RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 5  पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 5 भूषन वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
‘भनत’ शब्द का अर्थ है –
(अ) कविता
(ब) कहना
(स) सजना
(द) खनकना
उत्तर:
(ब)

प्रश्न 2.
कवि किसकी भुजाओं पर धरती का भार मानता है –
(अ) कछुए की
(ब) शेषनाग की
(स) शिवाजी की
(द) औरंगजेब की
उत्तर:
(स)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 5 भूषन अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भूषण के संकलित छंदों में कौन-सा रस और कौन-सा गुण है?
उत्तर:
भूषण के संकलित छंदों में वीर रस है तथा ओज गुण है।

प्रश्न 2.
कवि भूषण की दो रचनाओं के नाम बताइए।
उत्तर:
कवि भूषण की दो रचनाएँ-शिवराज भूषण’ तथा ‘छत्रसाल दशक’ है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 5 भूषन लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भूषण ने अँधेरे पर किसका अधिकार बताया है?
उत्तर:
कवि भूषण ने अंधकार पर सूर्य के प्रकाश का अधिकार बताया है। चौथे छंद में कवि ने कहा है ‘तेज तम अंस पर’ तथा पाँचवे छंद में भी भूषण कहते हैं “भूषन अखंड नवखंड महिमंडल में, तम पर दावा रविकिरन समाज कौ।” सूर्य के उदय होते ही संपूर्ण पृथ्वी से अंधकार समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 2.
सहस्रबाहु पर किसने विजय प्राप्त की थी?
उत्तर:
पुराणों में वर्णन आता है कि परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि, बड़े तपस्वी और अतिथियों के सम्मानकर्ता थे। एक बार प्रतापी राजा सहस्त्रबाहु उनके आश्रम पर आए। उनके साथ उनकी सेना भी थी। ऋषि जमदग्नि के पास एक दैवी गाय थी। उसके प्रभाव से ऋषि ने राजा का यथायोग्य आदर किया। राजा गाय के प्रभाव को देख ललचा गया उसने ऋषि से वह गाय माँगी। ऋषि के मना करने पर वह बलपूर्वक गाय को ले गया। इससे क्रोधित होकर परशुराम ने उसका युद्ध में संहार कर दिया।

प्रश्न 3.
वितुण्ड पर किसका अधिकार होता है?
उत्तर:
सिंह को मृगराज अर्थात् सारे पशुओं का राजा कहा जाता है। उसके पराक्रम के सामने किसी भी पशु का टिक पाना सम्भव नहीं होती। वितुण्डे (हाथी) लम्बी सँड वोला, विशालकाय और बलशाली पशु है परन्तु सिंह जब उस पर आक्रमण करता है तो वह भी उसका सामना नहीं कर पाती। इसलिए कवि भूषण ने उस पर सिंह का दावा बताया है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 5 भूषन निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पठित अंश के आधार पर सिद्ध कीजिए कि भूषण वीररस के कवि थे।
उत्तर:
यह सर्वविदित है कि रीतिकाल के श्रृंगारमेय वातावरण में कवि भूषण ने लीक से हट कर वीररस का शंखनाद किया था। उन्होंने महाराज शिवाजी और छत्रसाल को अपने काव्य का नायक बना कर उनकी वीरता, धाक और रणकौशल का वर्णन किया है।

महाराज शिवाजी अपनी चतुरंगिणी सेना सजाकर उत्साह में भरे शत्रुओं पर विजय पाने जा रहे हैं। स्पष्ट है कि उत्साह वीररस का स्थायीभाव है और शिवाजी उस समय वीररस में ओतप्रोत हैं। नगाड़ों की ध्वनि ‘उद्दीपन’ बनकर उनके उत्साह को बढ़ा रही है। छंद पाठकों के मन में भी वीररस का संचार कर रहा है।

एक और दृश्य देखिए। वीर शिवा अहंकारी औरंगजेब के दरबार में उपस्थित है। शिवाजी को नीचा दिखाने के लिए उन्हें छह हमारी मनसबदारों जैसे छोटे पद वालों के साथ स्थान दिया गया है। कवि यहाँ पर भी शिवाजी के वीर स्वभाव का परिचय कराता है। क्रोध रौद्र रस का स्थायीभाव है। और वीर को अनुचित और स्वाभिमान पर आघात करने वाले आचरण पर क्रोध आना स्वाभाविक है। निर्भीक, स्वाभिमानी और वीरपुरुष भरे दरबार में औरंगजेब को चुनौती देते हैं।

इसी प्रकार अन्य संभावित छंदों में भी हम महाराज शिवाजी की वीरता और शत्रुओं पर उनकी धाक का प्रमाण देखते हैं। ‘तेरी करबाल धरै म्लेच्छन को काल’, म्लेच्छवंस पर सेर शिवराज है” तथा जहाँ पातसाही वहाँ दावा सिवराज कौ” जैसे कथन शिवाजी महाराज वीरता का प्रमाण दे रहे हैं।

अत: संकलित छंदों से स्वत: सिद्ध हो रहा है कि भूषण वीर रस के कवि थे।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 5 भूषन व्याख्यात्मक प्रश्न

सप्रसंग व्याख्या कीजिए –
1, तेरी हीं भुजानि…………बदनाम धरातल है।
2. इन्द्र जिमि जंभ………….सिवराज है।
(संकेत-छात्र सप्रसंग व्याख्याओं में इन छंदों की व्याख्याओं (पद्यांश 3 व 4) का अवलोकन करके, स्वयं व्याख्याएँ करें।)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 5 भूषन अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 5 भूषन वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. धूल की अधिकता से सूर्य लगता है।

