RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 3  पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 3 रहीम वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
रहीम के काव्य की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता क्या है –
(अ) सामासिकता
(ब) शृंगारिकता
(स) नीति प्रवणता
(द) अनुभव संकुलता।
उत्तर:
(अ)

प्रश्न 2.
विपत्ति में धन किसकी तरह लुप्त हो जाता है(अ) प्रात:कालीन तारों की तरह
(ब) मित्र की तरह
(स) दुश्मन की तरह
(द) हवा की तरह
उत्तर:
(द)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 3 रहीम अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
काज परे कछ और है, काज सरै कछु और।
रहिमन भंवरी के भए, नदी सिरावत मौर॥
प्रस्तुत दोहे के माध्यम से रहीम जी ने मनुष्य की किस प्रवृत्ति का वर्णन किया है? समझाइए।
उत्तर:
प्रस्तुत दोहे के द्वारा रहीम ने मनुष्य की स्वार्थी प्रवृत्ति का परिचय कराया है। जब तक मनुष्य का किसी व्यक्ति या वस्तु से स्वार्थ सिद्ध होता है वह उसे बड़ा महत्त्व देता है और काम निकल जाने पर उसे ठुकरा देता है।

प्रश्न 2.
कवि के अनुसार बुरे स्वभाव वाले व्यक्ति कैसे अच्छे स्वभाव वाले व्यक्तियों की प्रवृत्ति को बदल नहीं पाते? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि ने चंदन के वृक्ष और विषैले सर्पो का उदाहरण देते हुए बताया है कि अच्छे स्वभाव वाले व्यक्तियों पर बुरे स्वभाव वाले व्यक्तियों की संगति से कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। इसी प्रकार गंगा में मिलने वाला गंदा नाला, उसकी पवित्रता पर कोई प्रभाव नही डाल पाता।

प्रश्न 3.
रहीम जी ने सज्जन व्यक्ति के रूठ जाने पर भी बार-बार मनाने की बात क्यों कही है।
उत्तर:
रहीम के अनुसार एक सज्जन व्यक्ति, मोतियों के हार जैसा ही मूल्यवान और शोभा बढ़ाने वाला होता है। जब लोग मोती के हार के बार-बार टूटने पर भी उसे फेंक नहीं देते। उसे हर बार फिर से पिरोते हैं तो फिर सज्जन को भी सौ बार रूठने पर मनाना ही बुद्धिमानी है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 3 रहीम लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
” थोथे बादर क्वार के …………. पाछिली बात” प्रस्तुत दोहे का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
क्वार मास के बादल गरजते ही हैं, बरसते नहीं। उनका यह ग़र्जन-तर्जन केवल पिछले मासों में उनको भारी वर्षा की याद दिलाता है। धरती को नहीं सींच पाता। इसी प्रकार जो व्यक्ति कभी बहुत धनवान था, वह निर्धन हो जाने पर अपने पुराने दिनों की बातें किया करता है। इसी प्रकार वह अपनी वर्तमान दयनीय दशा पर पर्दा डालने का प्रयत्न किया करता है।

प्रश्न 2.
“नीति काव्य के क्षेत्र में रहीम का स्थान सर्वोपरि है।” इस कथन के विषय में अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
नीति काव्य की परम्परा में यों तो अनेक उल्लेखनीय नाम हैं। किन्तु कबीर, तुलसी, कृपाराम, बिहारी तथा गिरिधर कविराय आदि ने नीति काव्य के कोष को बहुत बढ़ाया है। किन्तु इन सभी में रहीम का अपना अलग ही स्थान है। अन्य कवियों ने कुछ सीमित विषयों को लेकर नीतिपरक रचनाएँ की हैं किन्तु रहीम ने जीवन के व्यापक और अनेक विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है। रहीम दोहों में उनके स्वयं के अनुभवों तथा विविध विषयों पर प्रभावशाली नीति वाक्य प्राप्त होते हैं। सरल तथा सीधी हदय पर प्रभाव छोड़ने वाली भाषा और शैली में उन्होंने नीति काव्य का चिरस्थायी सृजन किया है। अत: रहीम का नीति काव्य के क्षेत्र में एक उल्लेखनीय स्थान है।

प्रश्न 3.
रहीम ने अपने मन की व्यथा अपने मन तक ही सीमित रखने को क्यों कहा है?
उत्तर:
व्यथा हो या आनंद मनुष्य का स्वभाव है कि वह इसे साझा करके सुख पाता है। जब मनुष्य का मन किसी कारण व्यथित होता है। तो उसे सहानुभूति दिखाने वाले व्यक्ति की आवश्यकता होती है। इससे उसका दुख कम हो जाता है। रहीम कहते हैं कि अपने मन की व्यथा को अपने में ही छिपा कर रखो। इसका कारण भी उन्होंने बताया है। वह कहते हैं कि यदि अपने मन की व्यथा दूसरों को सुनाओगे तो उसे बाँटने वाला तो नहीं मिल पायेगा। किन्तु उसे सुनकर इठलाने वाले, मन ही मन हँसने वाले अनेक मिल जाएँगे। इससे तुम्हारी व्यथा कम न होकर और बढ़ जाएगी।

प्रश्न 4.
“माँगे घटत रहीम पद …………..तऊ बावनै नाम।” । प्रस्तुत दोहे का कथन स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस दोहे में कवि ने माँगने या याचना करने से, मनुष्य की प्रतिष्ठा और पद कम होने के बारे में बताया है। देवताओं को उनका स्वर्ग राज्य पुनः दिलाने के लिए, विष्णु एक वामन (बौने ) बटुक (छात्र) का वेश धारण करके दैत्यराज बलि से थोड़ी-सी भूमि माँगने गए। उन्होंने बलि से केवल तीन डग धरती माँगी। जब बलि देने को प्रस्तुत हो गए तो विष्णु ने अपने शरीर को इतना विराट कर लिया कि उनके दो डगों में सारी धरती नप गई और तीसरा डग फिर भी बाकी रही। कवि ने इस कथा द्वारा यही संकेत दिया है कि इतना विशाल आकार धारण करने पर भी विष्णु का नाम वामन अर्थात् बौना ही प्रसिद्ध हो गया। माँगने के कारण वह भगवान से याचक हो गये। अतः मनुष्य को अपना स्वाभिमान नहीं त्यागना चाहिए। हाथ नहीं फैलाना चाहिए।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 3 रहीम व्याख्यात्मक प्रश्न

1. “मान सहित विष खाय………….राहु कटायो सीस॥ दोहे की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
(संकेत- छात्र ‘सप्रसंग व्याख्याएँ’ शीर्षक के अंतर्गत इस दोहे की व्याख्या का अवलोकन करें और स्वयं व्याख्या लिखें)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 3 रहीम अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 3 रहीम वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. ‘मूल’ को सींचने से –

(क) वृक्ष का तना पुष्ट होता है।
(ख) डालें बढ़ती हैं।
(ग) पत्ते हरे-भरे रहते हैं।
(घ) सारा वृक्ष फलता-फूलता है।

2. भाँवरें पड़ने के बाद नदी में सिरा देते हैं –

(क) हवन घी भस्म को
(ख) दूल्हे के मौर को
(ग) कंगनों को
(घ) पूजन सामग्री को।

3. ‘काक और पिक’ की पहचान होती है –

(क) वर्षा ऋतु में
(ख) वसंत ऋतु में
(ग) शरद ऋतु में
(घ) शीत ऋतु में।

4. मथने पर मक्खन नहीं निकलता

(क) ठंडे दूध से
(ख) गर्म दूध से
(ग) फटे दूध से
(घ) मीठे दूध से।

5. जीभ की वकबाद का फल भुगतना पड़ता है –

(क) हाथों को
(ख) पीठ को
(ग) आँखों को
(घ) सिर को।

उत्तर:

  1. (घ)
  2. (ख)
  3. (ख)
  4. (ग)
  5. (घ)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 3 रहीम अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
रहीम ने छोटे व्यक्तियों के महत्व को किस प्रकार जताया है?
उत्तर:
रहीम ने सुई और तलवार के उदाहरण द्वारा छोटे या साधारण लोगों के महत्व को दिखाया है। सुई का काम तलवार से नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 2.
वृक्ष को फलता-फूलता बनाने के लिए किसे सींचना चाहिए?
उत्तर:
वृक्ष को फलता-फूलता बनाने के लिए उसकी जड़ को सींचना चाहिए।

प्रश्न 3.
रहीम ने स्वाति की बूंद के द्वारा क्या-क्या सीख दी है?
उत्तर:
रहीम ने स्वाति की बूंद के द्वारा सीख दी है कि व्यक्ति जैसे लोगों की संगति करता है, वैसा ही बन जाता है।

प्रश्न 4.
कुसंग का प्रभाव किन लोगों पर नहीं पड़ता है?
उत्तर:
रहीम के अनुसार उत्तम स्वभाव वाले लोगों पर कुसंग का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रश्न 5.
सज्जनों की तुलना रहीम ने किससे की है?
उत्तर:
रहीम ने सज्जनों की तुलना मोतियों के हार से की है।

