RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 15  पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 15 तौलिये वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
‘स्वच्छता बुरी नहीं, पर तुम तो हर चीज को सनक की हद तक पहुँचा देती हो, और सनक से मुझे चिढ़ है।’ यह किसने, किससे कहा-
(क) मधु ने मंगला से
(ख) मधु ने बसन्त से
(ग) बसन्त ने मधु से
(घ) मधु ने सुरा से
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 2.
सुरो और चिन्ती कौन थीं –
(क) मधु की पड़ोसन
(ख) मधु की सहेलियाँ
(ग) मधु की ननद
(घ) मंगला की बहन
उत्तर:
(ख)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 15 तौलिये अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उषी और निम्मो से किसे चिढ़ थी? उत्तर-मधु को उषी और निम्मो से चिढ़ थी।

प्रश्न 2.
बसन्त-मधु की नोंकझोंक के दरमियान फोन पर साहब ने बसन्त को क्या आदेश दिया?
उत्तर:
बसन्त-मधु की नोंक-झोंक चल रही थी तभी साहब का फोन आया। उन्होंने बसन्त को तुरन्त बनारस जाने का आदेश दिया।

प्रश्न 3.
सुरो और चिन्ती दिल्ली में कहाँ ठहरी थीं?
उत्तर:
सुरो और चिन्ती दिल्ली में कनाट प्लेस पर मलिक चाचा के यहाँ ठहरी थीं।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 15 तौलिये लघूत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चूहा सैदनशाह के लोगों की तन्दुरुस्ती का राज क्या था?
उत्तर:
चूहा सैदनशाह के लोग अपने खाने-पीने का ख्याल रखते थे। वे दही तथा लस्सी का सेवन करते थे। दही में बीमारी के कीटाणुओं को मारने की शक्ति होती है। इस कारण उनके खून में लाल रक्त कणों की संख्या अधिक थी तथा वे स्वस्थ रहते थे।

प्रश्न 2.
मधु के मामा ने बसन्त द्वारा उनका रेजर इस्तेमाल करने के पश्चात् क्या किया?
उत्तर:
बसन्त ने मधु के मामा का रेजर इस्तेमाल किया और अपनी हजामत बनाई । मधु के मामा ने ब्लेड को फेंक दिया तथा रेजर को स्टरलाइज अर्थात् कीटाणु मुक्त कराया।

प्रश्न 3.
मधु अपने बचपन के वातावरण व संस्कार के बारे में नौकरानी मंगला से क्या कहती है?
उत्तर:
मधु मंगला से कहती है कि वह बचपन से ही ऐसे वातावरण में पली है, जहाँ सफाई और सलीके को बहुत खयाल रखा जाता है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 15 तौलिये निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मधु व बसन्त में किस बात पर वैचारिक मतभेद हैं। विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
मधु तथा बसन्त पति-पत्नी हैं। मधु ने बसन्त के साथ प्रेम-विवाह किया है। मधु बसन्त को तथा बसन्त मधु को खूब चाहते हैं किन्तु दोनों के बीच विवाद होता रहता है। मधु स्वयं को बदलने का निश्चय भी करती है किन्तु ऐसा कर नहीं पाती।

मधु एक ऐसे वातावरण से आई है, जहाँ सफाई पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। इस कारण मधु के संस्कार ऐसे हैं कि वह साफ-सुथरे रहने पर जोर देती है। उससे उनके सम्बन्ध प्रभावित होने लगते हैं। बसन्त की आदत है कि वह कोई भी तौलिया ले लेता है। मधु ने घर में अपने, मदन तथा बसन्त के लिए अलग-अलग तौलिये ले रखे हैं। इतना ही नहीं हाथ पोंछने, हजामत बनाने आदि अलग-अलग कामों के तौलिए भी अलग-अगल हैं। वह चाहती है कि बसन्त अपना तौलिया तथा किसी काम के लिए निश्चित तौलिया ही प्रयोग करे। इसके विपरीत बसन्त जो हाथ में आ जाता है उसी तौलिये को लेकर इस्तेमाल कर लेता है।

मधु चाहती हैं कि बसन्त सुबह-शाम बनियान बदले। वह पैर धोकर रजाई में घुसे। बिस्तर पर कुछ खाये पिये नहीं। बसन्त बताता है कि वह छ: भाई थे और एक ही तौलिया प्रयोग करते थे। कभी किसी को कोई बीमारी नहीं हुई। वह अपने दोस्तों के साथ बिस्तर पर पैरों पर लिहाफ डालकर बातें करते और चाय पीते थे। उसका आनन्द ही और था। पैर धोकरे रजाई में जाने पर तो रजाई का आनन्द ही नहीं रहता ।।

कुछ बातें बसन्त ने अपना ली थीं। किन्तु तौलिये का प्रयोग करने में वह बार-बार चूक जाता है और इसी कारण मधु से विवाद होता है। बसन्त को भी सफाई प्रिय है किन्त सफाई को सनक बना लेना इससे चिढ़ है। उसे लगता है कि मधु उससे घृणा करती है। मधु भी स्वयं को बदलने की कोशिश करती है परन्तु आदत को छोड़ नहीं पाती।

प्रश्न 2.
एकांकी के आधार पर आज के तड़क-भड़क का तकल्लुफ प्रधान जीवन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
‘तौलिये’ शीर्षक एकांकी में सफाई की समस्या उठाई गई है। गन्दगी को कोई प्यार नहीं करता । सबको सफाई अच्छी लगती है परन्तु समाज के गरीब वर्ग तथा सम्पन्न वर्ग के दृष्टिकोण इस सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रस्तुत एकांकी में मधु तथा बसन्त इन दो वर्गों के प्रतिनिधि पात्र हैं। मधु सम्पन्न (एरिस्टोक्रेट) तथा बसन्त निर्धन वर्ग से सम्बन्धित है।

बसन्त के छ: भाई थे। वे एक ही तौलिये का प्रयोग करते थे। वे कभी बीमार नहीं होते थे। वह रजाई में मित्रों के साथ बैठकर चाय पीता और गपशप करता था। इससे उनमें असीम आत्मीयता रहती थी। वे कभी भी बीमार नहीं होते थे। खुराक और पेट का ध्यान रखने के कारण वे स्वस्थ रहते थे। बसन्त को बार-बार बनियानें बदलने, हर बार एक नई तौलिया प्रयोग करने, बार-बार हाथ-पैर मुँह धोने की आदत नहीं है।

आज का मनुष्य बाह्य आचरण को अधिक महत्त्व देता है। खान-पान, पहनावा, सामाजिक व्यवहार, आचार-विचार सभी के बाहरी दिखावटी स्वरूप पर ध्यान दिया जाता है। बिना तड़क-भड़क के कोई काम नहीं होता। हम भोजन स्वास्थ्य रक्षा के विचार से नहीं खाते, कपड़े शरीर को ढकने तथा उसके आराम के लिए नहीं पहनते। इनके पीछे भी प्रदर्शन का भाव होता है। यह प्रदर्शन अपनी आर्थिक सम्पन्नता का भी होता है। आज के भक्त, पण्डित और पुजारी भी शान्त एकान्त भाव से पूजा नहीं करते। सबको पता लगे, इसलिए पूजा के लिए ध्वनि विस्तारक-यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। साधुओं के आश्रम और मन्दिरों की भव्यता के क्या कहने? सफाई अच्छी चीज है परन्तु किसी को हाथ से साबुन से धुली कमीज उनको लॉन्ड्री में धुले अपने कपड़े के आगे गन्दी दिखाई देती है। आज समाज में सादा जीवन उच्च विचार को विचारधारा नहीं शानदार, दिखावटी, ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जीने की भावना को महत्त्व प्राप्त हो चुका है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 15 तौलिये अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 15 तौलिये वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. तौलिए एकांकी में किसका वर्णन है?

(क) शिष्टाचार
(ख) सफाई
(ग) सभ्यता
(घ) सफाई की सनक

2. “मैं अपने रेजर से किसी दूसरे को हजामत नहीं बनाने देता, इसीलिए मैंने मेहमानों के लिए दूसरा रेजर रख छोड़ा है।’ मधु के मामाजी के इस कथन को सुनकर बसन्त के मन में कौन-सा भाव उत्पन्न हुआ?

(क) क्रोध
(ख) भ्रम
(ग) प्रेम
(घ) सम्वेदना

3. मधु को हँसी-मजाक से घृणा नहीं, घृणा है –

(क) गन्दगी से
(ख) अशिष्टता से
(ग) गन्दे मनुष्यों से
(घ) बसन्त से

4. मधु की सहेली का नाम है –

(क) मंगला
(ख) उषी
(ग) सूरो
(घ) निम्मो

5. मधु का पूरा नाम है –

(क) मधुरिमा
(ख) मधुमालती
(ग) मधुरमा
(घ) मधुमती

उत्तर:

  1. (घ)
  2. (क)
  3. (ख)
  4. (ग)
  5. (ख)

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 15 तौलिये अतिलघूत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बसन्त क्या काम करता है? उसको मासिक वेतन कितना है?
उत्तर:
बसन्त दिल्ली में एक फर्म का मैनेजर है। उसका मासिक वेतन ढाई सौ रुपये है।

प्रश्न 2.
‘ओह!’ यह कमबख्त तौलिए! मुझे ध्यान ही नहीं रहता’ किसको क्या ध्यान नहीं रहता?
उत्तर:
बसन्त को सही तौलिया प्रयोग करने का ध्यान नहीं रहता।

प्रश्न 3.
अश्क जी ने एकांकी का शीर्षक तौलिये’ क्यों रखा है?
उत्तर:
इस एकांकी की विषयवस्तु बसन्त द्वारा तौलिया को इस्तेमाल करने में भूल होने से सम्बन्धित है। तौलिया कथावस्तु. में मुख्य चीज है।

प्रश्न 4.
अब तो ऐनक नहीं। ऐनक हो तो कौन-सा आपको कुछ दिखाई देता है। इस संवाद में मधु को कौन-सा मनोभाव प्रकट हुआ है?
उत्तर:
इस संवाद में मधु का बसन्त के प्रति व्यंग्य का भाव प्रकट हुआ है।

प्रश्न 5.
‘नफासत में नफरत की भावना काम करती है।’ वाक्य में किस मनोवैज्ञानिक सत्य का उल्लेख हुआ है।
उत्तर:
समाज के कुलीन अथवा स्वयं को श्रेष्ठ समझने वाले लोग छोटे गरीबों से घृणा करते हैं। अमीरों का इसी भावना का उल्लेख है।

प्रश्न 6.
बसन्त और मधु में विवाद का अन्त कब हुआ?
उत्तर:
टेलीफोन की घण्टी बजी तो बसन्त ने चोगा उठाया और उनके विवाद का अन्त हो गया।

प्रश्न 7.
‘एकांकी’ किसको कहते हैं तथा क्यों?
उत्तर:
‘एकांकी’ नाटक को कहते हैं। इसमें एक ही अंक होने के कारण इसको एकांकी कहते हैं।

