RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 14  पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 14 ठेले पर हिमालय वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
नैनीताल से कोसी जाने वाली सड़क को लेखक ने कैसी बताया है –
(अ) सुन्दर-साफ व आरामदायक
(ब) सीधी व सपाट
(स) ऊँची और मजेदार
(द) ऊबड़-खाबड़ और कष्टप्रद
उत्तर:
(द)

प्रश्न 2.
शुक्लजी के साथ एमिल जोला-सी दाढ़ी वाला युवक कौन था –
(अ) कवि
(ब) चित्रकार
(स) लेखक
(द) संगीतकार
उत्तर:
(ब)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 14 ठेले पर हिमालय अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक का मित्र ठेले पर बर्फ देखकर खोया-खोया क्यों हो गया?
उत्तर:
लेखक का मित्र अल्मोड़ा का निवासी था। उसको ठेले पर बर्फ देखकर हिमालय के शिखरों की बर्फ याद आ रही थी।

प्रश्न 2.
लेखक ने किससे मिलने पर यह कहा कि उन जैसा साथी तो सफर में पिछले जन्म के पुण्यों से ही मिलता है?
उत्तर:
लेखक ने शुक्ल जी से मिलने पर कहा कि उन जैसा साथी तो सफर में पिछले जन्म के पुण्यों से ही मिलता है।

प्रश्न 3.
लेखक की सारी निराशा व खिन्नता कब दूर हुई?
उत्तर:
जब लेखक ने कौसानी में हिम शिखरों पर जमी बर्फ को देखा तो हिम-दर्शन से उसके मन की सभी खिन्नता और निराशा दूर हो गई।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 14 ठेले पर हिमालय लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
त्रिताप कौन-कौन से होते हैं? हिमालय की शीतलता से वे कैसे दूर हो गए?
उत्तर:
त्रिताप अर्थात् कष्ट तीन प्रकार के होते हैं-दैहिक, दैविक, भौतिक । पुराने साधक इनसे मुक्ति के लिए हिमालय पर जाते थे। हिमालय की शीतलता मनुष्य के शारीरिक कष्टों को दूर करती है। हिमालय का पवित्र वातावरण आत्मिक कष्टों से मुक्ति दिलाता है तथा भौतिक पीड़ा से भी मुक्त करता है। हिमालय की शीतलता, पवित्रता और शांति मनुष्य को त्रितापों से मुक्त कर देती थी।

प्रश्न 2.
हिमालय के पर्वतीय सौन्दर्य में स्नोफाल किस प्रकार पर्यटकों को अधिक आकर्षित करता है?
उत्तर:
हिमालय अत्यन्त आकर्षक है। उसके शिखरों पर जमी बर्फ लोगों को सुन्दर लगती है। हिमालय पर जब बर्फ गिरती है तो उसको देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक वहाँ जाते हैं। आसमान से रुई के फाहों की तरह गिरती बर्फ पर्यटकों को रोमांचित करती है। वहाँ बर्फ के खेल भी होते हैं। गिरती हुई बर्फ की प्राकृतिक सुषमा अद्वितीय होती है।

प्रश्न 3.
लेखक ने कौसानी गाँव में डूबते सूरज का जो वर्णन किया है, उसे अपने शब्दों में लिखिए?
उत्तर:
सूरज ढल रहा था। दूर स्थित शिखरों पर दरें, ग्लेशियर, ढोल तथा घाटियाँ कुछ धुंधली दिखाई दे रही थीं। ग्लेशियरों की बर्फ केसर के समान पीली दिखाई दे रही थी। पर्वत शिखरों पर जमी बर्फ लाल कमल जैसी हो गई थी। कौसानी की घाटियाँ भी पीली दिखाई देने लगी थीं।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 14 ठेले पर हिमालय निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पर्वतीय क्षेत्रों के प्राकृतिक सौन्दर्य पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
प्रकृति का स्वरूप अत्यन्त रमणीय होता है। नदी, वन, पर्वत, आकाश, समुद्र सभी सुन्दर लगते हैं किन्तु पर्वतीय क्षेत्रों की प्राकृतिक सुषमा ज्यादा मनोहारिणी होती है।

प्रकृति के विविध स्वरूप पर्वतों पर दिखाई देते हैं। एक के साथ एक जुड़ी हुई पर्वत श्रृंखलाएँ, उन पर बने पथरीले रास्ते हमें अपनी ओर आकर्षित करते हैं। कहीं मजबूत चट्टानें होती हैं तो कहीं कमजोर चट्टानें भी होती हैं। ये चट्टानें एक दूसरे से जुड़कर पहाड़ी शिखरों का रूप लेती हैं। लाल-लाल चट्टानें देखने में सुन्दर लगती हैं। इन चट्टानों पर सीढ़ीनुमा खेत होते हैं। इनमें उगे हुए पौधे हरे-भरे और सुन्दर लगते हैं। पर्वतों पर घने जंगल होते हैं। इन वनों में चीड़, देवदार आदि अनेक प्रकार के वृक्ष होते हैं। कहीं-कहीं पर झाड़ियाँ भी पाई जाती हैं। वहाँ हरी-हरी लम्बी घास भी उगती है। इन वनस्पतियों से ढंके होने से पर्वत शिखरों की शोभा द्विगुणित हो जाती है। उनका ऊँचा माथा आकाश को छूता हुआ-सा प्रतीत होता है। इन पर्वतीय वनों में अनेक जीव-जन्तु रहते हैं। छोटे-छोटे कीट-पतंगों से लेकर हाथी, शेर, चीता आदि बड़े-बड़े पशु-पक्षी इन वनों में पाए जाते हैं। ये पशु-पक्षी बड़े मनोहर होते हैं। वनों तथा पशु संरक्षण उद्यानों में इनको देखने अनेक लोग जाते हैं।

पर्वतों पर बहती नदियाँ अपने कल-कल स्वर से हमें आनन्द देती हैं, वहाँ वैसे जलाशयों-सरोवरों में स्वच्छ दर्पण जैसा जल भरा होता है। इनमें पर्वतों की मनोहर छवि दिखाई पड़ती है। पर्वतों की ऊँची चोटियाँ सफेद बर्फ से ढकी रहती हैं। यह बर्फ अत्यन्त सुन्दर होती है। सूर्य और चन्द्रमा के प्रकाश में वह रंग-बिरंगी और चमकीली लगती है। यहाँ सूर्य और चन्द्रमा का उदय और अस्त का दृश्य बहुत मनोहर होता है। अँधेरी रात में टिमटिमाते तारों की अपनी अलग ही छवि होती है। पर्वतों पर हिमपात के मनोहर दृश्य को देखने पर्यटक दूर-दूर से आते हैं।

प्रश्न 2.
पर्यटन का हमारे जीवन में क्या महत्व है?
उत्तर:
विभिन्न स्थानों की यात्रा को पर्यटन कहते हैं। इन यात्राओं के पीछे कोई विशेष उद्देश्य नहीं होता। किसी स्थान को देखना ही पर्यटन में निहित भावना होती है। पर्यटन धार्मिक, ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक दृष्टि से प्रसिद्ध स्थानों का किया जाता है। ये स्थल अपने देश में अथवा विदेश में कहीं भी हो सकते हैं। पर्यटन का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। पर्यटन से व्यक्ति का ज्ञान बढ़ता है। वह जहाँ जाता है, उस स्थान के विषय में तरह-तरह की जानकारियाँ उसको प्राप्त होती हैं। पुस्तकों में पढ़कर अथवा चित्रों को देखकर भी किसी स्थान के बारे में ज्ञान मिलता है, किन्तु जो ज्ञान उस स्थल को अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देखकर प्राप्त होता है, वह अधिक प्रभावशाली होता है। पर्यटन आनन्द-वर्धक तथा मनोरंजक होता है। नए-नए स्थानों की यात्रा में यद्यपि कष्ट उठाना पड़ता है और धन का व्यय भी होता है, परन्तु उससे प्राप्त आनन्द की तुलना में व्यय धन व समय कुछ भी नहीं है। इन स्थानों पर अनेक दर्शनीय चीजें होती हैं, जो दर्शक के मन को आनन्द से भर देती हैं।

ऐतिहासिक स्थलों, इमारतों, संग्रहालयों आदि को देखना इतिहास सम्बन्धी पुस्तकें पढ़ने से अधिक महत्वपूर्ण होता है। वहाँ जाकर हम उस काल अथवा युग से स्वयं भेंट कर सकते हैं। ताजमहल को देखकर हम उसकी सुन्दरता से ही प्रभावित नहीं होते बल्कि उसको बनाने वाले बादशाह शाहजहाँ के जीवन तथा घटनाओं से भी रूबरू होते हैं। इसी प्रकार धार्मिक स्थलों की यात्रा धर्म में हमारे विश्वास को बढ़ाने वाली होती है। मंदिरों की कलात्मक मूर्तियाँ तथा भवन हमारे मन को प्रसन्नता से भर देते हैं।

प्राकृतिक स्थानों यथा पर्वतों, वनों, समुद्र-तटों आदि का पर्यटन अधिक आनन्ददायक होता है। इन स्थानों पर जाकर प्रकृति को निकट से देखने का अवसर मिलता है। पर्वतों की चोटियों पर जर्मी श्वेत चमकीली हिम, वनों में विविध प्रकार के वृक्ष और लतायें, उनमें रहने वाले जीव-जन्तु, समुद्र तट का विस्तार, सूर्य और चन्द्रमा के प्रकाश से प्रभावित जल, उसमें उठती लहरें आदि पर्यटक को बार-बार बुलाते हैं।

पर्यटन से जीवन सार्थक होता है। प्रसिद्ध पर्यटक राहुल सांकृत्यायन ने विश्व के अनेक स्थानों का पर्यटन किया था। पर्यटन की प्रेरणा देते हुए वह कहते हैं

सैर कर दुनियाँ की गाफिल जिन्दगानी फिर कहाँ।
जिन्दगानी भी मिली तो नौजवानी फिर कहाँ।।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 14 ठेले पर हिमालय भाषा की बात

‘कुछ देर बादलों में निगाह भटकती रही कि अकस्मात्, फिर एक हलका-सा विस्मय को धक्का मन को लगा;’ -यह एक मिश्र वाक्य है। मिश्र वाक्य किसे कहते हैं। यह कितने प्रकार से बनते हैं?
उत्तर:
जिस वाक्य में एक प्रधान उपवाक्य तथा एक अथवा अधिक आश्रित उपवाक्य होते हैं, उसको मिश्र उपवाक्य कहते हैं। मिश्र वाक्य में तीन प्रकार के उपवाक्य (आश्रित) होते हैं। इन आश्रित उपवाक्यों के अनुसार मिश्रवाक्य तीन प्रकार के होते हैं

(क) संज्ञा उपवाक्य – ये उपवाक्य प्रधान उपवाक्य की क्रिया के कर्ता, कर्म, पूरक आदि होते हैं; जैसे- मोहन ने राम से कहा कि वह उसको एक पुस्तक देगा।।