(क) चन्द्रमा के समाने
(ख) तारे के समान
(ग) दीपक के समान
(घ) हीरे के समान

2. शिवाजी का क्रोध से लाल मुख देखकर औरंगजेब का मुख हो गया –

(क) पीला
(ख) लाल
(ग) काला
(घ) हरा

3. शिवाजी का अवतार हुआ है –

(क) दुष्टों के विनाश के लिए
(ख) राज्य विस्तार के लिए।
(ग) जगत् के भरण-पोषण के लिए
(घ) देश की स्वतंत्रता के लिए

4. बादलों पर प्रभुत्व है –

(क) इंद्र को
(ख) सूर्य का
(ग) समुद्र का
(घ) वायु का

5. भूषण ने शिवाजी का दावा बताया है –

(क) महाराष्ट्र पर
(ख) दिल्ली पर
(ग) सारे भारत पर
(घ) औरंगजेब के सारे राज्य पर

उत्तर:

  1. (ख)
  2. (ग)
  3. (ग)
  4. (घ)
  5. (घ)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 5 भूषन अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
चतुरंगिणी सेना सजाकर शिवाजी कहाँ जा रहे हैं?
उत्तर:
शिवाजी युद्ध में विजय पाने जा रहे हैं।

प्रश्न 2.
हाथियों के मद से क्या हो रहा है?
उत्तर:
हाथियों के मद के टपकने से नदी और नद बह रहे हैं।

प्रश्न 3.
शिवाजी की सेना के चलने से समुद्र पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
उत्तर:
सेना के चलने से समुद्र थाल पर रखे पारे के समान हिल रहा है।

प्रश्न 4.
शिवाजी औरंगजेब के दरबार में कहाँ खड़े होने योग्य थे?
उत्तर:
शिवाजी सबसे ऊपर खड़े होने योग्य थे।

प्रश्न 5.
औरंगजेब के अपमान पूर्ण व्यवहार से शिवाजी पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
औरंगजेब के अपमान पूर्ण व्यवहार से शिवाजी को क्रोध आ गया। उन्होंने औरंगजेब को सलाम भी नहीं किया।

प्रश्न 6.
शिवाजी के क्रोध से लाल मुख को देखकर औरंगजेब तथा सिपाहियों का क्या हाल हुआ?
उत्तर:
शिवाजी का क्रोध से लाल मुख देख औरंगजेब का मुख काला और सिपाहियों के मुँह पीले पड़ गए।

प्रश्न 7.
कवि भूषण भूमि पर भार उठाने के विषय में क्या कहते हैं?
उत्तर:
भूषण कहते हैं कि पुराणों में धरती का भार उठाने वाले शेषनाग, दिग्गज और हिमालय कहे गए हैं, किन्तु वास्तव में शिवाजी की भुजाओं पर ही धरती का भार टिका है।

प्रश्न 8.
भूषण ने संसार के भरण-पोषण में किसका दखल नहीं माना है?
उत्तर:
भूषण ने संसार का भरण-पोषण करने में ईश्वर की कोई भूमिका नहीं मानी है। वह शिवाजी को ही संसार का पोषण कर्ता और भर्ता मानते हैं।

प्रश्न 9.
काल को कवि भूषण ने किस काम के लिए व्यर्थ ही बदनाम बताया है?
उत्तर:
कवि भूषण ने दुष्टों का अंत करने वाला शिवाजी को मानते हुए मृत्यु के लिए काल को व्यर्थ ही बदनाम माना है।

प्रश्न 10.
कवि भूषण ने जल पर किसका सदा ही प्रभुत्व माना है?
उत्तर:
कवि भूषण बड़वाग्नि को जल पर सदा प्रभुत्व बनाए रखने वाला मानते हैं।

प्रश्न 11.
भगवान शिव को कवि ने रति के पति कामदेव पर प्रभुत्व रखने वाला क्यों बताया है?
उत्तर:
कामदेव ने देवताओं के कहने पर शिवजी की समाधि को भंग किया था। तब शिवजी ने रुष्ट होकर कामदेव को भस्म कर दिया था। इंसी कारण शिव को कामदेव पर भारी माना है।

प्रश्न 12.
‘दावा दुम दंड पर’ कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ईस कथन को आशय है कि वनों में लग जाने वाली आग का वृक्षों पर प्रभुत्व है। वृक्ष उससे नहीं बच सकते

प्रश्न 13.
कवि भूषण ने म्लेच्छवंश पर किसे ‘शेर’ बताया है?
उत्तर:
कवि भूषण ने शिवाजी को म्लेच्छवंश पर आधिपत्य रखने वाला शेर माना है।

प्रश्न 14.
गरुड़ का दावा कवि किस पर मानता है?
उत्तर:
कवि भूषण समस्त सर्पो पर गरुड़ का दावा मानते हैं।

प्रश्न 15.
कवि भूषण पर्वतों पर इन्द्र का दावा किस आधार पर मानते हैं?
उत्तर:
कभी पर्वत उड़ा करते थे। इन्द्र ने अपने वज्र के प्रहार से उनके पंख काट डाले और वे अचल हो गए। इसी कारण इन्द्र को पर्वतों पर दावा माना गया है।

प्रश्न 16.
भूषण के अनुसार सारे भूमण्डल के अंधकार पर किसका दावा है?
उत्तर:
सर्वत्र अंधकार पर सूर्य की किरणों का दावा है। उनके सामने अँधेरा टिक नहीं पाता।

प्रश्न 17.
समस्त भारत में पूर्व में पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण तक शिवाजी का दावा कहाँ-कहाँ है?
उत्तर:
भूषण के अनुसार जहाँ-जहाँ भी बादशाह औरंगजेब का शासन है, वहाँ-वहाँ वीर शिवाजी की तूती बोलती है।

प्रश्न 18.
कवि भूषण की कविता का प्रधान रस कौन-सा है?
उत्तर:
भूषण की कविता का प्रधान रस वीररस है।

