RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 13 पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 13 सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक के अनुसार प्रजातंत्र में किसी व्यक्ति को शासन करने का अधिकार तब तक है, जब तक कि
(अ) वह स्वयं छोड़ना न चाहे
(ब) पाँच वर्ष न हो जायें
(स) जब तक लोगों की इच्छा हो।
(द) अगले चुनाव न हों
उत्तर:
(स)

प्रश्न 2.
लेखक ने विरोधी पक्ष का महत्त्व माना है कि –
(अ) वह सरकार का विरोध करने के लिए होता है।
(ब) वह सरकार की स्वेच्छाचारिता पर नियंत्रण हेतु होता है।
(स) वह सरकार के कार्य में अड़चन के लिए होता है।
(द)वह निष्क्रिय होता है।
उत्तर:
(ब)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 13 सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सत्तारूढ़ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जिसको शासन करने का अधिकार प्राप्त है, उस राजनैतिक दल तथा व्यक्ति को सत्तारूढ़ कहते हैं।

प्रश्न 2.
किसी समय सरकार बदलते ही सरकारी कर्मचारी बदलने अथवा हटा देने की परम्परा किस देश में थी?
उत्तर:
किसी समय सरकार बदलते ही सरकारी कर्मचारी बदलने अथवा हटा देने की परम्परा अमेरिका में थी।

प्रश्न 3.
जब तेरह अमेरिकी उपनिवेशों ने बगावत की तब उनका नेता कौन था?
उत्तर:
जब तेरह अमेरिकी उपनिवेशों ने बगावत की तब उनके नेता जार्ज वाशिंगटन थे।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 13 सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जार्ज वाशिंगटन ने तीसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति बनने से इंकार क्यों कर दिया?
उत्तर:
अमेरिका में प्रजातंत्र है। वहाँ के संविधान के अनुसार राष्ट्रपति पाँच वर्ष के लिए चुना जाता है। इंग्लैंड के राजा के विरुद्ध विद्रोह करके वहाँ प्रजातांत्रिक शासन स्थापित हुआ था। जार्ज वाशिंगटन इंग्लैंड के राजा का स्थानापन्न बनना नहीं चाहते थे। वह अपने संविधान की मर्यादा के विरुद्ध भी नहीं जाना चाहते थे। अपने ही बनाए नियम के विरुद्ध जाकर वह तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बनना चाहते थे।

प्रश्न 2.
सार्वजनिक अन्तरात्मा से आप क्या समझते हैं? अम्बेडकर जी ने इसे किस प्रकार प्रजातंत्र की रक्षा के लिए आवश्यक बताया?
उत्तर:
किसी अन्याय के विरुद्ध बिना किसी मतभेद के सभी लोगों का एक साथ खड़ा हो जाना सार्वजनिक अन्तरात्मा है, भले ही विरोध करने वाला उस अन्याय से पीड़ित न हो रहा हो फिर भी उसे अन्याय का विरोध करना चाहिए। अन्याय का विरोध अन्याय के शिकार हुए मनुष्य को ही नहीं करना चाहिए बल्कि सभी लोगों को भेदभाव छोड़कर एक होकर अन्याय पीड़ित को अन्याय से मुक्ति दिलानी चाहिए। ऐसा न होने पर पीड़ित लोगों में प्रजातंत्र के प्रति विद्रोह का भाव पैदा होता है।

प्रश्न 3.
इंग्लैंड में विरोधी पक्ष के लिए क्या-क्या सहूलियत में सुविधाएँ हैं?
उत्तर:
इंग्लैंड में विरोधी पक्ष के नेता को प्रधानमन्त्री के समान सरकारी खजाने से वेतन मिलता है। उसको एक सचिव, सांकेतिक लेखक तथा अन्य कर्मचारी दिए जाते हैं। लोकसभा भवन में उसके कार्यालय हेतु एक अलग कमरा भी दिया जाता है। वहाँ से वह सरकार के कामों पर नजर रखता है तथा प्रतिपक्ष का उत्तरदायित्व निभाता है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 13 सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अनुसार सफल प्रजातन्त्र के लिए किन-किन बातों पर ध्यान देना जरूरी है?
उत्तर:
डॉ. अम्बेडकर के अनुसार प्रजातंत्र की सफलता के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है –

  1. प्रत्येक पाँच वर्ष बाद चुनाव होने चाहिए तथा सरकार का निषेध होना चाहिए। ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए कि पाँच वर्ष से पूर्व भी किसी भी समय सरकार का निषेध किया जा सके।
  2. प्रजातन्त्र में शासक दल की गलत नीतियों पर नियंत्रण के लिए एक सशक्त विरोधी दल होना चाहिए।
  3. कानून की दृष्टि में सभी समान होने चाहिए। शासन में पक्षपात नहीं होना चाहिए।
  4. सरकार को नीति निर्धारित करनी चाहिए। उसको लागू करने का काम कार्यपालिका को स्वतन्त्र रूप से करने देना चाहिए।
  5. प्रजातंत्र में सभी को विधान संबंधी नैतिकता का पालन करना चाहिए। ऐसा न करने से विधान भंग होता है तथा प्रजातंत्र को हानि पहुँचती है।
  6. अल्पमत पर बहुमत का अत्याचार नहीं होना चाहिए। बहुमत को अल्पमत के हितों की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए। अल्पमत को भी यह विश्वास होना चाहिए कि बहुमत उसको हानि नहीं पहुँचायेगा।
  7. समाज को नैतिकता का पालन करना चाहिए। राजनीति और नैतिकता को अलग मानना ठीक नहीं है। बिना नैतिकता के राजनीति दूषित हो जाती है।
  8. प्रजातंत्र की सफलता के लिए सार्वजनिक अन्तरात्मा का होना भी जरूरी है। इसका अर्थ यह है कि अन्याय का विरोध सबको भेदभाव मुक्त होकर एक साथ करना चाहिए, भले ही विरोध करने वाला उससे प्रभावितb हो या न हो।

प्रश्न 2.
भारत में प्रजातंत्र की कौन-कौन सी कमियाँ आपको नजर आती हैं? इनके निराकरण के लिए आप क्या करना चाहेंगे?
उत्तर:
भारत में प्रजातन्त्र सन् 1950 में स्वीकार किया गया था। तब से एक लम्बा समय व्यतीत हो चुका है। इस बीच प्रजातंत्र मजबूत हुआ है किन्तु अब भी उसमें अनेक कमियाँ हैं जिनको सुधारना जरूरी है। भारत में अनेक राजनैतिक दल हैं। चुनाव दलविहीन प्रत्याशी भी लड़ सकते हैं। केन्द्र तथा राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें होती हैं। इससे उनमें संघर्ष की स्थिति बनी रहती है तथा जनता के हित प्रभावित होते हैं। राजनैतिक दलों की संख्या कम होनी चाहिए। स्वतन्त्र प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने से रोका जाना चाहिए। केन्द्र तथा राज्यों में चुनाव साथ-साथ होने चाहिए।

भारतीय राजनीतिज्ञ सिद्धान्तहीन हैं। दल-बदल खूब होता है। चुनाव में धनबल, धर्म, जाति तथा अपराधी प्रकृति से लोग प्रभावित करते हैं। इन बातों पर नियंत्रण होना आवश्यक है। राजनैतिक दलों की आय की जाँच होनी चाहिए तथा आय के स्रोतों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

जो दल सत्ता में है, उसको पक्षपातरहित होना चाहिए। उसको अपनी नीति लोकसभा में रखनी चाहिए तथा वहाँ से स्वीकृत नीति को ही कार्यपालिका द्वारा लागू किया जाना चाहिए। सरकार को इसमें हस्त क्षेप नहीं करना चाहिए। किसी अधिकारी तथा कर्मचारी पर अनुचित दबाव भी नहीं डालना चाहिए। लोकसभा तथा विधानसभा में तर्कपूर्ण चर्चा होनी चाहिए। वहाँ सरकारी पक्ष तथा प्रतिपक्ष को एक दूसरे के विरोध के अनुचित तरीके नहीं अपनाने चाहिए। दोनों का आचरण संविधान सम्मत होना चाहिए।

उपर्युक्त कमियों के निराकरण हेतु मैं लोगों को अच्छे जनप्रतिनिधियों को चुनने हेतु प्रेरित करूंगा। साथ ही साथ इस विषय पर अपने अभिभावकों से लोगों से चर्चा करने हेतु आग्रह करूंगा।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 13 सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें पाठ से आगे

प्रश्न 1.
पंचायती राज में प्रजातंत्र की प्रथम पाठशाला ‘ग्राम सभा’ होती है। आप अपनी ग्राम-सभा, ग्राम-पंचायत, पंचायत समिति व जिला परिषद् के बारे में जानकारी एकत्र कीजिए।
उत्तर:
संकेत- विद्यार्थी अपने अध्यापक महोदय के मार्गदर्शन में स्वयं करें।

प्रश्न 2.
राजस्थान में विधानसभा चुनाव किस प्रकार होता है। आप वयस्क मताधिकार व मतदान का अधिकार के प्रति कितने जागरूक हैं? चर्चा कर लिखिए।
उत्तर:
राजस्थान में पंजीकृत मतदाता विधानसभा के सदस्यों का चुनाव करते हैं। निर्वाचित विधायक विधान मण्डल दल के नेता का चुनाव करते हैं। विधानमण्डल दल का नेता मुख्यमन्त्री होता है तथा मंत्रिपरिषद का गठन करता है। वयस्क मताधिकार तथा मतदान का अधिकार देश के नागरिक को प्राप्त एक ऐसा अधिकार है जिससे वह देश/राज्य का शासक तय करता है। अतः इसका प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति को सोच-समझकर करना चाहिए।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 13 सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 13 सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. ‘वाशिंगटन किनका देवता था –

(क) अमेरिका के लोगों का
(ख) इंग्लैण्ड के लोगों का
(ग) विद्रोही प्रदेशों का
(घ) उपर्युक्त सभी।