प्रश्न 6.
सज्जनों की सम्पत्ति किसके काम आती है?
उत्तर:
सज्जनों की सम्पत्ति दूसरों के उपकार के काम आया करती है।

प्रश्न 7.
धनी व्यक्ति निर्धन हो जाने पर किस बारे में बातें किया करता है?
उत्तर:
धनी व्यक्ति निर्धन हो जाने पर अपने पिछले दिनों के बारे में बातें किया करता है।

प्रश्न 8.
आँखों से टपकने वाले आँसू क्या प्रकट कर दिया करते हैं?
उत्तर:
आँखों से टपकने वाले आँसू मन के दुख को प्रकट कर देते हैं।

प्रश्न 9.
मन की व्यथा दूसरों को बताने पर क्या परिणाम होता है?
उत्तर:
अपने मन का दुख दूसरों को सुनाने पर लोग दुख को बाँटते नहीं हैं अपितु दुखी व्यक्ति पर हँसते और इठलाते हैं।

प्रश्न 10.
रहीम ने कैसे व्यक्ति को दीनबंधु’ के समान माना है?
उत्तर:
रहीम का मानना है कि जो व्यक्ति दीनजनों पर ध्यान देता है, उनकी सहायता करता है, वह दीनबंधु अर्थात् भगवान के समान होता है।

प्रश्न 11.
कौए और कोयल का अंतर कब ज्ञात होता है?
उत्तर:
कौए और कोयल का अंतर वसंत ऋतु आने पर होता है, जब दोनों बोलते हैं।

प्रश्न 12.
बड़ों की विशेषता क्या होती है?
उत्तर:
बड़े लोग अपने मुख से अपनी बढ़ाई नहीं किया करते तथा शेखी नहीं बघारते।

प्रश्न 13.
‘बिगरी बात बनै नहीं’ कवि रहीम के इस कथन का आशय क्या है?
उत्तर:
कथन का आशय है कि एक बार व्यक्ति की छवि धूमिल हो जाने पर फिर से उसे बना पाना सम्भव नहीं होता।

प्रश्न 14.
बुरे दिन आने का मनुष्य के धन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
रहीम के अनुसार विपत्ति आने पर मनुष्य का धन नष्ट हो जाता है। चाहे वह करोड़पति भी क्यों न हो।

प्रश्न 15.
भगवान विष्णु का नाम ‘वामन’ क्यों पड़ गया?
उत्तर:
दैत्यों के राजा बलि से भूमि की याचना करने के कारण अत्यंत विराट स्वरूप धारण करने पर भी विष्णु ‘वामन’ (बौना) । नाम से पुकारे जाते हैं।

प्रश्न 16.
बिना मान के अमृत पीने का दैत्य राहु को क्या परिणाम भोगना पड़ा?
उत्तर:
‘मोहनी’ रूप धारी भगवान विष्णु ने देवताओं के बीच उसे पहचान लिया और चक्र से उसका सिर काट डाला।

प्रश्न 17.
जीभ की करतूत का फल किसे और कैसे भोगना पड़ता है?
उत्तर:
जीभ अपशब्द बोल कर अंदर हो जाती है और उसके फलस्वरूप सिर को जूते खाने पड़ते हैं।

प्रश्न 18.
मधुर वार्तालाप के बीच क्रोध को रहीम ने कैसा बताया है?
उत्तर:
रहीम ने क्रोध को मिश्री में मिली हुई बाँस की नीरस फाँस (तीली) के समान बताया है।

प्रश्न 19.
संकलित दोहों के आधार पर बताइए कि रहीम का इन दोहों की रचना के पीछे क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
कवि रहीम विविध विषयों पर आधारित इन दोहों द्वारा हमें उत्तम जीवन मूल्यों का तथा लोक व्यवहार में उपयोगी नीतियों का ज्ञान कराना चाहते हैं।

प्रश्न 20.
पाठ्यपुस्तक में संकलित दोहों के अध्ययन से रहीम के व्यक्तित्व के बारे में क्या बातें ज्ञात होती हैं।
उत्तर:
इन दोहों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि रहीम एक श्रेष्ठ कवि, उदार हृदय मानव, अनुभवी पुरुष और नीतिज्ञ विद्वान थे।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 3 रहीम लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
“रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।” कवि रहीम ने ऐसा क्यों कहा है? लिखिए।
उत्तर:
जब व्यक्ति की मित्रता या जान-पहचान बड़े लोगों से हो जाती है तो वह छोटे स्तर के साथियों की उपेक्षा करने लगता है। कवि रहीम ऐसा करना बुद्धिमानी नहीं मानते क्योंकि छोटे व्यक्ति या छोटी वस्तु से हो सकने वाला काम बड़ा नहीं कर सकता।

सुई तलवार की अपेक्षा बहुत छोटी होती है परन्तु तलवार बड़ी होने पर भी सुई द्वारा किए जाने वाले कार्य को- सिलाई को नहीं कर सकती। अत: छोटों से सम्बंध बनाए रखना बुद्धिमत्ता की निशानी है।

प्रश्न 2.
“एकै साधे सब सधै” रहीम के इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यदि मनुष्य एक बार में, किसी एक ही कार्य पर पूरा ध्यान देकर उसमें सफलता पाने का प्रयत्न करता है तो उसे सफलता नहीं मिलती। परन्तु जो व्यक्ति एक बार में ही सारे कार्यों को सफल बनाने का प्रयास करता है उसे किसी भी कार्य में सफलता नहीं मिल पाती। रहीम इस लोकोक्ति के समर्थन में वृक्ष की जड़ को र्सीचे जाने का दृष्टांत देते हैं। यदि वृक्ष की जड़ में पानी दिया जाएगा तो वह वृक्ष के हर अंग को पुष्ट बनाएगा तना, डालियाँ, पत्ते, फूल और फल, सब संतुष्ट होकर वृक्ष की शोभा बढ़ाएँगे।

प्रश्न 3.
‘स्वाति एक गुन तीन’ इस कथन का तात्पर्य क्या है? लिखिए।
उत्तर:
ज्योतिष्य के अनुसार सत्ताइस नक्षत्रों में एक का नाम ‘स्वाति’ है। ऐसा विश्वास चला आ रहा है कि स्वाति नक्षत्र के समय जो वर्षा की बूंदें गिरती हैं, उनके विविधि वस्तुओं के सम्पर्क में आने पर, अनेक रूप हो जाते हैं। केले में गिरने पर वह बूंद कपूर बन जाती है। सीप में गिरने पर मोती बन जाती है और सर्प के मुख में गिरने पर वही स्वाति की बूंद विष बन जाया करती है। कवि ने इस कथन के माध्यम से संकेत किया है कि व्यक्ति जैसे लोगों की संगति में रहता है, वैसा ही बन जाता है। अतः सदा सत्संगति करनी चाहिए।

प्रश्न 4.
सामान्य व्यक्ति स्वभाव से स्वार्थी होता है’ रहीम ने इस तथ्य के समर्थन में क्या दृष्टांत दिया है। संकलित दोहे के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
रहीम ने अपने दोहे में कहा है कि अपना मतलब या स्वार्थ होने पर मनुष्य का औरों के साथ व्यवहार कुछ होता है और स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर कुछ और हो जाता है। इसके समर्थन में कवि विवाह की रीतियों का दृष्टांत प्रस्तुत करता है। विवाह के चलते वर-वधू एक दूसरे के वस्त्र में गाँठ बाँध कर भाँवरें लेते हैं, अग्नि की परिक्रमा करते हैं। विवाह की यह सबसे महत्वपूर्ण क्रिया है। विवाह सम्पन्न होने तक वर द्वारा सिर पर धारण किए जाने वाले मौर या मुकुट को बड़ा सम्मान और महत्व दिया जाता है किन्तु भाँवरें पड़ने के बाद उसे नदी में बहा दिया जाता है। यही बात मनुष्य के आचरण में भी दिखाई देती है। मतलब निकल जाने पर वह उसी व्यक्ति या वस्तु की उपेक्षा कर देता है, जिससे उसका महत्वपूर्ण कार्य सिद्ध हुआ है।

प्रश्न 5.
चंदन के वृक्ष और सर्यों को कवि रहीम ने किस संदर्भ में उल्लेख किया है। संकलित दोहों के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
चंदन लगाने से शीतलता का अनुभव होता है। चंदन की इसी विशेषता के आधार पर लोग मानते आ रहे हैं कि चंदन के वृक्षों पर विषैले सर्प अपने विष के ताप से बचने के लिए चंदन की डालियों पर लिपटे रहते हैं। कवि रहीम ने इस तथ्य का उपयोग उत्तम स्वभाव वाले पुरुषों की विशेषता बताने के लिए किया है। जैसे सर्यों के लिपटे रहने से चंदन पर उनके विष का कोई प्रभाव नहीं होता, उसी प्रकार उत्तम स्वभाव वाले लोगों पर कुसंग का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रश्न 6.
रहीम अपने पाठकों को सज्जनों के प्रति कैसा व्यवहार रखने का परामर्श देते हैं? लिखिए।
उत्तर:
रहीम कहते हैं कि सज्जन लोगों की मित्रता बड़ी मूल्यवान होती है। अत: यदि वे सौ बार भी रूठे तो उन्हें अवश्य मनाना चाहिए। किसी भी स्थिति में उनसे मित्रता या सम्बंध नहीं टूटने देना चाहिए। वे अत्यन्त मूल्यवान मोतियों के हार के तुल्य होते हैं। जैसे लोग बार-बार टूटने पर भी मोतियों के हार को हर बार पिरोते हैं। इसी प्रकार उत्तम स्वभाव वालों की मित्रता को भी बचाना चाहिए।