प्रश्न 19.
भूषण की कविता के नायक कौन हैं?
उत्तर:
भूषण की कविता के नायक महाराज शिवाजी तथा छत्रसाल हैं।

प्रश्न 20.
भूषण ने शिवाजी को अपनी रचनाओं में किस रूप में प्रस्तुत किया है?
उत्तर:
भूषण ने शिवाजी को एक वीर पुरुष, अन्याय के विरोधी, अत्याचारियों को आतंकित करने वाले राष्ट्रीय नायक के रूप में प्रस्तुत किया है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 5 भूषन लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शिवाजी की सेना के प्रस्थान के दृश्यों का जो वर्णन भूषण ने किया है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
जब शिवाजी ने शत्रुओं पर विजय पाने के लिए चतुरंगिणी सेना के साथ प्रस्थान किया तो नगाड़ों के बजने का भारी शब्द होने लगा। हाथियों की कनपटियों से मद झरने लगा और उससे नदी-नद बहने लगे। सेना के चलने से चारों ओर खलबली मच गई और हाथियों की ठेल-पेल से पर्वत उखड़ने लगे। सेना के चलने से उड़ी धूल में, सूरज तारे जैसा टिमटिमाने लगा और समुद्र ऐसे हिलने लगा, जैसे किसी थाल पर रखा पारा, थाल के हिलने पर इधर-उधर ढुलकने लगता है।

प्रश्न 2.
सेना के प्रस्थान के दृश्य का वर्णन करते हुए, भूषण की भाषा-शैली में आप क्या विशेषताएँ देखते हैं? लिखिए।
उत्तर:
कवि भूषण ने अपने काव्य-नायक वीर शिवाजी की सेना के प्रस्थान के दृश्य का जीवंत किन्तु अतिश्योक्ति पूर्ण वर्णन किया है। चतुरंगिणी सेना में ‘रथ’ भी माने गए हैं किन्तु उस समय रथों का प्रयोग ही नहीं था। हाथियों की कनपटियों से टपकने वाले मद से नदी और नद बहा देना भी अत्युक्तिपूर्ण है। कवि ने विषय के अनुरूप ही भाषा-शैली का प्रयोग किया है। सटीक शब्दों का चयन, नाद-सौन्दर्य, ओजपूर्ण भाषा-शैली वर्णन की अन्य विशेषताएँ हैं। शिवाजी के उत्साह, वीरता और दबदबे को साकार करने में कवि सफल रहा है।

प्रश्न 3.
औरंगजेब के दरबार में शिवाजी के क्रोधित होने का क्या कारण था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
औरंगजेब द्वारा उचित सम्मान दिए जाने के आश्वासन पर शिवाजी औरंगजेब के दरबार में पहुँचे किन्तु वहाँ उनके साथ उपेक्षा और अपमानपूर्ण व्यवहार हुआ। उनको छः हेजारी मनसबदारों जैसे साधारण दरबारियों के पास खड़ा किया गया। वीर शिवाजी इस अपमान को सहन नहीं कर सके। उन्होंने न तो औरंगजेब को सलाम किया और न विनम्र शब्दों में अपना विरोध प्रकट किया।

प्रश्न 4.
शिवाजी के क्रोधित होने पर औरंगजेब तथा उसके सिपाहियों की क्या दशा हुई और क्यों? लिखिए।
उत्तर:
एक राजा होने के नाते शिवाजी को सबसे श्रेष्ठ दरबारियों के बीच स्थान मिलना चाहिए था किन्तु छह हजारियों के बीच स्थान मिलने पर उनका स्वाभिमान भड़क उठा। उन्होंने भरे दरबार में बादशाह को सलाम न करके उसको चुनौती दे डाली। उनको भड़कते हुए और क्रोध से उनके लाल मुख को देख, जहाँ सिपाही किसी भयंकर संकट का आगाज पाकर पीले पड़ गए, वहीं अपने सार्वजनिक अपमान से औरंगजेब का मुँह काला पड़ गया।

प्रश्न 5.
“तेरी ही भुजानि पर भूतल को भार” कवि भूषण के इस कथन में शिवाजी की प्रशंसा किस रूप में की गई है? छंद के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
कवि भूषण ने शिवाजी की प्रशंसा केवल आश्रयदाता के रूप में नहीं की है। वह उनको एक आदर्श शासक और राष्ट्रीय नायक मानते हैं। छंद में कवि ने शिवाजी को शेषनाग, दिशाओं को हाथियों और हिमालय से भी बढ़कर दिखाया है। वह मानते हैं कि वास्तव में शिवाजी ही धरती का भार अपनी बलशाली भुजाओं पर उठाए हुए हैं। शेषनाग, दिग्गज और हिमालय तो केवल कहने भर के धरतीधर हैं। उन्हीं को जगत का भरण-पोषण करने वाला बता रहे हैं।

प्रश्न 6.
कवि भूषण ने शिवाजी के जीने को ही सफल क्यों बताया है? अपना मत लिखिए।
उत्तर:
जिस व्यक्ति का जीवन अपने सुख, स्वार्थ और नाम पाने में बीतता है, उसे समाज में सम्मान नहीं मिलता। ऐसे लोग आते हैं और चले जाते हैं। जो अपना जीवन दूसरों के हित में लगाते हैं, उन्हीं का जीना धन्य माना जाता है। शिवाजी ऐसे ही शासक थे। वे अन्य राजाओं के समान भोग-विलास में डूबे शासक नहीं थे। अत्याचारी शासकों से जनता की रक्षा करना ही उनके जीवन का लक्ष्य था। इसी कारण कवि ने उनके जीवन को सफल बताया है।

