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सामाजिक विज्ञान (Social Science)हिंदी माध्यम2026-27

RBSE Class 7 Social Science Chapter 11 Solutions in Hindi — वस्तु विनिमय से मुद्रा तक

📅 अंतिम अपडेट: 2026-09-09📖 RBSE/NCERT Solutions

Class 7 SST Chapter 11 Question Answer in Hindi वस्तु विनिमय से मुद्रा तक

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Class 7 Social Science Chapter 11 Question Answer in Hindi

वस्तु विनिमय से मुद्रा तक कक्षा 7 प्रश्न उत्तर

Class 7 Samajik Vigyan Chapter 11 Question Answer वस्तु विनिमय से मुद्रा तक

महत्त्वपूर्ण प्रश्न (पृष्ठ संख्या 229)

प्रश्न 1.
मुद्रा प्रचलन से पहले विनिमय कैसे होता था?
उत्तर:
मुद्रा प्रचलन से पहले विनिमय ‘वस्तु विनिमय प्रणाली’ से होता था। इसमें लोग अपनी वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय अन्य वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए करते थे। यह मुद्रा का प्रयोग किए बिना वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान करने का एक तरीका है। उदाहरण के लिए, आपको एक पेंसिल की आवश्यकता है और आपके पास एक अतिरिक्त रबर है। इसी बीच पता चलता है कि आपका एक सहपाठी रबर लाना भूल गया है, किन्तु उसके पास अतिरिक्त पेंसिल है। ऐसे में आप अपने अतिरिक्त रबर का विनिमय अपने सहपाठी के अतिरिक्त पेंसिल के साथ कर सकते हैं। इस तरीके से वस्तु विनिमय प्रणाली संचालित होती थी।

प्रश्न 2.
मुद्रा प्रचलन में क्यों आई?
उत्तर:
जैसे-जैसे विनिमय की जाने वाली वस्तुओं के प्रकार और संख्या बढ़ने लगी और वस्तु विनिमय सुदूर क्षेत्रों तक होने लगा, तो वस्तु विनिमय प्रणाली की निम्नलिखित समस्याओं से व्यापार में कठिनाई आने लगी। ये समस्यायें थीं- (1) आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या, (2) मूल्य के कोई सामान्य मापक का न होना, (3) वस्तु की विभाज्यता की समस्या, (4) सुवाह्यता और (5) टिकाऊपन की समस्या।

इन समस्याओं के कारण अब विनिमय की एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता होने लगी, जिसमें एक सामान्य वस्तु विनिमय का माध्यम हो क्योंकि एक सामान्य विनिमय माध्यम ही व्यापार को आसान बना सकता था। फलतः एक सामान्य विनिमय माध्यम के रूप में मुद्रा अस्तित्व में आई।

प्रश्न 3.
समय के साथ मुद्रा विभिन्न रूपों में कैसे परिवर्तित हुई?
उत्तर:
मुद्रा की सिक्का प्रणाली-
(1) सिक्के— मुद्रा के सबसे प्राचीन रूपों में से एक हैं। सिक्के महंगी धातुओं, जैसे—सोना, चाँदी और ताँबा अथवा मिश्रधातु के बनाए जाते थे। सिक्के ढालना एवं सिक्के जारी करना पूर्णतया शासकों के द्वारा नियंत्रित था। सिक्कों के प्रयोग से भारत को विश्व में समुद्री व्यापार बढ़ाने में सहायता मिली।
लेकिन समय के साथ व्यापार में वृद्धि व विस्तार होने से मुद्रा की सिक्का प्रणाली में दो समस्यायें सामने आई –

  1. बड़ी मात्रा में सिक्के ले जाना कठिन होता था।
  2. सिक्कों को संग्रहित करना भी एक बड़ी समस्या थी। अतः सिक्का प्रणाली की उक्त कठिनाइयों से मुक्ति पाने के लिए कागजी मुद्रा प्रयोग में आई।

(2) कागजी मुद्रा— कागजी मुद्रा पहली बार चीन में प्रयोग की गई और भारत में इसे 18वीं शताब्दी के अंत में प्रयोग में लाया गया।
अब सिक्कों का प्रयोग सामान्यतः छोटे मूल्यों के लिए, जबकि कागजी मुद्रा का प्रयोग बड़े मूल्यों के लेन-देन हेतु किया जाने लगा ।

