RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 4  पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 4 बिहारी वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
बिहारी सतसई में किस रस की प्रधानता है –
(अ) शान्त
(ब) श्रृंगार
(स) वीर
(द) हास्य
उत्तर:
(ब)

प्रश्न 2.
बिहारी की काव्य-शैली है –
(अ) मुक्तक काव्य शैली
(ब) खण्ड काव्य शैली
(स) गीतिकाव्य शैली
(द) प्रबन्धकाव्य शैली
उत्तर:
(अ)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 4 बिहारी  अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
“कब कौ टेरतु दीन-रट …… जगनाइक जग बाय॥
प्रस्तुत दोहे में कवि ने उलाहना देते हुए किस पर कटाक्ष किया है?
उत्तर:
कवि ने उलाहना देते हुए जगत के गुरु और नायक श्रीकृष्ण पर कटाक्ष किया है।

प्रश्न 2.
किस लालच में गोपियाँ श्रीकृष्ण की मुरली छिपा लेती हैं?
उत्तर:
श्रीकृष्ण से बात करने के आनन्द के लालच में गोपियाँ उनकी मुरली को छिपा लेती हैं।

प्रश्न 3.
श्रीकृष्ण के आगमन पर वन के मोर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं?
उत्तर:
श्रीकृष्ण के आगमन पर मोर उनके श्याम स्वरूप को बादल समझकर हर्ष से नाचने लगते हैं।

प्रश्न 4.
समान आभा के कारण नजर न आने वाले नायिका के आभूषणों की पहचान किस प्रकार होती है?
उत्तर:
आभूषणों की पहचान हाथ से शरीर को छूने पर आभूषणों की कठोरता से उनकी पहचान हो पाती है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 4 बिहारी  लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जगत के चतुर चितेरों को भी मूढ़ बनना पड़ा। कवि ने ऐसा क्यों कहा?
उत्तर:
पूर्व समय में चित्रकार किसी भी व्यक्ति का चित्र हाथों से बनाया करते थे। चित्र बनाते समय व्यक्ति को एक ही मुद्रा में चित्रकार के सामने बैठना होता था। इस नायिका की छवि पल पल में बदलती रहती थी। अत: चित्रकार जब उसकी ओर देखता था उसे उसकी मुद्रा या स्वरूप में कुछ अन्तर दिखाई देता था। इस कारण चित्रकार उसका यथावत चित्र नहीं बना पाता था। इसी कारण वह मूर्ख सिद्ध होता था।

प्रश्न 2.
“कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत लजियात।
भरे भौन में करत है, नैननु ही सों बात ॥”
प्रस्तुत दोहे के माध्यम से (अनुसार) नायक नायिका आँखों की चेष्टाओं के माध्यम से किन भावों को प्रकट कर रहे हैं?
उत्तर:
नायक-नायिका आँखों की चेष्टाओं द्वारा कुछ कहने की, असहमत होने की, प्रसन्नता की, खीझने की, मिलन सुख की, हर्षित होने की और लजाने की मनोभावनाओं को व्यक्त कर रहे हैं। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि मनुष्य के हृदय की भावनाएँ उनके नेत्रों से झलक जाती हैं।

प्रश्न 3.
“अंग-अंग नग जगमगत दीपसिखा सी देह।।
दिया बढ़ाएँ हूँ, बड़ौ उज्यारौ गेह॥
प्रस्तुत दोहे में सखी नायक से नायिका की छवि की प्रशंसा करते हुए क्या कहना चाहती है?
उत्तर:
सखी इस दोहे में नायक के सामने नायिका के उज्ज्वल रूप की, उसके गौरवर्ण की प्रशंसा करके नायक को नायिका के प्रति आकर्षित करना चाह रही है। वह यह भी संकेत कर रही है कि रात्रि के समय भी नायिका के घर में उसके रत्नजटित आभूषणों और उज्जवल रूप के कारण प्रकाश बना रहता है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 4 बिहारी  व्याख्यात्मक प्रश्न

  1. कहत सबै बेंदी …… बढ़तु उदोतु। – प्रस्तुत दोहे का भाव लिखिए।
  2. कागद पर लिखत …… हिय की बात ॥ – दोहे की व्याख्या कीजिए।

संकेत – छात्र पाठ की सप्रसंग व्याख्याओं में इन दोहों की व्याख्याओं (पद्यांश 18 व 17) का अवलोकन करके स्वयं व्याख्याएँ। लिखें।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 4 बिहारी  अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 4 बिहारी वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. “तो पर बारौं उरबसी …… उरबसी समान।” दोहे में प्रयुक्त अलंकार हैं –

(क) रूपक और उपमा
(ख) यमक और उपमा
(ग) श्लेष और उपमा
(घ) पुनरुक्ति प्रकाश

2. स्याम रंग में डूबकर चित्त हो रहा है –

(क) काला
(ख) उजला
(ग) भद्दा
(घ) प्रसन्न

3. स्याम शरीर पर पीताम्बर धारण किए कृष्ण लगते हैं –

(क) मानो नीलकमल के बीच पराग हो
(ख) मानो काले बादलों के बीच सूर्य हो
(ग) मानो नीले आकाश में इन्द्रधनुष हो
(घ) मानो नीलम की शिला पर प्रात:काल की धूप पड़ रही हो।

4. गोपियों ने श्रीकृष्ण की वंशी छिपा ली है –

(क) वंशी के द्वेष के कारण
(ख) कृष्ण का ध्यान आकर्षित करने के लिए।
(ग) बातें करने के लालच में
(घ) कृष्ण को तंग करने के लिए।

5. आगे बिंदी लगने पर अंक हो जाते हैं –

(क) दुगुना।
(ख) दस गुना
(ग) शून्य
(घ) पाँच गुना

उत्तर:

  1. (ग)
  2. (ख)
  3. (घ)
  4. (ख)
  5. (ख)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 4 बिहारी अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राधिका कृष्ण के हृदय में किसके समान होकर बसी हुई है?
उत्तर
राधा उर्वशी के समान सुन्दर होकर कृष्ण के हृदय में बसी हुई है।

प्रश्न 2.
कवि ने रघुपति राम पर क्या आरोप लगाया है?
उत्तर:
कवि ने आरोप लगाया है कि वह झूठी प्रशंसा पाकर इठलाते फिरते हैं।

प्रश्न 3.
“आपको भी संसार की हवा लग गई है।” कवि ने भगवान से ऐसा क्यों कहा है?
उत्तर:
कवि बहुत समय से दीन भाव से भगवान को पुकार रहा है, किन्तु वे उसकी सहायता को नहीं आए। वे भी आजकले के कठोर हृदय, बड़े आदमियों जैसे हो गए हैं।

प्रश्न 4.
भगवान के प्रेमी हृदय के कवि ने क्या विशेषता बताई है?
उत्तर:
भगवद् प्रेमी हृदय जितना-जितना श्याम रंग (कृष्ण भक्ति) में डूबता है, उतना ही उजला (पवित्र) होता जाता है।

प्रश्न 5.
कवि ने ‘आँवार’ किसे कहा है?
उत्तर:
कवि ने भगवान का भजन त्याग कर सांसारिक विषयों के भोग में लिप्त रहने वाले को ‘गॅवार’ कहा है।

प्रश्न 6.
“अजों तयौना…… बसि मुकुतन के संग।।”
उत्तर:
कवि ने सन्देश दिया है कि महापुरुषों की संगति व्यक्ति को सहज ही मोक्ष का मार्ग दिखा सकती है।

प्रश्न 7.
यमुना के तट पर जाकर कवि को कैसा अनुभव होता है?
उत्तर:
यमुना तट की कुंजों की सुखदायी छाया और शीतल सुगन्धित वायु के स्पर्श से उसे लगता है कि वह श्रीकृष्ण की निकटता का अनुभव कर रहा है।

प्रश्न 8.
श्रीकृष्ण के श्याम-सलौने शरीर पर पीताम्बर देखकर कवि के मन में क्या कल्पना जागती है?
उत्तर:
कवि को लगता है कि मानो नीलम रत्न की शिला पर प्रात:काल की पीली धूप पड़ रही हो।

प्रश्न 9.
भौंरी गुलाब की जड़ को छोड़कर क्यों नहीं जाता?
उत्तर:
भौंरे को आशा है कि बसंत ऋतु आने पर गुलाब की नंगी डालियों पर फिर वैसे ही सुन्दर फूल आएँगे।

प्रश्न 10.
सांसारिक सुखों के जाल में फंसने के बाद जीव के साथ क्या होता है?
उत्तर:
एक बार इनके जाल में फंसने पर मनुष्य जितना छूटने का प्रयत्न करता है, उतना ही और उलझता चला जाता है।

प्रश्न 11.
कृष्ण से बात करने के लालच में गोपियों ने क्या किया?
उत्तर:
गोपियों ने उनकी वंशी को छिपा दिया।

प्रश्न 12.
वन के मोरों को बिना वर्षा ऋतु के ही नाचते देख गोपी ने क्या अनुमान किया?
उत्तर:
उसने अनुमान किया कि उधर श्रीकृष्ण आए हुए हैं जिनके श्याम शरीर को बादल समझकर मोर नाच उठे हैं।

प्रश्न 13.
संसार के चतुर चित्रकार मूर्ख क्यों सिद्ध हुए?
उत्तर:
परम सुन्दरी नायिका की छवि का चित्र न बना पाने के कारण चित्रकार मूर्ख सिद्ध हो गए।

प्रश्न 14.
झीने वस्त्रों में नायिका कैसी लग रही है?
उत्तर:
नायिका ऐसी लग रही है मानो समुद्र के जल में झिलमिल करती कल्पवृक्ष की पत्तों से भरी डाली हो।

प्रश्न 15.
नायिका और नायक नेत्रों ही नेत्रों में बातें क्यों कर रहे हैं?
उत्तर:
उनके प्रेम प्रसंग का किसी को पता न चल पाए, इसलिए वे नेत्रों द्वारा ही अपनी मनोभावनाएँ प्रकट कर रहे हैं।

प्रश्न 16.
नायिका अपने मन की बात नायक को क्यों नहीं बता पा रही है?
उत्तर:
नायिका कागज पर लिख नहीं पाती और मुँह से कहते हुए उसे लज्जा आती है। इसी कारण नायक को वह मन की बात नहीं बता पा रही है।

प्रश्न 17.
स्त्री के मस्तक पर बिंदी लगाने पर क्या होता है?
उत्तर:
बिंदी लगने पर उसकी सुन्दरता अवर्णनीय हो जाती है।

