RBSE Class 6 Hindi Malhar Chapter 2 Question Answer गोल
Explore theseRBSE Solutions Class 6 HindiMalhar Chapter 2 गोल (संस्मरण) Question Answer to test your grasp of the chapter content.
गोल Class 6 Question Answer
गोल Question Answer Class 6
Class 6 Hindi Chapter 2 गोल Question Answer
मेरी समझ से-
(क) नीचे दिए गए प्रश्नों का सटीक उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा (*) बनाइए-
(1) “दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है। अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते तो शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता। “मेजर ध्यानचंद की इस बात से उनके बारे में क्या पता चलता है?
(अ) वे अत्यंत क्रोधी थे।
(ब) वे अच्छे ढंग से बदला लेते थे।
(स) उन्हें हॉकी से मारने पर वे अधिक गोल करते थे।
(द) वे जानते थे कि खेल को सही भावना से खेलना चाहिए।
उत्तर:
(द) वे जानते थे कि खेल को सही भावना से खेलना चाहिए।
(2) लोगों ने मेजर ध्यानचंद को ‘हॉकी का जादूगर’ कहना क्यों शुरू कर दिया?
(अ) उनके हॉकी खेलने के विशेष कौशल के कारण
(ब) उनकी हॉकी स्टिक की अनोखी विशेषताओं के कारण
(स) हॉकी के लिए उनके विशेष लगाव के कारण
(द) उनकी खेल भावना के कारण
उत्तर:
(अ) उनके हॉकी खेलने के विशेष कौशल के कारण
(ख) अब अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
उत्तर:
(1) मेजर ध्यानचन्द खेल को सही भावना से खेलना जानते थे। उनको इस बात का बोध था कि वैमनस्यता से सफलता या बदला नहीं लिया जा सकता है। धैर्य से ही सफलता या मुकाबला किया जा सकता है।
(2) मेजर ध्यानचन्द को लोगों ने उनके हॉकी खेलने के विशेष कौशल के कारण हॉकी का जादूगर कहना शुरू कर दिया क्योंकि उनके पास एक बार गेंद आ जाती थी तो वे उसे अपने कौशल से गोल तक पहुँचाकर ही दम लेते थे। उनसे कोई गेंद छीन ही नहीं सकता था।
मिलकर करें मिलान –
पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें इनके सही अर्थों या संदर्भों से मिलाइए। इसके लिए आप शब्दकोश, इंटरनेट या अपने शिक्षकों की सहायता ले सकते हैं-
उत्तर:


पंक्तियों पर चर्चा-
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार कक्षा में अपने समूह में साझा कीजिए और अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए-
(क) “बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी।”
उत्तर:
बुरा काम करने वाला व्यक्ति इस डर से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुरा ही होगा। कर्म का फल निश्चित होता है अर्थात् हम जैसा कर्म करते हैं। उसी अनुसार ही फल मिलता है। जैसे—हम आम का पेड़ लगायेंगे तो आम के ही फल मिलेंगे और आँकड़े का पौधा लगायेंगे तो आँकड़ा ही मिलेगा। इसलिए बुरा कार्य करने वाला व्यक्ति बुराई के फल प्राप्ति से आशंकित रहता है। अतः भला कार्य करें जिसमें कोई डर नहीं हो।
(ख) “मेरी तो हमेशा यह कोशिश रहती कि मैं गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को दे दूँ ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाए। अपनी इसी खेल भावना के कारण मैंने दुनिया के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया।”
उत्तर:
मेजर ध्यानचन्द को हॉकी के खेल में अतिरिक्त कुशलता हासिल थी। खेलते समय अधिकतर ‘गोल’ वे ही करते थे किन्तु उनकी हमेशा यही कोशिश रहती थी कि ‘गोल’ करने का श्रेय उनके सहयोगियों को मिले इसलिए ‘गेंद को गोल के पास लाकर उनको सौंप देते थे जिससे वे गोल कर सकें। उनकी इस तरह की अत्यधिक कोशिश ने लोगों का दिल जीत लिया था। इस कारण लोग उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहकर पुकारते थे।
सोच-विचार के लिए-
संस्मरण को एक बार फिर से पढ़िए और निम्नलिखित के बारे में पता लगाकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए-
(क) ध्यानचंद की सफलता का क्या रहस्य था?