2. ‘एडवर्ड ड्यूक ऑफ विण्डसर’ का सम्पूर्ण चरित्र छपा था –

(क) इंडियन एक्सप्रेस में
(ख) नेशनल हेराल्ड में
(ग) टाइम्स ऑफ इंडिया में
(घ) हिन्दुस्तान टाइम्स में।

3. ”यदि समाज नीतिपरायण न हो तो प्रजातन्त्र टिका नहीं रह सकता”-यह कथन है –

(क) डॉ. अम्बेडकर का
(ख) प्रो. लास्की का
(ग) पं. नेहरू का
(घ) महात्मा गाँधी का।

4. दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति का विरोधी श्वेत चमड़ी वाला व्यक्ति था –

(क) महात्मा गाँधी
(ख) रेवरेण्ड स्काट
(ग) मि. चर्चिल
(घ) विलियम टेनीसन।

उत्तर:

  1. (क)
  2. (ग)
  3. (ख)
  4. (ख)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 13 सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रजातंत्र में समाचार-पत्रों की आय का साधन कौन नहीं बन सकता?
उत्तर:
प्रजातन्त्र में समाचार-पत्रों की आय का साधन विरोधी पक्ष नहीं बन सकता।

प्रश्न 2.
तत्कालीन समय में किस देश में विरोधी पक्ष के नेता को सरकारी खजाने से वेतन मिलता था?
उत्तर:
विरोधी पक्ष के नेता को इंग्लैण्ड तथा कनाडा में सरकारी खजाने से वेतन मिलता था।

प्रश्न 3.
अमेरिका में पहले कौन-सी विकृत पद्धतिं प्रचलित थी?
उत्तर:
पहले अमेरिका में नए दल की सरकार आने पर सभी पुराने सरकारी कर्मचारियों को हटाकर सरकार के अनुसार नए कर्मचारी नियुक्त किए जाते थे।

प्रश्न 4.
प्रजातन्त्र में सत्तारूढ़ दल किस काम में हस्तक्षेप नहीं करता?
उत्तर:
प्रजातंत्र में सत्तारूढ़ दल प्रशासन के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करता।

प्रश्न 5.
दिल्ली में किस वायसराय के नाम से कोई क्लब या स्ट्रीट नहीं थी?
उत्तर:
दिल्ली में वायसराय लार्ड लिनलिथगो के नाम पर कोई क्लब या स्ट्रीट नहीं थी।

प्रश्न 6.
प्रजातन्त्र में शासन की बागडोर किसके हाथ में होती है?
उत्तर:
प्रजातन्त्र में शासन की बागडोर बहुमत वाले दल के हाथ में होती है।

प्रश्न 7.
प्रजातन्त्र को सफल बनाने में नैतिकता का क्या स्थान है?
उत्तर:
नैतिकतापूर्ण आचरण के बिना प्रजातंत्र सफल नहीं हो सकता।

प्रश्न 8.”
भारत के हर गाँव में दक्षिण अफ्रीका है”-डा.अम्बेडकर के इस कथन का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
डा. अम्बेडकर का तात्पर्य है कि भारत के हर गाँव में दलितों के साथ असमानता का व्यवहार किया जाता है जैसा दक्षिण अफ्रीका में होता है।

प्रश्न 9.
पुराने ईसाई कानून में यहूदी लोगों के लिए उत्तराधिकार संबंधी क्या व्यवस्था थी?
उत्तर:
पुराने ईसाई कानून में मृत पिता की जायदाद में कोही यहूदी बच्चा उत्तराधिकारी नहीं हो सकता था।

प्रश्न 10.
प्रजातंत्र में विरोधी दल का क्या कर्तव्य होता है?
उत्तर:
प्रजातन्त्र में विरोधी दल का कर्तव्य सरकार के कार्यों पर पैनी निगाह रखकर उसे जनविरोधी कार्यों से रोकना होता है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 13 सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रजातन्त्रवाद क्या है?
उत्तर:
विश्व के देशों में अनेक प्रकार की शासन व्यवस्थाएँ प्रचलित रही हैं, उनमें प्रजातन्त्रवाद भी एक है। प्रजा के मतानुसार जिस तन्त्र अर्थात् शासन व्यवस्था का संचालन होता है, उस विचारधारा को प्रजातन्त्रवाद कहते हैं। इसमें जनता ही शासक होती है तथा शासित भी वही होती है।

प्रश्न 2.
प्रजातन्त्र में सरकार का निषेध करने से क्या आशय है?
उत्तर:
प्रजातन्त्र में जो व्यक्ति अथवा राजनैतिक दल सत्तारूढ़ होता है, उसको हर पाँच वर्ष बाद जनता का मत जानना होता है कि वह सत्ता में रहे अथवा नहीं। इसके लिए पाँच वर्ष बाद चुनाव होते हैं। जनता चाहती है तो उस दल को सत्ता से हटा देती है। प्रजातन्त्र में ऐसे उपाय भी होते हैं कि सत्तारूढ़ दल को पाँच वर्ष से पूर्व ही सत्ता से हटाया जा सकता है। प्रजातन्त्र में किसी को भी अनन्त काल तक शासन करने का अधिकार नहीं होता।

प्रश्न 3.
प्रजातन्त्र में विधायिका में कितने पक्ष होते हैं? उनका क्या काम है?
उत्तर:
प्रजातन्त्र में विधायिका के दो पक्ष होते हैं। पहला, सत्ता पक्ष अथवा सरकार तथा दूसरा, विरोधी अथवा प्रतिपक्ष । निर्वाचित बहुमत को सत्ता पक्ष कहते हैं। उसका काम देश का शासन चलाना होता है। सरकारी पक्ष पर नियंत्रण रखने का काम विरोधी पक्ष अर्थात् प्रतिपक्ष करता है। वह सरकार के कार्यों के औचित्य पर विचार करता है तथा उसके अनुचित कार्यों पर रोक लगाता है।

प्रश्न 4.
“सरकार हमेशा हथौड़े के नीचे रहती है”–लेखक के इस कथन का तात्पर्य क्या है?
उत्तर:
लेखक ने प्रजातन्त्र में विरोधी पक्ष को जरूरी बताया है। जो लोग सरकार में नहीं होते वे सरकारी कार्यों पर नजर रखते हैं। उनके कारण सरकार मनमानी नहीं कर सकती। सरकार को अपने प्रत्येक कार्य को औचित्य सिद्ध करना होता है। सरकार के हथौड़े के नीचे रहने का तात्पर्य यही है कि विरोध के कड़े नियंत्रण के कारण सरकार विधि विरुद्ध कार्य नहीं कर पाती।

प्रश्न 5.
तत्कालीन समय में इंग्लैण्ड तथा कनाडा में विरोध पक्ष की स्थिति स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इंग्लैण्ड तथा कनाडा में विरोध पक्ष के नेता को अनेक सुविधायें दी जाती 2। लोकसभा के भवन में उसका कार्यालय होता था। उसमें एक सचिव तथा श्रुत लेखक और अन्य कर्मचारी काम करते थे। नेता तथा उसके कर्मचारियों का वेतन सरकारी खजाने से दिया जाता था। विरोध पक्ष के नेता को वहाँ के प्रधानमन्त्री के समान ही वेतन प्राप्त होता था।

प्रश्न 6.
कानून तथा शासन की दृष्टि में समानता होने का क्या अर्थ है? यह क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
कानून तथा शासन को पक्षपात से मुक्त होना चाहिए। कई बार शासक दल अपने सदस्यों को लाभ पहुँचाने के लिए कानून के विपरीत काम करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अपने दल के सदस्यों तथा प्रतिपक्ष के सदस्यों के साथ उसका व्यवहार भेदभावपूर्ण होता है। उनकी दृष्टि में सभी समान नहीं हैं। सत्तारूढ़ पक्ष का सतत, संतुलित और निष्पक्ष रहना जरूरी है अन्यथा प्रजातंत्र को इससे हानि पहुँचती है।

प्रश्न 7.
शासन की दृष्टि कब असमान होती है? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सत्तापक्ष जब पक्षपातपूर्ण आचरण करता है तब शासन की दृष्टि असमान होती है। उदाहरण के लिए, कोई मंत्री अपनी पार्टी के सदस्यों को नियम विरुद्ध लाभ पहुँचाये तो इसे शासन की असमान दृष्टि कहेंगे। सत्तारूढ़ दल का कोई नेता मजिस्ट्रेट को धमकाये कि यदि वह उसके परिचित किसी अपराधी को जेल में भेजेगा तो उसकी शिकायत मंत्री से करके उसका ट्रांसफर करा दिया जायेगा। ऐसी स्थिति में मंत्री भी उसकी सहायता करे तो इसको शासन की असमान दृष्टि अथवा पक्षपात कहा जायेगा।

प्रश्न 8.
सत्तापक्ष को कार्यपालिका के काम में दखल क्यों नहीं देना चाहिए?
उत्तर:
सत्तापक्ष को कार्यपालिका को अपना काम स्वतन्त्र रहकर कानूनसम्मत तरीके से करते रहने देना चाहिए। उसको उसके काम में हस्तक्षेप नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से प्रशासन में राजनीति का प्रवेश हो जाता है तथा वह निष्पक्ष नहीं रह जाता। शासन व्यवस्था ठीक और निष्पक्ष रहे तथा वह राजनीति से अप्रभावित रहे। इसके लिए सत्ता पक्ष को कार्यपालिका के कामों में दखल देने से बचना चाहिए।

प्रश्न 9.
अमेरिका में प्रचलित विकृत शासन पद्धति क्या थी? उसे क्यों त्याग दिया गया?
उत्तर:
अमेरिका में पहले ऐसी व्यवस्था थी कि कार्यपालिका शासन सत्ता की इच्छानुसार ही काम करती थी। चुनाव के बाद नई सरकार के सत्ता में आने पर सभी सरकारी कर्मचारियों को हटा दिया जाता था। यहाँ तक कि चपरासी को भी बदल दिया जाता था। पुनः सत्तारूढ़ दल के अनुसार नई नियुक्तियाँ होती थीं। इससे शासन निष्पक्ष नहीं रह पाता था तथा अव्यवस्था फैलती थी। इसी पद्धति को ‘विकृत पद्धति’ कहा गया। इसके कारण फैलने वाली अव्यवस्था तथा पक्षपात से बचने के लिए इस पद्धति को त्याग दिया गया।

