RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 16पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 16 ममता वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
कहानी की केन्द्रीय पात्र ममता कौन थी –
(अ) रोहतास-दुर्गपति की दुहिता
(ब) शेरशाह के मंत्री की पुत्री
(स) रोहतास-दुर्गपति के मन्त्री की दुहिता
(द) हुमायूँ की दुहिता
उत्तर:
(स)

प्रश्न 2.
चूड़ामणि द्वारा स्वर्णथाल उपहार में प्रस्तुत करने पर ममता ने कहा
(अ) विपदा के समय यह काम आएगा।
(ब) इतना सोना पाकर मैं धन्य हो गई।
(स) तो क्या आपने मलेच्छ को उत्कोच स्वीकार कर लिया?
(द) इस स्वर्ण को रखने के लिए मेरे पास स्थान नहीं है।
उत्तर:
(स)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 16 ममता अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शेरशाह ने किस युद्ध में हुमायूँ को परास्त किया था?
उत्तर:
शेरशाह ने चौसा युद्ध में हुमायूँ को परास्त किया था।

प्रश्न 2.
किस बादशाह ने ममता की झोपड़ी के स्थान पर अष्टकोण मंदिर बनवाया?
उत्तर:
बादशाह अकबर ने ममता की झोपड़ी के स्थान पर अष्टकोण मंदिर बनवाया।

प्रश्न 3.
किसने कहा-‘हे भगवान! तबके लिए! विपदा के लिए! इतना आयोजन!’
उत्तर:
यह सब बातें ममता ने कही हैं।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 16 ममता लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ममता ने स्वर्ण-मुद्राओं का उपहार लेने से मना क्यों कर दिया?
उत्तर:
ममता ने अपने पिता चूड़ामणि से स्वर्ण-मुद्राओं का उपहार लेने से मना कर दिया क्योंकि यह धन उसके पिता ने शेरशाह से उत्कोच के रूप में लिया था। ममता ब्राह्मण जाति की थी। जो त्यागी और संतोषी होते हैं। ममता को विश्वास था कि धरती पर रहने वाला कोई न कोई उसको दो मुट्ठी अन्न दे देगा। अत: उसको इतने अधिक धन की जरूरत नहीं थी।

प्रश्न 2.
हुमायूँ कब और क्यों ममता की झोपड़ी में आश्रय के लिए आया था?
उत्तर:
हुमायूँ शेरशाह से चौसा युद्ध में परास्त होने के पश्चात ममता की झोपड़ी में आश्रय लेने आया था। उसके साथी सैनिक पीछे छूट गए थे। वह रास्ता भटक गया था। रात हो गई थी। वह भूखा-प्यासा था और बहुत थका हुआ था। वह चलने-फिरने में भी असमर्थ हो रहा था।

प्रश्न 3.
इस कहानी में भारतीय संस्कृति के किन-किन मूल्यों को उभारा गया है?
उत्तर:
इस कहानी में बताया गया है कि ममता ने स्वर्ण मुद्राओं का उपहार स्वीकार नहीं किया। उसने अपनी झोपड़ी में उपस्थित विद्यर्मी को आश्रय दिया। वह गाँव के लोगों की सहायता करती थी। भारतीय संस्कृति में संतोष, त्याग, अतिथि-सत्कार, दूसरों की सेवा-सहायता करना, दीन-दुखियों पर दया दिखाना आदि मनुष्य के गुण बताये गये हैं। ममता के चरित्र में ये सभी गुण हैं। इस (ममता) कहानी में उनको ही उभारा गया है।

प्रश्न 4.
शेरशाह ने किस प्रकार रोहतास-दुर्ग पर कब्जा किया?
उत्तर:
शेरशाह ने छलपूर्वक रोहतास दुर्ग पर कब्जा किया। उसने मंत्री चूड़ामणि को उत्कोच के रूप में स्वर्ण-मुद्राएँ दीं। फिर उसने अपने सैनिकों को डोली में छिपाकर महिलाओं के रूप में दुर्ग में भेजा। जब मंत्री ने उनका पर्दा खुलवाने के लिए कहा तो उसकी हत्या कर दी। इस प्रकार दुर्ग तथा राजा-रानी को उसने अपने अधिकार में ले लिया।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 16 ममता निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘ममता’ के माध्यम से नारी के त्याग एवं आदर्शों पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
‘ममता’ कहानी की मुख्य पात्र है। वह एक आदर्श महिला है। उसके चरित्र में भारतीय स्त्रियों के अनेक गुण पाये जाते हैं। ममता के आदर्श चरित्र को प्रस्तुत करने के उसके द्वारा कहानीकार भारतीय नारी के त्याग तथा आदर्शों को प्रकट करना चाहता है।

भारतीय नारी संतोषी होती है। उसकी आवश्यकताएँ अल्प होती हैं। वह किसी से कोई अनुचित उपहार स्वीकार नहीं करती। वह त्यागी होती है तथा दूसरों के हितार्थ अपनी धन-सम्पत्ति तथा सुख-सुविधाओं को त्यागने में पीछे नहीं रहती। उसमें अतिथि सत्कार की भावना होती है। वह घर आए अतिथि का सत्कार करने में कभी पीछे नहीं हटती। अतिथि उसके लिए देवता होता है। वह अपने पड़ोसियों के साथ मेल-जोल रखती है तथा उनके सुख-दुख में सदा हाथ बटाती है। उसमें पक्षपात की भावना नहीं होती। जाति-धर्म की ओर ध्यान न देकर वह पीड़ितों की सहायता करने के लिए सदैव तत्पर रहती है। | इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय नारी में मानवता के उच्च आदर्श पाए जाते हैं। ये आदर्श कहानी की नायिका ममता के चरित्र में जड़े हुए लगते हैं।

प्रश्न 2.
मुगलकालीन भारतीय नारी की स्थिति का वर्णन कीजिए तथा आज इस स्थिति में सुधार पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
मुगलकाल में भारतीय नारी की स्थिति अच्छी नहीं थी। मुगल विदेशी तो थे ही विजातीय भी थे। उनका धर्म तथा परम्पराएँ भिन्न र्थी । मुगलों के भारत में आने के बाद भारतीय नारी को अपने धर्म, मान्यताओं तथा रीति-रिवाजों को सुरक्षित रखने की चिन्ता थी। इस काल में नारी के स्वातन्त्र्य को सर्वाधिक आघात पहुँचा था। उनकी सुरक्षा की दृष्टि से उनके ही लोगों ने उन पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिए थे। उनको घर से बाहर जाने पर रोक थी। वे परपुरुषों से बातें नहीं कर सकती थीं। इस कारण पर्दा प्रथा प्रचलित हो गई थी। मुगलकालीन स्त्रियों को घर से बाहर जाकर पढ़ने-लिखने की भी छूट नहीं थी। अत: उनमें अशिक्षा का प्रवेश हो गया था तथा इस कारण अन्य अनेक कुरीतियाँ भी उनमें जन्म ले चुकी थीं। यह काल नारी के पतन का काल था।

मुगलों के शासन का अन्त होने पर भारत में अंग्रेजी राज्य आया। इसके साथ ही भारतीय नारी के जीवन में भी परिवर्तन की शुरुआत हुई। कुछ उच्चवर्गीय महिलाओं में शिक्षा का प्रसार हुआ। समाज में कुरीतियों के विरुद्ध सांस्कृतिक आन्दोलन चले। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारत की स्वतंत्रता का आंदोलन चला। उसमें महिलाएँ भी सम्मिलित हुईं। इससे उनमें पिछड़ापन, अशिक्षा आदि दोष दूर हुए। बालिकाओं को स्कूल-कालेजों में भेजा जाने लगा। पर्दा-प्रथा में कमी आई तथा महिलओं की उन्नति के एक नये युग की शुरुआत हुई। भारत को स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद नारी-उत्थान में तेजी आई है। अब भारतीय नारियाँ अनेक क्षेत्रों में पुरुषों के कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रही हैं।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 16 ममता अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 16 ममता वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. ममता बैठी थी –

(क) रोहतास दुर्ग के प्रांगण में
(ख) रोहतास दुर्ग के प्रकोष्ठ में
(ग) रोहतास दुर्ग के बरामदे में
(घ) रोहतास दुर्ग के बाहर

2. चूड़ामणि थे-ममता के –

(क) पिता
(ख) भाई
(ग) गुरु
(घ) शिक्षक

3. काशी के उत्तर में स्थित बिहार को बनवाने वाले थे-

(क) मुगल सम्राट
(ख) पठान शासक
(ग) मौर्य और गुप्त सम्राट
(घ) अंग्रेज शासक

4. ‘मैं ब्राह्मणी हूँ, मुझे तो अपने धर्म-अतिथि देव की उपासना का पालन करना चाहिए। परन्तु यहाँ…….नहीं…..नहीं ये एक विधर्मी दया के पात्र नहीं। परन्तु यह दया तो नहीं……कर्तव्य करना है। तब?’ ममता के उपर्युक्त विचारों में है –