प्रश्न 18.
नायिका के शरीर पर सोने के गहने दिखाई क्यों नहीं पड़ते?
उत्तर:
नायिका के शरीर का रंग सोने से मिलता हुआ है। अत: उसके शरीर पर गहने दिखाई नहीं पड़ते।

प्रश्न 19.
कवि ने नायिका की देह को किसके समान बताया है?
उत्तर:
कवि ने नायिका की देह को दीपशिखा के समान बताया है।

प्रश्न 20.
आपकी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कवि बिहारीलाल के दोहे किन-किन विषयों पर हैं? लिखिए।
उत्तर:
संकलित दोहे कवि ने भक्ति, नीति तथा श्रृंगार विषयों पर रचे हैं।

प्रश्न 21.
बिहारी की कविता की कोई दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
कवि बिहारी की कविता की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं-

  1. गागर में सागर भरना।
  2. आलंकारिक कथन-शैली का प्रयोग।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 4 बिहारी लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि बिहारी राधा नागरी से क्या और क्यों अनुरोध कर रहे हैं? संकलित दोहे के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
कवि बिहारी चतुर राधा से अपनी भव-बाधाओं को दूर करने का अनुरोध कर रहे हैं। उन्होंने राधा की विशेषताएँ बताते हुए कहा है कि वह इतनी सुन्दर और प्रभावशालिनी हैं कि उनकी झलक मात्र देखते ही कृष्ण प्रसन्न हो जाते हैं। इस प्रकार राधिका जी को मना लेने पर उन्हें श्रीकृष्ण की कृपा भी स्वत: प्राप्त हो जाएगी और उनकी अभिलाषा सहज ही पूरी हो जाएगी।

प्रश्न 2.
“तो पर बारौं …… उरबसी समान॥” दोहे की काव्यपरक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
इस दोहे में कवि की रुचि राधा के प्रति श्रद्धा प्रदर्शन करने में नहीं बल्कि उनके मनमोहन को भी मोह लेने वाली राधा की सुन्दरता के बखान पर केन्द्रित है। कवि कहता है कि राधा की एक झलक भर देखते ही कृष्ण का मन प्रसन्न हो जाता है। इसके अतिरिक्त इस दोहे में कवि ने अपनी अलंकारप्रियता का भी प्रमाण दिया है।’उरबसी’ शब्द के द्वारा कवि ने यमक की कलाबाजी दिखाई है। दोहे में भाव पक्ष नाम मात्र को ही प्रस्तुत हुआ है।

प्रश्न 3.
‘तूठे-तूठे फिरत हो’ कवि ने यह व्यंग्य किस पर किया है और क्यों? संकलित दोहे के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
कवि ने यह व्यंग्य रघुराई अर्थात् भगवान श्रीराम पर किया है। कवि ने अपना उद्धार कराने को यह चतुराई भरा उपाय अपनाया है। वह श्रीराम पर अरोप लगा रहा है कि भगवान का दीनबन्धु होना पतितों का उद्धारक कहा जाना, झूठी प्रशंसा है। उसके जैसे पतित का उद्धार न होते हुए श्रीराम का झूठे यश पर इतराना उचित नहीं है। यह भक्त का भगवान को उलाहना है।

प्रश्न 4.
आज के सांसारिक गुरु और नायकों का स्वभाव कवि के अनुसार क्या है? कवि ने अपने इष्टदेव पर क्या व्यंग्य किया है? लिखिए।
उत्तर:
कवि ने अपने दोहे में अपने इष्टदेव को ताना दिया है कि वह कब से दीनतापूर्ण पुकार रहा है पर प्रभु उसकी पुकार को अनसुनी करते आ रहे हैं। उसकी सहायता नहीं कर रहे हैं कवि व्यंग्यात्मक लहजे में जगत के गुरु और जगत के नायक भगवान से कहता है हे प्रभु! लगता है आपको भी संसार की हवा लग गई है। आप भी आज के गुरु और नायकों के समान, दुखियों और असहायों की पुकार को अनसुनी करने लगे हैं।

प्रश्न 5.
‘अनुरागी चित्त’ की कवि ने क्या विशेषता बताई है? इसका आशय क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि कहता है इस अनुराग (प्रेम) में मग्न हृदय की अद्भुत प्रकृति को समझ पाना बड़ा कठिन है। यह ज्यों-ज्यों श्याम (काला) रंग में डूबता है, उतना ही उतना उजला होता चला जाता है। यह परस्पर विरोधी कथन है। इस कथन का आशय है कि व्यक्ति जितना-जितना श्याम (श्रीकृष्ण) के रंग (भक्ति या प्रेम) में डूबता है, त्यों-त्यों उसका हृदय पवित्र और प्रसन्न होता चला जाता है।

प्रश्न 6.
“भजन कयौ …… भज्यौ गॅवार।” इस दोहे द्वारा कवि बिहारी के काव्य की कौन-सी विशेषता सामने आती है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विहारी लाल रीतिकालीन कवि हैं। उनकी कविता रीतिकालीन कविता का पूरा प्रतिनिधित्व करती है। अलंकारप्रियता और उक्ति चमत्कार, रीतिकालीन कविता की ही दो विशेषताएँ रही हैं। इस दोहे में कवि ने ‘भजन’ और ‘भज्यौ’ का चमत्कार दिखाया है। ‘भजन’ और ‘भज्यौ’ का ‘भजन करने’ और भागने के अर्थ में प्रयोग हुआ है। इसके अतिरिक्त कवि ने ‘उक्ति वैचित्र्य’ (बात को अनोखे ढंग से कहय) का भी सुन्दर नमूना है। कवि ने इसी का प्रयोग करके भगवान का भजन न करने वालों को ‘आँवार’ बताया है।

प्रश्न 7.
“अज्यों तयौना …… मुकुतन के संग ।।” दोहे में कवि बिहारी क्या सन्देश देना चाहते हैं? लिखिए।
उत्तर:
इसमें कवि ने ‘तयौन’ और ‘बेसर’ नामक आभूषणों के माध्यम से सत्संग की महिमा का सन्देश दिया है। संसार -सर से तरने के लिए लोग वेद-शास्त्र आदि का अध्ययन करते हैं उनके बताये उपायों को अपनाते हैं। कवि के अनुसार यह मार्ग बहुत लम्बा और कठिन है। इसके स्थान पर जो लोग मोक्ष प्राप्त महापुरुषों अथवा सांसारिक मोह से मुक्त पुरुषों के आचरण का अनुकरण करते हैं, वे सरलता से स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न 8.
कवि बिहारी ने यमुना तट की क्या विशेषताएँ बताई हैं? सम्बन्धित दोहे के आधार पर बताइए।
उत्तर:
कवि बिहारी कहते हैं कि यमुना के तट भगवान श्रीकृष्ण की अनेक लीलाओं के साक्षी रहे हैं। इन तटों पर पहुँचने पर जहाँ वृक्षों, लताओं की घनी कुंजों की सुखदायिनी तथा वहाँ चलने वाली शीतल और सुगन्धित पवन से व्यक्ति के तन को सुख मिलता है तथा वह वातावरण व्यक्ति के मन को भी आनन्दित करता है। उसे लगता है जैसे वह वहाँ पर श्रीकृष्ण की समीपता का अनुभव कर रहा है। उसका मन उसी प्रकार प्रसन्न हो जाता है जैसे तत्कालीन गोप-गोपियों का मन कृष्ण की लीलाओं से हुआ करता था।

प्रश्न 9.
“सोहत ओढ़ पीत पट……॥” दोहे में कवि ने किस अलंकार का प्रयोग किया है? अलंकार के लक्षण बताते हुए स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि कहता है कि अपने साँवले और सुन्दर शरीर पर पीताम्बर धारण करके कृष्ण ऐसे लगते हैं मानो किसी नीलम (रत्न) की शिला पर प्रात:कालीन पीली धूप पड़ रही है। जहाँ उपमेय में किसी उपमान की सम्भावना प्रकट की जाती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। दोहे में “श्रीकृष्ण के श्याम शरीर पर पीताम्बर की शोभा” उपमेय है जिसमें कवि ने “नीलमणि शैल पर आतप पर्यौ प्रभात” यह सम्भावना जाताई है। अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।

प्रश्न 10.
“इन्हीं आस अटक्यौ …… वै फूल।” इस दोहे से आपको क्या सन्देश प्राप्त होता है? लिखिए।
उत्तर:
गुलाब का पौधा फूलों और पत्तों से रहित हो चुका है किन्तु भौंरा अभी भी उसकी जड़ में अटका पड़ा है। उसे आशा है। कि जब बसन्त ऋतु फिर आएगी तो इन सूखी डालियों पर पुन: वे ही सुन्दर और सुगन्धित फूल आएँगे। उसे फिर मधुपान का आनन्द मिलेगा। कवि ने हमें कठिन परिस्थितियों में भी निराश न होने का और सकारात्मक सोच बनाए रखने का सन्देश दिया है। जीवन-यापन की यही सर्वोत्तम शैली है।

प्रश्न 11.
“को छूट्यौ…… उरझत जात ॥” इस दोहे में कवि ने ‘जाल’ और ‘कुरंग’ शब्दों को किनका प्रतीक बनाया है? दोहे की शैलीगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
दोहे में कवि ने सांसारिक सुखों के मोह में पड़े व्यक्तियों की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डाला है। कवि ने दोहे में ‘जाल’ को सांसारिक सुखों का और ‘कुरंग’ को मोहग्रस्त लोगों का प्रतीक बनाया है। झूठे सुखों के मोह जाल में जो व्यक्ति एक बार फंस जाता है वह लाख प्रयत्न करने पर भी उससे बाहर नहीं निकल पाता। वह जितना इस जाल से छूटने का प्रयत्न करता है, जाल उसे उतना ही और उलझाता चला जाता है। कवि ने अपनी बात कहने के लिए प्रतीकात्मक तथा अन्योक्तिपरक शैली का प्रयोग किया है।

