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सामाजिक विज्ञान (Social Science)हिंदी माध्यम2026-27

RBSE Class 7 Social Science Chapter 5 Solutions in Hindi — साम्राज्यों का उदय

📅 अंतिम अपडेट: 2026-09-09📖 RBSE/NCERT Solutions

Class 7 SST Chapter 5 Question Answer in Hindi साम्राज्यों का उदय

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Class 7 Social Science Chapter 5 Question Answer in Hindi

साम्राज्यों का उदय कक्षा 7 प्रश्न उत्तर

Class 7 Samajik Vigyan Chapter 5 Question Answer साम्राज्यों का उदय

महत्त्वपूर्ण प्रश्न (पृष्ठ संख्या 83)

प्रश्न 1.
साम्राज्य क्या होता है?
उत्तर:
साम्राज्य अनेक छोटे-छोटे राज्यों या क्षेत्रों से मिलकर बना एक संघ होता है। प्रायः इन छोटे-छोटे राज्यों को जीतकर उन पर एक शक्तिशाली शासक या शासक समूह शासन करता था। यद्यपि इन छोटे-छोटे क्षेत्रों में अपने-अपने राजा होते थे, किन्तु वे सम्राट के अधीन होते थे सम्राट ही अपनी राजधानी से सम्पूर्ण साम्राज्य का शासन चलाता था।

प्रश्न 2.
साम्राज्यों का उदय कैसे हुआ और उन्होंने भारतीय सभ्यता को कैसे आकार दिया?
उत्तर:
साम्राज्यों का उदय कई कारणों से हुआ। कृषि के विकास से अधिक उत्पादन हुआ, जिससे शासकों को कर वसूलने और बड़ी सेनाएँ रखने में सहायता मिली। लोहे के औजारों और हथियारों के प्रयोग से सैन्य शक्ति बढ़ी। कुशल प्रशासन, स्थायी सेनाएँ और सुदृढ़ शासन व्यवस्था ने छोटे राज्यों को जीतकर बड़े साम्राज्य बनाने में मदद की। मौर्य और गुप्त जैसे साम्राज्यों का उदय इसी प्रकार हुआ।

• साम्राज्यों ने भारतीय सभ्यता को गहराई से आकार दिया। उन्होंने कानून और प्रशासन की सुव्यवस्थित प्रणाली विकसित की, सड़कों तथा व्यापार मार्गों का विस्तार किया। विदेशी तथा आंतरिक व्यापार को बढ़ावा दिया। कला, वास्तुकला तथा साहित्य को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। साम्राज्यों ने सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया और भारत की प्राचीन सभ्यता को एक संगठित स्वरूप प्रदान किया।

प्रश्न 3.
राज्य से साम्राज्य बनने में कौन-कौनसे तत्त्व सहायक हुए?
उत्तर:
राज्य से साम्राज्य बनने में निम्नलिखित तत्त्व सहायक हुए-

  1. शासक की प्रसिद्धि प्राप्त करने की इच्छा।
  2. शक्ति अर्जित कर एक विशाल भू-प्रदेश को अपने अधीन करना।
  3. सैन्य शक्ति को बढ़ाना और उसे नियंत्रित करना।
  4. संसाधनों एवं आर्थिक जीवन को नियंत्रित करना।
  5. स्वयं एवं अपने साम्राज्य के लिए महान संपदा प्राप्त करने की इच्छा।उपरोक्त कारणों से कोई राजा अपना राज्य बढ़ाकर सम्राट बनना चाहता होगा।

प्रश्न 4.
छठीं शताब्दी सा.सं.पू. से दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. तक का जीवन कैसा था?
उत्तर:
छठीं शताब्दी सा.सं.पू. से दूसरी शताब्दी सा.सं. पू. तक का जीवन इस प्रकार था-