(क) चिन्तन
(ख) करुणा
(ग) भय
(घ) अन्तद्वन्द्व

5. चौसा में युद्ध हुआ था –

(क) हिन्दू और मुगलों के बीच
(ख) मुगलों और पठानों के बीच
(ग) मुगलों-मुगलों के बीच
(घ) मुगलों और अंग्रेजों के बीच।

उत्तर:

  1. (ख)
  2. (क)
  3. (ग)
  4. (घ)
  5. (ख)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 16 ममता अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ममता कौन थी?
उत्तर:
ममता रोहतास दुर्ग के मंत्री चूड़ामणि की पुत्री थी। वह विधवा थी।

प्रश्न 2.
‘मन में वेदना, मस्तक में आँधी, आँखों में पानी की बरसात लिए, वह सुख के कण्टक-शयन में विकल थी। इस कथन का आशय क्या है?
उत्तर:
ममता मंत्री की पुत्री थीं। उसके लिए कोई भाव नहीं था। परन्तु सुख उसके शरीर में काँटों के समान चुभता और उसको व्याकुल कर रहा था। कारण यह था कि वह एक हिन्दू विधवा थी।

प्रश्न 3.
‘सब अपना धर्म छोड़ दें तो मैं क्यों छोड़ दें?’ यहाँ ममता किस धर्म की बात कर रही हैं?
उत्तर:
ममता अतिथि सत्कार को अपना धर्म बता रही हैं तथा उसी की बात कह रही हैं।

प्रश्न 4.
घोड़े पर चढ़कर जाते समय हुमायूँ ने मिरजा से क्या कहा?
उत्तर:
जाते समय घोड़े पर चढ़ने के बाद हुमायूँ ने मिरजा से कहा कि वह ममता की झोपड़ी वाले स्थान को भूले नहीं। उस स्त्री का घर बनवा दे।

प्रश्न 5.
ममता सत्तर वर्ष की थी। हुमायूँ ने उसकी झोपड़ी में कितने वर्ष पूर्व विश्राम किया था?
उत्तर:
हुमायूँ ने उसकी झोपड़ी में सैतालीस वर्ष पूर्व विश्राम किया था।

प्रश्न 6.
‘ममता’ किस गद्य विधा की रचना है?
उत्तर:
‘ममता’ हिन्दी गद्य की कहानी नामक विधा की रचना है।

प्रश्न 7.
प्रसाद जी की ‘ममता’ की भाषा की क्या विशेषता है?
उत्तर:
प्रसाद जी की ‘ममता’ कहानी में तत्सम शब्दों वाली संस्कृतनिष्ठ परिमार्जित भाषा का प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 8.
‘ममता’ अपने कर्तव्य से मुंह न मोड़ने वाली स्त्री की कहानी है। ममता की इस विशेषता के लिए एक शब्द लिखिए।
उत्तर:
‘ममता’ कर्तव्यनिष्ठ स्त्री की कहानी है।

प्रश्न 9.
रोहिताश्व’ को तदभव शब्द क्या है?
उत्तर:
‘रोहिताश्व’ का तदभव शब्द ‘रोहतास’ है।

प्रश्न 10.
‘ममता’ कहानी को संदेश क्या है?
उत्तर:
‘ममता’ कहानी का संदेश अतिथि का सत्कार करने तथा सभी मनुष्यों से प्रेम करने के बारे में है।

प्रश्न 11.
हुमायूँ के प्रति ममता के मन में घृणा क्यों पैदा हुई?
उत्तर:
हुमायूँ विधर्मी था। विधर्मी शेरशाह के सिपाहियों ने ममता के पिता की हत्या कर दी थी। यह स्मरण करके उसके मन में घृणा उत्पन्न हुई।

प्रश्न 12.
ग्रामीण स्त्रियाँ ममता की सेवा क्यों कर रही थीं?
उत्तर:
ममता जीवन भर पड़ोसियों के सुख-दुख में भागीदार रही थी। अत: गाँव की स्त्रियाँ उसकी सेवा कर रही थीं।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 16 ममता लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
“परमपिता की इच्छा के विरुद्ध इतना साहस”-ममता के इस कथन में क्या भाव निहित है? ।
उत्तर:
मंत्री चूड़ामणि ने शेरशाह से उत्कोच के रूप में स्वर्ण मुद्राएँ स्वीकार की थीं। सोचा था-मंत्री पद नहीं रहेगा। तब काम आयेगा। ममता को यह अच्छा नहीं लगा। उसने कहा कि ईश्वर सबको देने वाला है। वह सबको ख्याल रखता है, सबका पेट भरता है। भविष्य के विचार से आवश्यकता से अधिक संग्रह करने का आदेश ईश्वर नहीं देता है। अत: भविष्य की जरूरत कहकर आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 2.
“पिताजी यह अनर्थ है, अर्थ नहीं”-यह कथन किसने कहा है? तथा क्यों?
उत्तर:
चूड़ामणि रोहिताश्व राज्य के मंत्री थे। वह ममता के पिता थे। भविष्य की सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने शेरशाह से उत्कोच स्वरूप स्वर्ण मुद्रायें ली थीं। ममता ने अपने पिता से उसे लौटा देने के लिए कहा। पवित्र साधन से अर्जित न होने के कारण वह धन अनर्थकारी था। वह हितकारी नहीं था।

प्रश्न 3.
मौर्य और गुप्त सम्राटों की कीर्ति का खंडहर किसको कहा गया है? इसको खंडहर कहने का कारण क्या है?
उत्तर:
मौर्य तथा गुप्त राजा बौद्ध धर्म के मानने वाले थे। उन्होंने काशी के उत्तर में बिहार बनवाया था। इससे उनकी कीर्ति विश्व में दूर-दूर तक फैल गई थी। समय के साथ यह विहार ध्वस्त हो गया। उसी प्रकार इन राजाओं का यश भी धूमिल पड़ गया। इस टूटे-फूटे धर्मचक्र को सम्राटों की कीर्ति का खंडहर कहा गया है।

प्रश्न 4.
“वह सुख के कण्टक-शयन में विकल थी”-इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ममता रोहिताश्व राज्य के मंत्री की पुत्री थी। उसके लिए किसी चीज का अभाव होना असंभव था। वह युवती थी और विधवा थी। हिन्दू समाज में विधवा की स्थिति बड़ी दयनीय होती है। उसका दु:ख धन सम्पन्नती तथा भौतिक सुविधाओं से दूर नहीं हो सकता था। यह सुख उसको काँटों की तरह चुभता और व्याकुल कर देता था।

प्रश्न 5.
“यह महिलाओं का अपमान करना है।” यह कथन किसने कहा है तथा किस अवसर पर कहा गया है?
उत्तर:
रोहतास दुर्ग के द्वार पर डोलियों का ताँता लगा था। उनमें पर्दे के पीछे शेरशाह के सैनिक छिपकर बैठे थे। उनको महिला होने का बहाना बनाकर किले में प्रवेश कराना था। मंत्री चूड़ामणि ने साथ चल रहे पठान सैनिक को पर्दा हटाने का आदेश दिया। पठान सैनिक ने कहा-वह ऐसा नहीं करेगा। यह महिलाओं का अपमान होकर तनातनी बढ़ी तो पठान सैनिक ने मंत्री चूड़ामणि की हत्या कर दी।

प्रश्न 6.
ममता रोहतास दुर्ग को त्यागकर किस स्थान पर जाकर रहने लगी?
उत्तर:
रोहतास दुर्ग पर शेरशाह का अधिकार हो गया। ममता ने दुर्ग छोड़ दिया। वह बचकर निकल आई। काशी के उत्तर में मौर्य तथा गुप्त सम्राटों द्वारा बनवाये गये बौद्ध विहार के खंडहर थे। ममता ने वहाँ पर ही झोपड़ी बनवा ली और उसमें जाकर रहने लगी।

प्रश्न 7.
हुमायूँ जब ममता से आश्रये माँगने आया तो उसकी दशा कैसी थी?
उत्तर:
हुमायूँ जब ममता के सामने आया और आश्रय माँगा तो उसकी दशा अच्छी नहीं थी। वह शेरशाह से चौसा का युद्ध हार गयो था। वह रास्ता भटक गया था। उसके सैनिक उससे बिछुड़ गए थे। वह थका हुआ था। वह भूखा-प्यासा था। थकावट के कारण वह खड़ा भी नहीं रह पा रहा था।

प्रश्न 8.
“यहाँ कौन दुर्ग है! यही झोपड़ी न, जो चाहे ले ले, मुझे तो अपना कर्तव्य करना पड़ेगा”-ममता के ऐसा सोचने का क्या कारण है?
उत्तर:
ममता ने विधर्मी शेरशाह को छलपूर्वक रोहतास के दुर्ग, राजा-रानी तथा कोष पर अधिकार करते देखा है। उसने अपने पिता की हत्या होते भी देखा है। उससे शरण माँगने वाला मुगल भी विधर्मी हैं। वह छलपूर्वक उसकी झोपड़ी पर अधिकार कर सकता है। उसको इस बात का भय होता है परन्तु तुरन्त उसके मन में अपना कर्तव्य पूरा करने का विचार पैदा होता है। वह शरणागत को शरण देने का अपना कर्तव्य पूरा करने का निश्चय कर लेती है। झोपड़ी रहे या चली जाए इसकी उसको चिन्ता नहीं।

