RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 9 पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 9 सुभद्रा कुमारी चौहान वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
कवियत्री को बार-बार क्या याद आती है?
(अ) युवाकाल का जीवन
(ब) बचपन की मुधर याद
(स) जीवन खूब निराला है।
(द) मन का संताप
उत्तर:
(ब)

प्रश्न 2.
बचपन में कवयित्री के रोने पर काम छोड़ कर कौन आयी?
(अ) कवयित्री की सहेली
(ब) कवयित्री की माँ
(स) कवयित्री की दादी
(द) कवयित्री की बहन
उत्तर:
(ब)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 9 सुभद्रा कुमारी चौहान अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कवयित्री को बपचन में आँसू के मोती आज कैसे लगते हैं?
उत्तर:
कवयित्री को आँसू के वे मोती आज जयमाला जैसे लगते हैं।

प्रश्न 2.
कवयित्री की बिटिया कवयित्री को क्या खिलाना चाहती थी?
उत्तर:
कवयित्री की बिटिया उसे मिट्टी खिलाना चाहती थी।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 9 सुभद्रा कुमारी चौहान लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
“किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवयित्री को प्राय: अपने बपचन के मधुर जीवन की याद सताती रहती थी। उसे अपना घर सूना-सूना सा लगा करता था। बेटी के आगमन से उसका घर फिर से बेटी की मधुर किलकारियों और क्रीड़ाओं से गूंजने लगा। बेटी ने उसके घर के सूनेपन को समाप्त कर दिया।

प्रश्न 2.
‘नैने नीर युत दमक उठे’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवयित्री बचपन में जब कभी रोती-मचलती थी तो घर के सभी लोग उसे बहलाने में लग जाते थे। उसके दादा भी उसे बहलाने के लिए गोद में लेकर आकाश में चंद्रमा दिखाया करते थे। तब कवयित्री की आँसुओं से भरी आँचों प्रसन्नता से दमकने लगती थीं। वह मुस्कराने लगती थी।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 9 सुभद्रा कुमारी चौहान निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मेरा नया बचपन’ का सारांश लिखिए।
उत्तर:
‘मेरा नया बचपन’ कविता सुभद्रा जी की एक मनमोहक रचना है। कवयित्री ने जीवन की सबसे अधिक प्रिय, बाल्यावस्था के भाव भीगे शब्द-चित्रों से इसे सजाया है।

कवयित्री को बार-बार अपने बचपन के दिनों की मधुर यादें आती रहती हैं। उसे लगता है कि बपचन के जाने के साथ, उसके जीवन से सबसे बड़ी खुशी विदा हो गई है। बचपन का निर्भय और स्वच्छंद होकर खेलना-खाना, ऊँच-नीच और छुआ-छूत रहित मस्त जीवन आज भी उसे भूला नहीं है।

जब भी कवयित्री रोती-मचलती थी तो उसकी माँ घर के सारे काम-काज छोड़कर उसे मनाने आ जाती थी। उसके दादा भी उसे गोद में लेकर चंदा दिखाया करते थे। बचपन बीता तो पहले किशोरावस्था और फिर जवानी भी आ पहुँची। कवयित्री के हाव-भाव, गतिविधि और रुचियाँ सब कुछ बदल गए।

कवयित्री को यौवन का संघर्ष भरा जीवन उबाने लगा। विवाह के पश्चात् उसे घर सूना-सा लगने लगा। तभी उसके घर में एक बेटी ने जन्म लिया और कवयित्री की तो जैसे सारी दुनिया ही बदल गई। बिटिया की ‘ओ माँ’ पुकार और माँ काओ’ (माँ खाओ) जैसी भोली मनुहार ने उसके जीवन में जैसे उसके बचपन को फिर से साकार कर दिया।

इस प्रकार सुभद्रा जी का बचपन नया रूप-बेटी-बनकर उन्हें फिर से मिल गया।

प्रश्न 2.
जीवन में बचपन की ऐसी क्या-क्या विशेषताएँ ऐसी हैं जो हमें आज भी याद आती हैं?
उत्तर:
जीवन में बाल्यावस्था का भोला और अलमस्त सौन्दर्य ऐसा है, जिसे मनुष्य कभी नहीं भूल पाता है। जब भी व्यक्ति बच्चों को अठखेलियाँ करते, रूठते, उछलते-कूदते देखता है तो उसे अपना बचपन याद आए बिना नहीं रहता।

बचपन की कुछ निजी विशेषताएँ ऐसी हैं जो आगामी जीवन में मुनष्य को दुर्लभ हो जाती हैं। ये हैं निश्चितता, बेफिक्री, अल्लहड़पन, मस्ती, भोली प्रतिक्रियाएँ, ऊँच-नीच और छुआ-छूत से दूरी, रूठना, मनाया जाना आदि।

जवानी को जीवन में बहुत महत्व दिया जाता है किन्तु जीवन की इस सौगात के साथ ही मनुष्य को चिन्ताओं, जिम्मेदारियों, चुनौतियों और संघर्षों का बोझा भी ढोना पड़ जाता है। ऐसे क्षणों में उसे बचपन की यादें बड़ी सांत्वना प्रदान करती हैं। वह चाहने लगता है कि काश उसे उसका वही भोला-भाला, अपनी धुन में मतवाला, माता-पिता के मधुर लाड़ से ओत-प्रोत बचपन, फिर से वापिस मिल जाता।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 9 सुभद्रा कुमारी चौहान व्याख्यात्मक प्रश्न

1. “ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं ……………. सूना घर आबाद किया। प्रस्तुत पद की व्याख्या कीजिए।
2. “हुआ प्रफुल्लित हृदय ………… फिर से आया ।” पद की व्याख्या कीजिए।
(संकेत- छात्र ‘सप्रसंग व्याख्याएँ’ शीर्षक के अन्तर्गत इन व्याख्याओं (पद्यांश 1,2 व 7) का अवलोकन करके स्वयं व्याख्या | करें।)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 9 सुभद्रा कुमारी चौहान अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 9 सुभद्रा कुमारी चौहान वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. बचपन कवयित्री के जीवन से ले गया –

(क) निश्चिन्तता
(ख) खेलकूद
(ग) रोना
(घ) सबसे मस्त खुशी

2. बचपन में कवयित्री को ज्ञान नहीं था

(क) कपड़े पहनने का
(ख) ऊँच-नीच का
(ग) अपने-पराये का
(घ) पढ़ने-लिखने का

3. बचपन ने कवयित्री को किसमें फंसा दिया

(क) काम-धन्धों में
(ख) चिन्ताओं में
(ग) जवानी के फन्दे में
(घ) दुखों में

4. कवयित्री बचपन से फिर माँगती है –

(क) निर्मल शांति
(ख) मस्ती
(ग) ऊँच-नीच से मुक्ति
(घ) मधुर मुस्कान

5. बिटिया कवयित्री को खिलाने आई थी-

(क) रोटी
(ख) मिठाई
(ग) बिस्किट
(घ) मिट्टी

उत्तर:

  1. (क)
  2. (ख)
  3. (ग)
  4. (क)
  5. (घ)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 9 सुभद्रा कुमारी चौहान अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कवयित्री बचपन की कौन सी बातें नहीं भूल पाती है?
उत्तर:
कवयित्री बचपन की निश्चिन्तता, निडरता, स्वच्छंदता से घूमना-फिरना आदि बातें नहीं भूल पाती है।

प्रश्न 2.
‘झोपंड़ी और चीथड़ों में रानी’ होने का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
बचपन में कवयित्री को अपने घर की सुन्दरता, असुन्दरता और कपड़ों की कोई चिंता नहीं होती थी। वह एक रानी तरह प्रसन्न रहा करती थी।

प्रश्न 3.
कवयित्री ने सूने घर को कैसे आबाद कर दिया?
उत्तर:
कवयित्री ने अपनी किलकारियों और क्रीड़ाओं से सूने घर को प्रसन्नता से भर दिया।

प्रश्न 4.
माँ कवयित्री के आँसुओं से गीले गोलों को कैसे सुखाया करती थी?
उत्तर:
माँ कवयित्री के आँसुओं से गीले गालों को अपने होठों से चूम-घूम कर सुखाया करती थी।

प्रश्न 5.
माँ का घर के सारे काम छोड़कर कवयित्री को चुप कराने आ जाना, क्या संकेत करता था।
उत्तर:
माँ को इस प्रकार आना संकेत करता था कि वह अपनी बेटी पर बहुत लाड़ करती थी।

प्रश्न 6.
कवयित्री के परिवार के सभी लोगों के चेहरों पर चमक कब आ जाती थी?
उत्तर:
जब कवयित्री आँसूभरी आँखों के साथ भोलेपन से मुस्कराने लगती थी तो सभी के मुखों पर प्रसन्नता की चमक छा जाती थी।

प्रश्न 7.
बड़ी होने पर कवयित्री के व्यवहार में क्या अंतर आया?
उत्तर:
वह स्वयं ठगी हुई सी अनुभव करने लगी और दौड़कर द्वार पर जाने लगी।

प्रश्न 8.
युवावस्था आने पर कवयित्री की आँखों से और मन में क्या भाव उठने लगे?
उत्तर:
कवयित्री की आँखे कुछ लजाने लगी और मन में मधुर उत्साह जागने लगा।

प्रश्न 9.
बचपन ने कवयित्री को कैसे ठग लिया?
उत्तर:
बचपन ने उसे जवानी के जाल में फंसा कर उसकी मस्ती छीन ली।

प्रश्न 10.
युवाकाल में मनुष्य के हृदय में किन-किन बातों का उदय हुआ करता है?
उत्तर:
युवावस्था में नयी-नयी इच्छाएँ, पुरुषार्थ और ज्ञान का उदय हुआ करता है।

प्रश्न 11.
युवावस्था के साथ जीवन में कौन-कौन से झंझट आ जाते हैं?
उत्तर:
युवावस्था में संघर्ष, चिंताएँ और चुनौतियों का झंझट मनुष्य को घेर लेता है।

प्रश्न 12.
युवा कवयित्री बचपन से क्या-क्या माँगती है?
उत्तर:
युवा कवयित्री बचपन से निर्मल शांति, कष्ट दूर कर देने वाला स्वाभाविक विश्राम, भोली सरलता और निर्दोष जीवन माँगती है।

प्रश्न 13.
जब कवयित्री अपने बचपन को बुला रही थी उस समय अचानक कौन बोल उठा?
उत्तर:
उस समय उसकी छोटी-सी बिटिया बोल उठी।।

प्रश्न 14.
बिटिया के बोलते ही क्या परिवर्तन हो गया?
उत्तर:
बिटिया के बोलते ही कवयित्री का घर स्वर्ग के उपवन-नंदनवन के समान प्रसन्नता के पुष्पों से भर गया।

प्रश्न 15.
कवयित्री की बेटी उसे क्या खिलाने आई थी?
उत्तर:
कवयित्री की बेटी उसे मिट्टी खिलाने आई थी।

प्रश्न 16.
मिट्टी खिलाने आई बेटी की छवि कैसी थी?
उत्तर:
बेटी का अंग-अंग पुलकित हो रहा था और उसकी भोली आँखों से उत्सुकता छलक रही थी।

प्रश्न 17.
बेटी और माँ के बीच का संवाद हुआ?
उत्तर:
माँ ने पूछा ‘यह क्या लाई हो’ और बेटी बोल उठी ‘माँ ! खाओ’।

प्रश्न 18.
कवयित्री को अपना बचपन फिर से कैसे मिला?
उत्तर:
कवयित्री को बचपन उसे उसकी नन्ही-सी बिटिया के रूप में फिर से मिल गया।

प्रश्न 19.
बेटी के साथ कवयित्री कैसे समय बिताने लगी?
उत्तर:
वह बच्ची के साथ बच्ची बनकर खेलते, खाते और तोतली बोली में बोलते हुए अपना समय बिताने लगी।

प्रश्न 20.
कवयित्री को छोड़कर कौन भाग गया था जो उसे बरसों बाद फिर मिल गया?
उत्तर:
कवयित्री का बचपन जो उसे बरसों पहले छोड़कर चला गया था, उसे दोबारा मिल गया।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 9 सुभद्रा कुमारी चौहान लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सुभद्राकुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नया बचपन’ का कथ्य क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवयित्री अपने बचपन के दिनों को बड़ी चाह के साथ याद करती थी। उसे बचपन की क्रीड़ाएँ, रोना, मचलना, मनाया जाना, माता और दादा का लाड़, सभी कुछ स्मरण था। कवयित्री बचपन के साथ ही अपनी युवावस्था को भी याद करती है। उसे चिंताओं और संघर्ष से भरी जवानी एक फंदा और झंझट जैसी प्रतीत होती है। संयोगवश उसके यहाँ एक पुत्री जन्म लेती है और उसकी भोली-भाली क्रीड़ाओं में कवयित्री को अपना खोया हुआ बचपन फिर से मिल जाता है।

प्रश्न 2.
कवयित्री को अपने बचपन की याद बार-बार क्यों आती है?
उत्तर:
बचपन से कवयित्री की अनेक मधुर स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। उसी के शब्दों में, बचपन उसके जीवन की सबसे अधिक मस्ती भरी खुशी ले गया है। बचपन में कवयित्री चिंतारहित होकर खेला करती और मनचाही वस्तुएँ खाया करती थी, उसे किसी प्रकार भय नहीं था। भला ऐसा आनंद भरा बचपन कोई कैसे भूल सकता है। इसी कारण कवयित्री को अपने बचपन की मधुर यादें बार-बार आया करती थीं।

