RBSE Class 6 Sanskrit Chapter 11 Question Answer पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि
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Class 6 Sanskrit Chapter 11 Question Answer पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि
कक्षा 6 संस्कृत पाठ 11 के प्रश्न उत्तर
Class 6 Sanskrit Deepakam Chapter 11 Question Answer
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
[नोट- स्वयं कीजिए।
प्रश्न 2.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु।
(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर एक पद में लिखिए।)
उत्तर:
(क) त्रीणि।
(ख) लघुचेतसाम्।
(ग) उद्यमेन।
(घ) विनयम्।
(ङ) स्वर्गात्।
(च) स्वर्णमयी।

प्रश्न 3.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकवाक्येन उत्तराणि लिखन्तु।
(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर एक वाक्य में लिखिए।)
उत्तर:
(क) पृथिव्यां ‘जलम्, अन्नं सुभाषितम् च’ इति त्रीणि रत्नानि सन्ति।
(ख) उदारचरितानां कृते तु सम्पूर्णा पृथ्वी एव परिवारः भवति।
(ग) मृगाः स्वयमेव सुप्तस्य सिंहस्य मुखे न प्रविशन्ति।
(घ) अभिवादनशीलस्य नित्यम् ‘आयुः विद्या यशः बलं च’ इति चत्वारि वर्धन्ते।
(ङ) मनुष्यः धनात् धर्मम् आप्नोति।
(च) उत्पन्नेषु कार्येषु परहस्तगतं धनम् उपयोगाय न भवति।

प्रश्न 4.
चित्रं दृष्ट्वा वाक्यानि रचयन्तु।
(चित्र देखकर वाक्य रचना कीजिए।)
उत्तर:
(क) वृक्ष: छायां यच्छति। त्वं छायां स्वीकरोषि। अहं छायां स्वीकरोमि।
(ख) वृक्षः काष्ठानि यच्छति। त्वं काष्ठानि स्वीकरोषि। अहं काष्ठानि स्वीकरोमि।
(ग) वृक्षः पुष्पाणि यच्छति। त्वं पुष्पाणि स्वीकरोषि। अहं पुष्पाणि स्वीकरोमि।
(घ) वृक्ष: पत्राणि यच्छति। त्वं पत्राणि स्वीकरोषि। अहं पत्राणि स्वीकरोमि ।
(ङ) वृक्ष वस्त्राणि यच्छति। त्वं वस्त्राणि स्वीकरोषि। अहं वस्त्राणि स्वीकरोमि।

प्रश्न 5.
अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ‘आम्’ अथवा ‘न’ इति लिखन्तु।
(अधोलिखित वाक्य पढ़कर ‘आम्’ (हाँ) अथवा ‘न’ (नहीं) लिखिए।)
यथा- किं पृथिव्यां त्राणि रत्नानि सन्ति? – आम्
उत्तर:
(क) त्रीणि रत्नानि जलम् अन्नं पाषाणः च सन्ति? – न
(ख) किं धर्मेण सुखं प्राप्यते? – आम्
(ग) किं विद्या विनयं ददाति? – आम्
(घ) किम् अभिवादनशीलस्य विद्या वर्धते? – आम्
(ङ) किम् उद्यमेन कार्याणि नश्यन्ति? – न
(च) किं जन्मभूमिः स्वर्गात् गरीयसी भवति? – आम्

प्रश्न 6.
चित्रे दर्शितस्य नाम लिङ्गं च निर्दिशन्तु।
(चित्र में दिखलाये गए का नाम और लिंग का निर्देश कीजिए।)
यथा- पुष्पम्-नपुंसकलिङ्गम्
उत्तर:


प्रश्न 7.
वलये पदानि विलिख्य सुभाषितं पूरयन्तु।
(गोले में पद लिखकर सुभाषित को पूरा कीजिए।)
उत्तर:


प्रश्न 8.
पट्टिकातः पदानि चित्वा निर्देशानुसारं पदानि लिखन्तु।
(पट्टिका से पद चुनकर निर्देशानुसार पद लिखिए।)
उत्तर:
(क) प्रथमान्त पुंलिङ्गपदानि सन्ति-
1. उद्यमः 2. विनयः 3. निजः 4. पराक्रमः