प्रश्न 7.
भूषण ने शिवाजी के ‘म्लेच्छ वंश’ पर शिवाजी के प्रभुत्व की तुलना किन पौराणिक चीजों से की है? लिखिए।
उत्तर:
भूषण ने शिवाजी की तुलता इन्द्र से की है। इन्द्र ने शक्तिशाली और अत्याचारी जुंभ नामक असुर का वध किया था। भूषण शिवाजी को भगवान राम के तुल्य बताते हैं जिन्होंने राक्षसराज रावण पर विजय पायी थी। वह कामदेव को भस्म कर देने वाले भगवान शिव से भी शिवाजी की तुलना करते हैं। इसी क्रम में उन्होंने अहंकारी और निरंकुश राजा सहस्रबाहु का वध करने वाले परशुराम के समान ही शिवाजी को अहंकारी, निरंकुश और अत्याचारी मुगल शासकों का विनाशक बताया है।

प्रश्न 8.
“इन्द्रजिमि जंभ………………सिवराज है।” छंद की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
इस छंद की भाषा साहित्यिक ब्रजभाषा है। कवि ने विषय के अनुरूप शब्दों का चयन किया है। भाषा में नाद-सौंदर्य है। यथा “दावा द्रुमदण्ड पर, चीत मृग झुंड पर, भूषन वितुण्ड पर”। ओजपूर्ण, अतिशयोक्तिमयी शैली, वीररस को जगाने वाली है। छंद में अनुप्रास के साथ ही उपमाओं की लड़ी संजोई गई है। छंद जहाँ पाठकों में शिवाजी के प्रति सम्मान का भाव जगाता है, वहीं वीरता, पर रक्षा, अत्याचार-विरोध जैसे मानवीय गुणों को अपनाने की प्रेरणा भी देता है।

प्रश्न 9.
छंद “गरुड़ कौ दावा ………………दावा सिवराज कौ” में अलंकार और रस योजना पर अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
कवि भूषण अलंकार-प्रेमी कवि हैं। प्रस्तुत छंद में भी उनकी अलंकार-प्रियता का प्रमाण मिल रहा है। छंद में “अखंड, नवखंड, महिमंडल में अनुप्रास अलंकार है। प्रथम ‘नाग’ का अर्थ सर्प तथा द्वितीय ‘नाग’ शब्द का अर्थ हाथी होने से यमक अलंकार भी है। छंद में उदाहरण के साथ ही मालोपमा अलंकार भी है। कवि ने अनेक उदाहरण देते हुए पातसाही’ पर शिवराज का दावा सिद्ध किया है। साथ ही अनेक उपमानों को प्रस्तुत करते हुए शिवाजी की वीरता और प्रभुत्व से तुलना की है। छंद में वीररस की योजना है। शिवाजी के पराक्रम और दबदबे के वर्णन द्वारा, पाठकों के हृदयों में उत्साह का संचार किया गया है।

प्रश्न 10.
संकलित छंदों के आधार पर बताइए कि कवि भूषण की कविता में आपके लिए क्या संदेश निहित है?
उत्तर:
संकलित छंदों में कवि ने राष्ट्रीय नायक वीर शिवाजी के पराक्रम, शत्रुओं पर उनके आतंक और अत्याचारियों से जनता की सुरक्षा करने का वर्णन किया है। ये छंद हमें वीर, स्वाभिमानी, देशप्रेमी और अन्याय-विरोधी बनने की प्रेरणा देते हैं। शिवाजी महाराज का चरित्र आज भी युवाओं के लिए प्रासंगिक और अनुकरणीय बना हुआ है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 5 भूषन निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भूषण के छंदों का मुख्य विषय क्या है? संकलित छंदों के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
संकलित छंदों के आधार पर देखें तो भूषण के छंदों का मुख्य विषय शिवाजी महाराज की वीरता, निर्भीकता और शत्रुओं पर उनके आतंक का वर्णन करना है।

प्रथम छंद में कवि भूषण ने शिवाजी की विजय यात्रा का वर्णन किया है। सेना की विशालता और उसके प्रस्थान से शत्रुओं में मची खलबली का कवि ने बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया है।

दूसरे छंद में शिवाजी की निर्भीकता और स्वाभिमान के साथ शत्रुओं पर उनके क्रोध का प्रभाव दिखाया है। शिवाजी के भड़कने पर औरंगजेब का मुँह काला और सिपाहियों के मुँह भय से पीले पड़ जाते हैं।

तीसरे छंद में कवि ने शिवाजी को धरती का भार धारण करने वाला और ईश्वर के स्थान पर जगत् का भरण-पोषण करने वाला बताया है। कवि शिवाजी के जीवन को सफल बताता है।

चौथे और पाँचवे छंदों में कवि ने अत्याचारी शत्रु और शिवाजी के आतंक का आलंकारिक वर्णन किया है।

इस प्रकार संकलित छंदों का मुख्य विषय शिवाजी की प्रशंसा है। कवि ने उन्हें एक राष्ट्रीय वीर पुरुष, पराक्रमी योद्धा और आदर्श शासक दिखाया है।

प्रश्न 2.
“भूषण की वर्णन-शैली अतिशयोक्तिमय और आलंकारिक है। इस कथन को पाठ्यपुस्तक में संकलित भूषण के छंदों के आधार पर सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
भूषण रीतिकालीन कवि थे। अत: उनकी कविता पर तत्कालीन काव्य की परंपराओं का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन तथा अलंकारप्रियता का होना इसी प्रभाव का प्रमाण है।

शिवाजी की चतुरंगिणी सेना के प्रयास का वर्णन करते हुए कवि ने युद्ध से पहले ही शिवाजी को विजयी घोषित कर दिया है-“सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है” । हाथियों के मद से नदी-नद बह निकलना उनकी अनगिनती संख्या की ओर संकेत करता है। इसी प्रकार सारे संसार में खलबली मचना और सेना के चलने से समुद्र का हिलना अतिश्योक्ति का ही प्रमाण है। इसी प्रकार औरंगजेब के दरबार में शिवाजी को भड़कता
देख औरंगजेब के मुख का काला पड़ना और सिपाहियों के मुखों का पीला पड़ जाना भी बढ़ा-चढ़ा कर किया गया वर्णन है।