प्रश्न 3.
बचपन में कवयित्री का मन सब प्रकार के भेदभाव से रहित था। इस तथ्य को ‘मेरा नया बचपन ‘कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य ज्यों-ज्यों बड़ा होता जाता है, उसके मन में अनेक प्रकार के भेद-भाव उत्पन्न होते हैं। बचपन इन सारे भेदभावों से ऊपर होता है। कवयित्री भी यही बताती है कि वह बचपन में यह जानती ही नहीं थी कि कौन ऊँचा होता है, कौन नीचा होता है। किसे छूना चाहिए किसे नहीं छूना चाहिए। उसे यह भी बोध नहीं था कि वह झोंपड़ी में रह रही है या राजभवन में। उसके शरीर पर कैसे कपड़े हैं। वह तो अपने मन की रानी बनी हुई थी।

प्रश्न 4.
सुभद्रा जी का बचपन कैसे बीता था? ‘मेरा नया बचपन’ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
सुभद्रा जी पर उनके माता-पिता, दादा आदि सभी परिजनों ने लाड़ बरसाने में कोई कमी नहीं रखी थी। वह खूब दूध पीती और उगला करती थी। अपना अँगूठा चूसने में उन्हें अमृत जैसा स्वाद आता था। उन का रोना और हठ करना सभी को आनंदित किया करता था।

प्रश्न 5.
सुभद्रा जी की माँ और उनके दादा उन पर कैसे लाड़ किया करते थे?
उत्तर:
सुभद्रा जी बचपन में सारे घर की प्यारी बिटिया थी। यदि वह कभी रोने लगती थी तो उनकी माँ घर के सारे काम-काजछोड़ कर आ जाती और उन्हें तुरन्त गोद में उठा लिया करती थी। उनका शरीर झाड़-पौछ कर उनके आँसुओं से गीले गालों को चूमने लगती थी। इस प्रकार वह अपने होठों से ही सुभद्रा जी के आँसू पौंछ दिया करती थी। इसी प्रकार उनके दादा भी उन्हें बहलाने के लिए गोद में ले चंदा दिखाया करते थे।

प्रश्न 6.
युवावस्था में प्रवेश करने पर सुभद्रा कुमारी चौहान के हाव-भावों और भावनाओं में क्या अंतर आ गया?
उत्तर:
जब सुभद्रा ने बचपन की देहली पार करके जवानी के रंगमहल में प्रवेश किया तो उनका मतवाला मन बड़ा हो चुका था। उनके मन में कुद नए अनुभव हो रहे थे। वो स्वयं को लुटी और ठगी सी समझ रही थी। बार-बार द्वार पर जाकर खड़ी होना, आँखों में लजाने का भाव झलकना, मन में नई-नई उमंगें उठना, कानों में रसभरी ताने सुनाई देना, व्यवहार में चंचलता आनी आदि नई अनुभूतियाँ और नए हाव-भाव इनको जवानी के आने की सूचना दे रहे थे।

प्रश्न 7.
छैल-छबीली सुभद्रा जी के मन में कौन-सी पहेली थी? ‘मेरा नया बचपन’ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
युवती हो जाने के अनुभव ने सुभद्रा जी के मन में कई प्रश्न जन्म दिए थे। वह सोचती थी कि इतने लोगों के बीच रहते हुए भी उन्हें एक अकेलेपन का सा अनुभव क्यों हो रहा था ? वह अपने मन की दुविधाएँ औरों से साझा करने में क्यों हिचक रही थी। इस पहेली का उन्हें कोई हल नहीं सूझ रहा था।

प्रश्न 8.
सुभद्रा जी ने अपने बचपन पर क्या आरोप लगाया और क्यों?
उत्तर:
युवावस्था के अपरिचित अनुभव सुभद्रा जी के लिए पहेली जैसे लगते थे। जब यह पहेली हल हुई तो उन्हें ज्ञात हुआ कि वह अब जवान हो चुकी थी। जवानी के साथ-साथ नई-नई उलझनें, चुनौतियाँ और झंझट भी उन्हें सताने लगे। उन्हें लगा कि बचपन ने उन्हें जवानी को सौंप कर उनको ठग लिया है। सुख के साम्राज्य के बदले यह संघर्षमयी जवानी मुझे दे दी है।

प्रश्न 9.
सुभद्रा कुमारी जी के मन ने उन्हें किस फन्दे में फंसा दिया था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सुभद्रा जी अपने मन से बड़ी नाराज थीं क्योंकि उसने भोला– भाला मतवाला जीवन छीनकर उन्हें जवानी के माया-जाल में हँसा दिया था। नई सामर्थ्य का अनुभव हो रहा था, ज्ञान का भंडार भी बढ़ रही था, पर बचपन की स्वच्छंदती और मस्ती के स्थान पर अब जीवन संघर्षों से भरा एक रणक्षेत्र-सा बन गया था। यह सौदा बड़ा महँगा था।

प्रश्न 10.
जवानी के झंझटों से घबराकर सुभद्रा जी बचपन से क्या अनुरोध कर रही है? ‘मेरा नया बचपन’ कविता के आधार पर बताइए।
उत्तर:
जवानी की अलबेली दुनिया का सच जब सुभद्रा जी के सामने आया तो वह व्याकुल हो उठीं। उन्होंने अपने परमप्रिय मित्र ‘बचपन’ से गुहार को-‘ओ मेरे प्यारे बचपन ! तू एक बार फिर से मेरे जीवन में आजा । अपनी निर्मल शान्ति और स्वाभाविक विश्रान्ति से जवानी की इस थका देने वाली यात्रा से मुक्ति दिला दे। बता, क्या तू फिर से अपनी प्यारी, भोली-भाली सारलता और निर्दोष स्वरूप में आकर, मेरे मन की व्यथा को दूर नहीं कर सकता।

प्रश्न 11.
सुभद्रा जी की छोटी-सी कुटिया को किसने और कैसे ‘नंदनवन’ के समान बना दिया? लिखिए।
उत्तर:
जब सुभद्रा जी जवानी के भार से विचलित होकर बचपन को पुकार रही थी तभी उनकी नन्ही-सी बिटिया ने उन्हें अपनी तोतली बोली में पुकार लगाई। सुभद्रा जी चौंकी और दूसरे ही क्षण उन्हें लगा जैसे उनका घर स्वर्ग के उपवन के दिव्य गंध वाले फूलों से भर गया था। आनंद के मारे कवयित्री विह्वल हो उठी । बिटिया उन्हें ‘माँ ओ!’ कहकर पुकार रही थी।

प्रश्न 12.
मेरा नया बचपन’ कविता में माँ-बेटी के बीच क्या संवाद हुए? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
नन्ही-सी गुड़िया ने जब सुभद्रा जी को ‘ओ माँ !’ कहकर पुकारा तो कवयित्री के तन-मन वात्सल्य से भीग गए। देखा कि बिटिया मिट्टी का भोग लगाकर आई थी। वह मधुर प्रसाद उनके मुख की शोभा तो बढ़ा ही रहा था, वह अपनी माँ को भी वह स्वादिष्ट मिट्टी चखाने आई थी। बेटी ने कहा- माँ खाओ’ (माँ खाओ) तो माता ने कहा-‘तुम्हीं खाओ। माँ उस पुलकित अंगों वाली और आँखों से अचरज बरसाती आखों वाली बेटी में अपने बचपन को मूर्तिमान देखकर निहाल हो गई। उसका बचपन वापस आ गया था।