(3) मुद्रा के नए रूप (डिजिटल मुद्रा)— समय के साथ तकनीकी प्रगति के कारण वर्तमान में मुद्रा के अनेक रूपों का प्रयोग होने लगा है, जैसे—क्यू. आर. कोड, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, नेट बैंकिंग, यू.पी.आई. आदि । इसे डिजिटल मुद्रा कहा जाता है, जो इलेक्ट्रॉनिक रूप में होती है। इसका रूप अमूर्त है, जिन्हें हम न छू सकते हैं और न ही महसूस कर सकते हैं।

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 232)

प्रश्न – इन स्थितियों (पाठ्यपुस्तक के पृष्ठ 231 और 232 में ) में आपको किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा ?
उत्तर:
दी गई स्थितियाँ वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों से संबंधित है। इन स्थितियों में हमें आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की चुनौती, मूल्य के सामान्य मापक की चुनौती, वस्तुओं की विभाज्यता की चुनौती, सुवाह्यता की चुनौती तथा टिकाऊपन की चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 233)

प्रश्न— उपर्युक्त उदाहरण में आवश्यकताओं के द्विसंयोग के क्या दृष्टांत हैं? उपर्युक्त स्थिति में वे कौनसे मामले हैं, जहाँ आपको मूल्य के सामान्य मानक माप की कमी का सामना करना पड़ सकता है?
उत्तर:
उपर्युक्त उदाहरण वस्तु विनिमय प्रणाली का है जिसमें एक किसान एक बैल के बदले एक जोड़ी नए जूते, एक स्वेटर और अपनी दादी के लिए दवाइयाँ लेना चाहता है। प्रथमतः एक ऐसा व्यक्ति खोजना मुश्किल है कि वह विनिमय के लिए जूते, स्वेटर और दवाइयाँ रखता हो। यदि कोई व्यक्ति ये चीजें रखता भी हो तो यह आवश्यक नहीं है कि उसे बैल की आवश्यकता हो। ऐसी स्थिति सीधे द्विसंयोग होना अत्यन्त कठिन है।

इसके लिए उसे बहुत सारे विनिमयों या आदान-प्रदान की शृंखला से गुजरना होगा। जैसे—उसे पहले ऐसे व्यक्ति को खोजना होगा जो बैल के बदले कई गेहूँ के बोरे दे सके। इसके बाद उसे वह सारा गेहूँ कई स्थानों पर ले जाना होगा, जैसे— प्रथमत: उसे ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ना होगा जो जूतों के बदले गेहूँ का कुछ भाग लेने को तैयार हो, फिर उसे दूसरा व्यक्ति स्वेटर के लिए और तीसरा दवाइयों के लिए खोजना होगा, जो गेहूँ के बदले इन चीजों को देने को तैयार हो।

इस प्रकार किसान को एक बैल के बदले जूते, स्वेटर और दवाइयों के लिए चार दोहरे संयोग की आवश्यकता पड़ी। उपर्युक्त संयोगों की स्थति में भी यह तय करना कि कितने अनुपात में दोनों वस्तुओं का विनिमय किया जाए, कठिन हो जाता है क्योंकि ऐसे मामलों में एक वस्तु की मूल्य तुलना दूसरी वस्तु से करना कठिन हो जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि इन दोहरे संयोगों में मूल्य का कोई सामान्य मापक उपलब्ध नहीं है।

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 233)

प्रश्न- ऐसे कुछ उपाय सुझाइए जिससे मुद्रा के प्रयोग द्वारा किसान की स्थिति को सरल बनाया जा सके।
उत्तर:
चूंकि किसान एक बैल का विनिमय कर बदले में जूते, स्वेटर और दवाइयाँ लेना चाहता है। वह किसान सबसे पहले अपने बैल को मुद्रा के बदले बेच देगा और फिर उस मुद्रा से आसानी से वह आवश्यक वस्तुएँ अलग- अलग व्यक्तियों से खरीद सकता है। ऐसा करने पर उसे दोहरे संयोग, विभाज्यता, सुवाह्यता और टिकाऊपन की समस्या से मुक्ति मिल जायेगी।

आइए विचार करें (पृष्ठ संख्या 237)

प्रश्न- मान लीजिए कि आपको एक पुस्तक खरीदनी है। आपकी जेब में ₹ 50 हैं। आप अपने पड़ौस की पुस्तक की दुकान पर जाते हैं और वहाँ दुकानदार आपको पुस्तक की कीमत ₹ 100 बताता है। आपके पास आज पुस्तक खरीदने के क्या विकल्प हैं? क्या आप दुकानदार को शेष भुगतान बाद में करने की अनुमति देने का अनुरोध करेंगे?
उत्तर:
यदि हमारे पास डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड होगा तो हम शेष ₹50 का भुगतान उससे कर देंगे। दूसरे, हम दुकानदार को शेष भुगतान बाद में करने की अनुमति देने का अनुरोध करेंगे।