आगे कवि शिवाजी को धरा को धारण करने वाला और ‘करतार’ के समान संसार का भरण-पोषण करने बताता है।

चौथे और पाँचवे छन्दों में कवि ने शिवाजी के प्रभुत्व, आतंक और आधिपत्य की तुलना करने के लिए एक से एक बढ़कर उपमानों की झड़ी लगा दी है। शिवाजी को इन्द्र, रामचन्द्र, शिव और परशुराम के समान पराक्रमी बताया है।

इस प्रकार सिद्ध है कि भूषण के वर्णनों में अतिशयोक्ति तथा आलंकारिकता पूर्ण शैली की प्रधानता है।

प्रश्न 3.
संकलित छंदों के आधार पर शिवाजी महाराज की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
संकलित छंदों में शिवाजी के चरित्र के अनेक गुण प्रकाशित हुए हैं। कवि ने उन्हें कुशल सेनानायक, वीर योद्धा, स्वाभिमानी राजा, प्रजावत्सल शासक और शत्रुओं को अपने प्रताप से आतंकित करने वाले पराक्रमी पुरुष के रूप में प्रस्तुत किया है।

शिवाजी की विशाल और अनुशासित सेना है, जिसके प्रस्थान करते ही चारों ओर खलबली मच जाती है। वह शत्रुओं पर विजय का विश्वास लिए उत्साह के साथ सेना का नेतृत्व करते हैं।

वह बड़े स्वाभिमानी और निर्भीक नरेश हैं। जब औरंगजेब के दरबार में उनके साथ अपमानजनक व्यवहार होता है तो वह शत्रुओं के बीच होते हुए भी भरे दरबार में अपना आक्रोश व्यक्त करते हैं। बादशाह औरंगजेब को सलाम तक नहीं करते।

कवि उन्हें शेषनाग, दिग्गजों तथा हिमाचल के स्थान पर धरती को धारण करने वाला वास्तविक बली बताता है। उन्हें ईश्वर के स्थान पर संसार का पालन-पोषण करने वाला मानता है।

कवि ने उसे शत्रुओं के प्राणों का अधिकारी सिद्ध करने के लिए उपमाओं की श्रृंखला प्रस्तुत कर दी है।
इस प्रकार शिवाजी अनेक गुणों के भंडार, आदर्श और अनुकरणीय वीर पुरुष सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 4.
अपनी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि भूषण के छंदों का सार संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
संकलित दोहों का सार इस प्रकार है –

प्रथम छंद में कवि ने सेना सजाकंर उमंग के साथ शत्रुओं पर विजय पाने को प्रस्थान करते शिवाजी को प्रस्तुत किया है। नगाड़े बज रहे हैं, हाथी मद टपकाते नदी नद बहाते, पर्वतों को दहलाते चले जा रहे हैं। सेना चलने से धरती काँप रही है, समुद्र काँप रहा है।

उचित सम्मान का आश्वासन पाकर शिवाजी औरंगजेब के दरबार में पहुँचे। वहाँ उन्हें छह हजारी मनसबदारों में खड़ा कर दिया गया। अपमान से भड़के शिवाजी को देखकर औरंगजेब का मुंह काला पड़ गया और सिपाहियों के मुँह भय से पीले पड़ गए।

कवि ने शिवाजी की प्रशंसा करके उन्हें ही धरती का भार उठाने वाला घोषित कर दिया। शेषनाग, दिग्गज और हिमाचल तो बस नाम के धराधर हैं। ‘करतार’ और ‘यमराज’ की भूमिका भी संसार में वही निभा रहे हैं। |

शिवाजी म्लेच्छ वंश के लिए काल हैं। कवि ने इन्द्र और जूभासुर, बडवानल और जल, शिव और कामदेव, सहस्रबाहु और परशुराम आदि के उदाहरण देकर इसे सिद्ध किया है।

अंत में कवि ने सारे भारत में जहाँ भी ‘पातसाही’-बादशाह औरंगजेब का शासन है, वहाँ-वहाँ वीर शिवराज का दावा बताया है।

भूषण कवि परिचय

वीर रस के सिद्ध कवि भूषण’ का जन्म सन् 1613 ई. में कानपुर के गाँव तिकवाँपुर में हुआ था। इनके पिता पं. रत्नाकर त्रिपाठी थे। ‘भूषण’ का वास्तविक नाम घनश्याम बताया जाता है। ‘भूषण’ इनकी उपाधि थी जो इनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर चित्रकूट के राजा रुद्र ने प्रदान की थी। भूषण ने महाराज शिवाजी और राजा छत्रसाल को अपनी कविता का नायक बनाया है। इन दोनों के पराक्रम और दानशीलता का बहुत बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया है। भूषण का देहावसान सन् 1715 ई. के लगभग हुआ।

रचनाएँ- भूषण के तीन ग्रन्थ प्राप्त हुए हैं-‘शिवराज भूषण’, ‘शिवा वावनी’ तथा ‘छत्रसाल दशक’।

कवि भूषण ने रीतिकालीन धोर श्रृंगार मय काव्य-रचना के वातावरण के बीच अपनी ओजमयी वाणी और अत्युक्तिमयी शैली में वीररस के काव्य का सजृन किया। आपके द्वारा सेनाओं के प्रयाण, आक्रमण, व्यूह रचना, युद्ध, शत्रुओं के भय आदि का बड़ा सजीव वर्णन किया गया है। अलंकारप्रियता और नाद-सौन्दर्य आपकी कविता की विशेषताएँ हैं।