प्रश्न 8.
मधु के अनुसार संस्कृति क्या है?
उत्तर:
मानव की मूल भावनाओं पर चढ़ने वाला नए-नए पर्यों का नाम संस्कृति है।

प्रश्न 9.
सुरो ने सदियों पुराने सड़े-गले विचार किनको कहा है?
उत्तर:
सुरो ने महात्मा बुद्ध के मत को सदियों पुराने सड़े-गले विचार कहा है।

प्रश्न 10.
सुरो और चिन्ती कौन हैं?
उत्तर:
सुरो और चिन्ती मधु की सहेलियाँ हैं। वे उसके साथ कॉलेज में पढ़ती थीं।

प्रश्न 11.
बनारस से दिल्ली लौटकर आए बसन्त की ओर मधु कैसी दृष्टि से देख रही थी?
उत्तर:
जब बसन्त बनारस से दिल्ली लौटा तो मधु से बातें करने लगा। मधु उसकी ओर प्रशंसा की इच्छुक प्यार भरी दृष्टि से देख रही थी।

प्रश्न 12.
‘तौलिये’ एकांकी का आरम्भ और अन्त बसन्त कैसे होता है?
उत्तर:
‘तौलिये’ एकांकी का आरम्भ और अन्त बसन्त को तौलिए के बारे में मधु के रोकने-टोकने से होता है।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 15 तौलिये लघूत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘तौलिये’ एकांकी की कथावस्तु का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
‘तौलिये’ एकांकी में सफाई के प्रति मधु के प्रदर्शनपूर्ण तथा बसन्त के यथार्थ दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया गया है। बसन्त कोई भी तौलिया प्रयोग कर लेता है और मधु उसको रोकती-टोकती है। इससे दोनों में विवाद होता है। इसी विवाद से एकांकी प्रारम्भ होता है तथा इसी से उसका अन्त होता है। एकांकी की कथावस्तु सफाई की सनक से सम्बन्धित है।

प्रश्न 2.
‘तौलिये’ एकांकी के दो संवाद लिखिए। जो उसके आरम्भ में प्रयुक्त हुए हैं और अन्त में दोहराए गये हैं?
उत्तर:
‘तौलिये’ एकांकी के आरम्भ तथा अन्त में प्रयुक्त एक जैसे दो संवाद निम्नलिखित हैं –

  1. ‘ओह! यह कमबख्त तौलिए। मुझे ध्यान ही नहीं रहता।।
  2. जी, आपकी दुनिया ! जाने आप किस दुनिया में रहते हैं। अब तो ऐनक नहीं। ऐनक हो, तो कौन-सा आपको कुछ दिखाई देता है।

प्रश्न 3.
मधु को किस काम की निपुणता प्राप्त नहीं है?
उत्तर:
मधु को अपने मन के भावों को छिपा लेने की निपुणता प्राप्त नहीं है। उसके मन में उठने वाले उपेक्षा, क्रोध आदि भाव उसके चेहरे पर झलक उठते हैं। उसके मन की सभी भावनाएँ उसकी आकृति पर प्रगट हो जाती हैं। उसका चेहरा देखकर जाना जा सकता है कि वह क्या सोच रही है।

प्रश्न 4.
बसन्ते और मधु का बचपन जिसे वातावरण में बीता है, उसमें क्या अन्तर है?
उत्तर:
बसन्त का बचपन गरीबी में बीता है। उसके छ: भाई थे। वे सभी एक ही तौलिये से अपना शरीर पोंछ लेते थे। उसने अपने जीवन में ऐसे दिन भी देखे थे जब उसको एक ही बनियान पहने कई दिन बीत जाते थे। उसको इतना समय भी नहीं मिलता था कि उसको धो ले। उसे कठोर परिश्रम करना पड़ता था। इसके विपरीत मधु का परिवार सम्पन्न था। उसने हॉस्टल में रहकर कॉलेज की पढ़ाई की थी। उसके मौसा दो बार विलायत हो आए थे। अपने बड़प्पन के बारे में सोचकर वह छोटे लोगों के साथ घुल-मिल भी नहीं सकती थी। बसन्त ऐसे लोगों के साथ घण्टों बैठकर बातें कर सकता था।

प्रश्न 5.
तौलिए के प्रयोग के बारे में मधु तथा बसन्त के दृष्टिकोण में क्या भेद है?
उत्तर:
मधु का विचार है कि घर में प्रत्येक सदस्य का तौलिया अलग होना चाहिए। एक आदमी को भी अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग तौलिए प्रयोग करने चाहिए। सफाई और स्वास्थ्य के विचार से यह आवश्यक है। बसन्त ऐसा नहीं सोचता। उसके छः भाई थे। सभी एक ही तौलिया से अपना शरीर पोंछ लेते थे। वे कभी बीमार नहीं हुए। वह कोई भी तौलिया उठा लेता है। मधु इससे नाराज होती है तथा दोनों में विवाद होने लगता है।

प्रश्न 6.
रोग होने तथा उसके बढ़ने का कारण क्या है? बसन्त को इस बारे में क्या कहना है? क्या मधु भी बसन्त से सहमत है?
उत्तर:
रोग होने का कारण स्वास्थ्य तथा खुराक के प्रति लापरवाही है। बसन्त मानता है कि गन्दगी का सामना करने वालों में उसके प्रति प्रतिरोधकता बढ़ जाती है। मनुष्य को अपने खान-पान तथा सेहत का ध्यान रखना चाहिए। मधु बसन्त से सहमत नहीं है। वह मानती है कि रोग से बचने के लिए सफाई रखना जरूरी है। सबके तौलिए अलग-अलग होने चाहिए। किसी दूसरे का तौलिया प्रयोग नहीं करना चाहिए। बनियान आदि बदलते रहना चाहिए। हाथ-मुँह धोने के बाद तथा खाने की मेज पर ही खाना खाना चाहिए।

प्रश्न 7.
मधु को किस विषय में निपुणता प्राप्त नहीं है? इसका कारण क्या है? इस सम्बन्ध में आप मधु को क्या सलाह देना चाहेंगे?
उत्तर:
मधु का स्वभाव उत्तेजनापूर्ण है। वह छोटी-सी बात पर नाराज हो जाती है। दूसरे के प्रति क्रोध और उपेक्षा आदि मन के भावों को वह छिपाने में दक्ष नहीं है। उसके ये भाव उसके चेहरे पर साफ-साफ दिखाई दे जाते हैं। इसका कारण यह है कि उसमें अपने को नियन्त्रित करने की सामर्थ्य का अभाव है। मेरी सलाह है कि नियन्त्रित रहे। अपने विचारों को दूसरों पर लादे नह। यदि कोई उसके जैसे विचारों का नहीं है, तो उससे नाराज न हो। उसे संयम रखना चाहिए।

प्रश्न 8.
“इसी तरह विष घोल-घोल कर तुमने स्वास्थ्य का सत्यानाश कर लिया है। यह बात किसने, किससे तथा किस कारण कही है?
उत्तर:
यह बात बसन्त ने मधु से कही है। मधु छोटी-सी बात पर असंयमित हो जाती है। अपनी बात न माने जाने पर वह उत्तेजित हो जाती है। उसको क्रोध आ जाता है। वह दूसरों की उपेक्षा करती है। इस उत्तेजना तथा असंयम के भाव को विष कहा गया है। इस प्रकार के भावों तथा विचारों के कारण उसका स्वास्थ्य खराब हो गया है।

प्रश्न 9.
जोहड़ का मैला चीकट पानी पीने पर भी चूहा सैदनशाह के निवासी स्वस्थ थे। इसके दो कारण लिखिए।
उत्तर:
चूहा सैदनशाह के निवासी जोहड़ का मैला चीकट पानी पीते थे परन्तु वे स्वस्थ थे। इसके दो कारण थे –

  1. वे अपने खान-पान, सेहत आदि पर ध्यान देते थे। वे दही तथा लस्सी प्रयोग करते थे। दही में बीमारियों के कीटाणुओं को मारने की शक्ति होती है।
  2. वे गन्दगी में रहने को विवश थे। मैला पानी पीना भी उनकी मजबूरी थी। किन्तु इस कारण उनके शरीर में गन्दगी को सहन करने तथा रोगों का प्रतिरोध करने की क्षमता बढ़ गई है।

प्रश्न 10.
“तुम्हारे ऐसे वातावरण में पले हुए सब लोगों की नफासत में नफरत की भावना काम करती है।”-कथन में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बसन्त ने यह कहकर मधु को बताया है कि वह एक सम्पन्न परिवार में जन्मी है। सम्पन्न लोगों में स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानने की स्वाभाविक भावना होती है। वे दूसरों को विशेषत: निर्धन-निर्बल लोगों को अपने से छोटे मानकर उनसे घृणा करते हैं। उनकी श्रेष्ठता अथवा कुलीनता दूसरों के साथ घृणा पर ही जीवित रहती है।

प्रश्न 11.
“मुझे गन्दगी से घृणा नहीं है किन्तु मैं गन्दगी पसन्द नहीं करता-बड़ा नाजुक-सा फर्क है? वह नाजुक-सा फर्क क्या है?
उत्तर:
बसन्त गन्दगी से घृणा नहीं करता। मधु जिन लोगों को अपने बरामदे में भी पैर न रखने दे, वह उनके साथ बैठ सकता है। परन्तु वह गन्दगी पसन्द नहीं करता। गन्दगी से घृणा न करना तथा गन्दगी पसन्द न करना-इन दोनों बातों में फर्क है। जीवन में कदम-कदम पर गन्दगी का सामना होता है। गन्दे वातावरण में तथा गन्दे लोगों के साथ रहना और काम करना पड़ता है। गन्दगी से घृणा करने से काम नहीं चलता परन्तु इसका मतलब गन्दगी को पसन्द करना नहीं है। गन्दगी को दूर करने की जरूरत है, उससे घृणा करने की नहीं।

प्रश्न 12.
बसन्त को स्वच्छता पसन्द है परन्तु स्वच्छता की सनक ये उसे चिढ़ है। यह बात आप कैसे कह सकते हैं?
उत्तर:
बसन्त को स्वच्छता पसन्द है। उसने तौलिया तथा बनियान बदलने के बारे में मधु के विचारों को मान लिया है। वह दिन में दो बार बनियाने बदलता है। किन्तु यदि भूल से वह किसो अन्य व्यक्ति की तौलिया का प्रयोग करने लगता है तो उसको इसके लिए बुरा भला कहना या उससे नाराज होना उसको अनुचित लगता है। वह इसको स्वच्छता नहीं, सनक मानता है। उसे सनक से चिढ़ है। किन्तु स्वच्छता उसे प्रिय है।