प्रश्न 12.
“बतरस लालच …… नटि जाइ॥” इस दोहे में आप रस-योजना की दृष्टि से क्या विशेषता देखते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस दोहे में कवि ने संयोग श्रृंगार रस की सर्वांगपूर्ण योजना की है। गोपियाँ कृष्ण से वार्तालाप करने का अवसर चाहती हैं। इस लालच में उन्होंने कृष्ण की परमप्रिय वंशी को छिपा दिया है। कृष्ण जब उनसे वंशी के बारे में पूछते हैं तो वे सौगंध खाकर मैनी कर देती हैं। उनकी भौंहों में झलकती हँसी को देख कृष्ण जब उनसे वंशी माँगते हैं तो वे साफ मना कर देती हैं। कवि ने इस प्यार भरी छेड़छाड़ का जो सजीव शब्द चित्र अंकित किया है वह संयोग श्रृंगार रस का सर्वांगपूर्ण स्वरूप प्रस्तुत करता है। इसमें भाव, अनुभाव और संचारी भाव सब कुछ उपस्थित है-“सौंह करै, भौंहनु हँसौ, देन कहँ नटि जाइ ॥”

प्रश्न 13.
“नाचि अचानक …… नंद किसोर ॥” दोहे के कथन के कलात्मक और भावात्मक पक्ष को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
देखने में लगता है कि कवि ने गोपी या नायिका से साधारण-सी बात कहलाई है। वन में भौंरों के अचानके नाच उठने से से लगता है कि उस ओर श्रीकृष्ण आए हुए हैं। परन्तु गहराई से देखने पर इसके भावात्मक और कलात्मक पक्ष सामने आते हैं। नन्दकिशोर उधर आए हैं, यह जान कर नायिका बड़ी मुदित है। कृष्ण के प्रति उसका प्रेमभाव झलक रहा है। कला की दृष्टि से यह दोहा कवि के अलंकरण कौशल का प्रमाण दे रहा है। दोहे में अनुप्रास, भ्रान्तिमान और उत्प्रेक्षा अलंकार है।’नंदित’ ‘नंद किशोर’ शब्दों का कवि ने सार्थक और सुसंगत प्रयोग भी किया है।

प्रश्न 14.
नायिका की छवि को चित्र में न उतार पाने में गरबीले और अभिमानी चित्रकार क्यों असफल हो गए? इसका क्या कारण हो सकता है? अपना मत लिखिए।
उत्तर:
मेरे मत के अनुसार इसका कारण छवि या सुन्दरता की भारतीय परिभाषा में स्थित है। पुराने आचार्यों और कवियों की मान्यता है, “जो क्षण-क्षण में नवीनता धारण करे वही रमणीयता (सुन्दरता) का वास्तविक स्वरूप है।” नायिका परम सुन्दरी है। उसकी छवि हर पल बदलती रहती है। अत: बड़े-बड़े कुशल चित्रकार भी उसकी छवि को अंकित कर पाने में असफल रहते हैं। कवि ने नायिका की सुन्दरता की अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया है।

प्रश्न 15.
“नैननु ही सौं बात” का आशय क्या है? दोहे के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि ने दो प्रेमी नायक-नायिकाओं की चेष्टाओं का वर्णन किया है। दोनों ऐसे भवन में मिले हैं जहाँ अन्य अनेक व्यक्ति उपस्थित हैं। अपने प्रेम सम्बन्ध को अपने तक ही सीमित रखने अथवा संकोच के कारण वह आँखों ही आँखों में वे अपने मन के भावों को व्यक्तं कर रहे हैं। नेत्रों के संकेतों से मन की भावनाएँ प्रकट होती हैं।

प्रश्न 16.
“कहिहै सब तेरौ हियौ मेरे हिय की बात’ ॥ दोहे में यह भावना किसकी है और किस परिस्थिति में उत्पन्न हुई है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यह भावना एक नायिका की है जो नायक से अपने मन की बात न लिखकर व्यक्त कर पा रही है न कहकर । यदि दो व्यक्तियों का एक-दूसरे से गहरा प्रेम है तो दोनों की भावनाएँ एक-दूसरे के प्रति लगभग समान होती हैं। इसी आधार पर नायिका को विश्वास है कि भले वह नायक पर अपनी भावनाएँ व्यक्त न कर पाए, किन्तु नायक के हृदय में भी वे ही भावनाएँ उठ रही होंगी जो वह अनुभव कर रही है।

प्रश्न 17.
एक संख्या के आगे बिंदी (शून्य) लगाने और एक स्त्री के मस्तक पर बिंदी लगाने पर क्या अन्तर दिखाई देता है? दोहे के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सभी जानते हैं कि जब किसी संख्या के आगे बिंदी अर्थात् शून्य लगा दी जाती है तो वह संख्या दस गुनी हो जाती है। कवि कहता है जब यही बिंदी किसी रमणी के मस्तक पर लगती है तो उसकी सुन्दरता अगणति गुनी हो जाती है। कवि का यह कथन पाठकों को चमत्कृत करने के लिए है। यह भी ज्ञात होता है कि कवि को नारी-सौन्दर्य की गहरी समझ है।

प्रश्न 18.
“डीठिन परत समान दुति, कनक, कनक-से गात।” इस पंक्ति द्वारा कवि ने नायिका की सुन्दरता के विषय में क्या विशेषता दिखाई है? दोहे के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि इस पंक्ति में कह रहा है कि नायिका के स्वर्ण जैसे गौर वर्ण शरीर पर पहने गए सोने के आभूषण, एक जैसी चमक के कारण दिखाई नहीं पड़ते । केवल हाथों से छुए जाने पर कवि जताना चाहता है कि इसे सुन्दरी के शरीर की कान्ति सोने के समान है। किन्तु सोना उसकी बराबरी नहीं कर सकता। सोना कठोर है और नायिका के अंग कोमल हैं।

प्रश्न 19.
“दिया बढ़ाएँ हूँ रहै, बड़ौ उज्यारौ गेह॥” कवि ने इस कथन को क्या आप वास्तविक मान सकते हैं? कवि का आशय क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
दीपक बुझा देने पर भी नायिका के सुन्दर शरीर के कारण घर में उजाला बना रहना अतिशयोक्तिपूर्ण कथन है। कोई कितना भी गोरा और सुन्दर हो लेकिन वह दीपशिखा का काम नहीं कर सकता। उसकी सुन्दरता और रंग-रूप उजाले से ही सुशोभित दिखाई दे पाते हैं। अत: यह कथन में नायिका की सुन्दरता को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया है। बिहारी पर रीतिकालीन सौन्दर्य-वर्णन की अतिशयोक्तिपूर्ण शैली के प्रभाव का यह एक सुन्दर नमूना है।

प्रश्न 20.
पाठ्य-पुस्तक में संकलित दोहों के आधार पर बिहारी की कविता की दो प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
पाठ्य-पुस्तक संकलित दोहों के आधार बिहारी लाल की कविता की दो प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं

  1. कवि ने भक्ति, श्रृंगार और नीति अपनी कविता के विषय बनाए हैं। इन विषयों पर उनकी पकड़ और अनुभव इन दोहों से स्पष्ट व्यंजित होता है।
  2. कवि की अलंकारप्रियता और उक्ति वैचित्र्य का प्रयोग कविता में स्पष्ट दिखाई देते हैं।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 4 बिहारी निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पाठ्य पुस्तक में संकलित दोहों के आधार पर कवि बिहारीलाल की भक्ति-भावना का परिचय दीजिए।
उत्तर:
हमारी पाठ्यपुस्तक में कवि बिहारी लाल के भक्तिपरक पाँच दोहे संकलित है। इन दोहों से उनकी भक्ति भावना को पूर्ण परिचय प्राप्त होता है। कवि ने प्रथम दो दोहों में राधा की स्तुति की है। प्रथम दोहे में कवि राधा नागरी से अपने सांसारिक कष्टों को दूर करने की प्रार्थना करता है। दूसरे दोहे में कवि ने राधा के अनुपम सौन्दर्य का और श्रीकृष्ण के मन में उनके निवास का वर्णन किया है। ऐसा लगता है कि दोहों में भक्ति भावना प्रदर्शित करने के बजाय कवि ने अपनी अलंकार प्रियता और उक्ति वैचित्र्य की कुशलता का परिचय कराया है। प्रथम दोहे में श्लेष का चमत्कार है तो दूसरे दोहे में यमक के चमक-दमक भक्ति भाव पर करती है।

तीसरे दोहे में कवि ने भगवान राम को चुनौती दी है कि वे उस जैसे पापी का उद्धार करके दिखाएँ। चौथे दोहे में कवि ‘स्याम’ पर जमाने की हवा लग जाने का आरोप लगा रहा है और पाँचवे दोहे में कवि ने श्याम के रंग में रंग जाना ही मनुष्य के चित्त धन्यता बतायी है।

कवि के भक्ति भाव को सख्यभाव की भक्ति माना जा सकता है।

प्रश्न 2.
अपनी पाठ्यपुस्तक में संकलित, नीति संबंधी दोहों की विषय वस्तु और संदेशों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
हमारी पाठ्यपुस्तक संकलित कवि बिहारी के दोहों में से तीन को नीति परक रचना की श्रेणी में माना जा सकता है। इनमें प्रथम दोहा है-“भजन कहयो………………भज्यौ गॅवार।” इसका विषय सांसारिक भोगों से दूर रहकर ईश्वर का भजन करने का संदेश देना है। कवि के अनुसार सांसारिक विषय भोगों में डूबा रहने वाला मनुष्य ‘गॅवार’ है। इस दोहे में कवि ने नीति पर कम और अपने काव्य कौशल के प्रदर्शन पर अधिक बल दिया है। पूरा दोहा ‘भजन’ और ‘भज्यौ’ शब्दों के चमत्कारिक प्रयोग पर ही केन्द्रित है।

“अज तयौना……………बसि मुकुतन के संग।” इस दोहे में कवि ने कान और नाक के आभूषणों के माध्यम से लौकिक और पारलौकिक, दोनों प्रकार के लाभों को पाने का उपाय बताया है। सत्संग की महिमा प्रकाशित की गई है। राजदरबारी कान नरू। (चुगली) संस्कृति की झाँकी भी प्रस्तुत की है।

तीसरे दोहे “को छुट्यों………….उरझत जात ।” में कवि द्वारा मनुष्य को लोभ-मोह से दूर रहने की चेतावनी दी गई है। ‘हरिण’ को माध्यम बनाकर कवि ने सांसारिक माया-मोह में एक बार फंस जाने पर मनुष्य की दुर्गति का दयनीय दृश्य अंकित किया है। यह ऐसा जाल है जिससे छूटने की मनुष्य जितनी चेष्टा करता है, उतना ही यह उसे और कसता चला जाता है।