प्रश्न 7.
रहीम के अनुसार सज्जन लोग सम्पत्ति को संचय किसलिए किया करते हैं? इसके पक्ष में कवि ने कौन से उदाहरण दिए हैं? लिखिए।
उत्तर:
रहीम के अनुसार सज्जन लोग अपने सुख के लिए सम्पत्ति का संचय नहीं किया करते हैं। वे केवल परोपकार के लिए ही धन अर्जित करते हैं। कवि ने इस मते के पक्ष में वृक्षों और सरोवरों का उदाहरण दिया है। वृक्षों पर लगने वाले फलों को वृक्ष स्वयं नहीं खाते । अन्य प्राणी ही उनका आनन्द लिया करते हैं। इसी प्रकार सरोवर भी अपने जल को स्वयं नहीं पीते। उनके जल से पशु, पक्षी और मनुष्य ही अपनी प्यास बुझाया करते हैं।

प्रश्न 8.
क्वार मास के बादलों के बारे में रहीम ने क्या कहा है? लिखिए।
उत्तर:
क्वार मास में वर्षा थम जाती है। बादल आते हैं। घुमड़ते हैं, गरजते भी हैं। किन्तु बरसते नहीं क्योंकि वे जल रहित हो चुके होते हैं। इन बादलों को देखकर रहीम इनकी तुलना उस व्यक्ति से करते हैं जो कभी धन-सम्पन्न था और समय के प्रभाव से धनहीन हो गया है। ऐसा व्यक्ति अपनी वर्तमान दशा पर पर्दा डालने के लिए, अपने पिछले सम्पन्न जीवन की ही बातें किया करता है। इसी प्रकार क्वार के बादल भी जलरूपी धन से हीन हैं और वे गरज-गरज कर अपने पिछले रूप की याद कराते रहते हैं।

प्रश्न 9.
“जाहि निकारौ गेह ते, कस न भेद कहि देइ॥” रहीम ने यह पंक्ति किस संदर्भ में और क्या सीख देने के लिए कही है?
उत्तर:
रहीम ने यह पंक्ति दुखी व्यक्तियों को ध्यान में रखते हुए कही है। दुख आ पड़ने पर लोगों की आँखों से बरबस ही आँसू ढुलक पड़ते हैं। ये आँसू उस व्यक्ति के मन के दुख को सब पर प्रकट कर देते है। यह स्वभाविक बात है। जिसे आप घर से निकाल दोगे वह बाहर बालों से घर का कौन सा भेद नहीं कह देगा। इस से घर-परिवार की बदनामी भी हो सकती है। अत: रहीम सीख देना चाहते हैं। कि दुख को धैर्यपूर्वक सहन कर लेना चाहिए। आँसू बहाकर अपना स्वाभिमान नहीं खोना चाहिए।

प्रश्न 10.
“दीन सबन को …………. सम होय॥” इस दोहे में निहित आलंकारिक विशेषता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
इस दोहे में कवि ने अपनी काव्य-कुशलता का परिचय देते हुए श्लेष के प्रयोग से कथन को चमत्कारी बनाया है। सामान्य अर्थ यह है कि दीन व्यक्ति सबकी ओर आशा भरी दृष्टि से देखा करता है परन्तु दीन की ओर कोई ध्यान नहीं देता। जो दोनों की सहायता करता है वह ईश्वर के तुल्य होता है। अन्य अर्थ है कि दीन सबकों देख सकता है परन्तु दीन किसी को दिखाई नहीं देता। जो दीन को देख ले वह ईश्वर के समान होता है अर्थात् ईश्वर सबको देखा करता है। सब पर ध्यान देता है। परन्तु ईश्वर को कोई नहीं देख पाता। अत: दीन ईश्वर के समान है। जो उसे देख सके वह ईश्वर के समान है।

प्रश्न 11.
“दोनों रहिमन एक से” कवि रहीम किन दोनों को एक जैसा बताते हैं। और इस दोहे के द्वारा क्या संदेश देना चाहते हैं?
उत्तर:
कवि रहीम ने कौए और कोयल को माध्यम बनाकर बड़ी उपयोगी सीख दी है। कौए और कोयल का बाहरी रूप-रंग लगभग एक जैसा होता है। उनमें कौन कौआ है और कौन कोयल, यह तभी पता चलता है जब वे दोनों वसंत ऋतु आने पर बोलना आरम्भ करते हैं। कवि का संदेश है कि व्यक्तियों के बाहरी रूप-रंग के आधार पर उनके आंतरिक गुणों का परिचय नहीं मिलता। किन्तु उनकी भाषा या बोली बता देती है कि कौन गुणी है और कौन गुणी जैसा रूप-रंग धारण करने वाला पाखंडी है। अत: उचित परीक्षा के उपरांत ही किसी को प्रशंसा या मित्रता का पात्र बनाना चाहिए।

प्रश्न 12.
रहीम ने बड़प्पन का आधार किसे माना है? हीरा अत्यन्त मूल्यवान क्यों है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
रहीम बड़प्पन या महानता का आधार व्यक्ति या वस्तु के गुणों को मानते हैं। जो वास्तव में बड़ा होता है वह अपने मुख से अपनी बेड़ाई करके बड़ा नहीं कहलाना चाहता। लोग उसके गुणों के आधार पर उसे स्वयं ही बड़ा या महान कहा करते हैं। हीरा अपने मुँह से कभी अपनी कीमत लाखों नहीं बताता। हीरे के रूप, रंग और विशेषताएँ ही उसे बड़ा मूल्यवान बना देते हैं।

प्रश्न 13.
‘बिगरी बात बनै नहीं’ बात बिगड़ने से कवि रहीम का आशय क्या है? इसका क्या परिणाम होता है। लिखिए।
उत्तर:
‘बात’ शब्द के कई लाक्षणिक अर्थ प्रचलित हैं। वचन देना, छवि सम्मान आदि बात के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। यदि किसी ने कोई वचन दे रखा है, प्रण धरे रखा है और वह पूरा न हो तो बात बिगड़ जाती है। इसी प्रकार व्यक्ति की छवि का धूमिल होना, सम्मान चला जाना भी बिगड़ना कहा जाता है। एक बार यदि बात बिगड़ जाती है तो फिर उसे बना पाना असम्भव-सा हो जाता है। कवि ने बात बिगड़ने की तुलना फटे दूध से की है। फटे दूध को कितना भी मथा जाए उससे मक्खन नहीं निकल पाता।

प्रश्न 14.
विपत्ति आने पर, मनुष्य के जीवन पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है? कवि रहीम ने इस विषय में क्या कहा है? लिखिए।
उत्तर:
कवि रहीम अपने निजी अनुभव के आधार पर कहते हैं कि जब मनुष्य पर विपत्ति पड़ती है, बुरे दिन आते हैं, तो उसकी सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। वह चाहे लखपति या कसेड़पति भी क्यों न हो, विपत्ति उसे अकिंचन बना डालती है। कवि इस तथ्य के समर्थन में कहता है कि जब सबेरा होता है तो आकाश के असंख्य तारे भी छिप जाते हैं। आकाश का सारा वैभव समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 15.
“माँगे घटत …………वामनै नाम।।” रहीम के इस दोहे में निहित पौराणिक घटना का संक्षिप्त परिचय दीजिए?
उत्तर:
इस दोहे में कवि ने आत्म सम्मान के महत्व को स्पष्ट किया है। दैत्यों से त्रस्त देवताओं की सुरक्षा के लिए भगवान विष्णु दैत्यराज बलि के यहाँ ‘वामन बटुक’ (बौना छात्र) का वेश बनाकर पहुँचे । विष्णु ने उनसे तीन डग धरती माँगी । बलि के वचन देने पर उन्होंने इतना विराट रूप बनाया कि उनके तीन डगों (कदम) सारी पृथ्वी नप गई और बलि को पाताल में जाकर रहना पड़ा। रहीम का कहना है कि विष्णु ने इतना अद्भुत काम किया फिर भी माँगने जाने से उन का पद घट गया। वह आज तक’वामन’ (छोटा या बौना) नाम से प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 16.
राहु कौन था, उसका सिर किसने और क्यों कोटा? संक्षिप्त उत्तर लिखिए।
उत्तर:
राहु एक दैत्य था। एक बार विष्णु भगवान के कहने पर देवताओं ने दैत्यों के साथ समुद्र की मंथन किया। उसमें समुद्र से अनेक रत्न (विशेष वस्तुएँ और व्यक्ति) प्राप्त हुए। इनमें विष और अमृत भी थे। विष को भगवान शिव ने पी लिया और अमृत पर देव दैत्यों में झगड़ा हुआ तो विष्णु ने अत्यंत सुंदर स्त्री-मोहनी का रूप धारण कर उसे दोनों को पिलाने का प्रस्ताव रखा। पहले देवताओं की बारी आई। यह देख एक दैत्य राहु देवताओं का रूप बनाकर अमृत पीने बैठ गया। विष्णु उसका कपट पहचान गए और उन्होंने अपने चक्र से उसका सिर काट दिया ।