भूषण पाठ-परिचय

प्रस्तुत संकलन में कवि भूषण के पाँच कवित्त रखे गए हैं। प्रथम छंद में कवि ने युद्ध के लिए प्रस्थान करते वीर शिवा की सेना के प्रयाण का दृश्य प्रस्तुत किया है। द्वितीय छंद में औरंगजेब द्वारा शिवाजी के अपमान का और शिवाजी के क्रोधित होने पर दरबारियों की भयभीत दशी का वर्णन किया है। तृतीय छंद में कवि ने शिवाजी को समस्त भूमितल को धारण करने वाला, शत्रुओं का विनाशक और जगत का भरण-पोषण करने वाला बताया है। चौथे कवित्त में कवि अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए, म्लेच्छ वंश पर शिवराज का आतंक प्रमाणित कर रहा है। पाँचवे छंद में कवि ने सारे भारत में मुगल राजाओं पर शिवाजी के अबाध प्रभुत्व को प्रमाणित किया है।

काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ

(1) साजि चतुरंग-सैन अंग में उमंग धारि,
सरजा सिवाजी जंग जीतने चलत है।
भूषन भनत नाद बिहद नगारन के,
नदीनद मद गैबरन के रलत है।
ऐलफल खैलभैल खलक में गैल-गैल,
गजन की तैलपैल सैल उसलत है।
तारा सौ तरनि धूरिधारा में लगत जिमि
थारा पर पारा पारावार यों हलत है।

कठिन शब्दार्थ-साजि = सजाकर। चतुरंग सैन = हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक चार अंगों से युक्त सेना। अंग = शरीर। उमंग = उत्साह। धरि = धारण करके। सरजा = शिवाजी की उपाधि। जंग = युद्ध। भनत = कहते हैं। नाद= शब्द। बिहद = भारी, घोर। नगारन के = युद्ध के नगाड़ों के। नद = विशाल नदी। मद = मत्त हाथी की कनपटी से टपकने वाला द्रव। गैबरन = हाथियों। रलत है = बहते हैं। ऐल फैल = सेना के फैलने या चलने से। खैल-मैल = खलबली, भय। खलक = संसार। गैल-गैल = गली-गली या सभी मार्गों पर। गजन की = हाथियों की वैल-पैल = धक्कों से। सैल = पर्वत। उसलत = उखड़ते। तारा सौ = तारे के समान (छोटा)। तरनि = सूर्य। धूरि-धारा = धूल का उड़ना। जिमि = जैसे। धारा = थाल। पारा = एक द्रव अवस्था में रहने वाली धातु। पारावार = समुद्र। यों हलते है = इस प्रकार हिलता है।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत कवित्त छंद हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित क़वि भूषण के छंदों से लिया गया है। इस छंद में कवि, शिवाजी की विशाल सेना के युद्ध के लिए जाते हुए समय का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन कर रहा है।

व्याख्या-कवि भूषण कहते हैं-जब शिवाजी युद्ध में विजय पाने के लिए विशाल सेना सजाकर और मन में उत्साह भर कर चलते हैं तो सेना के नगाड़ों का भारी नाद गूंजने लगता है। हाथियों की कनपटियों से टपकने वाले मद से नदी और नद बहने लगते हैं। शिवाजी की सेना के आगे बढ़ने पर सारे संसार की गली-गली में खलबली मच जाती है और सेना के असंख्य हाथियों के धक्कों से पर्वत भी उखड़ने लगते हैं। विशाल सेना के चलने से उड़ने वाली धूल में सूर्य भी एक तारे के जैसा टिमटिमाता दिखाई देता है और धरती के हिलने से समुद्र भी इस प्रकार डोलने लगता है जैसे थाल पर रखा पारा थाल को लेकर चलने पर इधर-उधर ढुलको करता है।

विशेष-
(i) शिवाजी की सेना के रणक्षेत्र के प्रस्थान को दृश्य अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन-शैली में हुआ है।
(ii) शब्द-चयन ओज उभारने वाला है। “ऐलफल ……………………… गैल-गैल” में नाद सौन्दर्य है।
(iii) “ऐलफल ……………………. सैल उसलत हैं।” में अनुप्रास अलंकार, ” तारा सौ ………………… लगत” तथा “धरा पर ………………… यों हलत है।” में उपमा अलंकार है।
(iv) वीररस की झलक उत्साह जगाने वाली है।

(2) सबन के ऊपर ठाढ़ी रहिबे के जोग,
ताहि खरो कियौ छह-हजारिन के नियरे।
जानि गैरमिसिल गुसीले गुसा धारि मन,
कीन्हों ना सलाम न बचन बोले सियरे।
भूषन भनत महाबीर बलकन लाग्यौ,
सारी पातसाही के उड़ाये गए जियरे।
तमक तें लाल मुख सिवा को निरखि भए,
स्याहमुख नौरंग, सिपाह-मुख पियरे।

कठिन शब्दार्थ-ठाड़ो = खड़ी। जोग = योग्य। खरौ = खड़ी। छह हजारने = बादशाह द्वारा दिया जाने वाला एक ओटा पद। नियरे = पास। गैरमिसिल = बराबर न होना, अपमानजनक। गुसीले = क्रोधी। गुसा = गुस्सा, क्रोध। सियरे = नम्र, ठंडे। भनते = कहते हैं। बलधन लाग्यौ = उत्तेजित होने लगी। पातसाही = बादशाहत, दरबारी लोग। उड़ाई गए = उड़ गए। जिअरे = प्राण, होश। तमक = क्रोध, आक्रोश। निरखि = देखकर। स्याह = काला। नौरँग = औरंगजेब। सिपाह = सिपाही, सैनिक। पियरे = पीले॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत कवित्त हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि भूषण के कवित्तों से लिया गया है। कवि ने औरंगजेब द्वारा शिवाजी को उचित सम्मान ने दिए जाने पर, उनके क्रोधित होने और औरंगजेब तथा उसके सैनिकों के हाव-भावों का वर्णन किया