प्रश्न 13.
सुभद्रा कुमारी चौहान को अपना बचपन फिर से कैसे मिला? ‘मेरा नया बचपन’ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
मिट्टी खिलाने आई बेटी को निहारती कवयित्री ने देखा कि उसका अपना बचपन ही बालमूर्ति बनकर उसके सामने खड़ा मुस्करा रहा था। बचपन ने उनकी पुकार स्वीकार कर ली थी। वह बेटी का रूप धारण करके सुभद्रा जी के जीवन को फिर से शान्त, विश्रान्त, स्वच्छंद और मस्ती भरा बनाने आ गया था।

प्रश्न 14.
बेटी के आगमन से सुभद्रा कुमारी चौहान के जीवन में क्या परिवर्तन आ गया? ‘मेरा नया बचपन’ कविता के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
बेटो ने सुभद्रा जी के जीवन को आनंदमय बना दिया। बेटी बन घर आए बचपन का वह जी भरकर आनंद लेने लगी। वह बेटी के साथ ही खेलती और खाती थी। उसी की तरह तोतली वाणी में बातें करती थी। वह उस बच्ची के साथ स्वयं भी एक बच्ची जैसी बन जाती थी उनके मन को अपार संतोष का अनुभव हो रहा था। उन्हें जवानी में भी बचपन जैसी स्वच्छंदता और मस्ती का अनुभव हो रहा था। उन्हें छोड़कर भाग गया बचपन फिर से उनके जीवन में उतर आया था।

प्रश्न 15.
यदि सुभद्रा कुमारी चौहान के घर बेटी के बजाय बेटे ने जन्म लिया होता, तो भी क्या उन्हें उतना ही आनंद अनुभव होता? अपना मत लिखिए।
उत्तर:
वैसे तो एक माँ को बेटी या बेटे में को भेद नहीं मानना चाहिए, किन्तु सच यह भी है कि बेटी के प्रति माँ के हृदय में एक विशिष्ट स्थान रहा करता है। बेटी हो बेटा, बच्चों की बाल-सुलभ अठखेलियाँ तो हर माँ को वात्सल्य भाव में भिगो देती हैं। किन्तु इस प्रसंग में थोड़ा-सा अंतर अवश्य है। क्योंकि सुभद्रा जी ने एक बेटी के रूप में ही बचपन बिताया था अत: बचपन को बेटी के रूप देखना उनके लिए अधिक स्वाभाविक था। बेटे के रूप में अपने बचपन को स्वीकार कर पाना शायद उनके लिए कुछ कठिन प्रतीत होता।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 9 सुभद्रा कुमारी चौहान निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मेरा नया बचपन’ कविता के कला पक्ष पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
‘मेरा नया बचपन’ एक भाव-प्रधान रचना है। कवयित्री ने इसे सजाने-सँवारने का प्रयास नहीं किया है। फिर भी कविता का कला पक्ष भावों के प्रकाशन में सहायक बना है।

कविता की सादगी और प्रवाह से युक्त भाषा इसकी उल्लेखनीय विशेषता है। शब्दावली सरल होते हुए भी भाषा लक्षणा शब्द-शक्ति से बड़ी प्रभावशाली बन गई है।

‘‘लुटी हुई ………………..द्वार पर खड़ी हुई।”
”दिल में एक …………….अकेली थी।” आदि ऐसे ही कथन हैं।
कथन की शैली सरल सपाट गति से आगे बढ़ती जाती है। अनेक अलंकार सहज भाव से आकर कविता की शोभा बढ़ा रहे हैं।
“गया ले गया ……………खुशी मेरी।”
“हे बचपन …………..हँसा दिया तूने।”
“भाग गया था …………..फिर से आया।”
में मानवी करण अलंकार है। बार-बार’, चूम-चूम’ में पुनरूक्ति प्रकाश, किलकारी किल्लोल’, ‘खेलना खाना’ ‘नैन नीर’। ‘मंजुल मूर्ति’ आदि में अनुप्रास तथा ‘नंदनवन सी …….कुटिया मेरी’ में उपमा अलंकार है।

पूरी रचना में वात्सल्य की सरसता साकार हो रही है।

प्रश्न 2.
‘मेरा नया बचपन’ कविता के भाव-सौंदर्य पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
‘मेरा नया बचपन’ एक भाव प्रधान रचना है। इस कविता का विषय ही बड़ा भावुकतामय है। बचपन हमारे जीवन का सबसे प्रिय समय होता है। बचपन की बेफिक्री, मस्ती, भेदभावरहित भोलापन ऐसी भावनाएँ है। जिनके लिए हम सारे जीवन तरसते रहते हैं।

कवयित्री ने कविता के प्रारम्भ में ही बचपन को अविस्मरणीय समय बताया है। कवयित्री को अपने बचपन की बार-बार याद आती है। वह बिस्तार से बचपन के आनंदों का वर्णन करती है। कवयित्री का यह बचपन के प्रति आकर्षण दिखावटी नहीं है। वह चिंतारहित होकर खेलना-खाना, ऊँच-नीच, छुआ-छूत रहित मस्ती, रोना-मचलना और मनना बचपन की एक-एक घटना को कवयित्री ने बड़ी भावुकता से याद किया है।

बचपन से जवानी तक के सफर को भी कवयित्री ने भाव-मग्न होकर ही किया है। अपनी मनोभावनाओं को भावविभोर भाषा-शैली में प्रस्तुत किया है। जवानी को झंझट बताना और बचपन को फिर आने को आमंत्रित करना, पाठकों को भी अपने-अपने बचपनों की स्मृति करा देता है।

कविता की अंतिम पंक्तियाँ तो भाव विभूति का चरम प्रकाशन हैं। कवयित्री की नन्ही-सी बिटिया ही उसके बिछुड़े बचपन का रूप लेकर उसकी जिंदगी में आ जाती है और वह स्वयं बच्ची बनकर बचपन के आनंद में मग्न हो जाती है। इस प्रकार ‘मेरा नया बचपन वात्सल्य भाव के मार्मिक अनुभूति को हृदयंगम कराने में पूर्णत: सफल है।

प्रश्न 3.
‘मेरा नया बचपन’ बाल-वर्णन की एक श्रेष्ठ रचना है।’ इस कथन पर अपना मत लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी कविता में महाकवि सूर को बाल-वर्णन का सम्राट माना जाता है। सूर ने श्रीकृष्ण की बाल-क्रीड़ाओं के माध्यम से बाल जगत के विशाल भाव वैभव को प्रत्यक्ष किया है। सुभद्रा जी ने केवल एक रचना द्वारा बाल जीवन के मधुर क्षेत्र में पदापर्ण किया है।