प्रश्न 17.
‘रहिमन जिह्वा बाबरी ……….. खात कपाल ॥” इस दोहे के माध्यम से कवि रहीम ने क्या संदेश देना चाहा है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस दोहे के माध्यम से कवि ने वाणी पर संयम रखने का संदेश दिया है। व्यक्ति को बोलते समय विवेक का प्रयोग करना चाहिए और असंयमित, दूसरों को बुरी लगने वाली बातें नहीं कहनी चाहिए। यदि व्यक्ति अपशब्दों का प्रयोग करेगा तो उसे अपमानित होना पड़ेगा। जीभ को छूट देने पर जीभ का तो कुछ नहीं बिगड़ता किन्तु मनुष्य के सिर ( सम्मान) को जूते खाने पड़ते हैं। कवि ने बड़े रोचक ढंग से वाणी के संयम की सीख, इस दोहे द्वारा दी है।

प्रश्न 18.
कवि रहीम ने ‘मिश्री’ के माध्यम से क्या सीख दी है? संकलित दोहे के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मिश्री बनाने में बाँस की बारीक तीलियों या फाँसों का प्रयोग किया जाता था। इसी कार्य को माध्यम बनाकर कवि ने मधुर भाषण का महत्व बताया है। मधुर वार्तालाप में क्रोध का अंश आने पर बातचीत का आनंद किरकिरा हो जाता है। कवि ने मधुर स्वाद वाली मिश्री में बाँस की फाँसों को भी वैसा ही नीरस बताया है। कवि ने इस प्रकार क्रोध से बचे रहने की सीख दी है।

प्रश्न 19.
कवि रहीम द्वारा दी गई ऐसी दो सीखों का उल्लेख कीजिए जो आपको बहुत उपयोगी प्रतीत होती हैं।
उत्तर:
हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित रहीम के दोहों में अनेक उपयोगी सीखें दी गई हैं। इन सीखों में मुझे दो सीखें बहुत उपयोगी प्रतीत होती हैं। पहली सीख अच्छी संगति करने की है। हमें ऐसे छात्रों की संगति करनी चाहिए जो अच्छे विचारों वाले और मित्रता निभाने वाले हैं। दूसरी सीख, वाणी पर संयम रखना मुझे बहुत उपयोगी प्रतीत होती है। इससे हम अपने सम्मान की रक्षा करते हुए सब के प्रिय बन सकते हैं।

प्रश्न 20.
‘रहीम उदार धार्मिक दृष्टिकोण वाले कवि थे। उन संकलित दोहों का उल्लेख कीजिए जो इस कथन का समर्थन करते हैं।
उत्तर:
रहीम यद्यपि मुसलमान थे फिर भी सभी धर्मों के प्रति उनके मन में आदर का भाव था। उन्होंने हिन्दू धर्म ग्रन्थों का भी अध्ययन किया था। इसके प्रमाण उनके अनेक दोहों से मिलते हैं। इस विषय में कुछ संकलित दोहे उल्लेखनीय हैं। पहला दोहा “माँगे घटत………. वामनै नाम ॥” है। इसमें कवि ने एक का भी शीर्षक घटना थी। उल्लेख किया है। इसी प्रकारे दूसरा दोहा ”मान सहित ………. कटायौ सीस॥” है। यह भी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा पर आधारित है। इस प्रकार सिद्ध होता है कि रहीम का धार्मिक दृष्टि कोण बहुत उदार था।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 3 रहीम निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अपनी पाठ्यपुस्तक में संकलित रहीम के तीन दोहों का चयन कीजिए और उनके विषयों तथा विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
मेरे द्वारा चयनित प्रथम दोहा “रहिमन देखि …….. करै तरवारि॥” है। इसका विषय छोटे लोगों का महत्व बताना है। कवि ने सुई और तलवार के माध्यम से बड़ा उपयोगी परामर्श दिया है। बड़ों से मेलजोल होने पर लोग छोटे लोगों को भुला देते हैं। कभी-कभी ऐसा काम आ पड़ता है कि बड़े लोगों से मेलजोल बेकार सिद्ध होता है। छोटे व्यक्ति की ही सहायता लेनी पड़ती है। कपड़े सिलते हैं तो इतनी लम्बी, दृढ़ और शक्ति की प्रतीक तलवार कुछ काम नहीं आती, सुई की ही शरण लेनी पड़ती है।

दूसरी दोहा “बिपति भए……………..भए भोर॥” है।

धन वैभव से सम्पन्न व्यक्ति को अपने धन-बल पर बड़ा भरोसा होता है। वह अपने धन को अभेध भवन जैसा मान बैठता है। जब विपत्ति उस प्रहार करती है तो उसका विश्वस्त बल धन भी उसे दगा दे जाता है। कवि ने इस सच्चाई के प्रति हमेशा इस दोहे द्वारा सचेत किया है। रात्रि में आकाश में असंख्य तारे दिखाई पड़ते हैं पर ‘भोर’ भोररूपी विपत्ति आने पर उनका कहीं अता-पता नहीं चलता। इसलिए धन पर अतिविश्वास करना बुद्धिमानी नहीं है।

तीसरा दोहा “बड़े बेड़ाई……………मेरौ मोल॥” है।

इस दोहे में कवि ने शेखीखोरों और अहंकारियों को अपने व्यंग्य का निशाना बनाया है। बड़ा वह है जिसे सारा समाज बड़ा माने। ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू’ बनने से, अपनी बड़ाई अपने आप करने से कोई बड़ा नहीं हो जाता। कवि ने ऐसे लोगों को हीरे का उदाहरण देकर, दर्पण दिखाने का काम किया है।

प्रश्न 2.
संगति के प्रभाव के बारे में कवि रहीम के विचार क्या हैं? लिखिए।
उत्तर:
संगति का प्रभाव बहुत व्यापक होता है। केवल मनुष्य ही नहीं अन्य जीव-जन्तु तथा वनस्पतियाँ भी संगति से प्रभावित देखी जाती हैं। रहीम भी संगति के इस प्रभाव से सुपरिचित हैं। वह स्वाति नक्षत्री बँद का उदाहरण देकर संगति के प्रभाव को प्रमाणित करते हैं। स्वाति नक्षत्र की बूंद तीन स्थानों पर पड़कर तीन भिन्न रूप ग्रहण कर लेती है। केले में पड़ने पर वह कपूर बन जाती है। सीपी में मोती और सर्प के मुख में वही बूंद प्राणघाती विष बन जाती है।

किन्तु संगति के इस प्रभाव के अपवाद विपरीत रूप भी देखने में आते हैं। रहीम कहते हैं कि जो लोग उत्तम स्वभाव वाले होते हैं। उन पर कुसंगति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। चंदन शीतल स्वभाव वाला होता है। माना जाता है कि चंदन के वृक्षों पर सर्प लिपटे रहते हैं। परन्तु चंदन पर उनके विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह अपनी शीतलता नहीं त्यागता है।

प्रश्न 3.
रहीम एक स्वाभिमानी व्यक्ति थे। इस तथ्य का पता उनके किने दोहों से चलता है। संकलित दोहों का अवलोकन करके लिखिए।
उत्तर:
स्वाभिमानी व्यक्ति सुख-दुख को समान भाव से स्वीकार किया करता है। उसे सुख में अहंकार और दुख में दीनता से ग्रस्त नहीं देखा जाता। रहीम के दोहों से उनके स्वाभिमानी स्वभाव का पता चलता है।

रहीम कहते हैं कि दुख पड़ने पर आँसू मत बहाओ। आँसू जब नेत्रों से बाहर आते हैं तो वे मन के दुख को सब पर प्रकट कर देते हैं। स्वाभिमानी पुरुष कभी दीनता नहीं दिखाता। वह धैर्य के साथ दुख के दिनों का सामना करता है।

‘माँगे घटत…………..वामनै नाम’ दोहा रहीम के स्वाभिमानी व्यक्तित्व का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

इसी प्रकार रहीम मन की व्यथा को मन में छिपाए रखने की सीख भी देते हैं। यदि व्यक्ति दुख से व्याकुल होकर अपने मन की पीड़ा औरों को सुनाएगा तो लोग उसके दुख को बाँटने के लिए आगे नहीं आएँगे। वे तो इठला-इठलाकर उसके हाल का उपहास करेंगे। क्या एक स्वाभिमानी व्यक्ति इस स्थिति को सहन कर सकता है? कभी नहीं।