प्रश्न 10.
‘राजनीतिक कार्यालय’ तथा ‘सिविल कार्यालय’ से क्या तात्पर्य है? दोनों में क्या अन्तर है?
उत्तर:
इंग्लैंड में ‘राजनैतिक कार्यालय’ तथा ‘सिविल कार्यालय में भेद रखा गया। राजनैतिक दलों से सम्बन्धित कार्य उनके दलीय कार्यालय में होते हैं। सिविल कार्यालय में सरकारी नीति को लागू करने के कार्य होते हैं। इस कार्यालय के कर्मचारी सरकारी तथा स्थायी होते हैं। जो राजनैतिक दल सत्तारूढ़ है, वे उसी की आज्ञानुसार कार्य करते हैं। कोई मन्त्री उनके काम में हस्तक्षेप नहीं करता। अब यही नीति विश्व के सभी प्रजातान्त्रिक देशों में अपनाई गई है।

प्रश्न 11.
लार्ड लिनलिथगो कौन था? उसके प्राइवेट सेक्रेटरी ने लेखक से क्या कहा था?
उत्तर:
लार्ड लिनलिथगो भारत का वायसराय था। उसके नाम पर दिल्ली में कोई क्लब अथवा स्ट्रीट नहीं र्थी । उसका प्राइवेट सेक्रेटरी लेखक के पास आया और कहा-”क्या आप लार्ड लिनलिथगो के नाम पर किसी संस्था अथवा कार्य का नाम नहीं कर सकते? सभी वायसरायों के नाम पर कोई न कोई संस्था है, केवल उनका ही नाम नहीं है।” लेखक डा. अम्बेडकर उन दिनों ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया’ के ‘मेम्बर’ थे। उन्होंने उससे कहा कि विचार करेंगे।

प्रश्न 12.
“अब हम उस परम्परा से दूर हटते जा रहे हैं।” लेखक के अनुसार हम किस परम्परा से दूर हटते जा रहे हैं?
उत्तर:
सरकार का काम शासन-व्यवस्था में हस्तक्षेप करना नहीं है। वह केवल पालिसी अथवा नीति तय कर सकती है। उसको शासन व्यवस्था में दखल नहीं देना चाहिए। उस समय इस नीति का कठोरतापूर्वक पालन होता था। कोई मन्त्री इसको भंग नहीं करता था। आज भारत में लोग इस परम्परा से दूर होते जा रहे हैं। सरकार के मन्त्री छोटे-छोटे कामों में दखल देने लगे हैं। इससे सरकारी कर्मचारी निष्पक्षतापूर्वक काम नहीं कर पाते। लेखक को कष्ट है कि भारत में इस परम्परों को छोड़ा जा रहा है।

प्रश्न 13.
विधान सम्बन्धी नैतिकता किसको कहते हैं?
उत्तर:
शासन व्यवस्था सुचारु रहे, इसके लिए कुछ नियम बनाए जाते हैं। उनका दृढ़ता के साथ पालन करना ही विधान सम्बन्धी नैतिकता है। इसी से व्यवस्था कानून समस्त और निष्पक्ष होती है। यदि अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए नियमों को तोड़ा जायेगा तो अव्यवस्था फैलेगी तथा समाज में पक्षपात बढ़ेगा। प्रजातन्त्र में बहुमत वाले दल को ही सत्तारूढ़ होने का अधिकार होता है। यदि अल्पमत वाला दल सरकार बनाने का दावा करे तो यह विधान सम्बन्धी नैतिकता के विरुद्ध कार्य होगा।

प्रश्न 14.
अमेरिका के पहले राष्ट्रपति ने विधान संबंधी नैतिकता की सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित की थी?
उत्तर:
अमेरिका के पहले राष्ट्रपति को दूसरी बार राष्ट्रपति पद स्वीकार करने के लिए उनके समर्थकों ने किसी तरह तैयार कर लिया परन्तु तीसरी बार वह राजी नहीं हुए। उन्होंने कहा कि ऐसा करना विधान सम्बन्धी नैतिकता के विरुद्ध होगा। वह एक निर्वाचित राष्ट्रपति हैं। उनका कार्यकाल पाँच वर्ष है। वह राजा नहीं हैं कि आजीवन पद पर बने रहें । अमेरिकी इंग्लैंड के राजा की अधीनता त्याग कर प्रजातन्त्र के नागरिक बने हैं। यदि वह बार-बार राष्ट्रपति बनेंगे तो इंग्लैण्ड के स्थानापन्न राजा हो जायेंगे। प्रजातन्त्र में कोई व्यक्ति अथवा एक ही व्यक्ति सदैव किसी राजनैतिक पद पर नहीं रह सकता।

प्रश्न 15.
भारत में विधान संबंधी नैतिकता के प्रति कैसा दृष्टिकोण है? इस सम्बन्ध में अपना मत स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत में विधान सम्बन्धी नैतिकता का पालन दृढ़ता के साथ नहीं किया जाता। यहाँ के नेतागण किसी पद पर आजीवन बने रहना चाहते हैं। यदि पद त्यागना ही पड़े हो ऐसे नैतिक-अनैतिक उपाय करते हैं कि उस पद पर अपने किसी परिजन को बैठा देते हैं। इसकी रोकथाम के लिए दो तरीके अपनाए जा सकते हैं। सरकार ऐसा कानून बनाये कि कोई दूसरी बार उस पद पर आरूढ़ न हो सके अथवा लोगों में जार्ज वाशिंगटन जैसी नैतिक भावना जगाई जाय कि वे स्वयं इससे बचें। एक नागरिक होने के नाते मैं दूसरे तरीके को अपनाकर लोगों को जागरूक बनाऊँगा।

प्रश्न 16.
प्रोफेसर लास्की ने ‘हेराल्ड’ में लेख लिखकर इंग्लैण्ड के मजदूर दल की किस विषय में आलोचना की थी?
उत्तर:
आठवाँ एडवर्ड ड्यूक ऑफ विण्डसर एक सामान्य स्त्री से शादी करना चाहता था। इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री ने सलाह दी। कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। यदि वह ऐसा करेगा तो उसे राजा का पद त्यागना होगा। उस समय मजदूर दल विरोध में था। वह इस बात को लेकर प्रधानमन्त्री बाल्डविन को घेरना चाहता था। प्रो. लास्की ने ‘ हेराल्ड’ में लेख लिखकर मजदूर दल की आलोचना की थी। उनका कहना था कि राजा को प्रधानमन्त्री की सलाह माननी चाहिए। अतः इसको लेकर बाल्डविन का विरोध करना उचित नहीं होगा।

प्रश्न 17.
प्रजातंत्र में बहुमत को अल्पमत के सम्बन्ध में किस बात का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
प्रजातंत्र में बहुमत को अल्पमत के हितों की रक्षा का ध्यान रखना चाहिए। उसको ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए कि अल्पमत को लगे कि उस पर अत्याचार हो रहा है। अल्पमत को सदा विश्वास रहना चाहिए कि शासन की बागडोर बहुमत के हाथ में होने पर भी उसको कोई क्षति नहीं होगी। बहुमत की ओर से उस पर कोई चोट नहीं होगी। बहुमत प्राप्त होने का अर्थ अल्पमत की उपेक्षा । और उसका दमन करना नहीं है। बहुमत के हाथों में अल्पमत के हित सुरक्षित रहने चाहिए।

प्रश्न 18.
अल्पमत वालों में विधान विरोधी भावना कब पैदा होती है?
उत्तर:
अल्पमत को विरोध करने तथा अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए। लोकसभा में विरोध पक्ष ‘काम रोको’, ‘निन्दा प्रस्ताव’ आदि लाया करता है। उनको इसका अवसर मिलना चाहिए। इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट में उनके ऐसे प्रस्तावों को स्वीकार करके उनको अपनी बात कहने का अवसर अवश्य दिया जाता है। किन्तु भारत में उनके प्रस्ताव स्वीकृत नहीं हो पाते। यदि अल्पमत को अपना पक्ष रखने से वंचित किया जायगा तो उनके मन में विधान-विरोधी भावना पैदा होगी। बहुमत को ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए कि अल्पमत को लगे कि उसके साथ निरंकुशता का व्यवहार किया जा रहा है।

प्रश्न 19.
क्या राजनीति नैतिकता का पालन किए बिना सफल हो सकती है? इस विषय में आपका क्या मत है?
उत्तर:
कुछ लोग मानते हैं कि राजनीति तथा नैतिकता दो अलग-अलग चीजें हैं। राजनीति में सफलता के लिए नैतिकता को स्वीकार करना जरूरी नहीं है। किन्तु यह बात सच नहीं है। नैतिकता के अभाव में प्रजातन्त्र नहीं चल सकता। प्रो. लास्की प्रजातन्त्र के लिए नैतिकता को जरूरी मानते हैं। मेरा विचार है कि नैतिकता के अभाव में राजनीति दूषित हो जाती है।

प्रश्न 20
भारत में राजनीतिज्ञों का नैतिकता के सिद्धान्त के प्रति कैसा दृष्टिकोण है? इस सम्बन्ध में आप उनसे क्या कहना चाहेंगे?
उत्तर:
भारत में राजनेता नैतिकता को राजनीति के लिए आवश्यक नहीं मानते राजनीति का कुशल खिलाड़ी सफलता पर दृष्टि रखता है तथा किसी भी तरह सफलता प्राप्त करना उचित मानता है किन्तु सभी नेता ऐसे नहीं हैं। कुछ नैतिकता को अपनाने के पक्ष में भी हैं। मैं उनसे यही कहना चाहूंगा कि वे गम्भीरता से राजनीति में नैतिकता सम्बन्धी मुद्दों पर विचार करें। वे देखेंगे कि नैतिकता को त्याग कर राजनीति किसी के लिए भी हितकर नहीं हो सकती।