प्रश्न 13.
“जीवन को शिष्टाचार की बेड़ियों में जकड़ दिया जाए-यह न करो, वह न करो, ऐसे न बोलो, वैसे न बोलो’–बसन्त यह पसन्द नहीं करता। क्या आप इसको पसन्द करते हैं और क्या यह शिष्टाचार है?
उत्तर:
बसन्त को यह पसन्द नहीं है कि जीवन को शिष्टाचार की जंजीरों में जकड़कर उससे उसका स्वतन्त्रतापूर्वक जीने का तक छीन लिया जाय। यह न करो, वह न करो, आदि की नकारात्मक जीवन शैली का वह विरोधी है। हर बात में न करना या प्रतिबन्ध लगाना मनुष्य के बौद्धिक विकास को रोकता है। मैं जीवन के प्रति इस प्रकार के निषेधात्मक दृष्टिकोण को अनुचित मानता हूँ। दृष्टिकोण सकारात्मक ही अच्छा होता है। न यह शिष्टाचार ही है। मैं इसको पसन्द नहीं करता।

प्रश्न 14.
शिष्ट हास्य और अशिष्ट में क्या भेद है? उषी और निम्मो का व्यवहार इनमें से किसके अन्तर्गत आता है। उनके साथ मधु के व्यवहार को आप क्या कहेंगे?
उत्तर:
हास्य में यदि फूहड़पन नहीं है और यदि उसका लक्ष्य किसी को पीड़ा पहुँचाना नहीं है तो वह हास्य शिष्ट है। अशिष्टता सदाचार के नियमों के विरुद्ध आचरण को कहते हैं। उषी और निम्मो का व्यवहार शिष्ट हास्य नहीं है तो वह अशिष्टता तो कतई नहीं है। उनमें समझदारी और सन्तुलन की कमी है। मधु का कहना–“मैं उन्हें खा जो जाती हैं उनके प्रति उसकी नफरत का सूचक है। उसे उचित व्यवहार नहीं माना जा सकता है।

प्रश्न 15.
“जिसे बैठने-उठने, बोलने का सलीका नहीं, वह मनुष्य क्या पशु है” मधु के इस कथन पर बसन्त की जो प्रतिक्रिया है, उसको अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
जिसे बैठने-उठने, बोलने का सलीका नहीं, वह मनुष्य क्या पशु है।” मधु के मुख से यह सुनकर बसन्त क्रोध से भर उठता है।.उसको लगता है कि मधु उसको पशु बता रही है। उसके सिद्धान्त मनुष्य की प्राकृतिक आजादी को बाँधने वाले हैं। वह उससे घृणा करती है। उसकी हँसी जहरीली है। वह उसकी हर बात से घृणा करती है और उसको पशु समझती है। बसन्त उत्तेजित हो उठता है और चीखकर बात करता है।

प्रश्न 16.
मधु स्वप्न में भी क्या नहीं सोचती जिसकी कल्पना बसन्त कर लेता है? तौलिये एकांकी के अनुसार उत्तर लिखिए।
उत्तर:
जब बसन्त मधु को बताता है कि वह उससे घृणा करती है, वह उसकी हर बात से घृणा करती है। तब मधु कहती है वह बसन्त से घृणा की बात सपने में भी नहीं सोचती। उसके मन में बसन्त के प्रति घृणा कतई नहीं है। घृणा को बसन्त अपनी कल्पना की आँखों से देखता है। उसमें कोई वास्तविकता नहीं है। मधु द्वारा बसन्त से घृणा किया जाना बसन्त की कल्पना है और वह सत्य नहीं है।

प्रश्न 17.
“मेरा ख्याल था, मैं आपको सुख पहुँचा सकेंगी”-मधु के मतानुसार सुख क्या है तथा बसन्त की कल्पना के सुख से वह किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
मधु ने बसन्त से कहा कि वह शादी करके बसन्त को सुख दे सकेगी और उसके अव्यवस्थित जीवन में व्यवस्था ला सकेगी। सुख से मधु का आशय है कि बसन्त के जीवन की प्रकृति सिद्ध स्वतन्त्रता को तथाकथित सभ्यता के नियमों में बाँधना मधु बनावटी जीवन को सुख मानती है। बसन्त जीवन की स्वाभाविकता का पक्षधर है। वह परिवार के किसी भी सदस्य की तौलिया प्रयोग कर सकता है। मित्रों के साथ रजाई में बिना पैर धोए बैठकर चाय पी सकता है। इसमें उसे सुख लगता है परन्तु मधु को ऐसा नहीं लगता।

प्रश्न 18.
मधु तथा बसन्त के स्वभाव में आप क्या असमानता पाते हैं? आपकी दृष्टि में इसका कारण क्या है?
उत्तर:
मधु को कुलीन वर्ग की बनावटी जिन्दगी जीना अच्छा लगता है। बसन्त स्वाभाविक तथा प्राकृतिक जीवन को अच्छा मानता है। वह स्वाभाविक जीवन पर सभ्यता का बनावटी पर्दा नहीं डालता। दोनों के स्वभाव में यह असमानता उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण है। मधु एक सम्पन्न परिवार से आई है। जबकि बसन्त ने जीवन में विपन्नता भी देखी है। एक ने सभ्यता की बनावट में जन्म लिया है तो दूसरी नैसर्गिक स्वाभाविकता में पैदा हुआ है।

प्रश्न 19.
और तब पता चला कि हम लोग यों ही परेशान होते रहे। घर तो तुम्हारा पास ही था। सुरो और चिन्ती किस कारण परेशान हुईं? आप किसी जगह जाते हैं तो क्या ऐसे ही परेशान होते हैं?
उत्तर:
सुरो ने ताँगेवाले को मधु के घर का गलत पता बता दिया था। इस कारण ताँगेवाला उनको सब्जीमण्डली गिरजे के पास ले गया। जब उनको ध्यान आया कि उसका घर हनुमान मन्दिर के पास है तो वे मधु के घर आ सकी। उनको व्यर्थ इधर-उधर भटकना पड़ा। मैं कहीं जाता हूँ तो उस स्थान का पता लिखकर अपनी जेब में रख लेता हूँ तथा उस स्थान की पहचान भी पूछ लेता हूँ। इससे मैं भटकता नहीं।

प्रश्न 20.
लेफ्टिनेंट वीरेन्द्र तथा पुष्पा कौन हैं जिनके बारे में सुरो और चिन्ती मधु से बातें कर रही हैं?
उत्तर:
लेफ्टिनेंट वीरेन्द्र और पुष्पा मधु तथा उसकी सहेलियों के पूर्व परिचित हैं। पुष्पा मोटी है और वीरेन्द्र पतला सुरो मधु को बताती है कि पुष्पा की शादी अगले महीने होने वाली है। फिर मधु, सुरो और चिन्ती उन दोनों की शादी के बारे में बातें करने लगती हैं।

प्रश्न 21.
सभ्यता और संस्कृति का मानव की मूल भावनाओं पर पड़ा पर्दा कहने का क्या कारण है? सी.ई.एम. जोड़ का इस बारे में क्या मत है?
उत्तर:
सभ्यता और संस्कृति बाद में विकसित होती है। पहले मनुष्य प्राकृतिक नियमों के अनुसार ही जीता है। सभ्यता और संस्कृति उसके स्वाभाविक विचारों और कार्यों को रोककर एक नया रास्ता उसको बताती है। इस तरह सभ्यता और संस्कृति प्रकृतिदत्त स्वाभाविक जीवन के विपरीत चलने का नाम है। इसी कारण मधु ने उनको मानव की मूल भावनाओं पर पर्दा कहा है। सी.ई.एम. जोड़ एक प्रसिद्ध विचारक हैं। उनके मत में दो लोगों के अलग-अलग तरह से सोचने और काम करने तथा पहले की अपेक्षा नये तरीके से सोचने से सभ्यता जन्म लेती है। इसका मतलब है कि सभ्यता सतत् परिवर्तनशील रहती है।

प्रश्न 22.
बचपन के संस्कारों से मुक्ति पाना मधु के लिए क्यों मुश्किल है? क्या आपके लिए भी ऐसा करना मुश्किल है?
उत्तर:
मधु में स्वच्छता के प्रति जो सनकीपन तक का भाव है, वह उसके जन्मजात संस्कारों के कारण है। मनुष्य जिन परिस्थितियों में जन्म लेता और बढ़ता है वह सदा के लिए उसके व्यक्तित्व का अंग बन जाती हैं। उनसे मुक्त होना मधु के लिए भी इसी कारण मुश्किल है। मैं भी अपने संस्कारों से बँधा हुआ हूँ। मैं उनसे मुक्त होने का प्रयास तो कर सकता हूँ पर सफल होने का दावा नहीं कर सकता।

प्रश्न 23.
बसन्त के बनारस जाने के बाद मधु अपने आप में परिवर्तन लाने का प्रयास करती है। परन्तु बसन्त के लौट आने के बाद उसका व्यवहार पहले जैसा ही हो जाता है। इसको आपकी दृष्टि में क्या कारण हो सकता है?
उत्तर:
बसन्त बनारस में गया है। मधु सोचती है, वह उससे नाराज होकर गया है। उसने दो महीने से उसको पत्र भी ढंग से नहीं लिखा । वह अपनी सफाई की अतिवादी आदत को बदलने का प्रयास करती है। इसी कारण दोनों का विवाद होता है। बसन्त बनारस से आता है तो सब भूलकर तौलिया के प्रयोग पर उसका पहले जैसी टोका-टोकी शुरू हो जाती है। इसका कारण मधु की पारिवारिक पृष्ठभूमि है। मधु की आदतें और विचारे उसी के अनुरूप बने हैं। वह कोशिश करने पर भी स्वयं को बदल नहीं पाती।

प्रश्न 24.
बसन्त और मधु छोटी-छोटी बातों पर झगड़ते रहते हैं, किन्तु वे एक-दूसरे को प्रेम करते हैं। क्या आप भी ऐसा मानते हैं यदि हाँ, तो क्यों ?
उत्तर:
बसन्त और मधु तौलिया के प्रयोग जैसी छोटी-छोटी बातों पर झगड़ते हैं। उनका विवाद लम्बा चलता है। दो महीने बाद बनारस से बसन्त लौटता है। उसकी अनुपस्थिति में मधु स्वयं को बदलने का प्रयास करती है। परन्तु पुन: वैसा ही करने लगती है। उसके बावजूद वे दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। बसन्त मधु की सेहत के बारे में उसे (उसे) समझाता है। बसन्त मधु की बातों पर हँसकर टालने का प्रयास करता है। मधु भीb उसके पीछे स्वयं को बदलने और तकल्लुफों से मुक्त होने का प्रयास करती है।

प्रश्न 25.
‘तौलिये’ एकांकी के आरम्भ तथा अन्त में आप क्या समानता पाते हैं? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘तौलिये’ एकांकी का आरम्भ बसन्त द्वारा गलत तौलिये के इस्तेमाल और उस पर मधु द्वारा उसको रोकने-टोकने से होता है। एकांकी के प्रारम्भ में दोनों में इसी पर विवाद चल रहा है। एकांकी का अन्त भी इसी दृश्य के साथ होता है। दोनों में बसन्त के दो महीने बाद बनारस से लौटने के बाद भी यही विवाद आरम्भ हो जाता है। एकांकी के आरम्भ और अन्त में मधु और बसन्त के संवाद तथा कार्य एक समान हैं। वास्तविकता यह है कि आरम्भ के संवाद ही अन्त में दोहराए गए हैं।