अतः यह प्रत्यक्ष है कि रहीम एक स्वाभिमानी और धैर्यशाली व्यक्ति थे। उनके जीवन से भी इसके प्रमाण मिलते हैं।

प्रश्न 4.
पाठ्यपुस्तक में संकलित रहीम के दोहों के आधार पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के गुणों का परिचय दीजिए।
उत्तर:
रहीम बादशाह अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। उनकी विद्वत्ता, उदार हृदयता, वीरता, दानशीलता तथा कृतित्व से सभी लोग प्रभावित थे। संकलित दोहों से उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व और काव्य कौशल दोनों का परिचय मिलता है।

रहीम व्यवहारकुशल व्यक्ति थे। “रहिमन देखि…………….करै तरवारि॥” दोहे से उनके इस गुण का पता चलता है। बड़ों के साथ छोटों को भी महत्व देना चाहिए। सुई का काम तलवार नहीं कर सकती। रहीम एक विद्वान पुरुष थे। उन्हें अनेक भाषाओं का ज्ञान था और उनमें काव्य रचना का कौशल भी प्राप्त था। उनका अध्ययन बहुत व्यापक था। उन्होंने रामायण, गीता, पुराण तथा महाभारत आदि हिन्दू ग्रन्थों का भी अध्ययन किया था। वह एक उदार हृदय व्यक्ति थे। गुण ग्राहक और दानी थे। जीवन के हर पक्ष का उन्हें गहरा अनुभव था। ‘एकै साधे सब सधै’, ‘जैसी संगति बैठिए ………..दीन, काज परे ………सिरावत मौर’, ‘थोथे बादर…….पाछिली बात’, ‘बड़े बड़ाई ………मेरौ मोल’ आदि कथन उनके अनुभवों की व्यापकता का प्रमाण देते हैं।

एक कवि के रूप में भी रहीम बड़े लोकप्रिय रहे हैं। ब्रज भाषा पर उनका पूर्ण अधिकार था। ‘नीति वचन’ जैसे नीरस विषय को भी उन्होंने बड़ी रोचक शैली में प्रस्तुत किया है। अपनी बात को दृष्टांतों तथा उदाहरणों से सिद्ध करने में वह कुशल हैं। अपनी रचनाओं में उन्होंने मानव-जीवन के विविध पक्षों, समस्याओं और भावनाओं को बड़ी कुशलता गुँथा है। आज भी उनका काव्य लोगों को प्रसंगिक और उपयोगी प्रतीत होता है।

प्रश्न 5.
क्या आप मानते हैं कि रहीम की रचनाएँ वर्तमान समय में भी प्रसंगिक और पठनीय हैं? संकलित दोहों के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
नीति काव्य का मानव जीवन से सीधा सम्बध होता है। नीतियाँ, शिक्षाएँ और उपदेश जब अपने अनुभवों के आधार पर प्रस्तुत किए जाते हैं तो उनका श्रोताओं और पाठकों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। परन्तु यह भी सच है कि समय के साथ नीतियों के विषय और उनके प्रस्तुतीकरण के ढंग भी बदलते रहते हैं। इसी कारण अनेक नीति-कथन पुराने और अनुपयोगी भी हो जाते हैं।

रहीम के दोहे आज से चार सौ वर्ष से भी पूर्व रचे गए थे, किन्तु आज भी उनमें से अधिकांश हमें प्रासंगिक और उपयोगी प्रतीत होते हैं। संकलित दोहों में दैनिक जीवन के उपयोगी सुझाव दिए गए हैं। बड़ों से मेल-जोल होने पर छोटों को मत भुलाइए। वे भी कभी बड़े काम के साबित होते हैं। कुसंग से बचे रहिए। केवल काम निकालने के लिए सम्बंध और सम्मान उचित नहीं होता। भले आदमियों की मित्रता बड़ी अनमोल है। अपना दुख दूसरों को सुनाकर हँसी के पात्र मत बनिए। बोलते समय संयम से काम लीजिए।

ये सभी नीतिवचन, सीखें और सुझाव आज भी उतने ही उपयोगी हैं।

प्रश्न 6.
संकलित दोहों के आधार पर कवि रहीम की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कवि रहीम की कविता अपने विशिष्ट गुणों के कारण सदा ही लोकप्रिय रही है। संकलित दोहों में अधिकांश नीतिपरक कथनों पर केन्द्रित है। इनके आधार पर कवि रहीम की काव्यगत विशेषताएँ, संक्षेप में इस प्रकार हैं

भाषा- कवि रहीम ने अपने दोहों की रचना सरस, साहित्यिक और प्रौढ़ ब्रजभाषा में की है। गूढ़ विषयों को भी सरल भाषा में प्रस्तुत करने में रहीम को कुशलता प्राप्त है। भाषा में तद्भव, तत्सम तथा आंचलिक शब्दों का सहज मेल है।

कथन शैली- कवि ने अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए अनेक शैलियों को माध्यम बनाया है विषय को गहराई और प्रामाणिकता देने के लिए रहीम प्रायः दृष्टांतों और उदाहरणों का प्रयोग करते हैं। व्यंग्य, परिहास और उपदेश सभी का प्रयोग वे प्रभावशाली ढंग से करते हैं।

अलंकार- कवि ने अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप से किया है। अनुप्रास, उपमा, रूपक तथा दृष्टांत आदि अलंकार उनके काव्य की शोभा बढ़ाते हैं।
छन्द- दोहा कवि रहीम का सिद्ध छंद है। इस छोटे से छंद में कवि ने गूढ़ विचारों, अनुभवों और शिक्षाओं को भरने में पूर्ण सफलता पाई है।

विषय-कवि ने नीति, लोक व्यवहार, उपदेश, मानवीय मनोभाव तथा हास-परिहास आदि विविध विषयों को अपनी सहज कुशलता से लघु छंद में पिरोया है।

कवि रहीम की कविता सभी दृष्टियों से लोकप्रियता में आगे रही है।

रहीम कवि परिचय

‘रहीम’ नाम से हिन्दी काव्य जगत में प्रसिद्ध, नीतिपरक दोहों के अप्रतिम रचयिता का पूरा नाम, अब्दुर्रहीम खानखाना था। इनका जन्म सन् 1556 ई. में हुआ था। इनके पिता बैरम खाँ अकबर के संरक्षक थे। रहीम कई भाषाओं के ज्ञाता, विद्वान और उदार हृदये, पुरुष थे। बादशाह अकबर से इन्हें पूरा सम्मान मिला। रहीम उदार धार्मिक दृष्टिकोण के अनुकरणीय उदाहरण थे। आपने हिन्दू देवताओं के प्रति पूर्ण आदर प्रकट किया। आपका देहावसान सन् 1626 ई. में हुआ। रहीम लोकप्रिय कवि रहे हैं। उनके नीतिपरक दोहों का प्रयोग प्राय: लोग करते रहे हैं। उन्होंने नीति, भक्ति, श्रृंगार तथा प्रेम आदि विषयों पर काव्य रचनाएँ की हैं। आपने महाभारत, रामायण, पुराणों तथा गीता आदि ग्रन्थों के पात्रों तथा घटनाओं का अपनी रचनाओं में उदारता से प्रयोग किया है। रहीम के प्रिय छन्द, दोहा, सोरठा, बरवै तथा सवैया आदि हैं।

रचनाएँ-रहीम की प्रमुख रचनाएँ-दोहावली, बरवै नायिका भेद, रासपंचाध्यायी, मदनाष्टक तथा नगरशोभा आदि हैं।

रहीम पाठ परिचय

हमारी पाठ्यपुस्तक में कवि रहीम रचित 19 दोहे संकलित हैं। इनमें अनेक जीवनोपयोगी विषयों को लक्ष्य करके रचे गये हैं। व्यवहारकुशलता, उदारता, सहानुभूति, परोपकार, स्वाभिमान, सत्संगति, बड़प्पन आदि मानवीय गुणों का समावेश इन दोहों में है। रहीम बड़ों से मित्रता होने पर छोटों को न भुलाने का परामर्श दे रहे हैं। संगति के फल को सप्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं। काम निकल जाने पर वस्तु और व्यक्तियों के व्यवहार पर टिप्पणी कर रहे हैं। वृक्षों और सरोवरों का उदाहरण देकर परोपकारियों की प्रशंसा कर रहे हैं। मन का दुख मन में ही छिपाए रखने की महत्त्वपूर्ण सीख दे रहे हैं। स्वाभिमान के साथ जीने की महत्ता समझा रहे हैं। बात को बिगड़ने न दें, बिगड़ने के बाद बनाना बड़ा कठिन होता है, यह सीख दे रहे हैं। माँगने से मर जाना श्रेष्ठ है, सँभलकर बोलना ही बुद्धिमत्ता है। इन समस्त नीति वचनों से कवि की रचनाएँ सुशोभित हैं।

काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ

1. रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि॥
एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सचिबो, फूलै फलै अघाय॥