कवयित्री ने अपने और अपनी बेटी के बचपन को आधार बनाकर बाल-जीवन के सभी प्रश्नों को साकार किया है। बार-बार आती है” से कविता का आरम्भ करते हुए, बचपन की एक लघु किन्तु सर्वांगपूर्ण झाँकी प्रस्तुत की है। बाल-मनोविज्ञान तथा बाल क्रीड़ाओं से सुसज्जित यह अंश बाल-जीवन का बड़ा भावोत्तेजक चित्र प्रस्तुत करता है।

ऊँच-नीच, छुआछूत, महल-झौपड़ी, सुभग परिधान तथा चीथड़ों को समान भाव से स्वीकार करने वाला बचपन, इन पंक्तियों में खड़ा मुस्करा रहा है। दूध के कुल्ले करती और अँगूठे से अमृत को चूसती, यह एक नन्ही-सी परी की तस्वीर बड़ी मनमोहक है और वात्सल्य को उमगाने में पूर्ण सफल है।

माता और दादा का लाड़, आँसुओं की जयमाला से झाँकता, भोली मुस्कान बिखेरता एक छोटा-सा मुखड़ा, बालवर्णन के वैभव से मन को भाव विभोर कर देता है।

मेरे मतानुसार सुभद्रा जी की यह रचना बाल वर्णन एक सुन्दर नमूना है।

प्रश्न 4.
‘मेरा नया बचपन’ कविता का कौन-सा अंश आपकों सबसे अधिक प्रभावित करता है और क्यों ? लिखिए।
उत्तर:
वैसे तो ‘मेरा नया बचपन’ कविता का पूरा कथ्य ही मन को प्रिय लगता है किन्तु मुझे कविता का अंतिम अंश “मैं बचपन को बुला रही थी ………….नवजीवन आया। बहुत प्रभावित करता है। वात्सल्य का ऐसा सहज और मार्मिक शब्द-चित्र दुर्लभ प्रतीत होता है।

यह दृश्य बड़ा नाटकीय और मनमोहक है। यह कोई काल्पनिक प्रस्तुतीकरण नहीं है। यह कवयित्री के प्रत्यक्ष अनुभव का स्वाभाविक प्रकाशन है। कवयित्री अपने बचपन को बुला रही है और अचानक उसकी नन्हीं बिटिया बोल उठती है। सारा दृश्य ही बदल जाता है। कवयित्री की मन-कुटिया नंदनवन बन जाती है।

उसके सामने खड़ा उसका बचपन ‘कुछ मुँह में कुछ लिए हाथ में उससे मिट्टी चखने का अनुरोध कर रहा है। दोनों के बीच बड़े छोटे से संवाद होते हैं-‘माँ काओ’ और ‘तुम्ही खाओ’ परन्तु ये संवाद माँ-बेटी के भावनात्मक संबंधों का मधुर लघु शब्द-चित्र साकार कर रहा है।

यह प्रसंग हमारे घर-वार के एक सुपरिचित और परम प्रिय अंग को उद्घाटित करता है। अत: मुझे भी बहुत आकर्षक लगता है।

प्रश्न 5.
‘मेरा नया बचपन’ कविता आपको क्या संदेश देती है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कविता का विषय यद्यपि नया नहीं है। किन्तु उसका प्रस्तुतीकरण हमारे मन को जीवन के प्रति नई सोच के लिए प्रेरित करता है।

बचपन हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। सभी को इस स्मरणीय अनुभव से गुजरना होता है। आदमी जैसे-जैसे बड़ा होता है, उसके जीवन में नियम-कायदों, ऊँच-नीच, सावधानियों आदि का प्रवेश होता चला जाता है। जीवन का स्वाभाविक रूप धुंधला होता जाता है। जीवन एक संघर्षों का रणक्षेत्र सा हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप तनाव, चुनौतियाँ और अप्रिय प्रतिक्रियाएँ जीवन को भार-सा बना देती हैं।

कविता हमें संदेश देती है कि हमें सारी उम्र अपने बचपने को अपनी जीवनचर्या का अंग बनाए रखना चाहिए। हम एक प्रौढ़ बालक बने रहें तो तनाव-मुक्त, सहज मस्ती और भेद भाव रहित जिंदगी का आनंद पा सकते हैं।

सुभद्रा कुमारी चौहान कवयित्री-परिचय

‘झाँसी की रानी’ जैसी जन-मन में स्वतत्रता की आग प्रदीप्त घर देनी वाली लोकप्रिय रचना की लेखिका कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म सन् 1904 ई. में प्रयाग (इलाहाबाद) में हुआ था। आपने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा इलाहाबाद में ही प्राप्त की थी। पाँच वर्ष की अवस्था में ही कविता लिखकर आपने कवयित्री के रूप में प्रकट होने की पूर्व सूचना दे दी थी। सुभद्रा जी ने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और अनेक बार जेल यात्रा भी की। सुभद्रा जी ने दो प्रकार की रचनाएँ की हैं-पहली राष्ट्रीय भावनाओं से ओत प्रोत तथा दूसरी घरेलू जीवन पर। आपकी विशेषता थी, जटिल विषय को भी सरल भाषा में व्यक्त कर देना। भावों को पूर्णता से व्यक्त करने के लिए, सही शब्दों का चुनाव करने में वह कुशल थीं। सुभद्रा कुमारी चौहान ने कहानियाँ और निबन्ध भी लिखे हैं। उनकी कहानियों पर उन्हें दोबार सेकसरिया पुरस्कार भी मिला।

सुभद्रा जी का देहावसान एक मोटर दुर्घटना में सन् 1948 में हो गया।

सुभद्रा कुमारी चौहान कवयित्री पाठ-परिचय

‘मेरा नया बचपन’ कविता में कवयित्री को अपनी छोटी-सी पुत्री को खेलते देख अपने बचपन की याद आ जाती है। वह भावुक होकर अपने बचपन की बातों को याद करने लगती है। बचपन में वह किस प्रकार चिन्तारहित होकर खेलती-खाती और घूमती थी, वे सभी घटनाएँ उसके मन में छाने लगती हैं।

किलकारी मारकर हँसना, कभी मोती जैसे आँसू टपक आते हुए रोना, कवयित्री को देख-देखकर घर के सभी लोगों का प्रसन्न होना आदि बातें उनके नेत्रों के सामने उजागर ही उठी॥
कुछ बड़ी होने पर उनके व्यवहार में बदलाव आने लगे। वह लजाने लगी। मन में एक अपरिचित-सा रस उमगने लगा। किन्तु बचपन से यह विछोह उन्हें भारी पड़ा।

जवानी के झंझटों में घेर लिया। अब कवयित्री चाहती थी कि उसका बचपन उसे फिर मिल जाए। कवयित्री की यह कामना उसकी पुत्री के रूप में फिर से सफल हो गई। बेटी की तोतली बातों ने उसे उसका खोया बचपन फिर लौटा दिया।

काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ-

1. बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥
चिंता रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छन्द।
कैसा भूला जा सकता है, बचपन का अतुलित आनंद॥
ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था, छुआ-छूत किसने जानी।
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