प्रश्न 9.
”तैमूर का वंशधर स्त्री से छल करेगा! जाता हूँ, भाग्य का खेल है।” हुमायूँ के उपर्युक्त कथन से उसकी किस विशेषता का पता चलता है?
उत्तर:
हुमायूँ को ममता का अपने ऊपर छल की शंका करना अच्छा नहीं लगता। उसे तैमूर के वंश में जन्म लेने पर गर्व है। वह ममता से छल नहीं कर सकता। इस समय वह बहुत थका है। उसे विश्राम की आवश्यकता है। रात में वह शत्रु के हाथ पड़ सकता है। अतः आश्रय चाहता है। भाग्यवश ही उसको याचना करनी पड़ रही है। यदि ममता को उस पर विश्वास नहीं है तो वह चला जाएगा।

प्रश्न 10.
“वह अपनी मूर्खता पर अपने को कोसने लगी”-ममता ने क्या मूर्खता की थी जिसके लिए वह स्वयं को दोषी ठहरा रही थी?
उत्तर:
ममता ने प्राचीर की संधि से देखा कि विहार के पूरे खंडहर में अनेक सैनिक घूम रहे हैं। ममता ने सोचा कि रात उसने उस मुगल को आश्रय देकर भूल की थी। इसी कारण इतने सैनिक यहाँ आए हैं। वह उनके हाथों में पड़ सकती है। अत: उसने छिपने का प्रयत्न किया। वह मृगदाव में चली गई और वहीं छिपी रही।

प्रश्न 11.
ममता ने छल की शंका होने पर भी मुगल को अपनी झोंपड़ी में आश्रय दिया। यदि आपके सामने ऐसी स्थिति उत्पन्न हो तो आप क्या करेंगे?
उत्तर:
ममता को छल की शंका हुई । उसको लगा कि वह विधर्मी मुगल उसकी झोंपड़ी पर अधिकार कर सकता है। किन्तु उसने अपना कर्तव्य पालन किया और उसको आश्रय दिया। यदि कोई विपन्न और भूखा-प्यासा मनुष्य मुझसे सहायता चाहता है तो मैं उसकी सहायता अवश्य करूंगा। मैं उसको किसी धर्मशाला आदि में ठहरा दूंगा तथा भोजन-पानी की व्यवस्था भी करूंगा परन्तु मैं सतर्क रहूँगा।

प्रश्न 12.
कोई विपन्न अनजान व्यक्ति आये तो उसको शरण देना मानव का धर्म है किन्तु आजकल ऐसा करने के खतरे भी हैं? ऐसा करने से क्या खतरा है?
उत्तर:
मानवता कहती है कि दीन-दुखियों की सेवा-सहायता करो। भूखे को अन्न, प्यासे को जल तथा निराश्रय को आश्रय दो। किन्तु आज ऐसा करना खतरनाक भी है। विपन्न मनुष्य बनकर लोग लूटपाट करते हैं तथा विरोध पर हत्या तक कर देते हैं। प्राय: पड़ोसी भी दूरी बना लेते हैं। वे अपनी सुरक्षा देखते हैं। कोई घटना होने पर पुलिस आती है और पूछताछ के नाम पर पीड़ित को ही परेशान करती

प्रश्न 13.
जब अश्वारोही ममता के द्वार के सामने पहुँचा उस समय ममता की क्या दशा थी?
उत्तर:
जब अश्वारोही ममता के द्वार पर पहुँचा, उस समय वह सत्तर वर्ष की वृद्धा थी। वह दुर्बल तथा बीमार थी। सर्दी का मौसम था और सवेरा होने के कारण ममता का दुर्बल शरीर काँप उठता था। उसको बार-बार खाँसी आती थी। गाँव की दो-तीन स्त्रियाँ उसकी सेवा-सुश्रुषा में लगी थीं। पानी माँगने पर वे उसको जल पिला रही थीं। कुछ समय बाद ही उसका देहान्त हो गया।

प्रश्न 14.
ममता ने अश्वारोही को पास बुलाकर उससे क्या कहा?
उत्तर:
ममता ने अश्वारोही को अपने पास बुलाया। ममता ने उसको बताया कि उसकी इसी झोपड़ी में एक रात एक व्यक्ति ठहरा था। उसको नहीं पता कि वह साधारण मुगल था अथवा बादशाह था। उसने अपने कानों से सुना था कि उसने उसका घर बनवाने का आदेश दिया था। अब ईश्वर के यहाँ से उसका बुलावा आ गया है। वह जा रही है। वे इस झोपड़ी का मकान या महल कुछ भी बनायें उसको इससे कोई सरोकार नहीं है।

प्रश्न 15.
ममता की झोपड़ी के स्थान पर बने अष्टकोण मन्दिर पर क्या शिलालेख लगाया? इसमें ममता का नाम क्यों नहीं था?
उत्तर:
ममता की झोपड़ी के स्थान पर अष्टकोण गगनचुम्बी मंदिर बनाया गया। उस पर लगे शिलालेख में लिखा था-शहंशाह हुमायूँ ने एक रात इसी स्थान पर विश्राम किया था। उनके पुत्र सम्राट अकबर ने उनकी स्मृति में इस भव्य गगनचुम्बी मंदिर का निर्माण कराया है। उस लेख में ममता का नाम कहीं नहीं था। मंदिर बनवाने वाले का उद्देश्य अपने पिता के साथ घटी घटना की याद को सुरक्षित रखना था। ममता के लिए उसमें कोई स्थान नहीं हो सकता था।

प्रश्न 16.
ममता के चरित्र की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
ममता के चरित्र की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. ममता इस कहानी का प्रधान पात्र तथा नायिका है। इस कहानी का घटनाक्रम उसी के आस-पास घूमता है।
  2. वह मंत्री चूड़ामणि की विधवा युवती पुत्री है। वैधव्य की पीड़ा उसको सता रही है। वह त्यागी और संतोषी है। उसको भावी आवश्यकता के लिए संग्रह करने में विश्वास नहीं है।

प्रश्न 17.
हुमायूँ के चरित्र की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
हुमायूँ के चरित्र की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. हुमायूँ विदेशी तथा विधर्मी आक्रमणकारी है। वह तैमूर लंग की वंशज है। वह मुगल है।
  2. हुमायूँ चौसा युद्ध में पठान शेरशाह से परास्त होकर सुरिक्षत स्थान की खोज में है। वह भूखा-प्यासा तथा थका हुआ है। उसका अश्व गिर गया तथा साथी बिछुड़ गए हैं। वह ममता की झोपड़ी में आश्रय चाहता है।

प्रश्न 18.
“ममता’ की कहानी के कथानक की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
‘ममता’ कहानी के कथानक की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. ममता’ जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कहानी है। इस कहानी का कथानक इतिहास पर आधारित है। उसमें कहानीकार ने कल्पना के रंग भरे हैं।
  2. कहानी का आरम्भ रोहतास दुर्ग में बैठी ममता के यौवनकाल से होता है। इसमें उसकी मृत्यु तक का पूरा समय समाया हुआ है। कथानक के विकास में ममता के जीवन की घटनाओं का ही योगदान है। इसका अन्त भी चरम बिन्दु अर्थात् ममता के जीवन के अन्त के साथ होता है।

प्रश्न 19.
‘ममता’ कहानी के शीर्षक का औचित्य प्रगट कीजिए।
उत्तर:
कहानी को शीर्षक ‘ममता’ है। ममता इस कहानी की प्रधान पात्र है। वह कहानी की नायिका है। कहानी का कथानक ममता पर ही आधारित है। कहानी के आरम्भ में युवती, विधवा ममता का रोहतास दुर्ग के एक प्रकोष्ठ में बैठे दिखाया गया है। कहानी का अन्त ममता की उसकी ही झोपड़ी में हुई मृत्यु के साथ होता है। कहानी में ममता के त्याग, अतिथि परायणता तथा अनावश्यक धन-संग्रह से विरक्ति और गुणों का भव्य चित्रण हुआ है। ममता के न रहने पर इस कहानी का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। ‘ममता’ शीर्षक का औचित्य निर्विवाद है तथा वह कहानी के लिए सब प्रकार से ठीक शीर्षक है।

प्रश्न 20.
‘ममता’ कहानी की रचना का क्या उद्देश्य है?
अथवा
‘ममता’ कहानी में क्या संदेश दिया गया है?
उत्तर:
‘ममता’ कहानी में ममता के चरित्र के त्याग, संतोष, सेवा, सहयोग तथा संग्रह की प्रवृत्ति से विमुखता आदि का चित्रण है। ‘ममता’ अपने पिता से प्राप्त उत्कोच के स्वर्ण को उपहार रूप में स्वीकार नहीं करती। उसकी दृष्टि में वह अर्थ नहीं अनर्थ है। वह रोहतास दुर्ग को त्यागकर चली गई है। वह अपनी झोपड़ी को भी अन्त में छोड़ जाती है। उसके चरित्रांकन के द्वारा इन मानवीय गुणों की महत्ता बताना कहानी की रचना का उद्देश्य है। कहानी में त्याग, अतिथि-सत्कार, दया तथा अनावश्यक वस्तुओं के संग्रह से बचने का संदेश दिया गया है।