उत्तर:
मेजर ध्यानचन्द की सफलता का यह रहस्य था कि वे खेल को खेल भावना से खेलते थे। उनमें बदले की भावना नहीं थी बल्कि सहयोग की भावना थी । यहीं उनकी सफलता का रहस्य था।
(ख) किन बातों से ऐसा लगता है कि ध्यानचंद स्वयं से पहले दूसरों को रखते थे?
उत्तर:
मेजर ध्यानचन्द की हॉकी का खेल खेलते समय कई बार यही कोशिश रहती थी कि वे गेंद को गोल के पास ले जाकर साथी खिलाड़ी को दे देते जिससे गोल करने का श्रेय उसे मिले। इन बातों से लगता है कि ध्यानचन्द स्वयं से पहले दूसरों को रखते थे।
शब्दों के जोड़े, विभिन्न प्रकार के-
(क) “जैसे-जैसे मेरे खेल में निखार आता गया, वैसे-वैसे मुझे तरक्की भी मिलती गई।” इस वाक्य में ‘जैसे- जैसे’ और ‘वैसे-वैसे’ शब्दों के जोड़े हैं जिनमें एक ही शब्द दो बार उपयोग में लाया गया है। ऐसे जोड़ों को ‘शब्द-युग्म’ कहते हैं। शब्द-युग्म में दो शब्दों के बीच में छोटी-सी रेखा लगाई जाती है जिसे योजक चिह्न कहते हैं। योजक यानी जोड़ने वाला। आप भी ऐसे पाँच शब्द-युग्म लिखिए।
उत्तर:
1. थोड़ी-थोड़ी
2. जल्दी-जल्दी
3. धीरे-धीरे
4. कहाँ-कहाँ
5. बार-बार।
(ख) “खेल के मैदान मेंधक्का-मुक्कीऔरनोंक- झोंककी घटनाएँ होती रहती हैं।” इस वाक्य में भी आपको दो शब्द-युग्म दिखाई दे रहे हैं, लेकिन इन शब्द-युग्मों के दोनों शब्द भिन्न-भिन्न हैं, एक जैसे नहीं हैं। आप भी ऐसे पाँच शब्द-युग्म लिखिए जिनमें दोनों शब्द भिन्न-भिन्न हों।
उत्तर:
1. लोग-बाग
2 इक्का-दुक्का
3. तितर-बितर
4. चाल-ढाल
5. टेढ़ा-मेढ़ा।
(ग) “हार या जीतमेरी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।”
‘आज मैं जहाँ भी जाता हूँबच्चे व बूढ़ेमुझे घेर लेते हैं।”
इन वाक्यों में जिन शब्दों के नीचे रेखा खिंची है, उन्हें ध्यान से पढ़िए। हम इन शब्दों को योजक की सहायता से भी लिख सकते हैं, जैसे- हार-जीत, बच्चे-बूढ़े आदि। आप नीचे दिए गए शब्दों को योजक की सहायता से लिखिए-
• अच्छा या बुरा
• छोटा या बड़ा
• अमीर और गरीब
• उत्तर और दक्षिण
• गुरु और शिष्य
• अमृत या विष
उत्तर:
1. अच्छा-बुरा
2. उत्तर – दक्षिण
3. छोटा-बड़ा
4. गुरु-शिष्य
5. अमीर-गरीब
6. अमृत – विष।
बात पर बल देना-
“मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है।”
“मैंने तो अपना बदला ले लिया है।”
इन दोनों वाक्यों में क्या अंतर है? ध्यान दीजिए और बताइए । सही पहचाना! दूसरे वाक्य में एक शब्द कम है। उस एक शब्द के न होने से वाक्य के अर्थ में भी थोड़ा अंतर आ गया है।
हम अपनी बात पर बल देने के लिए कुछ विशेष शब्दों का प्रयोग करते हैं जैसे- ‘ही’, ‘भी’, ‘तो’ आदि। पाठ में से इन शब्दों वाले वाक्यों को चुनकर लिखिए। ध्यान दीजिए कि यदि उन वाक्यों में ये शब्द न होते तो उनके अर्थ पर इसका क्या प्रभाव पड़ता।
उत्तर:
वाक्य में किसी शब्द या पद के बाद जो अव्यय लगकर एक विशेष बल या अवधारणा को व्यक्त करते हैं, वे ‘निपात’ कहलाते हैं, जैसे-ही, भी, तो तक आदि। ये वाक्यों में विशेष बल देते हैं। इनका प्रयोग न होने पर साधारण अर्थ या भाव प्रकट होते हैं। पाठ में प्रयुक्त वाक्य-
- उन दिनों भी यह सब चलता था।
- आते ही मैंने उस खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रखकर कहा।
- मेरे कहते ही वह खिलाड़ी घबरा गया।
- अब हर समय मुझे ही देखता रहा।
- मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।
- उसके साथ भी बुराई की जाएगी।
- आज मैं जहाँ भी जाता हूँ।
- वैसे-वैसे मुझे तरक्की भी मिलती गई।
- सारे गोल मैं ही करता था।
पाठ से आगे-
आपकी बात-
(क) ध्यानचंद के स्थान पर आप होते तो क्या आप बदला लेते? यदि हाँ, तो बताइए कि आप बदला किस प्रकार लेते?