  1. जनसंख्या का एक बड़ा भाग कृषि में संलग्न था। कृषक तथा कृषि के सहायक कार्य से सम्बद्ध लोग गाँवों में निवास करते थे।
  2. लोहार, कुम्हार, बढ़ई, जौहरी और अन्य कारीगर नगरों में रहते थे। नगर भली-भांति योजनाबद्ध थे तथा सड़कों पर पहचान सूचक लगे होते थे।
  3. संदेशवाहकों के माध्यम से संचार होता था जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर संदेश पहुँचाते थे।
  4. घर लकड़ी के बने होते थे और दो मंजिल तक ऊँचे हो सकते थे।
  5. लोग सूती कपड़े पहनते थे, जो घुटनों से नीचे टखनों पहुँच थे।
  6. लोग चमड़े के बने जूते पहनते थे।
  7. नगरों के बाजार चहल-पहल से भरे तथा वाणिज्यिक गतिविधि के प्रमुख केन्द्र थे।

आइए पता लगाएँ (पृष्ठ संख्या 89)

प्रश्न 1.
साम्राज्य विस्तृत भू-भागों में फैले होते थे, जिनमें अनेक प्रकार की भाषाएँ, परम्पराएँ और संस्कृतियों वाले जन रहते थे। आपके विचार से सभी लोग सौहार्दपूर्वक रहें, यह सम्राटों ने कैसे सुनिश्चित किया होगा?
उत्तर:

  1. प्रथमतः सम्राटों ने स्थानीय राजाओं या प्रमुखों को अपने प्रति निष्ठा तथा भेंट के बदले अपने क्षेत्रों का प्रशासन करने की अनुमति देकर सभी प्रकार के लोगों का सौहार्दपूर्वक रहना सुनिश्चित किया होगा।
  2. आर्थिक गतिविधियों को सुगम बनाने के लिए उन्होंने सम्पूर्ण साम्राज्य में तथा इसके बाहर भी व्यापारिक मार्गों की स्थापना एवं नियंत्रण स्थापित किया होगा।
  3. कृषक, व्यापारी, पशुपालक, साहूकार तथा शिल्पकार सभी श्रेणियों को अपने आंतरिक नियमों के निर्माण की स्वतंत्रता प्रदान की होगी तथा राजा इसमें हस्तक्षेप नहीं करता होगा। इस प्रकार सम्राटों ने स्थानीय संस्थाओं को स्वायत्त रूप से कार्य करने देने तथा उनमें अनावश्यक हस्तक्षेप न करके सभी लोगों का सौहार्दपूर्वक रहना सुनिश्चित किया होगा।

प्रश्न 2.
एक विशाल साम्राज्य का संचालन करना अनेक प्रकार की कठिनाइयों से भरा होता है, फिर भी कोई राजा अपना राज्य बढ़ाकर सम्राट क्यों बनना चाहता होगा? नीचे कुछ संभावित उत्तर दिए गए हैं, आप चाहे तो इसमें और भी उत्तर जोड़ सकते हैं।
• ‘संपूर्ण विश्व पर शासन करने की महत्त्वाकांक्षा अर्थात् एक बड़े प्रदेश को नियंत्रण में रखना एक ऐसा रूपक है, जिससे संकेत मिलता है कि वह विशाल क्षेत्र पर अधिकार करना चाहता था तथा यह सुनिश्चित करना चाहता था कि भावी पीढ़ियाँ उन्हें याद रखेंगी।
• एक विशाल भू-प्रदेश को अपने अधीन कर, वहाँ के संसाधनों का प्रयोग कर अपनी आर्थिक एवं सैन्य शक्ति बढ़ाने की इच्छा।
• स्वयं एवं अपने साम्राज्य के लिए महान संपदा प्राप्त करने की उत्कंठा।
उत्तर:
कोई राजा अपना राज्य बढ़ाकर निम्न कारणों से सम्राट बनना चाहता होगा-

  • कुछ राजा या शासक अपनी संस्कृति, विचारधारा को बड़े क्षेत्रों में फैलाना चाहते थे।
  • कुछ शासकों का मानना हो सकता है कि अपने धर्म को फैलाने के लिए बड़े क्षेत्रों पर शासन करना उनका नैतिक, धार्मिक कर्तव्य है।

आइए पता लगाएँ (पृष्ठ संख्या 93)