प्रश्न 26.
तौलिए एकांकी शीर्षक की उपयुक्तता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
‘तौलिए’ एकांकी में तौलिया और इसका प्रयोग कैसे करें या न करें ही कथानक के केन्द्र में है। एकांकी के आरम्भ और अन्त में बसन्त कोई भी तौलिया उठाकर उसका प्रयोग करता दिखाई देता है और मधु उसको ऐसा करने से रोकती है। वह इसको सफाई के विचार से ठीक नहीं मानती। दोनों में इसी पर बराबर विवाद होता है। इस एकांकी में तौलिया महत्त्वपूर्ण है। वह कथन के विकास तथा पात्रों के चरित्रांकन में सहायक है। अत: तौलिया शीर्षक सर्वथा उपयुक्त है।

प्रश्न 27.
‘तौलिये’ एकांकी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
अथवा
‘तौलिये’ एकांकी में एकांकीकार ने क्या संदेश दिया है?
उत्तर:
‘तौलिये’ एकांकी में एकांकीकार ने संदेश दिया है कि सफाई रखना अच्छा तथा आवश्यक गुण है। मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए स्वच्छता का बराबर ध्यान रखना चाहिए। किन्तु स्वच्छता के प्रति अतिरंजित विचार होना ठीक नहीं है। सफाई रखने की भावना सनक नहीं बननी चाहिए तथा उससे परिवार का वातावरण अशान्त नहीं कर देना चाहिए। इसे एकांकी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि सफाई रखें किन्तु उसके पीछे पागलपन तक जाकर घर की सुख-शान्ति नष्ट न करें।

प्रश्न 28.
‘तौलिए’ एकांकी की मुख्य समस्या पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
तौलिये को लेकर मधु तथा बसन्त में विवाद होता है। इसका कारण पति-पत्नी के बचपन के संस्कार तथा पारिवारिक पृष्ठभूमि है। दोनों भिन्न-भिन्न संस्कारों वाले हैं। उच्चवर्गीय संस्कारों वाली मधु उनको छोड़ नहीं पाती। बसन्त अपनी स्वच्छन्दता में बाधा बर्दाश्त नहीं कर पाता। दोनों ही परस्पर सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते । ‘तौलिये’ एकांकी की मुख्य समस्या विरोधी संस्कारों वाले पति-पत्नी द्वारा पारिवारिक जीवन में सामंजस्य स्थापित न कर पाने की है।

प्रश्न 29.
बसन्त के चरित्र की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
बसन्त ‘तौलिये’ एकांकी का मुख्य पात्र है। उसके चरित्र की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. बसन्त जीवन में स्वच्छता का समर्थक है। सभ्यता के बनावटी जीवन में उसको सुख प्रतीत नहीं होता, वह सफाई पसन्द करता है, किन्तु सफाई की,सनक से उसको चिढ़ है।
2. बसन्त यथार्थवादी है। गन्दगी से जीवन में वास्ता पड़ना स्वाभाविक है। इसके कारण गन्दगी से घृणा करना वह ठीक नहीं मानता वह घर और समाज से गन्दगी हटाना ठीक समझता है।

प्रश्न 30.
मधु के चरित्र की दो विशेषताएँ लिखिए। उत्तर-मधु के चरित्र की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. मधु को बसन्त से प्रेम है। उसने बसन्त से प्रेम विवाह किया है। परस्पर होते विवाद के बाद भी प्रेम उसको स्वयं में परिवर्तन लाने की प्रेरणा देता है।
2. मधु कुलीनतावादी पारिवारिक संस्कारों से प्रभावित है। उसमें सफाई की भावना सनक की हद तक बढ़ी हुई है। इससे उसके परिवार की शान्ति भंग होती है तथा पति के साथ विवाद होता है।

प्रश्न 31.
‘तौलिये’ एकांकी की संवाद योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
‘तौलिये’ एकांकी की संवाद योजना सुविचारित है। संवाद प्रायः छोटे तथा प्रभावशाली हैं। वह पात्रों की चरित्रगत विशेषताओं को प्रकट करते हैं। कथानक के विकास में उनका योगदान है। कुछ संवाद एकांकी के आरम्भ तथा अन्त में समान रूप से
आए हैं। इस कारण एकांकी के प्रभाव में वृद्धि हुई है। संवाद पात्रानुकूल व मनोवैज्ञानिक हैं।

RBSE Class 12 Hindi सृजन Chapter 15 तौलिये निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘तौलिये’ एकांकी के प्रधान स्त्री पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
‘तौलिये’ उपेन्द्रनाथ अश्क द्वारा रचित एकांकी है। इसकी नायिका तथा प्रधान नारी पात्र मधु है। मधु के जीवन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-सम्पन्न एवं कुलीन पृष्ठभूमि-एक सम्पन्न परिवार में जन्मी है। वह समाज में स्वयं को कुलीन कहता है।

मधु के संस्कार उससे प्रभावित हैं। इनका प्रभाव उस पर बहुत गहरा है। वह चाहकर भी उनसे मुक्त नहीं हो पाती तथा अस्वाभाविक निषेधपूर्ण जीवन जीकर अपना तथा परिवार का सुख नष्ट कर देती है।

सफाई की सनक – मधु को अपने संस्कारों के कारण सफाई पसन्द है। सफाई के प्रति उसकी पसन्द सनकीपन तक विस्तृत है। एक ही मनुष्य अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग तौलिए प्रयोग करे। वह परिवार के किसी अन्य सदस्य का तौलिया भी इस्तेमाल न करे, आदि उसके विचार सफाई के प्रति उसके सनकीपन को व्यक्त करने वाले हैं। पति से प्रेम-मधु के अपने पति बसन्त से प्रेम है। उसने उसके साथ प्रेम विवाह किया है। विचारों में अन्तर होने पर भी उसका प्रेम बसन्त के प्रति कम नहीं हुआ है। जब बसन्त बनारस चला जाता है तो मधु उसको नाराज जानकर अपने व्यवहार को बदल लेती है। वह बसन्त के अनुकूल रहकर उसे सुख देना चाहती है। वह अपनी नौकरानी मंगला से कहती है-बचपन से मैंने जो संस्कार पाये हैं उनसे मुक्ति पाना मेरे लिए उतना आसान नहीं । पर नहीं, मैं इस सब वहमों को छोड़ देंगी। पुरानी आदतों से छुटकारा पा लूंगी।

कमजोर आत्मनियन्त्रण – एक बार अपने पति की प्रसन्नता के लिए मधु सफाई के प्रति अपनी सनक से मुक्त होने का प्रयास करती है। वह अपनी पुरानी आदतों से छुटकारा पाना चाहती है। परन्तु जब बसन्त हाथ-मुँह धोकर सुरो और चिन्ती द्वारा प्रयोग किए गए तौलिये से हाथ-मुँह पोंछता है तो मधु सब कुछ भूलकर पहले जैसी ही बन जाती है। वह चीखकर कहती है-मैं पूछती हूँ आप सूखे और गीले तौलिए में तमीज नहीं कर सकते। अभी तो सुरो और चिन्ती चाय पीकर इस तौलिए से हाथ पोंछकर गई हैं। यह सुनकर बसन्त घबरा जाता है। मधु बदलने का प्रयास करके भी कमजोर आत्मनियन्त्रण के कारण स्वयं को बदल नहीं पाती।

प्रश्न 2.
‘तौलिये’ एकांकी के पात्र बसन्त का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
‘तौलिये’ एकांकी का नायक तथा प्रधान पात्र है-बसन्त । उसकी प्रमुख चरित्रगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

मध्यम वर्गीय परिवार से बसन्त मध्यम वर्ग से जुड़ा व्यक्ति है। उसने अपने जीवन में विपन्नता देखी है। वह छ: भाई थे और एक ही तौलिये से अपना शरीर पोंछते थे। उसको कठोर परिश्रम करना पड़ता था। वह इतना व्यस्त रहता था कि उसको कई-कई दिनों तक बनियान बदलने और धोने का भी अवसर नहीं मिलता था।

यथार्थवादी – बसन्त यथार्थवादी है। वह जीवन की सच्चाई से भागता नहीं, उसका कहना है-यदि हमें जीवन का सामना करना है तो रोज गन्दगी से दो-चार होना पड़ेगा फिर इससे घृणा कैसी? वह गन्दगी से घृणा नहीं करता बल्कि इसको दूर करने और जीवन को स्वच्छ बनाने में विश्वास करता है।

स्वच्छता की सनक से दूर – बसन्त स्वच्छता को पसन्द करता है। वह उसकी सनक से चिढ़ता है। उसने तौलियों तथा बनियानों के बारे में मधु के विचारों को स्वीकार कर भी लिया है। परन्तु यदि वह भूल से कोई दूसरी तौलिया उठा लेता है तो इस पर मधु का अपने प्रति व्यवहार उसको क्रोधित कर देता है। वह सफाई के प्रति ऐसी सनक को नापसन्द करता है।

सच्चा पति और प्रेमी – बसन्त मधु का पति है। वह उससे सच्चा प्रेम करता है। वह उसके तकल्लुफ भरे जीवन से उसे बाहर निकालना चाहता है। वह इस कारण उसको गिरती सेहत के प्रति चिन्तित है और उसको समझाता है-अब तुम जीवन का रहस्य समझ पाई हो। जीवन का भेद बाह्य तड़क-भड़क में नहीं अन्तर की दृढ़ता में है।

हँसमुख और शिष्ट – बसन्त हँसमुख है। वह प्रसन्न रहता है। शिष्टाचार के नाम पर अनावश्यक निषेध उसको पसन्द नहीं है। वह नैसर्गिक तथा स्वाभाविक जीवन जीने में विश्वास करता है।

प्रश्न 3.
मधु के द्वारा मान्य शिष्टाचार में स्निग्धता नहीं है, क्यों? बसन्त के विवाह से पूर्व के अपने मित्रों के व्यवहार को आप क्या कहेंगे? क्या वह शिष्टाचार है?
उत्तर:
शिष्टाचार क्या है, इस बारे में भी मधु तथा बसन्त में मतभेद है। मधु के अनुसार, उठने-बैठने, बोलने चलने आदि के नियम हैं। इनका घर, परिवार तथा समाज में हर स्थान पर पालन करना अनिवार्य है। ये नियम नकारात्मक हैं। इनमें दूसरे की तौलिया का प्रयोग न करना, बिना पैर धोए रजाई में न बैठना, बिस्तर पर बैठकर न खाना-पीना आदि सभ्यता और शिष्टाचार के सूचक नियम हैं। इन नियमों का पालन कठोरता के साथ करना-कराना होता है। मधु को इसमें ढील बरदाश्त नहीं है। इस कारण उसका अपने पति से सदा विवाद बना रहता है। यदि इनके पालन पर इतना जोर न होता तो उनमें स्निग्धता होती।