उत्तर:
मेजर ध्यानचंद के स्थान पर मैं होता / होती तो उन्हीं की तरह ही धैर्य रखते हुए कुछ समय पश्चात् खेल के मैदान में पहुँचकर दुगुने साहस के साथ खेल भावना से खेल कौशल से उसे पराजित करता/करती । खेल समाप्ति के बाद उसे अपने पास बुलाकर शान्ति से समझाता/समझाती कि खेल को खेल भावना से खेलना चाहिए। हार-जीत तो होती रहती है। दोनों परिस्थितियों में प्रेरणा लेनी चाहिए कि व्यक्ति हारकर ही जीतना सीखता है। अर्थात् असफलता ही सफलता की कुंजी है।
(ख) आपको कौन-से खेल और कौन-से खिलाड़ी सबसे अधिक अच्छे लगते हैं? क्यों?
उत्तर:
हमें बैडमिंटन, टेनिस एवं क्रिकेट आदि खेल सबसे अधिक अच्छे लगते हैं। हमें सानिया नेहवाल, पीवी सिंधु, सानिया मिर्जा, महेश भूपति, सचिन तेन्दुलकर, महेन्द्र सिंह धोनी, मिताली राज आदि खिलाड़ी सबसे अधिक अच्छे लगते हैं। ये अपने-अपने खेल में सर्वश्रेष्ठ हैं। ये खिलाड़ी हमें अच्छे इसलिए लगते हैं कि इन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय भावना से खेल खेलकर अपना कौशल प्रदर्शित करते हुए हमारे देश को अनेक पदक एवं सम्मान दिलाए हैं और देश का नाम रोशन किया है।
Class 6 गोल Question Answer
बहुविकल्पात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1.
मेजर ध्यानचन्द का जन्म कब हुआ?
(अ) 1905
(ब) 1933
(स) 1936
(द) 1979
उत्तर:
(अ) 1905
प्रश्न 2.
ध्यानचन्द किस खेल से सम्बन्धित थे?
(अ) फुटबॉल
(ब) कुश्ती
(स) हॉकी
(द) क्रिकेट
उत्तर:
(स) हॉकी
प्रश्न 3.
ध्यानचन्द 1933 में कौनसी टीम की ओर से हॉकी खेलते थे?
(अ) सैंपर्स एवं माइनर्स टीम
(ब) पंजाब रेजिमेंट
(स) हरियाणा रेजिमेंट
(द) राजपूताना रेजिमेंट
उत्तर:
(ब) पंजाब रेजिमेंट
प्रश्न 4.
माइनर्स टीम के एक खिलाड़ी ने गुस्से में क्या किया?
(अ) मैदान छोड़कर चला गया
(ब) अपनी हार मान ली
(स) हॉकी स्टिक ध्यानचन्द के सिर पर दे मारी
(द) ध्यानचन्द की स्टिक छीन ली
उत्तर:
(स) हॉकी स्टिक ध्यानचन्द के सिर पर दे मारी
प्रश्न 5.
‘गोल’ पाठ हिन्दी साहित्य की कौनसी विधा है?
(अ) कहानी
(स) जीवनी
(ब) कविता
(द) संस्मरण
उत्तर:
(द) संस्मरण
प्रश्न 6.
पंजाब रेजिमेन्ट ने माइनर्स टीम को कितने गोल से हराया?
(अ) छ:
(ब) चार
(स) दो
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) छ:
प्रश्न 7.
ध्यानचन्द सर्वप्रथम कौनसी सेना में भर्ती हुए?
(अ) पंजाब रेजिमेन्ट
(ब) फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट
(स) राजपूताना रेजिमेंट
(द) असम रेजिमेंट
उत्तर:
(ब) फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट
प्रश्न 8.
सैनिकों के रहने का क्षेत्र कहलाता है?