(ख) विशेषण उपवाक्य – जब कोई उपवाक्य प्रधान उपवाक्य के कर्ता, कर्म इत्यादि की विशेषता प्रकट करता है, तो उसको विशेषण उपवाक्य कहते हैं; जैसे-राम, जो दशरथ के पुत्र थे, अत्यन्त आज्ञाकारी थे।

(ग) क्रिया – विशेषण उपवाक्य-प्रधान उपवाक्य की क्रिया के समय, दशा, स्वभाव आदि का ज्ञान क्रिया-विशेषण उपवाक्य कराते हैं; जैसे-जब बिजली चली गई, तो ध्वनि विस्तारक यंत्र ने काम करना बन्द कर दिया। जैसे ही रात हुई, वह बिस्तर पर लौट गया।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 14 ठेले पर हिमालय अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 14 ठेले पर हिमालय वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक है –

(क) उबाऊ
(ख) दिलचस्प
(ग) विचित्र
(घ) आकर्षक।

2. लेखक के गुरुजन उपन्यासकार मित्र का जन्म-स्थान है –

(क) अल्मोड़ा
(ख) शिमला
(ग) नैनीताल
(घ) मसूरी।

3. कोसी से कौसानी की दूरी है –

(क) 18 मील
(ख) 6 मील
(ग) 21 मील
(घ) 30 मील।

4. स्विटजरलैंड का आभास कौसानी में ही होता है।’ यह कथन है –

(क) जवाहरलाल नेहरू का
(ख) कमला नेहरू का
(ग) सुभाष चन्द्र बोस का
(घ) महात्मा गाँधी का।

5. हिमालय पर जमी बर्फ को कुछ विदेशियों ने कहा है –

(क) श्वेत हिम
(ख) चिरंतन हिम
(ग) नवीनतम हिम
(घ) शाश्वत हिम।

6.
“इसी से हम भी शीर का बल हिमालय देखता है।”-यह कथन है –

(क) डॉ. भारती का
(ख) शुक्ल जी का
(ग) चित्रकार सेन का
(घ) उपन्यासकार मित्र का।

उत्तर:

  1. (ख)
  2. (क)
  3. (ग)
  4. (घ)
  5. (ख)
  6. (ग)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 14 ठेले पर हिमालय अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है’- सुनते ही लेखक के मन में क्या बात आई?
उत्तर:
‘यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है।’ अपने गुरुजन उपन्यासकार मित्र का यह कथन सुनते ही लेखक के मन में शीर्षक ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक कौंध गया।

प्रश्न 2.
डॉ. भारती और उनके साथी कौसानी क्यों गए थे?
उत्तर:
डॉ. भारती और उनके साथी सिर्फ बर्फ को बहुत पास से देखने के लिए ही कौसानी गए थे।

प्रश्न 3.
लेखक और उनके साथी कौसानी पहुँचे तो उनके चेहरे पीले क्यों पड़ गए थे?
उत्तर:
कौसानी को रास्ता भयानक मोड़ों वाला तथा कष्टप्रद था। नौसिखिया ड्राइवर लापरवाही से बस चला रहा था।

प्रश्न 4.
“मेरे चेहरे पर निरन्तर घनी होती हुई उत्सुकता को ताड़कर शुक्ल जी ने कहा” लेखक के चेहरे पर उत्सुकता किस कारण प्रकट हुई थी?
उत्तर:
लेखक शुक्ल जी के साथ आए दुबले-पतले युवक का परिचय जानने को उत्सुक था।

प्रश्न 5.
कोसी किसका नाम है?
उत्तर:
कोसी एक नदी तथा एक स्थान का नाम है।

प्रश्न 6.
कोसी से कौसानी जाने वाली सड़क को ‘अजगर- सी’ क्यों कहा गया है?
उत्तर:
कोसी से कौसानी जाने वाली सड़क टेड़ी-मेड़ी, ऊपर-नीचे रेंगती हुई और करीली थी।

प्रश्न 7
कौसानी जाते समय लेखक के चेहरे पर अधैर्य, असंतोष तथा क्षोभ क्यों झलक उठा था?
उत्तर:
लेखक को बताया गया था कि कौसानी बहुत सुन्दर स्थान है। कष्टप्रद, टेढ़े-मेढ़े रास्ते देखकर तथा बर्फ का नामोनिशान न पाकर लेखक के मन में अधैर्य, क्षोभ और असंतोष पैदा हो गया।

प्रश्न 8.
कौसानी कहाँ बसा है?
उत्तर:
कौसानी सोमेश्वर घाटी के उत्तर दिशा में स्थित पर्वतमाला के शिखर पर बसा है।

प्रश्न 9.
शिखर पर जमी हुई बर्फ को देखकर अकस्मात् लेखक के मन में क्या विचार आया?
उत्तर:
लेखक के मन में अचानक विचार उठा कि यह बर्फ हिमालय की चोटियों पर कब से जमी है? क्या मनुष्य के पैर कभी वहाँ पड़े हैं?

प्रश्न 10.
सूरज डूबने लगा तो ग्लेशियरों में क्या बहने लगा?
उत्तर:
सूरज डूबने लगा तो ग्लेशियरों में पिघली केसर बहने लगी।

प्रश्न 11.
चाँदनी रात में डाकबंगले के बरामदे में विचारमग्न लेखक की तंद्रा कैसे टूटी?
उत्तर:
लेखक विचारमग्न था। तभी सेन रवीन्द्रनाथ टैगोर की कोई कविता गाने लगा। उसे सुनकर लेखक की तंद्रा टूट गई।

प्रश्न 12.
“कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो”-यह पंक्ति किसने लिखी है?
उत्तर:
यह पंक्ति भक्त कवि तुलसीदास ने अपनी ‘विनयपत्रिका’ में लिखी है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 14 ठेले पर हिमालय लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
“और यकीन कीजिए, इसे बिलकुल ढूँढ़ना नहीं पड़ा। बैठे-बिठाये मिल गया।” लेखक ने यह किसके बारे में कहा है?
उत्तर:
लेखक ने यह बात अपने निबंध के शीर्षक के बारे में कही। लेखक अपने एक गुरुजन उपन्यासकार मित्र के साथ पान की दुकान पर खड़ा था। वहाँ एक बर्फ वाला ठेले पर बर्फ की सिल्लियाँ लाद कर लाया। बर्फ में से भाप उड़ रही थी। लेखक के मित्र अल्मोड़ा के रहने वाले थे। वे बोले-यह बर्फ तो हिमालय की शोभा है। सुनते ही लेखक ने तुरन्त अपने लेख’ का शीर्षक ‘ठेले पर हिमालय’ रख दिया।

प्रश्न 2.
कोसी तक लेखक किस प्रकार पहुँचा? उसको कोसी में क्यों उतरना पड़ा?
उत्तर:
लेखक नैनीताल से रानी खेत, मझकाली होते हुए कोसी पहुँचा। रास्ते में भयानक मोड़ थे। रास्ता बहुत कष्टपूर्ण, सूखा और कुरूप था। पहाड़ सूखे थे। रास्ते में कहीं पानी का निशान भी नहीं था। कहीं हरियाली भी नहीं थी। ढालों को काटकर बनाया गया रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा था। वहाँ से एक सड़क अल्मोड़ा तथा दूसरी कौसानी जाती थी। लेखक की बस अल्मोड़ा जा रही थी। उसको कौसानी जाना था। अत: वह कोसी उतर गया।

प्रश्न 3.
शुक्ल जी कौन थे? उनके बारे में लेखक ने क्या कहा है?
उत्तर:
शुक्ल जी ने लेखक को कौसानी जाने के लिए उत्साहित किया था। वह भी कौसानी जा रहे थे। कोसी में बस से उतरे तो उनका चेहरा प्रसन्नता से भरा था। उनके चेहरे पर कभी थकान और सुस्ती दिखाई नहीं देती थी उनको देखते ही लेखक की थकान और सुस्ती दूर हो गई। लेखक ने कहा है कि शुक्ल जी जैसा सफर का साथी पिछले जन्म के पुण्यों से मिलता है।

प्रश्न 4.
शुक्ल जी के साथ बस से कोसी में उतरने वाला व्यक्ति कौन था?
उत्तर:
शुक्ल जी के साथ एक अन्य व्यक्ति भी कोसी में बस से उतरा। वह दुबला-पतला था। उसका चेहरा पतला और साँवला था । उसने एमिल जोला-सी दाढ़ी रखी हुई थी। वह ढीला-ढाला पतलून पहने था। उसके कंधे पर जर्किन पड़ी थी। उसके बगल में थर्मस अथवा कैमरा अथवा बाइनाकुलर लटका हुआ था। वह मशहूर चित्रकार सेन था। उसका स्वभाव मधुर था।

प्रश्न 5.
‘‘कोसी से बस चली तो रास्ते का सारा दृश्य बदल गया।” उस दृश्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए?
उत्तर:
कोसी तक का रास्ता अच्छा नहीं था। कोसी से बस चली तो रास्ते का दृश्य बदल गया, पत्थरों पर कल-कल करती हुई कोसो बह रही थी। उसके किनारे छोटे-छोटे गाँव और हरे-भरे खेत थे। सोमेश्वर की वह घाटी बहुत सुन्दर थी। मार्ग में कोसी नदी तथा उसमें गिरने वाले नदीनालों के पुल थे। एक के बाद एक बस स्टेशन, पहाड़ी, डाकखाने, चाय की दुकानें आदि भी रास्ते में मिले। कहीं-कहीं सड़क निर्जन चीड़ के जंगलों से गुजरी। सड़क टेढ़ी-मेढ़ी, ऊँची-नीची तथा केंकरीली थी। उस पर बस धीरे-धीरे चल रही थी। रास्ता सुहाना था।

प्रश्न 6.
”हम अपना संशय शुक्ल जी से व्यक्त भी करने लगे।” लेखक को किस विषय में संशय था?
उत्तर:
कोसी से अठारह मील दूर निकल आने पर भी लेखक को कहीं बर्फ दिखाई नहीं दी थी। कौसानी केवल छ: मील दूर हो रह गया था। लेखक को बताया गया था कि कौसानी बहुत सुन्दर है। वहाँ स्विट्जरलैंड का आभास होता है। वह कश्मीर से अधिक मनोहर है। वह इतनी प्रशंसा के योग्य नहीं था। लेखक को संदेह था कि वहाँ बर्फ दिखाई देगी भी या नहीं। यही बात लेखक ने शुक्ल जी से कही थी।

प्रश्न 7.
बिलकुल ठगे गए हम लोग”- लेखक को क्यों लगा कि उसको ठगा गया है?
उत्तर:
बस कौसानी के अड्डे पर रुकी। वह एक छोटा और उजड़ा-सा गाँव था। वहाँ बर्फ का नामोनिशान भी नहीं था ! लेखक बर्फ को निकट से देखने के इरादे से कौसानी गया था। उसने कौसानी की बहुत तारीफ सुनी थी। उसके मित्रों ने उसको कश्मीर से भी सुन्दर बताया था। अत: लेखक को लगा कि उसने लोगों की बातों पर विश्वास करके गलती की। उसके अनुसार वह बुरी तरह ठगा गया था।