प्रश्न 21.
‘ममता’ कहानी में इतिहास और कल्पना का सुन्दर समन्वय हुआ है। कहानी के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर:
‘ममता’ कहानी की पृष्ठभूमि ऐतिहासिक है। मुगल शहंशाहों हुमायूँ तथा शेरशाह भारतीय इतिहास से सम्बन्धित पात्र हैं। हुमायूँ तथा शेरशाह के बीच हुए युद्ध का वर्णन भी इतिहास में मिलता है। किन्तु ममता, चूड़ामणि आदि पात्र कहानीकार की कल्पना से प्रसूत हैं। ममता की झोंपड़ी में हुमायूँ के आश्रय लेने तथा उसके स्थान पर गगनचुम्बी मंदिर बनवाने की बात भी लेखक की कल्पना पर आधारित है। अत: हम कह सकते हैं कि ममता कहानी में इतिहास और कल्पना का सुन्दर समन्वय है।

प्रश्न 22.
‘ममता’ कहानी के संवादों की विशेषता क्या है?
उत्तर:
‘ममता’ कहानी में प्रयुक्त संवादों की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. संवाद छोटे तथा बड़े दोनों प्रकार के हैं। वे चुस्त हैं।
  2. संवाद पात्रों के चरित्रगत गुणों को उजागर करने वाले हैं।
  3. इन संवादों के द्वारा कहानी के कथानक को विकसित करने में भी कहानीकार सफल हुआ है।
  4. संवाद नाटकीय हैं। वह सुन्दर उक्ति के रूप में हैं। यथा-“पिताजी, यह अनर्थ है, अर्थ नहीं”।
  5. संवादों की भाषा तत्सम शब्द प्रधान, संस्कृतनिष्ठ तथा परिमार्जित है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 16 ममता निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘ममता’ कहानी की प्रधान पात्र का चरित्र चित्रण कीजिए।
उत्तर:
‘ममता’ कहानी की प्रधान पात्र तथा नायिका ममता ही है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

मन्त्री की पुत्री-ममता के पिता रोहिताश्व राज्य के मंत्री हैं। वह उनकी स्नेहपालिता पुत्री है। उसके पिता चूड़ामणि उसको बहुत चाहते हैं। उसको दुखी तथा चिन्तित देखकर वह विचलित हो जाते हैं।

विधवा युवती-ममता विधवा है। वह युवती है। उसका यौवन शोण नदी के समान उफन रहा है। हिन्दू विधवा को संसार में अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। सब सुविधाएँ प्राप्त होने पर भी ममता का वैधव्य उसे बहुत पीड़ा पहुँचाता है।

संतोषी और बुद्धिमती-ममता संतोषी है। सामने थालों में रखी स्वर्ण-मुद्राओं को देखकर वह समझ जाती है कि उसके पिता ने शेरशाह से रिश्वत ली है। वह कहती है हम ब्राह्मण हैं। हमें इतना सोना नहीं चाहिए। यह अर्थ नहीं अनर्थ है। अतिथि सत्कार करने वाली-ममता अपने कर्तव्य अतिथि सत्कार से पीछे नहीं हटती । मुगल को एक बार वह शरण देने से मना कर देती है परन्तु बाद में उसको अपनी झोपड़ी में विश्राम करने को कह देती है। वह कहती है-”मैं ब्राह्मण कुमारी, सब अपना धर्म छोड़ दें, तो मैं भी क्यों छोड़ दें?” वह त्यागी तथा सभी के सुख-दुख में साथ देने वाली है। अपनी मृत्यु के पूर्व वह अपनी झोपड़ी की अश्वारोही को सौंप देती है।

प्रश्न 2.
वृद्ध ममता के अन्तिम समय का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ममता अब वृद्धा है। उसकी आयु सत्तर वर्ष की है। मुगल-पठान युद्ध को बीते सैंतालीस साल हो चुके हैं। वह अपनी झोपड़ी में लेटी है। सर्दी की ऋतु है। सबेरे का समय है। ममता का शरीर दुर्बल हो गया है। सर्दी के कारण उसको बार-बार खाँसी उठ रही है। गाँव की दो-तीन स्त्रियाँ उसके पास बैठी हैं। वे उसकी सेवा में लगी हैं। ममता ने जीवनभर सबके सुख-दुख में साथ दिया है। फिर वे स्त्रियाँ उसको अकेली कैसे छोड़ दें?

ममता ने जल पीना चाहा। एक स्त्री ने सीपी से उसे जल पिलाया। सहसा एक अश्वारोही झोपड़ी के द्वार पर दिखाई दिया। वह अपने आपसे कह रहा था-मिरजा ने जो चित्र बनाकर दिया है, वह इसी स्थान का होना चाहिए। वह बुढ़िया मर गई होगी। सैंतालीस साल पुरानी बात है। किससे पूछ्रे कि सम्राट हुमायूँ ने किस झोपड़ी में रात बिताई थी।

ममता ने उसको बुलाया और कहा कि साधारण मुगल था या बादशाह-यह बात वह नहीं जानती किन्तु उसने इसी झोपड़ी में वह रात बिताई थी। उसने मेरा घर बनवाने का आदेश दिया था। अब मैं जा रही हूँ। तुम इस घर को मकान बनाओ या महल। मैं इसे छोड़े जाती हूँ। वह अश्वारोही अवाक था। ममता का देहान्त हो चुका था।

प्रश्न 3.
ममता से आश्रय माँगने वाले मुगल की दशा कैसी थी? उसको देखकर ममता के मन में उसे द्वन्द्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ममता अपनी झोपड़ी में बैठी दीपक के मंद प्रकाश में पाठ कर रही थी। उसी समय उसने द्वार पर एक हताश व्यक्ति को खड़ा देखा। वह द्वार बन्द करना चाहती थीं कि तभी उसने कहा-माता मुझे आश्रय चाहिए। परिचय पूछने पर उसने बताया कि वह एक मुगल है। चौसा युद्ध में शेरशाह से परास्त हो गया है। वह थका है तथा आश्रय चाहता है। ममता के मना करने पर वह धम्म से जमीन पर बैठ गया। वह प्यासा था। उसके साथी छूट गए थे। घोड़ा गिर गया था। ममता ने उसे पानी पिलाया तो उसकी जान में जान आई। उसने ममता से पुनः पूछा कि क्या वह चला जाए?

उस मुगल को देखकर ममता के मन में द्वन्द्व उत्पन्न हुआ। उसने सोचा-यह भी शेरशाह की तरह विधर्मी है। यह क्रूर, रक्त पिपासु तथा निष्ठुर है। वह उसकी दया का पात्र कैसे हो सकता है? परन्तु उसने सोचा कि उसको अपना कर्तव्य पालन करना चाहिए। उसे अतिथि का सत्कार करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। ममता मुगल को आश्रय दे अथवा नहीं यह द्वन्द्व अधिक समय तथा ममता के मन में नहीं चला। उसने मुगल को आश्रय देने का निर्णय कर लिया और उससे कहा-जाओ भीतर, थके हुए भयभीत पथिक ! तुम चाहे कोई हो, मैं तुम्हें आश्रय देती हूँ।

प्रश्न 4.
शेरशाह तथा हुमायूँ के चरित्र की तुलना कीजिए।
उत्तर:
शेरशाह तथा हुमायूँ विदेशी आक्रमणकारी के तथा विधर्मी थे। वे दोनों ही भारतीय राज्यों को अपने आधीन करने का प्रयास कर रहे थे। इन दोनों में आपस में भी इसी सिलसिले में युद्ध होता था। चौसा का युद्ध शेरशाह तथा हुमायूँ के बीच हुआ था। इसमें हुमायूँ परास्त हुआ था।

शेरशाह छली था। उसने धोखे से रोहिताश्व राज्य पर अधिकार कर लिया था तथा वहाँ के राजा-रानी को बंदी बनाकर कोष भी छीन लिया था। उसने निर्दयतापूर्वक मंत्री चूड़ामणि की हत्या कर दी थी।

हुमायूँ मुगल था। वह वीर था किन्तु छल-कपट उसे पसंद नहीं था। जब ममता ने शंका व्यक्त की कि क्या पता वह छल करें तो उसने कहा-“छल! नहीं, छल नहीं-स्त्री। जाता हूँ, तैमूर का वंशधर स्त्री से छल करेगा? जाता हूँ। भाग्य का खेल है।”

परन्तु ममता की दृष्टि में वे क्रूर, रक्त-पिपासु और निर्दय वह कहती है-”परन्तु तुम भी वैसे ही क्रूर हो, वही भीषण रक्त की प्यास, वहीं निष्ठुर प्रतिविम्ब तुम्हारे मुख पर भी है…..” | इस तरह शेरशाह तथा हुमायूँ दोनों का उद्देश्य भारत पर अधिकार करके उसके धन को लूटना था।