कठिन शब्दार्थ-निर्भय = भयरहित होकर। स्वच्छन्द = बिना रोक-टोक के। अतुलित = जिसकी तुलना न की जा सके। छुआ-छूत = छूने से बचना, किसी को छूने योग्य न मानना। चीथडों = फटे-पुराने कपड़ों में।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नया बचपन’ से लिया गया है। इस अंश में कवयित्री को अपने बचपन के समय की मधुर यादें आ रही हैं।

व्याख्या-कवयित्री कह रही है कि उसे अपने बचपन की मधुर यादें बार-बार आती रहती है। उसे लगता है जैसे बचपन के जाने के बाद उसके जीवन में से मस्ती का समय चला गया। बचपन में वह बिना किसी चिंता के खेलती और खाया करती थी। वह बिना किसी भय के घूमा करती थी। भला बचपन के उस अनुपम आनंद को कैसे भूल सकती है। उस समय उसके लिए न ऊँचा था न नीचा।

आज की तरह मन में किसी के भी प्रति छुआ-छूत का भाव भी नहीं था। उस समय तो वह स्वयं को झोंपड़ी और फटे-पुराने कपड़ों के बीच पलने वाली किसी रानी से कम नहीं समझा करती थी।

विशेष-
(i) कवयित्री ने इन पंक्तियों में बचपन की निर्भीकता, मस्ती और स्वच्छन्दता का यथार्थ चित्र प्रस्तुत कर दिया है।
(ii) कवयित्री ने संकेत किया है कि बच्चे के मन में ऊँच-नीच और छुआ-छूत जैसी कोई भावना नहीं होती। ये सभी बातें तो बड़ों के ही संकुचित मन में रहा करती हैं।
(iii) ‘झोंपड़ी और चीथड़ों की रानी’ कथन द्वारा कवयित्री ने बाल मनोविज्ञान में अपनी गहरी पैठ से परिचित कराया है।
(iv) भाषा अत्यन्त सरल है। कथन-शैली भावुकतापूर्ण है।
(v) “बनी हुई ………………………… चीथड़ों में रानी” में लोकोक्ति का प्रयोग तथा उपमा का सौन्दर्य है।

2. किए दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर, सूना घर आबाद किया॥
रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिलाते थे।
बड़े-बड़े मोती से आँसू जयमाला पहनाते थे॥
मैं रोई, माँ काम छोड़ कर आई, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम, गीले गालों को सुखा दिया॥

कठिन शब्दार्थ-दूध के कुल्ले = बच्चों द्वारा दूध को उगल देना। किलकारी = छोटे बच्चों की हर्षभरी आवाज। किल्लोल = बच्चों के खेल। आबाद = भरा-पूरा। जयमाला = विजयसूचक माला, बच्चों से रोकर अपनी बात मनवा लेना। सुखा दिया = (आँसू) होठों से पौंछ डाले।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक में संकलित कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नया बचपन’ से लिया गया है। इस अंश में कवयित्री ने बच्चों की मधुर क्रीड़ाओं का सजीव चलचित्र-सा अंकित कर दिया है।

व्याख्या-कवयित्री कहती है कि उसने बचपन के सभी आनंद पाए। पीते-पीते दूध को मुँह से निकाल देना। अपना अँगूठा ऐसे चाव से चूसना, जैसे कोई अमृत पी रहा हो, आदि बच्चों की सभी सहज क्रियाएँ वह भी किया करती थी। अपनी किलकारियाँ और किलोलों से घर के सूनेपन को भर दिया करती थी। उसका किसी बात पर रोना या मचल जाना, सभी को बड़ा आनंदित किया करता था। जब उसकी आँखों से मोती जैसे बड़े-बड़े आँसू ढुलकने लगते तो सभी उसे मनाने में लग जाते थे। उसे अपने मचलने से जैसे मनचाही विजय मिल जाया करती थी।

जब कभी कवयित्री रोने लगती तो उसकी माँ घर के सारे काम छोड़कर तुरंत आकर उसे गोद में भर लेती थी और उसके आँसुओं भीगे गालों को अपने होठों से चूम-घूमकर ही सुखा दिया करती थी।

विशेष-
(i) कवयित्री ने इस अंश में माँ-बेटी के बीच वात्सल्य भरी झाँकी का एक सजीव शब्द-चित्र अंकित कर दिया है। वात्सल्य रस के ऐसे दुर्लभ चित्र सुरदारस के अतिरिक्त अन्यत्त मिलने दुर्लभ हैं।
(ii) विम्ब-विधान में अपनी पूर्ण कुशलता का परिचय कवयित्री ने दिया है।
(iii) भाषा में विषय और भावों के अनुसार सटीक शब्द का चुनाव हुआ है।
(iv) वर्णन शैली चित्रात्मक और भावात्मक है। दूध के कुल्ले करना, अँगूठा चूसना जैसे मुहावरे वर्णन को यथार्थता प्रदान कर रहे हैं।
(v) “बड़े-बड़े …………..पहनाते थे।” में उपमा तथा ‘किलकारी-किल्लोल’ और ‘गीले-गालों’ में अनुप्रास है। बड़े-बड़े और ‘चूम-चूम’ में पुनरूक्ति प्रकाश अलंकार है।
(vi) सम्पूर्ण का अव्यांश पाठकों को वात्सल्य रस की धारा में नहला रहा है।

3. दादा ने चंदा दिखलाया, नैन नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देखकर, सबके चेहरे चमक उठे।
वह सुख का साम्राज्य छोड़कर, मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई कुछ ठगी हुई सी, दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥
लाज भरी आँखें थी मेरी, मन में उमंग रँगीली थी।
तान रसीली थी कानों में, मैं चंचल छैल छबीली थी॥

कठिन शब्दार्थ-नीर-युत = आँसुओं से भरे। धुली हुई = स्वच्छ, आँसुओं के बीच मुस्कराहट। चमक उठे = प्रसन्न हो गए। साम्राज्य = वातावरण। लुटी हुई = जिसका कुछ छिन गया हो। उमंग = उत्साह। रंगीली = प्रेमभरी। रसीली = मधुर। छैल-छबीली = सुंदर, बनी-ठनी।

संदर्भ प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक में संकलित कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नया बचपन से लिय गया है। इसे अंश में कवयित्री बचपन से किशोरावस्था की ओर बढ़ने पर अपने मन में उठने वाली भावनाओं को प्रकाशित कर रही है।

व्याख्या-कवयित्री कहती है-जब वह रोती थी तो उसके दादा उसे बहलाने के लिए चन्द्रमा दिखाया करते थे। तब उसकी आँसू भरी आँखों में प्रसन्नता की दमक आ जाती थी। आँसुओं के बीच उसकी सरल मुस्कान को देख सभी लोग प्रसन्न हो जाया करते थे। धीरे-धीरे बचपन बीता और उसे परम सुखों से भरे अपने स्वराज्य को छोड़ कवयित्री कुछ बड़ी हो गई। अब उसके मन की सरलता का स्थान एक मस्ती ने ले लिया। उसे लगता था जैसे उसका कुछ छिन गया था या किसी ने उसे ठग लिया था। उसका बचपन उससे दूर हो गया था। अब दौड़-दौड़ कर घर के द्वार पर जा खड़ी होती थी। उसके मन में घर के बाहर से संसार को देखने उत्सुकता भरी रहती थी।