प्रश्न 8.
‘अनखाते हुए बस से उतरा कि जहाँ था वहीं पत्थर की मूर्ति-सा स्तब्ध खड़ा रहा गया।” कौन स्तब्ध खड़ा रह गया तथा क्यों?
उत्तर:
लेखक जब कौसानी के बस-अड्डे पर बस से उतरा तो वह अत्यन्त खिन्न था। जहाँ वह बस से उतरा था, वहाँ से उसकी निगाह एक ओर पड़ी। उसने देखा कि सामने की घाटी अपार प्राकृतिक सौन्दर्य से भरी थी। पचासों मील चौड़ी इस घाटी में लाल-लाल रास्ते थे। ये गेरू की शिलाओं के काटने से बने थे। उनके किनारे सफेद थे। उसमें अनेक नदियाँ बह रही थीं। उसमें हरे-भरे खेत थे। पूरी घाटी अत्यन्त सुन्दर थी। लेखक उसे देखता ही रह गया और जहाँ था वहाँ पर ही स्तब्ध खड़ा रह गया।

प्रश्न 9.
कौसानी पहुँचकर लेखक हर्षातिरेक से क्यों चिल्लाने लगा?
उत्तर:
कौसानी के बस-अड्डे से लेखक ने कल्यूर की सुन्दर घाटी को देखा । दूर क्षितिज के पास कुछ धुंधले छोटे पर्वतों का उसे आभास हुआ। उसके बाद बादल थे। अकस्मात बादलों के बीच उसको कुछ दिखाई दिया। बादल के टुकड़े जैसी कोई अटल वस्तु थी । उसका रंग न नीला था, न रुपहला, न सफेद था। वह तीनों का मिलाजुला रंग था। लेखक ने सोचा-यह है क्या? बर्फ नहीं है तो क्या है? अचानक उसको ध्यान आया कि इसी घाटी के पार हिमालय पर्वत है, जो बादलों से ढका है। वह समझ गया कि उसने बर्फ से ढके किसी छोटे शिखर को देखा है। वह प्रसन्नता के साथ चिल्ला उठा ‘बर्फ, वह देखो।’

प्रश्न 10.
एक क्षण के हिम-दर्शन के कारण लेखक की क्या दशा हुई? यदि आप लेखक के साथ होते तो क्या आपकी दशा भी ऐसी ही होती?
उत्तर:
एक क्षण के हिम-दर्शन का लेखक पर अद्भुत प्रभाव पड़ा। उसका सारी खिन्नता, निराशा और थकावट दूर हो गई। वह बादलों के छटने के बाद आवरणहीन हिमाच्छादित हिमालय को देखने की कल्पना से अत्यन्त रोमांचित हो उठा। उसका हृदय तेजी से धड़कने लगा । यदि मैं लेखक के साथ होता तो संभवत: मेरी दशा भी ऐसी ही होती अथवा.मैं शुक्ल जी की तरह शांत रहता और लेखक के समान उत्तेजित नहीं होता।

प्रश्न 11.
छोटे हिम-शिखर को बादलों ने ढंक लिया तो लेखक तथा उसके साथियों ने क्या किया?
उत्तर:
क्षणभर अपनी झलक दिखाकर हिमावृत्त शिखर गायब हो गया था। लेखक और उसके साथी बर्फ देखना चाहते थे। उन्होंने डाकबंगले में अपना सामान रखा और बिना चाय पिये ही सामने के बरामदे में बैठे रहे। वे एकटक सामने देखते रहे। बादल धीरे-धीरे छैटते जा रहे थे और एक-एक करके नए-नए शिखरों पर जमी बर्फ दिखाई दे रही थी। फिर बादल पूरी तरह हट गए और हिम शिखरों की पूरी श्रृंखला दिखाई देनी लगी।

प्रश्न 12.
कौसानी के डाकबंगले से हिमाच्छादित पर्वत शिखरों को देखने के बाद लेखक को किस बात की अनुभूति हो रही थी?
उत्तर:
लेखक ने हिमालय के शिखरों को देखा। उसको अपने माथे पर शीतलता की अनुभूति हो रही थी। उसकी समझ में आ रहा था कि पुराने ऋषि-मुनि हिमालय पर क्यों आते थे तथा यहाँ आने पर दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किस तरह नष्ट हो जाते थे। लेखक के सारे अन्तर्द्वन्द्व, सारे संघर्ष और सारे ताप इन शिखरों को देखकर मिट गए थे।

प्रश्न 13.
“अकस्मात् एक दूसरा तथ्य मेरे मन के क्षितिज पर उदित हुआ”? कौन-सा दूसरा प्रश्न लेखक के मन में उत्पन्न हुआ? इस प्रश्न का उत्तर क्या आप दे सकते हैं?
उत्तर:
अचानक लेखक के मन में विचार आया कि हिमालय पर जमी बर्फ कितनी पुरानी है। कुछ विदेशियों ने इसको चिरंतन हिम कहा है अर्थात् यह बहुत पुराने समय से हिमालय पर जमी है। लेखक सोच रहा था कि क्या कभी मनुष्यों ने इन शिखरों पर अपने पैर रखे हैं अथवा अनादि काल से हिमालय पर बर्फीले तूफान उठते रहे हैं? इस प्रश्न का उत्तर मैं नहीं दे सकता। मैं जानता हूँ कि संसार के समस्त पर्वतों में हिमालय पर्वत श्रृंखला नवीनतम है तथा अभी उसके निर्माण की प्रक्रिया चल ही रही है। तथापि यह मनुष्य जाति के धरती पर पदार्पण से भी अधिक पुरातन है।।

प्रश्न 14.
सूर्यास्त के समय हिम शिखरों पर कैसा दृश्य दिखाई दिया?
उत्तर:
सूरज डूबने लगा। उसकी पीली-पीली किरणें हिमालय पर पड़ रही थीं। धीरे-धीरे ग्लेशियरों के श्वेत हिम का रंग बदल रहा था। उनमें पीली केसर बहती प्रतीत हो रही थी। बर्फ का रंग सफेद से लाल हो गया था। उसमें लाल कमल खिले हुए प्रतीत हो रहे थे। पूरी घटी गहरे पीले रंग में रँग गई थी।

प्रश्न 15.
चन्द्रमा के प्रकाश में आरामकुर्सी पर बैठे हुए लेखक ने हिमालय से प्राप्त किस प्रेरणा का उल्लेख किया है?
उत्तर:
चन्द्रमा निकलने पर आरामकुर्सी पर बैठकर लेखक हिमालय के शिखरों को देख रहा था। उसके मन में कविता की कोई भी पंक्ति उत्पन्न नहीं हो रही थी। यह छोटी बात थी। वह हिमालय की महानता के बारे में सोच रहा था । हिमालय उसको ऊपर उठने और महान् बनने की प्रेरणा दे रहा था। वह उसे स्नेहभरी चुनौती दे रहा था- हिम्मत है तो मेरे समान ऊँचे उठो, महान बनो।

प्रश्न 16.
हिमालय को देखकर सबसे ज्यादा खुश कौन था? उसकी खुशी के बारे में बताइए।
उत्तर:
हिमालय को देखकर चित्रकार सेन सव्रसे ज्यादा खुश थी। वह बच्चों की तरह चंचल और चिड़ियों की तरह चहकता हुआ दिखाई दे रहा था। वह कवीन्द्र रवीन्द्र की कोई कविता गा रहा था। अकस्मात् वह शीर्षासन करने लगा। कहने लगा-‘सब जीनियस लोग शीर का बल खड़ा होकर दुनियाँ को देखता है। इसी से हम भी शीर का बल हिमालय देखता है।

प्रश्न 17.
दूसरे दिन लेखक ने किस स्थान की यात्रा की?
उत्तर:
दूसरे दिन लेखक सभी के साथ घाटी में उतरकर बारह मील दूर बैजनाथ पहुँचा। वहाँ गोमती नदी बहती थी। गोमती नदी की जलराशि अत्यन्त स्वच्छ थी। उसमें हिमालय पर्वत की बर्फ से ढंकी हुई चोटियों की छाया पड़ रही थी। लेखक ने पानी में बनी हिमालय की चोटियों को जी भरकर निहारा। वह उस दृश्य में डूबा रहा। उसने सोचा कि इन चोटियों पर कभी वह पहुँचेगा भी अथवा नहीं?

प्रश्न 18.
लेखक के मन में आज भी क्या पीर उठती है? वह उसको भुलाने के लिए क्या करता है?
उत्तर:
हिमालय की उन बर्फीली चोटियों की स्मृति आज भी जब लेखक को होती है तो उसका मन एक अज्ञात पीड़ा से भर उठता है। वह उस पीड़ा से मुक्ति चाहता है तो ठेले पर लदी हुई बर्फ की सिलों को देखकर अपना मन बहला लेता है। उनको देखकर हिमालय की बर्फ की याद ताजा कर लेता है। ठेले पर हिमालय’ कहकर वह हँसता है। उसकी यह हँसी उस पीड़ा को भुलाने का बहाना है।

प्रश्न 19.
लेखक ने तुलसी की पंक्ति ‘कबहुँक हों यहि रहनि रहौंगो’ का उल्लेख क्या भाव व्यक्त करने के लिए किया है?
उत्तर:
लेखक ने तुलसीदास की विनयपत्रिका के एक पद की पंक्ति कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो’ का उल्लेख किया है। तुलसी सांसारिक माया-मोह की लघुता से ऊपर उठकर हिमालय के समान उच्च संत-स्वभाव को धारण करना चाहते हैं। लेखक ने इस पंक्ति को उल्लेख करके हिमालय को उच्च मानवीय भावों की ओर बढ़ने का प्रेरणास्रोत बताया है।

प्रश्न 20.
वहीं मन रमता है-लेखक का मन कहाँ रमता है और क्यों? क्या आप भी लेखक के समान सोचते हैं?
उत्तर:
लेखक का मन हिमालय की ऊँची, श्वेत, पवित्र और बर्फ से ढकी हुई चोटियों में ही रमता है। ये चोटियाँ उच्च मानवीय गुणों तथा मनोभावों की सूचक हैं। संसार की क्षुद्र बातों में पड़कर अपना जीवन नष्ट करना लेखक को उचित नहीं लगता। वह मानव जीवन के पवित्र और उच्च लक्ष्य-श्रेष्ठ मानवीय गुणों-के साथ ही अपना जीवन बिताना चाहता है। मैं भी सोचता हूँ कि मनुष्य को छोटी-छोटी अर्थहीन बातों में समय नष्ट नहीं करना चाहिए। उसको उच्च मानवीय आदर्शों के लिए स्वयं को अर्पित कर देना चाहिए।