प्रश्न 5.
ममता’ कहानी के आरम्भ में ममता तथा उसके पिता चूड़ामणि के बीच हुए वार्तालाप को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
ममता के पिता चूड़ामणि दोबारा ममता के कमरे में आए तो उनके साथ दस सेवक चाँदी के थालों में कुछ लिए आए। मंत्री के संकेत पर वे थालों को भूमि पर रखकर चले गए। ममता ने पूछा कि ये क्या है तो चूड़ामणि ने थालों पर ढका पर्दा हटा दिया। उसमें रखी स्वर्ण-मुद्राएँ चमकने लगीं। ममता के पूछने पर चूड़ामणि ने कहा कि यह उसके लिए उपहार हैं।

ममता ने पूछा कि इतना स्वर्ण कहाँ से आया और इसका वे क्या करेंगे? चूड़ामणि ने कहा-यह भविष्य के लिए है। इस सामन्ती वंश का पतन निश्चित है। तब मन्त्री पद नहीं रहेगा। उस समय इस धन की जरूरत होगी।

ममता अपने पिता से सहमत नहीं थी। उसने कहा कि वे ब्राह्मण हैं। उनको इतने अधिक धन की आवश्यकता नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने विधर्मी शेरशाह से रिश्वत ली है। ममता ने कहा कि यह अर्थ नहीं अनर्थ है, वह इसको लौटा दें। वह ब्राह्मण हैं। कोई हिन्दू उनको भिक्षा अवश्य देगा । उनको इतने धन की आवश्यकता नहीं है।

परन्तु चूड़ामणि ”मूर्ख है” कहकर बाहर चले गए।

प्रश्न 6.
“ऐसा प्रायः होता, पर आज मंत्री के मन में बड़ी दुश्चित्ता थी”-चूड़ामणि के साथ प्रायः क्या होता था जिसके कारण आज वह विशेष चिन्तित थे?
उत्तर:
ममता के पिता चूड़ामणि रोहिताश्व राज्य के मंत्री थे। ममता युवती थी। वह विधवा थी। मंत्री की पुत्री होने के कारण ममता को कोई अभाव नहीं था। परन्तु उसका वैधव्य उसे दुख देखा था। इस एक ही दुख के कारण उसके समस्त सुख व्यर्थ हो जाते थे। चूड़ामणि इस बात का जानते थे। इससे वह भी चिन्तित रहते थे। ममता रोहिताश्व के दुर्ग के एक कमरे में बैठी थी। कुछ दूरी पर शोण नहीं बह रही थी। ममता उसको देखने तथा उसकी आवाज सुनने में डूबी थी। उसी समय दबे पाँव मंत्री चूड़ामणि ने उसके कमरे में प्रवेश किया। परन्तु ममता का ध्यान भंग नहीं हुआ तो वह लौट गए।

प्राय: ऐसा ही होता था जब चूड़ामणि अपनी स्नेह से पाली हुई पुत्री के पास आते थे तो उसे गहरे विचारों में मग्न देखकर लौट जाते थे। आज भी ममता उनका आना नहीं जान सकी थी। वह अपने ध्यान में डूबी थी। उसके पिता आज कुछ अधिक चिन्तित थे। वे उसके भविष्य के बारे में सोच रहे थे। उनको प्रतीत हो रहा था वह रोहतास के सामन्त वंश का पतन निकट है। तब उनका मंत्रित्व भी नहीं रहेगा। फिर ममता का क्या होगा?

प्रश्न 7.
“……..परन्तु वह विधवा थी-हिन्दू-विधवा संसार में सबसे तुच्छ निराश्रये प्राणी है-तब उसकी विडम्बना का कहाँ अन्त था?” उपर्युक्त कथन के आधार पर बताइए कि आज हिन्दू-विधवा की क्या दशा है? उसमें सुधार के लिए आप क्या करना चाहेंगे?
उत्तर:
प्राचीन काल में हिन्दू धर्म में अनेक दोष रहे हैं। उनमें विधवा स्त्रियों के साथ दुर्वयवहार तथा उनका शोषण मुख्य है। उनको घर में बचा-खुचा खाना तथा फटे-पुराने वस्त्र पहनने को मिलते थे तथा सबकी दिन-रात सेवा में जुटना पड़ता था। कोई उनसे प्रेम अथवा सहानुभूति नहीं रखता था। बंगाल में तो उनका सिर मुंडवाकर उनको घर से निकाल दिया जाता है।

आज हिन्दू विधवाओं की दशा में सुधार हुआ है। इसका श्रेय समाज-सुधारकों के प्रयासों तथा शिक्षा में हुई प्रगति को दिया जाना चाहिए। किन्तु अभी भी उनको समाज तथा परिवार में वह सम्मान नहीं मिलता था जो उनको मिलना चाहिए। विधवा विवाह यद्यपि होने लगे हैं किन्तु उनकी संख्या कम है तथा उनको प्रशंसनीय नहीं माना जाता । मुंशी प्रेमचन्द्र जैसे कुछ अति उत्साही ही ऐसा कर पाते हैं।

विधवा स्त्रियों की दशा में सुधार के लिए मैं प्रमुख रूप से उनके पुनर्विवाह पर जोर दूंगा। मैं उनको समाज तथा परिवार में सम्मान और अधिकार दिलाना चाहूँगा। मैं उनको विद्यालयों में प्रविष्ट कराकर शिक्षित भी बनाऊँगा। मैं उनको वैधानिक अधिकार दिलाने का भी प्रयास करूंगा। मैं उनके लिए पिता और पति की सम्पत्ति में अधिकारों को सुनिश्चित करने का प्रयत्न करूंगा।

ममता लेखक परिचय

प्रश्न-
जयशंकर प्रसाद का जीवन-परिचय देकर उनकी साहित्य साधना का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
जीवन-परिचय-जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी (उत्तर प्रदेश) के प्रसिद्ध सुंघनी साहू नामक वैश्य परिवार में सन् 1889 में हुआ था। आपके पिता श्रीदेवीप्रसाद थे। बाल्यावस्था में ही आपके माता-पिता का देहान्त हो गया था। बड़े भाई भी सत्रह वर्ष की आयु में चल बसे। तब सत्रह साल के प्रसाद ने घर और परिवार का भार उठाया। आपने कक्षा आठ तक पढ़ाई करने के बाद स्वाध्याय द्वारा संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, फारसी आदि भाषाओं तथा साहित्य, इतिहास, वेदों, पुराणों आदि का ज्ञान प्राप्त किया। व्यवसाय की देखभाल के साथ प्रसाद की साहित्य साधना भी चल रही थी। आपने तीन विवाह किए परन्तु उनकी पत्नियाँ साथ न दे सकी और एका-एक करके चल बसीं। इस प्रकार घोर परिश्रम, व्यवसाय में हानि तथा इन आघातों के कारण क्षय रोग से सन् 1937 में आपकी मृत्यु हो गई।

साहित्यिक परिचय-

आरम्भ में प्रसाद ब्रजभाषा में कलाधर नाम से कविताएँ लिखते थे। बाद में खड़ी बोली में लिखने लगे। आप हिन्दी की छायावादी काव्यधारा के प्रमुख कवि थे। गद्य के क्षेत्र में प्रसाद ने श्रेष्ठ ऐतिहासिक नाटक, उपन्यास, कहानियाँ तथा निबन्ध लिखे हैं। प्रसाद की भाषा शुद्ध, साहित्यिक, संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है। उसमें कहीं-कहीं अंग्रेजी, उर्दू आदि के शब्द भी मिलते हैं। भाषा परिमार्जित और तत्सम प्रधान है। प्रसाद जी ने वर्ण्य विषय तथा भावों के अनुसार भावात्मक, वर्णनात्मक, शब्द-चित्रात्मक, आलंकारिक, सूत्र कथन और संवाद शैलियों का प्रयोग किया है। प्रसाद ने हिन्दी साहित्य की वृद्धि में अपूर्व योग दिया है।

कृतियाँ-प्रसाद जी की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं नाटक-चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु, राज्यश्री, ध्रुवस्वामिनी, जनमेजय का नागयज्ञ। उपन्यास-कंकाल, तितली, इरावती (अपूर्ण)।

कहानी-संग्रह-

इन्द्रजाल, आँधी, छाया, प्रति ध्वनि, आकाशदीप। निबन्ध-काव्य-कला और अन्य निबन्ध। काव्य-कामायनी (महाकाव्य), झरना, लहर, प्रेम–पथिक, आँसू आदि। . एक चूंट, कामना, करुणालय कल्याणी, परिणय, अग्निमित्र प्रायश्चित, सज्जन।

ममता पाठ सारांश

प्रश्न-
‘ममता’ शीर्षक कहानी का सारांश लिखिए।
उत्तर-
परिचय-‘ममता’ प्रसाद जी की प्रसिद्ध ऐतिहासिक कहानी है। इसमें काव्यात्मक भाषा में एक कर्तव्यपरायण और त्यागी नारी का चित्रण किया गया है।

युवती ममता-रोहतास के किले में एक कमरे में युवती ममता बैठी हुई शोण नदी का प्रवाह देख रही थी। वह विधवा थी। चूड़ामणि उसके पिता थे। वह कमरे में आए किन्तु ममता का ध्यान भंग नहीं हुआ तो लौट गए। वह अपनी पुत्री के लिए चिन्तित थे। कुछ समय बाद वह पुन: लौटे। उनके साथ दस नौकर चाँदी के बड़े-बड़े थाल लेकर आए। उनमें मूल्यवान सोना भरा था। चूड़ामणि रोहतास-दुर्ग के स्वामी के मंत्री थे। शेरशाह उस पर अधिकार करना चाहता था। उसने यह धन उत्कोच के रूप में मंत्री को दिया था। ममता ने पिता से उसे लौटा देने को कहा। उसने कहा- वे ब्राह्मण हैं, उनको इतने धन की जरूरत नहीं है।