प्रश्न 1.
व्यापारिक मार्गों के मानचित्र (पृष्ठ 92) का अवलोकन करें। उन भौगोलिक विशेषताओं की पहचान करें, जिन्होंने व्यापारियों को उपमहाद्वीप में यात्रा करने में सहायता की?
उत्तर:
विद्यार्थी इसे स्वयं करें।

प्रश्न 2.
उन सड़कों पर तत्कालीन समय में परिवहन के कौन-कौन से साधन उपलब्ध रहे होंगे? अनुमान लगाएँ।
उत्तर:
उस समय सड़कों पर संभवतः बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी, खच्चर, घोड़े आदि साधन उपलब्ध रहे होंगे।

आइए पता लगाएँ (पृष्ठ संख्या 103)

प्रश्न 1.
आपके अनुसार ग्रामीण क्षेत्र का विशेष ध्यान रखना क्यों महत्वपूर्ण था?
उत्तर:
हमारे अनुसार ग्रामीण क्षेत्र का विशेष ध्यान रखना इसलिए आवश्यक था क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र में प्रमुखतः किसान और पशुपालक रहते थे जिनका प्रमुख काम कृषि करना तथा पशु पालना था। अतः ग्रामीण क्षेत्र साम्राज्य के लिए राजस्व का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत था।

आइए पता लगाएँ (पृष्ठ संख्या 103)

प्रश्न 1.
अपनी कक्षा में एक सामूहिक चर्चा आयोजित करें और कौटिल्य के साम्राज्य के प्रति विचारों की विशेषताओं की तुलना आधुनिक राष्ट्र से करें।
उत्तर:
कौटिल्य के अनुसार राज्य सात भागों से निर्मित होता है- (1) राजा ( शासक स्वयं) (2) पार्षदों, मंत्रियों और अन्य उच्च अधिकारियों का समूह (अमात्य), प्रश्न और क्रियाकलाप (3) किलेबन्द कस्बे और नगर (दुर्ग), (4) रक्षा एवं कानून व व्यवस्था की शक्तियाँ (दंड), (5) राज्य क्षेत्र तथा उसमें निवास करने वाली जनसंख्या (जनपद), (6) राजकोष या राज्य की सम्पत्ति (कोष), (7) सहयोगी (मित्र)।

कौटिल्य के अनुसार सप्तांग को एक साथ मिलकर एक व्यवस्थित, सुसंरक्षित और समृद्ध राज्य की स्थापना करनी चाहिए ताकि उसे हर परिस्थिति में बनाए रखा जा सके। उन्होंने कानून और व्यवस्था के महत्व पर बल दिया, जिसके लिए एक सशक्त प्रशासन की आवश्यकता है। उन्होंने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए अनेक कानूनों का विवरण दिया और लोगों की भलाई के विरुद्ध किए जाने वाले किसी भी कार्य के लिए दण्ड विधान भी निर्दिष्ट किया। राजा को सदैव प्रजा के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। यदि हम कौटिल्य के उक्त विचारों की विशेषताओं की तुलना आधुनिक राज्य से करें तो अधिकांश आधुनिक राज्य लोकतांत्रिक राष्ट्रीय राज्य हैं। अतः राज्य के स्वामी उस राज्य में निवास करने वाले नागरिक हैं। दूसरे आधुनिक राज्यों का एक संविधान है जिसके अनुसार शासक वर्ग को जनता निर्वाचित करती है जो प्रायः संसद, कार्यपालिका और न्यायपलिका के रूप में होता है। आधुनिक राज्यों की अवधारणा भी लोक कल्याणकारी राज्य की है जो कौटिल्य के विचारों से पूर्णतः मेल खाती है। संसद कानून निर्माण का कार्य करती है तो कार्यपालिका प्रशासनिक व रक्षा का कार्यभार संभालती है।

विद्यार्थी सामूहिक चर्चा आयोजित कर दोनों की विशेषताओं की तुलना स्वयं करें।

आइए पता लगाएँ (पृष्ठ संख्या 109)