कठिन शब्दार्थ-बड़ेन को = बड़ों को। लघु = छोटा। न दीजिए डारि = त्याग मत कीजिए। साधे = साधना, ध्यान देना। मूलहिं = जड़ को। सचिबो = सींचना। फूलै-फलै = फलता-फूलता है। अघाय = भरपूर, मनचाहा।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहे हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि रहीम के दोहों से लिए गये हैं। इन दोहों में कवि ने छोटे लोगों के महत्त्व को तथा एक लक्ष्य पर ध्यान दिए जाने का महत्त्व समझाया गया है।

व्याख्या-रहीम कहते हैं-यदि आपकी बड़े लोगों से जान-पहचान हो गई हो, तो अपने छोटे साथियों का त्याग करना या उनकी उपेक्षा करना बुद्धिमानी नहीं है। प्रत्यक्षं देख लो, जहाँ सुई काम आती है वहाँ तलवार कुछ नहीं कर सकती है।

कवि कहता है जो मूल या प्रमुख कार्य है, उसी पर ध्यान देना उचित होता है। जो सब कामों को एक साथ साधने का प्रयत्न करते हैं वे किसी कार्य में सफल नहीं हो पाते हैं। एकमात्र जड़ को सींचने से पूरा वृक्ष भरपूर रूप में फलता-फूलता है। डालों और पत्तों को सींचने से उसके सूख जाने की आशंका बनी रहती है।

विशेष-
(i) सुई और तलवार का उदाहरण प्रस्तुत कर कवि ने छोटों को महत्त्व बड़ी सहजता से स्थापित किया है। अत्यन्त छोटी सुई ही वस्त्रों को सिलकर सभी की शोभा बढ़ाती है। तलवार चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, इस काम को कदापि नहीं कर सकती। अतः जीवन में छोटों का भी बहुत महत्त्व है।
(ii) सरल और सरस ब्रज भाषा में कवि ने बड़ी व्यावहारिक सीख दी है।
(iii) शैली उपदेशात्मक और परामर्शपरक है।
(iv) दृष्टान्त अलंकार का सुन्दर प्रयोग हुआ है।

2. कदली, सीप, भुजंग-मुख, स्वाति एक गुनं तीन।
जैसी संगति बैठिए, तै सोई फल दीन॥
काज परे कछ और है, काज सरै कछु और।
रहिमन भंवरी के भए, नदी सिरोवत मौर॥

कठिन शब्दार्थ-कदली = केला। सीप = एक कीट निर्मित खोल जिसमें मोती बनता है। भुजंग = सर्प। स्वाति = एक नक्षत्र जिसके होते हुए वर्षा की बूंद विभिन्न रूप धारण करती है। संगति = साथ। बैठिए = रहोगे। तैसौई = वैसा ही। दीन = प्राप्त होता है। काज = काम। परै = पड़ने पर। कछु और = कुछ और ही (व्यवहार)। काज सरै = काम निकल जाने पर। सँवरी = भाँवर, अग्नि की परिक्रमा। सिरावत = बहाते हैं, विसर्जित करते हैं। मौर = दूल्हे द्वारा सिर पर धारण किए जाने वाला मुकुट।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहे हमारी पाठ्यपुस्तके से संकलित रहीम के दोहों से लिए गए हैं। इन दोहों में कवि ने क्रमश: संगति के प्रभाव और संसार में स्वार्थपूर्ण व्यवहार पर व्यंग्यमय टिप्पणी की है।

व्याख्या-कवि रहीम कहते हैं कि वस्तु हो या व्यक्ति वह जैसी संगति करता है। उसे वैसा ही फल मिलता है। स्वाति नक्षत्र में जो बूंद गिरती है। वह भिन्न-भिन्न संगति से भिन्न-भिन्न रूप प्राप्त करती हैं। केले के वृक्ष पर गिरी बूंद कपूर बन जाती है। सीपी में गिरने। वाली बूंद मोती बन जाती है और सर्प के मुख में गिरने वाली बूंद विष बन जाती है। अत: जैसी संगति करोगे वैसा ही फल प्राप्त होगा।

कवि कहता है कि संसार में काम पड़ने और काम निकल जाने पर लोगों का व्यवहार बिल्कुल अलग-अलग होता है। काम पड़ने पर वस्तु या व्यक्ति का बड़ा ध्यान और सम्मान रखा जाता है। परन्तु काम निकल जाने पर उसकी घोर उपेक्षा की जाती है। दूल्हे के मौर को ही देख लीजिए। विवाह के समय उसको बड़ा सम्मान दिया जाता है और भाँवरें पड़ जाने, विवाह सम्पन्न हो जाने पर, उसे नदी में सिरा दिया जाता, बहा दिया जाता है।

विशेष-
(i) जीवन में संगति के प्रभाव को कवि ने बड़े प्रभावशाली ढंग से समझाया है। कवि का सन्देश है कि सदा सत्संगति ही करनी चाहिए।
(ii) जीवन में स्वार्थपूर्ण व्यवहार को लेकर कवि ने बड़ा चुभता हुआ व्यंग्य किया है। ‘काज परै कछु और है काज सरै कछु और’, यह एक कठोर सचाई है। सुखी रहना है तो किसी से अधिक अपेक्षा मत करो; अन्यथा हृदय को धक्का लगेगा।
(iii) भाषा साहित्यिक और लक्षणा शक्ति सम्पन्न है।
(iv) शैली व्यंग्यात्मक तथा नीति की व्यावहारिक शिक्षा देने वाली है।
(v) दोनों दोहों में दृष्टान्त अलंकार का सुन्दर प्रयोग है।

3. जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग॥
रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार।
रहिमन फिरि-फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार॥

कठिन शब्दार्थ-उत्तम = अच्छा। प्रकृति = स्वभाव। का = क्या। करि सकत = कर सकता है। व्यापत = व्याप्त होना, प्रभावित करना। भुजंग = साँप। सुजन = सज्जन व्यक्ति। फिरि-फिरि = बार-बार। पहिए = पूँथिए। टूटे = टूट जाने पर। मुक्ताहार = मोतियों का हार।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि रहीम के दोहों से लिया गया है। कवि ने उत्तम स्वभाव वाले व्यक्तियों पर कुसंग का प्रभाव न पड़ने की बात सप्रमाण कही है। कवि जीवन में सज्जनों के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए उनके सम्मान को बनाए रखने का परामर्श दे रहा है।

व्याख्या-कवि रहीम कहते हैं कि जो व्यक्ति उत्तम स्वभाव वाले होते हैं उनका कुसंग कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उन पर बुरी संगति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यद्यपि चंदन के वृक्ष पर सर्प लिपटे रहते हैं, फिर भी उस पर सर्पो के विष का कोई प्रभाव नहीं होता।

कवि रहीम का परामर्श है कि यदि सज्जन किसी बात पर रूठ जाएँ तो सौ बार भी उनको मनाने का प्रयास करना चाहिए। सज्जनों की मित्रता बहुत मूल्यवान होती है। मोतियों का हार जितनी भी बार टूटता है, उसे हर बार फिर से पिरोने या गूंथने का यत्न किया जाता है। जैसे मूल्यवान मोती के हार को टूट जाने पर फेंका नहीं जा सकता, उसी प्रकार सज्जन पुरुषों की मूल्यवान मित्रता की रक्षा करना भी परम आवश्यक है।

विशेष-
(i) जिनका स्वभाव उत्तम होता है, वे बुरी संगति से अप्रभावित रहते हैं और अपने स्वभाव से दूसरों को लाभ पहुँचाया करते हैं। चंदन सर्यों के विष से तनिक भी प्रभावित नहीं होता, अपितु अपनी मधुर गन्ध से अन्य वृक्षों को सुवासित करता रहता है। यही दोहे का सन्देश है।
(ii) सज्जनों का साथ सौभाग्यशालियों को प्राप्त होता है। अत: उसे किसी कीमत पर नहीं आँवाना चाहिए। सज्जनों की मित्रता मोती के हार जैसा ही मूल्यवान और अपरिहार्य होती है। यही समझाना कवि का उद्देश्य है।
(iii) तत्सम तथा तद्भव शब्दों के सुमेल से युक्त सक्षम ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।
(iv) शैली दृष्टान्तपरक और सन्देशात्मक है।
(v) का करि सकत कुसंग” में अनुप्रास, ‘फिरि-फिरि’ में पुनरुक्ति तथा दोनों दोहों में दृष्टान्त अलंकार का सुन्दर प्रयोग है।

4. तरुवर फल नहिं खात हैं, सरबर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर-काज हित, संपति सँचहिं सुजान॥
थोथे बादर क्वाँर के, ज्यों रहीम घहरात।
धनी पुरुष निर्धन भये, करै पाछिली बात॥