(ख) प्रथमान्त – स्त्रीलिङ्गपदानि सन्ति-
1. वसुधा 2. जननी 3. विद्या 4. बुद्धि:
(ग) प्रथमान्त नपुंसकलिङ्गपदानि सन्ति-
1. साहसम् 2. धैर्यम् 3. पत्रम् 4. मूलम्
प्रश्न 9.
पाठगतानि सुभाषितानि स्मृत्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु।
(पाठ में आये हुए सुभाषितों को याद करके रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए।)
उत्तर:
(क) पृथिव्यां त्रीणि रत्नानिजलमन्नंसुभाषितम्।
(ख) उदारचरितानां तुवसुधैवकुटुम्बकं भवति।
(ग) उद्यमेन हिकार्याणिसिद्ध्यन्ति।
(घ) अभिवादनशीलस्य वृद्धोपसेविनःआयुर्विद्या यशो बलं चत्वारिवर्धन्ते।
(ङ) उद्यमःसाहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिःपराक्रमः।
(च) विद्याविनयंददाति।
(छ) जननी जन्मभूमिश्चस्वर्गादपिगरीयसी भवति।
प्रश्न 10.
चित्राणि दृष्ट्वा उचितान् श्लोकांशान् लिखन्तु।
(चित्रों को देखकर उचित श्लोकांश लिखिए।)
उत्तर:


Class 6th Sanskrit Chapter 11 Question Answer
प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रश्नानाम् उत्तराणि विकल्पेभ्यः चित्वा लिखत-
(i) पृथिव्यां कति रत्नानि सन्ति?
(अ) चत्वारि
(ब) पञ्च
(स) षड्
(द) त्रीणि
उत्तर:
(द) त्रीणि
(ii) सुभाषितानि कानि भवन्ति?
(अ) सुन्दरवचनानि
(ब) सुन्दरवस्त्राणि
(स) सुन्दरपुस्तकानि
(द) सुन्दरपुष्पाणि
उत्तर:
(अ) सुन्दरवचनानि
(iii) ‘सत्यम्! एतानि सुभाषितानि सन्ति।’ अत्र विशेषणपदं किम्?
(अ) सन्ति
(ब) सुभाषितानि
(स) एतानि
(द) सत्यम्
उत्तर:
(स) एतानि
(iv) कै: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते?
(अ) मूढैः
(ब) पण्डितैः
(स) बालकै:
(द) धनिकैः
उत्तर:
(अ) मूढैः
(v) कार्याणि केन हि सिध्यन्ति?
(अ) मनोरथेन
(ब) उद्यमेन
(स) बलेन
(द) धनेन
उत्तर:
(ब) उद्यमेन
(vi) वृद्धोपसेविन: कति नित्यं वर्धन्ते?
(अ) चत्वारि
(ब) त्रीणि
(स) पञ्च
(द) सप्त
उत्तर:
(अ) चत्वारि
(vii) जनः धनं कस्मात् प्राप्नोति?
(अ) विनयात्
(ब) धर्मात्
(स) पात्रत्वात्
(द) विद्यायाः
उत्तर:
(स) पात्रत्वात्
(viii) कार्यकाले समुत्पन्ने कीदृशं धनम् उपयोगाय भवति?
(अ) पुस्तकस्थम्
(ब) स्वहस्तगतं
(स) परहस्तगतं
(द) मित्रहस्तगतम्
उत्तर:
(ब) स्वहस्तगतं
(ix) ‘निज:’ इति पदस्य विलोमपदं किम्?
(अ) स्वकीयः
(ब) आत्मनः
(स) मम
(द) परः
उत्तर:
(द) परः
(x) सुतस्य सिंहस्य मुखे के न प्रविशन्ति?
(अ) मृगाः
(ब) गजा:
(स) कपोता:
(द) जनाः
उत्तर:
(अ) मृगाः
प्रश्न 2.
कोष्ठकात् उचितपदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
(i) ………. वसुधैव कुटुम्बकम्। (लघुचेतसां/उदारचरितानां)
(ii) षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र ………. सहायकृत्। (देव/नृपं:)
(iii) धनाद्धर्मः ततः ………. । (विनयम्/सुखम्)
(iv) ………. स्वर्गादपि गरीयसी। (जननी/लङ्का)
(v) विद्या ………. विनयम्। (ददासि/ददाति)
उत्तर:
(i)उदारचरितानांवसुधैव कुटुम्बकम्।
(ii) षडेते यत्र वर्तन्ते तत्रदेवःसहायकृत्।
(iii) धनाद्धर्मः ततःसुखम्।
(iv)जननीस्वर्गादपि गरीयसी।
(v) विद्याददातिविनयम्।
प्रश्न 3.
मञ्जूषातः पदानि चित्वा श्लोकं पूरयतु-
मञ्जूषा
देव:, साहसं यत्र, शक्ति:
उद्यमः ……… धैर्य बुद्धिः ……… पराक्रमः।
षडेते ……… वर्तन्ते तत्र ……… सहायकृत्॥
उत्तर:
उद्यमःसाहसंधैर्यं बुद्धिःशक्तिःपराक्रमः।
षडेतेयत्रवर्तन्ते तत्रदेवःसहायकृत्॥
प्रश्न 4.
एकपदेन उत्तराणि लिखन्तु-
(i) कानि एव सुभाषितानि भवन्ति?
(ii) केषां कृते वसुधैव कुटुम्बकं भवति?
(iii) कार्याणि कै न सिध्यन्ति?
(iv) विनयात् किम् आयाति?
(v) कीदृशी विद्या समागते अवसरे सहायिका न भवति?
उत्तर:
(i) सुन्दरवचनानि।
(ii) उदारचरितानाम्।
(iii) मनोरथैः।
(iv) पात्रताम्।
(v) पुस्तकस्था।
प्रश्न 5.
पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखन्तु –
(क) मूढैः केषु रत्नसंज्ञा विधीयते?
उत्तर:
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।
(ख) आयुर्विद्या यशो बलम् च कस्य वर्धन्ते?
उत्तर:
आयुर्विद्या यशो बलम् च नित्यम् अभिवादनशीलस्य वृद्धोपसेविनः च वर्धन्ते।
(ग) कुत्र देवः सहायकृत् भवति?
उत्तर:
यत्र उद्यमः, साहस, धैर्य, बुद्धिः शक्तिः, च षडेते वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत् भवति।
(घ) जन: पात्रत्वात् किम् आप्नोति?
उत्तर:
जन: पात्रत्वात् धनम् आप्नोति।
(ङ) का स्वर्गादपि गरीयसी? पराक्रमः
उत्तर:
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
प्रश्न 6.
रेखाङ्कितपदम् अधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुर्वन्तु-
(i) मम हस्तेस्फोरकपत्राणिसन्ति।
(ii) पृथिव्यांत्रीणिरत्नानि सन्ति।
(iii)उद्यमेनकार्याणि सिध्यन्ति।
(iv) विद्याविनयंददाति।
(v) तस्यपरमेश्वर:सहायतां करोति।
उत्तर:
प्रश्ननिर्माणम्-
(i) मम हस्ते कानि सन्ति?
(ii) पृथिव्यां कति रत्नानि सन्ति?
(iii) केन कार्याणि सिध्यन्ति?
(iv) विद्या किं ददाति?
(v) तस्य कः सहायतां करोति?
प्रश्न 7.
क्रमानुसारं शब्दार्थ-मेलनं कुर्वन्तु-
(क) – (ख)
(i) मूढै: – माता
(ii) वसुधा – योग्यताम्
(iii) उद्यमेन – पृथ्वी
(iv) पात्रताम् – श्रेष्ठा
(v) गरीयसी – परिश्रमेण
(vi) जननी – मूर्खजनै:
उत्तर:
(i) मूढै: – मूर्खजनै:।
(ii) वसुधा – पृथ्वी।
(iii) उद्यमेन – परिश्रमेण।
(iv) पात्रताम् – योग्यताम्।
(v) गरीयसी – श्रेष्ठा।
(vi) जननी – माता।
Deepakam Class 6 Chapter 11 पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि Summary
पाठ-परिचय- प्रस्तुत पाठ में कुछ सुभाषित हैं। सुभाषित का अर्थ है- सुन्दर वचन। ये सुन्दर वचन हमारे लिए उत्तम कार्य करने की प्रेरणा देते हैं। प्रथम सुभाषित में पृथ्वी के वास्तविक तीन रत्नों का, द्वितीय में क्षुद्र एवं उदार चरित्र। वाले व्यक्तियों का, तृतीय में परिश्रम के महत्त्व का, चतुर्थ में बड़े लोगों के अभिवादन के महत्व का, पञ्चम में उद्यम, साहस आदि छः गुणों का, छठे में विद्या के महत्त्व का, सप्तम में जननी एवं जन्मभूमि के महत्त्व का तथा अष्टम सुभाषित में विद्या एवं धन के समय पर काम लेने का वर्णन करते हुए उत्तम कार्य की प्रेरणा दी गई है।
कठिन शब्दार्थ, अन्वय एवं हिन्दी अनुवाद/भावार्थ
छात्राः! पश्यन्तु, ……………………………….. सुभाषितानि पठामः।
कठिन शब्दार्थ- पश्यन्तु = देखो। अद्य = आज। हस्ते = हाथ में। स्फोरकपत्राणि = चार्ट। भित्तौ = दीवार पर। एतानि = ये सब। सुभाषितानि = सुन्दर वचन। उत्तमकार्यार्थम् = उत्तम कार्य के लिए। यच्छन्ति = देते हैं। पठामः = पढ़ते हैं।
हिन्दी अनुवाद – छात्रो! देखो, आज मेरे हाथ में स्फोरक-पत्र (चार्ट) हैं।
श्रीमान्! स्फोरक – पत्र (चार्ट) में क्या है?
छात्रो! इन स्फोरक – पत्रों (चार्ट) को दीवार पर लगा दीजिए। उसके बाद स्वयं ही देखिए।
श्रीमान्! स्फोरक – पत्र (चार्ट) में तो सुन्दर चित्र है। श्लोक भी हैं।
सही हैं, ये सुभाषित हैं। सुन्दर वचन ही सुभाषित होते हैं। ये हमारे लिए उत्तम कार्य के लिए प्रेरणा देते हैं। श्रीमान् ! तब तो हम सब सुभाषित पढ़ते हैं।
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते॥
पदच्छेद: – पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलम् अन्नम् सुभाषितं मूढैः पाषाण खण्डेषु रत्न संज्ञा विधीयते।
अन्वयः – पृथिव्यां जलम् अन्नं सुभाषितम् (इति) त्रीणि रत्नानि (सन्ति)। मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।
कठिन शब्दार्थ- पृथिव्याम् = पृथ्वी पर। त्रीणि तीन। मूढैः = मूर्खो के द्वारा। पाषाण खण्डेषु = पत्थर के टुकड़ों में। सुभाषितम् = सुन्दर वचन। विधीयते = की जाती है।