उसकी आँखों के भोलेपन का स्थान, अब एक संकोच ने ले लिया था। उसकी आँख लाज से झुकने लगी थीं। मन में एक प्रेम भरी पुलक-सी भरने लगी थी। उसके कानों में मधुर ध्वनियाँ गूंजने लगी थीं और अब वह एक चंचल और बन-ठनकर रहने वाली युवती बनने जा रही थी।

विशेष-
(i) बचपन से किशोरावस्था की ओर और फिर युवावस्था की ओर बढ़ती लड़की में, जो मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आते हैं, उनका बड़ा क्रमिक और सजीव चित्रण कवयित्री ने किया है। कवयित्री को सूक्ष्म निरीक्षण मन को मोह लेने वाला है।
(ii) शब्दों द्वारा घटनाओं और दृश्यों को मन के पर्दे पर साकार कर देने में कवयित्री परम कुशल है।
(iii) रोते बच्चे को चाँद दिखाकर बहलाना, रोते-रोते बच्चे का मुस्करा उठना, आयु के मोड़ों पर स्त्री-मन में आते परिवर्तन इने सभी का कवयित्री ने यथार्थ चित्रण किया है।
(iv) ‘नैन नीर-युत’ ‘चेहरे चमक’, ‘दौड़ द्वार’ तथा ‘छैल छबीली’ में अनुप्रास ‘लुटी हुई …….. खड़ी हुई में उपमा का सौन्दर्य है।
(V) भाषा सरल है। लक्षणा की छटा से मन को मुदित करती है। ‘धुली हुई मुस्कान’, सुख का साम्राज्य’, ‘लुटी हुई छबीली थी। आदि कथन इसका प्रमाण हैं।

4. दिल में एक चुभन सी थी, यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी, मैं सबके बीच अकेली थी।
मिला, खोजती थी जिसको, हे बचपन! ठगा दिया तूने।
अरे! जवानी के फंदे में, मुझको हँसा दिया तूने॥
माना, मैंने, युवाकाल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहने वाला है।

कठिन शब्दार्थ-चुभन-सी = मधुर कसक। अलबेली = अनौखी, सजी-धजी। पहेली = प्रश्न, उत्सुकता। अकेली = मन की भावना व्यक्त न कर पा रही। ठगा दिया = जवानी को सौंप दिया। जवानी का फंदा = युवावस्था की मुधर अनुभूतियाँ। आकांक्षा = इच्छा। पुरुषार्थ = पराक्रम, सामर्थ्य। उदय = उत्पन्न होना॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवियत्री सुभ्रद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नय बचपन’ से लिया गया है। कवियत्री ने रस अंश में युवावस्था आने पर, मन में उठने वाली मधुर भावनाओं के प्रकट किया है।

व्याख्या-कवयित्री कहती है कि जवानी में प्रवेश करते ही उसकी मनोभावनाएँ बदलने लगीं। उसके मन में एक मधुर कसक सी उठने लगी। जवानी की वह दुनिया बड़ी अनौखी और आकर्षक थी। उसके मन में जीवन को लेकर अनेक प्रश्न और उत्सुकताएँ जागने लगीं। उसे लगने लगा जैसे इतने प्रियजनों और परिजनों के बीच रहते हुए भी उसे ऐसा कोई विश्वस्त साथी नहीं मिल रहा था जिससे वह अपनी मनोभावनाओं को साझा कर सके। कवयित्री कहती है वह मन ही मन जिससे मिलने को उत्सुक थी वह यौवन उसे मिला तो सही पर उसे लगा कि बचपन ने उससे छल किया था। उसने उसे जवानी के मधुर जाल में उलझा दिया। यह ठीक है कि जवानी का समय बड़ा अनौखा होता है। इस आयु में व्यक्ति के मन में अनेक कामनाएँ जागा करती हैं। उसमें नई सामर्थ्य उत्पन्न होती है और ज्ञान में भी वृद्धि होती है। जवानी का यह समय सचमुच बड़ा मनमुग्धकारी होता है॥

विशेष-
(i) किशोरावस्था से जवानी में प्रवेश करते समय युवा हृदयों में जो भावनाएँ और अनुभूतियाँ जागा करती हैं, कवयित्री ने उनका चित्रण मन-मोहक भाषा-शैली में किया है।
(ii) बचपन के भोले-भाले जीवन की देहली लाँध कर जब मन, जवानी के प्रांगण में प्रवेश करता है तो इतनी मधुर अनुभूतियों और उत्सुकताएँ जागती हैं कि युवा को लगता है उसे ठग लिया गया है। कवयित्री ने इसी ओर संकेत किया है।
(iii) भाषा सरल है। वर्णन-शैली भावुकता प्रधान है।
(iv) ‘जवानी के फंदे’ में रूपक तथा ‘माना मैंने’ में अनुप्रास अलंकार है।

5. किन्तु यह झंझट भारी, युद्ध क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़ कर, जीवन भी है भार बना॥
आजा बचपन एक बार फिर, दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटाने वाली, वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥
वह भोली सी मधुर सरलता, वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा, तू मेरे मन का संताप।

कठिन शब्दार्थ-झंझट = व्यर्थ का बखेड़ा। भार = बोझ। निर्मल शांति = पूर्णत: बाधारहित शांति। प्राकृत = स्वाभाविक। विश्रांति = विश्राम। निष्पाप = पापरहित। संताप = कष्ट॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक में संकलित कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नया बचपन’ से लिया गया है। इस अंश में कवयित्री ने जवानी को अनेक चुनौतियों से भरा एक झंझट बताया है।

व्याख्या-कवयित्री ने माना है कि युवावस्था में नई-नई कामनाओं, पुरुषार्थ और ज्ञान की वृद्धि होती है किन्तु इस आयु में बड़े झंझट भी हैं। इस अवस्था में व्यक्ति के लिए सांसारिक जीवन, एक चुनौतियों और संघर्ष से पूर्ण रणभूमि सा नजर आता है। युवावस्था नई-नई जिम्मेदारियों के आने से मन चिंतित रहता है और कभी-कभी जीवन एक बोझ-सा प्रतीत होने लगता है। कवयित्री जवानी के झंझटों से विचलित होकर बचपन को पुकार उठती है। वह पुकार उठती है-ओ! मेरे प्यारे बचपन ! तू एक बार फिर से आजा। मेरे चिंताओं से बोझिल जीवन को फिर से अपनी निर्मल शांति से भर दे। फिर से मुझे जवानी के इस थका देने वाले मार्ग पर तू मुझे वह स्वाभाविक विश्राम प्रदान कर दे, जो मन की व्याकुलता भरी वेदना को शांत कर देता है। फिर से जीवन में उसी मधुरता भरी सरलता से भर दे। मेरे जीवन से सारे कलुषों को मिटा दे। बता, क्या तू फिर से मेरे जीवन में पधारकर, मेरे व्यथित और चिंतित मन का कष्ट दूर करेगा?