प्रश्न 21.
ठेले पर लदी बर्फ की सिल्लियाँ तथा हिमालय पर जमी बर्फ किनके प्रतीक हैं? आपको इनमें से क्या पसंद
उत्तर:
ठेले पर लदी बर्फ की सिल्लियाँ भौतिक जीवन तथा सांसारिक उलझनों का प्रतीक हैं। इसके विपरीत हिमालय की ऊँची पर्वत-श्रेणियों पर जमी बर्फ जीवन के श्रेष्ठ और उच्चतम आदर्शों की सूचक है। वह श्रेष्ठतम मानवीय गुणों और चेतना की व्यंजक हैं। मनुष्य होने के नाते मुझे इनमें से पश्चात्वर्ती अर्थात् हिमालय पर जमी बर्फ ही पसंद है। मैं उच्च मानवीय गुणों को अपनाकर ही जीना अच्छा समझता हूँ।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 14 ठेले पर हिमालय निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
लेखक और उसके मित्रों की कौसानी तक की यात्रा का वर्णन संक्षेप में कीजिए?
उत्तर:
लेखक और उसके मित्र कौसानी बर्फ देखने गए थे। नैनीताल, रानीखेत और मझकाली के भयानक मोड़ों को पार करके वे बस द्वारा कोसी पहुँचे। रास्ता कष्टप्रद, भयानक तथा सूखा था। कहीं हरियाली नहीं थी। ऊबड़-खाबड़ सड़क पर नौसिखिया ड्राइवर लापरवाही से बस चला रहा था। कोसी पहुँचने तक सबके चेहरे पीले पड़ गए थे। बस अल्मोड़ा जा रही थी। कौसानी के लिए कोसी से दूसरी बस मिलती थी। लेखक अपने एक साथी के साथ कोसी में ही बस से उतर गयो। दो घण्टे बाद आई दूसरी बस से शुक्ल जी तथा चित्रकार सेन उतरे। शुक्ल जी का चेहरा प्रफुल्लित था। उनको देखकर लेखक की भी सारी थकान दूर हो गई । सेन का स्वभाव अत्यन्त मधुर था। वह शीघ्र ही सबके साथ घुल-मिल गया। कोसी से चारों लोग कौसानी के लिए बस में सवार हुए। अब रास्ते का दृश्य बदला हुआ था। कल-कल करके बहती कोसी नदी, उसके किनारे स्थिर हरे-भरे खेत और सुन्दर गाँव आकर्षक लग रहे थे। रास्ते में अनेक बस-स्टेशन, डाकघर तथा चाय की दुकानें थीं। कोसी तथा उसमें मिलने वाले नदी-नालों के पुल थे तथा चीड़ के निर्जन वन भी थे। टेढ़ी-मेढ़ी कंकरीली सड़क पर बस धीरे-धीरे चल रही थी। वहाँ तक बर्फ के दर्शन नहीं हुए थे। अत: लेखक कुछ निराश और खिन्न था।

सोमेश्वर की घाटी के उत्तर में ऊँची पर्वतमाला के शिखर पर कौसानी बसा था। वह एक छोटा-सा गाँव-था। बस अड्डे पर उतरते ही अकस्मात् लेखक की निगाह कल्यूर की रंग-बिरंगी घाटी पर पड़ी। पचासों मील चौड़ी यह घाटी हरे-भरे खेतों, लाल-लाल रास्तों, नदियों आदि के कारण बहुत खूबसूरत लग रही थी। दूर घाटी के पार बादलों में हिमालय की बर्फीली चोटियाँ छिपी थीं। अचानक लेखक ने बादल छटने पर एक छोटे बर्फीले शिखर को देखा। वह प्रसन्नता से चिल्लाया -‘वह देखो बर्फ’। फिर सभी डाकबंगले में अपना सामान रखकर बिना चाय पिये ही बैठ गए और बादलों के हटने का इंतजार करने लगे। धीरे-धीरे बादल छैटे तो उनको हिम से ढंके हिमालय के दर्शन हुए।

प्रश्न 2.
यात्रा के दौरान लेखक की मनःस्थिति का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
लेखक अपने एक साथी के साथ नैनीताल से कौसानी के लिए बस से चला। उनको कोसी में उतरना था। वहाँ से शुक्ल जी को साथ लेकर कौसानी जाना था। कोसी तक का रास्ता बहुत ऊबड़-खाबड़, सूखा तथा कष्टप्रद था। बस का नौसिखिया ड्राइवर लापरवाही से बस चला रहा था। रास्ते में न पानी था, न हरियाली । लेखक तथा अन्य यात्रियों के चेहरे थकावट और परेशानी से पीले पड़े गए थे।

कोसी पहुँचने पर वे दोनों उतर गए। वहाँ शुक्ल जी तथा चित्रकार सेन उनसे मिले। वे सभी एक अन्य बस से कौसानी के लिए रवाना हुए। कोसी से 18 मील चले आने के बाद भी उनको बर्फ के दर्शन नहीं हुए थे। कौसानी यहाँ से छ: मील ही दूर था। लेखक से कौसानी की बड़ी तारीफ की गई थी। उसके मित्र ने उससे कहा था कि कौसानी कश्मीर से भी ज्यादा खूबसूरत है। गाँधी जी ने कहा था, कौसानी में स्विटजरलैंड का आभास मिलता है। परन्तु लेखक को कौसानी में प्राकृतिक सुन्दरता का कोई लक्षण दिखाई नहीं दे रहा था। अत: वह खिन्न हो उठा था। कौसानी के बस स्टैण्ड पर वह अन्यमनस्कता की मन:स्थिति में बस से उतरा। सहसा वहाँ कल्यूर की मनोरम घाटी को देखकर वह जड़वत् रह गया। यह घाटी अत्यन्त सुन्दर थी। उसके हरे-भरे खेत, गेरू की चट्टानों को काटकर बनाए गए लाल-लाल रास्ते, बहती हुई अनेक नदियाँ उसको अपूर्व मनोरमता प्रदान कर रहे थे। घाटी में दूर तक बादल छाये थे। उनके पीछे हिमालय छिपा हुआ था। सहसा उसको हिमालय की एक बर्फ से ढकी चोटी दिखाई दी। बर्फ देखने से वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसकी सारी थकान, असंतोष, खिन्नती और निराशा गायब हो गई। फिर बादल छंटने पर उनको बर्फ से ढंकी पर्वत श्रृंखला के दर्शन हुए। हिम-दर्शन की उनकी कामना, पूर्ण हो गई थी।

प्रश्न 3.
कौसानी की पर्वतमाला के अंचल में कौन-सी घाटी छिपी थी? उसके प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कौसानी की पर्वतमाला के अंचल में कल्यूर की रंग-बिरंगी घाटी छिपी थी। उसमें यह घाटी पचासों मील चौड़ी थी। अनेक हरे-भरे खेत, एक-दूसरे में मिलती अनेक नदियाँ, गेरू की चट्टानों से बने सफेद किनारों वाले रास्ते थे, जो उसकी सुन्दरता को बढ़ा रहे थे। यह घाटी इतनी सुन्दर, पवित्र और निष्कलंक थी कि लेखक का जी चाहा कि वह जूते उतारकर और अपने पैर पोंछकर उस पर कदम रखे। दूर क्षितिज के पास घाटी का सम्पूर्ण दृश्य नीले कोहरे में डूबा था। वहाँ लेखक को छोटे पर्वतों का आभास हुआ। इसके बाद बादल थे और कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

लेखक बादलों पर दृष्टि जमाये था कि सहसा उसको बादलों के हटने पर कुछ दिखाई दिया जो वहाँ अटल था। वह एक छोटे-से बादल के टुकड़े-सा कुछ था। उसका रंग सफेद, रूपहले तथा हल्के नीले रंग का मिश्रण था। लेखक ने सोचा, यह क्या है? फिर उसे ध्यान आया कि बादलों के पीछे हिमालय छिपा है। यह उसका एक छोटा बर्फ से ढंका शिखर है। यह देखकर वह प्रसन्नता से चिल्लाया-वह देखो बर्फ। बादल छंटने पर उसने देखा हिमालय की पूरी पर्वतमाला बर्फ से ढंकी थी और सुन्दर लग रही थी।

प्रश्न 4.
कौसानी में हिमाच्छादित पर्वत-शिखरों को देखने के बाद लेखक, शुक्ल जी तथा चित्रकार सेन की क्या दशा हुई? प्रत्येकं का वर्णन संक्षेप में कीजिए। यह भी बताइए कि यदि आप उनको देखते तो आपको कैसा लगता?
उत्तर:
लेखक हिम से ढंके पर्वत-शिखरों को देखने कौसानी गया था। उसके साथ उसका उपन्यासकार मित्र, शुक्ल जी तथा चित्रकार सेन भी थे। कौसानी पहुँचने के बाद उन्होंने विस्तृत सुन्दर कल्यूर की घाटी में क्षितिज के पास एक छोटी बर्फ से ढंकी पर्वत-श्रेणी को देखा। बादलों के एक क्षण हटने पर वे अनायास बहुत कम समय के लिए उसको देख सके। इस हिम दर्शन का लेखक, शुक्ल जी तथा सेन पर अलग-अलग तरह का प्रभाव पड़ा। उपन्यासकार मित्रे पर क्या प्रभाव हुआ, इसका उल्लेख इस लेख में नहीं है।

लेखक को हिम शिखरे को देखने के बाद हल्का-सा विस्मय हुआ। फिर यह निश्चय होने पर कि वह बर्फ ही थी, वह हर्षातिरेक से चिल्ला उठा। उसकी खिन्नता, निराशा तथा थकावट सब छूमंतर हो गई। वह व्याकुल हो उठा और उसका हृदय धड़कने लगा । शुक्ल जी पर इसका कोई उत्तेजक प्रभाव नहीं पड़ा। वह शांत रहे। वह लेखक की ओर देखकर मुस्करा रहे थे। चित्रकार सेन बहुत प्रसन्न था। वह बच्चों की तरह चंचल हो उठा था और चिड़ियों की तरह चहक रहा था। वह रवीन्द्र की कोई की पंक्ति गा रहा था। सहसा वह शीर्षासन करने लगा और कहने लगा –

‘हम शीर का बल हिमालय देखता है।’
यदि मैं लेखक के साथ होता तो हिम-दर्शन का आनन्द शांत चित्त से लेता तथा शुक्ल जी की तरह नियंत्रित रहकर प्रसन्न मुद्रा में हिमदर्शन करता।