‘नीति’ को आलंकारिक और प्रतीकात्मक शैली में समझाने का सफल प्रयास कवि ने किया है।

प्रश्न 3.
पाठ्यपुस्तक में संकलित दोहों के आधार पर कवि बिहारी के शृंगार-वर्णन की विशेषताओं का परिचय दीजिए।
उत्तर:
संकलित दोहों में से अधिकांश, बिहारी लाल के श्रृंगार रस वर्णन का परिचय कराते हैं। शृंगाररस रीतिकालीन कवियों का सर्वाधिक प्रिय विषय रहा है। कवि बिहारीलाल भी श्रृंगार रस वर्ण में पारंगत है। श्रृंगार रस के सभी प्रमुख अंग संकलित दोहों में विद्यमान हैं। रूप वर्णन, प्रेम प्रदर्शन, संयोग को आनंद, वियोग की वेदना, अनुभाव योजना, प्रेम की सरस खिलवाड़ आदि शृंगार की सारी सामग्री इन दोहों में उपस्थित है।

नायक – नायिका के रूप-सौंदर्य वर्णन के प्रसंग में कवि ने अलंकारों और चमत्कार पूर्ण कथनों का पूरा सहयोग लिया है। श्रीकृष्ण के पीताम्बर-सुशोभित श्याम शरीर को कवि ने नीलमणि पर प्रात:काल की धूप बताया है। (सोहत ओढ़े…………….पर्यो प्रभात ।।) राधा या नायिकाओं के सौन्दर्य वर्णन में कवि की विशेष रुचि है। राधा के शरीर की झलक मात्र का कमाल कवि दिखाता है। ‘झीने पट’ से झाँकती नायिका के शरीर की भक्ति का वर्णन, बिंदी लगाने पर नायिका की सुंदरता का अगणित गुना निखार कनक के आभूषणों का नायिका के कनकवर्ण शरीर से एक रूप हो जाना, दीपशिखा सी देह वाली नायिका का घर दिया बुझा देने पर भी प्रकाश से जगमगाना आदि रूप वर्णन की विशेषताओं से युक्त है। रूप वर्णन में कवि ने अतिशयोक्ति का भरपूर प्रयोग किया है।

इसके अतिरिक्त मुरली छिपाने में प्रेम भरी खिलवाड़, “कहत नटत, रीझन खिझत” में अनुभाव सौन्दर्य, “कहिहै सब तेरौ हियौ’ में विरह वेदना आदि का हृदय स्पर्शी चित्रण है।

इस प्रकार संकलित दोहे कवि बिहारी के श्रृंगार वर्णन की सभी प्रमुख विशेषताओं से परिचित कराते हैं।

प्रश्न 4.
कवि बिहारीलाल को ‘गागर में सागर’ भरने वाला कहा जाता है। संचालित दोहों के आधार पर इस कथन पर आप अपना मत लिखिए।
उत्तर:
‘गागर में सागर भरना’ एक मुहावरा है। इसका अर्थ है थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कहने की कला । कवि बिहारी ने अपनी काव्य-रचना के लिए छोटे से छंद दोहा को चुना है। दो पंक्तियों में वह इतना भाव सौन्दर्य, अलंकरण और कथन की विचित्रता भर देते हैं कि पाठक मुग्ध हो जाता है।

संकलित दोहों में अनेक दोहे बिहारी के इस गुण को प्रमाणित करते हैं।“अर्जी तयौना……… मुकुतन के संग ॥” दोहे में कवि ने विराधोभास का चमत्कर प्रदर्शित करते हुए, अनेक विषयों को नीति-कथन का लक्ष्य बनाया है। साधारण अर्थ है कि निरंतर एक ही रंग (स्वर्ण वर्ण) में रहते हुए तरयौना कान में ही पड़ा हुआ है जबकि मोतियों से युक्त होकर बेसर नाक पर स्थान पा गई है। यहाँ कवि ने ‘कान’ की उपेक्षा ‘नाक’ को श्रेष्ठ-सम्मान का प्रतीक-बताया है। अन्य अर्थों में वेद-अध्ययन की अपेक्षा महापुरूषों की संगति को उद्धर का श्रेष्ठ साधन बताया गया है। इसके अतिरिक्त कवि ने राजदरबारों में व्याप्त आपसी कांट-छांट के वातावरण को भी प्रकाशित किया है। ‘श्रुति सेवन’ का अर्थ कान भरना -चुगली करना-और ‘नाकवास’ को सम्मान का स्थन बताते हुए ‘तटस्थ और निष्पक्ष’ व्यवहार भी महत्ता सिद्ध की है।

ऐसे ही अन्य दोहे हैं-“कौ छुटयौ……… उरझत जात ॥” “कहत नटत…….सौं बात’ ।। तथा “कागद पर …………मेरे हिय की बात ।” आदि है।

प्रश्न 5.
अपनी पाठ्यपुस्तक में संकलित दोहों के आधार पर कवि बिहारी लाल द्वारा बात को विचित्र रूप में कहने की कुशलता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
अपनी बात को कुछ अनोखे ढंग से कहना कवि की लोकप्रियता को बढ़ाने में काफी योगदान करता है। इसे ‘उक्ति-वैचिव्य’ भी कहा जाता है। इस गुण को दर्शाने वाले कई दोहे हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित है।

“बंधु भए ……………….झूठे विरद कहाई॥” दोहे में कवि ने लक्ष्या शब्द शक्ति का उपयोग करते हुए, भगवान से विचित्र ढंग से अपने उद्धार की प्रार्थना की है। रघुराइ (राम) ने अनेकों पतितों का उद्धार किया है किन्तु कवि ने उन्हें चुनौती दे डाली है। वह कहनी चाहता है कि जब उस जैसे पापी का उद्धार राम ने नहीं किया तो उनका पतित-पावन कहे जाना झूठा है। इस प्रकार कवि ने भगवान राम से सीधे-सीधे अपने उद्धार की प्रार्थना न करके विचित्र ढंग अपनाया है।

इसी प्रकार “कब कौ टेरतु………..जगबाइ ।’ दोहा भी बिहारी की ‘वचन-वक्रता’ का सुंदर नमूना है। वह कहते हैं–“हे जगत् गुरु! हे जग नायक लगता है आप को भी संसार की हवा लग गई है।” कवि ने सांसारक प्रभुओं के दोनों के प्रति उपेक्षा पूर्ण व्यवहार के उजागर करने के साथ, ही एक कुशल वकील की तरह, अपने उद्धार की दलील पेश की है।

इसी प्रकार “लिखन बैठि………..चितेरे कूर॥” “कहत सबै…………बढ़त उदोतु ॥” आदि दोहे भी कवि की कथन कुशलता को दर्शा रहे हैं।

प्रश्न 6.
बिहारी के श्रृंगार रस के दोहों की विशेषता पाठ्यपुस्तक में संकलित दोहों के आधार पर बताइए।
उत्तर:
शृंगार रस के दो दोहों की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाये।
सौंह करै भौंहनु हसै, दैन कहै नटि जाय।।

इस दोहे में नायिका या गोपी द्वारा श्रीकृष्ण से बाते करने के लालच से उनकी मुरली छिपा दी है। स्पष्ट है कि नायिका श्रीकृष्ण से प्रेम करती है। दोहा इस प्रेम व्यापार को बड़े रोचक ढंग से प्रस्तुत कर रहा है। यहाँ श्रृंगार रस के आलम्बन श्रीकृष्ण हैं। नायिका की प्रेममयी चेष्टाएँ अनुभाव है। सौगंध खाना, होंठों से हँसना, माँगने पर मुकर जाना आदि ऐसी ही चेष्टाएँ हैं। अतः कवि ने संयोग शृंगार । रस के सभी अंगों को रोचक ढंग से प्रस्तुत करके श्रृंगार रस वर्णन में अपनी कुशलता का परिचय दिया है।

(2) कागद पर लिखत न बनत, कहत संदेसु लजात।
कहि हैं सब तेरौ हियौ, मेरे हिय की बाते ।।

इस दोहे में नायिका अपने हृदय का प्रेम नायक पर व्यक्त करना चाहती है। अपनी बात वह कागज पर लिख पाने में असमर्थ है। और मुँह से कहने में उसे लज्जा आ रही है। अत: वह सोच कर मन को धीरज बँधा रही है कि यदि नायक उस से सच्चा प्रेम करता है तो उसके मन की बात को वह अपने मन में अवश्य अनुभव कर लेगी। सच्चे प्रेमभाव को लेख या वाणी से प्रकट करने की आवश्यकता नहीं होती। उसे तो दोनों पक्ष सहज ही अपने हृदयों में अनुभव कर लिया करते हैं। नायिका की सरल हृदयता ही इसे प्रेम-प्रसंग की विशेषता है।’

बिहारी कवि परिचय

रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि बिहारी लाल का जन्म सन् 1595 ई. में ग्वालियर के बसुआ नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम केशव राय बताया जाता है। ये आमेर के राजा मिर्जा जयसिंह के दरबारी कवि थे। बिहारी ने नववधू के प्रेमपाश में जकड़े राजा जयसिंह को अपने एक दोहे के द्वारा मोह मुक्त किया था नहिं पराग, नहिं मधुर मधु, नहिं विकास यह काल अली कली ही सों बिंध्यों आगे कौन हबाल इस दोहे ने राजा की आँखें खोल दीं। उन्होंने बिहारी की कार्य-कुशलता को पहचाना और उन्हें अपनी राजसभा में सम्मानित स्थाने प्रदान किया।

कवि बिहारी को गागर में सागर भरने वाला कहा जाता है। दोहे जैसे छोटे छंद की गागर में रस, अलंकार, विशद अनुभव, कल्पना वैभव और भाव विभूति का सागर भरकर, बिहारी काव्य जगत में अमर हो गए हैं। कवि ने नीति, श्रृंगार और भक्ति आदि विविध विषयों को अपनी कविता का विषय बनाया है। अर्थ की गंभीरता, सटीक शब्दावली का प्रयोग, अलंकारों की सज्जा, रसों की सरलता आदि आपके काव्य के विशिष्ट गुण हैं।