बसन्त शिष्टाचार के स्वरूप के विषय में मधु से सहमत नहीं है। जीवन में अनेक चिन्ताएँ तथा आपदाएँ हैं। शिष्टाचार के बचपन से मनुष्य को और अधिक कष्ट उठाना पड़ता है। यह न करो, वह न करो, ऐसे न करो, वैसे न बोलो आदि नकारात्मक आदेश उसकी कठिनाइयों को बढ़ाते हैं। यह शिष्टाचार का कठोर रूप है तथा इसमें कोमलता तथा स्निग्धता लेशमात्र भी नहीं है। मधु के साथ विवाह होने से पूर्व बसन्त अपने मित्रों-देव और नारायण के साथ एक ही रजाई घुटने तक मोड़कर बैठता था। गपशप करता था और चाय पीता था। सर्दियों में ऐसा करने में बड़ा सुख मिलता था। इसकी कल्पना भी उसको आनन्ददायक और स्निग्ध लगती है। अब अलग-अलग कुर्सियों पर बैठना, डाइनिंग रूम में चाय पीना, बेडरूम में किसी को आने न देना कितना स्नेहहीन तथा कठोर लगता है। यह शिष्टाचार नहीं, तकल्लुफ है। जो बसन्त को नापसन्द है।

बसन्त का मित्रों के साथ व्यवहार स्नेहपूर्ण तथा आनन्ददायक है। उसमें प्रदर्शन नहीं है। उसमें प्रेम है, घृणा नहीं। यदि किसी से प्रेम, स्नेह और अपनत्व दिखाना शिष्टता है तो बसन्त का व्यवहार नि:संदेह शिष्टाचार है।

प्रश्न 4.
“तुमने फिर अपने मामा और मौसा की क्या छेड़ी?” बसन्त मधु को मामा और मौसा के बारे में कुछ कहने से क्यों रोकता है?
उत्तर:
सफाई की बात छिड़ने पर मधु अपने मामा और मौसा के बारे में कुछ कहना चाहती है किन्तु बसन्त उसको रोक देता है। इन दोनों का व्यवहार उसको अशिष्टतापूर्ण लगता है। उसमें अपनत्व और प्रेम नहीं है। वह बताता है कि एक बार मधु के मौसा आए थे। उन्होंने अपने हाथ धोये तो बसन्त ने उनको तौलिया दिया। उन्होंने उससे हाथ पोंछने से मना कर दिया और अपने रूमाल से हाथ पोंछे। इसी प्रकार एक बार वह मधु के मामा के घर रात को रुक गया। सुबह सीधे दफ्तर जाना था। उसके मामा के आग्रह पर उसने अपनी हजामत बनाई। मामा ने एक मामूली पुराना रेजर उसको दिया। कहा- मैं मेहमानों के लिए अलग रेजर रखता हूँ, अपना रेजर किसी को नहीं देता, जब उनको लगा कि बसन्त नाराज हो गया है तो उन्होंने अपना रेजर दे दिया। किन्तु बसन्त के हजामत बनाने के बाद उसका ब्लेड निकालकर फिकवा दिया तथा रेजर को स्टरलाइज अर्थात् रोगाणुमुक्त कराया। बसन्त का मानना है कि दोनों का व्यवहार स्नेहशून्य, अतिथि सत्कार की परम्परा के विरुद्ध तथा आशालीन है। वह विलायत हो आए हैं परन्तु इससे उनकी हर बात माननीय नहीं हो जाती।

मधु द्वारा स्वच्छता के सम्बन्ध में उनके व्यवहार का उदाहरण दिया जाना बसन्त को ठीक नहीं लगता। अत: वह उसको सुनना नहीं चाहता और मधु को रोक देता है। उनका व्यवहार स्वच्छता के प्रति अतिरंजनापूर्ण है तथा वह स्वाभाविकता के विपरीत है।

प्रश्न 5.
‘तौलिये’ एकांकी की रचना का उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
उपेन्द्रनाथ अश्क का एकांकी “तौलिये” एक उद्देश्यपूर्ण रचना है। एकांकीकार ने इसमें जीवन में सफाई और स्वच्छता का महत्त्व बताने के साथ ही उसके वास्तविक स्वरूप पर भी प्रकाश डाला गया है।

मधु सफाई को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानती है। उसका मानना है कि सफाई पर ध्यान न देने वाला मनुष्य पशु से भी गया-बीता है। सफाई के प्रति उसके विचार अतिरंजित हैं। इस मामले में वह कुछ सनकी है। वह चाहती है कि परिवार में कोई व्यक्ति किसी अन्य का तौलिया प्रयोग नहीं करे। प्रत्येक काम जैसे हजामत, हाथ पोंछने, बदन पोंछने आदि के लिए भी एक ही आदमी अलग-अलग तौलिए प्रयोग करे।

उसका पति बसन्त इस सम्बन्ध में उससे सहमत नहीं है। अलग-अलग तौलियों का प्रयोग, रजाई में पैर धोकर बैठना, चाय, पानी आदि पीने के लिए भी डाइनिंग टेबल परे भागना, मित्रों को अलग-अलग कुर्सियों पर बैठाकर बातें करना आदि बसन्त को ठीक नहीं लगता। वह कोई भी तौलिया प्रयोग कर लेता और मधु की झिड़कियाँ सुनता है। शादी से पहले वह अपने मित्रों के साथ रजाई में बैठकर गप्पें लड़ाता तथा चाय पीता था। उसको ऐसा करना स्वाभाविक और सुखद लगता है। वह मधु से कहता है कि सफाई अच्छी बात है किन्तु वह उसको सनक तक पहुँचा देती है इससे उसे चिढ़ है।

‘तौलिये’ एकांकी की रचना यही बताने के लिए की गई है कि सफाई अच्छी आदत है, उसकी सनक ठीक नहीं है। जीवन में स्वाभाविक आचरण ही आनन्ददायक होता है। सफाई पर आवश्यकता और औचित्य से ज्यादा जोर देने से पारिवारिक वातावरण तनावपूर्ण हो जाता है तथा वह अशान्त हो उठाता है। अशान्ति से परिवार तथा समाज को हानि पहुँचती है। अत: सफाई के नाम पर सनकी होना ठीक नहीं है।

प्रश्न 6.
तकल्लुफ और शिष्टाचार में क्या अन्तर है? शिष्टाचार दुःखदायी कब हो जाता है?
उत्तर:
तकल्लुफ का आशय है–अस्वाभाविक व्यवहार। जब हम स्वयं को सभ्य औ सुसंस्कृत दिखाने के लिए कुछ ऐसे काम करते हैं जिनके कारण हम दूसरों से भिन्न तथा असामान्य प्रतीत होते हैं तो उस व्यवहार को तकल्लुफ कहा जाता है। कहते हैं दो नवाब एक गाड़ी में चढ़ना चाहते थे। वे तकल्लुफ में पहले आप पहले आप कहते रह गए और गाड़ी चली गई। वे दोनों प्लेटफॉर्म पर खड़े एक दूसरे का मुँह देख रहे थे और उनको देखकर लोग उनकी हँसी उड़ा रहे थे।

शिष्टाचार शिष्ट आचरण को कहते हैं। जब हमारा व्यवहार शिष्टतापूर्ण होता है तो उसको शिष्टाचार कहते हैं। विनम्रता, स्नेह, प्रेम, आदर आदि गुण शिष्टाचार के अंग होते हैं। बड़ों के प्रति प्रेम और विनम्रता तथा छोटों के प्रति स्नेह और सदाचार में शिष्टचार के दर्शन होते हैं।

किसी के प्रति तकल्लुफ दिखाने का अर्थ है कि हम उसके प्रति हार्दिक सौहार्द नहीं कर रहे। केवल स्नेह का दिखावटी प्रदर्शन कर रहे हैं। हमको ऐसा नहीं करना चाहिए। यदि हम किसी व्यक्ति के साथ बनावटी व्यवहार करते हैं तो हम उसको शिष्टाचार कह भले ही दें, वह शिष्टाचार नहीं होता है। ऐसा शिष्टाचार दु:खदायी हो जाता है। इसका स्वरूप निषेधात्मक होता है तथा उसमें यह न करो, वह न करो, आदि नकारात्मक आदेशों का प्रधान्य होता है। उसको कोई पसन्द नहीं करता।

प्रश्न 7.
आपको किस प्रकार का जीवन पसन्द है? मधु की कल्पना को या बसन्त के विचारों का? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
मुझको किस प्रकार का जीवन पसन्द है। मधु की कल्पना का अथवा बसन्त के विचारों का ? इस प्रश्न का उत्तर देने से पूर्व मैं मधु तथा वसन्त के जीवन सम्बन्धी विचारों पर दृष्टिपात करना पसन्द करूंगा।

मधु सुसंस्कृत तथा सभ्य जीवन को मनुष्य होने का लक्षण मानती है। कोई भी व्यक्ति स्वयं को असभ्य अथवा असंस्कृत कहलाना पसन्द नहीं करेगा। किन्तु संस्कृति और सभ्यता का मधु अपना अलग ही रूप है। इस रूप में यह न करो, ऐसा मत कहो आदि नकारपूर्ण आदेश हैं। उसमें कठोर नियन्त्रण और बन्धन है। इनको मानने से जीवन का आनन्द नष्ट हो जाता है तथा वह सुखद नहीं रह जाता। तौलिये को लेकर उसने अपने प्रेमी तथा पति बसन्त की नाकों में दम कर रखा है तथा परिवार में अशान्त और कलह का वातावरण पैदा कर दिया है।

बसन्त उदार, स्वच्छन्द तथा बाह्य नियन्त्रण मुक्त जीवन का पक्षपाती है। उसे जीवन की स्वाभाविकता अच्छी लगती है। नैसर्गिक जीवन में रस और आनन्द है। वह किसी भी तौलिये से अपना बदन पोंछ सकता है। मित्रों के साथ बिना पैर धोए रजाई में बैठकर चाय पी सकता है तथा गप्पें लड़ा सकता है। उसे इसमें कुछ भी अनुचित नहीं लगता। किन्तु मधु ऐसा करने के बारे में सोच भी नहीं सकती।

उपर्युक्त बातों से स्पष्ट है कि बसन्त के विचार जीवन को स्वाभाविकता के साथ स्वीकार करने के पक्ष में हैं और मधु के विचार उसको दिखावटी के बंधन में बाँधने का समर्थन करते हैं।

मैं जीवन की स्वाभाविकता को स्वीकार करूंगा और बसन्त के पक्ष में समर्थन करूंगा।

तौलिये लेखक परिचय

प्रश्न–
उपेन्द्रनाथ अश्क का जीवन परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक सेवाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर–
जीवन परिचय–एकांकीकार उपेन्द्रनाथ अश्क का जन्म पंजाब के जालंधर नगर में 14 दिसम्बर सन् 1910 को एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। अपने जालंधर के डी.ए.वी. कॉलेज से बी.ए. और एल.एल.बी. की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की, सन् 1965 में आपको संगीत नाटक अकादमी पुस्कार प्राप्त हुआ। आप 19 जनवरी, 1996 में दिवंगत हो गए।