(अ) रेजिमेंट
(ब) कारागार
(स) छावनी
(द) रिजर्व क्षेत्र
उत्तर:
(स) छावनी
प्रश्न 9.
सन् 1936 में ओलंपिक खेल कहाँ हुए?
(अ) भारत
(ब) बर्लिन
(स) बीजिंग
(द) कोरिया
उत्तर:
(ब) बर्लिन
प्रश्न 10.
बर्लिन ओलंपिक के लिए ध्यानचन्द को हॉकी दल का क्या बनाया गया?
(अ) कसान
(ब) गोलरक्षक
(स) प्रशिक्षक
(द) संयोजक
उत्तर:
(अ) कसान
रिक्त स्थानों की पूर्ति –
प्रश्न 11.
रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्द से कीजिए-
(i) खिलाड़ी मुझसे गेंद ……………………….. की कोशिश करते। (पकड़ने / छीनने)
उत्तर:
छीनने
(ii) मुझे मैदान से ……………………….. ले जाया गया। (अन्दर / बाहर)
उत्तर:
बाहर
(iii) मैं ……………………….. फिर मैदान में आ पहुँचा। (पट्टी बाँधकर / दवा लेकर)
उत्तर:
पट्टी बाँधकर
(iv) दोस्त, खेल में इतना ……………………….. अच्छा नहीं। (गुस्सा / प्यार)
उत्तर:
गुस्सा
(v) मेरी ……………………….. का हॉकी खेल में काफी नाम था। (स्कूल / रेजिमेंट)
उत्तर:
रेजिमेंट
(vi) बर्लिन ओलंपिक में हमें ……………………….. पदक मिला। (रजत/स्वर्ण)
उत्तर:
स्वर्ण
अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 12.
मेजर ध्यानचन्द किस नाम से प्रसिद्ध हैं?
उत्तर:
मेजर ध्यानचन्द ‘हॉकी का जादूगर’ नाम से प्रसिद्ध हैं।
प्रश्न 13.
खेल के मैदान में कौनसी घटनाएँ होती रहती हैं?
उत्तर:
खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक की घटनाएँ होती रहती हैं।
प्रश्न 14.
बर्लिन ओलंपिक कौन-से सन् में हुआ?
उत्तर:
बर्लिन ओलंपिक 1936 में हुआ।
प्रश्न 15.
बुरा काम करने वाला आदमी किस बात से डरता रहता है?
उत्तर:
वह डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी।
प्रश्न 16.
बर्लिन ओलंपिक में ‘स्वर्ण पदक’ किसकी जीत कहा गया है?
उत्तर:
पूरे भारत देश की जीत कहा गया है।
प्रश्न 17.
किसी खेल को नया-नया सीखने वाला क्या कहलाता है?
उत्तर:
नौसिखिया खिलाड़ी।
प्रश्न 18.
ध्यानचन्द की खेल में क्या कोशिश रहती थी?
उत्तर:
ध्यानचन्द की हमेशा यह कोशिश रहती कि गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी को दे दें जिससे कि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाए।
लघूत्तरात्मक प्रश्न-
प्रश्न 19.
विरोधी टीम का खिलाड़ी क्यों घबरा रहा था?
उत्तर:
चोट लगने के बाद ध्यानचन्द ने पट्टी बाँधकर मैदान में आकर विरोधी खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रखकर कहा कि “तुम चिन्ता मत करो इसका बदला मैं जरूर लूँगा।” इतना सुनते ही खिलाड़ी घबरा गया कि कब उसके सिर पर भी हॉकी स्टिक लगने वाली है।
प्रश्न 20.
लेखक ने खेल समाप्ति पर विपक्षी खिलाड़ी को कैसे समझाया?
उत्तर:
ध्यानचन्द ने खेल समाप्ति पर विपक्षी खिलाड़ी की पीठ थपथपाई और समझाया कि “दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं है। खेल को खेल भावना से खेलना चाहिए। उसमें अवांछित गतिविधि नहीं करनी चाहिए।”
प्रश्न 21.
ध्यानचन्द ने बच्चों-बूढ़ों को अपनी सफलता का क्या राज बताया?
उत्तर:
ध्यानचन्दं जहाँ भी जाते बच्चे व बूढ़े उन्हें घेरकर उनकी सफलता का राज पूछते तो वे कहते कि उनके पास सफलता का कोई गुरु मंत्र तो नहीं है। लेकिन लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र हैं।
प्रश्न 22.
ध्यानचन्द खेलते समय हमेशा किस बात का ध्यान रखते थे?