प्रश्न 1.
एक इतिहासकार के रूप में अगले पृष्ठ पर प्रस्तुत कलाकृतियों को ध्यान से देखें मौर्य युग के लोगों और जीवन के बारे में आप इनसे क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं?
उत्तर:
विद्यार्थी अपने अध्यापक के मार्गदर्शन से स्वयं निष्कर्ष निकालें।

(संकेत-सामान्यतः मौर्य युग में गंगा के उपजाऊ मैदान से अधिशेष अन्न उत्पादन होने से यहाँ के लोग कला और शिल्प की ओर उन्मुख हुए। विभिन्न कलाकृतियाँ उनके समृद्ध जीवन की ओर इशारा करती हैं। मौर्य काल टेरोकोटा कला, नृत्य कला, धार्मिक जीवन तथा वास्तुकला की उत्कृष्टता से भरा था।)

कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान पाठ 5 के प्रश्न उत्तर

प्रश्न और क्रियाकलाप

प्रश्न 1.
साम्राज्य की विशेषताएँ क्या हैं और यह राज्य से किस प्रकार भिन्न है? इसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
साम्राज्य की विशेषताएँ- साम्राज्य में सम्राट की अपने अधीन राज्यों एवं राजाओं पर केन्द्रीय प्रभुता होती है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ ये हैं—

  1. अधीन राज्यों एवं राजाओं पर नियंत्रण, साम्राज्य विस्तार या बाह्य आक्रमणों से रक्षा हेतु सेना रखना।
  2. शासन संचालन हेतु प्रशासनिक तंत्र का निर्माण एवं संचालन, क्षेत्रों के प्रबंधन, कर संग्रह, विधि व्यवस्था बनाए रखने इत्यादि के लिए अधिकारियों की नियुक्ति।
  3. विधि निर्माण, मुद्रा निर्गत, माप-तौल की मानक प्रणाली की स्थापना तथा व्यापार का नियमन।
  4. संसाधनों (खनिज, वन, कृषि उत्पाद, जनशक्ति) का नियंत्रण व उनका विनियमन।
  5. कला, साहित्य, धर्म, दर्शन तथा ज्ञान केन्द्रों को प्रोत्साहन।
  6. संचार तंत्र (राजमार्ग, नदी, नौवहन) एवं अन्य लोकहितकारी संरचनाओं का निर्माण जिससे प्रशासन, व्यापार एवं जनकल्याण सुचारू रूप से चल सके।

साम्राज्य को जहाँ अधीन राज्यों एवं राजाओं पर नियंत्रण रखने तथा बाह्य आक्रमणों से रक्षा हेतु सेना रखनी पड़ती है, वहाँ राज्य को केवल बाह्य आक्रमणों से रक्षा हेतु सेना रखनी पड़ती है। राज्य के अधीन अन्य राज्य नहीं होते हैं। अन्य विशेषताएँ राज्य और साम्राज्य में समान होती हैं।

प्रश्न 2.
राज्यों से साम्राज्यों में परिवर्तन के लिए महत्त्वपूर्ण कारक क्या हैं?
उत्तर:
राज्यों से साम्राज्यों में परिवर्तन के लिए महत्त्वपूर्ण कारक ये हैं-

(1) सम्राट की महत्त्वाकांक्षा– सम्राट अपने राज्य का विस्तार मुख्यतः प्रसिद्धि पाने, शक्ति अर्जित करने, सैन्य शक्ति तथा संसाधनों और आर्थिक जीवन को नियंत्रित करने के लिए करते थे।

(2) प्रशिक्षित सेनाएँ– राज्य की प्रशिक्षित सेनाएँ राज्यों से साम्राज्यों में परिवर्तन के लिए दूसरा महत्वपूर्ण कारक होता था। प्रशिक्षित सेनाएँ पड़ोसी राज्यों को जीतने, उन पर नियंत्रण स्थापित करने तथा साम्राज्य की सीमाओं की सुरक्षा हेतु भेजी जाती थीं।

(3) सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थलों पर दुर्गयुक्त नगर— राज्यों की सीमाओं पर दुर्गयुक्त नगरों की स्थापना करना।