साहित्यिक परिचय–अश्क जी ने अध्यापक, पत्रकार तथा लेखक के रूप में कार्य किया। आपने एकांकी, नाटक, उपन्यास, कहानी, निबन्ध, संस्मरण, समालोचना इत्यादि गद्य विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई। आप फिल्में तथा रेडियो क्षेत्रों में भी कार्यरत रहे। अश्क जी के नाटक तथा एकांकी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। आपके पात्रों के चरित्र–चित्रण में गहराई हैं। रंगमंच की दृष्टि से आप सफल एकांकियों के रचयिता हैं। आपके संवाद प्रभावशाली तथा चुस्त होते हैं। आपकी भाषा सरल, सहज तथा प्रवाहपूर्ण है। तत्सम शब्दावली के साथ उर्दू शब्द भी उसमें प्रयुक्त हुए हैं। शैली नाटकीय है, उसमें यत्र–तत्र व्यंग्यात्मक तथा आंचलिकता है।

रचनाएँ–अश्कजी की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैंनाटक–जय–पराजय, लौटता हुआ दिन, अलग–अलग रास्ते, स्वर्ग की झलक, भँवर, बड़े खिलाड़ी आदि। एकांकी संग्रह–देवताओं की छाया में, चरवाहे, मुखड़ा बदल गया, तूफान से पहले, साहब को जुकाम है, अंधी गली, आदि। उपन्यास–गिरती दीवारें, शहार में धूम का आईना, गर्म राख, सितारों के खेल आदि। कहानी संग्रह–जुदाई की शाम के गीत, काले साहब, पिंजरा, सत्तर श्रेष्ठ कहानियाँ आदि। संस्मरण–मंटो मेरा दुश्मन, फिल्मी जीवन की झलकियाँ। . समालोचना–अन्वेषण की सहयात्रा तथा हिन्दी कहानी एक अंतरंग परिचय। काव्य–एक दिन आकाश ने कहा, प्रातः प्रदीप, दीपक जलेगा, बरगद की पेटी ऊर्मियाँ।

तौलिये पाठ सारांश

प्रश्न–
उपेन्द्रनाथ अश्क द्वारा रचित तौलिये’ शीर्षक एकांकी का सारांश लिखिए।
उत्तर–
‘तौलिये’ उपेन्द्रनाथ अश्क का पारिवारिक जीवन पर आधारित एक मनोवैज्ञानिक एकांकी है। बसन्त तथा मधु पति–पत्नी हैं। दोनों के संस्कार भिन्न–भिन्न हैं। उनमें छोटी–छोटी बातों पर विवाद हो जाता है। इसका प्रभाव परिवार की शान्ति पर पड़ता है। बसन्त और मधु एकांकी के प्रमुख पात्र हैं। मंगला, सुरों, चिन्ती आदि पात्र भी हैं। सारांश का घटनास्थल नई दिल्ली है।

आरम्भ–मंच पर बसन्त के कमरे का दृश्यहै। उसकी सजावट मध्यम वर्ग के परिवार जैसी है। समय नवम्बर, 1943 का है। बसन्त हजामत बनाने के बाद मदन के तौलिये से मुँह पोंछ रहा है। उसकी पत्नी मधु उसको रोकती है। कि वह अलग–अलग कामों के लिए अलग–अलग तौलियों का प्रयोग क्यों नहीं करता। बसन्त उसकी बात को हँसकर टालना चाहता है। बसन्त बताता है कि वह छ: भाई एक ही तौलिये का प्रयोग करते थे। कभी कोई बीमारी नहीं हुई। वह मधु को ऐरिस्टोक्रेटिक वातावरण में पढ़ी–बढ़ी बताता है। मधु चिढ़ जाती है। वह कहती है सफाई जरूरी है। उसके बिना मनुष्य बीमार हो जाता है। बसन्त कहता है सफाई जरूरी है परन्तु उसकी सनक अच्छी नहीं है। शरीर में प्रतिरोधक क्षमता होनी चाहिए। बीमारी पास नहीं फटकती। बसन्त चूहा सैरनशाह का उदाहरण देता है। वहाँ पीने के लिए साफ पानी भी नहीं है। लोग जोहड़ का पानी पीते हैं।

वहाँ के जाट अत्यन्त स्वस्थ हैं। उनके शरीर के रक्त में भरपूर लाल कण हैं। मधु कहती है तो उसे जोहड़ का पानी पीना पड़ेगा। फिर वह आपने मामाजी की सफाई पसन्दगी का उदाहरण देती है। बसन्त उसको रोक देता है। वह उनके व्यवहार को मनुष्यों के बीच भेदभाव करने वाला तथा अपमान जनक बताता है। दोनों के विवाद बढ़ता है। तो मधु रूठ जाती है और अपने पिता के घर जाने के लिए तैयार होती है। तभी दफ्तर से बसन्त के लिए फोन आता है। उसे तुरन्त बनारस जाने का आदेश मिलता है। वह मधु से कहता है वह अपना सामान बाद में बाँधे, पहले उसके जाने की तैयारी कर दे। तभी पर्दा गिरता है।

दूसरा दृश्य–पर्दा खुलता है। दृश्य मधु के शयनकक्ष का है। फर्नीचर तथा वस्तुएँ प्रथम दृश्य, की हैं किन्तु उनका स्थान बदल जाता है। कमरे में टँगे कलैण्डर से पता चलता है कि जनवरी, 1494 है। सर्दी अधिक है। बाहर से आती ठण्डी हवा को रोकने के लिए यधु नौकरानी मंगला से कहती है। वह रजाई में लेटी हुई है। वह कुछ उदास है। उसी समय उसकी कॉलेज की सहेलियाँ सुरो और चिन्ती वहाँ आती हैं। मधु उनको अपने पास बुला लेती है तथा अपने पास ही रजाई में बैठने को कहती है। वे बिस्तर गन्दे होने की बात कहती हैं किन्तु मधु उनसे सौहार्द्रपूर्ण व्यवहार करती है और आग्रह पूर्वक रजाई में ही बैठा लेती है। वह मंगला से उनके लिए चाय बनवाती है तथा बिस्तर पर बैठकर उनके साथ चाय पीती है। कुछ देर रुककर वे चली जाती हैं।

मधु अपनी नौकरानी को बुलाकर पूछती है कि वह पहले से बहुत बदल गई है। मंगला कोई उत्तर नहीं देती है। मधु बताती है कि बसन्त उससे नाराज होकर चला गया है। दो महीने से उसने उसको कुशल क्षेम पूछने के लिए पत्र भी नहीं लिखा। वह उसको नाराज नहीं करना चाहती। वह स्वयं को उसके स्वभाव के अनुसार बदल रही है। तभी बसन्त आता है। वह प्रसन्नतापूर्वक मधु से बातें करता है। मधु उससे कहती है कि वह उससे नाराज होकर चला गया, पत्र तक नहीं लिखा। बसन्त उसको बताती है कि उसेने पत्र लिखा था। वह उससे नाराज नहीं हो सकता। मधु की शिकायत दूर हो जाती है। वह बसन्त को बताती है कि वह उससे घृणा नहीं करता। उसने स्वयं को पूरी तरह बदल डाला है। वह बसन्त से कहती है कि वह हाथ–मुँह धो डाले। वह उसके लिए चाय तैयार करती है। बहुत सर्दी है। पहले तो बसन्त मना करता है किन्तु बाद में हाथ–मुँह धोने चला जाता है। वह लौटकर आता है तथा उसी तौलिये से हाथ–मुँह पोंछ लेता है जिसको कुछ समय पहले सुरो और चिन्ती ने प्रयोग किया था।

यह देखते ही मधु तुरन्त नाराज हो जाती है। बसन्त और मधु में फिर से विवाद शुरू हो जाता है। मधु धम्म से कोच पर गिर जाती है।

तौलिये महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्याएँ

1. बसन्त–मैं तुम्हें किस प्रकार विश्वास दिलाऊँ कि मैं स्वयं सफाई का बड़ा भारी समर्थक हूँ।
मधु–(हँसती है) इसमें क्या सन्देह है?
बसन्त–और मुझे स्वयं गन्दगी पसन्द नहीं है। मधु–(सिर्फ हँसती है।)
बसन्त–पर मैं तुम्हारी तरह ‘अरिस्टोक्रेटिक’ (Aristocratic) वातावरण में नहीं पला और मुझे नजाकतें नहीं आतीं। हमारे घर में सिर्फ एक तौलिया होता था और हम छ: भाई उसे काम में लाते थे।
मधु–आप मुझे अरेस्टोक्रेट कहकर मेरा उपहास करते हैं। मैं कब कहती हूँ, दस–दस तौलिये हों।
बसन्त–दस और किस तरह होते हैं? नहाने का अलग। हजामत बनाने का अलग। हाथ–मुँह पोंछने का अलग। और फिर तुम्हारे और मदन के।
मधु–(पहलू बदलकर) लेकिन मैं पूछती हूँ, इसमें दोष क्या है? जब हम खरीद सकते हैं तो क्यों न दस–दस तौलिये रखें। कल परमात्मा न करे हम इस योग्य न रहें, तो मैं आपको दिखा दूं, कि किस तरह गरीबी में भी सफाई रखी जा सकती है–तौलिये न सही, खादी के अँौंछे सही–कुछ भी रखा जा सकता है। लेकिन जिस तौलिए से किसी दूसरे ने बदन पोंछा हो, उससे किस प्रकार कोई अपना शरीर पोंछ सकता है? (पृष्ठ संख्या 73)

कठिन शब्दार्थ–अरिस्टोक्रेटिक = कुलीन, रईस। नजाकत = सुकुमारता। उपहास = हँसी, मजाक। बदन = शरीर।।

सन्दर्भ एवं प्रसंग–प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य–पुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘तौलिये’ शीर्षक एकांकी से लिया गया है। इसके रचयिता उपेन्द्रनाथ अश्क हैं।।
मधु चाहती है कि प्रत्येक मनुष्य का अलग तौलिया हो तथा प्रत्येक काम के लिए भी अलग तौलिया हो। उसका पति इस बात का ध्यान नहीं रख पाता। वह किसी भी तौलिया का प्रयोग कर लेता है। इस कारण दोनों में विवाद होता है।

व्याख्या–बसन्त मधु से कहता है कि वह सफाई को पसन्द करता है, इस बात का विश्वास उसको वह किस तरह दिलाए। मधु हँसकर कहती है कि उसकी बात में सन्देह नहीं है। बसन्त पुनः कहता है कि उसको गन्दगी नहीं है। मधु केवल हँसती है, कहती कुछ नहीं। बसन्त पुन: कहता है कि उसका पालन–पोषण रईसी के वातावरण में नहीं हुआ है। जैसा कि मधु का हुआ है। उसको अपने को कोमल दिखाना भी नहीं आता। उसके छः भाई थे। उनके घर में एक ही तौलिया होता था। सभी उसी एक तौलिये को काम में लाते थे। मधु ने उससे कहा कि वह उसको रईस कहकर उसकी हँसी उड़ा रहा है।