तीसरे, अंतिम विकल्प के रूप में हम अपने घर वापस लौटकर, वहाँ से ₹50 और लाकर दुकानदार को ₹100 देकर पुस्तक प्राप्त कर लेंगे। चूंकि दुकान हमारे पड़ौस में ही स्थित है।

आइए पता लगाएँ (पृष्ठ संख्या 237)

प्रश्न 1.
पाठ्यपुस्तक के चित्र 11.10 (पृष्ठ 238) में दी गई समय रेखा को देखें। आपने मुद्रा में क्या-क्या बदलाव देखे हैं?
उत्तर:
समय रेखा में दी गई मुद्राओं को देखकर हमने मुद्रा में निम्न बदलाव देखे हैं-

  1. 1000 सा.सं. पूर्व से 600 सा.सं. पू. तक कौड़ी मुद्रा के रूप में रही।
  2. 600 सा.सं. पू. से 1860 सा.सं. तक धातु के सिक्कों ने मुद्रा का रूप ले लिया और धातु के सिक्के इस काल में मुद्रा के रूप में प्रचलन में रहे।
  3. 1861 सा.सं. से सरकारी कागजी मुद्रा प्रचलन में आई।
  4. 1980 सा.सं. से डिजिटल मुद्रा (डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड आदि) प्रचलन में आई।
  5. 2016 सा.सं. से यू.पी.आई. मुद्रा के रूप में प्रचलन में आई।

वर्तमान में धातु मुद्रा, सरकारी कागजी मुद्रा, डिजिटल मुद्रा व यू.पी.आई. सभी मुद्रा के रूप में प्रचलन में हैं।

आइए पता लगाएँ (पृष्ठ संख्या 239)

प्रश्न 1.
पाठ्यपुस्तक के पृष्ठ 239 पर चित्र 11.12 में दर्शाए गए सिक्के तमिलनाडु में स्थित पुड्डूकोटाई में उत्खनन के समय मिले हैं। उनके ‘शीर्ष’ पर रोमन राजाओं की आकृति उकेरी हुई है। इस तरह की जानकारियों के द्वारा हम क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं?
उत्तर:
इस तरह की जानकारियों के द्वारा हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि ये सिक्के दक्षिण भारत की विश्व के अन्य भागों से जुड़ी तात्कालिक व्यापारिक गतिविधियों को दर्शाते हैं कि उस समय भारत का व्यापार समुद्र पार के देशों से था। दूसरे, इस जानकारी से यह भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उस समय व्यापार भारत के पक्ष में था।

आइए पता लगाएँ (पृष्ठ संख्या 241)

प्रश्न 1.
आपके विचार में क्या हुआ होगा जब सिक्कों का प्रयोग हर प्रकार के लेन-देन के लिए शुरू हुआ होगा, चाहे वह सब्जियाँ हों या जमीन खरीदना हो ? ऐसी क्या समस्याएँ उत्पन्न हुई होंगी?
उत्तर:
जब सिक्कों का प्रयोग हर प्रकार के लेन-देन में शुरू हुआ होगा तो दो प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हुई होंगी-

  1. बड़ी मात्रा में सिक्के ले जाना कठिन होता होगा।
  2. सिक्कों को संगृहीत करना भी एक समस्या बन गई होगी।

कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान पाठ 11 के प्रश्न उत्तर

प्रश्न और क्रियाकलाप

प्रश्न 1.
वस्तु विनिमय प्रणाली कैसे कार्य करती थी और इस प्रणाली में किस प्रकार की वस्तुओं का प्रयोग विनिमय हेतु किया जाता था?
उत्तर:
वस्तु विनिमय प्रणाली मुद्रा का प्रयोग किए बिना वस्तुओंऔर सेवाओं का आदान-प्रदान करने का एक तरीका था। जैसे— सब्जी वाले दुकानदार से किसान द्वारा अनाज का कुछ भाग देकर सब्जी लेना। इसमें सब्जी के वजन के बदले उतने वजन का गेहूँ लेना या गेहूँ के वजन के बदले दुगुने वजन की सब्जी लेना। यह निर्धारण दोनों पक्ष आपस में करते थे। उस समय लोग विनिमय के लिए कौड़ी, कवच, नमक, चायपत्ती, तंबाकू, कपड़ा, पशुधन, बीज आदि जैसी वस्तुओं के लिए करते थे।