प्रश्न 5.
हिमालय की शीतलता लेखक को कैसी प्रतीत हो रही थी? वह किन-किन तापों को नष्ट करने वाली थी?
अथवा
क्यों पुराने साधकों ने दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों को तापे कहा था और उसे शमित करने के लिए वे क्यों हिमालय जाते थे, यह पहली बार मेरी समझ में आ रहा था।” कौन-सी बात कब लेखक की समझ में आई?
उत्तर:
कौसानी पहुँचकर लेखक ने बर्फ से ढंकी हुई हिमालय की पर्वत श्रृंखला को देखा। उस समय उसके मन में क्या भावनाएँ उठ रही थीं; यह तो वह नहीं बता सकता किन्तु उसके माथे पर हिमालय की शीतलता की अनुभूति हो रही थी। उसके मन के सभी संघर्ष, ताप तथा अन्तर्द्वन्द्व नष्ट हो रहे थे।

लेखक को यह बात पहली बार समझ में आ रही थी कि पुराने ऋषि एवं मुनियों तपस्वियों ने दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों को ताप क्यों कहा है। वे उनको शांत करने के लिए हिमालय क्यों जाते थे। प्राचीन ऋषियों ने तीन तापों का उल्लेख किया है तथा उनको मनुष्य के लिए दु:खदायी बताया है। दैहिक ताप वे दुर्गुण हैं जिनका सम्बन्ध मनुष्य के शरीर से होता है। ईष्र्या, द्वेष, क्रोध, काम, परपीड़न इत्यादि दुर्गुण मनुष्य के मन (शरीर) में ही जन्म लेते हैं। हिमालय का शांत वातावरण उनके शमन में सहायक होता है। दैविक ताप पारलौकिक कष्ट हैं। तपस्वी उनके बारे में जानने और उनसे मुक्ति प्राप्त करने के लिए हिमालय को पावन भूमि पर ध्यानस्थ होते थे। भौतिक अर्थात् सांसारिक ताप शरीर से सम्बन्धित हैं। ये शारीरिक रोग भी हैं। हिमालय का प्रदूषण मुक्त निर्मल वातावरण तथा वहाँ की जड़ी-बूटियाँ रोग मुक्ति में सहायक होती थीं।।

प्रश्न 6.
आपकी दृष्टि में हिमालय हमारे लिए किस तरह उपयोगी है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
हिमालय भारत के उत्तर में स्थित है। भारतीय उपमहाद्वीप के निर्माण में हिमालय का बतुत बड़ा योगदान है। उससे निकलने वाली नदियों से उत्तर भारत के मैदान की रचना हुई है। इस भू-भाग से उत्पन्न धन-धान्य से इस क्षेत्र के मनुष्यों तथा जीव-जन्तुओं का पालन-पोषण होता है। हिमालय से निकलने वाली नदियों का जल पीने, सिंचाई करने तथा अन्य अनेक कामों में प्रयुक्त होता है। हिमालय तथा उससे निकलने वाली नदियों के आसपास घने वन हैं। उनमें अनेक जीव-जन्तु रहते हैं तथा उनसे लकड़ी, शहद, औषधियाँ आदि अनेक चीजें प्राप्त होती हैं, जिनकी हमारे लिए गहरी उपयोगिता है। हिमालय उत्तर से आने वाली शीतल हवाओं से हमको बचाता है तथा देश की जलवायु को मनुष्यों के रहने लायक बनाता है। हिमालय बहुत समय से उत्तरी सीमा पर एक प्रहरी की तरह खड़ा रहकर विदेशी आक्रमणकारियों से हमारी रक्षा करता रहा है।

हिमालय को देवताओं का स्थान कहा गया है। देवादिदेव महादेव शिव का आवास कैलाश हिमालय में ही स्थित है। यहाँ अनेक देवता निवास करते हैं। तपस्वी यहाँ आकर तपस्या करते हैं तथा सांसारिक बन्धनों से मुक्त होने से सफल होते हैं। वहाँ का शांत और निर्मल वातावरण मनुष्य के चित्त को निर्मल तथा निष्पाप बनाता है। इस प्रकार भौतिक जीवन में ही नहीं आध्यात्मिक जीवन में भी हिमालय हमारे लिए उपयोगी है।

प्रश्न 7.
हिमालय का महत्त्व प्रकट करते हुए बताइए कि उससे हमको क्या प्रेरणा प्राप्त होती है?
उत्तर:
हिमालय एक पर्वत ही नहीं हमारे लिए वह एक वरदान भी है। उसका हमारे लिए भौतिक ही नहीं आध्यात्मिक महत्त्व भी है। वह भारत की भूमि, सभ्यता तथा संस्कृति का जनक है।

हिमालय विश्व का सर्वोच्च शिखर है। हिमालय पर जमी श्वेत बर्फ मानव जीवन में स्वच्छता और पवित्रता की प्रेरक है। उसकी ऊँची चोटियाँ मनुष्य को अपने जीवन में ऊँचा उठने का आह्वान करती हैं। हिमालय कठोर झंझावातों के टकराने से भी विचलित नहीं होता और अडिग, अटल खड़ा रहकर उनको परास्त करता है। अपने इस स्वरूप से वह हमको प्रेरणा देता है कि हमें जीवन में आने वाली कठिनाइयों, प्रलोभनों, आतंक, भय आदि के सामने झुकें नहीं, उनसे निरन्तर संघर्ष करें और आगे बढ़ते रहें। हिमालय अपने स्वच्छ, पवित्र वातावरण द्वारा हमको पृथ्वी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कहता है। हिमालय की सतत् प्रवाहिनी नदियाँ हमको जीवन का संदेश देती हैं तथा निरन्तर चलते रहने के लिए प्रेरित करती हैं।

हिमालय हमको पुकारता है, चुनौती देता है और उत्साहित करता है कि डरो नहीं, झुको नहीं, रुको नहीं, निरन्तर आगे बढ़ो, संघर्ष करो और ऊँचे उठो।

ठेले पर हिमालय लेखक-परिचय

प्रश्न-
धर्मवीर भारती का जीवन-परिचय देकर उनकी साहित्य-सेवा पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
जीवन-परिचय-डॉ. धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसम्बर, सन् 1926 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुआ था। आपकी शिक्षा इलाहाबाद में ही हुई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आपने एम. ए. पीएच. डी. किया। आप कुछ समय ‘संगम’ के सम्पादक रहे। इसके पश्चात् इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में प्राध्यापक हो गए। सन् 1959 में आप ‘धर्मयुग’ के प्रधान सम्पादक बने। सन् 1972 में आपको भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से अलंकृत किया गया। सन् 1997 में आपका देहावसान हो गया।

साहित्यिक परिचय-डॉ. भारती विद्यार्थी जीवन से ही लेखन-कार्य करने लगे थे। कहानी, उपन्यास, नाटक, समीक्षा, निबन्ध आदि गद्य-विधाओं पर आपने कुशलतापूर्वक लेखनी चलाई है। आपने सम्पादक के रूप में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। आपके सम्पादक काल में ‘धर्मयुग’ की उत्तरोत्तर हुई उन्नति इसका प्रमाण है। आपकी भाषा परिमार्जित है, बोधगम्य है। आपकी भाषा तत्सम, तद्भव, उर्दू, अंग्रेजी, फारसी शब्दों तथा मुहावरों के कारण समृद्ध है। आपने वर्णनात्मक, भावात्मक, समीक्षात्मक, हास्यव्यंग्यात्मक आदि शैलियों का प्रयोग किया है।

कृतियाँ-डा. भारती की प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं:-

उपन्यास-गुनाहों का देवता, सूरज का सातवाँ घोड़ा, ग्यारह सपनों का देश। कहानी-संग्रह-चाँद और टूटे हुए लोग, बन्द गली का आखिरी मकान, गाँव, स्वर्ग और पृथ्वी। नाटक-एकांकी-नदी प्यासी थी, नीली झील। निबन्ध-कहनी-अनकहनी, ठेले पर हिमालय, पश्यन्ति। आलोचना-मानव मूल्य और साहित्य काव्य-ठंडा लोहा, कनुप्रिया, सात गीत वर्ष, अन्धायुग। सम्पादन-संगम, धर्मयुग। अनुवाद-देशान्तर।

ठेले पर हिमालय पाठ-सारांश

प्रश्न-‘ठेले पर हिमालय’ निबन्ध का सारांश लिखिए।
उत्तर-
परिचय–’ठेले पर हिमालय’ डॉ. धर्मवीर भारती के इसी शीर्षक निबन्ध संग्रह से लिया गया है। यह एक यात्रा वृत्तांत है। इसमें कौसानी की यात्रा तथा वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन हुआ है।

दिलचस्प शीर्षक-‘ठेले पर हिमालय’ एक दिलचस्प शीर्षक है। लेखक अपने एक उपन्यासकार मित्र के साथ पान की दुकान पर खड़ा था। वहाँ एक बर्फवाला बर्फ की सिल्लियाँ ठेले पर लादकर लाया। उन्हें देखकर उसके अल्मोड़ा निवासी मित्र ने कहा-बर्फ तो हिमालय की शोभा है। तभी अनायास लेखक को यह शीर्षक प्राप्त हो गया। बर्फ को देखकर लेखक के मन में अनेक विचार आए। उनके बारे में उसने अपने मित्र को भी बताया। यह सत्य है कि हिमाच्छादित हिमालय की शोभा अनुपम है तथा दूर से ही मनोहर लगती है।

कौसानी की माया-बर्फ को निकट से देखने के लिए लेखक कौसानी गया था। वह नैनीताल, रानीखेत, मझकोली होते हुए बस से कोसी पहुँचा। कोसी से एक सड़क अल्मोड़ा तथा दूसरी कौसानी जाती है। रास्ता सूखा, कुरूप और ऊबड़-खाबड़ था। बस का ड्राइवर नौसिखिया और लापरवाह था। उसके कारण यात्रियों के चेहरे पीले पड़ गए थे। बस अल्मोड़ा चली गई। लेखक अपने साथियों सहित कोसी उतर गया। वहाँ शुक्ल जी भी पहुंचे। वह एक उत्साही साथी थे। कौसानी जाने के लिए उन्होंने ही लेखक को उत्साहित किया था। उनके साथ एक दुबला-पतला व्यक्ति भी था। उसका नाम सेन था। वह चित्रकार था।

कोसी से कौसानी-बस कौसानी के लिए चल दी। कल-कल करती कोसी तट पर के छोटे-छोटे गाँव, मखमली खेत तथा सुन्दर सोमेश्वर घाटी थी। मार्ग सुन्दर और हरा-भरा था। परन्तु लेखक का मन निराश हो रहा था। वे लोग अट्ठारह मील चलकर कौसानी के पास पहुँच चुके थे। अभी भी कौसानी छ: मील दूर था। कौसानी की सुन्दरता के बारे में जैसा बताया गया था, वैसा कुछ भी देखने को नहीं मिला था, उसको कश्मीर से भी अधिक सुन्दर बताया गया था। लेखक ने अपने संशय के बारे में शुक्ल जी को बताया पर वह चुप थे। बस कौसानी के अड्डे पर रुकी। सोमेश्वर घाटी के उत्तर में पर्वत के शिखर पर छोटा-सा गाँव कौसानी बसा था। उसको देखकर लेखक को लगा कि उसको ठगा गया है।