वह नहीं कह रही कि घर में दस तौलिये हों। बसन्त ने प्रतिवाद किया। नहाने, हजामत बनाने, हाथ–मुँह पोंछने के लिए अलग–अलग तौलिये होंगे। एक तौलिया मधु का और एक मदन का होगा। इस तरह दस तौलिये तो होंगे ही। मधु तुरन्त अपनी कही हुई बात से पलट जाती है और कहती है कि यदि वे खरीद सकते हैं तो दस तौलिये रखने में भी कोई दोष नहीं है। ईश्वर न करे, यदि कल वे लोग गरीब हो जाएँ, तब भी वह दिखा देगी कि गरीबी में भी सफाई रखी जा सकती है और तौलिये खरीदना सम्भव न हो तो खादी के अंगोछे से भी काम चलाया जा सकता है। किन्तु जिस तौलिये से कोई आदमी पहले अपना शरीर पोंछ चुका है उससे कोई भी अपना शरीर नहीं पोंछ सकता।

विशेष–
(i) मधु सफाई पसन्द है। वह नहीं चाहती है कि घर में सभी एक ही तौलिये का प्रयोग करें।
(ii) बसन्त मधु का पति है। वह किसी के भी तौलिये को उठा लेता है। इससे दोनों में विवाद छिड़ जाता है।
(iii) भाषा सरल है तथा पात्रों के अनुकूल है।
(iv) संवाद शैली है।

2. बसन्त–(उठकर कमरे में घूमता हुआ) तुम इस बात पर अपनी विषाक्त हँसी बिखेर सकती हो (उसके सामने रुककर) तुम्हें मालूम हो कि अमेरिका के डाक्टर वहीं रहे। एक जाट के रक्त का उन्होंने विश्लेषण किया। मालूम हुआ कि उसमें रोग का मुकाबला करने वाले लाल कीटाणु रोग की मदद करने वाले कीटाणुओं से कहीं ज्यादा हैं। तब उन्होंने वहाँ के लोगों की खुराक का निरीक्षण किया। पता चला कि वे अधिकतर दही और लस्सी का प्रयोग करते हैं और दही में बहुत–सी बीमारियों के कीटाणुओं को मारने की शक्ति है। बीमारी का मुकाबला इन नजाकतों और नफासतों से नहीं होता बल्कि शरीर में ऐसी शक्ति पैदा करने से होता है जो रोग के आक्रमण का प्रतिविरोध कर सके। (फिर घूमने लगता है) (पृष्ठ संख्या 74)

कठिन शब्दार्थ–विषाक्त = जहरीला। जाट = एक भारतीय जाति। कीटाणु = छोटे जीव। खुराक = खान–पान। लस्सी = छाछ। नजाकत = कोमलता। नफासत = श्रेष्ठ।

सन्दर्भ एवं प्रसंग–प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य–पुस्तक ‘सृजन’ में संकलित एकांकी तौलिये’ से लिया गया है। इसके लेखक उपेन्द्रनाथ अश्क हैं।

बसन्त मधु को बताता है कि स्वस्थ शरीर ही बीमारी से बचाता है सफाइ का प्रदर्शन नहीं। वह चूहा सैदनशाह के रहने का उदाहरण देता है। वहाँ पीने का स्वस्थ पानी भी नहीं है वे जोहड़ का पानी पीते हैं। परन्तु वे लोग स्वस्थ हैं।

व्याख्या–मधु व्यंग्यपूर्वक हँसकर बसन्त से कहती है कि क्या वह यह चाहता है कि वे भी जोहड़ का पानी पीने लगे। मधु की हँसी बसन्त को चुभती है। वह उठकर कमरे में टहलने लगता है। फिर वह उससे कहता है कि वह यह बात सुनकर व्यंग्यपूर्ण विषैली हँसी हँस सकती है। फिर मधु के सामने रुककर उसको बताता है कि अमेरिका के डॉक्टर चूहा सैदनशाह में ही रुके। उन्होंने वहाँ के रहने वाले एक जाट के खून की जाँच की तो पता चला कि उसके खून में लालकण रोग फैलाने वाले कीटाणुओं से अधिक हैं। लाल कण रोग के कीटाणुओं से लड़ते हैं और उनको पनपने नहीं देते। इसके बाद डॉक्टरों ने देखा कि वहाँ के लोग क्या खाते–पीते हैं। मालूम हुआ कि वे लोग दही और लस्सी का प्रयोग ज्यादा करते हैं। दही में बीमारियों के कीटाणुओं को मारने की शक्ति है। बीमारियों से लड़ने के लिए सफाई आदि की सुकुमारता तथा बनावटी श्रेष्ठता की भावना जरूरी नहीं होती। उसके लिए शरीर में शक्ति चाहिए।

विशेष–
(i) बसन्त मानता है कि अच्छा स्वास्थ्यप्रद भोजन शरीर को शक्तिशाली बनाता है। उससे बीमारियों से रक्षा होती है। सफाई की सनक से नहीं।
(ii) वह चूहा सैदनशाह के निवासियों के स्वास्थ्य का उदाहरण अपनी बात के समर्थन में प्रस्तुत करता है।
(iii) भाषा सरल है तथा उसमें प्रवाह है।
(iv) संवाद शैली है। उसमें व्यंग्य निहित है।

3. मधु–मैं कहती हूँ आप उनके स्वभाव से परिचित नहीं, आपको बुरा लगा। स्वच्छता की भावना भी काव्य और कला ही की भाँति……।
बसन्त–(आवेग में उसके पास आकर) क्यों काव्य और कला को अपनी इस घृणा में घसीटती हो। तुम्हारे ऐसे वातावरण में पले हुए सब लोगों की नफासत में नफरत की भावना काम करती है–शरीर से, गन्दगी से, जीवन से नफरत की। (पृष्ठ संख्या 73)

कठिन शब्दार्थ–काव्य = कविता, आवेश = उत्तेजना। नफरत = घृणा।

सन्दर्भ एवं प्रसंग–प्रस्तुत गद्यात्मक संवाद हमारी पुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘तौलिये’ शीर्षक एकांकी से लिए गए हैं। इनके रचयिता उपेन्द्रनाथ अश्क हैं।

सफाई के बारे में मधु और बसन्त के तर्क–वितर्क चल रहे हैं। मधु को एक ही तौलिये के प्रयोग से गन्दगी फैलने का भय सताता है। वह कहती है कि सफाई एक अच्छी आदत है।

व्याख्या–मधु के मामा को सफाई की सनक बसन्त को मनुष्य के लिए अपमानजनक लगती है। मधु बसन्त को बताती है कि सफाई उसके मामा का स्वभाव में है। बसन्त उनके स्वभाव के बारे में नहीं जानता। इसलिए बसन्त द्वारा प्रयुक्त अपने उस्तरे को रोगाणुमुक्त कराना उसको बुरा लगा। सफाई की भावना तो कला और कविता के समान श्रेष्ठ है। इस कथन पर उत्तेजित होकर बसन्त मधु के पास जाकर उसको रोकता है वह कहता है कि उसके मन में जो घृणा की भावना है उसमें काव्य और कला जैसी ऊँची चीजों को शामिल करना ठीक नहीं है। रईसी और उच्चता के वातावरण में वह पली है, वैसे ही वातावरण में पलने वाले लोगों के मन में अपने को ऊँचा समझने की भावना होती है। इसमें दूसरों को नीचा समझकर उनसे घृणा करने की भावना छिपी होती है। वे शरीर से, गन्दगी से, जीवन से––सबसे घृणा करते हैं।

विशेष–
(i) बसन्त सफाई की सनक को रईसी वातावरण में जन्म लेने का परिणाम बताता है।
(ii) वह मानता है कि उसके पीछे अपनों को दूसरों से श्रेष्ठ मानकर उनसे घृणा करने की भावना छिपी रहती है।
(iii) भाषा सरल है तथा पात्रानुकूल हैं।
(iv) संवाद शैली है।

4. बसन्त–स्वच्छता बुरी नहीं, पर तुम हर चीज को सनक की हद तक पहुँचा देती हो और सनक से मुझे चिढ़ है। (फिर कमरे में घूमने लगता है) बनियानों और तौलियों की कैद मैंने मान ली, किन्तु यदि मैं गलती से बनियान न बदल पाऊँ, या गलत तौलिया ले लूँ तो इसका यह मतलब तो नहीं कि मैं स्वभाव से गन्दा हूँ और मेरे इस स्वभाव पर तुम्हें मुँह फुलाकर बैठ जाना या अपनी विषैली हँसी बिखेरना चाहिए।
मधु–(चुप रहती है।)
बसन्त–(रेडियो के पास से) तुमने अपने आपको इन मिथ्या बन्धनों में इतना जकड़ लिया है कि मेरा जरा–सा खुलापन भी तुम्हें अखरता है। अपने सिद्धान्तों को तुमने सनक की हद तक पहुँचा दिया है। (पृष्ठ संख्या 75)

कठिन शब्दार्थ–सनक = किसी चीज का घोर विचार–शून्य समर्थन। हद = सीमा। मुँह फुलाना = नाराज होना। विषैली = जहरीली, व्यंग्यपूर्ण।

सन्दर्भ एवं प्रसंग–प्रस्तुत गद्यखण्ड हमारी पाठ्य–पुस्तक ‘सृजन’ में संकलित तौलिये शीर्षक एकांकी से लिया गया है। इसके रचयिता उपेन्द्रनाथ अश्क है।

बसन्त के उस संवाद में स्वच्छता को अच्छी किन्तु उसके पीछे बिना विचार भागने की आदत को अच्छा नहीं माना जाता है।

व्याख्या–बसन्त स्वीकार करता है कि सफाई अच्छी चीज है। उसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन मधु सफाई की आदत को किसी सीमा, किसी नियम में बाँधना नहीं चाहती। वह उसके पीछे बिना विचार पड़ जाती है। सफाई की यह सनक अच्छी बात नहीं है। इससे उसको चिढ़ होती है। वह कमरे में घूमने लगता है। उसके मन में कुछ उत्तेजना है। वह फिर कहता है कि मधु ने बार–बार बनियान बदलने तथा हर बार नई तौलिया इस्तेमाल करने का जो नियम उस पर लाद दिया है वह उसे कैद की तरह लगता है। उसने इसको स्वीकार भी कर लिया है, किन्तु यदि वह बनियान और तौलिया बदलना भूल जाय अथवा कोई गलत तौलिया प्रयोग कर ले तो इसका यह अर्थ तो नहीं लगाया जा सकता है कि वह स्वभाव से ही गन्दगी पसन्द करने वाला है। उसको इस आदत पर मधु का नाराज होना और रूठ कर बैठ जाना क्या उचित हैं। क्या उसको इस बात को लेकर उसके साथ व्यंग्यपूर्ण बातें करनी चाहिए और उसकी हँसी उड़ानी चाहिए।

विशेष–
(i) बसन्त सरल स्वभाव का है। वह प्रदर्शन प्रिय नहीं है।
(ii) वह सफाई को अच्छा किन्तु सफाई की सनक को बुरा समझता है।
(iii) भाषा में तत्सम शब्दों के साथ उर्दू शब्दों तथा मुहावरों का प्रयोग हुआ है।.
(iv) संवाद शैली है। इसमें विचारात्मकता है।