हिन्दी अनुवाद / भावार्थ – इस पृथ्वी पर तीन रत्न हैं- जल, अन्न और सुन्दर वचन। किन्तु मूर्ख लोग तो पत्थरों के टुकड़ों को रत्न कहते हैं। अर्थात् जीवन के लिए अन्न, जल और सुन्दर वचन ही उपयोगी हैं, इसलिए वास्तव में ये ही रत्न हैं।
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
पदच्छेदः – अयं निजः परः वा इति गणना लघुचेतसाम् उदारचरितानां तु वसुधा एव कुटुम्बकम्।
अन्वयः – अयं निजः परः वा इति गणना लघुचेतसां (जनानां भवति)। उदारचरितानां (जनानां) तु वसुधा एव कुटुम्बकम् (भवति)।

कठिन शब्दार्थ- निजः = अपना। परः = पराया, अन्य। वा = अथवा। गणना = गिनती। लघुचेतसाम् = क्षुद्र हृदय वालों का। उदारचरितानाम् = उदार स्वभाव वालों का। वसुधा पृथ्वी एव ही। कुटुम्बकम् = परिवार।
हिन्दी अनुवाद / भावार्थ – यह अपना है अथवा पराया (अन्य) है, इस प्रकार की गणना क्षुद्र (संकुचित) हृदय वाले लोगों की होती है। किन्तु उदार स्वभाव वाले लोगों के लिए तो सम्पूर्ण पृथ्वी ही परिवार होता है। वे सभी को अपना परिवार मानते हैं। भेद-भाव नहीं करते हैं।
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
पदच्छेदः- उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।
अन्वयः – कार्याणि उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति मनोरथैः न (सिद्ध्यन्ति)। (यथा ) मृगाः (स्वयं) सुप्तस्य सिंहस्य मुखे न प्रविशन्ति।


कठिन शब्दार्थ – उद्यमेन = परिश्रम से। सिद्ध्यन्ति = सिद्ध (पूर्ण / सफल) होते हैं। मनोरथैः = इच्छाओं से। मृगाः = हरिण। सुप्तस्य = सोते हुए का। मुखे = मुख में। प्रविशन्ति = प्रवेश करते हैं।
हिन्दी अनुवाद / भावार्थ- हम जो भी कार्य करते हैं, वे केवल इच्छा करने से ही सिद्ध (पूर्ण) नहीं होते हैं । कार्य की सिद्धि के लिए परिश्रम तो आवश्यक ही है। सिंह यद्यपि शक्तिशाली होता है, फिर भी भोजन के लिए वह भी परिश्रम करता है। सोये हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं ही प्रवेश नहीं करते हैं। अतः हमें सदैव परिश्रमपूर्वक कार्य करने चाहिए।
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥
पदच्छेदः – अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुः विद्या यशः बलम्।
अन्वयः – तस्य नित्यम् अभिवादनशीलस्य वृद्धोपसेविनः आयुः विद्या यशः बलम् (च इति) चत्वारि वर्धन्ते।
कठिन – शब्दार्थ – अभिवादनशीलस्य = अभिवादन करने वाले का। वृद्धोपसेविनः = बुजुर्गों की सेवा करने वाले का। चत्वारि = चार। वर्धन्ते = बढ़ते हैं।

