्त कराया। सूरजमल ने दिल्ली को घेर लिया और आगे बढ़ते रहे। हिण्डन नदी के नाले को पार करते समय रुहेलों ने आक्रमण कर दिया। सूरजमल को प्राणघातक चोट लगी। 25 दिसम्बर, 1763 ई. को उनका निधन हो गया।

शब्दार्थ-
(पृष्ठ 44) रौद्र = प्रचंड, क्रोधपूर्ण। पराक्रमियों = वीरों। वीर प्रसूता = वीरों को जन्म देने वाली। जुझारों = वीरों। तेजस्वी = कीर्तिमान, प्रभावशाली। रणबांकुरों = योद्धओं।

(पृष्ठ 50) निष्णात = पारंगत। प्रतिकार = प्रतिशोध, बदला। जातरू = यात्री, मनौती = मनुहार। आयोजन = प्रबन्ध, तैयारी। नर पुंगव = नर श्रेष्ठ। पलक पाँवड़े बिछाना = स्वागत को तैयार रहना। अल्पाहार = नाश्ता। सेवारू = सेवा करने वाले।

(पृष्ठ 45) अविस्मरणीय = जिसे भूला न जा सके। दृष्टिगोचर = दिखाई देना, प्रदत्त = दिया हुआ। पण्डित = विद्वान। लक्ष्य = उद्देश्य। अंगरक्षक = सुरक्षा के लिए रखा गया भृत्य। आराधना = पूजा, सेवा, प्रार्थना। साक्षात् = प्रत्यक्ष। पुनर्जीवित = पुनः दोबारा जीवित करना। कुशासन = बुरा शासन। परास्त = पराजित। आतंक = अत्याचार।

(पृष्ठ 46) संकल्प = किसी कार्य को करने का निश्चय या इरादा। जाग्रत कर = जगाकर, सचेत करके, पारंगत = निष्पात। पीड़ितों = रोगियों। दर्शनार्थ = दर्शन करने के लिए। चिन्तनशील = विचारवान, चिन्तन करने वाला। प्रवृत्ति = स्वभाव। उत्थान = विकास, उद्धार। मुकाम = रहने का स्थान, ठहरने का स्थान।

(पृष्ठ 47) निरन्तर = लगातार। सहज = स्वाभाविक, साक्षी = प्रमाण। आ धमके = आ गये। सत्तामद = राजमद। रक्षार्थ = रक्षा के लिए। स्मृति = याद। अर्पित = चढ़ाते हैं। स्पर्श = छूती। वनांचल = वन प्रान्त में, जंगल में। संचालन = नेतृत्व। रोमांच = रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

(पृष्ठ 48) घूमन्तू = घूमने वाले। बीड़ा उठाया = संकल्प किया, सेवन = ग्रहण, खाना। बहिष्कार = त्याग। धूल चटा दी = पराजित कर दिया।

(पृष्ठ 49) सशर्त = शर्त के साथ। मुक्त = आजाद। यवन = मुसलमान जाति, विधिवत = नियमानुसार। आत्मसमर्पण = हथियार डालना, गुलामी स्वीकार करना।। अवतरित = पैदा हुए। पताका = ध्वजा। दुष्प्रभाव = बुरा प्रभाव।