उत्तर:
ध्यानचन्द खेलते समय हमेशा इस बात का ध्यान रखते थे कि हार या जीत उनकी नहीं अपितु संपूर्ण देश की है। अर्थात् वे व्यक्तिगत हितों की न सोचकर देशहित की भावना से खेलते थे। उनकी नजरों में देश ही सर्वोपरि था।
निबन्धात्मक प्रश्न-
प्रश्न 23.
विपक्षी खिलाड़ी सचमुच बड़ा शर्मिन्दा कैसे हुआ? बताइए।
उत्तर:
विपक्षी खिलाड़ी ध्यानचन्द से गेंद छीनने का प्रयास करते किन्तु असफल रहते तो उनमें से एक खिलाड़ी ने गुस्से में उनके सिर पर ‘हॉकी स्टिक’ दे मारी। वे पट्टी बाँधकर पुन: लौटे और उस खिलाड़ी से कहा कि “इसका बदला मैं जरूर लूँगा।” इस बात से खिलाड़ी डरता रहा किन्तु ध्यानचन्द ने कौशल दिखाते हुए छः गोल कर मैच जीत लिया। खिलाड़ी की पीठ थपथपाते हुए ध्यानचन्द ने कहा कि “यदि तुम स्टिक से नहीं मारते तो शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।” यह सुन वह खिलाड़ी बड़ा शर्मिन्दा हुआ।
प्रश्न 24.
मेजर ध्यानचन्द को हॉकी का जादूगर क्यों कहा जाता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मेजर ध्यानचन्द को उनकी हॉकी खेल में तरक्की को देखकर सन् 1936 में उन्हें बर्लिन ओलंपिक में भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया। उन्होंने खेल भावना से खेलते हुए भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। लोग उन्हें हॉकी का जादूगर कहते थे, इसका मतलब यह नहीं कि सारे गोल वे ही करते थे। बल्कि उनकी यही कोशिश रहती थी कि गेंद उनके पास आते ही गेंद को गोल के पास तक ले जाकर साथी खिलाड़ी को देते थे जिससे कि गोल का श्रेय उसे मिल सके। इसीलिए लोगों का दिल जीतने के कारण उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहा जाता था।
गद्यांश पर आधारित प्रश्नोत्तर-
निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर लिखिए।
(1)
खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक की घटनाएँ होती रहती हैं। खेल में तो यह सब चलता ही है। जिन दिनों हम खेला करते थे, उन दिनों भी यह सब चलता था।
सन् 1933 की बात है। उन दिनों में, मैं (ध्यानचंद ) पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करता था। एक दिन ‘पंजाब रेजिमेंट’ और ‘सैंपर्स एंड माइनर्स टीम’ के बीच मुकाबला हो रहा था। ‘माइनर्स टीम’ के खिलाड़ी मुझसे गेंद छीनने की कोशिश करते, लेकिन उनकी हर कोशिश बेकार जाती। इतने में एक खिलाड़ी ने गुस्से में आकर हॉकी स्टिक मेरे सिर पर दे मारी। मुझे मैदान से बाहर ले जाया गया।
प्रश्न-
1. धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक की घटनाएँ कहाँ होती रहती हैं?
2. मेजर ध्यानचन्द कौनसी टीम के खिलाड़ी थे?
3. कौन-सी टीम की हर कोशिश बेकार जाती?
4. ध्यानचन्द को मैदान से बाहर क्यों जाना पड़ा?
उत्तर:
1. खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक- झोंक की घटनाएँ होती रहती हैं।
2. मेजर ध्यानचन्द ‘पंजाब रेजिमेंट’ टीम के खिलाड़ी थे।
3. ‘माइनर्स टीम’ की ध्यानचन्द से गेंद छीनने की हर कोशिश बेकार जाती।
4. माइनर्स टीम के एक खिलाड़ी ने गुस्से में आकर हॉकी स्टिक ध्यानचन्द के सिर पर दे मारी। इसलिए उन्हें मैदान से बाहर जाना पड़ा।
(2)
मेरा जन्म सन् 1905 में प्रयाग में एक साधारण परिवार में हुआ। बाद में हम झाँसी आकर बस गए। 16 साल की उम्र में मैं ‘फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट’ में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हो गया। मेरी रेजिमेंट का हॉकी खेल में काफी नाम था। पर खेल में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी । उस समय हमारी रेजिमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी थे। वे बार-बार मुझे हॉकी खेलने के लिए कहते। हमारी छावनी में हॉकी खेलने का कोई निश्चित समय नहीं था। सैनिक जब चाहे मैदान में पहुँच जाते और अभ्यास शुरू कर देते। उस समय तक मैं एक नौसिखिया खिलाड़ी था।
प्रश्न –
1. लेखक का परिवार कहाँ से कहाँ आकर बस गया?