हिन्दी अनुवाद / भावार्थ – जो व्यक्ति हमेशा बुजुर्गों और बड़े लोगों की सेवा और सम्मान करता है, तथा जो उनको विनम्रतापूर्वक प्रणाम करता है, उस व्यक्ति की आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं।
उद्यमः साहसं धैर्य बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत्॥
पदच्छेदः- उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः षड् एते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत्।
अन्वयः- यत्र उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः च एते षड् वर्तन्ते तत्र देव: सहायकृत् (भवति)।
कठिन – शब्दार्थ – यत्र = जहाँ। उद्यमः = परिश्रम। एते = ये। षड् = छः। देवः = ईश्वर। सहायकृत् = सहायता करने वाला।

हिन्दी अनुवाद / भावार्थ- जो मनुष्य परिश्रम करता है, साहस दिखलाता है, धैर्य धारण करता है, बुद्धि का प्रयोग करता है, बलशाली होता है और पराक्रमी होता है, उसके कार्य में ईश्वर भी सहायता करता है।
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥
पदच्छेदः – विद्या ददाति विनयं विनयात् याति पात्रतां पात्रत्वात् धनम् आप्नोति धनात् धर्मम् ततः सुखम्।
अन्वयः – विद्या विनयं ददाति (मनुष्य) विनयात् पात्रतां याति पात्रत्वात् धनम् आप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम् (च आप्नोति)।

कठिन शब्दार्थ – विनयम् = विनम्रता। ददाति = देती है। पात्रताम् = योग्यता। याति = आती है। आप्नोति = प्राप्त करता है। ततः = तत्पश्चात्।
हिन्दी अनुवाद / भावार्थ – विद्या विनम्रता देती है, विनम्रता के कारण मनुष्य योग्यता को प्राप्त करता है, योग्य व्यक्ति सरलता से धन प्राप्त करता है, धन से धर्म का आचरण करता है और धर्म के आचरण से व्यक्ति सुख प्राप्त करता है, इसलिए विद्या अवश्य ही सुख प्रदान करती है।
अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥
पदच्छेदः – अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते जननी जन्मभूमिः च स्वर्गात् अपि गरीयसी।
अन्वयः – हे लक्ष्मण ! स्वर्णमयी अपि लङ्का मे (मह्यं) न रोचते । यतो हि जननी जन्मभूमिः च स्वर्गात् अपि गरीयसी (भवति)।

कठिन – शब्दार्थ- स्वर्णमयी स्वर्ण (सोना) से निर्मित। मे = मुझे। न रोचते = अच्छा नहीं लगता है। जननी = माता। गरीयसी = श्रेष्ठ।
हिन्दी अनुवाद / भावार्थ – श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं कि हे लक्ष्मण ! यद्यपि लंका सोने (स्वर्ण) से निर्मित है, फिर भी लंका में निवास करना मुझे अच्छा नहीं लगता है, क्योंकि माता और मातृभूमि ये दोनों स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं। इसलिए मातृभूमि में ही निवास करना उचित है।
पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम्॥
पदच्छेदः – पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम् कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद् धनम्।
अन्वयः – पुस्तकस्था तु या विद्या (अस्ति), परहस्तगतं (च यद्) धनम् (अस्ति), (तद् उभयम् अपि) कार्यकाले समुत्पन्ने (सति) न सा विद्या, न (च) तद् धनम् (स्वस्य उपयोगाय भवति)।
कठिन शब्दार्थ- पुस्तकस्था = पुस्तक में लिखा हुआ। या = जो। परहस्तगतम् = दूसरे के हाथ में गया हुआ। कार्यकाले समुत्पन्ने = समय आने पर आवश्यकता होने पर।
हिन्दी अनुवाद / भावार्थ- किसी के पास अनेक पुस्तकें हैं, किन्तु यदि उनको कभी भी नहीं पढ़ी हैं, तो पुस्तक में लिखा हुआ ज्ञान अवसर आने पर सहायक नहीं होता है, अपितु बुद्धि में स्थित विद्या (ज्ञान) ही कार्य सिद्ध करती है। इसी प्रकार दूसरों को दिया गया धन भी समय आने पर सहायक नहीं होता है, अपने हाथ में जो धन होता है वही धन कार्य को सिद्ध करता है। अतः हमें पुस्तकों का अध्ययन करके ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।