घाटी का सौन्दर्य-लेखक अनमना-सा बस से उतरा किन्तु घाटी के सौन्दर्य को देखकर स्तब्ध रह गया। पर्वतीय अंचल में पचास मील चौड़ी कल्यूर की सुन्दर घाटी फैली थी। उसके मखमली खेत, शिलाओं को काटकर बनाए गए लाल-लाल रास्ते, उनके सफेद किनारे, उलझी हुई बेलों जैसी नदियाँ आकर्षक थीं। लेखक ने सोचा-यक्ष और किन्नर यहीं रहते होंगे। वह सौन्दर्य इतना निष्कलंक था कि लेखक ने सोचा कि जूते उतारकर पाँव पोंछकर ही धरती पर रखने चाहिए। दूर क्षितिज तक फैले खेत, वन, नदियों के बाद धुंधले नीले कोहरे में छोटे-छोटे पर्वत थे। उसके बाद बादल थे। धीरे-धीरे बादलों के हटने पर लेखक ने बर्फ को देखा। बादलों से एक छोटा-सा बर्फ से ढंका शिखर दिखाई दे रहा था। उसने प्रसन्नता के साथ चिल्लाकर कहा-बर्फ! वह देखो! शुक्ल जी, सेन सभी ने देखा, फिर वह लुप्त हो गया।

हिमदर्शन-हिमदर्शन से एक क्षण में लेखक की खिन्नता और थकावट दूर हो गई। वे सब व्याकुल हो उठे। वे सोच रहे थे कि बादलों के छटने पर हिमालय का अनावृत्त सौन्दर्य उनके सामने होगा। शुक्ल जी शांत थे। जैसे मुस्कराकर कह रहे हों-बड़े अधीर हो रहे थे, देखा यहाँ का जादू? सामान डांक बँगले में रखकर बिना चाय पिये ही सब बरामदे में बैठे रहे। धीरे-धीरे बादल छंटने लगे। एक-एक करके नए बर्फ से ढंके पर्वत शिखर दिखाई देने लगे। फिर सब कुछ खुल गया। बाईं ओर से दाईं ओर जाती हिमशिखरों की ऊबड़-खाबड़, रहस्यमयी, रोमांचक श्रृंखला दिखाई दे रही थी। हिमालय की शीतलता माथे को छू रही थी तथा सारे संघर्ष, सारे अन्तर्द्वन्द्व, सारे ताप नष्ट हो रहे थे। तब समझ आया कि पुराने साधकों ने दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों का ताप क्यों कहा था तथा उनसे मुक्त होने वे हिमालय पर क्यों जाते थे। यह बर्फ अत्यन्त पुरानी है। विदेशियों ने इसको चिरंतन हिम अर्थात् एटर्नल स्नो कहा है। सूरज ढलने लगा था। उसके प्रकाश में सुदूर शिखरों के दर्रे, ग्लेशियर, जल, घाटियाँ आदि दिखाई दे रही थीं। लेखक सोच रहा था कि वे सदैव बर्फ से ढके रहे हैं या कभी मनुष्य के पैर भी वहाँ पड़े हैं। डूबते सूर्य के प्रकाश में ग्लेशियर और घाटियाँ पीली हो गई थीं। लेखक और उसके साथी उठे और हाथ मुँह-धोकर चाय पीने लगे।

कुछ समय बाद चाँद निकला चारों तरफ शांति थी। लेखक आरामकुर्सी पर बैठा था। वह सोच रहा था कि उसका मन कल्पनाहीन क्यों हो गया है। हिमालय बड़े भाई की तरह ऊपर चढ़कर उसे उत्साहित कर रहा है-हिम्मत है! ऊँचे उठोगे!। तभी सेन रवीन्द्र की कोई पंक्ति गा उठा। वह बहुत प्रसन्न था। वह शीर्षासन कर रहा था। कह रहा था- हम सिर के बल खड़े होकर हिमालय देखेंगे। अगले दिन हम बारह मील चलकर बैजनाथ पहुंचे। यहाँ गोमती नदी बहती है। उसके जल में हिमालय की छाया तैर रही थी। ठेले पर बर्फ देखकर लेखक के मित्र हिमालय की स्मृतियों में डूब गए थे। लेखक उनके मन के दर्द को समझता है। हिमालय के शिखरों पर जमी बर्फ बार-बार बुलाती है। लेखक उनको लौटकर आने का वचन देता है। उन्हीं ऊँचाइयों पर उसका आवास है। उसका मन वहीं रमता है।

ठेले पर हिमालय महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्याएँ

1. ‘ठेले पर हिमालय’-खासा दिलचस्प शीर्षक है न। और यकीन कीजिए, इसे बिलकल ढूँढ़ना नहीं पड़ा। बैठे-बिठाये मिल गया। अभी कल की बात है, एक पान की दुकान पर मैं अपने एक गुरुजन उपन्यासकार मित्र के साथ खड़ा था कि ठेले पर बर्फ की सिलें लादे हुए बर्फ वाला आया। ठण्डे, चिकने चमकते बर्फ से भाप उड़ रही थी। मेरे मित्र का जन्म-स्थान अल्मोड़ा है, वे क्षण-भर उस बर्फ को देखते रहे, उठती हुई भाप में खोए रहे और खोए-खोए से ही बोले, ‘यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है।’ और तत्काल शीर्षक मेरे मन में कौंध गया, ठेले पर हिमालय’। पर आपको इसलिए बता रहा हूँ कि अगर आप नए कवि हों तो भाई, इसे ले जायें और इस शीर्षक पर दो-तीन सौ पंक्तियाँ, बेडौल, बेतुकी लिख डालें-शीर्षक मौजूं है, और अगर नई कविता से नाराज हों, सुललित गीतकार हों तो भी गुंजाइश है, इस बर्फ को डाँटें, उतर आओ। ऊँचे शिखर पर बन्दरों की तरह क्यों चढ़े बैठे हो? ओ नये कवियो! ठेले पर लदो। पान की दुकानों पर बिको। (पृष्ठ सं. 65-66)

कठिन शब्दार्थ-दिलचस्प = आकर्षक। शीर्षक = नाम। बैठे-बिठाये = अनायास। खोए रहे = तल्लीन। कौंधना = चमकना, दिखाई देना। नए कवि = नई कविता की रचना करने वाला। बेडौल-बेतुकी = प्रभावहीन। गुंजाइश = संभावना। शिखर = पर्वत की चोटी।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक निबन्ध से उद्धृत है। इसके लेखक डॉ. धर्मवीर भारती हैं।

डॉ. भारती ने देखा कि एक विक्रेता बर्फ की सिल्लियाँ ठेले पर लादकर लाया। उनमें से भाप निकल रही थी। लेखक के एक अल्मोड़ा निवासी उपन्यासकार मित्र को उनको देखकर हिमालय की बर्फीली चोटियों की याद आ गई।

व्याख्या-लेखक कहता है कि उसने अपने यात्रा वृत्तान्त का नाम रखा- ‘टेले पर हिमालय’। यह अत्यन्त आकर्षक शीर्षक है। इस शीर्षक को तलाश नहीं करना पड़ा। उनको यह अनायास ही प्राप्त हो गया। एक दिन लेखक एक पान की दुकान पर अपने उपन्यासकार मित्र के साथ खड़ा था। उसी समय ठेले पर बर्फ की सिल्लियाँ लादे एक बर्फ बेचने वाला आया। मित्र ने बर्फ से उठती भाप को देखा। वह उसे देखने में लीन था। उसके मन में हिमालय के शिखर पर जमी बर्फ की याद थी। उसने कहा कि यही बर्फ हिमालय की सुन्दरता है। तुरन्त लेखक के मन में शीर्षक प्रकट हुआ ‘ठेले पर हिमालय’। लेखक इन बातों को इस कारण बताना चाहता है कि श्रोता/पाठक यदि नई कविता’ का कवि है तो इस शीर्षक पर दो-तीन सौ उल्टी-सीधी कविता की पंक्तियाँ लिख सकता है। यदि उसको नई कविता नापसंद हो और वह सुन्दर गीतों की रचना करने वाला गीतकार हो तो अपने गीत में वह इस बर्फ से सीधा संवाद कर सकता है। वह इसको डाँटकर कह सकता है कि वह हिमालय के ऊँचे शिखर पर चढ़कर बन्दरों की तरह क्यों बैठी है। नीचे उतर आए। वह कहता है कि हे नये कवियो ! ठेले पर लदो और पान की दुकान पर बिको।

विशेष-
(i) लेखक ने बताया है कि ठेले पर लदी बर्फ की सिल्लियाँ देखकर लेखक के मित्र को हिमालय की आकर्षक हिम याद आई।
(ii) हिमालय की शोभा उसकी धवल, शीतल बर्फ है।
(iii) भाषा सरल तथा प्रवाहपूर्ण है।
(iv) शैली विनोद तथा व्यंग्यपूर्ण है।

2. ये तमाम बातें उसी समय मेरे मन में आयीं और मैंने अपने गुरुजन मित्र को बतायीं भी। वे हँसे भी, पर मुझे लगा कि वह बर्फ कहीं उनके मन को खरोंच गई है और ईमान की बात यह है कि जिसने 50 मील दूर से भी बादलों के बीच नीले आकाश में हिमालय की शिखर-रेखा को चाँद-तारों से बात करते देखा है, चाँदनी में उजली बर्फ को धुंधली हलके नीले जल में दूधिया समुद्र की तरह मचलते और जगमगाते देखा है, उसके मन पर हिमालय की बर्फ एक ऐसी खरोंच छोड़ जाती है जो हर बार याद आने पर पिरा उठती है। मैं जानता हूँ, क्योंकि वह बर्फ मैंने भी देखी है। (पृष्ठ सं. 66)

कठिन-शब्दार्थ-तमाम = सभी। खरोंच = चुभन। ईमान = धर्म, सच्चाई। शिखर = रेखा-चोटी का क्षेत्र। धुंधली = अस्पष्ट। दूधिया = सफेद। पिरा उठना = टीस पैदा होना।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक निबन्ध (यात्रावृत्त) से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. धर्मवीर भारती हैं। लेखक कह रहा है कि हिमालय की बर्फ का आकर्षण अत्यन्त प्रबल है। उसकी स्मृति दर्शक के मन में सदा रहती है। उससे दूर होने की एक टीस, एक चुभन उसके मन में बनी रहती है। लेखक के गुरुजन मित्र के मन में जो चुभन है, उससे लेखक परिचित है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि ठेले पर लदी बर्फ की सिल्लियाँ देखकर उसके मित्र ने उसको हिमालय की शोभा कहा तो तत्काल लेखक को ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक सूझ गया। फिर उसने उसके बारे में तरह-तरह की बातें सोची। जो बातें उसके मन में आईं वे सभी उसने अपने गुरुजन मित्र को बताईं। सुनकर वे हँसे किन्तु लेखक को लगा कि वह बर्फ उनके मन में कहीं चुभ गई है। जिसने पचास मील दूर से भी नीले आकाश में चन्द्रमा और तारों के प्रकाश में हिमालय के शिखरों पर जमी सफेद बर्फ को झिलमिलाते देखा हो तथा उसको चाँदनी में हलके नीले जल में दूध के समान सफेद समुद्र की तरह मचलते और जगमगाते देखा है, उसके मन पर हिमालय की बर्फ की एक खरोंच बनी रह जाती है। जब भी उसको हिमालय की बर्फ याद आती है तो उसके मन में एक टीस उठती है। यह एक सच्चाई है। लेखक कहता है कि वह इस सच्चाई से अपरिचित नहीं है, क्योंकि उसने इस बर्फ को स्वयं देखा है।