(4) सीमावर्ती क्षेत्रों को जीतना— साम्राज्य विस्तार हेतु कोई राज्य सर्वप्रथम अपने सीमावर्ती क्षेत्रों पर आक्रमण कर उन्हें विजित करने का प्रयास करता है।

(5) व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण— शासक नदियों तथा व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण करने का प्रयास करते थे क्योंकि इससे उन्हें मूल्यवान साधनों पर अधिकार के साथ-साथ व्यापार से कर राजस्व भी प्राप्त होता था। राज्यों से साम्राज्य विस्तार का यह भी एक महत्त्वपूर्ण कारक रहा था।

(6) प्रबल सैन्य बल और अधिशेष संसाधन– जब अनेक लघु राज्यों में प्रभुत्व के लिए संघर्ष होता था, तब जिस राज्य के पास प्रबल सैन्य बल तथा अधिशेष संसाधन होते थे, वह अन्ततः सार्वभौम अधिपति बनता था।

प्रश्न 3.
एलेक्जेण्डर को विश्व इतिहास में एक महान शासक माना जाता है, आपके विचार से ऐसा क्यों है?
उत्तर:
(1) मैसीडोनिया के एक युवा और शक्तिशाली ग्रीक शासक एलेक्जेण्डर ने ग्रीस पर पूर्व में हुए फारसी आक्रमणों का बदला लेने के लिए फारसी साम्राज्य के विरुद्ध अभियान चलाया और उसने फारसी साम्राज्य पर विजय प्राप्त की जिसके परिणामस्वरूप वहाँ ग्रीक संस्कृति का प्रभाव व्यापक रूप से फैला।

फारसी साम्राज्य पर विजय के बाद उसका साम्राज्य तीन महाद्वीपों में विस्तृत हो गया, जो विश्व इतिहास के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक था। इस कारण एलेक्जेण्डर को विश्व इतिहास में एक महान शासक माना जाता है।

(2) उसकी नीतियों ने पूर्व और पश्चिम के सांस्कृतिक सम्बन्धों को गहरा बनाया।

(3) वह युद्धकौशल, साहस और दार्शनिक दृष्टिकोण से भी प्रसिद्ध रहा। उसके दार्शनिक दृष्टिकोण को ग्रीक और भारतीय दर्शन के बीच वैचारिक संवाद में देखा जा सकता है। जैसे— जिम्नोसोफिस्टों से प्रश्न-उत्तर करवाना।

उपरोक्त कारणों से एलेक्जेण्डर को विश्व इतिहास में एक महान शासक माना जाता है।

प्रश्न 4.
प्रारंभिक भारतीय इतिहास में मौर्य वंश को महत्त्वपूर्ण माना जाता है। कारण बताइए।
उत्तर:
प्रारंभिक भारतीय इतिहास में मौर्य वंश को महत्त्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि शासकों ने एक विशाल साम्राज्य बनाया जिसकी विरासत शताब्दियों तक चली। यथा— (अ) उनकी विरासत में (i) व्यापारिक मार्गों और आर्थिक प्रणालियों को सुदृढ़ करना, (ii) व्यापार के लिए सिक्कों का व्यापक उपयोग, (iii) उत्कृष्ट रूप से संरचित की गई नगरीय बस्तियाँ और (iv) प्रशासन की एक विस्तृत प्रणाली सम्मिलित है। (ब) मौर्य साम्राज्य में कला और वास्तुकला को भी प्रोत्साहन दिया गया। (स) साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र एक प्रमुख नगर और व्यापारिक केन्द्र बनी। (द) सम्राट अशोक ने इस साम्राज्य को धर्म, शांति और कल्याणकारी नीतियों से अद्वितीय बनाया।