कठिन शब्दार्थ-तरुवर = वृक्ष। सरबर = सरोवर, तालाब। पान = पानी। पर-काज = दूसरों के काम के लिए, परोपकार के लिए। संपति = धन। सँचहि = एकत्र करते हैं। सुजान = सज्जन, श्रेष्ठ पुरुष। थोथे = जल रहित। बादर = बादल। क्वाँर = वर्षा ऋतु का अन्तिम मास। घहरात = घुमड़ते हैं। निर्धन = धनहीन, गरीब। पाछिली = पिछली, सम्पन्नता के समय की।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-ये दोहे हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि रहीम के दोहों से लिए गए हैं। इन दोहों में कवि ने परोपकारी महापुरुषों की प्रशंसा की है तथा धनी से निर्धन हो जाने वाले लोगों के पुरानी बातें बखानने के स्वभाव पर व्यंग्य किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि प्रकृति हमें परोपकार का आदर्श स्वरूप समझाती आ रही है। उसके वृक्ष अपने फलों को स्वयं नहीं खाते वे दूसरों के ही काम आते हैं। इसी प्रकार तालाब अपना जल स्वयं नहीं पीते। उनसे मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष और खेतों की प्यास बुझा करती है। यही बात सज्जनों पर भी लागू होती है। वे भी केवल परोपकार के लिए संपत्ति का संचय किया करते हैं। उनके धन का लाभ दूसरे ही उठाया करते हैं।

रहीम कहते हैं-वर्षा ऋतु के अन्तिम मास क्वार (आश्विन) में घुमड़ने वाले जलरहित बादल बरसते नहीं। केवल घुमड़कर और गरजकर रह जाते हैं। इसी प्रकार जो धनी व्यक्ति निर्धन हो जाता है, वह अपने धन-सम्पन्नता के दिनों की बातें बढ़-चढ़कर किया करती है। वह वास्तविकता को भुलाकर व्यर्थ के अहंकार में फंसा रहता है।

विशेष-
(i) कवि ने परोपकारियों के स्वभाव और आचरण को सराहा है। जिसकी सम्पत्ति अभावग्रस्तों के काम आए, वही सच्चा परोपकारी है और प्रशंसा का पात्र है।
(ii) क्वार के बादलों की दृष्टान्त देते हुए कवि रहीम ने धन के अहंकार को दिल से लगाए रखने वाले, निर्धन हो गए लोगों पर बड़ा कटीला व्यंग्य किया है।
(iii) भाषा पर कवि रहीम का सहज अधिकार प्रकट हो रहा है। सरल शब्दों में गहरी बात कहने का कौशल है।
(iv) कवि की व्यंग्यपटुता प्रशंसनीय है।
(v) ‘संपति सँचहि सुजान’ अनुप्रास अलंकार तथा दोनों में दृष्टान्त अलंकार है।

5. रहिमन अँसुआ नैन ढरि, जिय दुःख प्रकट करे।
जाहि निकारो गेह ते, कस न भेद कहि देइ॥
रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बॉटि न लैहैं कोय॥

कठिन शब्दार्थ-अँसुआ = आँसू। नैन = नेत्र। ढरि = ढुलककर। जिय = हृदय। करेइ = करते हैं। जाहि = जिसे। निकारो = निकालोगे। गेह = घर। ते = से। कस न = क्या नहीं। भेद = गुप्त बातें। निज = अपने। बिथा = व्यथा, कष्ट। गोय = छिपाकर। अठिलैहैं। = इठलाएँगे, हँसी उड़ाएँगे। बाँटि न लैहैं = बाँटेगा नहीं। कोय = कोई॥

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहे हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि रहीम के दोहों से लिए गए हैं। नेत्रों से ढलने वाले आँसुओं को थाम के रखो, नहीं तो ये तुम्हारे मन का हाल उजागर कर देंगे। मन की व्यथा मन में छिपाकर रखना बुद्धिमानी है। ये उपयोगी सीखें कवि ने इन दोहों में दी हैं।

व्याख्या-कवि रहीम कह रहे हैं कि नेत्रों से ढुलकने वाले आँसू मन के दु:ख को प्रकट कर देते हैं। स्वाभिमानी व्यक्ति को मन का दु:ख मन में ही रखना चाहिए। जब तुम किसी को घर से निकालोगे तो वह घर के सभी भेद दूसरों के सामने प्रकट कर देगा। इसलिए रोओ मत धैर्य के साथ दु:ख के दिनों को काट लो।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कवि कहता है-अपने मन की व्यथा को मन में ही छिपाकर रखना बुद्धिमानी है। उसे यदि दूसरों के सामने प्रकट करोगे तो सच्ची सहानुभूति व्यक्त करने वाले कम और उसकी हँसी उड़ाने वाले अधिक मिलेंगे। इससे मन और भी अधिक दुखी होगा।

विशेष-(i) कवि ने मन के दु:ख को मन में ही छिपाकर रखने का जो परामर्श दिया है। वह बड़ा व्यावहारिक है। स्वाभिमानी व्यक्ति को दु:ख के दिन गम्भीरता और धैर्य के साथ चुपचाप बिता लेने चाहिए।
(ii) इसके साथ ही घर की बात घर में ही रहे, उपहास का कारण न बने, इसके लिए सावधानी रखनी चाहिए। घर के सभी सदस्यों के सम्मान और आकांक्षाओं को उचित समर्थन और आदर दिया जाना चाहिए, यह सन्देश भी कवि दे रहा है।
(iii) भाषा सरल तथा शब्द चयन भावों के अनुकूल है।
(iv) कथन शैली परामर्शपरक है।
(v) दृष्टान्त अलंकार का सुन्दर प्रयोग है।

6. दीन संबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय।
जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबंधु सम होय॥
दोनों रहिमन एक से, जौ लौं बोलत नाहिं।
जोन परत हैं काक पिक, ऋतु बसन्त के माँहिं॥

कठिन शब्दार्थ-दीन = निर्धन। लखत = देखता। दीनहिं = दीन को। दीनबंधु = ईश्वर, दीनों का सहायक। जौ लौं = जब तक। जान परत = पहचाने जाते हैं। काक = कौआ। पिक = कोयल। माँहिं = में।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहे हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि रहीम के दोहों से लिये गये हैं। कवि दीनों की सहायता करने वाले को ईश्वर के तुल्य बता रहा है। वह कहता है कि जब तक बोलते नहीं, तब तक गुणयुक्त और गुणहीन व्यक्ति की पहचान नहीं हो पाती है।

व्याख्या-दीन व्यक्ति सहायता के लिए सभी की ओर ताकता है किन्तु उसकी ओर कोई ध्यान नहीं देता। जो व्यक्ति दीन की सहायता करता है, उसे दीनबन्धु ईश्वर के समान ही समझना चाहिए।
रहीम कहते हैं कि कौआ और कोयल जब तक बोलते नहीं हैं, तब तक वे एक जैसे प्रतीत होते हैं। जब बसन्त ऋतु आने पर कोयल कूकती है और कौआ काँव-काँव करता है तो तुरन्त ज्ञात हो जाता है कि इनमें से कौआ (गुणहीन) कौन है और कोयल (गुणवान) कौन है।

विशेष-(i) जिसका सहायक या रक्षक कोई नहीं होता भगवान स्वयं उनकी सहायता करते हैं। अत: दोनों की रक्षा और सहायता करने वाला मनुष्य ईश्वर के तुल्य सम्मानीय होता है। कवि का यही सन्देश है।
(ii) गुणवान जैसा रंग-रूप बना लेने से कोई गुणवान नहीं हो जाता। उसकी वाणी उसकी वास्तविकता प्रकट कर देती है। गुणी व्यक्ति की वाणी स्वाभाविक रूप से मधुर और शिष्ट होती है और पाखण्डी व्यक्ति की वाणी बनावटी और निम्न स्तर की हुआ करती है। वाणी के स्तर से व्यक्ति की सही पहचान हो जाती है।
(iii) कवि ने दीन-हीन और दुर्बलों की सहायता करने का तथा गुणी बनने का सन्देश दिया है।
(iv) सरल भाषा में कवि ने प्रशंसनीय जीवन मूल्यों की ओर ध्यान आकर्षित किया है।
(v) शैली भावात्मक तथा प्रतीकात्मक है।

7. बड़े बड़ाई ना करें, बड़ो न बोलैं बोल।
रहिमन हीरा कब कहै, लाख टका मेरो मोल॥
बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥

कठिन शब्दार्थ-बड़े = महान् लोग, विनम्र लोग। बड़ाई = अपनी प्रशंसा। बड़ौ = बढ़ा-चढ़ाकर। बोल = कथन, बात। लाख टका = लाखों रुपये। मोल = मूल्य। बिगरी बात = सम्माने का नष्ट हो जाना। बनै = फिर से सुधारना। लाख करौ = कितना ही प्रयत्न करो। कोय = कोई। फाटे = फट जाने पर। मथे = मथने पर।

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहे हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि रहीम के दोहों से लिए गए हैं। इनमें कवि ने आत्मप्रशंसा करने वाले लोगों पर व्यंग्य किया है तथा व्यक्ति के आत्मसम्मान को बड़ा महत्त्वपूर्ण बताया है।

व्याख्या-कवि कहता है जो लोग वास्तव में गम्भीर स्वभाव वाले और महान होते हैं, वे कभी अपने ही मुख से अपनी बड़ाई नहीं करते। वे अहंकारपूर्वक ऊँची-ऊँची बातें नहीं किया करते। हीरा अत्यन्त मूल्यवान रत्न होता है किन्तु वह कभी नहीं कहता कि उसका मूल्य लाखों में है। उसके गुणों ने ही उसे लोकप्रिय और मूल्यवान बनाया है।