बिहारी पाठ-परिचय

भक्ति, नीति एवं श्रृंगार के दोहे पाठ्यपुस्तक में बिहारी सतसई से संकलित दोहों में कवि बिहारी के भक्ति, नीति और श्रृंगारपरक दोहों को प्रस्तुत किया गया है। राधा की स्तुति के साथ इन रचनाओं का प्रारंभ हुआ है। कवि चतुर राधा से अपनी सांसारिक बाधाएँ दूर करने का अनुरोध कर रहा है। राधा मनमोहन के हृदय में निवास करती हैं अत: राधा को मना लेने पर मनमोहन स्वयं ही प्रसन्न हो जाते हैं। कवि अपने इष्ट श्रीकृष्ण के। साथ ही रघुराय, श्रीराम का भी स्मरण कर रहा है। श्रीकृष्ण को उलाहना दे रहा है कि वह उसकी पुकार नहीं सुन रहे हैं। श्रीकृष्ण के श्याम रंग की महत्ता बताते हुए उनके भजन में मन लगाने की प्रेरणा भी कवि दे रहा है। इसके अतिरिक्त गोपियों और कृष्ण के हास परिहास, नायिका के अद्भुत सौन्दर्य, नायक-नायिका द्वारा नयनों में बातें करना आदि विषयों पर कवि के दोहे इस संकलन में उपस्थित हैं।

संकलित दोहों की सप्रसंग व्याख्याएँ।

(1) मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ।
जा तन की झांई परे, श्याम हरित दुति होई॥

कठिन शब्दार्थ- भव बाधा = सांसारिक बाधाएँ या कष्ट। हरौ = दूर कर दो। नागरि = चतुर। सोइ = वही। जा तर = जिनके शरीर। झाँई = झलक (छाया)। परे = पड़ने से। श्याम = श्रीकृष्ण, पाप। हरित दुति = हरी कांति वाले, प्रभावहीन, प्रसन्न। : = जाते हैं।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि बिहारी के दोहों से लिया गया है। कवि ने आलंकारिक भाषा में राधाजी की स्तुति की है।

व्याख्या-कवि बिहारी कहते हैं कि वे राधा उनके सांसारिक कष्टों को दूर करें जिनके सुंदर स्वरूप की झलक मात्र पड़ने से अथवा देखने से श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं।

(श्लेष अलंकार के अनुसार अन्य अर्थ) वे चतुर राधा मेरी भव बाधाएँ दूर करें जिनकी झलकमात्र पड़ने से श्याम(पाप) प्रभावहीन हो जाते हैं। अथवा जिनके शरीर की सुनहरी कान्ति पड़ने से श्रीकृष्ण के शरीर की नीली कान्ति हरे रंग की हो जाती है।

विशेष-
(i) कवि ने राधा की स्तुति के साथ-साथ अपनी आलंकारिक शब्दावली से अर्थ में चमत्कार भी उत्पन्न किया है।
(ii) समर्थ ब्रजभाषा का प्रयोग है।
(iii) वर्णन-शैली आलंकारिक और चमत्कार प्रदर्शन युक्त है।
(iv) ‘श्याम’ तथा ‘हरित दुति’ में श्लेष अलंकार है।

(2) तो पर वारी उरबसी, सुनि राधिके सुजान।
तू मोहन के उरबसी, वै उरबसी समान।

कठिन शब्दार्थ-तो पर – तुझ पर। बारौं = न्यौछावर करता हूँ। उरबसी = उर्वशी, एक अति सुन्दर मानी गई अप्सरा। सुजान = चतुर। मोहन = श्रीकृष्ण, मोहित करने वाले। उरबसी = हृदय में बसी हुई है। हवै = होकर। उरबसी = उर्वशी अप्सरा के समान अथवा मन को वश में करने वाली बनकर॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि बिहारी के दोहों से लिया गया है। इस दोहे में कवि ने यमक अलंकार का चमत्कार प्रदर्शित करते हुए राधाजी के सौन्दर्य और श्रीकृष्ण पर उनके प्रभाव का वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि बिहारी कहते हैं- हे चतुर राधिका जी! मैं आपके सौन्दर्य पर परम सुन्दर मानी जाने वाली अप्सरा, उर्वशी को भी न्यौछावर कर सकता हूँ। आप सभी का मन मोहने वाले श्रीकृष्ण के मन में उनके मन को भी मोह लेने वाली बनकर अथवा अप्सरा उर्वशी के समान होकर बस गई हो।

विशेष-
(i) दोहे में कवि ने राधा की स्तुति की है, किन्तु इस दोहे में भक्ति भावना से अधिक कवि ने अपने आलंकारिक कौशल को दिखाने की चेष्टा की है।
(ii) उरबंसी शब्द द्वारा यमक अलंकार का चमत्कार कवि ने दिखाया है।
(iii) प्रथम ‘उरबसी’ शब्द का अर्थ ‘उर्वशी अप्सरा’ है। दूसरे ‘उरबसी’ शब्द का अर्थ है-हृदय में बसी हुई तथा तीसरे ‘उरबसी’ शब्द का अर्थ उर्वशी और हृदय को वश में कर लेने वाली है। इस प्रकार इस शब्द में यमक अलंकार है।
(iv) कवि ने भाषी पर अपने असाधारण अधिकार का परिचय कराया है।
(v) प्रस्तुतीकरण की शैली आलंकारिक तथा चमत्कार प्रदर्शन की है।

(3) बंधु भए का दीन के, को तार्यौ रधुराई॥
तूठे-तूठे फिरत हौ, झूठे बिरद कहाई॥

कठिन शब्दार्थ-बंधु = भाई, सहायक। दीन = दुखी, असहाय। को = कौन। तायौ = उद्धार किया है। रघुराइ = भगवान राम। तूठे-तूठे = बड़े संतुष्ट या प्रसन्न। फिरत हौ = घूमते हो। बिरद = यश, प्रशंसा। कहाइ = कहलवाकर।

संदर्भ तथा प्रसंग- इस दोहे में कवि स्वयं को महान दीन और सबसे बड़ा पापी मानकर भगवान राम को उलाहना और चुनौती दे रहा है कि वह उसे तार कर दिखाएँ।

व्याख्या-कवि कहती है- हे रघुपति ! आप दीन बन्धु कहलाते हो, पतितोद्धारक कहे जाते हो। आप अपनी प्रशंसा सुन-सुन कर बड़े इतराते फिर रहे हो। सच तो यह है कि आपको अभी तक मुझ जैसे दीन और पापी से पाला नहीं पड़ा है। छोटे-छोटे दोनों और पतितों का उद्धार करके, झूठी प्रशंसा से संतुष्ट हो रहे हो। यदि मेरा उद्धार कर दो तो मैं मान लूंगा कि आप वास्तव में दीनबन्धु और पत्ति पावन हैं।

विशेष-
(i) कवि ने अपनी कथन की चतुराई से भगवान को अपना उद्धार करने की चुनौती दे डाली है। कवि चाहता है कि। भगवान उसकी चुनौती से उत्तेजित होकर उसको उद्धार कर दें और सहज ही उसका काम बन जाय।
(ii) भाषा-शैली कवि की प्रौढ़ काव्यकला का परिचय कराती है।
(iii) तूठे-तूठे’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

(4) कब को टेरतु दीन रट, होत ने स्याम सहाय।
तुमहूँ लागी जगत गुरु, जग नायक जग बाइ॥

कठिन शब्दार्थ–कब कौ = कितने अधिक समय से। टेरतु = पुकार रहा हूँ। दीन-रट = दीनता भरी वाणी में। सहाय = सहायक, कृपालु। तुमहू = आपको भी। जगत्-गुरु = सारे जगत के पूज्य। जग-नायक = जगत के मार्गदर्शक, स्वामी। जग-बाइ = संसार की हवा, सांसारिक प्रभाव।

संदर्भ तथा प्रसंग- प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि बिहारी के दोहों से लिया गया है। कवि अपने प्रभु की उपेक्षा से आहत है। वह उसकी दीनता भरी पुकार को नहीं सुन रहे हैं।

व्याख्या-कवि कहता है-हे प्रभु! मैं कब से दीनता भरी पुकार से आपको अपनी सहायता के लिए पुकार रहा हूँ पर आप मेरी दीन-पुकार को अनसुनी किए जा रहे हैं। हे श्याम ! हे जगत पूज्य! हे जगन्नायक! कहीं ऐसा तो नहीं कि आप को भी सांसारिक हवी लग गई हो। आपने भी सांसारिक गुरुओं और नायकों के समान दोनों की अपेक्षा करना आरम्भ कर दिया हो। यदि ऐसा न होता तो मेरी करुण पुकार सुनकर आप मेरी सहायता करने अवश्य आते।

विशेष-
(i) कवि ने अपने इष्ट श्रीकृष्ण को द्रवित करने के लिए चतुराई भरे तर्कों का सहारा लिया है।
(ii) भाषा लक्षणाशक्ति और वचन वक्रता से प्रभावशाली बनाई गई है।
(iii) कथन शैली उपालम्भ तथा व्यंग्यपूर्ण है।
(iv) कवि ने सखा भाव की भक्ति द्वारा अपने इष्ट को रिझाया है।

(5) या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोई।
ज्यों-ज्यों बूडै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होइ॥

कठिन शब्दार्थ-या = इस। अनुरागी = प्रेमी, रँगे जाने की इच्छा वाला। चित्त = मन। गति = स्वभावे, व्यवहार। समुझै = समझ पाना। कोइ = कोई भी। ज्यों-ज्यों = जैसे-जैसे। बूड़े = डूबता है, इँगता है। स्याम रंग = काला रंग, श्रीकृष्ण से प्रेम। त्यों-त्यों = उतना ही। उज्जलु = उजला, स्वच्छ। होय = होता जाता है।

संदर्भ तथा प्रसंग- प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि बिहारी लाल के दोहों से उधृत है। कवि इस दोहे में प्रेमी मन के विचित्र व्यवहार को प्रस्तुत कर रहा है।

व्याख्या-कवि बिहारी कहते हैं-श्रीकृष्ण के प्रेम रंग में रंगे हुए इस मन का व्यवहार बड़ा विचित्र है। यह जितना-जितना श्याम रंग में डूबता है, उतना-उतना ही उज्ज्वल होता चला जाता है।

विशेष-
(i) कवि ने विरोधाभास तथा श्लेष अलंकारों का उपयोग करते हुए अपने उक्ति-चमत्कार का परिचय कराया है।
(ii) चित्त अनुरागी अर्थात् रँगे जाने का इच्छुक है। प्रेमी है। इसके व्यवहार की विविधता यह है कि इसे ज्यों-ज्यों श्याम (काला) रंग में डुबोया जाता है, यह उतना ही काला होने के बजाय उजला होता जाता है।
(iii) विरोधी कथन का भाव यह है कि मन को जितना श्रीकृष्ण की प्रीति में लगाया जाता है वह उतना ही निर्मल, अवगुणों से मुक्त होता चला जाता है।
(iv) कवि का संदेश है कि मन को प्रेम में डुबोना है तो सांसारिक वस्तुओं में नहीं श्याम के श्याम रंग में डुबाओ। इसी में कल्याण
(v) दोहे में “ज्यों ज्यों ………………….. उज्जलु होय॥ में विरोधाभास अलंकार तथा ‘अनुरागी’ और ‘स्याम रँग’ में श्लेष अलंकार है।