प्रश्न 5.
कौटिल्य के कुछ प्रमुख विचार क्या थे? इनमें से कौनसे विचार आप आज भी आस-पास देख सकते हैं?
उत्तर:
कौटिल्य के कुछ प्रमुख विचार- कौटिल्य ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘अर्थशास्त्र’ में रक्षा, अर्थशास्त्र, प्रशासन, न्याय, नगर नियोजन, कृषि व्यवस्था तथा लोक कल्याण जैसे कई विषयों में अपने विचार प्रकट किए हैं। यथा-
(1) सप्तांग सिद्धान्त— उसकी प्रमुख राजनीतिक अवधारणाओं में एक ‘सप्तांग’ सिद्धान्त है जिसके अनुसार राज्य सात भागों से निर्मित होता है। इन सात भागों (सप्तांग) को एक साथ मिलकर एक व्यस्थित, सुसंरक्षित और समृद्ध राज्य की स्थापना करनी चाहिए, ताकि हर परिस्थिति में उसे युद्ध और शांति के लिए गठबंधन के माध्यम से बनाए रखा जा सके। कौटिल्य द्वारा निर्देशित राज्य के ये सात अंग हैं- (1) राजा (स्वामी), (2) अमात्य, (3) दुर्ग, (4) दंड, (5) जनपद (6) कोष तथा (7) मित्र राज्य।

(2) कानून-व्यवस्था— कौटिल्य ने समाज में कानून- व्यवस्था के महत्व पर बल दिया और उसने इसके लिए एक सशक्त प्रशासक की आवश्यकता पर बल दिया। उसने भ्रष्टाचार विरोधी अनेक कानूनों का विवरण दिया और लोगों की भलाई के विरुद्ध किए जाने वाले किसी भी कार्य के लिए दंड विधान भी निर्दिष्ट किया।

(3) प्रजा कल्याण— कौटिल्य का विचार था कि एक राजा को अपनी प्रजा के कल्याण को बढ़ावा देकर अपनी शक्ति में वृद्धि करनी चाहिए। उसका विचार था कि राजा चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे सदा प्रजा के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

कौटिल्य के निम्न विचारों को हम अब भी अपने आस-पास देख सकते हैं—

(1) वर्तमान के प्रजातंत्रीय राष्ट्रीय राज्यों में राज्य के सात अंगों की जगह तीन अंगों की व्यवस्था की गई है। ये अंग हैं- (i) व्यवस्थापिका, (ii) कार्यपालिका और (iii) न्याय-पालिका। कौटिल्य के सातों अंग इन तीनों में समाहित हैं।

(2) वर्तमान समय में भी कानून व्यवस्था और सशक्त प्रशासनिक व्यवस्था पर बल दिया जाता है।

(3) वर्तमान में भी भ्रष्टाचार विरोधी अनेक कानून बने हुए हैं।

(4) प्रजातंत्र राज्यों का आधार ही प्रजा का कल्याण है। आज लोकहितकारी राज्यों की अवधारणा पर बल दिया जाता है।

(5) आर्थिक नीतियाँ कर व्यवस्था, बजट, व्यापार और बाजार पर नियंत्रण आर्थिक सोच का आधुनिक रूप है।

प्रश्न 6.
अशोक और उसके साम्राज्य के बारे में असाधारण बातें क्या थीं? उनमें से कौन-सी बातें आज भी भारत को प्रभावित करती हैं और क्यों? अपने विचार लगभग 250 शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
अशोक के साम्राज्य के बारे में असाधारण बातें ये थीं-
(1) एक महान संचारक के रूप में अशोक – अशोक ने अपने साम्राज्य के कई स्थानों पर चट्टानों या स्तंभों पर शिलालेख उत्कीर्ण करवाए थे। इन शिलालेखों में जन सामान्य को धर्म का पालन करने का संदेश दिया था।

(2) एक परोपकारी और दयालु शासक अशोक ने अपने शिलालेखों में स्वयं को ‘देवताओं के प्रिय’ या ‘दूसरे के प्रति दयालुता से व्यवहार करने वाला’ कहा है।

(3) प्रजा – कल्याण – अशोक ने अपनी प्रजा के कल्याण और उन तक अपने विचार पहुँचाने का निरन्तर प्रयास किया। उन्होंने अपने साम्राज्य के मुख्य सड़कों के किनारे नियमित अन्तराल पर विश्रामगृहों का निर्माण, कुएँ बनवाने और फलदार एवं छायादार वृक्षों को लगवाने का उल्लेख अपने अभिलेखों में किया है। कुछ दक्षिणी राज्य मौर्य साम्राज्य के भाग नहीं थे, लेकिन अशोक ने उनके समग्र कल्याण का समर्थन किया।