विशेष-
(i) हिमालय की बर्फ लेखक को आकर्षित करती है। याद आने पर वह उसके मन में टीस उत्पन्न करती है।
(ii) लेखक ने हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन किया है।
(iii) भाषा सरल तथा प्रवाहपूर्ण है।
(iv) शैली वर्णनात्मक तथा विवेचनात्मक है।

3. अनखाते हुए बस से उतरा कि जहाँ था वहीं पत्थर की मूर्ति-सा स्तब्ध खड़ा रह गया। कितना अपार सौंदर्य बिखरा था सामने की घाटी में। इस कौसानी की पर्वतमाला ने अपने अंचल में यह जो कल्यूर की रंग-बिरंगी घाटी छिपा रखी है, इसमें किन्नर और यक्ष ही तो वास करते होंगे। पचासों मील चौड़ी यह घाटी, हरे मखमली कालीनों जैसे खेत, सुंदर गेरू की शिलाएँ काटकर बने हुए लाल-लाल रास्ते, जिनके किनारे सफेद-सफेद पत्थरों की कतार और इधर-उधर से आकर आपस में उलझा जाने वाली बेलों की लड़ियों-सी नदियाँ। मन में बेसाख्ता यही आया कि इन बेलों की लड़ियों को उठाकर कलाई में लपेट लूँ, आँखों से लगा लूँ। अकस्मात् हम एक दूसरे लोक में चले आए थे। इतना सुकुमार, इतना सुंदर, इतना सजा हुआ और इतना निष्कलंक कि लगा इस धरती पर तो जूते उतारकर, पाँव पोंछकर आगे बढ़ना चाहिए। (पृष्ठ सं. 67)

कठिन शब्दार्थ-अनखाते हुए = अन्यमनस्क होते हुए। स्तब्ध = क्षुब्ध होते हुए गतिहीन। किन्नर और यक्ष = जनजातियों की दो पुरानी प्रजातियाँ। कतार = पंक्ति। लड़ियाँ — पंक्तियाँ। लोक – संसार। निष्कलंक — पवित्र। बेसाख्ता = यकायक।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. धर्मवीर भारती है। कुछ साथियों के साथ लेखक हिमदर्शन के लिए कौसानी जा रहा था। उसने कौसानी की प्राकृतिक सुन्दरता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी। कोसी से बस चली तो वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था। इस कारण लेखक खिन्न था! वहाँ बर्फ का नामोनिशान भी नहीं था।

व्याख्या-लेखक कहता है कि वह बस से उतरा तो अत्यन्त खिन्न था। लेकिन सामने की घाटी में उसकी दृष्टि पड़ी तो देखा-वहाँ अपार प्राकृतिक सौन्दर्य भरा पड़ा था। कौसानी की पर्वत श्रेणी के बीच कल्यूर की तरह-तरह के रंगों से सुशोभित घाटी छिपी थी! लेखक ने सोचा कि प्राचीन-काल में इस घाटी में यक्ष और किन्नर नामक जनजातियों के लोग रहते होंगे। यह घाटी पचासों मील चौड़ी है। इसमें मखमल जैसे हरे-भरे खेत हैं, गेरू की सुन्दर चट्टानों को काटने से बने इसके रास्ते लाल हैं। इन रास्तों के किनारों पर पत्थरों की सफेद पंक्तियाँ हैं। इस घाटी में अनेक नदियाँ हैं जो इधर-उधर से आकर आपस में मिलती हैं। जैसे अनेक लतायें एक दूसरे से लिपट जाती हैं। लेखक ने अनायास सोचा कि वह इनको उठाये और अपनी कलाई में लपेट ले अथवा अपनी आँखों से लगा ले। अचानक लेखक इस संसार के बाहर किसी अन्य दुनियाँ में जा पहुँचा था। वह संसार इतना अधिक कोमल, सुन्दर, सुसज्जित और पवित्र था कि लेखक का मन हो रहा था। कि अपने जूते उतार ले और पैरों को पोंछकर ही उस भूमि पर पैर रखे।

विशेष-
(i) लेखक कौसानी की घाटी की सुन्दरता का वर्णन किया है।
(ii) कौसानी की प्राकृतिक सुषमा लेखक को मुग्ध कर रही थी।
(iii) भाषा में तत्सम शब्दों के साथ उर्दू के शब्द भी हैं।
(iv) शैली वर्णनात्मक तथा चित्रात्मक है।

4. पर उस एक क्षण के हिम दर्शन ने हममें जाने क्या भर दिया था। सारी खिन्नता, निराशा, थकावट सब छुमन्तर हो गई। हम सब आकुल हो उठे। अभी ये बादल छंट जायेंगे और फिर हिमालय हमारे सामने खड़ा होगा-निरावृत्त… असीम सौंदर्यराशि हमारे सामने अभी-अभी अपना यूँघट धीरे से खिसका देगी और… और तब? और तब? सचमुच मेरा दिल बुरी तरह धड़क रहा था। शुक्ल जी शांत थे, केवल मेरी ओर देखकर कभी-कभी मुस्करा देते थे, जिसका अभिप्राय था, ‘इतने अध पीर थे, कौसानी आया भी नहीं और मुँह लटका लिया। अब समझे यहाँ का जादू?
(पृष्ठ सं. 67-68)

कठिन शब्दार्थ-हिम-दर्शन = बर्फ देखना। खिन्नता = अन्यमनस्कता। छू-मंतर होना = गायब हो जाना। निरावृत्त = बेपर्दा, आवरणरहित। सौन्दर्य राशि = अपार सुन्दरता। चूँघट = पर्दा। दिल बुरी तरह धड़कना = जिज्ञासा से व्याकुल होना। अभिप्राय = आशय। मुँह लटकाना = दु:खी होना, बेचैन होना। जादू = प्रभाव।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक निबन्ध (यात्रावृत्त) से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. धर्मवीर भारती हैं।

लेखक अपने कुछ मित्रों के साथ कौसानी के पर्यटन के लिए गया था। कौसानी की घाटी हिमालय की पर्वत श्रेणियों में स्थित थी। वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य अत्यन्त आकर्षक तथा पवित्र था। वहाँ उसने हिमालय की बर्फ को देखा। बादलों के हटने पर उसने उस बर्फ को देखा। यद्यपि उसको देखने का अवसर लेखक को थोड़े से समय के लिए ही मिला था। इसके बावजूद उसका मन प्रसन्नता से भर गया था। कुछ समय पहले उसमें जो निराशा, थकान और व्याकुलता थी, वह एक क्षण को बर्फ में देखने से दूर हो गई थी। अब उसके मन में यह व्याकुलता थी कि अभी थोड़ी देर में बादल हट जायेंगे और हिमालय उसको साफ-सार्फ दिखाई देगा। उसके ऊपर बादलों का पर्दा नहीं होगा। हिमालय का अपार सौन्दर्य उसके नेत्रों के सामने खुल जायेगा। इसके बाद उसको कैसा लगेगा-यह सोच-सोच कर वह बेचैन हो रहा था। शुक्ल जी शांत बैठे थे। वह कभी-कभी लेखक की ओर देखकर मुस्करा उठते थे। कौसानी आने से पहले लेखक बहुत खिन्न था। वह सोच रहा था कि कौसानी को सुन्दर बताकर उसको ठगा गया है। शुक्ल जी की मुस्कान इसी ओर इंगित कर रही थी। मानो वह कह रही थी-कौसानी पहुँचने से पहले ही तुम व्याकुल हो गए, उदास हो गए। देखा, कौसानी कितना सुन्दर और आकर्षक है!

विशेष-
(i) कौसानी का अप्रतिम प्राकृतिक सौन्दर्य दर्शक को मुग्ध कर देता है।
(ii) हिमदर्शन ने लेखक के मन की खिन्नता और निराशा दूर कर दी थी।
(iii) भाषा सरल, मुहावरेदार और प्रवाहपूर्ण है।
(iv) शैली वर्णनात्मक है।

5. सिर्फ एक धुंधला-सा संवेदन इसका अवश्य था कि जैसे बर्फ की सिल के सामने खड़े होने पर मुंह पर ठण्डी-ठण्डी भाप लगती है, वैसे ही हिमालय की शीतलता माथे को छू रही है और सारे संघर्ष, सारे अंतर्द्वन्द्व, सारे ताप जैसे नष्ट हो रहे हैं। क्यों पुराने साधकों ने दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों को ताप कहा था और उसे शमित करने के लिए वे क्यों हिमालय जाते थे यह पहली बार मेरी समझ में आ रहा था। और अकस्मात् एक दूसरा तथ्य मेरे मन के क्षितिज पर उदित हुआ। कितनी-कितनी पुरानी है यह हिमराशि! जाने किस आदिम काल से यह शाश्वत अविनाशी हिम इन शिखरों पर जमा हुआ है। कछ विदेशियों ने इसीलिए हिमालय की इस बर्फ को कहा है-चिरंतन हिम (एटर्नल स्नो)। सूरज ढल रहा था और सुदूर शिखरों पर दरे, ग्लेशियर, ढाल, घाटियों का क्षीण आभास मिलने लगा था। आतंकित मन से मैंने यह सोचा था कि पता नहीं इन पर कभी मनुष्य का चरण पड़ा भी है या नहीं या अनंत काल से इन सूने बर्फ ढंके दरों में सिर्फ बर्फ के अंधड़ा-ह करते हुए बहते रहे हैं। (पृष्ठ सं. 68)

कठिन शब्दार्थ-संवेदन = अनुभूति। अन्तर्द्वन्द्व = मन में स्थित परस्पर विरोधी विचार। ताप = गर्मी, दुःख। साधक = तपस्वी, ऋषि। दैहिक = शरीर सम्बन्धी। दैविक = दैव (भाग्य) सम्बन्धी। भौतिक = सांसारिक। शमित = शांत। तथ्य = सच्चाई। अकस्मात = अचानक। क्षितिज = वह स्थान जहाँ पृथ्वी और आकाश मिलते हुए प्रतीत होते हैं, परदा। उदित = प्रगट। आदिम = अत्यन्त प्राचीन। शाश्वत = अमर। अविनाशी = कभी न मिटने वाली। चिरंतन = सदा स्थायी। आतंकित = भयभीत। अंधड़ = आँधी, तूफान।।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक धर्मवीर भारती हैं। लेखक तथा उसके साथियों ने डाकबंगले में अपना सामान रख दिया और बरामदे में बैठकर एकटक पर्वत शिखरों की ओर देखते रहे। उनके मन में तरह-तरह की भावनायें उत्पन्न हो रही थीं।