5. बसन्त–(उसके व्यंग्य को सुना–अनसुना करके तिपाई पर बैठते हुए) हँसना उनका स्वभाव है। वे हँसेगी तो बेबात की बात पर हँसेगी और तुम्हारी ऐटीकेट– बस दबे–दबे घुटे घुटे फिरो ऊँह ! (बेजारी से सिर हिलाकर उठता है) जो आदमी जी भर खा–पी नहीं सकता। हँस–हँसा नहीं सकता, वह जीवन में कर ही क्या सकता है। चिन्ताओं और आपत्तियों के बन्धन ही क्या कम हैं। जो जीवन को शिष्टाचार की बेड़ियों से जकड़ दिया जाए––यह न करो, वह न करो, ऐसे न बोलो, वैसे न बोलो–इन आदेशों का कहीं अन्त भी है। (पृष्ठ संख्या 76)

कठिन शब्दार्थ–बेबात = बिना बात। ऐटीकेट = सभ्य आचरण। घुटे–घुटे = मन की बात खुलकर न कह पाना। बेजारी = व्याकुलता। बेड़ी जंजीर।

सन्दर्भ एवं प्रसंग–प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य–पुस्तक में संकलित तौलिया’ शीर्षक एकांकी से लिया गया है। इसके रचयिता उपेन्द्रनाथ अश्क हैं।

बसन्त सफाई को अच्छा मानता है किन्तु उसके लिए अपनी उदार जीवन शैली को छोड़ने के पक्ष में नहीं है। सफाई के नाम पर बात–बात में रोक–टोक का वह विरोधी है।

व्याख्या–मधु को निम्मो और उषी का हँसोड़पन पसन्द नहीं है। बसन्त इसको बुरा नहीं समझता। मधु के व्यंग्य पर ध्यान न देकर वह कहता है कि निम्मो और उषी बच्चियाँ हैं और हँसना उनकी आदत है। वे बिना बात अथवा बात–बात पर हँसती हैं। परन्त मधु को यह हँसना असभ्यता लगता है। चुप और गम्भीर रहना उसकी दृष्टि से सभ्याचरण है। बसन्त अपना सिर हिलाकर व्याकुलता प्रगट करता है। यदि कोई आदमी अपनी मर्जी से खा–पी न सके, हँस न सके तो उसका तो जीना ही बेकार है। मनुष्य का जीवन अनेक चिन्ताओं और परेशानियों के बन्धनों में बँधा हुआ है। ऊपर से शिष्टाचार का बन्धन और बाँध दिया जाय। उसे बात–बात पर रोका–टोका जाय। अपनी मर्जी से कुछ करने और बोलने भी न दिया जाये तो ऐसा जीवन किस काम का? प्रत्येक बात में रोक या निषेध है। ऐसे नकारात्मक आदेशों का कोई अन्त होता भी नहीं दीखता।

विशेष–
(i) बसन्त मुक्त जीवन जीने का पक्षधर है। मधु का बनावटी सभ्याचरण उसको पसन्द नहीं है।
(ii) वह प्रत्येक बात में रोक–टोक को जीवन का आनन्द छीनने वाला आदेश मानता है।
(iii) भाषा पात्रानुकूल और सरल है।
(iv) शैली नाटकीय है।

6. मधु–मानव की आधारभूत भावनाओं पर नित्य नये दिन चढ़ते चले जाने वाले पर्दो का नाम ही तो संस्कृति है। सोसाइटी के एक वर्ग के लिए दूसरा वर्ग सदैव असभ्य और असंस्कृत रहेगा। फिर कहाँ तक आदमी सभ्यता और संस्कृति के पीछे भागे।
सुरो–यह तुम क्या कह रही हो? क्या तुम चाहती हो कि इतना कुछ सीख–समझकर मनुष्य फिर पहले की भाँति बर्बर बन
जाएँ?
मधु–नहीं बर्बर बनने की क्या जरूरत है? मनुष्य सीमाओं को छूता हुआ क्यों चले। मध्य का मार्ग क्यों न अपनाये। न इतना खुले कि बर्बर दिखाई दे, न इतना बँधे कि सनकी। महात्मा बुद्ध ने कहा था.
सुरो–(हँसकर) महात्मा बुद्ध ! तुम्हें हो क्या गया है, सदियों पुराने गले सड़े विचारों को तुम आज की सभ्यता पर लादना चाहती हो। चिन्ती–मनुष्य हर घड़ी, हर पल प्रगति पथ पर अग्रसर है। आज के सिद्धान्त कल काम न देंगे और कल के परसों। (पृष्ठ संख्या 80)

कठिन शब्दार्थ–आधारभूत = मूल। असंस्कृत = शालीनतारहित। बर्बर = असभ्य, जंगली। अग्रसर = आगे बढ़ना।

सन्दर्भ एवं प्रसंग–प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य–पुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘तौलिये’ शीर्षक एकांकी से लिया गया है। इसके रचयिता उपेन्द्रनाथ अश्क हैं।

मधु अपने शयन कक्ष में अपनी कॉलेज की सहेलियों सुरो और चिन्ती के साथ में बैठी है। वे चाय पी रही हैं और बातचीत कर रही हैं। वे मधु से कहती हैं यदि मनुष्य आराम के लिए बिस्तर पर बैठकर चाय पी सकता है तो कुछ और ऐसे काम भी कर सकता है जो सभ्यता और संस्कृति के विरुद्ध हों।

व्याख्या–मधु ने चिन्ती को बताया कि मनुष्य के मन की कुछ मूल भावनायें होती हैं। समय के साथ उनमें कुछ परिवर्तन होते हैं। उन पर नित्य नए–नए जो परिवर्तन के पर्त चढ़ते जाते हैं, उनको ही संस्कृति कहते हैं। समाज का एक वर्ग दूसरे वर्ग को असभ्य तथा अशिष्ट मानता है। फिर यह तय कर पाना कठिन है कि सभ्य कौन है और असभ्य कौन? अत: सभ्यता के पीछे भागना बेकार है। सुरो ने असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि तब तो मनुष्य पहले की तरह असभ्य और जंगली हो जायगा। इसने जो सीखा है, वह बेकार जायगा। मधु ने कहा कि असभ्य होने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य बीच का रास्ता भी चुन सकता है। न वह इतना खुलापन दिखाए कि जंगली दिखाई दे और न इतना नियमों से बँधे कि सनकी लगे। महात्मा बुद्ध ने कहा था। मधु की बात पूरी होने से पहले सुरो और चिन्ती उसको हँसकर रोक देती हैं और कहती हैं कि बुद्ध की बातें बहुत पुरानी हो चुकीं, वे आज की सभ्यता के उपयुक्त नहीं हैं। उन पिछड़ी बातों को सभ्यता के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। मनुष्य हर पल उन्नति कर रहा है। कल के पुराने नियम आज बेकार हैं। आज के नियम कल काम नहीं आयेंगे और कल के नियम परसों बेकार हो जायेंगे।

विशेष–
(i) सभ्यता व संस्कृति प्राकृतिक आचरण के विपरीत चलने को कहते हैं।
(ii) सभ्यता और संस्कृति के सिद्धान्त निरन्तर बदलते हैं और एक समय में बेकार हो जाते हैं।
(ii) भाषा पात्रानुकूल तथा सरल है।
(iv) शैली संवादों की है तथा विचारात्मक है।

7. मधु–यदि मैं बचपन ही से ऐसे वातावरण में पली हूँ जहाँ सफाई और सलीके का बेहद ख्याल रखा जाता है तो इसमें मेरा क्या दोष? (लगभग भरे हुए गले से) वे सफाई और व्यवस्था की मेरी इच्छा की घृणा बताते हैं। मैं बहुतेरा यत्न करती हूँ कि इस सब सफाई–वफाई को छोड़ दूँ, इन तकल्लुफात को तिलांजलि दे दूँ, पर अपने इस प्रयास में कभी–कभी मुझे अपने आप से घृणा होने लगती है। (लम्बी साँस भरकर) बचपन से जो संस्कार मैंने पाये हैं उनसे मुक्ति पाना मेरे लिए उतना आसान नहीं। (अचानक दृढ़ता से) पर नहीं। मैं इन सब बहमों को छोड़ दूंगी। पुरानी आदतों से छुटकारा पा लूँगी। वे समझते हैं, मैं उनसे नफरत करती हूँ। (पृष्ठ संख्या 82)

कठिन शब्दार्थ–बेहद = बहुत ज्यादा। भरा गला होना = दुःखी होना। तकल्लुफ = दिखावा, प्रदर्शन। प्रयास = प्रयत्न। बहम = भ्रम। नफरत = घृणा। सलीका = काम करने का तरीका।

सन्दर्भ एवं प्रसंग–प्रस्तुत गद्य खंड हमारी पाठ्य–पुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘तौलिये’ शीर्षक एकांकी से लिया गया है। इसके लेखक उपेन्द्रनाथ अश्क हैं। बसन्त की नाराजगी दूर करने के लिए मधु अपने आपको बदलना चाहती है। वह अपनी नौकरानी मंगला से पूछती है क्या वह सचमुच बहुत बदल गई है? उसकी सफाई की आदत के कारण बसन्त समझता है कि वह उससे घृणा करती है।

व्याख्या–मधु मंगला को बताती है कि वह बचपन से जिस वातावरण में पली और बड़ी हुई है, उसमें सफाई पर बहुत अधिक ध्यान दिया जाता है। प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य–पुस्तक ‘सृजन’ में संकलित तौलिये’ शीर्षक एकांकी से लिया गया है। इसके लेखक उपेन्द्रनाथ अश्क हैं। उसको इसी कारण सफाई का बहुत ख्याल रहता है। इसमें उसका दोष नहीं है। अपनी बात कहते हुए मंगला दुःखी हो उठती है। वह आगे बताती है कि बसन्त उसकी सफाई की आदत को और सब कुछ व्यवस्थित रखने की उसकी इच्छा को उसकी घृणा समझता है। वह बहुत प्रयत्न करता है कि इस सफाई बगैरह को छोड़ दे। इस दिखावे को त्याग दे। परन्तु जब वह ऐसा करती है तो उसको अपने आप से घृणा होने लगती है। कुछ निराश होकर वह बताती है कि सफाई की आदतें उसको बचपन से सिखाई गई हैं। उनको छोड़ देना आसान बात नहीं है। फिर वह अचानक अपने मन को मजबूत करके कहती है कि अब वह किसी भ्रम में नहीं पड़ेगी। वह अपनी पुरानी आदतों को छोड़ देगी। वह उस आदत से छुटकारा पा लेगी जिसके कारण बसन्त समझता है कि वह उससे घृणा करती है।

विशेष–
(i) इस संवाद में मधु का बसन्त के प्रति प्रेम व्यक्त हुआ है।
(ii) वह अपनी सफाई की आदत को बसन्त की प्रसन्नता के लिए छोड़ना चाहती है।
(iii) भाषा सरल है। उसमें तत्सम शब्दों के साथ उर्दू के शब्द भी हैं।
(iv) संवाद शैली में विचारात्मकता हैं।