(6) भजन कह्यौ तातें भज्यौ, भज्यौ ने एक बार।
दूरि भजन जातें कयौ, सो नैं भज्यौ गॅवार॥

कठिन शब्दार्थ-भजन = स्मरण करना, भजना। तासौं = उससे। भज्यो = दूर भागा। भज्यौ न = भजन नहीं किया। एक बार = एक बार भी। दूरि भजन = दूर भागना। सो = वह, उसे। तें = तूने। भज्यौ = स्मरण किया, अपनाया। आँवार = मूर्ख, नासमझ॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि बिहारी रचित दोहों से लिया गया है। कवि ने श्लेष का प्रयोग करते हुए अपना अलंकार-प्रेम और भक्ति चमत्कार प्रदर्शित किया है।

व्याख्या-बिहारी अपने मन अथवा भगवान के भेजने से विमुख गॅवार लोगों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं- अरे ! नादान ! हमने तुमसे जिसका भजन करने, स्मरण करने या अपनाने को कहा था। उस प्रभु स्मरण से तो तू दूर भागता रहा। तूने जीवन में एक बार भी उस प्रभु की भजन नहीं किया और जिन सांसारिक विषयों से दूर भागने को कहा, तृने उन्हीं का सेवन किया, उन्हीं में डूबा रहा। पिर तेरी उद्धार कैसे हो सकता है॥

विशेष-
(i) प्रभु-स्मरण से ही मनुष्य का कल्याण हो सकता है, इसे सहज संदेश को कवि बिहारी ने यमक के चमत्कार में सजाकर अलंकारप्रेमियों को आनंदित किया है।
(ii) कवि के अनुसार सांसारिक सुख-भोगों में आनन्द खोजने वाले और ईश्वर के भजन से विमुख लोगों को राँवार माना है।
(iii) कवि बिहारी के भाषा-शैली के खिलबाड़ का यह दोहा अच्छा उदाहरण है।
(iv) ‘भजन’ तथा ‘भज्यौ’ शब्दों में यमक अलंकार है। भजन = भागो मत तथा स्मरण करना, दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। इसी प्रकार ‘भज्यौ’ भी भागा और भजन करना या अपनाया जाना अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। अत: यमक अलंकार है।

(7) अजौ तरुयौना ही रहयौ, श्रुति सेवत इक रंग।
नाकवास बेसरि लयौ, बसि मुकुतन के संग॥

कठिन शब्दार्थ- अजौ = अब भी, अब तक। तयौना = कानों का एक पुराना आभूषण, (अन्य अर्थ) तेरे नहीं सका। श्रुति = धान, वेद। सेवत = सेवा करना, शोभा बढ़ाना, अध्ययन करना। इक रंग = एक रंग में, निरंतर। नाक बास = नाक पर निवास या पहनी जाना, स्वर्ग प्राप्ति। बेसरि = नांक का आभूषण, सामान्य, अविश्वनीय। लयौ = प्राप्त कर लिया। बसि = रहकर। मुकुतन = मोतियों, मुक्त पुरुषों, निष्पक्ष लोग।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि बिहारी लाल रचित दोहों से लिया गया है। इस दोहे में कवि ने श्लेष अलंकार के माध्यम से सत्संग की महिमा दिखाई है तथा राजदरबारों में व्याप्त गुटबंदियों और चुगली की प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया है।

व्याख्या-सामान्य अर्थकवि कानों में पहने जाने वाले आभूषण’तयौना’ को संबोधित करते हुए कहता है-अरे तयौना ते एक ही रंग (स्वर्ण-रंग) में रहने के कारण कोई प्रगति नहीं कर पाया। आज तक कानों में ही पहना जा रहा है। जबकि मोतियों को साथ में लेने के कारण ब्रेसर (नाक के आभूषण) ने व्यक्ति के सम्मान की प्रतीक ‘नाक’ पर स्थान पा लिया है।

श्लेष से अन्य अर्थ-हे एक निष्ठभाव से वेद-शास्त्रों का अध्ययन करने वाले। तू अभी तक अपना उद्धार नहीं कर पाया, जब कि पुक्त पुरुषों की संगति करके, सामान्य जन भी स्वर्ग के भागी हो गए।

एक अन्य अर्थ-कवि राजदरबारों में चलने वाले कुटिल व्यवहारों पर व्यंग्य करते हुए कहता है-अरे निरंतर राजा के कान भरने वाले ! तेरी अभी तक दरबार में कोई उन्नति नहीं हो पाई। जबकि दरबार के निष्पक्ष लोगों का संग करने वाले राज की नाक बन गए। राजा उन पर गर्व करने लगा है॥

विशेष-
(i) कवि की अलंकार-प्रियता और चमत्कार प्रदर्शन की लालसा, इस दोहे में प्रत्यक्ष हो रही है।
(ii) बिहारी गागर में सागर भरने वाले कवि कहे जाते हैं। दोहे की इस छोटी-सी गागर में कवि ने वास्तव में अर्थ-वैभव का सागर भर दिया है।
(iii) राजसभाओं की संकृति का कवि ने निकट से निरीक्षण किया था। अत: उसके उपर्युक्त व्यंग्य वचन बड़े सटीक बन पड़े हैं।
(iv) ‘तयौना’, ‘श्रुति’, ‘सेवत’, ‘इकरंग’, ‘नाक’, ‘बेसरि’ तथा ‘मुकुतन’ में श्लेष अलंकार का प्रयोग हुआ है।
(v) कवि बिहारी के काव्य कौशल का पूर्ण वैभव इस दोहे में प्रकाशित हो रहा है।

(8) सधन कुंज छाया सुखद सीतल सुरभि समीर।
मनु वै जातु अजौं वहै, उहि जमुना के तीर।

कठिन शब्दार्थ-सघन = घनी। सुखद = सुखदायिनी। सीतल = ठंडी। सुरभि = सुगंध। समीर = वायु। वैजातु = हो जाता है। वहै = वही, कृष्ण के समय जैसा प्रसन्न। उहि = उस। तीर = तट।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि बिहारी के दोहों से लिया गया है। बिहारी कृष्ण भक्त कवि हैं। कवि ने इस दोहे में श्रीकृष्ण की बिहार भूमि-यमुना तट के सुखदायी वातावरण का वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि बिहारी कहते हैं-जिस यमुना के तटों पर कुंजों की सुखदायिनी छाया है और जहाँ पुष्पों की मधुर गंध से युक्त शीतल पवन चलती है, उसे यमुना तट पर पहुँचने पर आज भी व्यक्ति का मन उसी आनन्ददायी समय में जा पहुँचता है जब वहाँ श्रीकृष्ण नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ और रासलीलाएँ किया करते थे।

विशेष-
(i) बिहारी लाल के समय तक यमुना तट का वातावरण अवश्य ही आनंददायक और कृष्ण-प्रेम उपजाने वाला रहा होगा। आज तो न कुंजें हैं, न सुगंधित समीर है। प्रदूषण के कारण बेचारी यमुना स्वयं ही बड़ी अधीर है॥
(ii) सहज, सजीव और स्वाभाविक प्रकृति चित्रण है।
(iii) भाषा सरस और शैली मनोहरता जगाने वाली है।
(iv) “सुखद, सीतल, सुरभि, समीर” में अनुप्रास की छटा है।

(9) सोहत ओढ़ें पीत पटु, स्याम सलौनें गात।
मनौ नीलमनि सैल पर, आतप पर्यौ प्रभात॥

कठिन शब्दार्थ-सोहत = शोभा पाते हैं। ओढ़े = ओढ़कर, धारण करके। पीत पटु = पीताम्बर, पीला वस्त्र। स्याम = श्रीकृष्ण। सलौने = लावण्य मय, आकर्षक। गात = शरीर। मनौ = मानो। नीलमनि = नीलम नामक रत्न। सैल = शिला, पर्वत। आतप = धूप। परयौ = पड़ रही हो। प्रभात = प्रातः काल॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहो हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि बिहारी के दोहों से लिया गया है। इस दोहे में कवि पीताम्बर धारी कृष्ण के श्याम शरीर में प्रात:कालीन धूप की संभावना
व्यक्त कर रहा है।

व्याख्या-बिहारी कहते हैं-अपने श्यामल शरीर पर पीताम्बर धारण किए हुए श्रीकृष्ण ऐसे लगते हैं, मानो किसी नीलम की शिला पर प्रात:काल की पीली धूप पड़ रही हो।

विशेष-
(i) कवि ने श्रीकृष्ण के पीताम्बर से सुशोभित श्याम वर्ण शरीर की शोभा का वर्णन सटीक उत्प्रेक्षा के द्वारा किया है।
(ii) अपनी कल्पना शक्ति और सटीक उपमानों का चयन करके कवि ने काव्य-प्रेमी पाठकों के मन में मनमोहन की चित्ताकर्षक छवि साकार कर दी है।
(iii) भाषा के प्रयोग में कवि की कुशलता और शब्द-चित्र साकार करने वाली वर्णन शैली का, सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत हुआ है।
(iv) दोहे में उत्प्रेक्षा (‘मनों ………………. पर्यो प्रभात) तथा ‘पीत-पट’, ‘स्याम सलौने’ तथा ‘आतप पयौ प्रभात में अनुप्रास अलंकार है।

(10) इहीं आसे अटक्यौ रहतु, अलि गुलाब के मूल।
वै है फेरि बसंत ऋतु, इन डारनु वै फूल॥

कठिन शब्दार्थ-इही = इसी। आस = आशा। अटक्यौ = अटका हुआ, ठहरा हुआ। अलि = भौंरा, मूल = जड़। हवै है = होंगे। फेरि = फिर से। डान्नु = डालियों पर। वै = वे ही।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक से संकलित कवि बिहारी के दोहों से उद्धृत है। कवि ने अन्योक्ति के माध्यम से प्रतीक्षा और आशा के मोह जाल में फँसे मनुष्यों पर व्यंग्य किया है।