प्रश्न 21.
सार्वजनिक अन्तरात्मा’ से लेखक का क्या तात्पर्य है? यह प्रजातन्त्र की सफलता में किस तरह सहायक है?
उत्तर:
जब कोई अन्याय अथवा अनुचित काम हो रहा हो तो उसका विरोध प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिए। उस अन्याय से जिसकी हानि हो रही हो केवल उसी को विरोध नहीं करना है। सभी प्रकार के मतभेद भुलाकर एकता के साथ सभी को अन्याय का विरोध करना चाहिए। समाज की ऐसी ही मन:स्थिति को सार्वजनिक अन्तरात्मा कहते हैं। ऐसा करने से समाज में एकता की भावना बढ़ती है। तथा एक-दूसरे के प्रति विश्वास में वृद्धि होती है। यह बात प्रजातन्त्र की सफलता में सहायक होती है।

प्रश्न 22.
लेखक को भारत में सार्वजनिक अन्तरात्मा का अभाव कहाँ दिखाई देता है? क्या आपको भी ऐसा ही लगता है?
उत्तर:
लेखक को भारत में दलितों के साथ होने वाले व्यवहार में उसे लगता है कि लोग दलितों के साथ समानता का व्यवहार न होने पर उसके विरोध के लिए एकजुट नहीं होते। केवल दलितजनों को ही उस अत्याचार का विरोध करना होता है। लेखक का कथन हमें अतिरंजित प्रतीत होता है। गौतम बुद्ध, कबीर, महात्मा गाँधी आदि तथा उनसे प्रभावित अनेक भारतीय दलितों के साथ दुर्व्यवहार के विरुद्ध रहे हैं।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 13 सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रजातन्त्रवाद का मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को सदैव शासन करते रहने का अधिकार नहीं है-लेखक के इस कथन में प्रजातन्त्र की किस विशेषता का उल्लेख हुआ है?
उत्तर:
डा. अम्बेडकर ने बताया है कि प्रजातन्त्र में कभी भी किसी व्यक्ति को आजीवन शासन करने का अधिकार नहीं होता। ऐसा अधिकार तो राजतन्त्र में राजा को ही होता है। राजतन्त्र वंश परंपरा के आधार पर चलता है जबकि प्रजातंत्र में निष्पक्ष, स्वतन्त्र निर्वाचन ही सत्ता का आधार होता है। प्रजातन्त्र में प्रत्येक पाँच वर्ष के बाद चुनाव होता है। जनता सत्तारूढ़ दल को पुन: शासन करने का अधिकार दे सकती है अथवा उसको हटाकर किसी दूसरे दल को शासन का अधिकार प्रदान कर सकती है। प्रजातन्त्र में कोई भी व्यक्ति अथवा दल सदैव शासक नहीं बना रह सकता । प्रजातन्त्र में निर्वाचन द्वारा शासनाधिकार तय होता है। निर्वाचन निष्पक्ष होता है तथा चुनाव जनता करती है। राज्याधिकार जन्म और वंश के आधार पर तय नहीं होता। सरकार को पाँच वर्ष के कार्यकाल के बाद हटाया जा सकता है। यदि उसका काम ठीक नहीं है तो संविधान में व्यवस्था होती है तथा उसके अनुसार उसको कार्यकाल के बीच में भी निरुद्ध किया जा सकता है। उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है।

प्रश्न 2.
प्रजातन्त्र में विरोधपक्ष का क्या महत्व है। इंग्लैण्ड में विरोधी पक्ष के लिए क्या व्यवस्था है?
उत्तर:
प्रजातन्त्र में बहुमत वाले पक्ष को सत्तापक्ष तथा अल्पमत वाले पक्ष को विपक्ष, विरोधपक्ष अथवा प्रतिपक्ष कहते हैं। प्रजातंत्र में सशक्त विरोध पक्ष का होना आवश्यक होता है। विरोध पक्ष अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। उसका महत्त्व सत्ता पक्ष से कम नहीं होता। विरोध पक्ष सरकार के प्रत्येक कार्य पर नियंत्रण रखता है तथा उसको विधान विरुद्ध काम करने से रोकता है। इससे सरकार मनमानी नहीं कर पाती और देश में प्रजातन्त्र के कमजोर होने का खतरा नहीं रहता।।

इंग्लैण्ड में विरोध पक्ष के इस महत्व को मान लिया गया है। वहाँ विरोध पक्ष के नेता को अनेक सुविधायें दी जाती हैं। लोकसभा के भवन में विरोध पक्ष के नेता का कार्यालय होता है। उसमें एक सचिव, एकं श्रुत लेखक तथा अन्य कर्मचारी होते हैं। इनका वेतन सरकार देती है। विरोध पक्ष के नेता का वेतन प्रधानमन्त्री के वेतन के समान सरकारी खजाने से दिया जाता है। संविधान में ऐसी व्यवस्था विरोध पक्ष की महत्ता को स्वीकार करने के कारण ही की गई है।

प्रश्न 3.
“सम्भव है कि मिनिस्टर सबसे पहले उसकी टोपी की ओर देखे कि वह किस रंग की टोपी पहने हुए है”-लेखक यह कहकर प्रजातन्त्र की किस कमजोरी की ओर संकेत करना चाहता है? इससे प्रजातन्त्र को क्या हानि होती है?
उत्तर:
कोई व्यक्ति सरकार के मन्त्री के पास जाता है तथा उससे निवेदन करता है कि वह सम्बन्धित अधिकारी से कहकर उसका काम करा दे। पहले मन्त्री उसकी टोपी का रंग देखता है। आशय यह है कि वह यह सुनिश्चित करता है कि वह व्यक्ति उसकी पार्टी का है या किसी दूसरी पार्टी का। यदि उसकी पार्टी का है तो काम हो जायगा, अन्य को नहीं । लेखक के प्रश्नगत कथन से पता चलता है कि मन्त्री महोदय का व्यवहार समानता पर आधारित नहीं है। इससे शासकीय पक्षपातपूर्ण नीति का पता चलता है।

प्रजातन्त्र में कानून तथा शासन की दृष्टि में सभी समान होते हैं। धर्म, जाति, लिंग, रंग, पार्टी आदि के आधार पर उनमें कोई असमानता नहीं होती। सरकार किसी काम को करने न करने के लिए कर्मचारियों से नहीं कहती। सरकारी अफसर निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र होकर नियमानुसार काम करते हैं। सरकार केवल पॉलिसी अथवा नीति बना देती है। यदि कोई सरकार अथवा उसका कोई मन्त्री ऐसा करता है तो यह सरकार का पक्षपात माना जाता है। सरकार को ऐसी कार्य प्रणाली से प्रजातन्त्र कमजोर होता है। सरकारी कर्मचारियों में सत्तारूढ़ दल की बात मानने तथा उससे अनुचित लाभ उठाने की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है।

प्रश्न 4.
विधान-सम्बन्धी नैतिकता’ का अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन ने किस प्रकार पालन किया था? क्या भारत के किसी नेता के जीवन से ऐसा उदाहरण दिया जा सकता है?
उत्तर:
शासन व्यवस्था का संचालन सुचारु रूप से हो सके, इसके लिए विधान बनाया जाता है। विधान सम्बन्धी नैतिकता का अर्थ है कानून का पालन करना क्योंकि उसके होने से कानून व्यवस्था बनी रहती है। जार्ज वाशिंगटन अमेरिका के पहले राष्ट्रपति थे। लोगों के बहुत आग्रह करने पर वह दूसरी बार भी राष्ट्रपति बने किन्तु तीसरी बार उन्होंने इस पद को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने लोगों को समझाया कि ऐसा करने से लोकतंत्र तथा राजतंत्र में अन्तर ही नहीं रह जायगा। वह इंग्लैण्ड के राजा के स्थानापन्न हो जायेंगे। राजतन्त्र में राजा आजीवन शासक बना रह सकता है। वहाँ वंश परम्परा को माना जाता है। प्रजातन्त्र का विधान यह है कि राष्ट्रपति एक कार्यकाल के लिए ही चुना जाता है। उसके बाद किसी अन्य को उस पद पर काम करने का अवसर मिलना चाहिए। उनका बार-बार राष्ट्रपति बनना इस विधान सम्बन्धी नैतिकता का उल्लंघन होगा।

इंग्लैण्ड के विरुद्ध विद्रोह करके अमेरिका के लोगों ने लोकतन्त्र की स्थापना की है तथा राजा की अधीनता से मुक्ति पाई है। इस नियम को बनाने वाले भी वह स्वयं हैं। अतः उनका पुनः राष्ट्रपति बनना इस नियम का उल्लंघन होगा। इस प्रकार अपने अनुयायियों के अनुरोध को उन्होंने स्वीकार नहीं किया और विधान सम्बन्धी नैतिकता का पालन किया। यद्यपि भारत में आज सत्तालोलुप नेताओं का बोल वाला है परन्तु भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने भी दूसरी बार राष्ट्रपति बनना स्वीकार नहीं किया था।