2. कौन-सी रेजिमेंट का हॉकी खेल में बहुत नाम था?
3. प्रारम्भ में ध्यानचन्द की खेल के प्रति कैसी भावना थी?
4. लेखक को हॉकी खेलने के लिए किसने प्रेरित किया?
उत्तर:
1. लेखक का परिवार प्रयाग से झाँसी आकर बस गया।
2. ‘फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट’ का हॉकी खेल में बहुत नाम था।
3. प्रारम्भ में ध्यानचन्द की खेल के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं थी।
4. लेखक को हॉकी खेलने के लिए रेजिमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी ने बार-बार प्रेरित किया।
(3)
जैसे-जैसे मेरे खेल में निखार आता गया, वैसे-वैसे मुझे तरक्की भी मिलती गई। सन् 1936 में बर्लिन ओलंपिक में मुझे कप्तान बनाया गया। उस समय मैं सेना में लांस नायक था। बर्लिन ओलंपिक में लोग मेरे हॉकी खेलने के ढंग से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मुझे ‘हॉकी का जादूगर’ कहना शुरू कर दिया। इसका यह मतलब नहीं कि सारे गोल मैं ही करता था। मेरी तो हमेशा यह कोशिश रहती कि मैं गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को दे दूँ ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाए। अपनी इसी खेल भावना के कारण मैंने दुनिया के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया। बर्लिन ओलंपिक में हमें स्वर्ण पदक मिला। खेलते समय मैं हमेशा इस बात का ध्यान रखता था कि हार या जीत मेरी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।
प्रश्न-
1. ध्यानचन्द के खेल में निखार एवं तरक्की का क्या परिणाम निकला?
2. ध्यानचन्द के हॉकी खेलने के ढंग से प्रभावित होकर लोग उन्हें क्या कहने लगे?
3. ध्यानचन्द की हमेशा क्या कोशिश रहती थी?
4. ध्यानचन्द खेलते समय किस बात का ध्यान रखते थे?
उत्तर:
1. इसके परिणामस्वरूप 1936 में बर्लिन ओलंपिक में उन्हें हॉकी टीम का कसान बनाया गया।
2. लोग उन्हें हॉकी का जादूगर कहने लगे।
3. उनकी हमेशा यही कोशिश रहती कि वे गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने साथी खिलाड़ी को दे दें जिससे गोल करने का श्रेय उसे मिले।
4. वे खेलते समय हमेशा ध्यान रखते थे कि हार या जीत उनकी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।
गोल Class 6 Summary
कठिन शब्दार्थ एवं पाठ का सार
कठिन शब्दार्थ – नोंक-झोंक = आपस की छेड़छाड़ या कहासुनी। मुकाबला प्रतियोगिता या आमना सामना। घबरा गया = परेशान या अशांत हो गया। पीठ थपथपाई = प्रशंसा या शाबाशी देना। गुस्सा क्रोध या रोष या प्रकोप । शर्मिन्दा = लज्जित या शर्मसार। राज = रहस्य । रेजिमेन्ट सैन्यदल या सैन्य इकाई। दिलचस्पी = लगन या रुझान या अभिरुचि। छावनी सैनिकों की बस्ती या शिविर। नौसिखिया हाल में काम सीखने वाला या जो काम में निपुण न हो। निखार निर्मलता या स्वच्छता। तरक्की = अभिवृद्धि या विकास। जादूगर = बाजीगर या मायावी श्रेय = यश या कीर्ति। कप्तान = दल का नायक, मुखिया, सेनानायक, नेता।
पाठ-सार – हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचन्द का जन्म 1905 में प्रयाग में एक साधारण परिवार में हुआ। 16 वर्ष की उम्र में ‘फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेन्ट’ में इनकी भर्ती हुई। वहीं से उन्होंने हॉकी खेलने का निश्चय किया। 1936 में इन्हें बर्लिन ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बनाकर भेजा गया। उसमें उन्होंने भारतीय टीम को ‘स्वर्ण पदक’ दिलवाया। उनकी विशेषता थी कि उनके पास एक बार गेंद आ जाती तो वे ‘गोल’ करके ही दम लेते थे। इसलिए उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहा जाता है।