व्याख्या-औरंगजेब द्वारा उचित सम्मान दिए जाने के आश्वासन पर शिवाजी औरंगजेब के दरबार में पहुँचे। अपनी वीरता और प्रभाव के कारण जो शिवाजी सबसे ऊपर खड़े होने के योग्य थे, उनको अपमानित करते हुए छह हजारी मनसबदारों के पास खड़ा किया। गया। इसे अत्यन्त अनुचित और अपमानजनक मानते हुए, स्वाभिमानी और क्रोधी शिवाजी के मन में बड़ा रोष छा गया। उन्होंने न तो औरंगजेब को सलाम किया और न नम्र शब्दों में अपना विरोध प्रकट किया। जब अपना अपमान किए जाने से शिवाजी उत्तेजित होने लगे तो उनका क्रोध से लाल मुख तथा रौद्ररूप देख औरंगजेब का मुख तो झेप के मारे काला पड़ गया और इसके सिपाहियों के मुख भय से पीले पड़ गए।

विशेष-
(i) कवि ने शिवाजी को स्वाभिमानी और साहसी वीर पुरुष के रूप में चित्रित किया है।
(ii) औरंगजेब तथा सिपाहियों की प्रतिक्रिया दिखाने में अतिशयोक्ति का प्रयोग हुआ है।
(iii) भाषा में उर्दू शब्दों-‘गैरमिसिल’, ‘गुस्सा’, ‘सलाम’, ‘तमक’, ‘स्याह’ तथा ‘सिपाह’ का प्रयोग हुआ है।
(iv) ‘गैरमिसिल’, ‘गुसीले गुसा’ में अनुप्रास अलंकार तथा “तमक ते ……………………. मुख पियरे।’ में अतिशयोक्ति अलंकार है।

(3) तेरे हीं भुजानि पर भूतल को भार
कहिबे कौं सेषनाग दिगनाग हिमाचल है।
तेरौ अवतार जग-पोषन-भरनहार,
कछु करतार कौ न तो मधि अमल है।
साहि-तनै सरजा समथ्थ सिवराज कवि
भूषन कहत जीवौ तेरो ही सफल है।
तेरौ करबाल करै म्लेच्छन कौ काल
बिन काज होत काल बदनाम धरातल है।

कठिन शब्दार्थ-भुजानि = हाथों में। भूतल = पृथ्वी। भार = बोझ। शेषनाग = एक सहस्र फन वाले, विशाल सर्प माने जाते हैं, जो धरती को धारण करते हैं। दिगनाग = चारों दिशाओं में धरती को धारण करने वाले हाथी। हिमाचल = हिमालय आदि पर्वत। पोषन-भरनहार = भरण-पोषण करने वाला। करतारे = ईश्वर, विधाता। ती मधि = उसमें। अमल = प्रयत्न, कार्य, अधिकार। साहि= शाह। तनै = पुत्र। सरजा = शिवाजी की उपाधि। समथ्थ = समर्थ, शक्तिशाली। जीवौ = जीना। करेवाल = तलवार। म्लेच्छन कौ = अत्याचारी मुगलों का। काल = अंत, नाश। काज = कारण। धरातल = संसारे।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत छंद पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि भूषण की रचना से उद्धृत है। कवि के अनुसार पृथ्वी का भार धारण करना और संसार का भरण-पोषण वास्तव में शिवाजी ही करते हैं। शेषनाग, दिग्गज आदि और ईश्वर का तो केवल नाम ही नाम है।

व्याख्या-कवि भूषण कहते हैं-हे शाह पुत्र सरजा शिवाजी ! इस संसार का भार वास्तव में आप ही उठाए हुए हैं। शेषनाग, दिग्गज तथा हिमालय आदि पर्वत तो कहने के लिए ‘भूधर’ हैं। हे शिवाजी ! तुम्हारा अवतार (जन्म) ही सारे जगत की सुरक्षा और पालन-पोषण के लिए हुआ है। इस काम में ईश्वर की कोई भूमिका नहीं है। हे सर्वसमर्थ शिवाजी महाराज! सच कहें तो आज के राजाओं में आपका ही जीना सार्थक है। हे शिवाजी ! तुम्हारी तलवार ही अत्याचारी मुगलों का अंत करने वाली है। बेचारा काल तो जान लेने के लिए व्यर्थ ही बदनाम चला आ रहा है।

विशेष-
(i) कवि ने शिवाजी महाराज को एक कर्तव्यनिष्ठ शासक सिद्ध किया है। दुष्टों से जनता की रक्षा करने वाले और उसके भरण-पोषण की समुचित व्यवस्था करने वाले शासक का ही जीवन धन्य है। भूषण शिवाजी को ऐसी ही शासक मानते हैं।
(ii) समर्थ, ओजपूर्ण और साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग है।
(iii) शैली उत्साह भरने वाली और वीररस को जगाने वाली है।
(iv) “साहि-तनै सरजा, समथ्थ सिवराज” में अनुप्रास अलंकार है।
(v) छंद में शिवाजी के सामर्थ्य और कर्तव्यनिष्ठा का अतिशयोक्तिपूर्ण चित्रण है।

(4) इंद्र जिम जंभ पर, बाड़व ज्यौं अंभ पर,
रावन सदंभ पर रघुकुलराज है।
पौन वारिवाह पर, संमुतिनाह पर,
ज्यों सहस्रबाहु पर राम् द्विजराज है।
दावा दुमदंड पर चीता मृगझुंड पर,
भूषन वितुंड पर जैसे मृगराज है।
तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर
यौं मलेच्छ-बंस पर, सेर सिवराज है।