प्रश्न 5.
“मुझे तो यह एक आश्चर्य में डालने वाली स्थापना मालूम होती है”-डा. अम्बेडकर किस स्थापना की बात कर रहे हैं, जो उनको आश्चर्यजनक लगती है? क्या आप उनकी बात से सहमत हैं?
उत्तर:
डा. अम्बेडकर का कहना है कि राजनीति को नैतिकता के द्वारा ही स्वच्छ तथा पवित्र बनाया जा सकता है। कुछ लोग मानते हैं कि राजनीति तथा नैतिकता अलग-अलग बातें हैं। राजनीतिज्ञ कोई नैतिकतावादी साधु-संत नहीं होता । राजनीति में सब चलता है। सत्य बोलना अच्छा है किन्तु राजनीति में सच पर अड़े रहना मूर्खता है। प्रोफेसर लास्की कहते हैं कि नैतिकता के बिना प्रजातन्त्र नहीं चल सकता। उनके ही समान डा. अम्बेडकर भी नैतिकतापूर्ण राजनीति के पक्ष में हैं। जिस समाज में नैतिकता नहीं होगी, वहाँ प्रजातन्त्र सफल नहीं होगा। नैतिकता को त्याग कर राजनीति नहीं की जा सकती। नैतिकता के बिना राजनीति दूषित हो जाती है। कानून बनाने वालों को विश्वास होता है कि कोई समाज इतना सदाचार परायण अवश्य होगा कि कानून का पालन हो सकेगा। यदि समाज में नैतिकता की भावना ही होगा तो कानून का पालन कराना आसान नहीं होगा। नैतिक नियंत्रण के बिना राजनीति उद्दण्ड तथा समाज विरोधी हो जाती है। प्रजातन्त्र में नियमों तथा कानूनों का स्वेच्छा से पालन करने पर बल दिया जाता है तथा उसमें ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा होता है । नैतिकता को मानते हैं तथा उसके अनुरूप ही आचरण करते हैं।

अत: यह स्थापना कि नैतिकता के बिना राजनीति सफल हो सकती है, आश्चर्यजनक ही मानी जायगी। हम इस सम्बन्ध में उनकी बात से असहमत नहीं है।

प्रश्न 6.
”अल्पमत वाले जो इस अन्याय के तले पिस रहे हैं, बहुमतवालों से कभी किसी प्रकार की सहायता न प्राप्त करेंगे, जिससे वे इस अन्याय से मुक्त हो सकेंगे।” डा. अम्बेडकर यहाँ किनके बारे में बात कर रहे हैं? क्या यह कहना ठीक है कि बहुमत वालों से उनको कभी सहायता नहीं मिली है ना मिलेगी?
उत्तर:
‘सार्वजनिक अंतरात्मा’ प्रजातन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक है। इसका आशय यह है कि किसी अन्याय का विरोध सभी नागरिकों को भेदभाव त्याग कर करना चाहिए तथा पीड़ित व्यक्ति की रक्षा करनी चाहिए, भले ही वह स्वयं उससे पीड़ित हो या न हो। इसी सन्दर्भ में लेखक ने उपर्युक्त बात कही है।

इस कथन में ‘अल्पमत’ दलित जातियों के लिए तथा ‘बहुमत’ उच्च जातियों के लिए प्रयुक्त शब्द है। दलित जातियाँ बहुत समय से भेदभाव तथा अन्याय का शिकार रही हैं। उनको सामाजिक असमानता की पीड़ा सहन करनी पड़ी है तथा अपमान भी झेलना पड़ा है। लेखक का कहना है कि सार्वजनिक अन्तरात्मा’ के न होने से ऐसा हो रहा है। वे अन्याय सहते रहेंगे और उच्च जाति वालों से उनको कोई सहायता प्राप्त नहीं होगी, जिससे वे इस अन्याय से मुक्त हो सके।

यह कथन अतिरंजित प्रतीत होता है कि बहुमतवालों से उनको कभी सहायता नहीं मिली है ना मिलेगी। यदि ध्यान से देखा जाय तो गौतम बुद्ध, सन्त कबीर, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, महात्मा गाँधी आदि अनेक महापुरुषों ने इस अन्याय का विरोध किया है।

महात्मा गाँधी का तो इसमें बहुत बड़ा योगदान है। दलितों में सामाजिक चेतना जगाने में गाँधी जी अग्रणी हैं। प्रेमचन्द, निराला, बच्चन तथा अनेक साहित्यकारों ने भी इस कार्य में योग दिया है।

प्रश्न 7.
भारत में शासन-प्रशासन को जन-अविरोधी तथा निष्पक्ष बनाने के लिए आप क्या करना चाहेंगे? विचारपूर्ण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
एक सफल प्रजातन्त्र में शासन तथा प्रशासन निष्पक्ष तथा जन-अविरोधी होता है। भारतीय शासन-प्रशासन को प्रजातन्त्र के अनुकूल बनाने के लिए मैं निम्नलिखित प्रयास करना चाहूँगा–

मैं सरकार को निष्पक्ष बनाऊँगा तथा उसको अपने ही दल के प्रति होने वाले झुकाव को रोकेंगा। मैं भारत में राजनैतिक दलों को जाति, धर्म आदि के आधार पर कार्य नहीं करने दूंगा । निर्वाचन में उनको नीति के अनुकूल चुनाव लड़ने को कहूँगा। मैं दल-बदल को रोकेंगा । दल बदलने पर किसी प्रत्याशी को पाँच वर्ष से पूर्व उस दल से चुनाव नहीं लड़ने दूंगा। मैं राजनैतिक दलों में अपराधी लोगों का प्रवेश रोकेंगा तथा उनको चुनाव लड़ने और लोकसभा में प्रविष्ट होने नहीं दूंगा। लोकसभा सदस्यों तथा मंत्रियों की शैक्षिक योग्यता तथा आयु सीमा भी मैं तय करूंगा तथा अशिक्षित और अधिक आयु वालों को चुनाव लड़ने से रोक देंगा।

मैं भारत के लोगों में कानून के प्रति विश्वास का भाव जगाऊँगा तथा उसका उल्लंघन न करने की संस्कृति का विकास करूंगा। मैं राजनैतिक दलों की संख्या कम करूंगा। राजनैतिक दलों को धन मिलने के स्रोतों को सार्वजनिक करूंगा तथा उनका निरीक्षण अनिवार्य करूंगा।

सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें लेखक परिचय

प्रश्न-
लेखक का जीवन-परिचय तथा उसके साहित्यिक योगदान का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर-
जीवन परिचय-डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म मध्यप्रदेश के एक छोटे गाँव ‘महू’ में 1891 ई. में हुआ था। इनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल तथा माता का नाम भीमाबाई था। दलित जाति से सम्बन्धित होने के कारण आपको अनेक बाध् T ओं तथा अपमान का सामना करना पड़ा। आप पढ़ाई-लिखाई में होशियार थे। अनेक बाधाओं से लड़ते हुए आप अध्ययन में लगे रहे। वित्तीय सहायता प्राप्त कर आप विदेशों में शिक्षा ग्रहण करने में सफल हुए। आपने कानून का अध्ययन किया और डाक्टरेट प्राप्त की। आप स्वतंत्र भारत में पहले कानून मंत्री बने। आप संविधान सभा के सदस्य रहे तथा भारतीय गणतंत्र के लिए संविधान बनाने में मदद की। आपने जाति प्रथा का विरोध किया तथा समतामूलक समाज की स्थापना के लिए संघर्ष किया। इस प्रसंग में आपने हिन्दू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म को अपनाया। सन् 1956 में आपका देहान्त हो गया।

साहित्यिक परिचय-डॉ. अम्बेडकर हिन्दी के लेखक नहीं थे। आपने अँग्रेजी भाषा में ही पुस्तकें लिखीं। इन पुस्तकों का विषय भी साहित्यिक न होकर सामाजिक है।

रचनाएँ-आपकी अँग्रेजी भाषा में लिखी पुस्तकें अग्रलिखित हैं-द कास्ट्स इन इंडिया, देयर मेकेनिज्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट, द अनटचेबल्स, हू आर दे?, हू आर द शूद्राज, बुद्धा एंड हिज धम्मा, थाट्स ऑन लिंग्युस्टिक स्टेट्स, द प्रॉब्लम ऑफ द रफपी, द एबोलुशन ऑफ प्रोविंशियल फायनांस इन ब्रिटिश इंडिया, द राइज एंड फॉल ऑफ द हिंदू वीमैन, एनीहिलेशन ऑफ कास्ट आदि। इनसे सम्बन्धित साहित्य भारत सरकार के कल्याण मंत्रालय द्वारा ‘बाबासाहब अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय’ नाम से 21 खण्डों में प्रकाशित हो चुका है।

सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें पाठ-सारांश

प्रश्न-‘
सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें’ नामक पाठ का सारांश लिखिए।
उत्तर-
परिचय-‘सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें’ डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा दिया गया एक भाषण हैं। उसमें प्रजातंत्र की सफलता के लिए उपयोगी बातें बताई गयी हैं।

सरकार का निषेध-सफल प्रजातंत्रात्मक शासन के लिए प्रत्येक पाँच वर्ष बाद चुनाव होना चाहिए। इतना ही नहीं पाँच वर्ष होने से पूर्व भी सरकार के निषेध के लिए आवश्यक व्यवस्था होनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि किसी भी दल को हमेशा के लिए तथा मनमाना शासन करने का हक नहीं है।

विरोधी दल-लोकसभा में सरकार के अनुचित कार्यों का प्रतिरोध करने के लिए एक विरोधी दल का होना जरूरी है। इससे सरकार पर नियंत्रण बनाये रखा जा सकता है। इंग्लैंड में प्रधानमंत्री की तरह विरोधी दल के नेता को भी सरकारी खजाने से वेतन तथा अन्य सुविधायें दी जाती हैं। कनाडा में भी ऐसी व्यवस्था है। वहाँ के लोग सरकार की गलतियाँ बताने के लिए विरोध पक्ष की आवश्यकता समझते हैं।