व्याख्या-कवि कहता है-ग्रीष्म ऋतु आने पर गुलाब के पौधे पर खिलने वाले सुंदर और सुगंधित फूल अदृश्य हो गए। केवल बिना पत्तों वाली कँटीली डालिया रह गई हैं, किन्तु फिर भी भौंरा इस आशा में गुलाब की जड़े पर अटका पड़ा है कि फिर से वसंत ऋतु आने पर इन डालियों पर पहले जैसे ही सुंदर फूल खिलेंगे।

अन्योक्ति के अनुसार कवि ने उने व्यक्तियों पर व्यंग्य किया है, जो सुख-साधनों के छिन जाने या नष्ट हो जाने पर भी इसी आशा और प्रतीक्षा में फंसे रहते हैं कि अनुकूल समय फिर आएगा और उन्हें फिर उन्हीं सुख-साधनों को भोगने का अवसर मिलेगा।

विशेष-
(i) कवि बिहारी लाल की अन्योक्तियाँ बहुत लोकप्रिय रही हैं। प्रस्तुत दोहा उनके इसी काव्य-कौशल का एक नमूना है।
(ii) कवि ने ‘आशा के दास’ लोगों की दयनीय दशा पर खेद भी व्यक्त किया है।
(iii) भाषा सरल किन्तु अर्थ-वैभव से परिपूर्ण है।
(iv) शैली प्रतीक्षाव्यर्थ और अन्योक्तिपरक है।

(11) को छूट्यौ इहि जाल परि, कत कुरंग अकुलात।
ज्यौं-ज्यौं सुरझि भज्यौ चहत, त्यौं त्यौं उरझत जात॥

कठिन शब्दार्थ-छूट्यौ = छूटा है, मुक्त हुआ है। इहि = इस। जाले = सांसारिक मोह बंधन। कत = क्यों। कुरंग = हरिण। अकुलात = छटपटाता है। सुरझि = सुलझ कर। भज्यौ चहत = भागना चाहता है। त्य-त्यौं = उतना ही। उरझत जात = उलझता जाता

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि बिहारी लाल के दोहों से लिया गया है। कवि सांसारिक विषयों में लिप्त लोगों की दशा पर खेद व्यक्त करते हुए, उन पर व्यंग्य कर रहा है कि इन विषयों के जाल में जो एक बार हँस गया, उसका इनसे छूट पाना बड़ा कठिन होता है।

व्याख्या-कवि सांसारिक बन्धनों में जकड़े हुए लोगों को संबोधित करते हुए कह रहा है-अरे बावले हरिण। तू जिस जाल में फंस गया है उससे आज तक कौन छूट पाया है। तू व्यर्थ छटपटा रहा है। इस जाल में जो जीव एक बार फँस जाता है, वह जितना-जितना छूटने का प्रयत्न करता है, उतनी ही और इसमें फंसता चला जाता है।

अन्योक्ति के अनुसार अर्थ है- अरे सांसारिक सुखभोगों के जाल में फंसे पड़े मनुष्य ! इन झूठे सुखों के जाल में फंस जाने पर, इनसे छूट पाना असम्भव हो जाता है। इनके दुखमय परिणामों से त्रस्त होकर, अब तू छूटने को छटपटा रहा है, तेरा यह प्रयास व्यर्थ है। तू जितना ही इनसे छूटने का प्रयत्न करेगा, ये तुझे उतना ही और उलझाते चले जाएँगे।

विशेष-
(i) कवि ने सांसारिक विषयों की असारता की ओर संकेत करते हुए, मनुष्यों को इनसे दूर रहने की चेतावनी दी है।
(ii) ‘जाल में फंसे हरिण’ की दशा से विषय-जाल में पड़े मनुष्यों की तुलना बड़ी सटीक है। हरिण जाल से छूटने के लिए जितछटपटाता है, जाल उसे उतना ही कसता चला जाता है।
(iii) कवि ने संकेत दिया है कि मनुष्य को संयमित जीवन बिताते हुए और भगवान पर आस्था रखते हुए जीवन बिताना चाहिए।
(iv) कवि माया पर अधिकार और प्रतीकात्मक शैली की कुशलता का परिचय कराया है।
(v) दोहे में अन्योक्ति, पुनरुक्ति तथा अनुप्रास का सही प्रयोग है।

(12) बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सौंह करै भौंहनु हँसै, दैन कहै नटि जाइ॥

कठिन शब्दार्थ-बतरस = बातें करने का आनंद। लाल = श्रीकृष्ण। मुरली = वंशी। धरी लुकाइ = छिपाकर रख दी। सौंह = सौगंध, कसम। भौंहन = भौंहों से। दैन कहै = देने की कहने पर। नटि जाइ = मना कर देती है।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि बिहारी लाल के दोहों से लिया गया है। इस दोहे में कवि ने कृष्ण और गोपियों के बीच चल रही सरस ठिठोली का मनोहरी चित्र अंकित किया है।

व्याख्या-गोपियाँ अपने परम प्रिय कृष्ण से बातें करने का अवसर खोजती रहती हैं। इसी बतरस (बातों के आनंद) को पाने के। प्रयास में उन्होंने कृष्ण की वंशी को छिपा दिया है। कृष्ण वंशी के खो जाने पर बड़े व्याकुल हैं।

वे गोपियों से वंशी के बारे में पूछते हैं तो गोपियाँ (झूठी) सौगंध खाकर कहती हैं कि उन्हें वंशी के बारे में कुछ पता नहीं। साथ ही वे भौंहों के संकेतों में मुसकराती भी जाती हैं कृष्ण को लगता है। कि वंशी इन्हीं के पास है।

किन्तु जब वह वंशी लौटाने को कहते हैं तो गोपियाँ साफ मना कर देती हैं।

विशेष-
(i) कृष्ण और गोपियों के इस सरस परिहास द्वारा, कवि ने संयोग श्रृंगार का सजीव शब्द-चित्र प्रस्तुत कर दिया है।
(ii) श्रृंगार रस के भाव-अनुभावों का मनोहारी चित्रण हुआ है।
(iii) ‘गागर में सागर’ भरने की बिहारी लाल की दक्षता प्रमाणित हो रही है।
(iv) अनुप्रास अलंकार को भी स्पर्श है।

(13) नाचि अचानक ही उठे, बिनु पावस बन मोर।
जानति हौं नंदित करी, यह दिसि नंदकिसोर॥

कठिन-शब्दार्थ-नाचि= नाचना। बिनु= बिना। पावस= वर्षा ऋतु। = मैं। नंदित= आनंदित। दिसि= दिशा। नंदकिशोर = श्रीकृष्ण।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि बिहारी के दोहों से लिया गया है। इस दोहे में कवि ने अप्रत्यक्ष रूप से कृष्ण के ‘घनश्याम’ नाम की सार्थकता का परिचय कराया है।

व्याख्या-ग्रीष्म ऋतु में भी अचानक वन में मोरों की ध्वनि को सुनकर कोई गोपी कहती है–

वनों में ये मोर बिना ही वर्षा ऋतु आए नाच उठे हैं। इससे मुझे अनुमान होता है कि घनतुल्य श्याम शरीर वाले नंद नंदन ने इस दिशा को अपने आगमन से आनंदित कर दिया है। भाव यह है कि श्रीकृष्ण के घनश्याम (बादलों के समान साँवले) शरीर को देखकर, मोरों को यह भ्रम हो गया है कि वर्षा ऋतु आ गई और वे मगन होकर नाचने लगे हैं।

विशेष-
(i) कवि बिहारी अलंकारों के प्रयोग में बड़े दक्ष हैं। इसी का प्रभाव यह दोहा दे रहा है।
(ii) ‘नंदित’ तथा ‘नंद किशोर’ शब्दों का साथ-साथ प्रयोग, कृष्ण के नंद किशोर’ नाम को सार्थक कर रहा है।
(iii) कवि ने उत्प्रेक्षा और भ्रान्तिमान अलंकारों का रोचक प्रयोग किया है।
(iv) गोपी की मनोभावनाएँ भी पाठकों को आनंदित कर रही है।

(14)लिखन बैठि जाकी छबी, गहि-गहि गरब गरूर।
भए न केते जगत के, चतुर चितेरे कूर॥

कठिन-शब्दार्थ-लिखन बैठि = लिखने बैठे, चित्र बनाने को बैठे। जाकी = जिसकी। छबी = सुन्दरता। गहि-गहि = धारण कर-कर के। गरब = गर्व। गरूर = अहंकारे, घमंड। भए = हो गए। केते = कितने ही। चितेरे = चित्रकार। कूकू = मूर्ख, असफल।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि बिहारी रचित दोहों से लिया गया है। इस दोहे में कवि किसी नायिका की क्षण-क्षण में बदल जाने वाली छवि का अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन कर रहा है।

व्याख्या-कवि कहता है-इस अपूर्व सुंदरी नायिका की सौन्दर्य-छवि का चित्र बनाने के लिए, न जाने कितने गर्वीले और अहंकारी चित्रकार आए, परन्तु सब मूर्ख या असफल सिद्ध हो गए। भाव यह है कि इस रमणी की सुन्दरता की छवि, पल-पल बदलती रहती है। अत: चित्रकार चित्र बनाकर जैसे ही चित्र और उस सुंदरी का मिलान करता है, उसे भिन्नता दिखाई देती है। अत: उसका महान चित्रकार होने का गर्व और अहंकार चूर हो जाता है।

विशेष-
(i) सुंदरता की परिभाषा पुराने कवियों ने बताई है कि जो क्षण-क्षण में कुछ नई दिखाई पड़े, वही वास्तविक सुंदरता (रमणीयता) है। ‘कवि ने अपनी नायिका को इसी परिभाषा के अनुसार आदर्श सुंदरी सिद्ध किया है।
(ii) ‘गहि-गहि’ में पुनरुक्ति, ‘गहि-गहि गरब गरूर’ में अनुप्रास तथा पूरे दोहे के कथन में ‘अतिशयोक्ति अलंकार है।
(iii) लक्षणा शक्ति संपन्न भाषा और अतिशय प्रशंसापूर्ण शैली का प्रयोग हुआ है।

(15) झीनै पट में झुलमुली, झलकलि ओप अपार॥
सुरतरु की मनु सिंधु मैं, लसति सपल्लव डार॥