प्रश्न 2.
वस्तु विनिमय प्रणाली की क्या सीमाएँ थीं?
उत्तर:
वस्तु विनिमय प्रणाली की निम्नलिखित सीमाएँ थीं-
(1) आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की सीमा—वस्तु विनिमय में ऐसे दोहरे संयोग की आवश्यकता होती है, जिसमें एक व्यक्ति को जिस वस्तु की आवश्यकता है, वही वस्तु दूसरे के पास अतिरिक्त हो तथा दूसरे को जो चाहिए वह पहले के पास अतिरिक्त हो तथा दोनों आपस में अतिरिक्त वस्तुओं के लेन-देन हेतु तैयार हों।

(2) मूल्य के कोई सामान्य माप का न होना— एक वस्तु के मूल्य की तुलना दूसरे वस्तु से करना कठिन होता था क्योंकि मूल्य का कोई सामान्य मानक माप उपलब्ध नहीं होता था।

(3) वस्तु की विभाज्यता की समस्या— लोग छोटी चीजों को खरीदने हेतु बड़ी चीजों को बाँट नहीं सकते थे। उदाहरण दवाई लेने के लिए किसान बैल को बाँट नहीं सकता।

(4) सुवाह्यता की समस्या— बड़े और भारी सामानों को वस्तु विनिमय हेतु हर जगह ले जाना कठिन होता था।

(5) टिकाऊपन की समस्या— खराब होने वाली चीजों को अधिक समय तक रखा नहीं जा सकता था।

प्रश्न 3.
प्राचीन भारतीय सिक्कों की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:
प्राचीन भारतीय सिक्कों की मुख्य विशेषताएँ—

  1. सिक्के महँगी धातुओं, जैसे— सोना, चाँदी और ताँबा अथवा उनकी मिश्रधातु से बनाए जाते थे।
  2. सिक्कों को कार्षापण या पण अथवा हण कहा जाता था। उन पर अंकित चिह्न को ‘रुपा’ कहा जाता था।
  3. प्राचीन समय के सिक्के के दो पहलुओं-सिक्के के शीर्ष और पृष्ठ पर विभिन्न प्रकार के चिह्न और आकृतियाँ उकेरी जाती थीं। इनमें प्राकृतिक आकृतियाँ, जैसे—जानवर, वृक्ष, पहाड़ और उस समय के राजा-रानी या देवी-देवताओं की छवियाँ शामिल हैं।

प्रश्न 4.
समय के साथ मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में कैसे परिवर्तित हुई?
उत्तर:
इस प्रश्न के उत्तर के लिए पाठगत प्रश्नों में दिए गए महत्त्वपूर्ण प्रश्न— ‘समय के साथ मुद्रा विभिन्न रूपों में कैसे परिवर्तित हुई?’ का उत्तर देखें।

प्रश्न 5.
प्राचीन काल में कौन-कौनसे कदम उठाए गए होंगे जिससे भारतीय सिक्के विभिन्न देशों में विनिमय का माध्यम बने?
उत्तर:
प्राचीन भारत में, भारतीय सिक्कों को विभिन्न देशों में विनिमय का माध्यम बनाने के लिए कई कदम उठाए गए। यथा—-
(1) मूल्यवान धातुओं का उपयोग— सोने और चाँदी जैसी कीमती धातुओं से सिक्के बनाए जाते थे, जो उनकी अन्तर्निहित मूल्य और स्वीकार्यता को सुनिश्चित करते थे।

(2) शाही चिह्न और प्रतीक— शासकों ने अपने सिक्कों पर अपने चित्र, शाही चिह्न और प्रतीकों की मुहर लगाई, जिससे यह पता चलता था कि सिक्का प्रामाणिक और राज्य द्वारा अधिकृत है।

(3) गुणवत्ता और शुद्धता का आश्वासन– सिक्कों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए शासकों ने सुनिश्चित किया कि वे उच्च गुणवत्ता वाली धातुओं से बने हों और शुद्धिकरण प्रक्रियाओं का पालन करें।

(4) मानकीकरण और वजन— सिक्कों के लिए एक मानकीकृत वजन प्रणाली (जैसे—32 रत्ती या लगभग 56 ग्रेन) स्थापित की गई, जिससे व्यापार में एकरूपता आई।

(5) व्यापार मार्ग और नेटवर्क— भारतीय व्यापारियों और साम्राज्यों ने दूर-दराज देशों के साथ व्यापार के लिए एक नेटवर्क स्थापित किया, जिससे भारतीय सिक्के विभिन्न क्षेत्रों में आसानी से पहुँच गए।

(6) विभिन्न प्रकार के सिक्के— विभिन्न मूल्यवर्ग के सिक्के जारी किए गए, जिससे विभिन्न प्रकार के लेन-देन की सुविधा हुई।