कानून तथा शासन की दृष्टि में समानता-कानून तथा शासन की दृष्टि में सभी नागरिकों में समानता सुनिश्चित होनी चाहिए। शासक दल अपने दल के सदस्य की बात माने तथा अन्य दलों की बातें न माने ऐसा करना ठीक नहीं है। अपने दल के किसी अपराधी को छुड़ाने के लिए शासन दल का कोई व्यक्ति मजिस्ट्रेट को धमकाए कि मेरी बात मानकर इसे छोड़ दो अन्यथा मंत्री से बात करके तुम्हारा ट्रांसफर करा दूंगा। इससे अव्यवस्था फैलेगी और असंतोष व्याप्त होगा। किसी समय अमेरिका का यही हाल था। वहाँ प्रशासन के लोग सत्तारूढ़ दल के अनुसार ही बार-बार बदले जाते थे। इंग्लैंड में सिविल कर्मचारियों को स्थायी रखा जाता था। शासन सत्ता में कोई भी दल हो परन्तु वे नियमानुसर काम करते थे। सत्तारूढ़ दल का कोई व्यक्ति उनके काम में हस्तक्षेप नहीं करता था। सरकार का काम नीति तय करना है। उसको शासन व्यवस्था में दखल नहीं देना चाहिए तथा पक्षपात नहीं करना चाहिए।

विधान सम्बंधी नैतिकता-प्रजातंत्र की सफलता के लिए विधान सम्बंधी नैतिकता का पालन करना आवश्यक है। उसके कारण ही कानूनी व्यवस्था बनी रहती है। उसके उल्लंघन से अराजकता फैलती है। जार्ज वाशिंगटन ने दोबारा अमरीका का राष्ट्रपति बनने से मना कर दिया था। उनका कहना था कि राजतंत्र में ही एक व्यक्ति जीवन भर राजा बना रह सकता है। प्रजातंत्र में ऐसा नहीं होता। विधान सम्बंधी नैतिकता यही है कि अपने प्रतिकूल प्रतीत होने वाले किसी नियम को तोड़ना नहीं चाहिए। उसका सम्मान करना चाहिए। ब्रिटेन में किसी दल का नेता विरोधी दल को किसी बात को लेकर कमजोर कर सकता था किन्तु उसने ऐसा नहीं किया क्योंकि उसको पता था कि इससे विधान कमजोर होगा और प्रजातंत्र को हानि पहुँचेगी।

अल्पमत की उपेक्षा न होना-प्रजातंत्र की सफलता के लिए बहुमत द्वारा अल्पमत की उपेक्षा न करना भी आवश्यक है। अल्पमत को विश्वास रहना चाहिए कि बहुमत की सरकार उसको हानि नहीं पहुँचाएगी। अल्पमत को अपनी बात कहने का अधिकार होना चाहिए। विरोधी पक्ष के सदस्य कार्य स्थगन प्रस्ताव लाते हैं। ब्रिटेन की संसद में शायद ही कभी अध्यक्ष ने विभिन्न मुद्दों पर विचार करने की अल्पमत वाले दलों को अनुमति न दी हो। इसके विपरीत मुम्बई विधानसभा में मोरारजी, मुंशी, खरे आदि ने एक बार भी किसी काम रोको प्रस्ताव पर चर्चा नहीं होने दी। जब अत्यन्त अल्पसंख्या वाले संसद सदस्यों को अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अवसर न मिलेगा तो उनमें विधान विद्रोही भावना पैदा होगी। अत: बहुमत को कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए कि अल्पमत के प्रति उसके व्यवहार को निरंकुश कहा जा सके।

नैतिकता का पालन-नैतिकता और राजनीति को दो अलग बातें माना जाता है। राजनीति में नैतिकता का पालन करना जरूरी नहीं समझा जाता। प्रजातंत्र की सफलता नीतिपरायण समाज पर निर्भर करती है। लास्की ने अपनी पुस्तक में लिखा है-‘यदि समाज नीति परायण नहीं होगा तो प्रजातंत्रवाद टिका नहीं रह सकता।’ आजकल हमारे देश में ऐसा ही हो रहा है।

सार्वजनिक अन्तरात्मा-सार्वजनिक अन्तरात्मा का अर्थ यह है कि किसी अन्याय अथवा अनुचित कार्य के प्रतिरोध का भाव सभी देशवासियों में समान रूप से पाया जाना चाहिए। धर्म, जाति, वर्ग, लिंग आदि के आधार पर इनमें आपसी विरोध नहीं होना चाहिए। जो गलत है, उसको सभी लोगों को बिना मतभेद के एक स्वर में गलत ही कहना चाहिए। सार्वजनिक अन्तरात्मा अन्याय को देखकर विचलित हो उठती है तथा पीड़ित को अन्याय से बचाने के लिए भेदभाव मुक्त होकर खड़ी हो जाती है। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध गोरी चमड़ी वाले रेवरेण्ड स्कॉट ने डटकर संघर्ष किया है। भारत में दलितों के प्रति होने वाले भेदभाव में किसी गैर दलित के विरोध के उदाहरण कम ही मिलते हैं। इससे भी प्रजातंत्र कमजोर होता है तथा समाज में उसके विरुद्ध विद्रोह पनपता है।

महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्याएँ।

1. यह स्वीकृत मत है कि प्रजातंत्रवादी शासन व्यवस्था में जो सत्तारूढ़ हैं, उन्हें प्रत्येक पाँचवें वर्ष लोगों के पास जाना चाहिए और उनसे पूछना चाहिए कि क्या उनकी सम्मति में वे इस योग्य हैं कि उन्हें सत्तारूढ़ रहने दिया जाए ताकि वे उनके हितों का संरक्षण कर सकें, उनके सौभाग्य को बना सकें और उनकी आरक्षा कर सकें। प्रजातंत्र को केवल इतने से ही संतोष नहीं होता कि प्रत्येक पाँचवें वर्ष सरकार की रोक-थाम की जा सके और इस बीच के समय में कोई सरकार को कुछ भी न कह-सुन सके। प्रजातंत्रवाद चाहता है कि न केवल पाँच वर्ष की समाप्ति पर सरकार का निषेध किया जा सके, बल्कि ऐसी भी व्यवस्था होनी चाहिए कि सरकार के विरुद्ध किसी भी समय और तुरन्त निषेधात्मक कार्रवाई की जा सके। अब यदि आपको मेरे कहने को आशय स्पष्ट हो तो प्रजातंत्रवाद का मतलब है कि किसी भी आदमी को सदैव शासन करते रहने का अधिकार नहींयह शासन करने का अधिकार लोगों की स्वेच्छा पर निर्भर करता है। उस अधिकार को लोकसभा भवन में ही चेलेंज किया जा सकता है। (पृष्ठ 57-58)

कठिन-शब्दार्थ-सत्तारूढ़ = शासन करने वाला। सम्मति = विचार। हित = लाभ पहुँचाने वाले काम। आशय = तात्पर्य। प्रजातंत्रवाद = जनतंत्र का विचार। चेलेंज = चुनौती।।

संदर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। यह डॉ. भीमराव अम्बेडकर का एक भाषण है।।
इस भाषण में डॉ. अम्बेडकर ने प्रजातंत्रीय शासन व्यवस्था की चर्चा की है तथा उसकी कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में बताया है।

व्याख्या-डॉ. अम्बेडकर का कहना है कि जनतंत्रीय शासन व्यवस्था में प्रत्येक पाँच वर्ष बाद चुनाव होना आवश्यक है। जो राजनैतिक दल शासन कर रहा है उसको जनता से पूछना चाहिए कि वह आगे जनता के लाभ के काम करे अथवा नहीं। जनता उसको सरकार में बनाए रखने के पक्ष में है अथवा नहीं ? प्रजातंत्र में इतना ही पर्याप्त नहीं है कि सरकार को पाँच वर्ष बाद शासन करने से रोक दिया जाये तथा उसके पाँच साल के कार्यकाल में उसको कोई रोक-टोक ही न सके। प्रजातंत्रीय व्यवस्था के अनुसार पाँच वर्ष बाद सरकार को शासन करने से रोक दिया जाए तथा नया जनादेश प्राप्त किया जाय और ऐसी व्यवस्था की जाए कि शासन-काल के मध्य भी सरकार को जनविरोधी अथवा विधान विरोधी कार्य करने से रोका जा सके। यह सब बातें कहने का तात्पर्य यह है कि प्रजातंत्रीय शासन व्यवस्था में किसी को सदैव शासन-सत्ता में बने रहने का अधिकार नहीं होता। कौन शासन करेगा, यह निर्णय करने का हक जनता को होता है। इस अधिकार को चुनौती केवल लोकसभा में दी जा सकती है।

विशेष-
(i) प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में सरकार पाँच साल के लिए चुनी जाती है। उसको चुनने का हक जनता को होता है।
(ii) विधान-विरुद्ध कार्य पद्धति अपनाने पर सरकार को कार्यकाल के मध्य भी रोकने की व्यवस्था होनी चाहिए।
(iii) भाषा सरल तथा विषयानुरूप है।
(iv) शैली विचार-विश्लेषणात्मक है।

2. मिनिस्टर की इच्छा के प्रतिकूल किसी अफसर का कुछ कहना, आज मुझे एकदम असम्भव लगता है, लेकिन उन दिनों यह सम्भव था क्योंकि ब्रिटेन की तरह हमने भी बुद्धिमत्तापूर्ण फैसला कर रखा था कि सरकार की शासन-व्यवस्था में दखल नहीं देना चाहिए। सरकार का काम है पॉलिसी या नीति तय कर देना। उसका यह काम नहीं कि शासन-व्यवस्था में हस्तक्षेप करे या पक्षपात से काम ले। यह बात महत्त्वपूर्ण है। मुझे लगता है कि अब हम उस परम्परा से दूर हटते जा रहे हैं। और कहीं ऐसा न हो कि हम इस मर्यादा का एकदम परित्याग कर दें। (पृष्ठ सं. 60)

कठिन शब्दार्थ-मिनिस्टर = मंत्री। प्रतिकूल = विरुद्ध। दखल देना = हस्तक्षेप करना। पालिसी = कार्य करने की नीति। पक्षपात = एक ही ओर की बात मानना, संतुलनहीनता। परम्परा = रीति। मर्यादा = सीमा। परित्याग = छोड़ देना।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ के ‘सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। यह डॉ. भीमराव अम्बेडकर को एक भाषण है। इस भाषण में डॉ. अम्बेडकर ने प्रजातंत्रीय शासन व्यवस्था की कुछ जरूरी बातों का उल्लेख किया है। इनको मानकर ही प्रजातंत्र सफल बनाया जा सकता है।