कठिन शब्दार्थ-झीने = महीन। पट = वस्त्रे। झुलमुली = कान का एक आभूषण जो हिलता हुआ झिलमिलाता है। झलकति = झलकती। ओप = चमक। अपार = अत्यन्त। सुरतरु = कल्पवृक्ष नामक वृक्ष जो सारी इच्छाएँ पूरी करने वाला माना जाता है। मनु -: मानो। सिंधु = समुद्र। लसति = शोभित होती। संपल्लव = पत्तों से युक्त। डार = डाली।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कवि बिहारी के दोहों में से लिया गया है। इस दोहे में कवि ने महीन वस्त्र धारण करने वाली एक नायिका द्वारा कानों में पहने गए झिलमिली नामक आभूषण का वर्णन किया है।

व्याख्या–कवि कहती है-इस नायिका द्वारा पहने गए, महीन वस्त्र में से झुलमुली’ नामक आभूषण की अपारं चमक झलक रही है। यह ऐसी लगती है मानो समुद्र के जल में कल्पवृक्ष की कोई पत्तों भरी डाली, हिलती हुई शोभा पा रही है।

अन्य अर्थ-झीने वस्त्रों में नायिका की झिलमिलाती छवि से अपार शोभा झलक रही है। ऐसा लगता है मानो समुद्र के जल में कल्पवृक्ष रूपी कोई पत्तों से भरी शाखा सुशोभित हो रही हो।

विशेष-
(i) झीने वस्त्र में से कोई भी चमकती और हिलती (झिलमिलाती) हुई वस्तु बड़ी सुन्दर लगा करती है। कवि ने इसी तथ्य को उत्प्रेक्षा के माध्यम से बड़े आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया है।
(ii) कहा जाता है कि स्वर्गस्थ वृक्ष ‘कल्पवृक्ष’ माँगने वाले की सारी इच्छाएँ पूरी करता है। नायिका भी प्रेमीजन की सारी इच्छाएँ पूर्ण करने वाली है, इसलिए उसे कल्पवृक्ष की डाली कहा गया है।
(iii)दोहे में ‘झुलमुली झलकति’ में अनुप्रास है तथा उपमेय ‘झुलमुली’ में कल्पवृक्ष की सपल्लव डार उपमान की सम्भावना प्रकट करने के कारण यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।
(iv)सामान्य पाठक के लिए कवि की इस कल्पना को समझकर आनन्दित हो पाना, तनिक कठिन प्रतीत होता है।

(16) कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
भरे भौन में करते हैं, नैननु, ही सौं बात॥

कठिन शब्दार्थ-कहत = कहते हैं। नटत = मना करते हैं। रीझत = खीज उठते हैं। मिलात = मिला लेते हैं। खिलत = गद-गद हो जाते, प्रसन्न हो जाते हैं। लजियात = लज्जित हो जाते हैं। भरे = लोगों से भरा हुआ। भौन = भवन। नैनन = नेत्रों से। स = से।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कवि बिहारी के दोहों में से लिया गया है। इस दोहे में कवि एक-दूसरे से आँखों-आँखों में बात करते, प्रसन्न होते, मिलते, खिलते और खीझते हुए दिखाए हैं।

व्याख्या-कवि कहते हैं, ये दोनों नायक और नायिका, लोगों से भरे हुए भवन में मुँह से कुछ न बोलकर, अपनी सभी भावनाएँ अपने नेत्रों के हाव-भावों द्वारा व्यक्त कर रहे हैं। कभी ये आँखों से बातें करते हुए तो कभी असहमति प्रकट करते प्रतीत होते हैं। कभी रीझते, कभी खीझने लगते हैं। कभी मिलते, कभी प्रसन्न और कभी लजाते हुए दिखाई देते हैं। ये सारे भाव और क्रियाएँ लोगों से भरे घर में ये अपने नेत्रों से ही प्रकट कर रहे हैं।

विशेष-
(i) नायक-नायिका अपनी प्रीति को सार्वजनिक नहीं होने देना चाहते हैं। अत: आँखों से ही अपने मनोभाव व्यक्त कर रहे हैं।
(ii) संयोग श्रृंगार रस में भीगे इस शब्द-चित्र द्वारा, कवि ने भाव-विभाव, अनुभाव और संचारी भाव आदि रस के सभी अंगों का सफल निर्वाह किया है।
(iii) अनुप्रास’ अलंकार को चमत्कार है।
(iv) भाषा और वर्णनशैली की प्रौढ़ता प्रत्यक्ष हो रही है।

(17) कागद पर लिखत न बनत, कहत सँदेसु लज़ात।
कहिहै सबु तेरौ हियौ, मेरे हिय की बात॥

कठिन शब्दार्थ-कागद = क़ागज। लिखत = लिखते। न बनत = नहीं हो पा रहा। लजात = लज्जा आती है। कहिहै = कहेगा। हियौ = हृदय॥

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कवि बिहारीलाल के दोहों से लिया गया है। इस दोहे में कवि ने, प्रेमी को अपनी मनोभावनाएँ बताने को आतुर एक प्रेमिका को प्रस्तुत किया है।

व्याख्या-नायिका नायक को अपने मन की बात बताना चाहती है। उसके सामने समस्या है कि वह अपनी बात अपने प्रिय तक कैसे पहुँचाए। वह कागज पर अपनी मनोभावनाओं को नहीं लिख पा रही है और मुँह से कहने में लज्जा बाधा बन जाती है। वह कहती है कि यदि हमारा प्रेम सच्चा है तो नायक का हृदय उसके हृदय की बात को स्वयं ही जान जाएगा।

विशेष-
(i) कवि ने इस दोहे के माध्यम से आदर्श प्रेम-भावना का स्वरूप प्रस्तुत किया है।
(ii) लगता है पत्र द्वारा अपनी बात न बता पाने का कारण है कि विरहिणी जब लिखने बैठती होगी तो आँखों से आँसू टपकने लगते होंगे। कागज घुल और गल जाता होगा।
(iii) दोहे में कवि के काव्य के भावपक्ष का मर्मस्पर्शी स्वरूप व्यक्त हुआ है।
(iv) सरल शब्दों में हृदय को छू लेने वाली भावनाएँ साकार हुई हैं।

(18) कहत सबै बेंदी दियै, अंकु दसगुनी होतु।
तिय लिलार बैंदी दियै, अगनितु बढ़त उदोतु॥

कठिन शब्दार्थ-सबै = सभी। बैंदी = स्त्रियों द्वारा मस्तक लगाए जाने वाली बिंदी। दिए = लगाए जाने पर। अंकु = संख्या। दस गुनौ = दस गुना। तिय-लिलार = स्त्री के मस्तक पर। अगनितु = अगनिनती, अत्यधिक। उदोतु = प्रकाश, शोभा।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कवि बिहारी के दोहों में से लिया गया है। कवि ने बिंदी (शून्य) के महत्त्व को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। व्याख्या-गणित के अनुसार किसी भी संख्या के आगे बिंदी अर्थात् शून्य लगाने पर उसको मूल्य दस गुना हो जाता है, परन्तु सौन्दर्य शास्त्र के नियम अलग हैं। कवि के अनुसार सुन्दर नारी के मस्तक पर बिंदी लगाए जाने पर उसकी सुन्दरता या शोभा अनगिनती बढ़ जाती है। यहाँ गणित का नियम काम नहीं करता।

विशेष-
(i) दोहे में कवि ने अपनी चमत्कारपूर्ण कथन की प्रवीणता का परिचय कराया है।
(ii) भाषा साहित्यिक है और कथन शैली वचन-वक्रता (कुछ नए ढंग से बात कहना) का सुन्दर नमूना है।

(19) डीठिन परतु समान-दुति, कनक-कनक से गात।
भूसन कर करकस लगत, परसि पिछाने जात॥

कठिन शब्दार्थ-डीठि = दृष्टि। न परन्तु = नहीं पड़ता। समान-दुति = एक जैसी दमक या कान्ति। कनक = सोना। गात = शरीर। भूषन = आभूषण, गहना। कर = हाथ। करकम = कठोर। परसि = छुए जाने पर। पिछाने = पहचाने/जान जाते हैं।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कवि बिहारी के दोहों में से लिया गया है। इस दोहे में कवि ने नायिका के शरीर की सुन्दरता या गौरवर्ण का कुछ नए ढंग से वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि बिहारी कहते हैं कि नायिका के गौरवर्ण शरीर पर सोने के गहने दिखाई नहीं पड़ते क्योंकि दोनों की दमक या कान्ति एक जैसी है। जब इसके शरीर को हाथ से स्पर्श किया जाता हैं तब सोने के आभूषण हाथों को कठोर लगते हैं। तभी पता चल पाता है कि नायिका ने शरीर पर सोने के आभूषण पहन रखे हैं।

विशेष-
(i) कवि ने नायिका के गौरवर्ण का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया है।
(ii) रीतिकालीन सौन्दर्य-वर्णन की छाप दोहे पर स्पष्ट है।
(iii) कनक-कनक में पुनरुक्ति तथा ‘कर करकस’ और ‘परसि पिछाने’ में अनुप्रास अलंकार है। ‘कनक से गात’ में उपमा अलंकार है।

(20) अंग-अंग नग जगमगत, दीपसिखी सी देह॥
दिया बढ़ाएँ हूँ रहै, बड़ौ उज्यारो गेह॥

कठिन शब्दार्थ-नग = रत्न। जगमगत = जगमगाते हैं। दीपसिखा = दीपक की लौ। देह = शरीर। दिया = दीपक। बढ़ाए हूँ। = बुझाने पर भी। उज्यारौ = प्रकाश। गेह = घर॥

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोही हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कवि बिहारी के दोहों में से लिया गया है। कवि ने नायिका (सुन्दर नारी) के शरीर के गोरेपन की तुलना दीपक की लौ से की है।

व्याख्या-कवि बिहारी कहते हैं, इस सुन्दरी के अंग-अंग में रत्नों से जटित आभूषण जगमगा रहे हैं और इसका शरीर दीपक की उज्ज्वल लौ के समान दमकता हुआ और गोरा है। इसलिए रात के दीपक बुझा देने पर भी घर में बड़ा उजाला बना रहता है।

विशेष-
(i) कवि ने नायिका के शरीर के गौर वर्ण का बड़ा बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन किया है।
(ii) कोई कितना गोरा हो लेकिन उसके शरीर से अँधेरे में उजाला हो जाए, यह बात गले उतरना कठिन है।
(iii)कवि की रचना पर रीतिकालीन अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन शैली का पूरा प्रभाव दिखाई देता है।
(iv) दोहे में पुनरुक्ति (अंग-अंग), अनुप्रास, उपमा अलंकार है। पूरे छंद में अतिशयोक्ति अलंकार है।