विशेष-
(i) कवियत्री ने बचपन को जीवन की सबसे सुन्दर अवधि सिद्ध किया है। जवानी भले ही अनेकानेक आकर्षक भेंटों से भरी हो, पर बचपन की निर्मल विश्रान्ति के सामने से वह कहीं नहीं ठहरती। वह युवाओं को चिंताओं और झंझटों के जाल में उलझा देती है।
(ii) कवयित्री का संकेत है कि मनुष्य चमक-दमक भरी जिन्दगी की ओर दौड़ने के बजाय बचपन जैसी सरल, सहज भोली और निष्पाप जीवन शैली को अपनाए। तभी उसे जीवन के तनावों, चिंताओं और संघर्षों से मुक्ति मिल सकती है।
(iii) भाषा लक्षणा-शक्ति सम्पन्न है। वर्णन-शैली में भावुकता का पुट है।
(iv) व्याकुल व्यथा’ में अनुप्रास अलंकार है।

6. मैं बचपन को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी॥
नंदन वन-सी फूल उठी, वह छोटी-सी कुटिया मेरी॥
माँ ओ! कहकर बुला रही थी, मिट्टी खाकर आई थी।
कुछ मुँह में, कुछ लिए हाथ में, मुझे खिलाने आई थी।
पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतूहल था छलक रहा।
मुँह पर भी आल्हाद लालिमा, विजय गर्व था झलक रहा।

कठिन शब्दार्थ-बिटिया = छोटी सी बेटी। नंदनवन = स्वर्ग का उद्यान। फूल उठी = फूलों से भरी गई, आनंद से परिपूर्ण हो गई। कुटिया = झोंपड़ी, घर। पुलक रहे = रोमांचित हो रहे, हर्षित हो रहे। अंग = शरीर के भाग। दुग = नेत्र। कोतूहल = आश्चर्य। छलक = प्रकट हो रहा। आल्हाद = अत्यन्त हर्ष। लालिमा = लाली॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नया बचपन’ से लिया गया है। इस अंश में कवयित्री ने बताया है कि उसका बचपन फिर से आ गया है।

व्याख्या-जब वह बचपन से फिर से आने के लिए अनुरोध कर रही थी, तभी उसकी छोटी-सी बेटी अचानक उसे ओ माँ’ कहकर पुकार उठी। कवयित्री ने अचानक उसकी ओर देखा तो देखती ही रह गई। बिटिया के बोलते ही ऐसा लगा कि कवयित्री का वह घर, प्रसन्नता के मारे स्वर्ग के नंदनवन के समान फूलों से भर गया हो। बेटी भी मिट्टी खाकर आई थी। कुछ मिट्टी अभी भी मुँह में थी और हाथ में भी मिट्टी थी, जिसे वह अपनी माँ को खिलाने के लिए आई थी। मिट्टी चखने का रोमांचित आनंद, उसके अंग-अंग से छलका पड़ रहा था। आँखों में भोला कौतूहल छाया हुआ था। मुख परम हर्ष से लाल हो रहा था और लगता था बिटिया को अपने मिट्टी खाने जैसे महान कार्य पर बड़ा गर्व भी हो रहा था।

विशेष-
(i) कवयित्री की मनोकामना की पूर्ति के लिए, उसका बचपन ही उसकी बेटी के रूप में मूर्तिमान होकर आ पहुँचा। उसकी निराली, भोली और कौतूहल भरी मूर्ति देखकर, कवयित्री का मनरूपी नंदनवन वात्सल्य के फलों से भर गया। काव्यांश का यह शब्द-चित्र बड़ा मन-मोहक है।
(ii) भाषा में मृदुलता है और वर्णन शैली वात्सल्य रस से सराबोर है।
(iii) बच्चों की सहज अठखेलियों का सजीव चित्रण हुआ है।
(iv) “नंदनवन-सी……………..कुटिया मेरी॥” में उपमा अलंकार है।

7. मैंने पूछा, यह क्या लायी? बोल उठी वह ‘माँ काओ’।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से, मैंने कहा तुम्हीं खाओ॥
पाया मैंने बचपन फिर से, बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर, मुझमें नवजीवन आया।
मैं भी उसके साथ खेलती-खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥
जिसे खोजती थी बरसों से, अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर, वह बचपन फिर से आया॥

कठिन शब्दार्थ-‘माँ काओ’ = माँ खाओ। प्रफुल्लित = अत्यन्त प्रसन्न। मंजुल = सुन्दर।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नया बचपन’ से लिया गया है। इस अंश में कवयित्री ने बेटी के रूप में आपने बचपन के दर्शन किए हैं। इससे उसके जीवन में नया उत्साह उत्पन्न हो गया। जीवन का तनाव दूर हो गया। वह स्वयं भी बच्ची जैसी बनकर बेटी के साथ खेलने लगी।

व्याख्या-कवयित्री ने अपनी छोटी-सी बिटिया की तोतली बोली में सुना ‘माँ खाओ’। यह सुनते ही उसका हृदय वात्सल्य से प्रफुल्लित हो उठा और उसने कहा-‘बिटिया ! तुम्हीं खाओ’। इस प्रकार वह स्वयं भी बच्ची बन गई। उसे लगा कि उसका बचपन ही बेटी बनकर आ गया है। इस घटना से उत्साहित होकर वह स्वयं भी बच्ची जैसी बन गई है। अब वह बेटी के साथ खेलती और खाती और तुतलाकर ही बोलती है। बेटी की भोली बातों बौर मनहमोहक क्रीड़ाओं को देखकर वह स्वयं भी बच्ची की तरह व्यवहार किया करती है। कवयित्री को लगता है कि वह जिस बचपन को वर्षों से खोज रही थी, उसे अब उसने बेटी के रूप में पा लिया है। जो बपचन उसे छोड़ कर भाग गया था, वह फिर से वापस आ गया है।

विशेष-
(i) घर में एक बेटी के आगमन से प्रफुल्लित सुभद्राजी, आज के ‘बेटी बचाओ’ अभियानकर्ताओं को भी संबोधित करती दिखाई देती हैं।
(ii) बच्चों से रहित घर के सूने-पन से बेचैन रहने वालों के लिए, सुभद्रा जी की यह रचना एक नवजीवनदायिनी औषध के समान है।
(iii) सरल भाषा-शैली के माध्यम से भी साहित्य पाठकों को आनंदित किया जा सकता है, इस बात का यह काव्यांश प्रत्यक्ष प्रमाण है।
(iv) सम्पूर्ण काव्यांश वात्सल्य रस से ओत-प्रोत है।
(v) ‘बचपन बेटी बन’, ‘मंजुल मूर्ति’ तथा ‘खेलती-खाती’ में अनुप्रास तथा ‘बचपन बेटी बन आया’ में मानवीकरण है।