(4) प्रकृति और वन्य जीव संरक्षण के कार्य — अशोक ने पशुओं के शिकार और उन पर क्रूरता पर प्रतिबंध लगाया और आवश्यक होने पर उनके लिए उपचार का आदेश दिया।

(5) प्रशासन की निष्पक्षता पर बल — सम्राट अशोक ने यह सुनिश्चित करने की व्यवस्था की कि अधिकारी निष्पक्षता से कार्य करें। वह पाँच वर्ष के अन्तराल में यह देखने के लिए एक महामात्र भेजता था कि प्रशासनिक अधिकारी उनके आदेशों का पालन कर रहे हैं या नहीं।

आज का प्रभाव— आज के भारत पर अशोक की धरोहर गहरी छाप छोड़ती है। धर्मनिरपेक्षता, सभी सम्प्रदायों के प्रति सहिष्णुता की भावना, पर्यावरण संरक्षण, वन्य जीवों के प्रति संवेदनशीलता और सामाजिक कल्याणकारी योजनाएँ उनकी नीतियों के प्रभाव को दिखाती हैं।

प्रश्न 7.
“देवताओं के प्रिय राजा पियदसी कहते हैं- मेरे धम्माधिकारी सार्वजनिक लाभ के लिए अनेक विषयों में व्यस्त हैं। वे सभी सम्प्रदायों के सदस्यों (तपस्वियों और गृहस्थों दोनों) के बीच व्यस्त हैं। मैंने कुछ को बौद्ध संघ, ब्राह्मणों और आजीविकों….. जैनियों…… और विभिन्न सम्प्रदायों के लिए नियुक्त किया है। अधिकारियों की अनेक श्रेणियाँ हैं और उनके कई प्रकार के कर्तव्य हैं। मेरे धम्माधिकारी इन और अन्य संप्रदायों के विषयों में व्यस्त हैं।”

अशोक के उपरोक्त शिलालेख को पढ़ने के उपरांत, क्या आपको लगता है कि वे अन्य धार्मिक विश्वासों और विचारधाराओं के प्रति सहिष्णु थे? अपने विचार कक्षा में साझा कीजिए।
उत्तर:
हाँ, उपरोक्त शिलालेख पढ़ने के उपरांत हमें लगता है कि वे अन्य धार्मिक विश्वासों और विचारधाराओं के प्रति सहिष्णु थे। उन्होंने बौद्ध संघ, ब्राह्मणों, आजीविकों और जैनियों (तपस्वियों और गृहस्थों) का तो इस शिलालेख में उल्लेख ही किया। इसके अतिरिक्त अन्य सम्प्रदायों के बारे में भी कहा है। उन्होंने अपनी समस्त प्रजा के कल्याण हेतु निरन्तर प्रयास किया तथा सभी सम्प्रदायों को एक- दूसरे की उचित शिक्षाओं को स्वीकार करने पर भी बल दिया।

प्रश्न 8.
ब्राह्मी लिपि एक लेखन प्रणाली थी जिसका प्राचीन भारत में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था। इस लिपि के बारे में अधिक जानने का प्रयास कीजिए। जहाँ भी आवश्यक हो, अपने शिक्षक से सहायता लीजिए। एक लघु कार्य परियोजना बनाएँ और इस दौरान आपने ब्राह्मी लिपि के बारे में जो कुछ भी सीखा है, उसे संलग्न कीजिए।
उत्तर:
लिपि वह है जिसमें हम एक भाषा को लिखते हैं। अशोक के अधिकांश शिलालेख प्राकृत भाषा में ब्राह्मी लिपि में लिखे गए थे। ब्राह्मी लिपि भारत की सभी क्षेत्रीय सबसे प्राचीनतम लिपियों में से एक है। लिपियों की जननी मानी जाती है। यह लिपि भारत की सबसे प्राचीनतम लिपियों में से एक है।