कठिन शब्दार्थ-जिमि = जैसे। जंभ = जुंभासुर नाम का दैत्य जिसका वध इंद्र ने किया था। बाड़व = वड़वानल, समुद्र में रहने वाली आग जो जल को जलाया करती है। अंभ = जल। सदंभ = अहंकारी। रघुकुलराज = राम्। पौन = पवन। वारिवाह = बादल। संभु = शिव। रतिनाह = कामदेव। सहस्रबाहु = एक पौराणिक राजा। राम = परशुराम। द्विजराज = ब्राह्मणों में श्रेष्ठ। दावा = दावानल, जंगल में लगने वाली आग। द्रुम दंड = वृक्ष। मृगझुंड = हरिणों का समूह। वितुंड = हाथी। मृगराज = सिंह। सेर = शेर, हाबी, आतंकित करने वाला।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत कवित्त हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि भूषण के कवित्तों में से लिया गया है। कवि अनेक उदाहरणों द्वारा अन्यायी मुगल शासकों पर शिवाजी के आतंक का वर्णन कर रहा है।

व्याख्या-कवि भूषण कहते हैं-जिस प्रकार देवराज इन्द्र का जूभासुर पर आधिपत्य प्रसिद्ध है। जल को भी जला देने वाली वडवाग्नि से जैसे जल भयभीत रहता है, अहंकारी रावण पर भगवान राम का आधिपत्य सर्वज्ञात है, पवन का बादल पर, शिवजी का रति के पति कामदेव पर, राजा सहस्रबाहु पर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ परशुराम का, वृक्षों पर दावानल का, चीते का हरिणों के समूह पर, हाथी पर सिंह का, प्रकाश का अंधकार पर, भगवान कृष्ण का कंस पर जिस प्रकार आधिपत्य प्रसिद्ध है, उसी प्रकार संपूर्ण अत्याचारी मुगल शासकों पर शिवाजी महाराज का आतंक छाया हुआ है।

विशेष-
(i) इंद्र ने जूभासुर का वध किया था। वड़वानल एक अग्नि है, जो समुद्र के जल को जलाया करती है। शिवजी ने कामदेव को भस्म कर दिया था। सहस्रबाहु राजा को परशुराम ने युद्ध में मारा था।
(ii) शिवाजी महाराज के पराक्रम और शत्रुओं पर छाए उनके आतंक का कवि ने ओज पूर्ण भाषा-शैली में वर्णन किया है।
(iii) नाद-सौन्दर्य (समान ध्वनि वाले शब्दों का चयन) छंद को आकर्षक बना रहा है।” जंभ पर, अंभ पर, सदंभ पर” आदि ऐसे ही उदाहरण हैं।
(iv) छंद में अनुप्रास और उदाहरणों की लड़ी का आलंकारिक प्रयोग दर्शनीय है। उपमाओं की माला है।
(v) छंद-वीर रस की अनुभूति कराने वाला है।

(5) गरुड़ को दावा जैसे नाग के समूह पर,
दावा नागजूह पर सिंह सिरताज को।
दावा पुरहूत को पहारन के कूल पर,
दावा सबै पच्छिन के गोल पर बाज को।
भूषन अखंड नवखंड महिमंडल में,
तम पर दावा रविकिरनसमाज को।
पूरब, पछाँह देस, दच्छिन ते उत्तर लौं
जहाँ पातसाही तहाँ दावा सिवराज को।

कठिन शब्दार्थ-गरुड़ = भगवान विष्णु का वाहन जो सर्पो का शत्रु माना गया है नाग = सर्प। नागजूह = हाथियों का समूह। सरताज = संबसे अधिक शक्तिशाली। पुरहूत = इंद्र। कुल = समूह वंश। पच्छिन के = पक्षियों के। गोल = समूह। बाज = एक शिकारी पक्षी। अखंड = संपूर्ण। नवखंड = नौ खंडों या भागों वाली। महिमंडल = पृथ्वी। तम = अंधकार। रविकिरन समाज = सूर्य की किरणों का समूह। पछाँह = पश्चिम दिशा। पातसाही = बादशाहत, औरंगजेब का शासन। सिवराज = शिवाजी महाराज॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत छंद हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि भूषण के छंदों से लिया गया है। छंद में कवि ने अपने आश्रयदाता और काव्य-नायक महाराजा शिवाजी के प्रताप और दबदबे का उदाहरण सहित वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि भूषण कहते हैं-जैसे सर्यों के बैरी बलशाली गरुड़ का सर्यों पर प्रभुत्व और आंतक है, हाथियों के झुंड पर जैसे- पराक्रमी सिंह का प्रभुत्व है, पर्वतों को अपने बज्र के प्रहार से खंडित करने वाले इंद्रदेव का संपूर्ण पर्वतों पर आधिपत्य है, सभी पक्षियों पर जैसे बाज का आतंक बना रहता है और नौ खंडों वाली सम्पूर्ण पृथ्वी पर जैसे सूर्य की किरणों के प्रकाश का अंधकार पर आधिपत्य है। उसी प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण दिशाओं में जहाँ भी बादशाह औरंगजेब के अधीन शासकों का शासन है, वहाँ पर महाराज शिवाजी का आतंक छाया रहता है।

विशेष-
(i) कवि ने शिवाजी महाराज के प्रताप और शत्रुओं पर छाए उनके आतंक का ओजपूर्ण भाषा-शैली में वर्णन किया है।
(ii) “अखंड, नवखंड, महिमंडल में” अनुप्रास अलंकार है। मालोपमा तथा उदाहरण की भी सुंदर साज-सज्जा है।
(iii) भाषा प्रसंग और भाव के अनुकूल है। शब्द चयन पाठकों को मुग्ध करने वाला है।
(iv) छंद से वीररस छलक रहा है।