स्वाभिमानी लोग कभी अपनी बात या प्रतिष्ठा पर आँच नहीं आने देते क्योंकि यदि एक बार समाज में सम्मान कम हो गया तो फिर उसे पुन: प्राप्त कर पाना असम्भवसा हो जाता है। यदि असावधानी से दूध फट जाता है, तो फिर उसे कितना भी मथो, उससे मक्खन नहीं निकल सकता।

विशेष-
(i) अपने मुँह से अपनी प्रशंसा करने वाले लोग ‘बड़बोले और शेखीखोर’ कहे जाते हैं।
(ii) अपने आत्मसम्मान को बचाने का कवि ने संदेश दिया है।
(iii) सरल भाषा में कवि ने बहुत उपयोगी संदेश दिए हैं।
(iv) कथन शैली सचेत करने वाली और उपदेशात्मक है।
(v) दोहों में ‘अनुप्रास’ तथा दृष्टांत अलंकार का प्रयोग हुआ है।

8. विपति भए धन ना रहै, रहे जो लाख करोर।
नभ तारे छिपि जात हैं, ज्यों रहीम भए भोर॥
माँगे घटत रहीम पद, कितौ करौ बढ़ि काम।
तीन पैग बसुधा करो, तऊ बावनै नाम॥

कठिन शब्दार्थ- विपति = विपत्ति, संकट। करोर= करोड़ों। नभ = आकाश। भोर = सबेरा। कितौ = कितना भी। बढ़ि = बडा। पैग = डग, कदम। वसुधा = पृथ्वी। तऊ = तो भी। वामनै = बौना ही।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत दोहे हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि रहीम के दोहों से लिये गए हैं। कवि बता रहा है कि संकट या बुरे दिन आने पर मनुष्य का वक्त भी उसका साथ छोड़ जाता है। माँगने जाने वाले मनुष्य की प्रतिष्ठा अवश्य ही कम हो जाती है। चाहे वह कितना भी बड़ा काम क्यों न कर दिखाए।

व्याख्या- जब मनुष्य के बुरे दिन आते हैं तो उसके पास चाहे लाखों या करोड़ों भी क्यों न हों, सब समाप्त हो जाते हैं। धन भी उसका साथ नहीं देता। सब देखते हैं कि जब सबेरा होने लगता है तो आकाश में असंख्य तारे भी छिप जाते हैं। आकाश भी साथ नहीं देता।

मनुष्य चाहे कितना बड़ा या आश्चर्यजनक काम क्यों ने कर दिखाए किन्तु माँगने, हाथ फैलाने पर उसका पद और प्रतिष्ठा अवश्य ही कम हो जाती है। स्वयं भगवान भी जब बलि से दान लेने गए तो उन्होंने भी तीन डग में सारी पृथ्वी नाप डाली, परन्तु इतना महान कार्य करने पर भी उनका नाम ‘वामन’ (बौना) ही रहा।

विशेष-
(i) प्रथम दोहे में कवि रहीम का अपना ही कुछ अनुभव झलक रहा है। रहीम बहुत बड़े दानी थे। उन पर बहुत सम्पत्ति थी। परन्तु उन पर जब संकट आया तो वह भी भिखारी हो गए।
(ii) भगवान देवताओं के हित के लिए दैत्यराज बलि से वामन (बौने) का रूप बनाकर तीन डग धरती माँगने गए थे। जब बलि ने उन्हें देना स्वीकार कर लिया तो उन्होंने विराट रूप धारण करके तीनों लोक तीन डगों से नाप डाले। इतना आश्चर्यजनक कार्य करने (परम विराट रूप धारण करने) पर भी उन्हें वामनावतार ही कहा जाता है। कवि ने संदेश दिया है कि मनुष्य को कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना चाहिए।
(iii) दोनों ही दोहों में कवि रहीम के अनुभवों और हिन्दू धर्म ग्रन्थों के अध्ययन का प्रमाण प्रस्तुत हुआ है।
(iv) भाषा पर कवि का पूर्ण अधिकार है। कथन शैली रोचक और प्रभावशाली है।
(V) दोहों में अनुप्रास तथा दृष्टांत अलंकार हैं।

9. मान सहित बिस खाय के, संभु भये जगदीश।
बिना मान अमृत पिये, राहु कटायौ सीस॥
रहिमन जिह्वा बाबरी, कहि गई सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।

कठिन शब्दार्थ- मान = सम्मान। बिस = जहर। संभु = शिव। जगदीश = जगत के स्वामी। राहु = एक दैत्य, जिसने कपटपूर्वक अमृत पिया था। जिह्वा = जीभ। बाबरी = मूर्ख। सरग-पताल = अनुचित बातें, अशोभनीय कथन। जूती = जूता। कपाल = सिर।

संदर्भ तथा प्रसंग- प्रस्तुत दोहे हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित रहीम के दोहों से लिया गया है। इनमें कवि ने अपमान सहित होने वाले, महान लाभ को भी तुच्छ बताया है तथा बोलते समय वाणी पर संयम रखने का परामर्श दिया है।

व्याख्या- समुद्र मंथन से प्राप्त विष का सम्मान सहित पान करने पर भगवान शिव सारे जगत के रक्षक जगदीश’ कहलाए। परन्तु देवताओं के बीच छिपकर ‘अमृत’ पीने वाले राहु नामक दैत्य को अपना सिर कटवाना पड़ गया।

रहीम कहते हैं कि यह जीभ बड़ी नादान है, यह बोलते समय कुछ भी अनुचित और अनर्गल बोल जाती है और उसका दुष्परिणाम बेचारे सिर को भोगना पड़ता है। आशय यह है कि वाणी के असंयम का अपमानजनक फल-जूतियाँ पड़ना- मनुष्य को भोगना पड़ता है। अत: बोलते समय बहुत सतर्क रहना चाहिए।

विशेष-
(i) प्रथम दोहे में कवि ने समुद्र मंथन’ की प्रसिद्ध पौराणिक घटना का संदर्भ लेते हुए स्वाभिमानपूर्वक जीवन बिताने का संदेश दिया है। चाहे इसके लिए कितना भी मूल्य चुकाना पड़े। कवि का मत है कि मान सहित विष पी लेना अपमानपूर्वक अमृत पाने करने से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।
(ii) कवि ने दूसरे दोहे में बोलते समय बहुत संयम और सावधानी बरतने का परामर्श दिया है। अन्यथा ‘करे कोई भरे कोई’ जैसा दुष्परिणाम सामने आता है। जीभ अपराध करती है और बेचारे सिर को जूते खाने पड़ते हैं।
(iii) मुसलमान होते हुए भी हिन्दू पौराणिक ग्रन्थों का अध्ययन और उनके संदर्भो का रचनाओं में उपयोग करना रहीम के उदार व्यक्तित्व का प्रशंसनीय प्रमाण है।
(iv) साहित्यिक ब्रज भाषा का कुशल प्रयोग हुआ है।
(v) कथन शैली बहुत प्रभावशाली है। उद्धरणात्मक और व्यंग्यात्मक शैलियों का प्रयोग है।

10. अमृत ऐसे वचन में, रहिमन रिस की गाँस।
जैसे मिसिरिह में मिली, निरस बाँस की फाँस॥

कठिन शब्दार्थ- अमृत से = मधुर। रिस = क्रोध। गाँस = गाँठ, अप्रिय मेल। मिसिरिहु = मिश्री में भी। निरस = रसहीन, फीकी। फाँस = बारीक तिनको, शरीर में चुभ जाने वाला बाँस का रेशा॥
संदर्भ तथा प्रसंग- प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि रहीम के दोहों से लिया गया है। इस दोहे में कवि ने वाणी को मधुर बनाए रखने और अप्रिय शब्दों के प्रयोग से बचने का परामर्श दिया है।

व्याख्या- रहीम कहते हैं कि व्यक्ति को सदा मधुर और विनम्र वाणी का प्रयोग करना चाहिए। कर्णप्रिय, मृदुल बोली में कटु शब्दों का प्रयोग उसी प्रकार खटकने वाला प्रतीत होता है जैसे मधुर मिश्री में बाँस के नीरस महीन रेशों का उपस्थित रहना॥

विशेष-
(i) कवि ने मिश्री के निर्माण की प्रक्रिया का ज्ञान जताते हुए, सदा विनम्र, कर्णप्रिय और शिष्ट वाणी के प्रयोग का परामर्श दिया है।
(ii) मिश्री बनाते समय, उसमें रबे बनाने के लिए बाँस की बारीक नसों या फाँसों का प्रयोग किया जाता है।
(iii) दोहा कवि की बहुज्ञता का प्रमाण दे रहा है।
(iv) भाषा-शैली रोचक है।
(v) दोहे में ‘निरस बाँस की फाँस’ में अनुप्रास तथा ‘उदाहरण’ अलंकार है।