व्याख्या-लेखक कहता है कि मन में उठने वाली भावनाओं को बता पाना संभव नहीं था। जिस प्रकार बर्फ की सिल के पास खड़े होने पर उसकी ठण्डी भाप मुँह पर लगती है, उसी तरह हिमालय का ठंडापन उनके माथे पर पड़ रहा था। उसकी अस्पष्ट अनुभूति हो रही थी। हिमालय की शीतलता के प्रभाव से उसके मन के सभी कष्ट, संघर्ष और अनिश्चय मिटते जा रहे थे। यहाँ आकर लेखक को पहली बार यह बात समझ में आई कि पुराने तपस्वी, ऋषि-मुनि हिमालय पर इसी कारण आते थे। उन्होंने मनुष्य के तीन तरह के कष्टों का उल्लेख किया है-शारीरिक, आत्मिक तथा सांसारिक। हिमालय में उनके इन कष्टों, जिनको उन्होंने ताप कहा है, को दूर करने की शक्ति है। इन कष्टों से मुक्त होने के लिए ही वे हिमालय पर जाते थे। किन्तु अचानक एक अन्य सच्चाई उसके मन के क्षितिज जैसे पर्दे पर प्रकट हुई। उसने सोचा-यह बर्फ कितनी पुरानी है। दूरवर्ती अनादि काल से यह अमर, कभी नष्ट न होने वाली बर्फ हिमालय की चोटियों पर जमी है। इसी विशेषता के कारण कुछ विदेशियों ने इस बर्फ को ‘एटर्नल स्नो’ अर्थात् सदा जमी रहने वाली बर्फ कहा है। सूरज अस्त होने वाला था। उसके धुंधले प्रकाश में दूरवर्ती पर्वत-चोटियों पर दर्रे, ग्लेशियर, ढाल और घाटियाँ अस्पष्ट दिखाई दे रही थीं। कुछ भयभीत होकर लेखक ने सोचा कि क्या कभी मनुष्य के पैर इन बर्फीले प्रदेशों पर पड़े हैं? अथवा सदा से ही यहाँ बर्फ के तूफान भयानक आवाज करते हुए आते रहे हैं?

विशेष-
(i) हिमालय को देखकर लेखक विचारमग्न हो गया।
(ii) उसने अनुभव किया कि पुराने कवियों का हिमालय के प्रति आकर्षण क्यों था।
(iii) भाषा तत्सम शब्द प्रधान है।
(iv) शैली वर्णनात्मक व विचारात्मक है।

6. थोड़ी देर में चाँद निकला और हम फिर बाहर निकले…. इस बार सब शांत था। जैसे हिम सो रहा हो। मैं थोड़ा अलग आरामकुर्सी खींचकर बैठ गया। यह मेरा मन इतना कल्पनाहीन क्यों हो गया है? इसी हिमालय को देखकर किसने-किसने क्या-क्या नहीं लिखा और यह मेरा मन है कि एक कविता तो दूर, एक पंक्ति, हाय, एक शब्द भी तो नहीं जानता। पर कुछ नहीं, यह सब कितना छोटा लग रहा है इस हिमसम्राट के समक्ष। पर धीरे-धीरे लगा कि मन के अंदर भी बादल थे जो छुट रहे हैं। कुछ ऐसा उभर रहा है जो इन शिखरों की ही प्रकृति का है…. कुछ ऐसा जो इसी ऊँचाई पर उठने की चेष्टा कर रहा है ताकि इनसे इन्हीं के स्तर पर मिल सके। लगा, यह हिमालय बड़े भाई की तरह ऊपर चढ़ गया है, और मुझे-छोटे भाई को-नीचे खड़ा हुआ, कुंठित और लज्जित देखकर थोड़ा उत्साहित भी कर रहा है, स्नेह भरी चुनौती भी दे रहा है-हिम्मत है? ऊँचे उठोगे? (पृष्ठ सं. 68)

कठिन शब्दार्थ-हिम-सम्राट = बर्फ का शासक। बादल छंटना = अवरोध दूर होना। उभरना = ऊपर निकलना, प्रकट होना। प्रकृति = स्वभाव। चेष्टा = प्रयत्न। ताकि = जिससे। स्तर = तल, समानता। कुंठित = उत्साहहीन।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक यात्रावृत्तान्त से उद्धृत है। इसके लेखक धर्मवीर भारती हैं।

सूर्यास्त होने पर लेखक और अन्य सभी डाकबंगले के बरामदे से उठे और चाय आदि पीने में लग गए। अँधेरा होने के कारण बाहर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। पर्वत के शिखर भी अँधेरे में डूबे हुए थे।

व्याख्या-लेखक कहता है कि थोड़ी देर के पश्चात् आकाश में चन्द्रमा उदय हुआ। उसकी चाँदनी फैल गई तो सभी लोग पुनः बाहर आ गए। इस समय सब जगह शांति फैली हुई थी। ऐसा लग रहा था जैसे बर्फ को भी नींद आ गई थी। लेखक ने आरामकुर्सी उठाई और कुछ दूर हटकर बैठ गया। वह सोचने लगा कि हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य को देखकर भी उसके मन में भाव क्यों नहीं उठ नहीं रहे हैं? वह कल्पना-शून्य क्यों हो गया था। इसी हिमालय को देखकर अनेक कवियों ने अनेक कविताएँ लिखी हैं। किन्तु लेखक का मन कविता की एक लाइन तो क्या एक शब्द भी लिखने में असमर्थ था। लेखक विचार कर रहा था कि कविता न लिख पाना बड़े महत्त्व की बात नहीं थी। हिमालय की विशालता के सामने सब कुछ छोटा प्रतीत हो रहा था। धीरे-धीरे लेखक का मन विचार-शून्यता से मुक्त होने लगा। हिमालय की ऊँची पर्वत-श्रेणियों के स्वभाव के अनुरूप ही उसके मन में कुछ भव्य भाव उत्पन्न हो रहे थे। इन भावों में कुछ ऐसा था जो उसको हिम-शिखरों की ऊँचाई तक उठाने का प्रयत्न कर रहा था। जिससे वह उन शिखरों के साथ समानता के भाव के साथ मिल सके। लेखक को ऐसा लग रहा था कि हिमालय बड़ा भाई है। वह ऊपर चढ़ गया है। वह अपने छोटे भाई लेखक को नीचे, उत्साहहीन तथा लज्जित खड़े देखकर उसका उत्साह बढ़ा रहा है। वह प्रेमपूर्वक उसको ललकार रहा है कि क्या वह भी ऊँचा और श्रेष्ठ बन सकता है।

विशेष-
(i) डाकबंगले के बरामदे में बैठा लेखक विचारमग्न है।
(ii) लेखक के मन को हिमालय से प्रेरणा मिल रही है कि वह उच्च तथा महान बने।
(iii) भाषा सरल तथा विषयानुकूल है।
(iv) शैली भावात्मक है।

7. वे बर्फ की ऊँचाइयाँ बार-बार बुलाती हैं, और हम हैं कि चौराहों पर खड़े, ठेले पर लदकर निकलने वाली बर्फ को ही देखकर मन बहला लेते हैं। किसी ऐसे ही क्षण में, ऐसे ही ठेलों पर लदे हिमालयों से घिरकर ही तो तुलसी ने नहीं कहा था … कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो…. मैं क्या कभी ऐसे भी रह सकूँगा वास्तविक हिमशिखरों की ऊँचाइयों पर? और तब मन में आता है कि फिर हिमालय को किसी के हाथ संदेशा भेज दूँ…. नहीं बंधु… आऊँगा। मैं फिर-लौट-लौट कर वहीं आऊँगा। उन्हीं ऊँचाइयों पर तो मेरा आवास है। वहीं मन रमता है… मैं करूँ तो क्या करूँ? (पृष्ठ सं. 69)

कठिन शब्दार्थ-बर्फ की ऊँचाइयाँ = हिमालय के बर्फ से ढके उन्नत शिखर। रहनि = जीवन। मन रमना = मन लगना।

सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक यात्रा वृत्तान्त से उद्धृत है। इसके रचयिता डा. धर्मवीर भारती हैं।

लेखक कहता है कि जब उसको कौसानी के हिमावृत्त शिखरों की याद आती है तो उसके मन में एक तरह की पीड़ा जन्म लेती है। एक दिन पूर्व उसके उपन्यासकार मित्र ने ठेले पर लदी बर्फ की सिलों को देखा था तो हिमालय के हिम को स्मरण करके उनका मन भी दर्द से भर उठा था। लेखक उनके मन की पीड़ा को समझता है। वह बर्फ की उन सिलों को ‘ठेले पर हिमालय’ कहकर हँसता है। उसकी यह हँसी उस दर्द को भुलाने का एक बहाना है।

व्याख्या-लेखक बता रहा है कि हिमालय के बर्फ से ढंके शिखर लोगों को बार-बार बुलाते हैं। किन्तु वे वहाँ न जाकर चौराहे पर खड़े ठेले पर लदी हुई बर्फ की शिलाओं को देखकर ही प्रसन्न हो जाते हैं। कभी महाकवि तुलसीदास भी ऐसे ही ठेले पर लदे हिमालयों से घिर गए थे अर्थात् सांसारिक मोह-माया ने उनको अपने आकर्षण में जकड़ लिया था। उस समय उनसे मुक्त होने का विचार उनके मन में प्रकट हुआ था और उन्होंने प्रार्थना की थी कि वह भगवान राम की कृपा से इस मोह-माया से मुक्त जीवन जीने का अवसर पायेंगे। लेखक सोच रहा है कि क्या वह भी इसी तरह वास्तविक हिम शिखरों की ऊँचाइयों पर रह सकेगा? आशय यह है कि वह जीवन के चिरंतन सत्य को जान सकेगा? वास्तविक उन्नत जीवन की कामना से प्रेरित होकर हिमालय के पास संदेश भेजना चाहता है कि वह पुनः उसके पास आयेगा। वह हिमालय को स्वयं को आने का विश्वास दिलाता है। वह कहता है कि वह बार-बार वहीं आएगा। उसका विश्वास उन ऊँचाइयों पर ही है, उसका मन वहीं लगता है। वह अपने मन को रोकने में असमर्थ है।

विशेष-
(i) हिमालय के श्वेत हिम से ढंके शिखरों के बहाने लेखक श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा दे रहा है।
(ii) तुलसीदास भी संसार के मोह से मुक्त होकर श्रेष्ठ और पवित्र जीवन जीना चाहते थे।
(iii) भाषा सरल है तथा विषयानुरूप भव्य है।
(iv) शैली भावात्मक है।