(7) प्रशासन और नियंत्रण— सिक्कों की जालसाजी को रोकने और मुद्रा व्यवस्था नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने कदम उठाए।

प्रश्न 6.
अर्थशास्त्र की निम्नलिखित पंक्तियाँ पढ़ें-
’60 पणों का एक वर्ष का वेतन प्रतिदिन एक अधक अनाज से प्रतिस्थापित हो सकता है, जो चार बार के भोजन के लिए पर्याप्त था…’ (एक अधक लगभग 3 किलोग्राम के बराबर होता है।)

यह एक पण के मूल्य के विषय में क्या बताता है? पड़ौसी की सहायता न करने का दंड 100 पण था। इसकी तुलना वार्षिक वेतन से करें। इससे आप मानवीय मूल्यों के बारे में क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं, जो इसके माध्यम से प्रोत्साहित किए जा रहे थे?
उत्तर:
यह एक पण के मूल्य 50 ग्राम अनाज के बराबर बताता है।

100 पण दण्ड का अभिप्राय 5 किलोग्राम अनाज, जो एक वर्ष के वेतन से 40 पण ( अर्थात् 2 किलोग्राम अनाज) अधिक है। इससे मानवीय मूल्य के बारें में हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि मानवीय श्रम की कीमत कुछ भी नहीं थी तथा पड़ौसी की सहायता हर हालत में करनी चाहिए। यह सहायता आपके वार्षिक वेतन के मूल्य से कहीं अधिक महत्व की है।

प्रश्न 7.
एक नाटक लिखिए और उसका मंचन कीजिए जिसमें यह दिखाया जाए कि लोग एक-दूसरे को कौड़ी, कवच (और ऐसी अन्य वस्तुओं) को विनिमय के माध्यम के रूप में प्रयोग के लिए कैसे तैयार हो सके होंगे?
उत्तर:
यह कार्य विद्यार्थी अपने कक्षाध्यापक की सहायता व अन्य सहपाठियों की सहायता से स्वयं करें।

प्रश्न 8.
भारत में भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी.आई.) ही कागजी मुद्रा को छापने व वितरण करने का एकमात्र वैधानिक स्रोत है। नोटों की अवैध छपाई और उनके दुरुपयोग को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने कई सुरक्षा कदम उठाए हैं। पता लगाइए कि ऐसे कुछ उपाय कौन-से हैं और अपनी कक्षा में उनकी चर्चा कीजिए।
उत्तर:
भारतीय रिजर्व बैंक जालसाजी और अवैध छपाई व उनके दुरुपयोग को रोकने के लिए नोटों में कई सुरक्षा उपाय शामिल करता है, जैसे—सुरक्षा धागा, छिपे हुए डिजाइन, वॉटरमार्क होलोग्राफिक तकनीक, जाली नोटों की पहचान और रोक आदि कदम उठाता है। यथा—
(1) सुरक्षा धागा— नोटों के बीच में से एक खास चाँदी का सुरक्षा धागा होता है और मशीन द्वारा पढ़ा जा सकता है। नोट को तिरछा करने पर भी यह दिखाई देता है।

(2) छिपे हुए डिजाइन— कुछ सुरक्षा सुविधाएँ मुद्रण प्रक्रिया के दौरान शामिल की जाती हैं ताकि उन्हें फोटोकापी करने पर आसानी से अलग रंग दिखाई दे।

(3) वाटरमार्क— ये नोटों की बनावट में शामिल किए। जाते हैं और ये भी जालसाजी रोकने में मदद करते हैं।

(4) होलोग्राफिक तकनीक— यह तकनीक नोटों को अधिक सुरक्षित बनाती है और जालसाजी को रोकती है।

(5) जाली नोटों की पहचान और रोक– जाली नोटों की पहचान के लिए, आर.बी.आई. नोटों में कई सुरक्षा उपाय करता है। इन उपायों का उल्लंघन करना दण्डनीय अपराध है।
[नोट-विद्यार्थी अपनी कक्षा में इन सुरक्षा कदमों की चर्चा करें।]

प्रश्न 9.
अपने परिवार के कुछ सदस्यों और स्थानीय दुकानदारों का साक्षात्कार कीजिए और उनसे पूछिए कि वे भुगतान करने या प्राप्त करने में नकद या यू.पी.आई. में किसको वरीयता देंगे और क्यों?
उत्तर:
विद्यार्थी अपने परिवार के सदस्यों और स्थानीय दुकानदारों से साक्षात्कार कर इसका उत्तर खोजें।