दुर्ग का त्याग-दूसरे दिन डोलियों की कतारें किले के द्वार से अन्दर आ रही थीं। चूड़ामणि ने उनका पर्दा खुलवाना चाहा। साथ चल रहे पठान सैनिक तैयार नहीं हुए। बात बढ़ी तो उन्होंने मंत्री चूड़ामणि की हत्या कर दी। डोलियों में छिपे सैनिक बाहर निकले। उन्होंने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। किला शेरशाह के अधिकार में जा चुका था। सैनिकों ने ममता को तलाश किया परन्तु वह दुर्ग छोड़कर पहले ही जा चुकी थी।

ममता की झोपड़ी काशी में एक बिहार का खंडहर था। उसमें ममता ने झोपड़ी बना ली थी। वह अपनी झोपड़ी में बैठी धार्मिक पाठ कर रही थी। दीपक के मंदप्रकाश में उसने झोपड़ी के द्वार पर एक अत्यन्त हताश और थके-माँदे व्यक्ति को देखा। वह उठकर दरवाजा बन्द करना चाहती थी परन्तु उस व्यक्ति ने उससे आश्रय की याचना की। परिचय पूछने पर उसने बताया कि वह मुगल हुमायूँ था। शेरशाह से चौसा युद्ध में हारकर रास्ता भटक गया था। उसके सैनिक छूट गए थे।

ममता का भय और शंका-ममता को भय लगा। वह विधर्मी था। शेरशाह ने बलपूर्वक उसके पिता की हत्या कर रोहतास दुर्ग पर अधिकार कर लिया था। वह भी ऐसा ही कर सकता है। उसने आश्रय देने से मना कर दिया। छल की शंका से व्यथित हुमायूँ जाने लगा तो ममता को अपना अतिथि सरकार का धर्म याद आया। उसने हुमायूँ को रोका और झोपड़ी में विश्राम करने को कहा। वह बाहर चली गई।

खंडहर में छिपी ममता–सबेरा हुआ। खंडहर में छिपी ममता. ने एक दरार से देखा कि वहाँ अनेक सैनिक घूम रहे थे। वे किसी को तलाश रहे थे। वह भयभीत होकर छिपने के लिए मृगदाब में चली गई। मुगल हुमायूँ झोपड़ी से बाहर आया। उसने एक सैनिक से ममता को तलाश करने के लिए कहा। बाद में घोड़े पर सवार होते हुए उसने कहा-मिरजा, मैं उस स्त्री को कुछ दे न सका। उसने मुझे आश्रय दिया था। तुम यह स्थान याद रखना। उसका घर बनवा देना। इसके बाद वे सब वहाँ से चले गए।

वृद्धा ममता-ममता अब बूढ़ी हो गई थी। वह सत्तर साल की थी। सर्दी के दिन थे। खाँसी आती तो पूरा शरीर हिल उठता था। गाँव की स्त्रियाँ ममता की सेवा में लगी थीं। ममता जीवन भर सबके सुख-दुख की साथी रही थी। प्यास लगने पर एक स्त्री ने उसे पानी पिलाया।

अश्वरोही का आना-तभी वहाँ एक घुड़सवार आया। वह कह रहा था—मिरजा ने जो चित्र दिया वह तो इसी स्थान का है। सैंतालीस साल हो गए। वह स्त्री बूढ़ी होकर मर गई होगी। अब किससे पूछु कि मुगल सम्राट हुमायूँ ने किस झोपड़ी में विश्राम किया था। ममता ने सुना तो उसको बुलवाया। उसने उसे बताया कि वह नहीं जानती कि वह साधारण मुगल था या सम्राट। उसने यहाँ पर ही रात बिताई थी। अब वह यह संसार छोड़कर जा रही है। तुम यहाँ मकान बनाओ या महल। इतना कहते ही ममता के प्राणपखेरू उड़ गए।

अष्टकोण मन्दिर-उस स्थान पर एक भव्य अष्टकोण का भवन बनाया गया। उस पर शिलालेख लगा था-इस स्थान पर मुगल सम्राट हुमायूँ ने विश्राम किया था। उनके पुत्र अकबर ने इसी स्मृति को स्थायी रखने के लिए इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया। इस शिलालेख में ममता का कोई उल्लेख नहीं था।

ममता महत्वपूर्ण गद्यांशों की सन्दर्भ-प्रसंग सहित व्याख्याएँ।

1. रोहतास-दुर्ग के प्रकोष्ठ में बैठी हुई युवती ममता, शोण के तीक्ष्ण गम्भीर प्रवाह को देख रही है। ममता विधवा थी। उसका यौवन शोण के समान ही उमड़ रहा था। मन में वेदना, मस्तक में आँधी, आँखों में पानी की बरसात लिए, वह सुख के कण्टक-शयन में विकल थी। वह रोहतास-दुर्गपति के मन्त्री चूड़ामणि की अकेली दुहिता थी, फिर उसके लिए कुछ अभाव होना असम्भव था, परन्तु वह विधवा थी-हिन्दू-विधवा संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी है-तब उसकी विडम्बना का कहाँ अन्त था? (पृष्ठ सं, 86)

कठिन-शब्दार्थ-प्रकोष्ठ = कमरा। शोण = सोन नदी। तीक्ष्ण = तेज। प्रवाह = बहाव। वेदना = दर्द पीड़ा। पानी की बरसात = आँसू। कण्टक = आँसू। कण्टक = काँटे। शयन = सोना, लेटना। विकल = व्याकुल। दुर्गपति = किले का स्वामी, राजा। दुहिता = बेटी। तुच्छ = छोटी, उपेक्षित। निराश्रय = बेसहारा। विडम्बना = दुर्भाग्य।

सन्दर्भ एवं प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ममता’ शीर्षक कहानी से उदधृत है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं।

कहानी की इन प्रारम्भिक पंक्तियों में कहानी की नायिका ममता का परिचय कहानीकार ने दिया है। एक मंत्री की पुत्री होने के कारण उसको सब कुछ सुलभ है किन्तु वह अत्यन्त दु:खी है।

व्याख्या-कहानी की नायिका ममता दुखी है लेखक उसका परिचय देते हुए कहता है कि वह युवती थी। वह रोहतास के किले के एक कमरे में बैठी थी। वहाँ से वह सोन नदी के पानी की तेज तथा गहरे बहाव को देख रही थी। वह विधवा थी। उसका यौवन उसी प्रकार उमड़ रहा था जिस प्रकार सोन नदी का बहता पानी उमड़ रहा था। ममता के मन में पीड़ा थी। उसके मस्तिष्क में विचारों की आँधी उठ रही थी। उसकी आँखों से आँसू टपक रहे थे। महल का सुख भी उसके मन में काँटों के समान चुभ रहा था। वह रोहतास के किले के स्वामी के मंत्री चूड़ामणि की बेटी थी। उसके लिए संसार में किसी चीज की कमी नहीं थी। किन्तु वह विधवा थी। संसार में हिन्दू विधवा को अत्यन्त छोटा तथा बेसहारा जीव माना जाता है। यह वैधव्य ही उसको पीड़ित कर रहा था। उसके इस दुर्भाग्य का अन्त होना संभव नहीं था।

विशेष-
(i) ममता कहानी की नायिका का कहानीकार ने उसे विस्तृत परिचय दिया है।
(ii) ममता यद्यपि एक मंत्री की बेटी है परन्तु उसका वैधव्य एक ऐसी पीड़ा है जिसका कोई अन्त नहीं है।
(iii) भाषा संस्कृतनिष्ठ तथा परिमार्जित है।
(iv) शैली वर्णनात्मक तथा चित्रात्मक है।

2. “इस पतनोन्मुख प्राचीन सामन्त-वंश का अन्त समीप है, बेटी! किसी भी दिन शेरशाह रोहिताश्व पर अधिकार कर सकता है, उस दिन मन्त्रित्व न रहेगा, तब के लिए बेटी।”

“हे भगवान! तबके लिए! विपद के लिए! इतना आयोजन! परम पिता की इच्छा के विरुद्ध इतना साहस! पिताजी, क्या भीख न मिलेगी? क्या कोई हिन्दू-भू-पृष्ठ पर न बचा रह जायेगा, जो ब्राह्मण को दो मुट्ठी अन्न दे सके? यह असम्भव है। फेर दीजिए पिताजी, मैं काँप रही हूँ-इसकी चमक आँखों को अन्धा बना रही है।”

“मूर्ख है’-कहकर चूड़ामणि चले गए। (पृष्ठ सं. 87)

कठिन शब्दार्थ-पतनोन्मुख = पतन की ओर जाने वाले, विनाश के निकट। सामन्त = राजशाही। मन्त्रित्व = मंत्री का पद। आयोजन = व्यवस्था। परमपिता = ईश्वर। भूपृष्ठ = जमीन, धरातल। फेरना = लौटाना।

सन्दर्भ एवं प्रसंग–प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ममता’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। यह जयशंकर .. प्रसाद द्वारा रचित एक ऐतिहासिक कहानी है।

ममता के पिता ने अपनी पुत्री को थालों में रखकर स्वर्ण मुद्रायें उपहारस्वरूप दीं। ममता को पता चला कि उसके पिता ने यह स्वर्ण ठत्कोच स्वरूप शेरशाह से प्राप्त किया है। उसने पिता से आग्रह किया कि वह उस धन को लौटा दे। उसने पूछा वे इतने सोने का क्या करेंगे?