व्याख्या- डॉ. अम्बेडकर कहते हैं कि प्रजातंत्र में सरकार को नीति बनानी होती है। सरकार की नीतियों के संचालन का काम कार्यपालिका करती है। ब्रिटेन की प्रजातंत्रीय शासन व्यवस्था में कार्यपालिका का कोई अधिकारी सरकार के मंत्री की इच्छा के विपरीत सलाह दे सकता था किन्तु भारतीय प्रजातंत्रीय व्यवस्था में आज मंत्री की इच्छा के विरुद्ध किसी अफसर द्वारा कुछ कहना संभव नहीं लगता। उन दिनों जब डॉ. अम्बेडकर ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया’ के मेम्बर थे, भारत में भी ब्रिटेन की तरह यह बुद्धिमत्तापूर्ण नीति का पालन होता था कि सरकार शासन व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं करेगी। उसका काम हस्तक्षेप करना नहीं है। उसका काम केवल नीति तय करना है। उसका काम व्यवस्था में टाँग अड़ाना और एकपक्षीय कार्यवाही करना नहीं है। यह प्रजातंत्र के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण बात है। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि भारत में शासक वर्ग इस रीति को छोड़ता जा रहा है। संभावना इस बात की भी है कि वह इस नीति को सदा के लिए छोड़ दे।

विशेष-
(i) प्रजातंत्र में सरकार नीतियाँ बनाती है। उसे कार्यपालिका के काम में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
(ii) प्रजातंत्र में निष्पक्षता के साथ शासन करना आवश्यक है।
(iii) भाषा बोधगम्य है।
(iv) शैली विचारात्मक है।

3. जब उससे इसका कारण पूछा गया तो उसका उत्तर था-“प्रियवर! आप भूल गए हैं कि हमने इस विधान को किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनाया है। हमने यह विधान इसलिए बनाया है कि हम कोई वंशपरम्परागत राजा नहीं चाहते थे, हम कोई पैतृक शासन नहीं चाहते थे। हम कोई अनन्य शासक या डिक्टेटर भी नहीं चाहते थे। यदि इंग्लैण्ड के राजा की अधीनता त्याग कर, आप लोग इस देश में आकर भी, मुझको ही प्रतिवर्ष, प्रति कालविभाग अपना प्रेसिडेण्ट बनाये रहने लगे, मेरी ही पूजा करने लगे तो आपके सिद्धांतों का क्या होगा? जब आप मुझे ही इंग्लैण्ड के राजा का स्थानापन्न बना देते हैं, तब आप क्या कह सकते हैं कि आपने उसके अधिकार के प्रति विद्रोह किया है?” उसने कहा-“आपका मेरे प्रति जो विश्वास है, जो भक्ति-भाव है उसके कारण आप चाहे मुझ पर दूसरी बार प्रेसिडेण्ट बनने के लिए दबाव डालने पर मजबूर हो, लेकिन जब मैंने ही इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है कि हमें वंशानुगत शासन नहीं चाहिए, तो मुझे आपकी भक्ति-भावना के वशीभूत होकर भी दूसरी बार खड़ा नहीं होना चाहिए। (पृष्ठ सं. 60)

कठिन शब्दार्थ-विधान = नियम। उद्देश्य = लक्ष्य। वंशपरम्परागत = एक ही वंश में जन्म लेने वालों पर आधारित। पैतृक = पिता से पुत्र को प्राप्त। अनन्य = एक ही, एकमात्र। डिक्टेटर = तानाशाह। काल-विभाग = कार्यकाल। प्रेसीडेंट = राष्ट्रपति। स्थानापन्न = स्थान पर कार्य करने वाला। प्रतिपादन = स्थापना करना, बनाना। वंशानुगत = एक ही परिवार में जन्म लेने वाले व्यक्ति के अधीन।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित “सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें” शीर्षक पाठ से लिया गया है। यह डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा दिया गया भाषण है।

डॉ. अम्बेडकर का कहना है कि प्रजातंत्र की सफलता के लिए वाशिंगटन को लोग दूसरी बार भी राष्ट्रपति बनाना चाहते थे किन्तु वह इस कारण तैयार नहीं थे कि राष्ट्रपति पद किसी राजा का वंशपरम्परानुगत पद नहीं है।

व्याख्या-जार्ज वाशिंगटन से लोगों ने पूछा कि वह दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति क्यों नहीं बनना चाहते तो उन्होंने बताया कि अमेरिका का विधान एक उद्देश्य को पूरा करने के लिए बनाया गया है। इस विधान के अनुसार अमेरिका एक लोकतंत्र है तथा उसका राष्ट्रपति एक निश्चित कार्यकाल के लिए ही चुना जाएगा। इस विधान को बनाने का उद्देश्य यह था कि अमेरिका के लोग एक ही वंश में उत्पन्न होने वाला राजा नहीं चाहते। वे नहीं चाहते कि पिता के पश्चात् उसका पुत्र शासन करे। वे कोई एकमात्र अटल शासक थवा तानाशाह भी नहीं चाहते। वे हर बार अपना नया राष्ट्रपति चुनेंगे। इंग्लैंड के राजा की अधीनता छोड़कर अमेरिका में आने के बाद भी वे उनको हर साल अथवा प्रत्येक कार्यकाल के लिए अपना राष्ट्रपति चुनेंगे तो जो नियम बनाया गया है, उसका उल्लंघन होगा। इससे सिद्धांतों की हानि होगी। अमेरिका का राष्ट्रपति भी एक तरह से इंग्लैंड के राजा जैसा हो जाएगा। इससे इंग्लैंड के राजा के प्रति हुए विद्रोह का लक्ष्य ही नष्ट हो जाएगा। यदि उनके प्रति श्रद्धा की भावना और विश्वास के कारण उनसे दूसरी बार राष्ट्रपति बनने का आग्रह किया जाता है तो नियम टूटेगा जिसको बनाने वाले वह स्वयं ही हैं। अत: उनको दूसरी बार राष्ट्रपति पद लोगों के श्रद्धा भाव के कारण ही स्वीकार नहीं करना चाहिए।

विशेष-
(i) लोकतंत्र की सफलता नियमों-कानूनों को मानने पर ही निर्भर होती है। अपने हित में किसी नियम को नहीं तोडना चाहिए।
(ii) अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन प्रजातांत्रिक मूल्यों के संवर्द्धन के लिए पुनः राष्ट्रपति पद के लिए खड़े होना नहीं चाहते थे।
(iii) भाषा विषयानुकूल है तथा उसमें प्रवाह है।
(iv) शैली उदाहरणात्मक है।

4. प्रजातन्त्र की सफलता के लिए एक और बात है जो अत्यन्त आवश्यक है और वह यह है कि अल्पमत पर बहुमत की अत्याचार न हो। अल्पमत को हमेशा यह विश्वास बना रहना चाहिए कि यद्यपि शासन की बागडोर बहुमत के हाथ में है तो भी अल्पमत को हानि नहीं पहुँच रही है और अल्पमत पर कोई अनुचित प्रहार नहीं किया जा रहा है।
(पृष्ठ सं. 61)

कठिन शब्दार्थ-अल्पमत = किसी बात के पक्ष में कम संख्या में लोगों का होना। बहुमत = अधिक संख्याबल। बागडोर = नियंत्रण। प्रहार = चोट।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘सृजन’ से सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। यह डॉ. अम्बेडकर द्वारा दिया गया एक भाषण है।
डॉ. अम्बेडकर ने प्रजातंत्र की सफलता के लिए कुछ आवश्यक बातें बताई हैं। प्रजातंत्र में बहुसंख्यक लोगों का शासन होता है। किन्तु संख्याबल के आधार पर उनको कम संख्या वाले लोगों पर अत्याचार, अनाचार नहीं करना चाहिए।

व्याख्या-डॉ. अम्बेडकर कहते हैं कि प्रजातंत्र की सफलता के लिए एक और भी बात महत्त्वपूर्ण है। वह यह है कि उसमें शासन सत्ता पर अधिकार पाने वाले लोगों की संख्या अधिक होती है। इस संख्या बल का उनको दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। उनको यह ध्यान रखना चाहिए कि जिनकी संख्या कम है, उनके अधिकारों का उल्लंघन न हो तथा उनके हितों को किसी प्रकार की चोट न पहुँचे। उनको यह विश्वास होना चाहिए कि बहुमत के हाथ में शासन का अधिकार होने पर भी उनको हानि नहीं पहुँचेगी तथा उन पर कोई अनुचित चोट नहीं करेगा। बहुमत तथा अल्पमत का इस प्रकार का व्यवहार प्रजातंत्र की सफलता के लिए अत्यन्त आवश्यक है।

विशेष-
(i) प्रजातंत्र में बहुमत को अल्पमत के हितों की सुरक्षा को ध्यान रखना चाहिए।
(ii) बहुमत को अल्पमत पर कोई अनुचित प्रहार नहीं करना चाहिए। अल्पमत को भी इससे आश्वस्त रहना चाहिए।
(iii) भाषा बोधात्मक तथा प्रवाहपूर्ण है।
(iv) शैली विचारात्मक है।

5. प्रजातन्त्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि समाज नैतिक नियमों का पालन करे। कुछ ऐसा हुआ है कि राजनीतिशास्त्र के आचार्यों ने शायद प्रश्न के इस पहलू पर कभी विचार ही नहीं किया है। उनकी दृष्टि में ‘नीतिपरायण’ होना एक बात है और ‘राजनीति’ दूसरी। आप ‘राजनीति’ सीख सकते हैं, लेकिन ‘नीति’ के विषय में कोरे अज्ञानी बने रह सकते हैं, मानो ‘राजनीति’ बिना ‘नीति’ के ही सफल हो सकती हो। मुझे तो यह एक आश्चर्य में डालने वाली स्थापना मालूम देती (पृष्ठ सं. 62)