यह लिपि व्यंजन स्वर लिपि है जिसमें व्यंजनों में अन्तर्निहित चिह्नों का उपयोग किया जाता है। यह बाएँ से दाएँ लिखी स्वर होता है और अन्य स्वरों को जोड़ने के लिए विशेषक जाती है। इस लिपि का प्रयोग संस्कृत, प्राकृत और पाली जैसी भाषाओं को लिखने के लिए किया जाता है।

लघु कार्य परियोजना : ब्राह्मी लिपि
(1) ब्राह्मी लिपि क्या है?
ब्राह्मी लिपि प्राचीन भारत की सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण लेखन प्रणालियों में से एक है। इसका व्यापक प्रयोग मौर्यकाल में हुआ। यह लिपि मुख्यतः प्राकृत भाषा को लिखने के लिए प्रयुक्त की गई। विद्वान इसे भारत की लगभग सभी आधुनिक लिपियों की जननी मानते हैं।

(2) मुख्य विशेषताएँ—
(i) यह लिपि बाएँ से दाएँ लिखी जाती थी।
(ii) इसमें स्वरों और व्यंजनों के लिए अलग-अलग चिह्न थे।
(iii) यह सरल और व्यवस्थित लिपि थी।

(3) उपयोग
(i) अशोक के शिलालेख और स्तंभ लेख इसी लिपि में लिखे गए।
(ii) इसे व्यापारिक दस्तावेज, प्रशासनिक आदेश तथा धार्मिक ग्रंथों को लिखने में भी उपयोग किया गया।

(4) आधुनिक प्रभाव—
(i) इस लिपि से आगे चलकर देवनागरी, बंगला, गुजराती, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, उड़िया आदि भारतीय लिपियों का विकास हुआ।
(ii) यह भारतीय संस्कृति, इतिहास और लेखन परंपरा की सबसे बड़ी धरोहरों में से एक है।

प्रश्न 9.
मान लीजिए कि आपको तीसरी शताब्दी सा.सं.पू. में कौशांबी से कावेरीपट्टनम की यात्रा करनी है। आप यह यात्रा कैसे करेंगे? इस यात्रा के दौरान आप कहाँ-कहाँ ठहरेंगे और आपको इसमें कितना समय लगेगा?
उत्तर:
यह यात्रा हम दक्षिणापथ के माध्यम से पहले हम कौशांबी से विदिशा, विदिशा से उज्जयिनी तक पहुँचेंगे। तथा वहाँ ठहरेंगे। उज्जयिनी से प्रतिष्ठान तक आयेंगे और यहाँ पुनः ठहरेंगे। प्रतिष्ठान से अन्य मार्ग से स्वर्णगिरि आयेंगे और यहाँ ठहरेंगे। स्वर्णगिरि से चलकर कावेरी नदी के माध्यम से कावेरीपट्टनम पहुँचेंगे। इस यात्रा में परिवहन के निम्न साधन काम में लिये जायेंगे—

(i) बैलगाड़ी— यह लंबी दूरी और सामान ढोने के लिए प्रमुख साधन था।
(ii) घोड़े या पैदल— छोटे मार्गों और कठिन रास्तों के लिए घोड़े द्वारा या पैदल यात्रा की जाती थी।
(iii) नदी मार्ग— इस यात्रा में नर्मदा, गोदावरी जैसी नदियों पर नावों का सहारा लिया जाता था।

ठहरने के मुख्य स्थान– (1) विदिशा, (2) उज्जयिनी, (3) प्रतिष्ठान, (4) स्वर्णगिरी (5) कावेरीपट्टनम (अंतिम गंतव्य स्थान)।

यात्रा की अवधि—

  1. इस यात्रा की कुल दूरी लगभग 1500-2000 किमी की थी।
  2. बैलगाड़ी से प्रतिदिन 20-25 किमी यात्रा संभव थी।
  3. विश्राम और मौसम की बाधाओं सहित इस यात्रा में लगभग 3 महीने लग सकते थे।