व्याख्या-ममता के प्रश्न का उत्तर देते हुए उसके पिता चूड़ामणि ने बताया कि रोहिताश्व का राजवंश शीघ्र ही समाप्त होने वाला है। शेरशाह किसी भी दिन रोहिताश्व पर अधिकार कर लेगा। तब वह मंत्री नहीं रहेंगे। उस समय यह स्वर्ण उनके काम आयेगा। ममता अपने पिता से सहमत नहीं हुई। उसने कहा कि भावी विपत्ति के लिए इतनी व्यवस्था करना, इतना अधिक धन एकत्र करना आवश्यक नहीं है। यह परमात्मा की इच्छा का उल्लंघन है। परमात्मा सभी को देता है, सभी का पेट भरने की व्यवस्था वह स्वयं करता है। वे ब्राह्मण हैं। उनको भिक्षा तो मिल ही जायेगी। धरातल पर कोई तो हिन्दू बचेगा जो उन ब्राह्मणों को दो मुट्ठी अनाज दे सकेगा। इस उत्कोच के धनको स्वीकार करना संभव नहीं है। उसने अपने पिता से कहा कि वह इसको लौटा दें। इस सोने की चमक से उसकी आँखें झुकी जा रही हैं। वह काँप रही है। चूड़ामणि ने कहा कि वह मूर्ख है। भविष्य को नहीं देख पा रही। इसके बाद वह वहाँ से चले गए।
विशेष-
(i) चूड़ामणि तथा ममता की स्वभावगत भिन्नता का चित्रण इस अंश में हुआ है।
(ii) चूड़ामणि उत्कोचस्वरूप स्वर्ण मुद्रायें शेरशाह से लेना स्वीकार करते हैं किन्तु ममता उसको उपहार रूप में स्वीकार नहीं करती। वह उसे लौटा देने का आग्रह पिता से करती है।
(iii) भाषा संस्कृतनिष्ठ तथा परिमार्जित है।
(iv) शैली संवादात्मक तथा काव्यात्मक है।

3. काशी के उत्तर धर्मचक्र विहार, मौर्य और गुप्त सम्राटों की कीर्ति का खंडहर था। भग्न चूड़ा, तृण-गुल्मों से ढके हुए प्राचीर, ईंटों की ढेर में बिखरी हुई भारतीय शिल्प की विभूति, ग्रीष्म की चन्द्रिका में अपने को शीतल कर रही थी।

जहाँ पंचवर्गीय भिक्षु गौतम का उपदेश ग्रहण करने के लिए पहले मिले थे, उसी स्तूप के भग्नावशेष की मलिन छाया में एक झोपड़ी के दीपालोक में एक स्त्री पाठ कर रही थी”अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते……..” (पृष्ठ सं. 87)

कठिन-शब्दार्थ-धर्मचक्र विहार = बौद्ध धर्म का उपासना केन्द्र। कीर्ति = यश। खंडहर = टूटा-फूटा मकान। भग्न = टूटा। चूड़ा = शिखर, ऊपर का स्थान। तृण = घास। गुम = लता, बेल। प्राचीर = चहारदीवारी। शिल्प = भवन-निर्माण कला। चन्द्रिका = चाँदनी। स्तूप = बौद्ध धर्म से सम्बन्धित भवन। भग्नावशेष = टूटने के बाद बचा भाग, खंडहर। दीपालोक = दीपक का प्रकाश

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘सृजन’ में संकलित जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कहानी ‘ममता’ से उद्धृत है।
ममता रोहतास का दुर्ग छोड़कर चली गई। उसके पिता की हत्या हो चुकी है। काशी के उत्तर में बौद्ध विहार के खंडहरों में उसने एक झोपड़ी बनाई और वहीं रहने लगी।

व्याख्या-लेखक कहता है कि काशी के नगर के उत्तर में बौद्ध धर्म के उपासकों का उपासना केन्द्र अर्थात विहार था। वह अब टूट-फूट गया था। कभी इस विहार का निर्माण मौर्य और गुप्त सम्राटों ने कराया था। वे दोनों ही बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। इस विहार के खंडहरों को देखकर उन सम्राटों के यशस्वी होने का पता चलता था। इस विहार के ऊपरी कक्ष टूट-फूट गए थे। उसकी चहारदीवारी घास-फूस और लताओं से ढकी थी। भारत की भवन निर्माण कला के प्रमाण ये बिहार टूट गए थे और ईंटें इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं। गर्मी का मौसम था और उस पर चन्द्रमा की चाँदनी पड़ रही थी और उसको ठंडा कर रही थी। वहाँ एक स्तूप का खंडहर था। यहाँ पंचवर्गीय भिक्षु गौतम बुद्ध का उपदेश सुनने तथा उनके शिष्य बनने के लिए एकत्र हुए थे। उसी स्तूप की मटमैली छाया में एक झोपड़ी बनी थी। उसमें एक दीपक जल रहा था। एक स्त्री झोपड़ी में बैठी थी और दीपक के धीमे प्रकाश में धार्मिक पाठ कर रही थी”अनन्यश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते……..”। (जो लोग मुझको अनन्य मानकर मेरी उपासना करते हैं…….)

विशेष-
(i) ममता अब विहार के खंडहरों में बनी झोपड़ी में रहती है।
(ii) अंधेरा हो गया है। उसकी झोपड़ी में दीपक जल रहा है। उसके मंद प्रकाश में वह धार्मिक पाठ कर रही है।
(iii) भाषा संस्कृतनिष्ठ तथा तत्सम शब्दावली प्रधान है।
(iv) शैली वर्णनात्मक है।

4. “परन्तु तुम भी वैसे ही क्रूर हो, वही भीषण रक्त की प्यास, वही निष्ठुर प्रतिबिम्ब, तुम्हारे मुख पर भी है! सैनिक! मेरी कुटी में स्थान नहीं। जाओ, कहीं दूसरा आश्रय खोज लो।”
“गला सूख रहा है, साथी छूट गये हैं, अश्व गिर पड़ा है-इतना थका हुआ हूँ-इतना!” कहते-कहते वह व्यक्ति धम से बैठ गया और उसके सामने ब्रह्माण्ड घूमने लगा। स्त्री ने सोचा, यह विपत्ति कहाँ से आई। उसने जल दिया, मुगल के प्राणों की रक्षा हुई। वह सोचने लगी- “ये सब विधर्मी दया के पात्र नहीं-मेरे पिता का वध करने वाले आततायी!” घृणा से उसका मन विरक्त हो गया। ..
स्वस्थ होकर मुगल ने कहा- “माता! तो फिर मैं चला जाऊँ?”
स्त्री विचार कर रही थी-“मैं ब्राह्मणी हूँ, मुझे तो अपने धर्म-अतिथिदेव की उपासना का पालन करना चाहिए। परन्तु यहाँ…..नहीं नहीं ये सब विधर्मी दया के पात्र नहीं। परन्तु यह दया तो नहीं……कर्तव्य करना है। तब?” (पृष्ठ सं. 88)

कठिन-शब्दार्थ-क्रूर = निर्दयी। निष्ठुर = कठोर, निर्दयतापूर्ण। प्रतिबिम्ब = छाया। आश्रय = शरणस्थल। ब्रह्माण्ड = पूरा संसार। विधर्मी = अपने धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म के अनुयायी। आततायी = दुष्ट, अशांति फैलाने वाला। विरक्त = स्नेहहीन। अतिथि देव की उपासना = अतिथि को देवता मानकर उसका सत्कार करना।

सन्दर्भ एवं प्रसंगः-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ममता शीर्षक कहानी से उदधृत है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं।

मुगल ने ममता से शरण माँगी और उसके झोपड़ी में रात्रि विश्राम करने की अनुमति चाही। उसने बताया कि वह चौसा युद्ध में शेरशाह से परास्त होकर भटक रहा है। वह थका हुआ है तथा किसी सुरक्षित स्थान पर रात बिताना चाहता है।