कठिन शब्दार्थ-नैतिक = नीति सम्बन्धी। आचार्य = विद्वान। पहलू = प्रश्न। नीति-परायण = नीति के अनुसार चलने वाला। कोरे = पूर्णत:। स्थापना = मान्यता।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ”सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें” शीर्षक पाठ से लिया गया है। यह डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा दिया गया एक भाषण है।

डॉ. अम्बेडकर एक विधि विज्ञानी थे। आपने प्रजातंत्रीय शासन व्यवस्था के लिए कुछ तत्वों को आवश्यक माना है। इनके बिना यह व्यवस्था सफल नहीं हो सकती। नागरिकों द्वारा नैतिक नियमों का पालन करना भी प्रजातंत्र की सफलता के लिए जरूरी है। नैतिकता के अभाव में राजनीति दुष्टों का खेल होना ही है।

व्याख्या-डॉ. अम्बेडकर बता रहे हैं कि प्रजातंत्रीय शासन व्यवस्था तभी सफल होती है, जब उसके नागरिक नीति सम्बन्धी नियमों का पालन करते हैं तथा उनका आचरण नीतिपूर्ण होता है। अनैतिक समाज में राजनीति भ्रष्ट हो जाती है तथा प्रजातंत्र नष्ट हो जाता है। यह विषय ऐसा है जिस पर राजनीति के विद्वानों ने बहुत ही कम सोच-विचार किया है। उनका मत है कि राजनीति में कुशल होना तथा नीतिवेत्ता होना दो अलग-अलग बातें हैं। चतुर राजनीतिज्ञ होने के लिए नीति का ज्ञान होना जरूरी नहीं है। राजनीति सीखने के लिए नीति की शिक्षा प्राप्त करना आवश्यक नहीं है। नीति का ज्ञान न होने पर भी आप राजनीति सीख सकते हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि नीति को जाने बिना भी राजनीति सफल हो सकती है। डॉ. अम्बेडकर इस विचार से असहमत हैं। उनके दृष्टिकोण में यह मान्यता आश्चर्य में डालने वाली है। नीति ज्ञान के अभाव में कुशल राजनीति नहीं की जा सकती।

विशेष-
(i) अनेक लोग राजनीतिज्ञ होने के लिए नीतिज्ञ होना आवश्यक नहीं मानते।
(ii) डॉ. अम्बेडकर का मानना है कि नीति के अनुसार आचरण किए बिना अच्छी राजनीति सफल नहीं हो सकती।
(iii) भाषा सरल, विषयानुकूल तथा प्रवाहपूर्ण है।
(iv) शैली विचारात्मक है।

6. ‘सार्वजनिक अन्तरात्मा’ उस अन्तरात्मा को कह सकते हैं, कि जो हर अन्याय को देखकर विचलित हो उठती है। वह इस बात की परवाह नहीं करती कि उसे अन्याय का शिकार किसे होना पड़ रहा है? इसका मतलब हुआ कि चाहे उसे व्यक्तिगत रूप से उस ‘अन्याय’ से कष्ट होता हो, या न होता हो, जो कोई भी उस ‘अन्याय’ का भाजन हो उसे उस ‘अन्याय’ से मुक्ति दिलाने के लिए उसके कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हो जाती है। (पृष्ठ सं. 63)

कठिन शब्दार्थ-सार्वजनिक = सभी लोगों से सम्बन्धित। अन्तरात्मा = भीतरी अर्थात् मन की आवाज। विचलित = व्याकुल। परवाह = चिन्ता। भाजन = पात्र, शिकार। मुक्ति = छुटकारा। कंधा से कंधे मिलाकर खड़े होना = सबका सहयोग करना।।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ”सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें” शीर्षक पाठ से लिया गया है। यह डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा दिया गया एक भाषण है।

इस भाषण में डॉ. अम्बेडकर ने प्रजातंत्र की सफलता पर विचार किया है तथा उसके लिए कुछ बातों को आवश्यक माना है। इनके बिना प्रजातंत्र असफल हो जाता है। उनमें एक बात सार्वजनिक अन्तरात्मा भी है। व्याख्या-डॉ. अम्बेडकर कहते हैं कि सार्वजनिक अन्तरात्मा प्रजातंत्र की सफलता के लिए आवश्यक है। सार्वजनिक अंतरात्मा का अर्थ बिना भेदभाव के किसी अत्याचार के विरुद्ध एकमत होना है। सार्वजनिक का अर्थ ‘सभी लोगों से संबंधित है। जब समाज के सभी सदस्य, जाति, धर्म, वर्ग आदि का अन्तर भुलाकर किसी अन्याय के विरुद्ध एकमत होकर उठे खड़े होते हैं, तो अंबेडकर के अनुसार इसको सार्वजनिक अन्तरात्मा कहते हैं। इसके तहत लोग अन्याय को देखकर व्याकुल हो जाते हैं। वे यह नहीं देखते कि अन्याय कौन कर रहा है तथा उसका शिकार कौन हो रहा है उस अन्याय से व्यक्तिगत कष्ट होने अथवा न होने पर भी अन्याय का शिकार हुए मनुष्य को अन्याय से बचाने के लिए भेदभाव मुक्त होकर उसके साथ खड़े हो जाना ही सार्वजनिक अन्तरात्मा है।

विशेष-
(i) सफल प्रजातन्त्र के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक नागरिक अन्याय का सभी मतभेद भुलाकर विरोध करे भले ही वह स्वयं उससे प्रभावित न हो रहा हो।
(ii) भेदभाव मुक्त सार्वजनिक प्रतिरोध से ही प्रजातन्त्र की रक्षा हो सकती है।
(iii) भाषा बोधगम्य तथा विषय के अनुरूप है।
(iv) शैली विचारात्मक है।

7. मैं अपने मन में सोचता रहा हूँ, कि हम जो दक्षिण अफ्रीका की पृथक्करण की नीति के विरुद्ध इतना बाय-बेला मचाते हैं, जानते हैं कि हमारे हर गाँव में दक्षिण अफ्रीका है। वह वहाँ है-हमें केवल जाकर उसे देखने की जरूरत है। हर गाँव में दक्षिण अफ्रीका है, लेकिन तब भी मैंने शायद ही किसी को देखा हो जो स्वयं दलित वर्ग’ का न हो लेकिन तब भी ‘दलित वर्ग’ का पक्ष लेकर उठ खड़ा हो। क्यों? क्योंकि यहाँ ‘सार्वजनिक अन्तरात्मा’ नहीं है। यदि यही होता रहा तो हम ‘अपने में और अपने भारत में ही कैदी बने रहेंगे। अल्पमत वाले जो इस अन्याय के तले पिस रहे हैं, बहुमत वालों से कभी किसी प्रकार की सहायता न प्राप्त करेंगे, जिससे वे इस अन्याय से मुक्त हो सकेंगे। इन सबसे भी विद्रोह की भावना बढ़ती है, जिससे फिर प्रजातन्त्रवाद को खतरा पैदा हो जाता है। (पृष्ठ सं. 63)

कठिन शब्दार्थ-पृथक्करण = अलग करना। बाय-बेला मचाना = शोरगुल करना, विरोध करना। दक्षिण अफ्रीका = एक देश, अन्यायपूर्ण नीति अपनाने वाला प्रदेश। दलित = पीड़ित, शोषित। विद्रोह = विरोध।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘सफल प्रजातंत्रवाद के लिए आवश्यक बातें’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। यह डा. भीमराव अम्बेडकर द्वारा दिया गया भाषण है।

डा. अम्बेडकर ने सार्वजनिक अंतरात्मा न होने का उदाहरण दिया है और बताया है कि दक्षिण अफ्रीका में गोरे-कालों के बीच जो भेदभावपूर्ण नीति अपनाई जाती है उसका विरोध गोरे लोग नहीं करते। इसी प्रकार भारत में भी दलित जातियों को अपने अन्याय के विरुद्ध स्वयं ही संघर्ष करना पड़ता है।

व्याख्या-डा. अम्बेडकर कहते हैं कि भारतीय दक्षिण अफ्रीका के गोरे-कालों के बीच भेदभाव पूर्ण नीति पर बहुत शोरगुल करते हैं। वे यह जानते हैं कि भारत में भी दक्षिण अफ्रीका जैसी भेदभाव पूर्ण नीति दलित जातियों के प्रति अपनाई जाती है। इसको किसी भी भारतीय गाँव में जाकर देखा जा सकता है। प्रत्येक गाँव में दक्षिण अफ्रीका है अर्थात् भेदभावपूर्ण नीति चल रही है। इस अन्यायपूर्ण नीति के विरुद्ध दलित वर्ग के पक्ष में कोई गैर दलित शायद ही खड़ा होता है। ऐसा इसलिए है कि हमारे यहाँ इस सम्बन्ध में सार्वजनिक अन्तरात्मा नहीं है। आशय यह है कि देश में इस अन्याय का भेदभाव मुक्त सार्वजनिक विरोध करने की कोई नीति ही नहीं है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो दलित जातियाँ अपने में तथा अपने देश भारत में सबके समान जीवनयापन नहीं कर सकेंगी तथा कैदी जैसा जीवन जीने को विवश होंगी। बहुसंख्यक लोगों से इन अल्पसंख्यक लोगों को कोई सहायता नहीं मिलेगी जिससे वे अन्याय से बच सकें। इन बातों से दलितों में भी विद्रोह की भावना पैदा होती है तथा प्रजातंत्र संकट में पड़ जाता है।

विशेष-
(i) दक्षिण अफ्रीका का मतलब है भेदभावपूर्ण नीति और व्यवहार का स्थान।
(ii) लेखक के अनुसार भारत में दलितों के साथ भेदभाव किया जाता है। यह प्रजातंत्र को संकट में डाल सकता है।
(iii) भाषा सरल तथा प्रवाहपूर्ण है।
(iv) शैली विचारात्मक है।