व्याख्या–ममता ने मुगल की बात सुनकर कहा-किन्तु तुम भी शेरशाह के समान ही निर्दयी लगते हो। तुम्हारे मुख पर वैसी ही निर्दयता की झलक है। तुम भी उसी प्रकार खून के प्यासे हो। यह कहते हुए ममता ने उसको अपनी झोपड़ी में शरण देने से मना कर दिया। उसने कह दिया कि वह कोई दूसरा स्थान तलाश करे। उस मुगल ने बताया कि उसे जोर की प्यास लगी है। उसका गला सूख रहा है। उसके साथी पीछे छूट गए हैं। उसका घोड़ा गिर पड़ा है। वह बहुत ज्यादा थका हुआ है। यह बताते-बताते वह धम्म की आवाज के साथ जमीन पर बैठ गया। समस्त सृष्टि उसको चक्कर काटती हुई प्रतीत हुई। उसको इस दयनीय दशा में देखकर ममता ने सोचा कि उसके सामने यह आपत्ति कहाँ से आ गई। उसने मुगल को पानी पिलवाया तो उसकी जान में जान आई। वह कुछ स्वस्थ हुआ। उसके प्राण बचे।

ममता ने सोचा-वह भी शेरशाह की तरह दूसरे और पराये धर्म को मानने वाला है। इन पर दया नहीं करनी चाहिए। इन दुष्टों ने ही मेरे पिता का वध किया था। उसके मन में घृणा की भावना उत्पन्न हो गई। उस कारण उसके मन से स्नेह का भाव समाप्त हो गया। मुगल कुछ स्वस्थ हुआ तो उसने पूछा-माता! तो मैं चला जाऊँ? ममता ने विचार किया कि वह ब्राह्मण जाति की स्त्री है। उसको अपने अतिथि सत्कार के कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए। फिर उसने सोचा कि उसको उन सभी विधर्मियों पर दया नहीं दिखानी चाहिए। वे दया के योग्य नहीं हैं। उसके मन में द्वन्द्व हो रहा था। वह सोच रही थी कि यह दया नहीं है। यह तो अतिथि सत्कार के अपने कर्तव्य का पालन करना है-तब वह क्या करे?

विशेष-(i) मुगल थका और प्यासा था। उसने ममता से शरण माँगी।
(ii) मुगल विधर्मी था। उसको देखकर ममता को क्रूर शेरशाह का स्मरण हो आया। उसे शरण देना उचित नहीं लगा। परन्तु ममता के मन में शरण देने न देने तथा शरणागत वत्सलता दिखाने या न दिखाने के भावों के बीच संघर्ष होने लगा।
(iii) भाषा संस्कृतनिष्ठ, परिमार्जित तथा प्रवाहपूर्ण है।
(iv) शैली वर्णनात्मक तथा विचारात्मक है।

5. ममता ने मन में कहा-“यहाँ कौन दुर्ग है! यही झोपड़ीन, जो चाहे ले-ले, मझे तो अपना कर्तव्य करना पड़ेगा।” वह बाहर चली आई और मुगल से बोली-“जाओ भीतर, थके हुए भयभीत पथिक! तुम चाहे कोई हो, मैं तुम्हें आश्रय देती हूँ। मैं ब्राह्मण-कुमारी हूँ, सब अपना धर्म छोड़ दें, तो मैं भी क्यों छोड़ दूँ? मुगल ने चन्द्रमा के मन्द प्रकाश में वह महिमामय मुखमण्डल देखा, उसने मन-ही-मन नमस्कार किया। ममता पास की टूटी हुई दीवारों में चली गई। भीतर, थके पथिक ने झोपड़ी में विश्राम किया। (पृष्ठ सं. 88)

कठिन शब्दार्थ-दुर्ग = किला। भयभीत = डरा हुआ। धर्म = कर्तव्य।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ममता’ शीर्षक कहानी से उद्धृत है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। ममता ने शरण की याचना करने वाले मुगल से कहा कि कहीं वह उसके साथ छल तो नहीं करेगा। ‘छल’ शब्द सुनकर मुगल आहत हुआ। वह वहाँ से चले जाने को उद्यत हुआ।

व्याख्या–ममता ने अपने मन में सोचा कि उसको मुगल को आश्रय देना चाहिए। उसके पास एक मामूली-सी झोपड़ी ही तो है! वह कोई किले की स्वामिनी तो है नहीं। इस झोपड़ी को जो चाहे ले ले। उसे इससे क्या फर्क पड़ता है। उसे अपने अतिथि सत्कार के कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए। यह सोचकर ममता ने मुगल को रोका। वह झोपड़ी से बाहर आ गई। उसने उससे कहा कि वह चाहे कोई भी हो। वह उसको आश्रय देगी। वह थका और टूटा हुआ है। वह झोपड़ी के अन्दर जाए और विश्राम करे। वह ब्राह्मण की बेटी है। संसार में सभी अपने कर्तव्य छोड़ दें तो भी वह अपना कर्तव्य नहीं छोड़ेगी। वह शरणागत को वापस जाने को नहीं कहेगी। चन्द्रमा की चाँदनी ममता के चेहरे पर पड़ रही थी। मुगल ने उसकी ओर देखा तो वह अत्यन्त महिमाशालिनी प्रतीत हुई। उसने मन ही मन उसको प्रणाम किया। ममता पास की टूटी हुई दीवारों में चली गई। मुगल झोपड़ी में भीतर चला गया और वहाँ रातभर आराम करता रहा।

विशेष-
(i) ममता की उदारता तथा शरणागतवत्सलता का भव्य चित्रण हुआ है।
(ii) वह घृणा तथा भय से मुक्त होकर मुगल को अपनी झोपड़ी में आश्रय प्रदान करती है।
(iii) भाषा प्रवाहपूर्ण संस्कृतनिष्ठ और तत्समता प्रधान है।
(iv) शैली संवादात्मक है।

6. अश्वारोही पास आया। ममता ने रुक-रुककर कहा-‘मैं नहीं जानती कि वह शहंशाह था या साधारण मुगल, पर एक दिन इसी झोपड़ी के नीचे वह रहा। मैंने सुना था कि वह मेरा घर बनवाने की आज्ञा दे चुका था! भगवान ने सुन लिया, मैं आज इसे छोड़े जाती हूँ। अब तुम इसका मकान बनाओ या महल, मैं अपने चिर-विश्राम-गृह में जाती हूँ।’ वह अश्वारोही अवाक् खड़ा था। बुढ़िया के प्राण-पक्षी अनन्त में उड़ गये। वहाँ एक अष्टकोण मन्दिर बना और उस पर शिलालेख लगाया गया ‘सातों देश के नरेश हुमायूँ ने एक दिन यहाँ विश्राम किया था। उनके पुत्र अकबर ने उनकी स्मृति में यह गगनचुम्बी मन्दिर बनाया।’ पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं। (पृष्ठ सं. 89)

कठिन-शब्दार्थ-अश्वारोही = घुड़सवार। शहंशाह = बादशाह। चिर विश्राम गृह = परलोक। अवाक् = शांत, बिना कुछ बोले। अनन्त = जिसका अन्त न हो। अष्टकोण आठ कोनों वाला मंदिर भवन। शिलालेख = पत्थर पर लिखी बात। गगनचुम्बी = अत्यन्त ऊँचा।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ममता’ शीर्षक कहानी से उदघृत है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं।

ममता सत्तर वर्ष की वृद्धा थी। वह बीमार और मरणासन्न थी। उसी समय उसकी झोपड़ी के द्वार पर एक घुड़सवार आया। वह उस स्थान को तलाश रहा था जहाँ कभी हुमायूँ ने रात बिताई थी।

व्याख्या–ममता ने घुड़सवार की बात सुन ली थी। उसने उसको अपने पास बुलाया। घुड़सवार उसके पास आया तो ममता ने अटक-अटक कर उसको बताया कि वह जिस स्थान को तलाश रहा है, वह यही स्थान है। इसी झोपड़ी में कभी एक मुगल सैनिक ने रात में विश्राम किया था। उसको यह नहीं पता कि वह साधारण मुगल था या कोई बादशाह था। उसने सुना था कि उसने ममता का घर बनवाने की आज्ञा दी थी। आज ईश्वर ने उसकी बात सुन ली है। उसका बुलावा आ गया है। वह इस झोपड़ी को छोड़कर जा रही है। अब वे लोग इसका मकान बनाएँ या महल, यह उनकी मर्जी है। वह तो अपने स्थायी निवास स्थान अर्थात् परलोक जा रही है। यह कहते-कहते ममता ने प्राण त्याग दिए। उस स्थान पर एक अत्यन्त ऊँचा आकाश को छूने वाला भव्य आठ कोने वाला भवन बनाया गया। उस पर एक पत्थर लगा था, जिसमें यह लिखा था-यहाँ बादशाह हुमायूँ ने एक रात विश्राम किया था। उस घटना को यादगार बनाने के लिए उसके पुत्र अकबर ने इस आकाश को चूमने वाले ऊँचे भवन को बनवाया है। इस शिलालेख में ममता का नाम कहीं नहीं था।

विशेष-
(i) ममता के अन्त समय का वर्णन है।
(ii) ममता का नाम शिलालेख में न होना उसकी उपेक्षा का सूचक है। भवन बनाने वालों को यह चिन्ता तो है कि हुमायूँ कहाँ रुका था किन्तु ममता की उदारता तथा त्याग का उनको ध्यान भी नहीं आता।
(iii) भाषा संस्कृतनिष्ठ, तत्सम प्रधान तथा प्रवाहपूर्ण है।
(iv) शैली वर्णनात्मक है। अंतिम पंक्ति व्यंग्यपूर्ण है।